रु. 25,000+ के  नाका लघुकथा पुरस्कार हेतु रचनाएँ आमंत्रित.

अधिक जानकारी के लिए यहाँ http://www.rachanakar.org/2018/10/2019.html देखें.

नीचे टैक्स्ट बॉक्स से रचनाएँ अथवा रचनाकार खोजें -
 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें.

विषादेश्वरी भाग 5 // उड़िया उपन्यास // सरोजिनी साहू // अनुवादक - दिनेश कुमार माली

साझा करें:

भाग 1 भाग 2 भाग 3   भाग 4 " तुम साहित्यकार कब से बन गए हो?" कहकर हर्षा हंसने लगी, "अच्छा, तुमने मुझे फातिमा-दिवस पर...



भाग 1 भाग 2 भाग 3  भाग 4
" तुम साहित्यकार कब से बन गए हो?" कहकर हर्षा हंसने लगी, "अच्छा, तुमने मुझे फातिमा-दिवस पर आधारित कहानी सुनाने के लिए कहा था। "

"हां, निश्चित रूप से। "  लैपटॉप बंद करते हुए उसने टेबल पर रख दिया। वह कहने लगा, "फातिमा के नाम पर पुर्तगाल में एक जगह है। यह 1917 के मई महीने की बात होगी। हां, वह 13 तारीख थी। लुसिया सैंट्रोस, फ्रांसिस्को मार्टो और जसिंतिया नामक तीन औरतें  अपनी-अपनी भेड़-बकरियों का चराते समय ध्यान रखती थी। मदर मेरी फातिमा के पास उन्हें दिखाई दी। बाद में उन्होंने प्रसार किया कि उन्होंने मदर मैरी को देखा और उन्हें तीन गुप्त चीजें पता चल गई हैं। तत्कालीन शासक ने उन्हें 13 अगस्त को राजनीति प्रेरित दावे के कारण गिरफ्तार कर लिया था। लेकिन 13 अक्टूबर, 1917 को जनता की मांग पर उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया। मगर एक शर्त पर कि पोप  उनके मुकदमे पर विचार करेगा। पोप ने उनकी सारी बातें सुनी और अंत में  उन्हें तीन सत्य में से दो सत्यों को लोगों के बीच प्रचार करने की इजाजत दी।  वे दोनों सत्य साबित हुई: पहला, उन्होंने समुद्र में से आग के फुव्वारों को आसमान की ओर छूटते हुए देखा और उसी अग्नि-वर्षा के भीतर वीभत्स दिखाई दे रहे पशु तुल्य भयानक राक्षसों को बाहर निकलकर पृथ्वी की तरफ भागते देखा। दूसरा सत्य था मदर मेरी ने निर्देश दिए थे कि वे रूस के साथ युद्ध न करें, वरन शांति का प्रस्ताव रखें। यह मानव जाति के लिए अच्छा होगा और तीसरे सत्य को पोप ने खुद उन्हें सन 2000 के ईस्टर तक गुप्त रखने का निर्देश दिया। सत्य यह था कि पोप की हत्या की जाएगी। ”

"क्या तुम जानती हो, हाना, “लेडी ऑफ फातिमा” के नाम से प्रसिद्ध लूसिया कौन थी? वह मेरी दादी थी। जिनका पिछले साल 97 साल की उम्र में देहांत हो गया। "
हर्षा ने पूछा, " इसका मतलब तुम एक ऐसे परिवार से संबंध रखते हो, जिसे मदर मैरी का आशीर्वाद प्राप्त है?"
अल्बर्टो ने मुस्कराते हुए कहा: "कभी-कभी अविश्वसनीय घटना भी घटित हो जाती है, है ना? अब मुझे बताओ कि क्या तुम पहले खाना खाओगी या फिल्म देखना पसंद करोगी? "
"क्या तुमने मुझे फिल्म दिखाने की सौगंध खाई हैं?"
"यदि तुम चाहो तो, प्रश्नोत्तरी-खेल भी खेल सकती हो। "

