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उपन्यास - अमावस्या का चांद - भाग 10 // बैरिस्टर गोविंद दास // अनुवाद - दिनेश माली

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भाग 1 भाग 2 भाग 3 भाग 4 भाग 5 भाग 6 भाग 7 भाग 8   भाग 9 “हेलो काउल! ” “हेलो मिस! ” ज्यादातर एयर होस्टेस काउल को जानती है। आधी जिंदगी ...

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भाग 1 भाग 2 भाग 3 भाग 4 भाग 5 भाग 6 भाग 7 भाग 8 भाग 9

“हेलो काउल! ”

“हेलो मिस! ” ज्यादातर एयर होस्टेस काउल को जानती है। आधी जिंदगी तो आकाश में बिताई है। फिर बीच-बीच में स्मगलिंग के माल को लाने लेजाने में इन्हीं में से कुछ एयर होस्टेस घड़ी, सोने के हार या कुछ पैसे लेकर काउल की मदद करती है।

काउल हर काम के लिए उचित कीमत देते हैं। उनका ख्याल है कि पैसों से दुनिया की हर चीज मिल सकती हैं। बस फर्क है केवल कीमत का, चीज पाने का नहीं।

हवाई जहाज से काउल सिंगापुर पहुंचे। पहले उन्होंने अपना व्यापारिक काम सफलतापूर्वक सम्पन्न किया। उसके बाद रात को सिंगापुर की मौज-मस्ती का लुफ्त उठाया।

चाहते तो वह कुछ दिन और रुक सकते थे। मगर लौटने का उनका मन कर रहा था। लौटते समय वह सोच रहे थे कि अचानक लौटने की आज ही इच्छा क्यों हुई। उनके लिए तो दुनिया का हर देश एक समान है। दिल्ली, टोक्यो, बेरूत, लंदन-सब बराबर। दिन में व्यापार संबंधी काम और रात में मौज-मस्ती। वास्तव में सारी दुनिया एक है। यह कथन वेंडल विल का है। मगर काउल ने इंतजार नहीं किया। खुद उन्होंने इस बात का अनुभव किया। फर्क सिर्फ एक्सचेंज में है। भाषा में कहीं पाउंड कह देते हैं तो कहीं फ्रेंक, कहीं इयान कहते हैं तो कहीं रुपया। कहीं फारसी भाषा है तो कहीं अरबी!

काउल लौटे। उनके मन के झिलमिलाते पर्दे की ओट में बीमार मनीषा की धुंधली-सी तस्वीर दिखाई देने लगी। यह इसकी दशा?बेचारी मनीषा! सगे-संबंधियों और मां-बाप विहीन मनीषा। सोचने लगे, परिचित अस्वस्थ व्यक्तियों के प्रति ममत्व और मानवता मनुष्य का कर्तव्य-मात्र है।

एयर होस्टेस लीला ने कहा, “ताज्जुब है आज काउल इतने शांत! ”

दूसरी ने कहा, “नहीं, यह तूफान के पहले की निस्तब्धता है। ”

लीला ने कहा, “ ऐसा लगता है, सिंगापुर के उच्छृंखल जीवन के बारे में सोच रहे है?”

काउल सोचने लगे, इतने कम दिनों के अंदर उनकी मानसिक स्थिति में किस तरह परिवर्तन हो रहा है। यह परिवर्तन साधारण होते हुए भी महत्त्वपूर्ण है। जिन चीजों में कभी उन्हें आनंद आता था, आज अचानक रसहीन हो गई थी। जो अर्द्ध-नग्न कैबरे डांसर रात-रात भर उन्हें बांधे रखती थी, आज अचानक मांसपेशियों का मामूली प्रदर्शन नजर आने लगा था। जो शराब हरदम उनकी संगिनी बनी रहती थी, आज यह फालतू लगने लगी थी।

वह उस दिन सिंगापुर-क्लब से जल्दी लौटना चाहते थे। हंसते हुए किसी ने कहा, “स्वामीजी! रात होते ही आश्रम का द्वार बंद हो जाएगा। गुरुदेव रूठ जाएंगे। जल्दी प्रत्यावर्तन करें। ”

काउल हवाई जहाज की खिड़की से आकाश की तरफ देख रहे थे। आदमी के मन की तरह आकाश भी अभेद्य है। चारों और तारे टिमटिमा रहे हैं। नीचे बादलों के झुंड कारपेट की तरह दिखाई दे रहे थे। पुराणों में इस बात का उल्लेख है, जो लोग महापुरुष होते हैं वे लोग इसी प्रकार तारे होकर आकाश में निश्चल, विच्छिन्न होकर रहते हैं। मगर खूब सुनसान लगता होगा। कोई साथी नहीं, कोई मित्र नहीं, एकदम अकेले।

