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स्मृतियों में हार्वर्ड - भाग 5 // सीताकान्त महापात्र // अनुवाद - दिनेश कुमार माली

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भाग 1 भाग 2 भाग 3   भाग 4 जोसेफ ब्रोडस्की का कविता-पाठ 15 फरवरी, 1988। यह जगह अमेरिकी रिपॉर्टर थिएटर था। हार्वर्ड में जिसे आर्ट कहते थे। ...

भाग 1 भाग 2 भाग 3  भाग 4

जोसेफ ब्रोडस्की का कविता-पाठ

15 फरवरी, 1988। यह जगह अमेरिकी रिपॉर्टर थिएटर था। हार्वर्ड में जिसे आर्ट कहते थे। , सन 1987 की 15 फरवरी को साहित्य में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित यूसुफ ब्रोडस्की का वहाँ कार्यक्रम आयोजित किया गया था, 'एक शाम ब्रॉडस्की के नाम' ।कार्यक्रम 8 बजे शुरू हुआ। हार्वर्ड के विजिटिंग प्रोफेसर सिआमस हिनि ने ब्रोडस्की का परिचय दिया। मैंने पहले कहा है कि वे रेटोरिक एंड लैंगवेज़ के प्रोफेसर थे। सिआमस हिनि के साथ नजदीकियाँ बढ़ने के बाद मैंने उनसे मज़ाक में कहा था कि आम तौर पर, हम रेटोरिक और ओरेटरी दोनों को गैर-साहित्यिक मानते हैं। उन्होंने मुस्कराकर कहा, "भगवान का शुक्र है कि मैं इन दोनों गुणों से बहुत दूर हूं।" ब्रोडस्की को सुनने के लिए थियेटर खचाखच भर गया था। टिकटों की कीमत 15, 20 और 25 डॉलर थी। मेरे मित्र हिनि ने मुझे कंप्लीमेंटरी टिकट लेने का प्रस्ताव दिया। लेकिन मुझे पता चला कि उस शाम के टिकटों की बिक्री से हुई आय का थिएटर के विकास में प्रयोग किया जाएगा। इसलिए मैंने 20 डालर का टिकट खरीदने का निर्णय लिया और वह बात मैंने हिनि को बता दी। ब्रोडस्की ने अपनी कवितायें रूसी और अंग्रेजी दोनों में पढ़ी। उन्होंने लेनिनग्राद में कुछ दिन पहले लिखी हुई अपने बचपन की स्मृति के कुछ अंश भी पढे। इसके अलावा उन्होंने अपने एकमात्र नाटक 'मार्बल्स' के भी कुछ हिस्से पढे। मैंने उस समय तक इस नाटक को नहीं पढ़ा था। मुझे पता चला कि उस समय तक वह नाटक मंच पर भी नहीं खेला गया था। नाटक की सारी घटनाएं जेल के अंदर की थीं। जेल का आकार, ब्रोडस्की की भाषा में, एक अविवाहित युवक के छोटे बिखरे कमरे की तरह और आंशिक रूप से अनिश्चित भविष्य वाले अंतरिक्ष यान के केबिन की तरह था। नाटक को पढ़ते हुए उन्होंने कहा, "यह अनिश्चित समय अभी से दो शतक बाद आएगा।" एक तरह से यह नाटक कुछ हद तक ब्रोडस्की की आत्मकथा है। एक बार उन्हें साइबेरिया में एक छोटे गांव कोर्सेक में पांच साल के लिए एक कैदी के रूप में भेजा गया था। उत्तर ध्रुव से वह गांव तीन सौ मील दूर था। पांच साल जेल काटने के बाद उन्हें रूस से निर्वासित किया गया था। उन्होंने इस नाटक के बारे में संक्षेप में बताया: " जेल एक ऐसी जगह है जहां रहने के लिए बहुत कम जगह है,मगर वहाँ सोचने के लिए बहुत समय मिलता है। नाटक की अंतर्निहित कहानी में मनुष्य के जीवन के साथ समय, व्यक्तित्व और रचनात्मक भावनाओं का आपसी संबंध दर्शाया गया है।"

ब्रोडस्की को सन 1972 में रूस से निर्वासित किया गया था। तब उनका कविता-संग्रह "ए पार्ट ऑफ स्पीच"(1980) और निबंध-संग्रह 'लेस देन वन' (1986) बहुचर्चित किताबें थीं। वेस्ट इंडीज कवि डेरेक वाल्कोट ने भी शाम के कार्यक्रम में भाग लिया था। उन्होंने ब्रोडस्की की पांच अंग्रेजी अनूदित कविताएं पढ़ीं। अभिनेता वालेस सन ने ब्रोडस्की के नाटक का एक दृश्य पढ़ा। उन्होंने वुडी एलेन की दो फिल्मों में अभिनय किया था। वे दो फिल्में थीं 'मैनहट्टन' और 'न्यू हैम्पशायर होटल' । मैंने हार्वर्ड में फिल्म 'मैनहट्टन' देखी थी। बाद में मुझे पता चला कि सन ने स्वयं अपने दोस्त के साथ फिल्म 'माय डिनर विद आंद्रे' की स्क्रिप्ट लिखी है। उस फिल्म में उनका अभिनय अत्यंत ही उच्च कोटि का हुआ था। सन 1950 में अमेरिकन रिपोर्टरी थिएटर की स्थापना हुई थी। कैम्ब्रिज में रहने वाले अनेक कवि मित्रों ने इस थिएटर की स्थापना की थी। जिसमें वरिष्ठ कवि रिचर्ड विलबर, जॉन सिआरदी और रिचर्ड एवरहार्ट तथा हार्वर्ड विश्वविद्यालय से स्नातक लेखक डोनाल्ड हॉल, जॉन ऐशरी और फ्रैंक ओ'हारा के नाम उल्लेखनीय हैं। लेखिका नोरा सीयर ने थिएटर पर एक छोटी पुस्तक 'मेमोरिज ऑफ द फिफ्टीज' लिखी थी, जिसका उद्देश्य यह था कि यदि संभव हो तो, कवि भी अभिनय करेंगे, निर्देशन देंगे, थिएटर चलाएंगे और टिकट भी बेचेंगे। मगर पहले वे यह सुनिश्चित कर लें कि इन सभी का उनकी रचनात्मक क्षमता पर कोई बुरा असर नहीं पड रहा हैं। थियेटर में कई कार्यशालाएं आयोजित की जाती थी, जहां नाट्यकार अपने नाटक के अपूर्ण दृश्यों को कुछ चर्चा के बाद बदल सकते थे। संक्षेप में कहने का उद्देश्य था अमेरिकन वर्स थियेटर बनाना अर्थात् अमेरिकी काव्य थियेटर।

प्लेवर मोली मानिंग ने इस थिएटर की स्थापना की थी।उन्होंने थिएटर के उद्देश्य के बारे में कहा था: "अब शब्दों से इतना डर है कि हमारा लक्ष्य है शब्दों को वापस लाना।" ऐसे एक आदर्श थिएटर की मदद के लिए थोड़ी-बहुत सहायता कर पाया, वह मेरे लिए खुशी की बात थी।

ब्रोडस्की की कविताएं बीसवीं सदी की कविता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। मुझे उनका नेटिविटी पोएम्स कलेक्शन बहुत अच्छा लगता है, जो उनके द्वारा क्रिसमस के अवसर पर हर साल लिखी गई कविताओं का संकलन है। उन्होंने इन कविताओं में ईसा को बहुदृष्टिकोण से वर्तमान समय के परिप्रेक्ष्य में साधारण दुखी, जीवंत और सहानुभूतिशील मनुष्य के रूप में चित्रित किया है। अब उनका ‘कविता-समग्र’ प्रकाशित हो चुका है,जिसकी बिक्री भी बहुत अच्छी है।ब्रोडस्की की गद्य-रचनाएँ भी उच्च श्रेणी की हैं।

मेरे मन में केवल एक ही चीज़ याद आ रही है। ब्रोडस्की निर्वासित होकर अमेरिका के पूर्वी तट के एक विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बन गए थे।एक साल भी नहीं हुआ होगा कि वे अमेरिका के पोएट लोरिएट बने और तीन साल होने से पहले-पहले उन्हें नोबेल पुरस्कार मिल जाता है। सोवियत संघ और कम्युनिस्ट शासन का थोड़ा-बहुत विरोध करने वाले लेखकों को नोबेल समिति द्वारा ज्यादा महत्त्व देने के इतिहास के दृष्टिकोण से सोलगेनित्सिन और ब्रोडस्की स्वाभाविक रूप से मन में आने लगते हैं। मैंने दोपहर के भोजन के दौरान कार्लो फुएंटेस से इस बात पर चर्चा की थी। कार्लो ने कहा , “हाँ, उन्हें नोबेल पुरस्कार मिलता,मगर इतनी जल्दी नहीं।" काम्यू की तरह ब्रोडस्की को बहुत कम उम्र (50 से कम) में नोबेल पुरस्कार मिला था।

14. अमेरिका की स्वतंत्रता की प्रसवशाला-कॉनकॉर्ड

मैं हार्वर्ड के जिस अपार्टमेंट में एक साल रहा, वह कॉनकॉर्ड एवेन्यू पर स्थित था। यह एवेन्यू कैंब्रिज सिटी का मुख्य रास्ता था। इसका नाम उस छोटे से शहर (वास्तव में, यह एक बड़ा गांव है) से लिया गया है, जो हार्वर्ड से कार द्वारा लगभग आधे घंटे की दूरी पर है। कॉनकॉर्ड अमेरिकी इतिहास, साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण नाम है। यह स्वतंत्रता संग्राम का मुख्य केंद्र था। स्वतंत्रता संग्राम के समय यह सबसे उत्तेजक और निर्णायक स्थान था।यह वह जगह है, जहां थोरो, इमर्सन और हॉथोर्न रहते थे।

मैंने लेक्सिंगटन और कॉनकॉर्ड के चारों ओर घूमने में दो पूरे दिन बिताए थे। कॉनकॉर्ड से पहले लेक्सिंगटन आता है। दोनों छोटे कस्बे हैं। कॉनकॉर्ड ज्यादा प्रसिद्ध है।

कॉनकॉर्ड अमेरिका की स्वतंत्रता संग्राम की पवित्र भूमि है। पिल्ग्रिम फादर इंग्लैंड से यहाँ आए थे और मैसाचुसेट्स में न्यू इंग्लैंड नामक उपनिवेश की स्थापना की थी। नई सभ्यता, नई संस्कृति और नए समाज की स्थापना की गई थी। हार्वर्ड जैसे विश्व प्रसिद्ध विश्वविद्यालय की स्थापना हुई थी। यहाँ का भूगोल ब्रिटिश द्वीपों से अलग था, लेकिन ब्रिटेन के शहरों और कस्बों के नाम पर इन इलाकों का नामकरण किया गया है। उदाहरण प्लायमाउथ, कैम्ब्रिज, ऑक्सफ़ोर्ड, सुंदरलैंड, ग्लॉसेस्टर, वॉर्सेस्टर इत्यादि। इंग्लैंड के उच्च शिक्षित और दूरदर्शी लोगों ने समकालीन समाज और राजनीति के खिलाफ विद्रोह किया था और वे अमेरिका में आए थे। लेकिन उन्होंने अपने पुराने देश की स्मृति को जीवित रखने के लिए इन जगहों के नाम ऐसे रखे थे। इंग्लैंड का राजा प्रोटेस्टेंटिज्म धर्म को मानता था, इसलिए वह इस नई उपनिवेश का धर्म बन गया और न्यू इंग्लैंड के पूरे क्षेत्र में व्याप्त हो गया था। उन्हें इस बात की संतुष्टि थी कि उन्होंने पुरानी इंग्लैंड की प्राचीन सभ्य परंपरा को नया रूप दिया था। अपने प्राचीन देश ने उन्हें त्याग दिया था इसलिए उन्होंने सभी पुरानी चीजों का नवीनीकरण किया था। यह प्रक्रिया केवल पुराने स्थानों के नए नाम देने तक ही सीमित नहीं थी। इंग्लैंड की सुगंध सारे सामाजिक आचरण, रीति-रिवाजों, शिक्षा (हार्वर्ड की शिक्षा प्रणाली, इंग्लैंड के दो प्रमुख विश्वविद्यालयों, जैसे ऑक्सफ़ोर्ड और कैम्ब्रिज पर आधारित थी) में पाई जाती थी। ऐसा कैसे नहीं होता ? जो लोग उपनिवेश की स्थापना में अग्रणी थे, उनमें से ज्यादातर कैम्ब्रिज और ऑक्सफोर्ड के पुराने छात्र थे !!

किसी इतिहासकार ने कहा है, "इतिहास हमेशा एक त्रासदी है, नाटक नहीं।" यह कथन पूरी तरह से अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम के लिए लागू होता है। उपनिवेश में रहने वाले लोगों का इंग्लैंड की रानी या राजा का विरोध करने का कोई मतलब नहीं था। उनका क्रांतिकारी रवैया धीरे-धीरे समय के साथ समाप्त हो गया था। इस प्रकार, इंग्लैंड के अधिकांश निवासियों में उपनिवेश के लोगों के लिए बहुत अधिक सहानुभूति और स्नेह था। वे आखिर अपने लोग थे! इस प्रकार स्वतंत्रता संग्राम जरूरी नहीं था। ब्रिटिश प्रशासन और उपनिवेश के बीच रिश्ता तब तक अच्छा था, जब तक इंग्लैंड के राजा ने इस पर कुठाराघात नहीं किया था। इतिहासकारों का मानना है कि राजा और ब्रिटिश प्रशासन की दूरदर्शिता की कमी के कारण उपनिवेशवासी स्वतंत्रता संग्राम के लिए मजबूर हुए। स्वतंत्रता के घोषणा-पत्र में इंग्लैंड के राजा की अत्यंत कठोर भाषा में आलोचना की गई है। किंग जॉर्ज व्यक्तिगत स्तर पर एक स्नेही व्यक्ति थे। एलन बेनेट ने अपनी पुस्तक 'मैडनेस ऑफ किंग जॉर्ज' में उनकी विरोधाभासी मानसिकता को दर्शाया है। उनके द्वारा नियुक्त प्रधान मंत्री लॉर्ड नॉर्थ को बेनेट ने आलस्य-परायण और हठी के रूप में वर्णित किया था।संक्षेप में कहें, दोनों में दूरदर्शिता और नेतृत्व की कमी थी। जब उपनिवेशवासी कुछ हद तक विरोधी बन गए, तो उन्होंने यह पता लगाने की कोशिश नहीं की कि ऐसा क्यों हो रहा है और स्थिति का समाधान करने के लिए कौनसे कदम उठाए जाएं। इसके विपरीत, उस विद्रोह को दबाने के लिए कई कठोर कृत्य प्रयोग में लाए गए, जबकि वे इससे सम्बंधित नहीं थे। अटलांटिक महासागर के उस पार सेना भेजी गई। पिट द एल्डर, इंग्लैंड के पूर्ववर्ती युद्धकालीन नेता ने इसका विरोध किया था, जिन्हें बाद में लॉर्ड चैथम के नाम से जाना जाने लगा। उन्होंने इंग्लैंड के इस पदक्षेप का विरोध किया था। उन्होंने कहा, " अब खोने के लिए समय नहीं है; हर आंदोलन खतरों से भरा हुआ है। नहीं, जब मैं बोल रहा हूँ, तो निर्णायक कदम उठाने होंगे। "

उसकी बात मान ली गई। उसके इस बयान के कुछ ही हफ्तों बाद पूरे मैसाचुसेट्स (न्यू इंग्लैंड) क्षेत्र में स्थिति विस्फोटक हो गई। एक रिपोर्ट ब्रिटिश गवर्नर जनरल थॉमस गाग के पास आई कि मैसाचुसेट्स कांग्रेस और सुरक्षा समिति ब्रिटेन के विरोध के लिए तैयार हो रही हैं। ब्रिटेन के साथ युद्ध करने के उद्देश्य से हथियार एकत्र किए जा रहे हैं। सबसे दुखद बात थी कि गवर्नर की उपनिवेश के प्रति कोई विद्वेष नहीं था, उनकी पत्नी औपनिवेशिक अमेरिकन थी। लेकिन उन्हें हथियारों को जब्त करने के निर्देश दिए गए थे।