"नहीं, अल्बर्टो, आज नहीं। फिल्म देखकर खाना खाएँगे। दो काम एक समय में क्या नहीं कर सकते हैं? ठीक है, चलो पहले फिल्म देखते हैं। " अल्बर्टो ने डीवीडी चालू किया। रूसी सिनेमा, ‘द मिरर’ शुरू हुई।
"देखो, तुम इस फिल्म को कितनी बार देखोगे ? जहां तक मुझे याद है, तुमने पहले भी मुझे  इस फिल्म के बारे में बताया था। "
  "सच में ? मैं भूल गया। वैसे भी, तुम्हारे साथ एक बार और इस फिल्म को देख लूँगा तो  क्या नुकसान हो जाएगा ? "
हर्षा अल्बर्टो के अकेलेपन का अहसास कर सकती थी। फिल्म देखना केवल बहाना था, केवल एक साथ बैठकर समय व्यतीत करने का। वह फिल्म देखने में मशगूल हो गया था। वह उसके  चेहरे पर कभी प्रसन्नता, कभी गंभीरता, कभी हँसी देख सकती थी। लेकिन हर्षा को सिनेमा में मजा नहीं आया। सोचने लगी, इसमें ऐसा क्या खास है कि अल्बर्टो इसे बार-बार देखना पसंद करता है?  हर्षा मोबाइल को कान पर लगाकर बाहर आ रही थी, तो अल्बर्टो ने सिनेमा की आवाज कम कर दी और कहने लगा कि यहीं बात कर लो।

उसके पिता का फोन था। शुरु में हर्षा को थोड़ा असहज महसूस हुआ। पुरी का नंबर देखकर उसने पहले सोचा कि यह उसकी माँ का फोन होगा, अपने दुखों को बताने के लिए। मगर दूसरी तरफ उसके पिताजी थे।
" कुनी तुम्हारी तबीयत कैसी हैं?"
"मै ठीक हूँ। " हर्षा ने कहा। बहुत दिनों से उसने पिताजी से बात नहीं की थी। केवल नाराजगी के कारण। स्कूल में पढ़ते समय उसके पिता नीलकंठ दास की तरह बहुत ही मुखर  और व्यवहार-कुशल थे। वे सभी सामाजिक नियमों और प्रथाओं को तोड़कर प्रगति के रास्ते खोलना चाहते थे। हेडमास्टर के रूप में उन्होंने स्कूल के लिए नए नियम तैयार किए थे, लेकिन घर में दादाजी के खिलाफ कभी नहीं गए। हर्षा जानती थी कि वे दोनों अलग-अलग खंभे हैं, फिर भी पिताजी ने दादाजी के नीति-नियमों का कभी विरोध नहीं किया था। पर क्यों? बुआ ही क्यों, हर्षा ही क्यों,  सभी दादाजी की इच्छानुसार चलेंगे? उसके पिता कम से कम एक बार तो विरोध कर सकते थे? हर्षा की अपने पिता के खिलाफ कई शिकायतें थीं। उसे पता नहीं क्यों लग रहा था, मनुष्य के आदर्श एक तरफ और मनुष्यता दूसरी तरफ। जिनमें उनके मामूली स्वार्थ, उद्देश्य, सपने और आकांक्षाएं शामिल थीं।
पिताजी ने कहा: "तुम्हारी माँ के हाथ जल गए हैं। "
"जल गए! यह कैसे हुआ?" हर्षा बहुत परेशान हो गई थी।
"पानी की हांडी उठाते समय गर्म पानी उसके हाथों पर गिर गया। "
"अब कैसी है, माँ ?" हर्षा के स्वर में व्यग्रता झलक रही थी।
"डॉक्टर ने घाव पर मलहम लगाने के लिए दिया है। पूजा समाप्त होने में केवल एक दिन बाकी था, पता नहीं क्यों, यह विध्न पड़ा। माँ की चिंता से तुम परेशान हो जाओगी, इसलिए मैंने तुम्हें फोन किया। ”
"पूजा जैसे चल रही है, चलने दे, इसके बारे में ज्यादा चिंता न करें। मगर माँ पर अनावश्यक दबाव न डाले। उसे आराम करने के लिए कहे। " पता नहीं क्यों, हर्षा को अविश्वास हो रहा था। क्या कोई इस बात के लिए इतना बड़ा झूठ बोल सकता है?