किन्तु मैं भी तो बहुत अकेला हूं। ऐसा क्यों? इतने मित्र, इतने कार्यकर्ता, इतने साथी, इतने पैसे तो है। जो चाहा सब मिला। केवल घर-संसार नहीं बसाया। मगर यह दुनिया तो पैरों की बेडी है।

ऊपर उठने में तुम्हारे लिए अवरोधक है।

एक बार चर्चिल के पास लॉर्ड बेब्रूक बैठे थे। चर्चिल ने पूछा, “मिस्टर बेब्रूक, आपके जिंदगी की बड़ी-बड़ी घटनाएं या माइल-स्टोन क्या है?”

बेब्रूक ने कहा, “ जब मैं 22 बरस का था तब मैंने विवाह कर लियाथा। ”

चर्चिल ने बात करते हुए कहा, “मैं माइल-स्टोन के बारे में पूछ रहा हूं। मिल स्टोन के बारे में नहीं। दुनिया, पत्नी, बाल-बच्चे सभी मिल स्टोन है, , गले के चारों ओर चक्की के पाट की तरह। ”

काउल चिंतन करने लगे- इससे मजेदार बातें मिल्टन के बारे में है। विवाह के बाद मिल्टन ने लिखा था ‘पैराडाइज लॉस्ट’। पत्नी के मरने के बाद में क्या लिखा था ‘पैराडाइज रीगेंड’?यही तो दुनिया है! ”

लीला सोने के लिए कंबल देकर चली गई। हवाई जहाज के अंदर की बत्तियां बुझा दी गई। खिड़की से तारें और भी ज्यादा उज्जवल दिखाई देने लगे।

काउल को नींद आने लगी। अपनी गोद में मनीषा के उसी शांत, निरीह सिर की उपस्थिति अनुभव करने लगे। अचानक नींद खुल गई, मगर स्मृति मधुर लगी। मन ही मन में सोच रहे थे, पहले दिन जिस तरह असहाय हालत में थी, यदि जागृत अवस्था में उसी तरह होती तो!

काउल ने सोचा, शायद यही तो नारी का मातृत्व है। जो हलचल पैदा नहीं करता, बल्कि एक प्रलेप प्रदान करता है। धीरे-धीरे काउल को फिर से नींद आने लगी। मनीषा की स्मृति में खोए हुए काउल चैन से सो गए।

जब काउल उठे, तब उगते सूर्य की आभा से आकाश में लालिमा छाई हुई थी। कुछ समय बाद वह हवाई जहाज से नीचे उतरे। चेन्नई एयरपोर्ट से सीधे नर्सिंग होम में मनीषा के पास पहुंचे।

“मनीषा! ”काउल ने आवाज लगाई।

कोई उत्तर नहीं मिला। नर्स ने बताया, “पिछले दो दिनों से बीमारी बढ़ गई है। ”

काउल ने नर्स को बाहर बुलाकर बातचीत की। नस के ख्याल से उसका आखरी समय नजदीक था। जीवन के दिए को बुझाने में सिर्फ कुछ दिन और बचे हैं। इसके लिए प्रतीक्षा करनी है। फिर नियति को रोकना असंभव है।

काउल को अपने अंदर बेचैनी-सी लग रही थी। तुरंत वह मनीषा के डॉक्टर के पास गए और पूछने लगे, “कैसी हालत है मनीषा की?”

“धीरे-धीरे हालत हमारे कंट्रोल से बाहर होती जा रही है। पंद्रह दिन के अंदर तुरंत ऑपरेशन की जरूरत है। ” डॉक्टर ने कहा।

“ऑपरेशन कहां हो सकता है?” काउल ने पूछा।

“यहां हो सकता है। मगर कोई गारंटी नहीं है। संभव हो तो भारत के बाहर स्विजरलैंड डयूरिक में डॉक्टर एण्ड्र्युज के पास ऑपरेशन कराने की कोशिश करें। ”इसी बीच मैंने उनसे काफी समय तक परामर्श किया है। वह ऑपरेशन के लिए तैयार है।