जब यह समाचार मिला कि ब्रिटिश सेना युद्ध की तैयारी कर रही है, बोस्टन के प्राचीन नॉर्थ चर्च से ब्रिटेन को चेतावनी दी गई थी और उपनिवेशवासियों को संगठित होने का आह्वान किया गया। उपनिवेशवासियों के दो प्रसिद्ध नेताओं में विलियम डोयस और पॉल रिवर लेक्सिंगटन कॉनकॉर्ड में चारों तरफ घूमकर स्थानीय निवासियों को ब्रिटिश के खिलाफ लड़ने का आह्वान किया। लेक्सिंगटन में पहला संघर्ष और रक्तपात शुरू हुआ। इतिहासकारों का मानना है कि इतिहास में यह आजादी का पहला औपचारिक युद्ध था, जिसकी गूंज दुनिया भर में सुनाई पड़ी। जब ब्रिटिश सेना लेक्सिंगटन पहुंची, स्थानीय सेना (मिनिटमैन) लेक्सिंगटन कॉमन में इकट्ठी हुई थी। ब्रिटेन के सभी गांवों में विलेज कॉमन होता है। उसी मॉडल को बाद में उपनिवेशवासियों ने अपनाया था। इस युद्ध में आठ उपनिवेशवासियों की बलि चढ़ी। ब्रिटिश सेना कॉनकॉर्ड की ओर बढ़ने लगी।

कॉनकॉर्ड लेक्सिंगटन से केवल 9 किलोमीटर दूर था। सड़क का नाम है बेटल रोड ट्रेल है, जहां पर कोलोनियल इन होटल सन 1716 में बनी हुई है, रास्ते में आती है। यह होटल 281 साल पुरानी थी, जब मैंने इसे देखा था। यह इन अब तक अपने मूल आकार में मौजूद है। मोनूमेंट स्ट्रीट थोड़ी देर बाद आती है, जो इमर्सन, थोरो, नथानियल, हॉथोर्न और एल्कोट जैसे कॉनकॉर्ड के प्रसिद्ध साहित्यकारों की यादें समाई हुई हैं । थोरो का वाल्डेन तालाब इस जगह से बहुत दूर नहीं है। रास्ते में पहले आता है –ओल्ड मानसे, जिसे राल्फ वाल्डो एमर्सन के दादा ने बनाया था। हॉथोर्न भी कभी यहाँ रहा करते थे। ओल्ड मानसे जाने के बाद मैं सड़क के बाईं तरफ उत्तरी ब्रिज पर आया, जहां ब्रिटिश सेना को गंभीर झटका लगा था। मिनिटमैन कोई खास सेना नहीं थी, उन्होंने अप्रचलित राइफलों का इस्तेमाल किया। लेकिन उनमें बहुत उत्साह था और वे लेक्सिंगटन में अपने आठ भाइयों की मौत का बदला लेना चाहते थे। ब्रिटिश सेना ने जल्दबाजी में पीछे हटने के लिए उनका मुकाबला नहीं किया। उत्तरी ब्रिज के दोनों किनारों पर भयंकर लड़ाई हुई थी। ब्रिटिश सेना के दो सौ चौहत्तर सैनिक मारे गए या घायल हो गए। वे कॉनकॉर्ड छोड़कर बोस्टन में अपने मुख्यालय में वापस जाने के लिए मजबूर हो गए। उत्तरी ब्रिज पर उन आठ मिनटमैन सैनिकों के सम्मानार्थ एक पत्थर की मूर्ति का निर्माण किया जा रहा है, जिन्होंने लेक्सिंगटन में अपने प्राण नयौछावर कर दिए थे। मूर्ति एक मिनटमैन की है, जिस पर खुदा हुआ है '1775 अप्रैल 19' जो अमेरिकी के स्वतंत्रता संग्राम का दिन था तथा ब्रिटिश शासन के खिलाफ उनके संघर्ष का सबसे सफल दिन था। स्तंभ के दूसरी तरफ निम्नलिखित चार पंक्तियां अंकित की गई हैं:

"वे तीन हजार मील दूर आए और मर गए

अपने सिंहासन के अतीत को बनाए रखने के लिए;

सागर के ज्वार से परे, अनसुना

उनकी अंग्रेजी मां ने उन्हें विलाप करवाया। "

मैंने एक दिन में लेक्सिंगटन और कॉनकॉर्ड के सभी महत्वपूर्ण स्थानों का दौरा किया था। इनमें युद्ध स्मारक और हॉथोर्न, एमर्सन और एल्कोट परिवार की समाधियाँ भी शामिल हैं। मैंने थोरो के वाल्डेन तालाब और आस-पास उनके छोटे घर का दौरा करने के लिए एक पूरा दिन अलग से रखा था।

15. अमेरिका के दर्शन, साहित्य और संस्कृति की प्रसवशाला-कॉनकॉर्ड

लेक्सिंगटन और कॉनकॉर्ड नामक दो छोटे शहर हार्वर्ड और बोस्टन से थोड़ी दूरी पर स्थित हैं। इतिहासकार दोनों शहरों को एक रूप में देखते हैं। दोनों कस्बों की भूमिका अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम में बेहद महत्वपूर्ण थी। कॉनकॉर्ड में बहुत रक्तपात हुआ था,जिसे देखने के लिए स्वतंत्रता संग्राम के कई जीवित स्मारक हैं।कॉनकॉर्ड में हर जगह स्वतंत्रता संग्राम के विभिन्न चरणों का इतिहास दर्ज किया गया है।

कॉनकॉर्ड न केवल अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम का मूक दर्शक है,बल्कि अमेरिका के दर्शन, उपन्यास, सरल जीवन शैली और मानवता की परंपरा यहाँ पैदा हुई थी। इमरर्सन, अमेरिका का पहला महत्वपूर्ण दार्शनिक था। जो यहां लंबे समय अर्थात् पचास वर्षों तक रहा था और इस जगह पर उन्होंने अपने सभी मूल ग्रंथों की रचना की थी। इमर्सन ने अमेरिका के एक साधारण इंसान में असाधारण शक्ति, आत्म-सम्मान, गौरव, स्वाभिमान और समाजिकता की स्पष्ट तस्वीर खींची। यह तस्वीर उनके विश्वास-बोध की अभिव्यक्ति थी। यह अब तक दुनिया के लिए अमेरिका का सबसे बड़ा उपहार रहा है। उनका 'द स्कार्लेट लेटर', युगांतरकारी उपन्यास कॉनकॉर्ड में लिखा गया था। इस उपन्यास में मानव मनोविज्ञान के कई चरणों का विश्लेषण कर ऐसे पात्र का निर्माण किया है, जो उपन्यासों के इतिहास में अद्वितीय और अविस्मरणीय है। उपन्यासकार नथानियल हॉथोर्न को उपन्यासों के जादूगर कहा गया है। सामान्य पाठकों के लिए श्रीमती लुइसा अल्कोट द्वारा कई उपन्यास कॉनकॉर्ड में लिखे गए थे। अल्कोट के पिता उस समय के प्रसिद्ध दार्शनिकों में से एक थे और इमर्सन द्वारा स्थापित ‘शनिवार क्लब’ के सदस्य थे। कॉनकॉर्ड की धरती अमेरिकी समाज के सामाजिक मूल्यों और आध्यात्मिकता की पृष्ठभूमि बनी। सरल जीवन शैली में थोरो की जीवन-शैली अनोखी थी। यह उनकी साहित्यिक कृतियों से स्पष्ट जाना जा सकता है। उन्होंने स्वेच्छा से खुद को दो वर्षों तक जन-साधारण से दूर रखा और प्रकृति के सानिध्य में रहकर उन्होंने कुछ पुस्तकें लिखीं, जिसने ने केवल अमेरिका का पथ-प्रदर्शन किया,बल्कि महात्मा गांधी और मार्टिन लूथर किंग जैसे महानुभावों को भी असाधारण मंत्र दिया, जो मानव जाति के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय साबित हुआ। कॉनकॉर्ड अमेरिकी इतिहास में दर्शन और स्वतंत्रता-संग्राम के क्षेत्र में अद्वितीय है।

राल्फ वाल्डो इमर्सन

इमर्सन अमेरिका के सबसे महत्वपूर्ण दार्शनिक हैं । उनके जीवन ने विभिन्न तरीकों से अमेरिकी दार्शनिक परंपरा और साहित्य को प्रभावित किया है। दर्शन और चिंतन की विशाल परिधि के बाहर, उन्होंने मिसिसिपी नदी पर पुरानी शैली में बनी नौकाओं के आस-पास रहने वाले किसानों और व्यवसायियों के जीवन का अध्ययन करने में काफी समय बिताया। उन्होंने अमेरिका के उत्तर-पूर्व और मध्य-पश्चिम के विभिन्न क्षेत्रों में चालीस वर्षों तक भाषण दिया था। उन्होंने अपने व्याख्यानों के नोटों के आधार पर अपने प्रसिद्ध निबंध प्रकाशित किए थे।उनका 'आत्मनिर्भर' नामक निबंध अमेरिकी साहित्य में एक उज्ज्वल रत्न है। उनकी भाषा में, “एक प्रतिभा को अपने विचारों पर विश्वास होना चाहिए। केवल छोटा आदमी दूसरों की सभी बातों पर सहमत होने के लिए तैयार रहता है।एक असली आदमी को हर वक्त और हर चीज में ‘हाँ’ नहीं कहना चाहिए।”

इमर्सन ने अपने बचपन में अपने पिता को खो दिया था। उनकी विधवा मां को अपने पांच बेटों में से इमर्सन के भविष्य के प्रति कोई उच्च आंकांक्षा नहीं थी। बचपन में वह स्वस्थ लड़का नहीं था और अक्सर विभिन्न बीमारियों से पीड़ित होता रहता था। सब कोई यही सोचता था कि इमर्सन बहुत बुद्धिमान नहीं है,उसकी कल्पना-शक्ति प्रखर नहीं है।स्कूल में भी उसका अच्छा प्रदर्शन नहीं था। वह ग्रीक और गणित में बहुत कमज़ोर था। उनके स्वयं के शब्दों में, "स्कूल में पढ़ना एक अमानवीय काम था"।वह हमेशा स्कूल से डरते थे। मगर जब वह स्कूल छोड़कर हार्वर्ड चले गए तो उनके छात्र-जीवन का एक नया अध्याय शुरू हुआ।उनके प्रोफेसरों ने देखा कि इमर्सन में विश्व के कई दार्शनिकों और लेखकों को पढ़ने की बहुत लिप्सा थी। वह हार्वर्ड स्क्वायर में जिस छात्रावास में रहते थे, वहाँ सर्दी में गर्म रखने की कोई व्यवस्था नहीं थी। ठंड से खुद को बचाने एक से अधिक कंबल का इस्तेमाल करते थे और उस कंबल के अंदर घुसकर प्लेटो का दर्शन-शास्त्र पढ़ते थे। यहाँ इस बात का उल्लेख करना आवश्यक है कि प्लेटो की रचनाओं से वह बहुत प्रभावित थे।

जब वे स्कूल में पढ़ रहे थे तब से उनकी चाची श्रीमती मेरी उन्हें बहुत पसंद करती थी।उन्हें उम्मीद थी कि इमरर्सन एक दिन महान दार्शनिक बनेगा। हार्वर्ड से स्नातक होने के बाद कुछ समय के लिए उन्होंने एक शिक्षक के रूप में काम किया। उन्होंने कुछ समय के लिए एक चर्च में ‘मिनिस्टर’ का भी काम किया था।स्नातक होने के बाद उनकी शादी हुई, लेकिन शादी से उन्हें कोई संतोष नहीं मिला।

सन 1835 इमर्सन के जीवन का उल्लेखनीय वर्ष था। उस वर्ष उन्होंने दूसरी शादी की और यह निर्णय लिया कि वह अपना सम्पूर्ण जीवन आत्म-चिंतन और लेखन में बिताएंगे। उन्हें पूरा भरोसा था कि वह अपने आलेखों से जीवित रहने के लिए पर्याप्त कमा सकेंगे। कॉनकॉर्ड में एक छोटे से घर में वह रहने लगे। उस घर में उन्होंने पचास वर्षों तक अपनी रचनाएं लिखीं, उनकी उन रचनाओं ने न केवल अमेरिका, बल्कि पूरे विश्व को चकित कर दिया।उनकी रचनाओं और दर्शन में कई नई चीजों,समकालीन मूल्यों के विरूद्ध उनके क्रांतिकारी विचारों के कारण आज भी उन्हें अमेरिका का सबसे बड़ा दार्शनिक माना जाता है।

बचपन से हर रोज 5 बजे उठने की उनकी आदत थी। उठने के बाद एक घंटे तक जर्नल लिखते थे, अपने विचारों की अभिव्यक्ति के लिए। जिसे वे अपना 'बचत बैंक' जर्नल कहते थे। उनकी अधिकांश रचनाएं इस पत्रिका से निकली हैं।

उनके दृष्टिकोण में निम्नलिखित विचार महत्वपूर्ण थे:-

1. आनंद के लिए मनुष्य जीवन बना है। उनका मानना था कि इस दुनिया में हर जीवित वस्तु में भगवान की चेतना मौजूद है। इसलिए निराशा और दुख क्षणिक हैं। उनका अतिक्रम करते हुए मनुष्य को आनंद के पवित्र स्रोत की तरफ बढ़ना चाहिए।

2. वह आश्वस्त थे कि पूरी दुनिया एक ही रस्सी से बंधी हुई है। यह रस्सी हमारे चारों ओर की प्रकृति है। उनका मानना था कि प्रकृति परमेश्वर की अभिव्यक्ति है और वह प्रकृति का ही ध्यान करते थे। कॉनकॉर्ड के पास स्थित वाल्डेन तालाब और सन्निकट जंगल में वह हर दिन जाते थे। वह बहुत समय तक झील, घास और पेड़ों को निहारते रहते थे, जिसे उन्होंने अपनी पत्रिका में लिखा है। 1848 में फ्रांसीसी क्रांति के समय क्रांतिकारियों ने कई पेड़ों को काटकर सड़कों को ब्लॉक करने के लिए उनका इस्तेमाल किया। उन्होंने अपने जर्नल में निम्नलिखित प्रश्न उठाया था: "क्या क्रांति पेड़ों की कीमत पर उचित थी?"

3. उनका मानना था कि हर किसी को अपने बल की तुलना में अपने आप में ज्यादा विश्वास होना चाहिए। उत्कलमणि गोपबंधु की तरह, उनका मानना था कि एक आदमी का जीवन केवल साल और महीनों से नहीं मापा जाना चाहिए। इमर्सन की भाषा में, "हम किसी आदमी के वर्षों की गिनती नहीं करते हैं, जब तक उसके पास गिनने के सिवाय कुछ नहीं हो।" उनका मानना है कि गहरे आत्म-विश्वास की भावना किसी भी आदमी को निर्भयतापूर्वक अपनी शर्तों पर अपना जीवन जीने में मदद करता है।उनकी भाषा में, "हमें खतरनाक तरीके से जीवित रहना चाहिए।" वह पूरी तरह गुलामी के खिलाफ थे। जब अमेरिकी कांग्रेस ने 1850 में फ्यूजिटिव स्लेव लॉ को पारित किया, तो इमर्सन ने कहा, "भगवान की कसम, मैं इसे नहीं मानता।" उनका दृढ़ विश्वास था कि मनुष्य असीम है। उनका यह भी दृढ़ विश्वास था कि हर व्यक्ति के भीतर विवेक और विचार बुद्धि सन्निहित होती है।

4. उनका मानना था कि मनुष्य को अपने जीवन में भौतिकवादी नहीं होना चाहिए और न ही भोग-विलास के प्रति दुर्बलता । उन्होंने एक प्रश्न उठाया, " घर और खलिहान के आराम हेतु स्टारलाईट रेगिस्तान में घूमने का तुम्हारा अधिकार क्यों छोड़ना चाहिए?" वह पूरे जीवन मितव्ययी थे। वह गरीब भी थे। उन्होंने लुइसा अल्कोट के पिता और थोरो को कुछ वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए अतिरिक्त श्रम किया। प्रसिद्ध अमेरिकी कवि वॉल्ट व्हिटमैन ने एक कवि के रूप में अपनी प्रगति के लिए इमर्सन के योगदान को सुंदर ढंग से स्वीकार किया है, "I was Simmering, Simmering, Simmering. Emerson brought me to a boil. "

इतिहास शनिवार क्लब के लिए भी इमर्सन को याद करता है। जिस दिन यह क्लब शुरू हुआ था, तत्कालीन सभी महत्वपूर्ण लेखक और चिंतक इस क्लब के सदस्य थे। इनमें प्रमुख थे थोरो, एच॰ लोंगफेलो, जे॰आर॰लोवेल,हॉथोर्न,ओलिवर वेन्डेल्स होम्स और कई अन्य। अमेरीका के इस प्रसिद्ध दार्शनिक का सन 1862 में 79 वर्ष की आयु में निधन हो गया। अपने अन्य दोस्तों के साथ कॉनकॉर्ड में एक ही जगह पर समाधि दी गई। उनकी मृत्यु के बाद उनके विचारों और दर्शनों पर कई पुस्तकें लिखी गई । मेरा मानना है कि उनमें तीन पुस्तकें महत्वपूर्ण हैं।