पिता ने फोन रख दिया था। हर्षा माँ की बुरी खबरो से उदास हो गई थी। माँ उसे बार-बार पुरी आने के लिए कह रही थी; अगर वह चली जाती तो शायद यह घटना नहीं घटती। पूरे घर में मां ही उसकी बात को थोड़ा-बहुत  समझती थी।  उसकी मानसिक वेदना समझकर अकेले में रोती थी। माँ ने पिताजी से जिद्द कर उसे टाटा से  वापस लाया था। अवश्य, वह कुछ दिनों के भीतर यह समझ गई थी कि शादीशुदा बेटी को हमेशा अपने पति से अलग घर में रखना संभव नहीं है। माँ उसे सांत्वना देने की कोशिश कर रही थी: "अपनी बुआ को देखो, उसे किस तरह की खुशी मिली? उसका जीवन उसके लिए बोझ बन गया था। अगर वह मर जाती तो शायद दुनिया से तर जाती। तुम क्या जानती हो कि मन कितने जुनून और इच्छाओं का भंडार है? मैंने देखा है तुम्हारी बुआ को पंद्रह साल तक कष्ट भोगते हुए। वह पागल हो गई थी, इसलिए उसे चैन से बांधकर रखा जाता था। किसी भी आदमी को देखकर वह उसे पकड़ने के लिए दौड़ती थी, इस वजह से कोई भी पड़ोसी हमारे घर में कदम रखने की हिम्मत नहीं करता। तुम्हारा भाई था बहुत ही जवान, उसके गाल पर इतनी निर्दयता से चिंकुटी काटी  कि वह घंटों भर रोता रहा। दो दिन तक उसे बुखार रहा। गुस्से से तुम्हारे  दादा ने एक कमरे के कोने में एक चैन से बांधना शुरू किया। तुम छोटी बच्ची थी, तुम नहीं समझ पाओगी कि इस शरीर में कितनी आग होती है?
“आग? माँ किस आग की बात कर रही थी?”  वह सोचने लगी।

अब हर्षा बहुत अच्छी तरह समझ सकती थी कि उसके मां के कहने का मतलब। राख के नीचे छुपे अंगार की तरह उस सुप्त कामना का अर्थ। जिसकी वजह से उसकी बुआ एक दिन पागल हो गई। अब बुआ अपने पिछले जन्मों के पापों को 'हविश' (पूरे दिन में एक बार खाना) कर मिटाना चाहती थी?जबकि ऐसा कोई पाप बुआ ने किया था ?
अल्बर्टो ज़ोर से हंसने लगा।
"तुम इतने जोर से क्यों हंस रहे हो?"
अपनी हंसी को बहुत मुश्किल से रोकते हुए वह कहने लगा: "हे भगवान, क्या तुम  अन्यमनस्क थी? क्या तुमने   फिल्म नहीं देखी ? "
हर्षा ने कहा, "नहीं, "
"अरे! क्या हुआ ? तुम ठीक हो? फोन कहां से आया था? क्या कोई बुरी खबर थी? "अल्बर्टो ने एक बार में बहुत सारे सवाल किए। फिल्म को आधे में बंद करते हुए वह कहने लगा: "मुझे गलत मत समझो, मैंने तुम्हारी तरफ  ध्यान नहीं दिया;  यह स्वार्थपरता नहीं तो और क्या है? मुझे बताओ, बिना झिझक के बताओ, हाना, मैं तुम्हारी मदद कैसे कर सकता हूँ ? "
हर्षा  ने कहा, "पिताजी की फोन आया था। गरम पानी से मेरी मां का हाथ जल गया है। "

