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संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 44 : बच्चन जी जैसा कोट // अशोक कुमार शुक्ला

प्रविष्टि क्र. 44 :

बच्चन जी जैसा कोट

अशोक कुमार शुक्ला


मुरादाबाद में एक सरकारी कालेज के हिन्दी अध्यापक शर्मा जी के घर एक बच्ची पैदा हुयी। बचपन हिन्दी के आसपास बीता जब बालिका आठ वर्ष की होती है तो पिता का स्थानान्तरण लखनऊ हो जाता है। हिन्दी प्राध्यापक पिता के मित्र सायंकालीन चर्चा में अक्सर शर्मा जी के घर पर एकत्रित होते थे। ऐसे में एक शाम घर पर इकट्ठा मित्रों के बीच तश्तरी में फल काटकर लायी उस बालिका को देखकर किसी मित्र ने शर्मा जी से पूछा:-
''यह बच्ची कब पैदा हुयी थी ?''
शर्मा जी ने उत्तर दिया:- '' सन् 1935 में गंगा दशहरा के दिन...!''
''ओह हो...! यही तो वह वर्ष था जिसके बाद हिन्दी के महान कथाकार प्रेमचंद और जयशंकर प्रसाद नहीं रहे।''
''यह तो एक संयोग है..''!
''नहीं संयोग नहीं ....इसे तो दुर्योग कहिये शर्मा जी...!'' के मित्र ने उत्तर दिया।...'' फिर आप तो हिन्दी के प्राध्यापक है। हिन्दी आपकी जीविका है आप भी समझ सकते है कि सन् 1935 में हिन्दी की कितनी बडी क्षति हुयी है। इस हिसाब से यह बच्ची हिन्दी साहित्य के लिये शुभ नही है। ''
मित्र की बात पूरी हुयी और वह बच्ची वहां से चली गयी लेकिन मन पर इस बात का एक बडा बोझ लेकर गयी कि जिस वर्ष जब वह धरती पर आयी थी उसी वर्ष हिन्दी के महान कथाकार दुनिया छोडकर चले गये। मन ही मन उस बालिका ने यह मिथ बुन डाला कि वह तो 'मनहूस' है जिसके आते ही हिन्दी की महान विभूतियां चली गयीं।
इस मिथ के साथ बडी होती बालिका जब पांचवे दर्जे में पहुंची तो हिन्दी के अध्यापक ने बताया :-
"क्या आपको पता है कि हरिवशंराय बच्चन जी ने अपनी कालजयी कृति मधुशाला 1935 में लिखी थी।"
यह जानते ही वह बालिका का मन प्रसन्न हो गयी ।उसने अपने मन में अपने लिए जो मनहूसियत का मकड़जाल बुना था उस पर आघात हुआ और उसे यह मिथ टूटता हुआ अनुभव हुआ कि वह हिन्दी साहित्य के लिये ऐक मनहूस बालिका है।
यह जानकारी उस बालिका के लिये बहुत बड़ा संबल बनी कि अब वह सबको दृढ़ता के साथ उत्तर दे सकती है कि वह 'मनहूस' नहीं है जिस वर्ष वह पैदा हुयी उसी वर्ष हिन्दी की अमर रचना मधुशाला लिखी गयी जो समूचे हिन्दुस्तान में गर्व के साथ सुनी जाती है।
इस बात ने उस बालिका को आत्मविश्वाश से भर दिया।