मनीषा की जिंदगी आज काउल के लिए एक चुनौती बन गई। अपना सारा अतीत मानो काउल को हुंकार रहा हो –“देख, एक दिन तू भी ऐसे ही लाचार, दरिद्र और बीमार था। भाग्य न तुझे बचा लिया। मगर क्या इसे बचा पाएगा? कितनी तेरी ताकत है, कितना पैसा है तेरे पास में? दिखा तेरी ताकत! दिखा दे तेरी मर्दानगी! ”

काउल ने सोचा, “ठीक है, मैं यह चैलेंज स्वीकार करता हूँ। मनीषा को बचाऊंगा। यह मेरे जीवन का अतीत अध्याय है। चाहे, मुझे जो भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े। ”

वही जुए वाला नशा। जिस नशे की खुमारी में वह घुड़दौड़ में बर्बाद हो गए थे, जिस नशे में लात मारी चेयरमैनी को, उसी नशे में जिंदगी को मुट्ठी में भरकर फेंक सकते हैं। काउल अपने आपको मिटा सकते हैं।

काउल ने कहा, “डॉक्टर एण्ड्र्युज के पास ऑपरेशन कराने की आप व्यवस्था करें। स्विट्जरलैंड में अस्पताल तय करें। मैं खुद मनीषा को लेकर जाऊंगा। अगर परिस्थिति अनुकूल रही तो इसी हफ्ते के भीतर। ”

मनीषा के लिए पासपोर्ट बन गया, टिकट आ गया। खुद के लिए तो ये सब आम बात थी।

मनीषा की हालत दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही थी। सूखे होठों पर बहुत सारे साँवले दाग पद गए थे। आंखों के नीचे भी काली रेखा दिखाई दे रही थी। अंगुलियां मैली हो गई थी। उसकी व्याकुलता कम नहीं हो रही थी, असहायता में कोई कमी नहीं आ रही थी!

“मनीषा! मैं काउल हूं। मैं सिंगापुर से लौट आया हूं। ” विनीत भरी नजरों से टुकुर-टुकुरकर देखती रही मनीषा। कुछ समय के लिए उसने आंखें खोली। फिर निर्जीव-सी लेटी रही।

मनीषा के दोनों हाथ पकड़कर काउल ने पूछा, “सुनो मनीषा, मैं तुम्हें स्विजरलैंड ले जाना चाहता हूं। कोई तुम्हारे साथ चलेगा ?”

मनीषा की दोनों छोटी-छोटी हथेलियां धीरे-धीरे काउल के हाथ में बिना किसी प्रतिवाद के कुछ समय तक पड़ी रही। मनीषा उत्तर देने की अवस्था में नहीं थी।

काउल ने पैसों की तलाश की। इतना पैसा उसके पास में नहीं हो सकता है। कई एजेन्टों से भी बातचीत की। परिस्थिति में कुछ सुधार हुआ, मगर आवश्यकता पूरा नहीं हो पा रही थी। उनका चेन्नई में छोटा-सा कारखाना था। उसे आनन-फानन में कौड़ियों के भाव बेच डाला।

एक सप्ताह बाद वह हवाई-जहाज से मनीषा को स्विजरलैंड ले गए। निस्तेज, निर्वाक मनीषा के सिर को अपनी गोद में लेकर वह आकाश की तरफ ताक रहे थे। सिंगापुर से वापिस आने के समय वाला सपना साकार हो रहा था। वह सोच रहे थे, इतने बड़े आकाश में भगवान अगर कहीं है तो मेरी मनीषा की रक्षा करो, उसे बचा लो।

हवाईजहाज ड्यूरीक पहुंचा। पूर्व निर्धारित प्रोग्राम के मुताबिक डॉक्टर एण्ड्र्युज ऑपरेशन के इंतजार कर रहे थे अपने अस्पताल में। मनीषा के शरीर की परीक्षा की गई। थोड़ी तबीयत ठीक होने पर ऑपरेशन किया जाएगा। एक-दो दिन इंतजार करना होगा।

काउल ने अपनी जिंदगी में अनेक शारीरिक कष्ट और मानसिक यंत्रणाएँ भोगी है। मगर इन दो दिनों की प्रतीक्षा के बारे में कुछ मत पूछो। आखिरकार ऑपरेशन हुआ। डॉक्टर एण्ड्र्युज सफल हुए। काउल की विजय हुई। काउल ने डॉक्टर को हार्दिक कृतज्ञता ज्ञापन की।

रात-दिन मनीषा के बिस्तर के पास काउल बैठकर जगुआली कर रहे थे। बीच-बीच में मनीषा देख लेती थी उसी कृतज्ञता भरी दृष्टि से।