पहली पुस्तक 'इमर्सन एंड कंडक्ट ऑफ़ लाइफ' के लेखक डेविड रॉबिन्सन ने लिखा है कि इमर्सन धीरे-धीरे आधिभौतिक या रहस्यवाद से दूर होते गए। यह सच है कि इमर्सन की प्रसिद्धि उन्नीसवीं शताब्दी के तीसरे और चौथे दशकों के अपने निबंधों और व्याख्यानों पर निर्भर करती है। उन्होंने इनमें आदर्शवाद और रहस्यमय विचारों पर बल दिया था। मगर समय के साथ उन्होंने नैतिकता, कर्मदक्षता और समाज के अन्य व्यक्तियों के लिए कुछ करने की आवश्यकता पर अधिक बल दिया। रॉबिन्सन दूसरे चरण में इमर्सन के कामों के बारे में अपने दो प्रमुख निबंध-संग्रहों का उदाहरण देते हुए बताते हैं। वे 'सोसाइटी एंड सॉलिट्यूड' और 'द कंडक्ट ऑफ लाइफ' हैं अर्थात् ‘समाज और निर्जनता’ एवं ‘जीवनचर्या’। रॉबिन्सन इस चरण में इमर्सन के कार्यों के बारे में कहते हैं, "मैं उस आदमी को पसंद नहीं करता जो सोच रहा है कि वह कैसे अच्छा बनेगा;लेकिन उस आदमी को पसंद करता हूँ जो अपने काम को पूरा करने की सोच रहा है।" रॉबिन्सन का मानना था कि जीवन के इस चरण के दौरान वह धीरे-धीरे रहस्यवाद से यथार्थवाद की तरफ मुड़ रहे थे। इमर्सन ने इस दौरान रहस्यवादी विचारों से सामाजिक कर्तव्यों और नैतिकता को अधिक महत्वपूर्ण माना।

दूसरी पुस्तक "इमर्सन और लिटरेरी चार्ज" है,जो डेविड पोर्टर द्वारा लिखी गई और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा प्रकाशित हुई। पोर्टर की राय में, इमर्सन अमेरिकी साहित्य में आधुनिकता के पूर्वज थे। उन्हें इस दृष्टिकोण से अमेरिकी साहित्य के इतिहास में सबसे बड़ा माना नहीं जा सकता है, लेकिन अमेरिकी साहित्य और कविता के क्षेत्र में वह एक अपरिहार्य निर्णायक और प्रभावशाली लेखक थे। परवर्ती कवियों में वालेस स्टीवंस, विलियम कार्लो, एमिली डिकिन्सन, आदि पर उनका स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है। इमर्सन अपने आलेखों में चिंतन और कर्म, व्यक्ति और समाज, परंपरा और आधुनिकता आदि को एक साथ लाने में सक्षम थे। उनकी साहित्यिक रचनाएँ एक नए साहित्यिक युग के प्रादुर्भाव का संकेत दे रही थीं । उनकी पुस्तक ‘समाज और निर्जनता’ इस दोहरी प्रक्रिया का प्रमाण है। एक ओर, उच्च कोटि के साहित्य की रचना तब तक संभव नहीं है जब तक कि समाज के साथ लेखक के व्यक्तिगत और घनिष्ठ संबंध न हो। दूसरी ओर, समाज के साथ इस तरह के रिश्तों से उत्पन्न होने वाला अनुभव लेखक की निर्जन आत्मा और एकाकीपन में अपनी अंतिम अभिव्यक्ति पाता है। इसलिए साहित्य समाज की जिम्मेदारी तक सीमित नहीं है। इसी तरह यह आत्मनिरीक्षण तक भी सीमित नहीं है। दोनों के बीच एक अच्छा संतुलन उच्च कोटि के साहित्य की रचना में मदद करता है।

इमर्सन थोरो के अकेले जीवन के अनुभवों को आदर की दृष्टि से देखते थे। उनका मानना था कि लेखक को समाज से कुछ हद तक दूरी बनाए रखकर, अपने स्वयं के अनुभवों और सामाजिक गतिविधियों का गहन पर्यवेक्षण करना चाहिए। ‘वाल्डेन पॉन्ड’ उनके लिए लेखकीय जीवनशैली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था। इसके अलावा, उन्होंने यह भी महसूस किया कि हर व्यक्ति की समाज के प्रति ज़िम्मेदारी है। उनके जीवन के दूसरे चरण के आलेखों में यह पहलू अधिक प्रभावशाली था।

रॉबिन्सन और पोर्टर के अलावा, इमर्सन के बारे में तीसरी सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक एडवर्ड वॅकेंप्पेट द्वारा लिखित 'द बैलेंस्ड मैन' है। उपर्युक्त चर्चा की पृष्ठभूमि से यह स्पष्ट होता है कि इमर्सन एक बहुत ही संतुलित व्यक्ति थे, जो अपने जीवन में और अपने आलेखों में दर्शन और कर्म के बीच एक अच्छा संतुलन लाने में सिद्धहस्त थे। यह अमेरिकी साहित्य और दर्शन की सबसे महत्वपूर्ण बात है।

हेनरी डेविड थोरो

हेनरी डेविड थोरो (1817-1862) अमेरिका के सबसे प्रसिद्ध दार्शनिकों और लेखकों में से एक हैं, जिन्होंने व्यक्तियों के अलग-अलग अस्तित्व और प्रकृति के साथ अंतरंग सह-अस्तित्व पर अपनी प्रगाढ़ आस्था व्यक्त की थी। उन्होंने अपने हाथों से एक छोटी-सी झोपड़ी बनाकर मैसाचुसेट्स के कॉनकॉर्ड निकट वाल्डेन नामक जगह पर पूरे दो साल अकेले बिताए थे। थोरो कॉनकॉर्ड में पैदा हुए थे और हार्वर्ड में शिक्षित। 1830 के दशक के अंत से 1840 के दशक की शुरुआत तक स्कूल में पढ़ाने के साथ-साथ निजी ट्यूशन में व्यस्त थे। थोरो 1841 और 1843 के बीच प्रसिद्ध अमेरिकी दार्शनिक और निबंधकार राल्फ वाल्डो इमर्सन के घर में रहते थे।उस समय अमेरिका में इमर्सन के मार्गदर्शन में ‘ट्रांसिंडेंटलिस्ट’ या ‘उत्तरणवाद’ सामाजिक दर्शन के रूप में प्रसिद्ध हो गया था। इस दार्शनिक दृष्टिकोण के अनुसार- 'भगवान प्रकृति के प्रत्येक वस्तु में मौजूद है'। उनका यह भी विश्वास था कि दिव्य शक्ति हर व्यक्ति के अंदर मौजूद है और वह अपनी अंतरात्मा की आवाज के अनुसार काम करके मानसिक शांति प्राप्त कर सकता है। इमर्सन, थोरो, शिक्षाविद् और दार्शनिक ब्रॉन्सन अल्कोट के अलावा, सामज सुधारक मार्गरेट फुलर और साहित्यिक आलोचक जॉर्ज रिकली ने भी इस दृष्टिकोण पर विश्वास किया। ‘उत्तरणवाद’ में परंपराओं, अच्छे सामाजिक संबंध और व्यक्तिगत चेतना की एक संतुलित अभिव्यक्ति के बारे में एक नया दृष्टिकोण शामिल था। मैंने थोरो के बारे में पहले बहुत कुछ पढ़ा था। मैं जानता था कि गांधी उनके जीवन से कैसे प्रभावित हुए थे। इसलिए मैं थोरो के वाल्डेन पॉन्ड के किनारे पर दीर्घ समय तक बैठकर उस व्यक्ति के बारे में सोचने लगा, जिसने अपनी जीवन यात्रा में कुछ नया खोजा, सम्पूर्ण व्यक्तिगत जीवन यापन करने के लिए। थोरो 1945 से इस झील या तालाब (वाल्डेन) के किनारे पर अपने हाथ से बने कुटीर में दो साल तक रहे थे। उन्होंने अपनी डायरी में अपनी कार्यावली का विशद विवरण लिपिबद्ध किया था। अपनी कार्यावली के अलावा, उन्होंने प्रकृति की विभिन्न वस्तुओं को भी देखा और आध्यात्मिक ध्यान-धारणा को भी इस डायरी में दर्ज किया।अपने वहाँ रहने के दौरान उन्होंने साग-सब्जियां उगाई, तालाब से मछह लियां पकड़ी और विभिन्न जीव-जंतुओं और आकाश में उड़ते पक्षियों का अवलोकन किया। दिन-रात और ऋतु चक्र के परिवर्तन का आनंद लेते थे और अपने अनुभवों को लिखते थे। समाज में दूसरों के साथ अच्छे संबंध रखने में विश्वास करने वाले थोरो इन दो वर्षों के दौरान पूर्ण रूप से आत्म-निर्भर होकर अत्यंत सामान्य जीवन जीने की कोशिश कर रहे थे। इस अवधि में जो कोई उनसे मिलने आया तो उन्होंने उनको अच्छा आतिथ्य प्रदान किया। अकेले जीवन जीने वाले ऐसे एक दार्शनिक और लेखक के लिए वास्तव में एक विरल घटना है! मगर उन्होंने कहा कि इन दो साल की अवधि के दौरान उन्हें कभी अकेलापन महसूस नहीं हुआ। उनका विश्वास था कि हर प्राकृतिक वस्तु में जीवन है और इन वस्तुओं ने उनका साथ दिया था। भले ही, वह वस्तु तालाब में तैरती हुई मछली हो, आकाश में उड़ती चिड़िया हो,फूलों से लदालद जंगली पौधें हों, अपने हाथों से उपजाई हुई बगीचे की बीन्स हो या अन्य वनस्पति पौधे हों ।

वाल्डेन को इस दृष्टि से दुनिया की सर्वश्रेष्ठ पुस्तकों में स्थान मिला। वाल्डेन छोड़ने के बाद उन्होंने कुछ समय बिताया इमर्सन के घर में और बाद में अपने पिता के पास। वाल्डेन में रहने से पहले उन्होंने 1839 में अपने भाई के साथ नाव से यात्रा की थी। यह यात्रा मेरिमैक नामक एक छोटी-सी स्थानीय नदी में की गई थी।इस नौका-यात्रा के थोरो के अनुभवों के अलावा, कई प्राकृतिक वस्तुओं के बारे में उनके दार्शनिक विचार और टिप्पणियां 'कॉनकॉर्ड और मैरिमैक नदी में एक सप्ताह' नामक पुस्तक में दर्ज है। यह पुस्तक 1849 में प्रकाशित हुई थी, जब थोरो जीवित थे। उनके द्वारा लिखी गई अन्य पुस्तकें उनकी मृत्यु के बाद संपादित और प्रकाशित की गई हैं। थोरो को 1846 में जेल हुई थी, जब उन्होंने मेक्सिको के साथ अमेरिका के युद्ध का विरोध किया था। उन्होंने अपने प्रसिद्ध निबंध 'सिविल डिसोबेडिएन्स(सविनय अवज्ञा)' में अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। महात्मा गांधी इस निबंध से काफी प्रभावित हुए थे। अमेरिकन नीग्रो को सामाजिक न्याय दिलाने की दिशा में काम करने वाले बहुत सारे व्यक्ति एवं अनुष्ठान भी निबंध से प्रभावित हुए थे। थोरो द्वारा लिखित छह ह पुस्तकें उनकी मृत्यु के बाद 1862 में प्रकाशित हुईं थीं। इन चारों को उन्नीसवीं सदी में प्रकाशित किया गया था, अर्थात् 'Excursion(भ्रमण)' (1863), 'The Maine woods(द मेन वुड्स)' (1864), 'A café cod (ए कैफे कॉड)' (1865) और 'A onkyee in Canada (ए ओंक्यी इन कनाड़ा)' (1866)। एक लंबे समय के बाद उनकी दो और पुस्तकें प्रकाशित हुईं। वे थी 'Faith in a seed (बीज में विश्वास)' और 'Wild Fruits (जंगली फल)' । थोरो ने अपने जीवन-दर्शन को बहुत ही कम वाक्यों में इस प्रकार लिखा है: -

"आपको वर्तमान में रहना होगा, हर लहर पर अपने आपको लांच करना होगा और प्रत्येक क्षण में अपने अनंत काल को देखना होगा। मूर्ख लोग अपने अवसर के द्वीपों पर खड़े होकर किसी दूसरी जमीन की ओर देखते हैं।कोई अन्य जमीन नहीं है; इसके सिवाय कोई दूसरा जीवन भी नहीं है।"

थोरो ने अपनी जीवनचर्या से कई उदाहरणों का हवाला दिया है,जिससे मनुष्य अपने जीवन में खुशी और संतोष कैसे प्राप्त कर सकते हैं। मैंने इस बारे में लगभग सारी चीजें पढ़ी हैं। जिस दिन मैं वाल्डेन और उनका घर (जो अब एक संग्रहालय है) देखने गया था, साथ में लेकर गया था थोरो की कुछ रचनाओं को, उस पवित्र भूमि पर बैठकर, उस सुंदर हृदयस्पर्शी वातावरण में पढ़ने के लिए। उसके बारे में कुछ कहने का मतलब उनकी भाषा के उच्चारण को लिपिबद्ध करने के सिवाय कुछ और संभव नहीं है।

क्या दो साल अकेले रहकर उन्होंने अकेलेपन का सामना किया था ? हम में से बहुत से लोग अकेलापन महसूस करते हैं, भले ही,हम घनी आबादी वाले क्षेत्रों में रहते हैं। वास्तव में उनके अनुभव सीखना कितना आवश्यक है! वह अपनी भाषा में कह रहे है। मैं उसे अनुवाद करने की कोशिश नहीं कर रहा हूँ ...। "मैं अकेला नहीं हूं ... .. एक डंडेलायन, एक मक्खी, एक मधुमक्खी की तुलना में। मैं उत्तर तारा, दक्षिण हवा, अप्रैल की बूँदाबाँदी या नए घर में पहली मकड़ी की तुलना में अकेला नहीं हूं।"

वह हर किसी के करीब था: अप्रैल की बूँदाबाँदी, एक उत्तर तारा या दक्षिण हवा।

"ज्यादातर पुरुष ... जीवन के बेहद कठोर परिश्रम तथा आलतू-फालतू चिंताओं से ऐसे जकड़े हुए है कि वे जीवन के सूक्ष्म फलों को नहीं तोड़ सकते है। "

" मैं जंगल में गया था क्योंकि मैं जीना चाहता था .. और मैंने देखा कि उससे क्या सीखना था, और क्या नहीं, जब मैं मरने लगा था, तब पता चला कि मैं जीवित नहीं हूँ।"

जादुई काव्यात्मक भाषा में उनकी कुछ पंक्तियों पर फिर से गौर कीजिए:

" समय है,मैं जिस धारा में मछह ली पकड़ने जाता हूँ। इसकी पतली धारा दूर ले जाती है लेकिन अनंतकाल बना रहता है। मैं और गहराई से पानी पीता हूं, आकाश में मछह लियां पकड़ता हूँ, जिसका धरातल सितारों से भरा हुआ है।"

" केवल उस दिन ही प्रभात होती हैं,जिस दिन हम जागते हैं। प्रभात होने के लिए बहुत दिन हैं। सूरज तो एक सुबह का तारा है।"

" मैं चिंतित हूं ... .. दो अनंत-काल, भूत और भविष्य के संगम पर खड़े होते हुए, जो सूक्ष्मता से वर्तमान क्षण ही है।"

“मुझे अपने जीवन में एक व्यापक अंतर पसंद है।"

यह उनका दृढ़ संकल्प था ( दो साल तक वाल्डेन में स्वेच्छा से अकेले रहने का अर्थ था) कि जीवन का मार्जिन खूब प्रशस्त रहें। इसे खाली पड़ा रहने दो, मगर इसमें बकवास नहीं भरी होनी चाहिए। हम उन दोनों चरम सीमाओं के मिलन बिंदु पर जीवन जीना सीखते हैं, अतीत और भविष्य के मिलन बिंदु वर्तमान पर।

"इतने शरद ऋतु और सर्दियों के दिन बिताए ...।

हवा को सुनने और उसे साथ ले जाने की कोशिश करते हुए ।"

एक कवि, खुद में खोया हुआ कवि। थोरो! जिसने खेती करने की कोशिश की, फसल उगाने की कोशिश की और तालाब में मछह ली पालने की कोशिश की! लेकिन जिनके कान हमेशा सुनने को तत्पर थे, कि शीत ऋतु में हवा क्या कहती है !