"ओह! बड़े दुख की बात है! चिंता मत करो, सब-कुछ ठीक हो जाएगा। क्या किसी डॉक्टर को दिखाया है ? तुम ऐसी मानसिक स्थिति में फिल्म देख पाओगी ? चलो, फिल्म देखना बंद करते हैं। बेहतर है, खाना खा लेते हैं। "
हर्षा सोच रही थी, अगर वह आदमी कभी अल्बर्टो की तरह बात करता तो आज उसका जीवन अलग होता।  भीतर जाकर अल्बर्टो ने प्लेट पर कुछ खाना लाया।  हर्षा ने कहा: "अल्बर्टो, कृपया बैठो, मुझे बताओ कि क्या करना है, मैं कर दूँगी। "
"'अतिथि देवो भव:' - अतिथि देवता-तुल्य होते हैं-आपके यहाँ कहा जाता है। इसलिए तुम चुपचाप बैठ जाओ। ऐसे भी  तुम परेशान हो। "
रसोई-घर से दो गिलास जूस लाकर अल्बर्टो कहने लगा: "मैंने ‘फातिमा-दिवस’ मनाने के लिए तुम्हारे लिए  खास भोजन की व्यवस्था की है। "
उसने छैना की दो प्लेटें लाई।
" यह छैना तुम्हारा विशेष भोजन है?"
" गलत हैं, यह चीज़ छैना नहीं है, यह सेटन है। "
"उस सेटन क्या है?"
"ओह, तुमने सेटन को पहले नहीं चखा ? यह तुम्हारा एशियाई भोजन है। यह पहले बौद्ध भिक्षुओं के लिए चीन में तैयार किया जाता था। यह एक प्रकार के आटे से बनाया गया है। वास्तव में, आटे से माँड़ निकालकर  प्रोटीन बचा कर रखा जाता है। बौद्ध भिक्षु मांसाहार नहीं लेते थे, उन्हें यह सेटन दिया जाता था। यह सेटन मेरा पसंदीदा भोजन है। "
हर्षा इस बौद्ध को कर्म, मन और प्राण में देख रही थी। बौद्ध भिक्षुओं को सेटन खिलाया जाता था, इसलिए वह भी सेटन खाता है।
हर्षा ने कहा, "क्या हमारे भोजन-पेय का हमारे धार्मिक विश्वासों, पूजा-पाठ, अनुष्ठानों या 'साधना' में कोई संबंध  हैं, जैसा तुम  कह रहे हो? स्कूल में हमारे पाठ्यक्रम में गौतम बुद्ध के बारे में एक कहानी थी। उन्होंने कठोर तपस्या के लिए उरुवेला शहर में एक सुंदर जगह का चयन किया था। उन्होंने छह वर्षों तक वहाँ पर कठोर तपस्या की थी। तपस्या  की इस अवधि के दौरान उन्होंने अपनी सभी सामान्य आदतों को छोड़ दिया। भोजन, पेय और नींद से वंचित रहने और निरंतर तपस्या के कारण वह बहुत कमजोर हो गए। उनकी कठोर तपस्या  की जानकारी मिलने के बाद कुछ शिष्य उनके आस-पास इकट्ठा हो गए। वे आपस में फुसफुसाने लगे कि उन्हें  बहुत ही जल्दी 'सिद्धी' प्राप्त होगी। एक दिन गौतम अत्यधिक कमजोरी के कारण बेहोश हो गए। जो शिष्य उनके आस-पास इकट्ठे हुए थे, वे कहने लगे कि गौतम की तपस्या करते-करते मृत्यु हो गई। हम व्यर्थ में उनके पास रहे, इस श्रमण ने कोई ज्ञान प्राप्त नहीं किया था। जब गौतम की चेतना लौटी तो उन्हें लगा कि वह मौत की दहलीज से लौटे है। इस तरह भोजन-पेय लिए बिना शरीर को यातना देकर ज्ञान प्राप्त नहीं किया जा सकता है; वरन मृत्यु अनिवार्य है। इसलिए उन्होंने भिक्षा माँगना शुरू किया। इस बार वे संन्यासी कहने लगे कि गौतम बुद्ध छह साल की कठोर तपस्या के बावजूद ज्ञान प्राप्त करने में नाकाम रहे, क्या अब वह भोजन-पेय लेते हुए बिना तपस्या के बुद्धत्व प्राप्त कर सकेंगे ?  इस आदमी के पीछे चलने का कोई फायदा नहीं है। वे लोग गौतम को छोड़कर चले गए। मगर गौतम ने महसूस किया कि कृच्छ साधना से शरीर को कष्ट देने की तुलना में सामान्य जीवन जीते हुए सत्य का अनुसंधान करना बेहतर है। "

हर्षा की कहानी खत्म होने के बाद खुशी से अभिभूत अल्बर्टो कहने लगा, "यही कारण है कि मैं तुम को इतना प्यार करता हूँ। मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ। यू आर वंडरफूल माय गर्ल। तुम मुझसे वादा करो, हाना, जब तक मैं तुम्हारे देश में हूं, तब तक तुम मुझे छोड़कर नहीं जाओगी। तुम्हारे देश में ही क्यों, मैं तुम्हें सारे जीवन के लिए चाहता हूँ, हाना। ओह, माय स्वीट बेब! "
हर्षा ने अल्बर्टो की भावनाओं पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। केवल कुछ महीनों से वे एक-दूसरे को जानते थे। आज वह यहाँ है, कल वह कहाँ रहेगा, क्या पता। दोनों ने अपनी प्लेटें सिंक में डालने के लिए उठाईं। हर्षा ने टैप के नीचे प्लेटों को साफ किया और अल्बर्टो ने गमछे से उन्हें पोंछकर शेल्फ में रख दिया।