मनीषा स्वस्थ हो रही थी। वह उठकर बैठने लगी। धीरे-धीरे उसने चलना शुरू किया। डॉक्टर ने दो महीने बाद भारत लौटने की सलाह दी।

एक दिन मनीषा ने पूछ लिया, “काउल साहब, मेरा भगवान मैं तो विश्वास नहीं है। मगर कहीं भगवान है तो आप ही मेरे लिए उनके अवतार है। ”

काउल ने फूलों का गुच्छा मनीषा के बिस्तर के पास सजाया। “मेरे लिए आपने कितने कष्ट उठाए है। यह ऋण कैसे मैं उतार पाऊंगी। ”

काउल विजय की दृष्टि से देखते रहे मनीषा की तरफ।

भारत लौटने का समय पास आ गया। मनीषा ने कहा, “काउल साहब, आज आपको मेरे लिए सेक्रेटरी का काम करना होगा। कृपया कर आप कुछ पत्र मेरे लिए लिख दीजिए। ”

काउल ने मुंबई, कोलकाता के परिचितों मित्रों को पत्र लिखें। परिवार वालों को खबर दी गई। फर्श पर बिखरी माला जिस तरह समेटा जाता है, मनीषा आज उसी तरह अपनी विक्षिप्त दुनिया के लोगों को फिर से जोड़ रही थी।

एक दिन मनीषा ने पूछा, “काउल साहब, भारत लौटकर आप क्या करेंगे?घर-संसार में रम जाएंगे, पति, पत्नी, बेटा-बेटी आदि के साथ। स्नेह, सहानूभूति से उल्लासित हो जाएगा आपका जीवन। नारी सौभाग्यवती होगी, क्यों?”

काउल ने कहा, “मनीषा मुझे अगर ठीक से जानती हो तो समझ गई होगी कि मैं एक झूठ हूं, क्षण-स्थायी हूं। ”

मनीषा ने बात बीच में काट दी।

“सच-झूठ के विवाद का फैसला हो गया है, काउल साहब। ”

एक बार बादल ने मलय से कहा, “मलय, सत्य क्या है?”

इस संसार के माथे पर उगने वाला सूर्य, पृथ्वी के वक्ष-स्थल पर इतना बड़ा हिमालय क्या यही सत्य है? तू जो अदृश्य अनुभूतिरहित, अन्यथा अंभोग्या और मैं इन्हीं छोटे-छोटे जल-कणों का समूह, हम क्या असत्य, अचिरंजीवी, क्षणिक है?

मलय ने कहा, ”बादल, सृष्टि का यह अभियोग हमारे प्रति सत्य है। सूरज की प्रखरता, हिमालय का आधिपत्य जगत को स्वीकार्य अवश्य है। मैं अरूप हूँ, तुम अस्पष्ट। इसलिए हम दोनों क्षणस्थायी और असत्य है। ”

मगर पता है, अगर एक बार तुम मेरे आगोश में आ जाओगे तो हमेशा के लिए तुम विलीन हो जाओगे। हमारा मिलन दृढ़, अभेद्य और संपूर्ण हो जाएगा। इस गंभीरता, आड़ोलन और आलिंगन से ध्रूम, विद्युत और कंपन उत्पन्न होंगे। जिससे सूरज डूब जाएगा, हिमालय अवगुंठित हो जाएगा। ”

यह आत्मीयता, आलिंगन और मिलन सत्य होता है। जिससे प्रलय हो सकता है।

काउल मनीषा की ओर देख रहे थे। देख रहे थे अपना अतीत। सलीम की दोस्ती। वैश्याओं के

घरों में फूलों की बिक्री, शराबी, लंपट, जुआरी काउल। मनीषा एक प्रस्फुटित निरीह कोमल कली। जिसका स्थान देवताओं का सिर है।

मनीषा ने मेरे भीतर केवल दीप्त आभा, विस्तृत मानवता देखी है। जिस दिन वह देखेगी कि काउल अंधेरे गव्हर में है, उसका रूप विकलांग है, जहां सलीम रहता है, नीरा रहती है, बाईजी और अनेक है, शराबखाना है, जुए का खेल है, कालाबाजार का अड्डा चलता है-वहां मनीषा की कोमलता नष्ट हो जाएगी, बेचारी वह घायल हो जाएगी। शायद मनीषा मिल भी जाए तब भी उसकी जिंदगी किसी पेड़ से लिपटी मृत लता से कम नहीं होगी। सारी जिंदगी एक गहरी दीर्घश्वास बनकर रह जाएगी।

मनीषा क्षमा भी कर सकती है। मगर किसे क्षमा करेगी? उसने तो कोई पाप नहीं किया है, वह किसी भ्रम में भी नहीं हैं। जीवन में उसने जो कुछ किया उसके लिए कोई भी अनुताप नहीं था! क्या कालाबाजार बदल देंगे? जुए का नशा बदल सकेंगे? मगर क्यों?