हम जानते हैं कि थोरो हार्वर्ड से 1837 में स्नातक हुए थे, 1845 तक इधर-उधर काम किए, इमर्सन के घर में 1841 से 1843 तक रहे थे और वाल्डेन तालाब के तट पर कुटीर में 1844-45 बिताए। उन्होंने 1841 में वाल्डेन जाने के लिए अपना मन बनाया था। 24 दिसंबर, 1841 को, उन्होंने अपनी डायरी में लिखा:

"मैं जल्द ही जाना चाहता हूं और तालाब के साथ जीऊँगा ... .. मेरे दोस्त मुझसे पूछह ते हैं कि मैं वहां क्या करूंगा? क्या मौसम के कार्यक्रमों को देखना किसी रोजगार से कम है? "

उन्होंने यह कहने के लिए नहीं कहा था। उन्होंने अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनी होगी। आधुनिक समाज और दग्ध जीवन के लिए अमृत की तलाश कर था वह। उन्होंने दुनिया को त्याग नहीं किया, वह वर्तमान में रहते थे। उन्होंने हर समय अपनी जीवन को दूसरों के जीवन की प्रकृति के साथ एकात्म करने का प्रयास किया। उनकी मृत्यु के कई सालों बाद प्रकाशक ह्यूटन मिफ्लिन ने 1907 में अठारह संस्करणों में उनकी समग्र रचनावली को प्रकाशित किया। इस संकलन का नाम 'द राइटिंग ऑफ़ थ्योरम' है। इस तरह के ऋषि प्रतिम व्यक्ति के कॉलेज (जो हार्वर्ड यार्ड पर चलते हैं) में अध्ययन करने और उनके कुटीर के पास बैठना मेरे लिए किसी दिव्य अनुभव से कम नहीं था!

नथानियल हॉथोर्न (1804-1864)

हॉथोर्न अमेरिका के सर्वप्रथम प्रसिद्ध उपन्यासकार थे।उनका उपन्यास 'द स्कार्लेट लेटर' भविष्य के अमेरिकी समाज,चिरंतन मूल्यबोध और वर्तमान समय के संघर्ष और जीवन स्वप्न के अप्रत्याशित परिणति की प्रभावी व्याख्या करता है।उनका जन्म 1804 में न्यू इंग्लैंड के उत्तरी क्षेत्र में स्थित सालेम के एक कुलीन परिवार में हुआ था। सालेम सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दियों में जादू-टोने के लिए कुख्यात था। चुड़ैलों को सज़ा देने के लिए विशेष अदालतें स्थापित की गई थीं और उनके लिए न्यायाधीशों की नियुक्ति की गई थी। हॉथोर्न के पूर्वजों (शायद उनके परदादा) में से एक ऐसा न्यायाधीश था,जिनके दरबार में कई चुड़ैल-प्रसंगों की सुनवाई हुई थी।रिकॉर्ड के मुताबिक वह 1692-93 में एक न्यायाधीश थे और उनके द्वारा दिए गए निर्णयों को संरक्षित रखा गया है। हॉथोर्न ने उन निर्णयों को विस्तारपूर्वक पढ़ा था, जिस पर उनका प्रसिद्ध उपन्यास 'द स्कार्लेट लेटर' आधारित था। जब वे केवल चार वर्ष के थे, तब उनके पिता की सुरीनाम के समुद्र में डूबने से मृत्यु हो गई थी। नाना के घर उनका बचपन बीता और प्राथमिक शिक्षा भी वहीं हुई। उन्होंने कहा है कि उनका प्रारंभिक जीवन कई कहानी पुस्तकों को पढ़ने, छोटी-छोटी काल्पनिक कथा-वस्तुओं की खोज करने,अपने घर और पास-पड़ोस के युवाओं को कहानियां सुनाकर मनोरंजन करने में प्रसन्नतापूर्वक व्यतीत हुआ। ऐसी पृष्ठभूमि और परिवेश से उपन्यासकार और कथाकार होने की प्रवणता उनके हृदय में बलवती हुई। मां अपने बेटे के मन को समझ गई थीं,इसलिए उसने उसे प्रोत्साहित किया। उसने आशा व्यक्त की कि उसका बेटा एक दिन एक महान लेखक होगा। पितृविहीन हॉथोर्न जब सत्रह वर्ष का था,तो उसने ननिहाल स्थित एक कॉलेज में तीन साल तक अध्ययन किया था। कॉलेज में उनके दो अंतरंग मित्र बने। एक कवि लॉन्गफेलो थे और दूसरे फ्रैंकलिन पियर्स, जो अमेरिका के चौदहवें राष्ट्रपति हुए। हॉथोर्न ने अपनी कॉलेज की शिक्षा समाप्त कर लगभग दस वर्षों तक पत्रिकाओं में लघु कथाएं लिखीं।उनका मित्र सुलिवन 'डेमोक्रेटिक रिव्यू' नामक एक पत्रिका प्रकाशित करता था। हॉथोर्न ने उस पत्रिका के लिए 25 से 30 कहानियां लिखीं, जिसका उसे कुछ पारिश्रमिक भी मिला था। उन्होंने अपनी लघु कथाओं का शीर्षक 'सेवन टेल्स ऑफ माय नेटिव लैंड' से संकलन कर कई प्रकाशकों को भेजा। दुर्भाग्यवश, किसी भी प्रकाशक ने इसे स्वीकार नहीं किया। हॉथोर्न ने निराशा और गुस्से में इस पांडुलिपि को जला दिया। उन्होंने 1828 में अपना पहला उपन्यास छह द्म नाम से अपने खर्च से प्रकाशित किया। उपन्यास का नाम 'fanshawe' था। उन्होंने अपने दोस्तों को उपहार-स्वरूप कुछ प्रतियां भेंट कीं। उन्होंने अपने इस प्रथम उपन्यास में कॉलेज जीवन के बारे में लिखा था। उपन्यास की एक भी प्रति नहीं बिकी। अनबिकी किताबें उनके घर में पड़ी हुई थीं। निराशा से उन्होंने फिर से उन सभी अनबिकी प्रतियों को आग लगा दी।

सतही तौर पर देखा जाए तो, एक लेखक के रूप में उनका जीवन बहुत ही निराशाजनक ढंग से शुरू हुआ था और इससे उन्हें बहुत दुःख हुआ था। एक प्रकाशन-संस्था के लिए 1836 और 1841 के बीच उन्होंने कुछ बाल-साहित्य लिखा और अमेरिकी समकालीन साहित्य पर कुछ निबंध भी। हॉथोर्न के जीवन में 1842 में वास्तविक परिवर्तन हुआ। इस वर्ष के दौरान उन्होंने इमर्सन और थोरो से मुलाकात की और कॉनकॉर्ड में भी रहने लगे। उसी वर्ष उनका विवाह भी हुआ। उन्होंने महसूस किया कि साहित्य की कमाई से घर चलाना मुश्किल था। इस संदर्भ में उन्होंने कहा, "मेरा साहित्य और मेरी ज्ञान-गरिमा, घर-परिवार चलाने के लिए मुझे पर्याप्त कमाई नहीं दे पा रही है।" कॉनकॉर्ड में घर चलाने के लिए उन्हें धन उधार लेना पड़ा। अपना कर्ज़ चुकाने के लिए सालेम बन्दरगाह पर उन्हें तीन साल के लिए सर्वेक्षक का काम करना पड़ा। मन लगाकर काम नहीं करने के कारण बंदरगाह के अधिकारियों ने उन्हें नौकरी से निकाल दिया । इस प्रकार उन्हें लंबे समय तक कई विफलताओं का सामना करना पड़ा। सन 1850 में प्रकाशित 'द स्कार्लेट लेटर' उनके साहित्यिक जीवन की पहली पुरस्कृत कृति थी। उसके बाद 'द हाउस ऑफ सेवन गैबल्स' दूसरा सफल उपन्यास अगले वर्ष प्रकाशित हुआ।

हॉथोर्न मनुष्य के जीवन के अंधेरे पक्ष के बारे में अधिक जागरूक थे, शायद अपने जीवन के अनुभवों की वजह से। वे कॉर्कशायर के लेनॉक्स में कुछ समय हर्मन मेलविले के साथ रहे थे। मेलविले उन्हें बहुत प्यार करते थे,इसलिए उन्होंने न केवल उनका उपन्यासों की दुनिया में स्वागत किया था, वरन उन्हें सभी प्रकार की सहायता भी प्रदान की थी। यहाँ तक कि अपना प्रसिद्ध उपन्यास "मोबी डिक" को उन्हें समर्पित किया था। मेलविले के दृष्टिकोण, जीवन के प्रति आभिमुख्य और लेखन-शैली ने स्पष्ट रूप से उन्हें प्रभावित किया था।

हॉथोर्न ने कुछ समय तक सरकारी काम भी किया था। वे सात साल तक इटली में रहे। लेकिन उन्होंने अपनी नोटबुक में कुछ चीज़ों को लिखने के अलावा इस अवधि में कोई उपन्यास या कहानी नहीं लिखी थी। वे 1860 में अमेरिका लौट आए। उन्होंने 1860 में अपना अंतिम उपन्यास 'द मार्बल फ़ौन' लिखा था। कॉनकॉर्ड में उन्होंने अपने घर का नाम ‘द वेसाइड’ रखा था अर्थात् रास्ते का किनारा। उस समय उन्होंने कुछ अच्छे निबंध लिखे, जिसका संकलन 1863 में 'अवर ओल्ड होम' शीर्षक से प्रकाशित हुआ। उनकी पत्नी ने उनकी मृत्यु के बाद कई डायरी और नोट्स संपादित कर प्रकाशित किए थे। अपने दोस्त फ्रेंकलिन के साथ एक पहाड़ी इलाके में सफर करते समय उनका निधन हो गया था।

'द स्कारलेट लेटर' निस्संदेह उनकी सबसे अच्छी रचना है।इस उपन्यास में कुछ प्रतीकों का बार-बार उपयोग किया गया है, जो पाठक का ध्यान आकर्षित करते हैं। उन्होंने अपनी रचनाओं के बारे में कहा, “मेरी रचनाएँ वे फूल हैं जो छाया में खिलते हैं।" परवर्ती लेखक उन्हें उच्च कोटि का उपन्यासकार मानते थे। आलोचकों का मानना है कि उनके प्रतीकों का अर्थ व्यापक है। वे कहते हैं कि हॉथोर्न की रचनाओं में क्रूर वास्तविकता और आदमी के सपने,आवेग,अभीप्सा परस्पर एक-दूसरे के विरोधी हैं, और ज्यादातर मामलों में, वास्तविकता की ही दूसरों पर विजय होती है। कुछ आलोचकों ने उनकी तुलना परवर्ती अनन्य उपन्यासकार हेमिंग्वे और काफ्का से की है। वे कॉनकॉर्ड के लेखक, दार्शनिक परिवार के मुख्य व्यक्ति थे।

लुइसा अल्कोट

लुइसा मे अल्कोट उपन्यास 'लिटिल वुमेन' की लेखिका हैं,जो कॉनकॉर्ड की निवासी थीं । उन्होंने कॉनकॉर्ड ऑर्चर्ड हाउस में यह उपन्यास लिखा था। जिस छोटे घर के पास वे बैठकर लिखती थी, वह घर अब तक अच्छी तरह से संरक्षित है। उन्होंने और उनकी बहनों ने बोस्टन के लुईसबर्ग में अपने जीवन काल का अधिकांश हिस्सा बिताया था। लुइसा की मृत्यु 6 मार्च, 1888 को हुई थी। कॉनकॉर्ड जाने से पहले मैंने बोस्टन में उनका तथा उनकी बहनों अन्ना और एलिजाबेथ के घरों को देखा था।

अल्कोट परिवार ने कॉनकॉर्ड के ऑर्चर्ड हाउस में अपने जीवन का दीर्घ काल व्यतीत किया था। उस घर में उनका लेखन टेबल ही नहीं,वरन उनके सेल्फ में संग्रहीत एवं हस्ताक्षरित किताबें अभी भी मौजूद हैं। मुख्यतः चार्ल्स डिकेंस, जॉर्ज इलियट, गोएटे और हॉथोर्न की पुस्तकें रखी हुई हैं। खिड़कियों के बाहर के दृश्य (जो 'लिटिल वुमेन' में कई जगह वर्णित हैं) बहुत सुंदर हैं। घर के सभी फर्नीचर भी अच्छी तरह से संरक्षित रखे गए हैं। मुझे नहीं पता था कि लुइसा अल्कॉट अमेरिकी युवा पाठकों में बहुत लोकप्रिय थी। जिस दिन मैं वहां गया था, उस दिन मैं उस घर के सामने लगी लंबी कतार से उनकी लोकप्रियता का अनुमान सहज लगाया जा सकता था। तीन गाइड थे, जो उस जमाने के कपड़े पहने हुए थे। ऑर्चर्ड हाउस जाने वाली सड़क पर ज्यादा यातायात नहीं था। दर्शकों के अलावा ज्यादा भीड़ नहीं थी। उनकी कब्र घर के नजदीक थी। घर से कब्र तक जाने का रास्ता बकाइन फूलों से लदा हुआ था, उन फूलों की खुशबू हवा में तैर रही थी।

अचानक मेरी उस जगह पर हमारे इस कोर्स के एक सहपाठी दोस्त से मुलाकात हो गई। जूलियन सोबिन, उद्योगपति तथा उनके साथ उनकी पत्नी, दो बेटियां और एक भतीजी से। जूलियन ने बताया कि उनकी बेटियां और भतीजी लुइसा के लेखन के पीछे पागल है। बाद में पता चला कि जूलियन और उनकी पत्नी के साथ वे कई बार लुइसा के घर आ चुकी हैं। वास्तव, में लुइसा की अमेरिकी युवा पीढ़ी में लोकप्रियता देखकर मैं अचंभित था। मेरी राय में, 'लिटिल वुमेन' उपन्यास पढ़ना सुखद है,इसमें चरित्र चित्रण भी सुंदर है।ऐसा कहा जाता है कि इस उपन्यास के कई पात्र लुइसा की बहनों और अन्य संबंधियों पर आधारित हैं। संक्षेप में, इसे एक स्वच्छ और आकर्षक रोमांटिक उपन्यास कहा जा सकता है।

लुइसा अपनी रचनाओं के लिए जितना लोकप्रिय थीं,उतनी ही अपने परिवार और जीवन के लिए। उनका चरित्र काफी जटिल था। उनके पिता आदर्शवादी और एक शुभचिंतक दार्शनिक थे, जो अपनी आय के प्रति पूरी तरह उदासीन थे। पिता, लंबे समय से बीमार चल रही मां, बहनें, भतीजे और भतीजी वाले बड़े परिवार को चलाने का दायित्व लुइसा के ऊपर था। इसलिए शायद अपने परिवार को चलाने हेतु पैसे कमाने के लिए उन्होंने कई साधारण उपन्यास और लघु कथाएं लिखी थीं। उनका लेखन समकालीन नैतिकता के प्रति बेहद उदासीन एवं विरोधाभासी था। छह त्तीस वर्ष की उम्र में उन्होंने जिस 'लिटिल वुमन' उपन्यास की रचना की थी,जो शीघ्र लोकप्रिय ही नहीं हुआ,बल्कि समीक्षकों द्वारा भी अत्यधिक सराही गई । उनके जीवनी लेखक के अनुसार कई बार प्रशंसकों से बचने के लिए वह अपना घर छोडकर बोस्टन चली जाती थी।

ऑर्चर्ड हाउस जाने से पूर्व आल्कोट परिवार का प्राचीन घर 'हिल साइड' लेक्सिंगटन रोड पर ऑर्चर्ड हाउस के निकट स्थित था। उन्होंने अपने इस घर को नाथनीएल हॉथोर्न को बेच दिया था और हॉथोर्न ने उस घर का नाम 'द वे साइड' में बदल दिया। हॉथोर्न, इमर्सन, थोरो, मार्गरेट फुलर और कुछ अन्य प्रसिद्ध लेखक अल्कोट परिवार से पड़ोसियों के रूप में सामाजिक और साहित्यिक स्तरों पर जुड़े हुए थे। उनकी एक सांस्कृतिक साहित्यिक गोष्ठी थी। अवश्य, थोरो कुछ समय बाद वाल्डेन पॉन्ड के नजदीक छोटे कुटीर में चले गए, वह तालाब और थोरो दोनों दुनिया भर में प्रसिद्ध हो गए। उनके आदर्श, सरल जीवन शैली और अकृत्रिम प्रकृति प्रेम ने कई बुद्धिमान लोगों को प्रभावित किया। यह सर्वविदित है कि महात्मा गांधी भी उनका तथा उनके आदर्शों का बहुत सम्मान करते थे।

