संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 45 : मनाली से लेह : एक अविस्मरणीय यात्रा // डा०अमित कुमार सिंह’

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प्रविष्टि क्र. 45

मनाली से लेह : एक अविस्मरणीय यात्रा

डा०अमित कुमार सिंह’

जाड़े की एक अलसाई सुबह। थोड़ी अलमस्त,थोड़ी सुकून की अंगड़ाई। चाय की गर्म चुस्की और दैनिक जागरण के रविवारिय परिशिष्ट ‘झंकार’ का अंतिम पेज। इसमें समूचे विश्व के सबसे सुन्दर पर्वतीय मार्गों के सम्बन्ध में एक लेख प्रकाशित हुआ था। इस लेख में रोमांचकारी यात्रा की सूची में पांच पर्वतीय मार्गों का नाम शामिल था। रोमांचकारी यात्रा की सूची में पहला स्थान था। मनाली से लेह पर्वतीय यात्रा का।

चाय की चुस्की के साथ इसी वर्ष किए मनाली से लेह ( लद्दाख ) यात्रा का एक-एक पन्ना खुलना शुरू हो गया।

उन्नीस जून इस भुलक्कड़ को तारीख भी तुरंत याद आ गई। फ्लेश बेक में मनाली की कहानी मस्तिष्क में तरो-ताज़ा होने लगी। 18 जून की शाम से ही हम लेह यात्रा को लेकर उत्साहित एवं रोमांचित थे।

मनाली में सुबह के चार बजे जब हम ट्रैवलर से लेह- लद्दाख की यात्रा पर चले,तब तेज़ बारिश हो रही थी। चार बजे तैयार रहने की चुनौती। शायद इसलिए हमारी रात्रि-नींद डिस्टर्ब रही। ऐसे में यात्रा के आरम्भ से ही हम निंद्रा देवी के आगोश में कब चले गए,हमें कुछ पता ही नहीं चला। मेरे साथ दो अन्य मित्र भी थे। प्रीतम और सर्वोत्तम।

रोहतांग दर्रे से हमारी गाडी करीब एक घंटे तक गुजरी। मैं इस नज़ारे को लगातार देखता रहा। मेरे एक अन्य मित्र सर्वोत्तम जी बोल उठे-वाह रे परमात्मा। पौ फटने से पहले का अँधियारा,चांदनी रात। बर्फ पर पड़ती चांदनी। इस वक़्त की अनुभूति को शब्दों में समेटना मुश्किल है। सच ही कहा गया है-परमात्मा का दर्शन करना है तो उसे प्रकृति में ढूंढो। मैं हिमालय के दीदार का दीवाना हूँ।

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चित्र :- राह का एक मनोरम दृश्य

उत्तराखंड,हिमाचल प्रदेश और कश्मीर की अधिकांश पहाड़ियों का मैं लुत्फ़ उठा चूका हूँ,चाहे अमरनाथ-यात्रा का आनद हो या हिमाचल में चिट्कुल-सांग्ला घाटी की सादगी,गंगोत्री की पवित्रता हो या फिर गुलमर्ग-सोनमर्ग की रूमानियत,मैंने पहाड़ों की सुन्दरता को छक कर पिया है।

रोहतांग में चाँद और बादल लुका-छिपी खेल रहे थे। कभी-कभी आकाश बादलों से आच्छादित होने पर काला,कभी बादल से छन कर आती थोड़ी चांदनी और कभी चांदनी का बादल के आलिंगन से बाहर आकर अठखेलियाँ करना,इस प्रेम क्रीड़ा में जब चाँद की रोशनी बर्फ से ढके पहाड़ों पर पड़ रही थी,तो उसके परिणामस्वरुप बर्फ से ढके पहाड़ों की सुन्दरता भी बार-बार अपना अक्स बदल रही थी।

चाँद को प्रतीक बनाकर कितने गीत,कविताएँ और कल्पनाएँ रची गयी हैं,लेकिन बादल,चाँद और बर्फ से ढके पहाड़ों के सम्भोग के कारण,जो अनुभव हुआ,उसकी प्रतिछवि और प्रतिबिम्ब किसी गीत में देखने को नहीं मिला है। प्रकृति की इस रतिक्रिया में स्वयं ही एक रचना का अवतरण होने लगा :-

चाँद,

तेरी चांदनी,

और

बादलों से,

तेरी अठखेलियाँ,

तू

बर्फीली पहाड़ियों की

शांति को,

भला

क्यूं,

उकसा रही है,

कामातुर चाँद,

यह तेरी प्रीत है.