काउल ने पूछा, “मनीषा, घर जाकर तुम क्या करोगी?पति, बेटे-बेटी की गृहस्थी में उलझ जाओगे। अस्पताल में उनके जो चित्र देख रही थी। ”

मनीषा ने पूछ लिया, “काउल साहब! अगर कहूं ‘हां’ घर बसाना चाहती हूं तो तुम उसमें मदद करोगे?”

“मनीषा तुमसे एक बात पूछनी है। तुम जिससे विवाह करती हो अगर वह शराबी, लंपट, जुआरी झूठा, झगड़ालू हो तो क्या करोगी?”

“काउल साहब! प्रत्येक नारी जो करेगी, वही मैं करूंगी-आत्महत्या। मगर जानते हो मैं जिस पुरुष को चाहती हूं, वह खुद राम है। आदमी इतना बड़ा हो सकता है, कल्पना नहीं की जा सकती है। इतना रूपवान होगा कि कोई उसका चित्र ही न बना सके। उसके स्पर्श की मुझे जरूरत नहीं है, बस उसकी उपस्थिति ही मेरे लिए पर्याप्त है। उसे देखते-देखते सारी जिंदगी गुजार दूंगी। ”

“मनीषा, आदमी में भी परिवर्तन होता है। ”

मनीषा ने उत्तर दिया, “असंभव काउल साहब! मेरे राम सदा राम बनकर ही रहेंगे। ”

काउल मन ही मन सोचने लगे, रावण भी राम बन सकता है। मगर मैं तो रावण नहीं हूं। मैंने तो कुछ अन्याय नहीं किया है, किसी का बुरा नहीं किया है, फिर भी यह कैसा समाज का अभियोग है?

मनीषा ने पूछा, “काउल साहब, आपने तो कभी भी अपने अतीत, अपने परिवार, अपने भविष्य के बारे में भी कुछ नहीं बताया। आपके महत्व का परिचय जरुर मिला है, मगर इतिहास तो छुपा ही रह गया। ”

काउल निरुत्तर थे। कुछ समय बाद कहने लगे, “समय आने पर खुद जान जाओगी मनीषा! ”

एक दिन काउल की तबीयत बिगड़ गई। बुखार और सिरदर्द बढ़ता गया। उस दिन शाम को वह नर्सिंग होम नहीं जा सके। उस शाम उनकी मनीषा से मुलाक़ात नहीं हो पाई।

रात को उस समय बारह बज रहे होंगे। दरवाजे पर घंटी की आवाज सुनाई दी। काउल बड़ी मुश्किल से उठे। देखा, नर्स के साथ मनीषा आई है। वह हाथ पकड़कर काउल को बिस्तर तक ले गई। कंबल ओढा दिया। काउल के दोनों हाथों को अपनी मुट्ठी में रखकर देखती रही मनीषा। आंखें भर आई। काउल ने कहा, “यह ठीक नहीं किया। अभी तुम पूर्ण स्वस्थ नहीं हुई हो। इतनी रात को शीत-लहर में तुम्हारा बाहर निकलना खतरे से खाली नहीं है। ”

मनीषा ने कहा, “काउल, क्या तुमने ही त्याग का झण्डा उठाने का ठेका लिया है? बाकी लोग क्या अमानुष है?”

उस रात मनीषा काउल के पैरों के पास बैठे-बैठे सोती रही।

सुबह हुई। काउल ने देखा, मनीषा उसके घुटनों के पास कोने में दुबककर उसी छोटे कंबल को ओढ़कर सो रही थी। काउल उठकर बैठ गए। कंबल से मनीषा की देह को ढक दिया। उसके चेहरे की तरफ देखते रहे। वही रेल वाला दृश्य। बिखरे केश, मधुर अधर, नम्र नेत्र और सुप्त नारी। इस बार वह केवल नारी नहीं थी। वह मनीषा थी। उनके हृदय की मनीषा। उनके जीवन का एक अंश।