‘हिलसाइड' घर में वे केवल तीन साल रहे। उस समय लुइसा केवल बारह साल की थी, मगर 'लिटिल वुमन' की मूल कथावस्तु उनके दिमाग में जन्म ले चुकी थी। उपन्यास की पात्र अपने परिवार से थी, उसकी बहन। लुईसा लेखिका बन गई।यह घर छोड़ने से पहले उनकी पहली पुस्तक 'फ्लॉवर फैबेल्स' प्रकाशित हुई थी। उनकी बहनों में एलिजाबेथ पियानोवादक बन गई और 'मे' चित्रकार। तीन बहनों ने एक साथ मिलकर ‘पिलग्रीम प्रोग्रेस’ में अभिनय किया था।

एलिज़ाबेथ की ऑर्चर्ड हाउस में मृत्यु हो गई। एलिज़ाबेथ के स्मारक भवन में उनके पिता ने दैनिक काम बाँट दिए थे, अपनी बेटियों को ऊपरी मंजिल में एक लटकते बोर्ड पर लिखित निर्देश देकर। यह निम्नानुसार था :

(1)सुबह 5.30 बजे - बिस्तर त्यागना, स्नान और ड्रेस अप होना

(2) सुबह 9.00 बजे - अध्ययन,

(3) दोपहर 2 बजे – सिलाई का काम

(4) शाम को 4 बजे – कोई भी काम,जो बताया जाए।

लुइसा के कमरे की दीवार पर लिली का एक सुंदर चित्र टंगा हुआ था। उसकी चित्रकार बहन ‘मे’ का उद्देश्य था, लुईसा बिस्तर से उठते ही उसे देखकर आनंद अनुभव करे। उस समय तक अमेरिकी सिविल युद्ध के दौरान नर्स का काम कर रही लुइसा आजीवन अपंग हो गई थी, किसी गलत चिकित्सा के कारण। उनका परिवार 1877 में थोरो से खरीदे हुए नजदीकी घर में चला गया। वर्तमान समय में दर्शकों को घर के अंदर जाने की अनुमति नहीं है, क्योंकि यह किसी का निजी आवास बन गया है। लेकिन ‘हिलसाइड' या 'ऑर्चर्ड हाउस' की तुलना में यह घर बहुत बड़ा और बहुत सुंदर है।

कॉनकॉर्ड रास्ते में पड़ने वाले इन सारे घरों को देखते हुए मैं अन्य पर्यटकों के साथ कुछ दूर चला गया। सड़क के अंत में आया-स्लीपी होलो सेमेटेरी। इसके अंदर देवदार पेड़ के विशाल वृत्त में स्थित है- आथर रिज। इमर्सन, हॉथोर्न, थोरो और अल्कॉट परिवार के सदस्यों की यहाँ समाधि बनी हुई है। ऐसा कहा जाता है कि वे सभी कॉनकॉर्ड शहर में अपने प्रिय मित्रों के बीच समाधि लेना चाहते थे। स्थानीय लोगों ने वहाँ देवदार पेड़ के साथ-साथ कई फूलों के पौधे लगाए हैं। कई पर्यटक इस जगह की यात्रा करते हैं। आज यह अमेरिका का अन्यतम तीर्थ-स्थल बन गया है।

16. हार्वर्ड से बहुदिगंत आनुष्ठानिक भ्रमण

सीफा पाठ्यक्रम की अन्यतम विशेषता सीफा द्वारा आयोजित अनेक आनुष्ठानिक भ्रमण थे, जिसका उद्देश्य संबंधित सरकारों, उनके वरिष्ठ अधिकारियों और अन्य संगठनों के साथ उच्च स्तरीय चर्चाओं का आयोजन करना था। इस कार्यक्रम के तहत हम निम्नलिखित स्थानों पर भ्रमण करने गए।

न्यू हैम्पशायर राज्य के शरद ऋतु में पतझड़ देखने के साथ-साथ हमने उस वर्ष के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार माइकल डकाकिस से मुलाक़ात की और हमने अमेरिका की चुनाव प्रक्रिया की प्रत्यक्ष जानकारी प्राप्त की। यह कार्यक्रम विश्वविद्यालय ने खुद आयोजित किया था। इसके अलावा, हमने औपचारिक निमंत्रण प्राप्त कर तीन देशों की विधिवत यात्रा की। सबसे पहले, हमने अमेरिकी सरकार के निमंत्रण पर वॉशिंगटन, मिनियापोलिस - सेंट पॉल, न्यू ऑरलियन्स, जैक्सन और ऑरेंज काउंटी का भ्रमण किया।

दूसरे, हम यूरोपीय संघ के निमंत्रण पर एक सप्ताह स्ट्रासबर्ग के केंद्रीय संसद में गए थे। हमने ब्रसेल्स में संघ के केंद्रीय सचिवालय का भी दौरा किया और वहां के अधिकारियों के साथ चर्चा की।

तीसरे, कनाड़ा सरकार के निमंत्रण पर बीस दिनों के लिए हमने कनाड़ा के छह प्रमुख शहरों (क्यूबेक, मॉन्ट्रियल, ओटावा, टोरंटो, कैलगरी और वैंकूवर) का दौरा किया। हमने ओटावा में स्थानीय संसद सदस्यों, बड़े महानगरीय निगमों के अधिकारियों और राज्य प्रशासन के अधिकारियों के साथ चर्चा की।

अंत में, हमने पंद्रह दिनों के लिए जापान, कोरिया और चीन सरकार के निमंत्रण पर उन देशों के कुछ शहरों का दौरा किया। निजी कारणों से मैं इस यात्रा में सरीक नहीं हो सका था।

ये सब हमारे हार्वर्ड पाठ्यक्रम का औपचारिक हिस्सा थे। इसलिए हमने इन स्थानों पर एक साथ यात्रा की है। यूनिवर्सिटी द्वारा आयोजित कार्यक्रम और अमेरिकी शहरों के यात्रा-वृतांत पर इस अध्याय में चर्चा की गई है। जबकि यूरोपीय समुदाय और कनाड़ा के यात्रा-वृतांत परवर्ती अध्याय में दिए गए है।

न्यू हैम्पशायर, चुनाव एवं पतझड़

सर्दी में कैंब्रिज, बोस्टन में बहुत ठंड पड़ती है।

सीधे कनाड़ा से उत्तरी हवा ठंड लेकर आती है। मैंने बोस्टन की हड्डी-कंपाने वाली ठंड बर्दाश्त की है। एस्किमो वेश में कॉनकॉर्ड एवेन्यू में अपने घर से सीफा तक थोड़ी दूरी पर चलना बहुत कष्टप्रद था। मुझे बर्फ पर बर्फीले जूते पहनकर चलने का भी अनुभव है। हार्वर्ड में सितंबर में शरद ऋतु की शुरुआत हो जाती है। शरद ऋतु में पेड़ों के रंग लाल, पीले, नारंगी और कई मिश्रित रंग हो जाते हैं–ऐसे शोभावन की सुंदरता जिसने नहीं देखी हो; वह उसकी कल्पना भी नहीं कर सकता है। हार्वर्ड आने से पहले मैंने भी ऐसा अनुभव नहीं किया था। मैंने शरद ऋतु में लेनिनग्राद के बाहरी इलाके वाले जंगलों में कुछ ऐसे पेड़ों को देखा था। बाद में मुझे पता चला कि उत्तरी अक्षांश में शरद ऋतु जल्दी आती है और जल्दी समाप्त हो जाती है।वहाँ सर्दी दीर्घ समय तक रहती है।

सीफा ने हमारे लिए हार्वर्ड के उत्तर में स्थित न्यू हैम्पशायर में शरद ऋतु के जंगलों की शोभा देखने की व्यवस्था की थी। हम सभी एक वातानुकूलित बस में वहाँ गए। अमेरिका में लगभग सभी सड़कें बहुत चौड़ी हैं, साधारण रास्तों से राजमार्ग, अंतरराज्यीय सड़कें, बेल्टवेज़ और टर्नपाइक मार्ग और भी चौड़े हैं। वहाँ वाहनों की रफ्तार 100 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक होती है। कम गति वाले वाहन सड़क के किनारे और सबसे तेज गति वाली गाड़ियाँ सड़क के मध्य में चलती हैं। इसलिए हम लगभग दो घंटों में ही न्यू हैम्पशायर पहुंच गए।वहाँ के दृश्य देखने के लिए पहले से व्यवस्था की गई थी। एक छोटी पहाड़ी, जो नीचे से लगाकर ऊपर तक पेड़ों से भरी हुई थी। और क्या वर्णविभा! क्या रंग-महोत्सव!! केवल भगवान ही ऐसे रंगों को संयोजित कर सकते हैं। कोई चित्रकार या आधुनिकतम वसन शिल्प-कारीगर भी इतने सारे रंगों और उनके मिश्रण के बारे में नहीं सोच सकते हैं।फिर पहाड़ी जैसे विस्तृत कैनवास पर मिश्रण का उपयोग करना प्राय: असंभव है !

न्यू हैम्पशायर के अधिकारियों द्वारा हमारे लिए व्यवस्था की गई थी। कुर्सियां रखी हुई थीं, चाय, कॉफी और स्नैक्स तैयार थे। मैं चाय पीते हुए उस शानदार दृश्य का आनंद लेने लगा। किसी ने मानो हृदय पर वह दृश्य अंकित कर दिया हो। जो अविस्मरणीय है, और रहेगा। सत्रह वर्ष के बाद अभी जब मैं उसके बारे में लिख रहा हूँ तो मेरे मानस पटल पर वह दृश्य उभर कर सामने आने लगता है। मैंने सुना है शरद का वर्णाढ्य आगमन दस-बारह दिन पहले हुआ है और यह पन्द्रह-बीस दिन तक रहेगा। बीस दिन के बाद पेड़ धीरे-धीरे अपने आभूषणों को जमीन पर गिरा देंगे। अलग चरण शुरू होगा। दु:ख से पेड़ पत्तियों को अलविदा कहेगा। लोहे के तारों की तरह डालियाँ, शाखा-प्रशाखाएं अप्रैल तक ऐसे ही खड़ी रहेगी बसंत के इंतजार में, वे जानते है कि शीत ऋतु को रंगों की सुंदरता पसंद नहीं है। मृत्यु तुल्य शीतल परिवेश केवल श्वेत बर्फ का स्वागत करती है। इसलिए उन्होंने रंगीन कपड़े त्याग कर विधवा वस्त्र धारण किया है।

देखते-देखते एक घंटा बीत गया। वापस जाने का समय आ गया। बाद में, मैंने हार्वर्ड की सर्दियों में पेड़ों का ध्यान-मग्न तपस्वी रूप देखा।

वहाँ से वे अधिकारी हमें डुकाकीस के मुख्य चुनाव कार्यालय में ले गए। न्यू हैम्पशायर शहर राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार माइकल डुकाकीस का अपना क्षेत्र था।वहाँ उनका बहुत प्रभाव था। चारों तरफ उनके पोस्टर, प्रचारपत्र, टेलीविज़न, समाचार पत्र, टेलीफोन, ईमेल, विज्ञापन आदि के माध्यम से चुनाव प्रचार पर लाखों रूपए खर्च किए गए थे। तब मुझे पता चला कि अमेरिकी चुनाव कितने महंगे होते हैं ! कितना अनाप-शनाप पैसा खर्च होता है! पार्टी बहुत पैसा खर्च करती है, दोस्तों,शुभचिंतकों, संगठनों आदि से बड़ी मात्रा में धन भी प्राप्त किया जाता है। डुकाकीस पार्टी के कार्यकर्ताओं ने हमें सब कुछ समझाया। अमेरिका के राष्ट्रपति का चुनाव प्रत्यक्ष वोट से होता है। पोपुलर वोट इलेक्टोराल कॉलेज वोट में बदल जाते है। प्रत्येक राज्य में ऐसे विशिष्ट संख्या में वोट होते हैं, जिनमें दो भाग होते हैं। एक कांग्रेस में सदस्यों की संख्या है,जो संबंधित राज्य की जनसंख्या द्वारा तय की जाती है। दूसरा, प्रत्येक राज्य सीनेट के दो सदस्यों का चुनाव करता है। राज्य का इलेक्टोरल कॉलेज बनाने के लिए दोनों को मिलाया जाता है। अमेरिका में कुल इलेक्टोरल कॉलेज के वोट 538 है, जिसका अर्थ है कि अगर किसी को 270 मत मिल जाए तो राष्ट्रपति के रूप में उनका चयन हो जाता है। उदाहरण के लिए, जॉर्ज बुश को 286 वोट मिले और 2004 के चुनावों में उनके प्रतिद्वंदी जॉन केरी को 252 वोट मिले। बुश रिपब्लिकन पार्टी (जिसका दूसरा नाम GOP या ग्रैंड ओल्ड पार्टी है) और कैरी डेमोक्रेट दल का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। एक राज्य में बहुमत प्राप्त करने वाले उम्मीदवार को राज्य के सभी इलेक्टोरल कॉलेज के वोट मिलते हैं। उदाहरण के लिए, कैलिफोर्निया में 55 मत हैं, टेक्सास में 34 वोट हैं और न्यूयॉर्क स्टेट में 31 वोट हैं (ये तीनों आबादी के दृष्टिकोण से पहले, दूसरे और तीसरे नंबर पर हैं)। केरी को कैलिफोर्निया और न्यूयॉर्क में अधिक पोपुलर वोट मिले, जबकि बुश को 2004 के चुनावों में टेक्सास में अधिक पोपुलर वोट मिले।

डुकाकीस पार्टी और निर्वाचन अधिकारियों ने अमेरिका की चुनाव प्रक्रिया, न्यू हैम्पशायर में उनकी संभावना, चुनाव प्रचार के विभिन्न पहलुओं और चुनाव के लिए धन जुटाने के तरीकों के बारे में विस्तार से बताया। ऐसे विशिष्ट संगठन हैं, जो कुछ उम्मीदवारों के लिए बड़ी मात्रा में अनुदान देते हैं। उदाहरण के लिए, अरबपति जॉर्ज सोरोस ने जॉन केरी के चुनाव निधि में 200 मिलियन डॉलर का योगदान दिया था। अधिकारियों ने हमें निजी टेलीविज़न और सार्वजनिक वाद-विवाद के प्रचार अभियान के बारे में बताया, जो कि प्रमुख उम्मीदवारों की प्रस्तावित नीतियों का बयान करती है। इसके बाद हमें विपक्षी उम्मीदवार के चुनाव कार्यालय ले जाया गया। विपक्षी शिविरों के लोगों ने हमें उनके दृष्टिकोण के बारे में बताया कि वे कैसे डुकाकियों से लड़ने जा रहे हैं। उन्होंने दो दृष्टिकोण समझाए, अर्थात् विदेश नीति और घरेलू नीति। मैं इस विषय पर ज्यादा नहीं कहना चाहता।

आखिरकार, डुकाकीस से हमारी मुलाक़ात हुई। उन्होंने अपने, अपने परिवार, अमेरिका के लिए उनके सपने और इन सपनों को साकार करने की उनकी योजनाओं के बारे में संक्षिप्त प्रकाश डाला। सीफा के निदेशक लेस ब्राउन ने पहले हमारा व्यक्तिगत परिचय करा दिया था। उन्होंने हमारे देशों की चुनाव प्रक्रियाओं के बारे में पूछा। उन्होंने हमारे सवालों का जवाब भी दिया। मैंने उनसे भारत के संबंध में उनकी पार्टी की नीति के बारे में पूछा था।

चाय-नाश्ता करने और एक ग्रुप फोटो लेने के बाद हम हार्वर्ड लौट आए। हमने सारे रास्ते अमेरिकी चुनावों पर चर्चा की। हमने लेस ब्राउन से पूछा कि उनके हिसाब से अमेरिका का राष्ट्रपति कौन होने जा रहा है। उन्होंने अपनी राय देने के साथ-साथ संभाव्य मत भी दिया। उन्होंने द्विपक्षीय चुनावों की विशिष्ट सुविधाओं के बारे में विस्तार से बताया। बाद में केनेडी स्कूल ऑफ गवर्नमेंट के राजनीति विज्ञान के विशारद और सीफा के चेयरमैन शमूएल हंटिंगटन ने हमें कई सैद्धांतिक पहलू समझाए। उसके बाद अमेरिकी सरकार के निमंत्रण पर हमने पांच अमेरिकी शहरों का दौरा किया।