इस जानकारी ने उस बालिका के मन को विशिष्ट उर्जा से तो भरा ही साथ ही उसके बालमन में हरिवंश राय बच्चन जी के लिये एक विशेष प्रकार का सम्मान और लगाव भी पैदा कर दिया। वो ऐसा समय था जब विद्यालयों में साहित्य चर्चा होती थी और अनेक विद्यालय अपने यहां कवि दरबार का आयोजन भी करते थे। ऐसे कवि दरबारों में विद्यालय के छात्र छात्राएं उस प्रसिद्ध कवि की जैसी वेशभूषा धारण करते थे और उसकी रचनाओं को उसी की शैली में सुनाते थे।
इस बालिका ने भी हरिवंशराय बच्चन जैसे घुघराले बाल बनाकर उनका सा रूप धरा और अपने विद्यालय के कवि दरबार में उनकी प्रसिद्ध मधुशाला की रूबाइयां प्रस्तुत करीं। बालिका का यह रूप सहपाठियों और श्रोताओं को खासा पसंद आया और उस बालिका को खूब वाह वाही मिली। ऐसे में बालिका के मन में और भी अधिक बच्चन जी जैसा बनने की लालसा प्रबल हुयी। वह भी वैसा ही कोट और शेरवानी पहनकर कवि दरबार जाना चाहती थी जैसा बच्चन जी पहनते थे लेकिन उसके पास वैसा कोट तो था ही नहीं । उसने अपनी इच्छा अपनी मां को बतायी:-
''मां मुझे भी बच्चन जी जैसा कोट सिलवा दो ना..!''
मां ने अपनी मजबूरी प्रगट करते हुये कहा :-
''बेटा क्या बेसिर पैर की बातें करती हो ? कोई इस तरह फालतू कपडे सिलवाता है क्या? कभी सोचा है कि इसके लिये पैसे कहां से आयेंगे। ''
नन्हा बालमन निराश हो गया लेकिन उसने उम्मीद नहीं छोडी। आखिर बच्चन जी के जैसे घुंघराले बाल बनाना तो उसके अपने हाथ में थी ना। वह कवि दरबार मे मधुशाला की पंक्तियां बच्चन जी की शैली में सुनाकर तालियां बटोरती रही। उस बालिका का बच्चन की रूबाइयों का पाठ इतना लोकप्रिय हुआ कि दूसरे विद्यालय के कवि दरबार में भी उसे आमंत्रित किया जाने लगा और उसे मधुशाला के वाचन के लिये पैसे भी मिलने लगे।
इस प्रकार मिलने वाले पैसों को इकट्ठा कर उसने अपनी मां को देते हुये पुनः वही अनुरोध दोहराया:-
''मां अब तो इन पैसों से बच्चन जी जैसा कोट सिल जायेगा ना...?''
मां ने गौर से अपनी बच्ची को देखा और उसकी ललक को पहचाना। हालांकि उस बच्ची के द्वारा एकत्रित किये गये पैसे इतने पर्याप्त नहीं थे कि उससे कोट सिलवाया जा सकता लेकिन बच्ची की लगन को भांपकर मां ने उसके लिये कोट सिलवाया। अब वह बालिका बच्चन जी के जैसे घुंघराले बाल और उनका जैसा कोट पहनकर कवि दरबार में जाने लगी।
बच्चन जी के प्रति उस बालिका की अगाध श्रद्धा शनै शनै उसे हिन्दी साहित्य के प्रति भी श्रद्धावान बनाती चली गयी और अंततः वह दिन भी आया जब यह बालिका इलाहाबाद विश्वविद्यालय पहुंची और वहां के अंग्रेजी विभाग के प्रवक्ता हरिवंशराय बच्चन जी से मिली।

पुष्पा भारती जी का यह किस्सा फिर कभी सुनाउंगा

डॉ० अशोक कुमार शुक्ला

संर्पक सूत्रः- तपस्या, 2-614,सेक्टरएच,जानकीपुरम् , लखनऊ(उ0प्र0) पिन-226021

संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018 4273672067977130417

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  1. .....और जब उक्त प्रसंग को मैने फेसबुक पर साझा किया तो इस पर श्रद्धेया पुष्पा जी ने निम्न प्रकार टिप्पणी कर इसकी पुष्टि की है

    Pushpa Bharati

    Pushpa Bharati

    उनके प्रति आभारी हूं कि उन्होने पता नहीं कैसे ऐसे प्रसंगों की जानकारी मिली।धन्यवाद के साथ यही कहना चाहती हूं कि ऐसी बातों पर अपना श्रम ज़ाया करने से क्या लाभ ? वे बहुत अच्छा लिखते हैं। ऐसी रोचक जानकारी पता कर लेना ही बड़ी सूझबूझ और प्रशंसा की बात है । शोधविद्यार्थियों को उनसे सीखना चाहिये।

    उत्तर देंहटाएं

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