कमजोरी लग रही थी काउल को। अधिक देर तक बैठना उनके लिए मुश्किल था। फिर से बिस्तर पर लेट गए। कुछ समय बाद मनीषा उठ खड़ी हुई। काउल के सिर पर हाथ रखा। देखा, बुखार कम नहीं हुआ था। काउल बेचैन हो रहे थे। उनके सिर को गोद में लेकर वह सहलाने लगी।

डाक्टर और नर्स की व्यवस्था की गई। दवाइयाँ बाजार से मंगवा ली। अपने हाथ से काउल को दवाई खिला दी। वह खुद देखभाल करने लगी।

तीन-चार दिन बीत गए। इस दौरान मनीषा नर्सिंग होम नहीं जा सकी। उस समय डयूरिक में कड़ाके की ठंड पड रही थी। काउल ने कहा, “मनीषा, आज हम दोनों का क्विट हो गया। एक दिन मैंने तुम्हारी सेवा की थी, तुमने सूद सहित मूल चुका दिया। ”

काउल एक कुर्सी में बैठे हुए थे और कार्पेट पर मनीषा। काउल के पैरों की तरफ देखते हुए कहने लगी, “हिंदू धर्म में पाप करने वालों को सजा मिलती है और पुण्य करने वालों को पुरस्कार। अगर कोई पाप और पुण्य दोनों करता है तो दोनों आपस में कटकर खत्म नहीं होते। आपको दोनों भोगने पड़ेंगे। अतः तुम अपनी सेवा के लिए अपना फल पाओगे और मैं अपनी सेवा के लिए अपना फल। दोनों क्विट नहीं हो सकते हैं। ” दोनों हाथों की अंजुली फैलाकर मनीषा ने काउल को दिखाते हुए कहा, “मेरा फल मुझे दे दो काउल। ”

काउल ने उस अंजुली को अपने हाथों में रखकर कहा, “तुमने पाप की बात कही। पाप होता क्या है?”

मनीषा ने कहा, “जिसे सारी दुनिया समझती है। ”

काउल ने तुरंत पूछा, “जैसे?”

“जैसे शराब पीना, जुआ खेलना, नारी-संभोग, झूठ बोलना इत्यादि। ”

काउल ने मनीषा का हाथ छोड़ दिया। उसका चेहरा गंभीर हो गया। वह बेचैन-सा लगने लगा।

कुछ दिन बाद मनीषा ने कहा, “डॉक्टर से कल मैंने बात की थी। वह कहते हैं कि अब मैं बिल्कुल स्वस्थ हूं। भारत लौटने की अनुमति दे दी है। डाक्टर के अनुसारतुम्हारे लिए भारत का क्लाइमेट अच्छा है। मैं भी लौटना चाहती हूं। मेरे कई काम पड़े हैं। सबसे बड़ा काम है-तुम्हारा ऋण। शायद जिंदगी में उतार न पाऊं, भरसक कोशिश तो फिर भी करुंगी, जितना जल्दी हो सके। तुम्हें मंजूर है, काउल?”

काउल ने सहमति जताई। कहने लगे, “ इसका मतलब तुम स्वीकार करती हो मेरा निवेश ठीक जगह पर हुआ है। अब मानती हो न कि मैं एक पक्का व्यापारी हूं?”

मनीषा ने कहा, “मैं तुम्हारे व्यापार के बारे में विशेष नहीं जानती हूँ। मगर इतना निश्चित कह सकती हूं कि तुम्हारा मूल-धन जीवंत भाव से लौट आएगा। जो तुम्हारे पास अक्षय अमर अनंत होकर चिरदिन के लिए तुम्हारे कदमों में पड़ा रहेगा। ”

उस दिन शाम को डयूरिक में दोनों सिनेमा देखने गए। अंग्रेजी फिल्म थी, चार्ल्स डिकन्स की “टेल ऑफ़ टू सिटीज”। लौटते समय मनीषा कह रही थी, “बहुत खूब! बैरिस्टर सिडनी कार्टून प्रेम के लिए हंसते-हंसते गिलोटिन में चला जाता है, जीवन परित्याग कर देता है। मगर काउल प्रेम के लिए खुद का नामोनिशान मिटा देना क्या संभव है?”

काउल ने पूछा, “तुम्हें क्या लगता है?”

मनीषा ने कहा, “काउल मैं बहुत स्वार्थी हूं। जिससे प्रेम करती हूँ, उसे जान देकर भी पाना चाहूंगी। उस पर अधिकार जमाऊँगी, अपना बना लूंगी। अगर मेरा नामोनिशान मिट गया तो तब तो यह मिलन संभव नहीं हो पायेगा। यह नारी की प्रेम की कल्पना है, हो सकता है पुरुष का प्रेम और दांभिक होगा। वह अपने को मिटा डालने में परिपूर्णता समझता है। ”

मनीषा कुछ समय चुप रहने के बाद पूछने लगी, “काउल, तुमने कभी प्रेम किया है?”