वॉशिंगटन : अमेरिका की सर्वशक्तिमान राजधानी की विरासत और संस्कृति

हार्वर्ड विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर इंटरनेशनल एफेयर्स में एक वर्ष प्रशिक्षण पर आए फ़ेलो के लिए अमेरिका का विदेश विभाग वहाँ के कुछ शहरों का दौरा करने की व्यवस्था करता है। उस वर्ष दो सप्ताह यात्रा की योजना बनाई गई थी। यात्रा 9 जनवरी से शुरू हुई और 26 जनवरी को समाप्त। फेडरल कैपिटल वाशिंगटन हमारा पहला पड़ाव था। बाद में हम मिनेयापोलिस- सेंट पॉल, न्यू ऑरलियन्स, जैक्सन और कैलिफोर्निया के ऑरेंज काउंटी (उसी क्रम में) हार्वर्ड जाने से पहले गए। हम 9 जनवरी की दोपहर को बोस्टन से वॉशिंगटन गए थे। जब मैं हार्वर्ड से किसी दूसरे स्थान पर जाता था तो आम तौर पर मैं अपने अपार्टमेंट से हवाई अड्डे तक टैक्सी किराए पर ले लेता था। लेकिन उस दिन मुझे मेरे इस कोर्स के सहपाठी इतालवी मित्र रॉबर्टो टस्कानो और उनकी पत्नी अपने साथ हवाई अड्डे ले गए। श्रीमती टस्कानो ने कार से हम दोनों को हवाई अड्डे पर छोड़ दिया।

अध्येताओं में 12 लोग हार्वर्ड में सपत्निक रह रहे थे। उन सभी के पास अपनी गाड़िया थीं। पुरानी कारें अमेरिका में बहुत सस्ते में मिल जाती थीं। उनके पास गाड़ी होने के कारण वे लोग हार्वर्ड ,कैम्ब्रिज केंद्रस्थल से कुछ दूर रहते थे। नजदीक में दो अन्य प्रसिद्ध विश्वविद्यालय भी थे। एक था बोस्टन विश्वविद्यालय और दूसरा मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी)। इस क्षेत्र में घर का किराया बहुत अधिक था। उदाहरण के लिए, विश्वविद्यालय परिसर के निकट कॉनकॉर्ड एवेन्यू के जिस अपार्टमेंट में मैं रहता था, उसका मासिक किराया 900 डॉलर था। दक्षिण कोरिया के मेरे दोस्त यांग ली सोमरविल में मेरे घर से बड़े घर में रहते थे, जिसका मासिक किराया मात्र 1000 डॉलर था। हमारे सपत्निक मित्र हार्वर्ड में रहते समय हमें रात्रि-भोज पर आमंत्रित करते थे। ऐसे अवसरों पर मुझे कोरियाई, जापानी, इतालवी, जर्मन और स्वीडिश व्यंजनों का आनंद लेने का अवसर मिला। मेरी तरह नौ अकेले रहने वाले मित्र अपने दोस्तों और अध्यापकों को फ़ैकल्टी क्लब या किसी होटल में रात्रि-भोज के लिए आमंत्रित किया करते थे ।

सामान्य तौर पर अमेरिका की फ्लाइटें देरी से नहीं चलती है, लेकिन उस दिन बर्फबारी से मौसम खराब था।विमान उड़ने में कुछ देरी हुई। हम लगभग आठ बजे वाशिंगटन पहुंचे। वाशिंगटन से 22 मील दूर जर्मनटाउन में मेरी पत्नी के मामा की बेटी बुबु और दामाद रबू रहते थे। हार्वर्ड में अकेले रहने के कारण वे अक्सर टेलिफोन पर मेरे हालचाल पूछह ते रहते थे। जब उन्हें पता चला कि मैं वॉशिंगटन में आ रहा हूं, तो उन्होंने आग्रह किया कि मैं उनके साथ रहूँ, न कि किसी होटल में। मेरे आगमन का समय उन्हें मालूम था,इसलिए मेरे होटल पहुँचने से आधे घंटे पहले ही रबू वहाँ पहुंच गया था। होटल से जर्मनटाउन में उनके घर तक जाने के लिए गाड़ी में एक घंटा लगता था। बुबु खाना बनाकर घर में हमारा इंतजार कर रही थी। उनकी छह ह साल की बेटी भी जाग रही थी। उस समय बर्फबारी की वजह से हर जगह सफेद नजर आ रही थी। खाना खाने के बाद हम गपशप करने लगे, क्योंकि हम एक लंबे अंतराल के बाद एक दूसरे से मिल रहे थे। अगला दिन रविवार था और रबू की छुट्टी थी। वे वॉशिंगटन की बड़ी कंपनी आईबीएम में काम करते थे।हर दिन अपने घर से आना-जाना करते थे। उस दिन हमारा भी कोई प्रोग्राम नहीं था। स्वेच्छा से हम कहीं भी जा सकते थे।

हिमपात वाली उस सुबह चाय-नाश्ते के बाद छोटी लड़की शिबानी मेरी मार्गदर्शिका बनकर मुझे छोटे से तालाब के पास ले गई, वहाँ तैरते 4-5 बतखों को दिखाने के लिए। रात में भारी हिमपात हुआ था। हमने अवसर के अनुरूप एस्किमो कपड़े पहन रखे थे। तालाब के कुछ किनारे बर्फ से जम गए थे। फिर भी बतख़ें खुशी से तैर रही थीं।यह जाहिर था कि शिवानी उनकी पुरानी दोस्त थी। वह उनके लिए कुछ खाना ले जाती थी और उन्हें खुशी से खिलाती थी।

रबू की योजना के अनुसार 12 बजे हम बाल्टीमोर के लिए रवाना हुए। वहाँ हम दोनों को श्री रवि पटनायक ने मध्याह्न भोजन के लिए आमंत्रित किया था। उस दिन रवि बाबू ने कई ओड़िया मित्रों को भी खाने पर बुलाया था। श्री सर्वेश्वर आचार्य उनमें से एक थे। वे कटक के रेवेन्शा कॉलेज के रसायन विज्ञान के पूर्व छात्र थे। श्री शरत मिश्रा(आई.पी.एस.) भी वहाँ थे,जो कभी भारतीय दूतावास में पहले काम करते थे। उनकी बेटी न्यूयॉर्क स्टेट यूनिवर्सिटी में अध्ययन कर रही थी। श्री नलिनी पंडा,कुछ समय पहले यहाँ आए थे। उनके बेटे-बेटी की पढ़ाई मैरीलैंड में हुई थी। मैं मेरे एक और मित्र श्री योगेश पति से मिलने के लिए उत्सुक था, जिनका भौतिक विज्ञानी में बहुत नाम था। योगेश बाबू रेवेन्शा कॉलेज में मेरे दो साल सीनियर थे। हम दोनों रेवेन्शा के पूर्व छात्रावास में रहते थे,पास-पास अलग-अलग रूम में। उनकी अध्ययन की नियमितता और प्रगाढ़ अनुराग मुझे प्रभावित करता था। उन्होंने पढ़ाई में मेरी बहुत मदद की थी। प्रत्येक दिन निर्धारित समय पर छात्रावास में बत्ती बुझा दी जाती थी। उन दिनों जोगेश बाबू खड़ाऊँ पहनते थे। बत्ती बुझते ही खड़ाऊँ की खट-खट करते हुए वह बाथरूम में जाते थे। वह आवाज मुझे याद आने लगी। मगर योगेश बाबू अपनी पत्नी के साथ भारत चले गए थे। इसलिए उनसे मुलाक़ात नहीं हो सकी।बंधु-मिलन और आतिथ्य ग्रहण करने के बाद हम शाम को जर्मनटाउन लौट आए।

उसके दूसरे दिन हम सुबह सात बजे वाशिंगटन के लिए रवाना हुए। पहले दिन से बहुत अधिक समय लगा था- लगभग दो घंटे। क्योंकि जर्मनटाउन में रहने वाले बहुत सारे लोग वॉशिंगटन में काम करते थे और हाइवे पर काफी ट्रेफिक था। मुझे होटल में छोड़कर रबू अपने ऑफिस चले गए।

वाशिंगटन पृथ्वी पर सबसे अमीर और सबसे शक्तिशाली राष्ट्र अमेरिका की राजधानी है। अमेरिकी संसद, राष्ट्रपति-कार्यालय, सभी प्रशासनिक प्रभाग और सुप्रीम कोर्ट यहां स्थित हैं। सभी सरकारी नीतियां यहां बनती हैं और यह सभी राजनीतिक और आर्थिक गतिविधियों की केंद्र-स्थली है। राष्ट्रीय जीवन में अहम भूमिका अदा करने के कारण वाशिंगटन अमेरिका का सबसे महत्वपूर्ण शहर है, भले ही,यह न्यूयॉर्क, शिकागो और लॉस एंजिल्स जैसी अन्य शहरों की तुलना में बहुत छोटा है।

वाशिंगटन केवल सत्ता, शक्ति, प्रशासन, सरकारी संप्रभुता और वित्तीय मसलों का ही केन्द्र नहीं है, वरन यह अमेरिका का प्रमुख सांस्कृतिक केंद्र भी है। स्मिथसोनियन संग्रहालय और यहां की गैलरी दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं। यह अमेरिका के सिनेमाघरों, ओपेरा, पेंटिंग, गायन और नृत्य का भी केंद्र-स्थल है। उदाहरण के लिए, जॉन एफ कैनेडी सेंटर में तीन थियेटरों और दो ओपेरा शो में साल भर विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते है। दुनिया के कई देशों के बैले नृत्य नियमित रूप से वॉशिंगटन में किए जाते हैं। स्मिथसोनियन संगठन द्वारा अमेरिका के लोक कला और लोक नृत्य पर शोध की व्यापक व्यवस्था की गई है। नतीजतन अमेरिकी-भारतीय नृत्य और संगीत पर कई फिल्में, डीवीडी और सीडी बनाई जाती है।इस तरह वाशिंगटन, शक्ति, प्रशासन और संस्कृति के क्षेत्र में अमेरिका के जन-जीवन में एक विशेष स्थान रखता है।

हमारी यात्रा के पहले दिन पहली बैठक स्टेट डिपार्टमेन्ट में आयोजित की गई थी। अमेरिका का स्टेट डिपार्टमेन्ट उनका विदेश मंत्रालय है। स्टेट सचिव उनके विदेश मंत्री होते हैं। स्टेट डिपार्टमेन्ट एक बड़ा संगठन है।दुनिया के हर दूसरे देश के संबंध में अमेरिका जैसे एक शक्तिशाली राष्ट्र की विदेश नीति यहां पर निर्धारित की जाती है। स्टेट डिपार्टमेन्ट के कई उप-विभाजन हैं, अर्थात् नाटो, यूरोपीय संघ, दक्षिण पूर्व एशिया, मध्य पूर्व, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका। स्टेट डिपार्टमेन्ट का दो अन्य संगठनों के साथ घनिष्ठ संबंध है, जैसे रक्षा और आंतरिक सुरक्षा।

हमने स्टेट के उप सचिव से मुलाकात की और स्टेट डिपार्टमेन्ट में हमारे साथ कई मुद्दों पर चर्चा हुई। विदेशी सीनेट समिति के एक सीनेटर और दक्षिण पूर्व एशिया और नाटो की देखभाल करने वाले दो वरिष्ठ अधिकारी उनके साथ थे। उन्होंने हमें स्टेट डिपार्टमेन्ट के काम-काज, उसके अतीत और वर्तमान, युद्ध और शांति के समय में रक्षा और आंतरिक सुरक्षा विभागों के साथ घनिष्ठ संबंध के बारे में समझाया। हमारी चर्चा शुरु होने से यूनाइटेड स्टेट इन्टरनेशनल एफेयर्स (यूएसआईए) द्वारा एक शानदार दावत का आयोजन किया गया था।

स्टेट डिपार्टमेन्ट से हम दुनिया का सबसे बड़े पुस्तकालय देखने गए। अमेरिका के लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस में दुनिया के सभी देशों की,सभी भाषाओं में और सभी विषय पर पुस्तकें उपलब्ध हैं। इसके अतिरिक्त, विभिन्न विषयों पर विभिन्न देशों की कई पत्रिकाएं भी वहाँ हैं। विश्वविद्यालय पुस्तकालयों के हिसाब से हार्वर्ड विश्वविद्यालय की वाइडनर लाइब्रेरी विश्व में सबसे बड़ी है, लेकिन लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस में पुस्तकों का सबसे बड़ा संग्रह है। लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस में 11 हजार करोड़ वस्तुओं को संरक्षित किया गया है, जिसमें मुद्रित किताबें, पांडुलिपियां, प्राचीन फोटोग्राफ, शास्त्रीय संगीत की मूल शीट आदि शामिल हैं।

हमने लाइब्रेरी में चारों ओर घूमते समय थॉमस जेफरसन की निजी पुस्तकें,नोटबुक और निखुण भाव से रखी हुई अनेक प्राचीन बाइबल देखी। इसके अलावा, कंप्यूटर डिजिटल मशीनों के माध्यम से भी कई दस्तावेजों को संरक्षित किया गया है। विभिन्न देशों के प्रमुख लोगों के रचना-पाठ पर लाइब्रेरी ने सीडी और वीसीडी तैयार की है,जिसे एक अलग कमरे में सुरक्षित रखा गया है। कुछ साल पहले, उन्होंने पूर्व एशियाई लेखकों की रचनाओं पर सीडी तैयार की थी। नई दिल्ली में यू.एस.आई.ए.के कार्यालय ने भारतीय लेखकों की ऐसी सीडी और वीसीडी तैयार की थी। इस संग्रह में मेरी भी ग्यारह कविताएं संकलित हैं । हार्वर्ड आने से पहले मुझे पता चला था कि नई दिल्ली का यह कार्यालय हर भारतीय भाषाओं की किताबें एकत्रित कर ‘लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस’ में भेज रहा है। मेरी पत्नी के चचेरे भाई श्री नागेंद्र नाथ मोहंती नई दिल्ली में इस संगठन में काम करते थे। इस लाइब्रेरी में प्राचीन, मध्ययुगीन और आधुनिक ओड़िया साहित्य, ओड़िया इतिहास, महिमा-धर्म, जगन्नाथ संस्कृति आदि कई किताबें देखकर मुझे बहुत खुशी हुई। मेरा मानना है कि ‘लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस’ दुनिया का सबसे बड़ा सांस्कृतिक संगठन है, जो अमेरिका के लिए गर्व और गौरव है। यह बहुमंजिला पुस्तकालय वाशिंगटन के स्मिथसोनियन, व्हाइट हाउस, यूनियन स्टेशन, वाशिंगटन स्मारक और लिंकन मेमोरियल की तरह मील का एक पत्थर है। हम लाइब्रेरी का केवल छोटा-हिस्सा घूम पाए थे। मुख्य लाइब्रेरियन ने कुछ अधिकारियों के साथ हमें उनके कॉन्फ्रेंस हॉल में पुस्तकालय के संक्षिप्त इतिहास, पुस्तकों के संग्रह और वर्तमान स्थिति के बारे में जानकारी दी थी।