या प्रलोभन,

या फिर,

कोई,

रूहानी फलसफा !!

वाकई,यह अद्भुत नजारा था। रोहतांग,मैं पहले भी घूम चूका था। लेकिन दिन के उजाले में। इस समय रोहतांग से गुजरने का वक़्त करीब-करीब ब्रह्ममुहूर्त था। सुबह की नीरव शांति। चांदनी और बर्फीली रास्ते की रतिक्रीड़ा। यह सिलसिला करीब एक घंटे तक चलता रहा।

इन दर्रों के पश्चात् जब हम इस स्वर्ग जैसे अनुभव से आगे बढे,तो हमें कोकसर में चंद्रा नदी देखने को मिली। दर्रों के बाद एकाएक नदी। प्रकृति का यह परिवर्तन अत्यंत सुखद,रोमांचकारी और विस्मयकारी था।

प्रकृति का यही स्वभाव है। प्रकृति स्वयं को कहीं भी दुहराती नहीं है। प्रकृति यांत्रिक नहीं है। उसका कोई ढांचा-सांचा नहीं है। हम प्रकृति जैसे नहीं है। इसलिए हम यांत्रिक हैं और थोड़े बोझिल भी।

प्रकृति की गोद में हुए यात्रा में अनवरत एक आंतरिक तल्लीनता के साथ-साथ अतरंग-संवाद का आनन्द भी हमारे साथ-साथ चल रहा था।

डिम्पू के बाद हम ट्रांडडप के घने जंगल से होकर गुज़रे। एक साथ,पहाड़,नदी और जंगल का दीदार कुछ अद्भुत था और अविस्मरणीय भी। इसी राह में हमें दो विपरीत दिशाओं से आती नदियों का दर्शन हुआ। पहला,चतरा और दूसरा भागा। इस समूची घाटी में ग़ज़ब की विविधता है।

यह विविधता अविस्मरणीय आनन्द देता है। यही कारण है कि इस पर्वतीय यात्रा को संसार का सबसे रोमांचकारी पर्वतीय यात्रा घोषित किया है।

पवित्र नदियों का संगम हम लोगों ने इलाहाबाद में देखा है। संगम पवित्र,दर्शनीय और दिव्य घटना है। किन्तु हमारे समाज ने संगम को गरिमा नहीं दी है। न स्त्री का पुरुष से, न एक जाति का दूसरे से और न ही एक धर्म का दूसरे धर्म से। यधपि इस संगम का अनुकूल माहौल बन सकता है, बनाया जा सकता है लेकिन यह कमबख्त राजनीति ...

प्रेम भी संगम है। पर हम भी अहंकार के कारण कहाँ संगम का लुत्फ़ उठा पाते हैं !!

जिप्सा नामक स्थान भी राह में मिला। यह अत्यंत असमतल था। पेट की पसलियों ने इसका एहसास कराया।

इसके बाद हम लोग एक बार फिर बारलाचा दर्रे से गुज़रे। बर्फीली पहाड़ियों और बर्फ के रास्तों से गुज़रना दिल में कुछ अलग ही गुदगुदी कर रहा था। सूरज सिर पर था। इसकी चमक बर्फ पर पड़ रही थी। इसका दीदार रोहतांग के अनुभव से अलहदा था। सूरज की रोशनी में बर्फ की चमक अत्यन्त चमकीली थी। यहीं आगे चलकर सूरजताल था। यह एक झील थी। पानी हरा, शान्त और निश्चिन्त था। यह चालीस फीसदी जमी हुई थी। पानी थोडा हरा और थोडा नीला प्रतीत हो रहा था। ऐसे अनापेक्षित सौन्दर्य की आभा देखकर आँखें आश्चर्य से अभिभूत थीं।