अल्बर्टो ने पूछा: "क्या तुम फोन आने के बाद थोड़ा निराश हो गई थी?"
"हाँ, यह सच है। मगर एक और बात है, मुझे नहीं पता कि कैसे कहूँ। "
"चिंता करने की कोई बात नहीं है। यदि तुम सहज महसूस करती हो तो कह सकती हो, नहीं तो बाद में बता सकती हो। अच्छा,  'रोमांस', के बारे में तुम्हारी क्या धारणा है ? "
“रोमांस?" अल्बर्टो क्या जानना चाहता है ? अचानक ऐसा सवाल क्यों? हर्षा ने होठ भींचते हुए कहा, “ जब मैं पहली बार कॉलेज गई थी तो हमारे अंग्रेजी अध्यापक ने छात्रों को एक कविता समझाने से पहले यह सवाल पूछा था। हमें यह प्रश्न समझ में आ गया था और उसका इसका जवाब भी। लेकिन हम अनुभव कर सकते थे, पता नहीं, सही उत्तर क्या होगा। एक सौ अट्ठाईस छात्रों में से केवल एक ने अपना हाथ ऊपर उठाया। उसका जवाब था  'सम अनयुजूयल फीलिंग्स'। मुझे नहीं पता कि वह सही उत्तर था या गलत। आज भी मुझे रोमांस का अर्थ नहीं मालूम है। "

हर्षा ने आँखें मूंदकर महसूस किया:
साफ-सुथरा छोटा घर
गोबर लिपा आँगन-द्वार
छप्पर पर लौकी पत्ते व पंख ,
घर के अंदर से गुंजित होता शंख ;
घर से सटा हुआ एक छोटा तालाब
तालाब में मछली , पेड़ों पर पक्षियों की रब
तालाब को घेरे छोटा बगीचा
बगीचे में हरी घास का गलीचा
रात में  चमकता चाँद
चाँद का सिर्फ प्रेम मन
 
" रोमांस कहने से सिर्फ इतना ही कि आँखें बंद करो तो उभर आता है एक चित्र  किशोरावस्था का। मन में और ज्यादा कुछ नहीं आता है। घर के लोगों के बारे में नहीं सोचा जा सकता हैI सोचा  नहीं सकता  उनके नाक, नक्शा या चरित्र के बारे में कुछ भी। जब तक आँखें बंद रहती हैं तब तक चांदनी में स्नान करती है घर की छत। जब खुल जाती है, तो कुछ भी नहीं नजर आता है। रोमांस, रोमांस, रोमांस, 'रोमांस'  कुछ है भी क्या, अल्बर्टो?
 
"कैंडल लाइट डिनर, जाज, बोटींग, ये क्या हैं, हाना ?"
 
"क्या यह दार्शनिक अल्बर्टो का उत्तर है?"

"हां, तुमने सही कहा। " अल्बर्टो ने कहा, "रोमांस कोहरे की तरह है, एक ऑप्टिकल भ्रम है, यहाँ है, यहाँ नहीं। जो  है, वह नहीं है। जो नहीं है, वह है। बंद आँखों के तले हम जीवन का आधा हिस्सा जीते है, और आधा खुली आँखों से। जब तक बंद आँखों के तले कुछ भी दिखाई नहीं देता है कि जीवन जीना एक आदत बन जाता है। "
“हां, जीवन अभ्यस्त हो जाता है। ” तकिये को गोद में लेते हुए हर्षा ने अपनी आँखें बंद कर दीं। उसे कुछ भी दिखाई नहीं दिया। कोई घर नहीं, कोई बाग नहीं, कोई मछली नहीं और न ही लौकी की लता, यहां तक कि चाँद भी नहीं। केवल एक चीज उसकी आंखों के सामने दिखाई देने लगी, वह थी दक्षिण दिशा की खिड़की। ऐसा लग रहा था जैसे कि कोई उसे आधी रात को नाम लेकर बुला रहा हो। कोई दरवाजे पर दस्तक दे रहा हो। बार-बार कॉलिंग-बेल की घंटी बज रही थी, एक छोटे बच्चे द्वारा गुणन तालिका के रटने की तरह। फिर भी हर्षा उठकर  दक्षिण दिशा की खिड़की की ओर नहीं गई। हर्षा मानो निबुज कोठारी में बदल गई हो, उसके पास कोई आवाज नहीं पहुंच रही हो। नहीं, वह दरवाजा नहीं खोलेंगी। उस आदमी को बाहर रहने दो। उसके दाँत भींच रहे थे। दरवाजे पर कोई बार-बार किक मार रहा था। सुनते हुए भी अनसुना करते हुए बैठी हुई थी वह। धीरे-धीरे सब-कुछ शांत हो गया। आह! आदमी सर्दी की इतनी ठंडी रात में बाहर ठिठुर जाएगा। झरोखे के पास से उठकर वह धीरे-धीरे दरवाजा खोलने के लिए आगे बढ़ी। आदमी अभी तक जमीन पर लुढ़का नहीं था।
  "तुम इतनी देर क्या कर रहे थे, पियक्कड़?"