‘लाइब्रेरी ऑफ कॉंग्रेस’ ने हमारे लिए दोपहर के भोजन की व्यवस्था की थी। भोजन करने के बाद हम वाशिंगटन के प्रसिद्ध रेलवे स्टेशन देखने गए,जिसका नाम था यूनियन स्टेशन।यह रेलवे स्टेशन वांशिगटन का ही नहीं, अमेरिका का ही नहीं, वरन वास्तुशिल्प कला की दृष्टि से यह दुनिया का अनुपम और वृहत रेलवे स्टेशन है। यह पारंपरिक रेलवे स्टेशन नहीं है, जब तक आप इसे देखेंगे नहीं, तब तक इसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती है।केवल रेलवे स्टेशन कहना इस अनुष्ठान के प्रति अन्याय और सौजन्यता का अभाव माना जाएगा। यूनियन स्टेशन के सामने एक अर्ध-वृत्ताकार जगह है। जहां प्रतिदिन लाखों की संख्या में कारें आती है, जिनकी पार्किंग के लिए समुचित व्यवस्था उपलब्ध है। स्क्वायर के सामने रास्ते के बाहर की ओर देश-विदेश के कई झंडे लगे हुए हैं और स्क्वायर के अंदर फव्वारें और खूबसूरत मूर्तियाँ स्थापित की हुई हैं। इन सब को पार कर जब आप अंदर प्रवेश करेंगे तो आपको लगेगा कि आप किसी सुंदर संग्रहालय में प्रवेश कर रहे हैं। रेलवे पटरियां प्रवेश द्वार से बहुत दूर हैं। इस विशाल हाल के भीतर कई खुले रेस्तरां, पुस्तक और कलात्मक वस्तुओं की दुकानें इस जगह को मॉल और संग्रहालय के मिश्रित रूप को प्रदर्शित करती हैं। इसलिए विदेशी पर्यटक वॉशिंगटन की इस जगह को अवश्य देखते है। मुझे हार्वर्ड के दोस्तों और गाइड के साथ यह जगह बहुत अच्छी लगी। बहुत पहले मैंने इसे 1973 में देखा था। इस हॉल में बैठकर विश्वास करना मुश्किल है कि कितनी सारी ट्रेनें हर दिन यहाँ आती हैं! कहने की जरूरत नहीं है कि अमेरिका जैसे बड़े देश की राजधानी का रेलवे स्टेशन होने के कारण यहाँ हर रोज आने वाले यात्रियों की संख्या बहुत अधिक है। बेशक, समय के साथ हवाई यात्रा करने वाले लोगों की संख्या में काफी वृद्धि हुई है। अमेरिका में जनसाधारण सम्पन्न होने के कारण ट्रेन से यात्रा करना अक्सर पसंद नहीं करते हैं। हमारे गाइड ने कहा, "कुछ ऐसे लोग हैं जिनके पास समय ही समय है और जो एक बंद कोठरी से कहीं जाना पसंद नहीं करते हैं। जिन्हें दोनों तरफ तरह-तरह के दृश्यों को देखना अच्छा लगता हैं। ऐसे लोग रेल यात्रा का आनंद उठाते हैं। जब यह पहली बार 1908 में बनाया गया था तब यह दुनिया का सबसे बड़ा रेलवे स्टेशन था। अब भी यह दुनिया के सबसे बड़े रेलवे स्टेशनों में से एक है। लगभग दो करोड़ तीस लाख लोग हर साल इसे देखने आते हैं।”

हमारी अगली सुबह पेंटागन में बीती। पेंटागन अमेरिका के रक्षा विभाग और आंतरिक सुरक्षा का प्राण-केंद्र है। इस विशाल पांच मंजिला इमारत में तकरीबन 20 हजार लोग काम करते हैं। जब पोटॉमैक नदी जम जाती है, यह स्थान बहुत महत्त्वपूर्ण हो जाता है। उस नदी के पुल को पार कर फेयरफैक्स की ओर जाने से पेंटागन आता है। पेंटागन रक्षा-विभाग का मुख्य कार्यालय है। यह विदेश विभाग और आंतरिक सुरक्षा विभाग के साथ लगातार संपर्क बनाए रखता है और नीति-निर्धारण एवं रोज़मर्रा के कार्यों के बारे में उनकी सलाह लेता है। इस दृष्टि से पेंटागन अमेरिका के शिल्प और पूंजीवादी सभ्यता का सबसे शक्तिशाली विभाग है। आधुनिक हथियारों के निर्माण के क्षेत्र में उन्नत अनुसंधान के लिए पेंटागन का अपना वैज्ञानिक संगठन है। इसके अलावा, पेंटागन प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों जैसे हार्वर्ड और एम.आई.टी. को अनुदान भी प्रदान करता है। पेंटागन का मुख्य उद्देश्य सर्वोत्तम युद्ध उपकरण निर्माण करना है। अमेरिका की सर्वोत्तम रक्षा ही पेंटागन का लक्ष्य है। थल सेना, वायु सेना और नौसेना के लिए सर्वोत्कृष्ट उपकरण पेंटागन के प्रत्यक्ष पर्यवेक्षण में तैयार किए जाते है। इसके अलावा, दूसरे देशों को अमेरिका द्वारा बेचे जाने वाले हथियारों पर भी यह निगरानी रखता है।

पेंटागन में हमारे लिए एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया था, जिसमें रक्षा मंत्रालय, विदेश विभाग और आंतरिक सुरक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने हमें उनके कामकाज की सविस्तार जानकारी प्रदान की।सवाल-जवाब सत्र के माध्यम से भी हमें बहुत-सी जानकारी प्राप्त हुई। उन्होंने संगोष्ठी के बाद हमारे लिए दोपहर के भोजन की व्यवस्था की ।

बहु-मंजिला अमेरिकी संसद वास्तुशिल्प दृष्टिकोण से काफी उल्लेखनीय है और वाशिंगटन दृश्यदिगंत का प्रमुख दृश्य है। इस गोलाकर अट्टालिका को ‘कैपिटल’ कहा जाता है। संघीय कानून बनाने के लिए हमारे संसद की तरह यहाँ अमेरिका के हाऊस ऑफ कॉंग्रेस और सीनेट दोनों यहां स्थित हैं। शक्तिशाली सीनेट की सभी समितियों की बैठकों का आयोजन इस भवन के अंदर किया जाता है। अमेरिकी राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के कार्यालय भी इसके अंदर हैं। अन्य देशों के बड़े-बड़े नेतागण अमेरिका के दौरे पर आते हैं,वे यहाँ कांग्रेस एवं सीनेट के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हैं।

जॉर्ज वाशिंगटन ने 1793 में कैपिटल भवन की आधारशिला रखी थी। जहां कैपिटल का निर्माण किया गया है,उस जगह को ‘कैपिटल हिल’ के नाम से जाना जाता है। इसका निर्माण 1793 में शुरू होकर 1830 में समाप्त हुआ था। मगर बाद में कुछ परिवर्तन भी हुए हैं। अमेरिका के तीसरे राष्ट्रपति थॉमस जेफरसन का स्मारक इसके आस-पास है। संगमरमर से बने इस स्मारक में छह ब्बीस गोलाकार खंभे हैं। ऐसा माना जाता है कि रोम के पैन्थियॉन की वास्तुकला ने जेफरसन को विशेष रूप से प्रभावित किया था। उन्होंने वर्जीनिया विश्वविद्यालय की स्थापना में इस वास्तुकला को अपनाया। अंत में, ऐसे छह ब्बीस गोलाकार खंभे उनके स्मारक में लगाए गए थे।

अमेरिकी राष्ट्रपति मुख्यतः व्हाइट हाउस से अपना कार्य निष्पादित करते हैं। मगर यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि कैपिटल अमेरिकी जीवन, समाज और अर्थव्यवस्था का प्राण-केंद्र है। इसके अलावा, यूनियन स्टेशन के नजदीक अमेरिका का सुप्रीम कोर्ट, व्हाइट हाउस, वाशिंगटन स्मारक और लिंकन मेमोरियल- सभी एक सीधी रेखा पर स्थित हैं। उनके दोनों तरफ वाशिंगटन की दो प्रमुख सड़कें,इंडिपेंडेंस एवेन्यू और कान्स्टीट्यूशन एवेन्यू हैं। कैपिटल के अंदर ले जाकर गाइड ने हमें इसके बारे में साधारण जानकारी दी। अवश्य, हमें वाशिंगटन की सारी दर्शनीय संस्थानों की अच्छी-ख़ासी जानकारी थी। हम कैपिटल से व्हाईट हाउस में आए। वाशिंगटन में व्हाइट हाउस सबसे महत्वपूर्ण स्थान है। 16 वीं, एवेन्यू, पेनसिल्वेनिया कहना ही पर्याप्त है।यह दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के सबसे क्षमता-सम्पन्न प्रशासनिक प्रमुख का निवास-स्थान है। जॉर्ज वॉशिंगटन को छोड़कर, उन्नीसवीं शताब्दी की शुरुआत से अमेरिका के सभी राष्ट्रपति वहां रहे हैं। व्हाइट हाउस वास्तव में सफेद,मगर बहुत ऊंचा घर नहीं है। इसके अंदर हॉल का नाम अलग-अलग है, लेकिन ओवल ऑफिस उन सभी में सबसे महत्वपूर्ण है। अमेरिकी राष्ट्रपति युद्ध और शांति के दौरान, अमेरिका के आपातकाल तथा स्मरणीय घटनाओं के घटित होते समय इस कार्यालय में अपने मुख्य सलाहकार और सीनियर वरिष्ठ अधिकारियों से मिलकर विचार-विमर्श करते हैं। व्हाइट हाउस सन 1800 के बाद से अमेरिकी राष्ट्रपतियों का आधिकारिक निवास-स्थान है। उस साल अमेरिका की राजधानी फिलाडेल्फिया से वॉशिंगटन में स्थानांतरित हुई। राष्ट्रपति जॉर्ज वॉशिंगटन ने व्हाइट हाउस के इस स्थान का चयन किया था। हमें ओवल ऑफिस ले जाने के लिए विशेष व्यवस्था की गई थी। जन साधारण के लिए व्हाइट हाउस के पांच कमरें खुले रखे जाते हैं। इनमें राष्ट्रीय डाइनिंग हाल, ब्लू रूम, ग्रीन रूम, रेड रूम और ईस्ट रूम शामिल हैं। ग्रीन रूम ड्राइंग रूम के प्रयोजन में आता है। उच्च स्तरीय राष्ट्र अतिथियों का स्वागत ब्लू रुम में किया जाता है। पूर्व राष्ट्रपति की तस्वीरें रेड रूम की दीवारों पर देखी जा सकती हैं। ईस्ट रूम में कंसर्ट,संगीत सभा, बॉल डांस आदि का आयोजन किया जाता है।

जॉन एडम्स से लेकर सभी राष्ट्रपति यहाँ रहे हैं। जब अंग्रेजों ने सन 1814 में क्रोध से व्हाइट हाउस में आग लगा दी थी,तब राष्ट्रपति मैडिसन अपना कार्यालय दूसरी जगह ले गए थे।

शाम को होटल लौटकर हम केनेडी सेंटर एचएमएस पिनार्फ ऑपेरा देखने गए। यूएसआईए ने हम सभी के टिकट खरीद लिए थे। यूएसआईए के दो अधिकारी भी हमारे साथ थे। ऑपेरा शुरू होने से पहले हमने केनेडी सेंटर के चारों तरफ घूमकर थोड़ी-बहुत जानकारी अर्जित कर ली थी। कॉन्सर्ट हॉल और ओपेरा हाउस के अलावा केनेडी सेंटर में तीन अन्य थिएटर थे। सेंटर की वास्तुकला बहुत आकर्षक थी। मेरे हिसाब से यह अमेरिका में थिएटर, ओपेरा और कॉन्सर्ट की सबसे सुंदर संरचना होगी। जॉन कैनेडी की स्मृति में बनाया गया यह सेंटर पोटॉमैक नदी से बहुत दूर नहीं है और वॉशिंगटन के पार्श्व में है। यहाँ से एक रास्ता मैरीलैंड और वर्जीनिया की तरफ गया है, दूसरा घुमावदार रास्ता वाशिंगटन के प्रसिद्ध जॉर्जटाउन की तरफ जाता है। जॉर्जटाउन विश्वविद्यालय बहुत प्रसिद्ध है। लगभग 104 एकड़ के परिसर में छोटी-बड़ी साठ इमारतें हैं, इसके रोल में 2,500 छात्र हैं। यह अमेरिका के सबसे पुराने कॉलेजों में से एक है। यह सन 1788 में केवल बारह विद्यार्थियों को लेकर खोला गया था।

शनिवार और रविवार हमारी छुट्टियां थीं। मेरे दो दोस्त (एक कनाड़ा से और दूसरा इटली से) और मैं नियाग्रा की यात्रा पर गए। पहले दिन हम कार से बफ़ेलो सिटी तक गए, उसके अगले दिन नियाग्रा में हमने आधा दिन बिताया और शाम को वाशिंगटन लौट आए। बेशक, हमें वहाँ थोड़ा समय मिला। फिर भी मुझे पछह तावा नहीं था क्योंकि यह मेरी नियाग्रा की दूसरी यात्रा थी। मेरे कैनेडियन मित्र भी इस वजह से परेशान नहीं थे। हमारे इतालवी मित्र निश्चित रूप से कुछ और समय बिताना चाहते थे। लेकिन समय पर वाशिंगटन पहुंचने के लिए हमें लौटना पड़ा। वापसी यात्रा से पहले, हम दोपहर का भोजन ले चुके थे। सप्ताह का अंतिम दिन होने के कारण दर्शकगण बड़ी संख्या में वहां आए हुए थे। कनाड़ा की तरफ कम रेस्तरां थे,जबकि बफ़ेलो की तरफ बहुत सारे रेस्तरां थे। फिर भी वहाँ हर जगह भीड़ थी। हमें दोपहर के भोजन के लिए करीब पंद्रह से बीस मिनट इंतजार करना पड़ा। अधिक दूर पैदल चलने और नौकायन के कारण उस समय हमें बहुत भूख लगी थी। सौभाग्य से हमें खाने के लिए अच्छा भोजन मिला। मेरे हिसाब से उस दिन वहाँ लगभग दस से बारह हजार दर्शक रहे होंगे।

दर्शक नदी तक नीचे उतरने के लिए लिफ्ट अथवा दूसरे साधनों से जा सकते हैं। दर्शकों के बैठने के लिए बड़ी संख्या में बैंच बने हुए है।प्रपात से नदी के स्रोत की विपरीत दिशा में दूर तक जाने के लिए एक सुंदर पैदल रास्ता भी बन रहा है। अधिकांश दर्शकों के हाथों में कैमरे, हैंडीकैम, तस्वीर और ध्वनि दोनों रिकॉर्ड करने के इन्स्ट्रुमेंट थे। नियाग्रा पर बने वृत्तचित्रों में मेरा मानना है कि 'इमिक्स फिल्म' सबसे ज्यादा उत्कृष्ट है। वहां लगभग सौ से डेढ़ सौ जापानी पर्यटक प्रतिदिन आते थे। उनके हाथों में विभिन्न प्रकार के कैमरे होते थे। मैंने विभिन्न जगहों पर जापानी पर्यटकों को देखा है और मेरा विश्वास है कि दुनिया में शायद ही ऐसा कोई राष्ट्र होगा,जिसे इतनी ज्यादा फोटोग्राफी पसंद है। वे शायद दुनिया के सर्वश्रेष्ठ फोटोग्राफर भी हैं।

अनेक युग पहले नियाग्रा का रूप देखकर, ध्वनि सुनकर, अमेरिका के मूल निवासियों ने इसे 'थंडर ऑफ द वाटर्स' की संज्ञा दी है। 167 फीट की ऊंचाई से गिरती जलराशि वाष्प बनकर आकाश में बादलों की तरह उड़ती हुई नजर आती है। नियाग्रा में प्रति मिनट 35 मिलियन गैलन पानी गिरता है।

मैंने कनाड़ा के टोरंटो से पहले नियाग्रा देखा था। इस बार मैंने इसे अमेरिका के बफेलो शहर की तरफ से देखा। नियाग्रा प्रपात तीन भागों में विभाजित किया गया है:अश्वखुर अर्थात् घोड़े के खुर के आकार का बड़ा हिस्सा (लगभग 90 प्रतिशत) कनाड़ा में है। शेष अमेरिका में है। मध्य में एक बहुत ही संकीर्ण पट्टी आती है, जिसे 'ब्राइडल वेल' अर्थात् कन्या का घूँघट कहा जाता है। नियाग्रा प्रपात नदी में गिरने से पहले दो भागों में बंट जाता है। बीच में एक छोटा द्वीप है,जिसे गोट आइलैंड अर्थात् ‘बकरी द्वीप’ कहा जाता है। हम तीनों दोस्त (हम अपने आपको ‘द थ्री मस्केटीयर’ कहते थे) एक ही पल में रॉक हाउस प्लाजा एलेवेटर द्वारा 125 फीट नीचे चले गए और जल-स्तर तक पहुंच गए। अधिकारियों ने हम प्रत्येक को एक-एक रेनकोट दिया था। लिफ्ट से उतरने के बाद जल-वाष्प ने हमें गीला कर दिया। ऊपर से भयंकर गर्जन के साथ गिरने वाला पानी हमें कुछ डरा रहा था। फिर भी यह दृश्यावली देखने में आनंद आ रहा था। कनाड़ा और अमेरिका के दोनों तरफ ऐसी लिफ्टों की व्यवस्था है। इसके बाद हम एक स्टीम बोट में बैठे जिसका नाम था 'द मैड ऑफ़ द मिस्ट' । उससे हम वहाँ तक गए, जहां पानी गिर रहा था। मैंने पहले ‘इमिक्स फिल्म’ में नियाग्रा को देखा था। इस फिल्म की कहानी में मिथक, चमत्कार और जादू दिखाया गया है। मिथक इस प्रकार है : बहुत समय पहले, एक अमेरिकन इंडियन गाँव (जो नियाग्रा प्रपात से दूर नहीं था) की सुंदर युवती लेलावाला की एक बूढ़े से शादी करवा दी गई। उस लड़की को उस आदमी से बिलकुल प्यार नहीं था। वह किसी और से प्यार करती थी। दु: खी, पीड़ित और असहाय लड़की ने रात में नियाग्रा में कूदकर आत्महत्या कर ली। वह बन गई 'द मैड ऑफ़ द मिस्ट' अर्थात् कोहरे की कन्या। इस प्रकार यह परिचित मिथक बन गया। अमेरिकन इंडियन मिथक में यह कहा जाता है कि जलप्रपात के कोहरे के अंदर उस लड़की का रूप दिखाई देता है। उसकी आवाज़ जल की गर्जन में सुनाई देती है। कई सत्य घटनाएं समय के साथ मिथकों में बदल जाती हैं। फिल्म में कुछ अन्य घटनाओं का भी वर्णन है। ऐनी टेलर, एक शिक्षिका ने 1901 में लकड़ी का एक बड़ा बैरल बनाया और उसके अंदर उसने अपनी प्रिय बिल्ली के साथ प्रवेश किया और अपने दोस्तों से कहा कि वे इसे नियाग्रा में डाल दे। बैरल 167 फीट की ऊँचाई से नीचे गिरा और नदी के किनारे पहुंचने तक पानी पर तैरता रहा। श्रीमती ऐनी और उनकी बिल्ली सकुशल जीवित थी,जब उन्हें बैरल से बाहर निकाला गया। उन्नीसवीं शताब्दी में एक और दुस्साहसी व्यक्ति ने बांस पकड़कर रस्सी पर चलकर नियाग्रा प्रपात पार किया था। इस दृश्य को देखने वाले सैकड़ों दर्शकों ने उसकी सुरक्षा के लिए भगवान से प्रार्थना की थी। दोनों श्रीमती ऐनी और ब्लोंडिन बच गए थे, मगर कई लोग नियाग्रा में अपनी जान गंवा चुके हैं। मुझे ये सब याद आने लगा, जब मैं ‘द मेड ऑफ द मिस्ट’ बोट और स्पैनिश एयरो-कार से गर्जन वाली जगह पर पहुंचा। मेरे जैसा डरपोक आदमी मेरे दो निडर मित्रों के बलबूते के बिना यह यात्रा नहीं कर सकता था।