सवाल साधारण था, मगर उत्तर के लिए मनीषा एकनिष्ठ भाव से ताकती रही काउल की ओर।

काउल ने कहा, “नहीं। ”

मनीषा ने पूछा, “अब तक भी नहीं?”

“मैं नहीं जानता। ” काउल का उत्तर था।

नर्सिंग होम में मनीषा को छोड़कर टैक्सी ने काउल को उनके फ्लैट पर छोड़ दिया। काउल के मन में ‘सिडनी कार्टून’ की बात घूम रही थी। लूसी के प्रति प्रेम की कितनी बड़ी कीमत चुकाता है फिल्म का नायक, अपना जीवन त्याग कर। तुम महान हो सिडनी कार्टून! काउल के कानों में सिडनी कार्टून की आखिरी बात गूंज रही थी।

“ हां, आज मैं नेस्तनाबूद हो गया हूं, मगर लूसी के हृदय में सदा जीवित रहूंगा। आज के दिन हर वर्ष वह मेरे बारे में सोचेगी। अपने सुखी-संसार के भीतर वह कभी मुझे नहीं भूलेगी। अपने बच्चों को मेरे बारे में मेरा स्मृति-लेखा बताएगी। ”

“आज जो कुछ कर रहा हूँ, जीवन में ऐसा काम कभी नहीं किया। आज जो विश्राम ले रहा हूँ, जीवन में तो कभी ऐसा आराम नहीं मिला। अलविदा लूसी, हमेशा के लिए। ”

कुछ दिन बीत गए। अंत में दोनों मुंबई आए। मनीषा के परिवार के कुछ आत्मीय लोग खबर पाकर एरोड्रम पर आए। सभी उसे अपना अतिथि बनना चाहते थे। मनीषा ने काउल के साथ उनका परिचय करा दिया।

वह कहने लगी, “ये मिस्टर काउल है। एक प्रतिष्ठित व्यापारी, मेरे मित्र और मेरे जीवन दाता। ”

मनीषा आखिर में अतिथि बनकर अपने परिवार वाले किसी के यहां चली गई। तब तक काउल का व्यापार ठप्प होने लगा था। उनकी अवहेलना के कारण कर्ज काफी बढ़ गया था। पैसो का कोई हल तुरंत दिख नहीं रहा था।

काउल मुंबई के एक छोटे होटल में ठहरे। हर रोज मनीषा को देखने जाते। इसी दौरान मनीषा सुंदर युवती हो गई।

“ काउल साहब! आप कहा करते थे न, भाग्य नाम की कोई चीज इस दुनिया में होती है। हमने खुद उसे प्रमाणित कर दिया। ”

“मनीषा, तुम्हें एक बात कहनी है?”

“मैं जानती हूं, आप क्या कहेंगे? कहेंगे, मनीषा मुझे अपने व्यापार के काम पर जल्दी जाना होगा। उसका सीधा जवाब होगा, “नहीं”। मेरी अनुमति मिलने तक आपको यही इंतजार करना होगा। ”

उस दिन होटल में पहुंचकर काउल आकाश-पाताल के बारे में सोचने लगे। मन ही मन हिसाब कर रहे थे, मैंने जो कुछ किया है, क्या बिल्कुल निस्वार्थ है? क्या इसमें कोई स्वार्थ नहीं है? केवल दंभ का प्रमाण भर देना था? या मैं मनीषा को चाहता हूं। यह जो खिलौना मैंने अपने हाथों से गढ़ा है क्या इसे किसी और के महल में छोड़ दूँ ? या उसे जीवन भर अपनी गोद में समेट लूँ ? फिर सोचने लगे, मगर जब मनीषा को पता चलेगा कि काउल उसकी कल्पना का राम नहीं है, तब वह खुद को भी क्षमा नहीं कर पाएगी। अगले दिन मनीषा से मिलने जाते समय तक शाम हो चुकी थी। काउल कहने लगे, “मनीषा याद है न, मैंने जो हरी साड़ी नर्सिंग होम में दी थी, उसे पहन लो। ”

मनीषा कुछ समय बाद वह साड़ी पहनकर आ गई। होठों पर लाल-लिपिस्टिक। ललाट पर बिंदी। आँखों में काजल की रेखा।

“मनीषा, तुमने अपने को देखा है? इस रानी के रूप को? तुम्हारी स्कूल वाली रानी को?”