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चित्र :- सूरजताल झील

सूरजताल से आगे सूरचू था। यह स्थान समुद्र तल से 13,800 फुट ऊंचाई पर स्थित है। यहाँ केम्पिंग की व्यवस्था भी थी। कुछ लोग यहाँ रुके हुए

थे। तेज़, ठंडी हवा बह रही थी, परन्तु यहाँ धुल की अंधड़ भी थी।

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चित्र :- सूरचू

सूरचू ही वह जगह है जहाँ पर जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश की सीमा मिलती

हैं। सरहदों को देखना भी रोमांचक अनुभव होता है। इन्हें देखकर यह प्रतीत होता है कि केवल, लेबल या नाम बदलने से एक अदना सा भूगोल समूचे इतिहास, राजनीतिशास्त्र, समाजशास्त्र एवं अर्थशास्त्र को प्रभावित, प्रेरित और प्रभावित करने लगता है।

प्रकृति में कोई विभाजन नहीं है। मनुष्य ही सरहदें बनाता है। फिर, राज्य और देश को अहंकार से जोड़ता है। ‘अज्ञेय’ ने कहा है कि “राष्ट्रवाद एक संगठित अहंकार” है। राष्ट्रवाद नाहक ही लोगों को कब्ज़ा, सुरक्षा और अधिपत्य के नाम पर लड़ाता-भिड़ाता है। निश्चित ही प्रकृति चुपचाप इन बेवकूफियों को देखती होगी। मन ही मन हंसती भी होगी।

सूरचू के बाद हम लोग पांग में रुके। इसकी ऊँचाई 15,280 फुट है। यहाँ अत्यधिक ठण्ड थी। यहाँ तापमान शून्य से दो डिग्री सेल्सियस नीचे था।

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चित्र :- पांग

यहाँ मुझे फ्रांस के एक दम्पति मिले। उनकी आयु 58 वर्ष की थी और वह साईकिल से लेह के दुर्गम रास्तों में साईकिलिंग का लुत्फ़ उठा रहे थे। उन लोगों से बात करके यही एहसास हुआ कि हम भारतीय चालीस की उम्र से ही बूढ़े हो जाते हैं। कोई जोखिम का भाव नहीं। कोई नयापन नहीं। कोई सृजनात्मकता नहीं। हम शीघ्र ही मृत्यु, बुढ़ापे, और बीमारी की चिंता और चिंतन करने लगते हैं।

इसके बाद दृश्य बदलता है।

पांग की पहाड़ियों के बाद लाटो में अचानक हरियाली के दर्शन हुए। यह भी अजूबा था। सूखे और पीले पहाड़ों की दूर –दूर तक फैली श्रृंखला। इस हरियाली का दीदार आश्चर्य जैसा था।

लाटो के बाद अचानक अलग-अलग रंगों की पहाड़ियों के दर्शन होने लगे। गुलाबी, हरी, पीली, भूरी और थोड़ी-थोड़ी काली भी। इन अलग –अलग रंगों के पहाड़ों की मौजूदगी मुझे अन्दर से पुलकित कर रही थी। विविध रंगों के पहाड़ों को देखने का यह मेरा पहला अनुभव था।

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चित्र :- भूरे-पीले पहाड़ों की आभा

इन रंग-बिरंगे पहाड़ों का अनुभव रोचक था। हिमाचल के अधिकांश पहाड़ हरे हैं। गंगोत्री-यमुनोत्री की राह में पड़ने वाले अक्सर पहाड़ मटमैले। मसूरी के कैम्पटी फॉल के इर्द-गिर्द पहाड़ थोड़े से सूखे हैं। कश्मीर के पहाड़ सुन्दर हैं। थोड़े हरे, थोड़े भूरे और थोड़े छितरे हुए।