नियाग्रा प्रपात से पानी का उद्दाम स्तंभ सीधे बहुत ऊंचाई से नीचे गिरता है। क्या पानी में तैरती हुई मछह लियाँ नीचे गिर जाएगी? आम तौर पर, मछह ली अपने सुलभ ज्ञान के कारण प्रपात तक पहुँचने से पहले खतरे को भाँप लेती हैं। इसलिए वे प्रपात के विपरीत दिशा में तैरते हुए वापस चली जाती हैं। मगर जैसे कि हर जगह कुछ बेवकूफ लोग होते हैं,वैसे ही कुछ बेवकूफ मछह लियां भी होती हैं।वे बेवकूफ मछह लियां खुद की तरफ ध्यान दिए बगैर विपरीत दिशा में लौट नहीं पाती हैं।झरने के प्रखर वेग से कुछ मछह लियां नीचे गिर जाती हैं।

एक विद्वान व्यक्ति ने इस विषय पर शोध किया था, उसका कहना है कि मछह ली गिरते ही तुरंत नहीं मरती।लेकिन उनमें से ज्यादातर थोड़ी देर के लिए बेहोश हो जाती हैं और पानी की सतह पर असहाय रूप से तैरने लगती हैं। उस समय नीचे उड़ने वाले सारसों का आसानी से भोजन बन जाती हैं।

इस शोधकर्ता के पास कुछ रोचक जानकारी भी है। कुछ वर्ष पहले प्रपात के निम्नतम स्तर पर बने पैदल मार्ग पर एक पर्यटक चल रहा था। एक बड़ी मछह ली ऊंचाई से गिरी और पानी से टकराकर उस आदमी के पीठ से टकराई। उस आदमी को थोड़ी चोट लगी, लेकिन वह उस मछली को अपने घर ले गया और खुशी से उसे खाया होगा। दर्शकों को आकर्षित करने के लिए नियाग्रा के नजदीक कई खूबसूरत उद्यान, संग्रहालय, गोल्फ़ कोर्स, कैसीनो, बार, हॉल ऑफ हॉरर आदि बनाये गए हैं।

नियाग्रा इन चीजों की तरफ भ्रूक्षेप किए बिना निरंतर बह रहा है। यह नीचे की ओर ऐसे ही बह रहा है जैसे कि यह बारह हज़ार साल पहले बहा करता था। "अवश्य, यह डेढ़ करोड़ दर्शकों का हर साल यहां सम्मान करता हैं। लेकिन इसके अधीर पानी को इनकी वाणिज्यिक मनोवृत्ति समझ में नहीं आती हैं।" मानो नियाग्रा अपने वज्र निर्घोष से यह बात बता रहा हो। इस तरह हम नियाग्रा की यात्रा समाप्त कर देर रात वाशिंगटन लौट आए।

वॉशिंगटन में आखिरी दिन हमें लिंकन मेमोरियल और वाशिंगटन स्मारक देखने ले जाया गया। खूब बर्फबारी होने के कारण वॉशिंगटन स्मारक तक पैदल जाने की इच्छा नहीं हुई। हमने इसे दूर से देखा। मेरे वॉशिंगटन के पहले दौरे में मैंने इसे नजदीक से देखा था। यह स्मारक वॉशिंगटन में सबसे लोकप्रिय और दर्शनीय खूबसूरत जगह है। जॉर्ज वाशिंगटन की स्मृति में संगमरमर और ग्रेनाइट से बनी यह 555 फुट ओबिलिस्क(सूच्याकार स्तम्भ) वाशिंगटन में प्रवेश करते ही ध्यान आकर्षित करती है। जॉर्ज वॉशिंगटन अमेरिकी जीवन और राजनीति में सबसे महत्वपूर्ण और स्मरणीय व्यक्तित्व है।

लिंकन मेमोरियल 30 मई, 1922 को देश को समर्पित किया गया था। स्मारक तीन चीजों की याद दिलाता है : गृह युद्ध, जो लंबे समय तक चला, विजयी स्वतंत्रता-संग्राम और अमेरिका के राष्ट्रपति के रूप में अब्राहम लिंकन के व्यक्तित्व। लिंकन अमेरिका के सोलहवे राष्ट्रपति थे। स्मारक के अंदर एक बहुत ही ऊंचे सिंहासन पर बैठे हुए लिंकन की प्रतिमा प्रसिद्ध वास्तुकार डैनियल चेस्टर फ्रेंच ने बनाई थी। प्रतिमा पूरी तरह से निर्दोष है, लिंकन का मानवतावाद और उनकी दृढ़ता भी इस प्रतिमा में प्रतिबिंबित होती है। लिंकन द्वारा दिए गए कुछ व्याख्यानों को प्रतिमा के सामने वाली दीवार पर उत्कीर्ण किया गया है।

थॉमस जेफरसन अमेरिका के तीसरे राष्ट्रपति थे। उनका स्मारक, लिंकन मेमोरियल और वाशिंगटन मेमोरियल से पूरी तरह अलग है। यह संगमरमर से वर्तुलाकार बना हुआ है। मेमोरियल में इक्कीस खंभे हैं। जेफर्सन की 19 फुट ऊंची प्रतिमा इसके अंदर खड़ी है। जेफरसन के लेखन के कुछ अंश के साथ-साथ आजादी की घोषणा दीवार पर अंकित है। ऐसा कहा जाता है कि वर्जीनिया विश्वविद्यालय की स्थापना करते समय जेफरसन को रोमन देवता की वास्तुकला ने आकर्षित किया था।

अमेरिका 4 जुलाई, 1776 को स्वतंत्र हुआ। इस दिन स्वतंत्रता की घोषणा पर हस्ताक्षर किए गए थे। हमारे गाइड ने कहा कि दुनिया के किसी दूसरे देश ने इतनी धूमधाम के साथ शायद ही स्वतंत्रता दिवस मनाया होगा ! मुझे अपने स्वतंत्रता दिवस पर नई दिल्ली में लाल किले के सामने रोशनी से जगमगाते भवनों की याद आने लगी। मैंने अखबारों में पढ़ा है कि उनके स्वतंत्रता दिवस समारोह की 200 वीं वर्षगांठ के अवसर पर 33 टन पटाखे छोड़े गए थे।

वाशिंगटन के केंद्रीय अंचल को नेशनल मॉल कहा जाता है। इस पर दो चौड़ी और समानांतर सड़कों को स्वतंत्रता राजपथ और संविधान राजपथ के रूप में जाना जाता है। लिंकन मेमोरियल राष्ट्रीय मॉल की बाईं ओर है और कैपिटल बिल्कुल उसके विपरीत दिशा में है। स्मिथसोनियन संग्रहालय नेशनल मॉल के दोनों किनारों पर है। स्मिथसोनियन दुनिया की सबसे बड़ी संस्था है, जो सत्रह संग्रहालयों की देखरेख करती है। मैंने अपनी पहली वाशिंगटन यात्रा के दौरान इनमें से कई को देखा था। स्मिथसोनियन के मुख्यालय का नाम है स्मिथसोनियन कैसल। वास्तव में, यह मध्ययुगीन किले की तरह दिखता है।

स्मिथसोनियन केवल संग्रहालयों का प्रबंधन ही नहीं करता है, बल्कि यह चित्रकला, वास्तुकला, पुराने दस्तावेजों, ऐतिहासिक वस्तुओं के संरक्षण के बारे में उन्नत अनुसंधान करता है। संविधान राजपथ नेशनल मॉल के उत्तर में है और स्वाधीनता राजपथ दक्षिण में है। इन दो सड़कों की तरह राष्ट्रीय मॉल के अंदर दो अन्य समानांतर सड़कें हैं। जिन्हें जेफरसन ड्राइव और मैडिसन ड्राइव के नाम से जाना जाता है। उनके ये नाम अमेरिका के दो पूर्व राष्ट्रपतियों के नाम पर रखे गए है। स्मिथसोनियन द्वारा प्रबंधित प्रमुख संस्थानों में नेशनल आर्ट गैलरी शामिल है,जो पूर्वी अट्टालिका और पश्चिमी अट्टालिका में विभाजित है। इसके द्वारा प्रबंधित अन्य संस्थानों में स्पेस म्यूजियम, शाक्लर और फ्रीर आर्ट गैलरी, नेशनल पोर्ट्रेट गैलरी, अमेरिकन आर्ट म्यूजियम और अफ्रीकी आर्ट म्यूजियम शामिल हैं। नेशनल गैलरी ऑफ आर्ट के पूर्वी भवन में ऑर्केस्ट्रा और उच्च गुणवत्ता वाली कला फिल्मों का नियमित प्रदर्शन होता रहता है। स्मिथसोनियन और उसकी सह-संस्था नेशनल ज्योग्राफिक सोसाइटी कई विषयों पर फिल्में बनाती हैं, सेमिनार आयोजित करती हैं।स्मिथसोनियन का लाल दुर्ग 1855 में स्थापित किया गया था। स्मिथसोनियन के सभी मुख्य कार्यालय और वुडरो विल्सन के नाम पर इंटरनेशनल सेंटर फॉर स्कॉलर इस दुर्ग में अवस्थित है। स्मिथसोनियन द्वारा परिचालित सभी संग्रहालयों को देखना लगभग असंभव है। हमने नेशनल आर्ट गैलरी और पास में हिर्शहॉर्न संग्रहालय के प्रतिमा कला उद्यान में कुछ समय बिताया। इसके बाद हमने फ़्रीर आर्ट गैलरी देखी। दक्षिण पूर्व एशिया (भारत सहित) और पूरे पूर्वी गोलार्ध से सबसे अधिक चित्रकला यहां संग्रहीत हैं।

पोटोमैक नदी लगभग पूरी तरह से बर्फ बन गई थी। यह बहुत बड़ी नदी नहीं है। इसकी लंबाई 285 मील है, मैरीलैंड से लेकर चेसपीक खाड़ी तक। नदी के किनारे घूमते समय मुझे कुछ नौकाएँ नजर आई । गाइड ने बताया कि वे पोटोमैक बोट क्लब द्वारा आयोजित वार्षिक बोट रेस प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए अभ्यास कर रही हैं। लिंकन मेमोरियल के सामने खड़े होकर देखने पर वॉशिंगटन स्मारक और कैपिटल एक सीधी रेखा में दिखाई देते हैं।

लिंकन मेमोरियल के सामने छोटी झील में वाशिंगटन स्मारक का प्रतिबिंब नजर आता है। इस झील को 'रिफ़्लेक्टिंग पूल' के नाम से जाना जाता है। लिंकन की प्रतिमा, पुस्तकों में पढ़ा उनका चरित्र और अमेरिकी स्वतंत्रता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता वहाँ प्रतिफलित हो रही है। मेरा मानना है कि वाशिंगटन में देखी जाने वाली सभी प्रतिमाओं में सबसे विशाल एवं खूबसूरत है। वाशिंगटन स्मारक 555 फुट ऊंचे संगमरमर का बना हुआ है, यह चतुष्कोण वाला विशिष्ट ओबिलिस्क टॉवर है। यह स्मारक अपनी दक्षता, शक्ति और सौंदर्यबोध का परिचायक है। वाशिंगटन स्काईलाइन में यह हर जगह दिखाई देता है। वॉशिंगटन सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा हर साल स्मारक के सामने खुले आसमान के नीचे कॉन्सर्ट आयोजित करता है। लगभग चार हजार संगीत प्रेमी वहाँ आनंद लेने के लिए इकट्ठा होते हैं।

वॉशिंगटन नेशनल कैथेड्रल की ऊंचाई 676 फीट है। यह वॉशिंगटन स्मारक की तुलना में ऊंचा है। इसकी नींव सन 1907 में रखी गई थी और 1990 में अर्थात् तिरासी साल बाद अंतिम पत्थर रखा गया था। थियोडोर रूजवेल्ट से लेकर बाकी सभी अमेरिकी राष्ट्रपति प्रतिवर्ष एक या अधिक बार कैथेड्रल में आये थे। वियतनाम, कोरियाई और अन्य युद्धों में अपने प्राण न्यौछावर करने वाले अमेरिकी सैनिकों की दिवंगत आत्माओं को यहाँ सम्मानपूर्वक श्रद्धांजलि दी जाती है। अमेरिका के राष्ट्रपति इस समारोह में भाग लेते हैं।

शहर के बाहरी इलाके में चेसपीक और ओहियो के नहर हैं। जिसका उद्देश्य ओहियो नदी को जलमार्ग से जोड़ना था, क्योंकि उन्नीसवीं शताब्दी में पोटोमैक नदी को गहरा कर जल-यातायात बढ़ाने के लिए इसे तैयार करना संभव नहीं था। उन्नीसवीं शताब्दी में कैनाल की लंबाई 4000 मील थी। छोटे-छोटे यंत्रचालित नाव लोगों और सामान को लाने-लेजाने का काम कर रहे थे। सन 1889 और 1924 की बाढ़ के बाद नहर के कई भाग अनुपयोगी हो गए थे। वाशिंगटन के बाहरी इलाके में स्थित इस नहर के किनारे हार्वर्ड में रहते समय और परवर्ती काल में, मैं अक्सर इस नहर पर घूमता था।

हमारी होटल ‘डुपोंट सर्कल’ के उत्तर-पश्चिम में मैसाचुसेट्स एवेन्यू है, जिसका लोकप्रिय नाम दूतावास पंक्ति है। बेलारूस और केमरून से लेकर नेपाल और स्लोवेनिया तक के लगभग 70 से 75 दूतावास इस पंक्ति पर स्थित हैं।

एयर एंड स्पेस म्यूजियम देखने के लिए हमें समय नहीं मिला।अवश्य, मैं पहले देख चुका था। अंतरिक्ष में अमेरिका की दीर्घ-यात्रा इस संग्रहालय में प्रदर्शित की गई है। राइट ब्रदर्स से लेकर अपोलो यान और अंतरिक्ष में उनके विभिन्न अभियानों का सुंदर ढंग से प्रदर्शन किया गया है। अंतरिक्ष यानों के विशाल मॉडल दर्शकों को बहुत आकर्षित करते हैं। इसके अतिरिक्त, म्यूजियम के अंदर इमिक्स थिएटर में अंतरिक्ष यात्रा से संबंधित फिल्मों को भी देखने की व्यवस्था है।

(क्रमशः अगले भागों में जारी...)

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रचनाकार: स्मृतियों में हार्वर्ड - भाग 5 // सीताकान्त महापात्र // अनुवाद - दिनेश कुमार माली
स्मृतियों में हार्वर्ड - भाग 5 // सीताकान्त महापात्र // अनुवाद - दिनेश कुमार माली
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