मनीषा ने काउल के दोनों हाथ पकड़कर कहा, “काउल साहब, ये सब तुम्हारा दान है। मेरी जितनी उन्नति होगी, मेरा कर्ज उतना ही बढ़ेगा। मेरी एक सलाह है। थोड़ी प्रतीक्षा करें। ”

घर के भीतर चली गई मनीषा।

एक भव्य महल की तरह घर। मोजाइक का फर्श। मार्बल की सीढ़ियाँ। सामने सुंदर लान। पोर्टिको में नई अमेरिकन गाड़ी रखी हुई है। वर्तमान में यहाँ मनीषा रहती है। भीतर से कोल्ड-ड्रिंक लेकर मनीषा आई। कहने लगी, “काउल साहब, जीवन में भाग्य हो या नहीं, एक्सीडेंट होते ही है। यह घर देसाई के पिताजी का है। नैनीताल में रहते समय वह मेरे पिताजी के घनिष्ठ मित्र थे। उनके लड़के- लड़की मेरे साथ एक ही स्कूल में पढ़ते थे। उनका बेटा देसाई इसी बीच विलायत से इंजीनियर बनकर लौटा। उस समय सभी ने मजाक में हम दोनों की शादी करने के लिए प्रस्ताव दिया। अब 10 वर्ष बाद फिर हमारी भेंट होती है। उनकी बहन कहती है मैं जल्दी उनके घर चली आऊँ। मिस्टर देसाई भी विवाह के लिए जोर दे रहे हैं। आंटी, अंकल सब बेंगलुरु में है। अगर मैं हामी भर देती हूं तो हम सब कल सवेरे चले जाएंगे बेंगलुरु उनकी सम्मति लेने के लिए। वे लोग तुरंत अनुमति दे देंगे। ” मनीषा की आंखों में उपहास का संकेत था।

मगर काउल के दिमाग में कुछ समय के लिए सुनामी आ गई। ऐसा लगा जैसे वह एक भूकंपग्रस्त इलाके में फंस गया है। निरुत्तर थे काउल। मनीषा देखती रही काउल की तरफ।

मनीषा ने कहा, “ काउल कुछ तो बोलो, समय बीत रहा है। ”

काउल खुद को मनीषा के अंदर देख रहे थे।

इस बीच अंदर से एक युवक बाहर निकल आया। नाम था देसाई। नमस्ते का आदान-प्रदान हुआ। फिर देसाई ने कहा, “सुना है कि आपने मनीषा के लिए बहुत कष्ट उठाए है। काफी पैसे भी खर्च किए है। मगर मनीषा इतनी स्वाभिमानी है कि कभी एक बार भी खबर हमें नहीं दी। चारो ओर ढूंढते-ढूंढते थक-हारकर हम लोगों ने तो आशा छोड़ दी थी। ”

देसाई अत्यंत सुंदर, शिक्षित और सज्जन दिखाई दे रहे थे। रूप, गुण, वंश में मनीषा के लायक। एक ही दुनिया के दो जीव। सहज मिलन, प्राकृतिक और विधेय।

काउल अपने बारे में सोच रहे थे। मनीषा की जीवन दृष्टि से देसाई के साथ अपनी तुलना कर रहे थे। प्रखर ज्ञान, प्रतिष्ठा, शिक्षा, रूप में देसाई मनीषा के आदर्श राम है। कभी कोई कल्पना कर नहीं सकता है कि देसाई कालाबाजारी के लिए जेल में तड़ीपार हुए, कभी कोई सोच भी नहीं सकता कि यह युवक बाईजी के मुजरे में हाजिर हुआ होगा?किसी वेश्या के आलिंगनबद्ध हुआ होगा? देसाई सूरज की तरह नियमित निर्दिष्ट दिखाई दे रहा था। मगर वह स्वयं? एक नीतिहीन, चरित्रहीन, कक्षच्युत सामग्री। जिसका अतीत घिनौना है, वर्तमान कलंकित है, भविष्य अंधकारमय है।

(क्रमशः अगले भागों में जारी...)

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रचनाकार: उपन्यास - अमावस्या का चांद - भाग 10 // बैरिस्टर गोविंद दास // अनुवाद - दिनेश माली
उपन्यास - अमावस्या का चांद - भाग 10 // बैरिस्टर गोविंद दास // अनुवाद - दिनेश माली
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