लाटो से लेह के दौरान पहाड़ों की विविधता इसकी विशेषता है। हम कल्पना भी नहीं कर सकते हैं कि रंगों के आधार पर पहाड़ों के भी इतने रंग हो सकते हैं।

ऐसा लगता है कि सचमुच प्रकृति की बगिया में ये पहाड़ अलग-अलग फूलों जैसी अपनी छटा बिखेर रहे हैं। यह नज़ारा लाजवाब था। समूचे विश्व में अनोखा।

लाटों से लेह तक पहुँचते-पहुँचते प्रकृति का नज़ारा बदलने लगता है। मनाली से लाटो तक करीब-करीब निर्जन इलाका दिखाई देता है। अकेले पहाड़,अठखेलियाँ करती नदियाँ और ऋषि जैसे शान्त छोटे -छोटे तालाब,झील और पृष्ठभूमि में अलमस्त बर्फ की शिलाएं। बेच-बीच में हमें कहीं-कहीं थोड़ी जनसख्या दिखाई देती है। मुस्तैद खड़े बी०एस०एफ़० के संजीदा जवान। परन्तु लेह से पहले थोड़े बौद्ध स्तूप,सेना के स्थाई कैंटोनमेंट,थोड़े शहर और सड़कों पर दौड़ते कुछ वाहन दिखाई देने लगते हैं।

निर्जनता और एकांत का सुख ही स्वर्गीय आनदं है। शहर में घुसते ही हमारे ट्रैवलर गाडी में हिंदी फिल्म ‘कभी-कभी’ का एक गीत बज उठता है।

तेरे चेहरे से नज़र नहीं हटती,

नज़ारे हम क्या देखें”।

इस गीत का अन्तरा है :-‘रंगों की बरखा है,

खुशबू का साथ है,

किसको पता है

कि अब,

दिन है

कि रात है...

सचमुच मनाली से लेह तक का सफ़र कुछ ऐसा ही सुखद,सुन्दर और स्वप्निल था।

लेखक परिचय :- clip_image011

अज्ञेय पुरस्कार 2016 एवं राजीव गांधी राष्ट्रीय पुरस्कार 2011 से सम्मानित डा० अमित कुमार सिंह पिछले 16 वर्षों से आर० एस० एम० कॉलेज धामपुर,बिजनौर, (उ०प्र०) में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। आप चार पुस्तकों के लेखक हैं

1. भारत – पाक सम्बन्ध : एक नवीन परिप्रेक्षेय,

2. नक्सलवाद : मुद्दे एवं परिप्रेक्ष्य,

3. भूमंडलीकरण और भारत : परिदृश्य एवं विकल्प,

4. अमरनाथ-यात्रा : सत्यम शिवम सुन्दरम ।

इसके अतिरिक्त आपके 32 से अधिक रिसर्च पेपर प्रकाशित हैं और 143 लेख समाचार पत्रों में प्रकाशित हैं। और आप अभी भी नियमित रूप से लेखन करते हैं। पता :- आर० एस० एम० कॉलेज धामपुर,बिजनौर, (उ०प्र०)

ईमेल :- amitkumarsingh99@gmail.com

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2 टिप्पणियाँ "संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 45 : मनाली से लेह : एक अविस्मरणीय यात्रा // डा०अमित कुमार सिंह’"

  1. रोचक संस्मरण

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    1. "रोचक संस्मरण" कि "माँ भारती का प्रसाद" - जी 'बचपन के दिन भुला न देना...' सच कहूँ! प्रारंभ से अंत तक विचरण करते हुए ऐसा लुफ्त मिला कि विगत वर्षों में किये हुए मनाली-से-लेह/लेह-मनाली से वाराणसी तक प्रत्यक्ष-रूप यात्रा का नहीं मिला था | 09 दिन की यात्रा आपने 09 मिनट में करा दी | साधुवाद ... जी 'गागर में सागर'!

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