  उस शराबी ने हर्षा को धक्का दिया और खुद वहीं जमीन पर ढेर हो गया। उसके बाद सब-कुछ शांत, नीरव और स्थिर। हर्षा आदमी को उठाकर बिस्तर पर ले गई। वह रात में बिस्तर पर मृत मछलियों की तरह दिख रहा था, लेकिन सुबह उसने हर्षा को अपने प्रचंड पौरुष और पूंजीभूत आक्रोश से छिन्न-भिन्न कर दिया था।  उसने विरोध किया, " अभय, आई एम इन पेन। मेरे पेट में भयानक दर्द है। देखो, आज मेरे लिए यह संभव नहीं है। तुम तो एक डॉक्टर हो, तुम मेरी स्थिति को अच्छी तरह से समझ सकते हैं।  मैं तुम्हें कैसे समझाऊँ? क्या तुम कुछ दिनों के लिए संयम धारण नहीं कर सकते हो ? "
"कैसा अंधविश्वास है? सब फालतू बात है। " वह आदमी परेशान होकर ब्याज समेत सब वसूल करना चाहता था,  जैसे कि वह रात का गुस्सा नहीं भूल पाया हो। हर्षा विकल होकर पूछने लगी, "मेरे दर्द का क्या? मेरी पीड़ा कुछ नहीं ? क्या यह कुसंस्कार हैं, क्या यह फालतू है?" हर्षा की आँखों के दोनों किनारों से आँसू गिरने लगे। दांत भींचकर सूखी मिट्टी की तरह पड़ी रही।

"क्या हुआ, हाना? तुम रो क्यों रही हो? क्या हुआ, मुझे बताओ। ” अल्बर्टो उसके पास आकर बैठ गया। "याद रखो, हाना, मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूं, सुसमय-दु:समय में भी। हे हाना, माय स्वीट, मेरी प्रियतमा, जब तुम यहां आई थी, तब से मैं समझ गया था। तुम्हारे सीने में दुख के काले बादल भरे हुए हैं, जानता हूँ तुम किस कारण से उदास हो। मैंने तुम्हें अपनी सीमित क्षमता के भीतर दु:ख की दुनिया से उबारने का बहुत प्रयास किया। मैंने तुम्हारे चेहरे पर मुस्कराहट लाने की कोशिश की, लेकिन दुर्भाग्य से मैं विफल हुआ। "

अल्बर्टो की उंगलियां हर्षा के बालों को सहला रही थी। जैसेकि वह उसके सारे दुखों को पोंछना  चाहता हो। मानो हर्षा के आँसूओं से धीरज का तटबंध टूट गया हो।
"हम यूरोपीय कभी किसी के निजी मामलों में हस्तक्षेप नहीं करते हैं। मुझे नहीं मालूम कि तुम्हारा दर्द क्या है, लेकिन मैं तुम्हारा दोस्त हूं, मैं तुम्हारा साउलमेट हूं, तुम्हारा आत्मीय हूँ। " कहते-कहते वह उसे अपनी छाती के नजदीक ले आया। मानो नदी लंबे समय से सूख गई थी और उसके किनारे सूखी रेत पर अल्बर्टो और हर्षा दोनों वहां खड़े हुए थे। चारों ओर तेज धूप। क्षितिज में दूर-दूर तक एक भी पक्षी दिखाई नहीं दे रहा था। अचानक अल्बर्टो के स्पर्श से नदी छलक उठी, बांध तोड़कर लहरें रुक नहीं पाई।

उसने अल्बर्टो के होठों को स्पर्श किया: "तुम मेरी केवल सहेली नहीं हो, हाना, उससे अधिक हो।  जानती हो न, हम दोनों एक ही हैं? हम दोनों निर्जन सपने देखने वाले हैं। देखो, हमें भाग्य ने कैसे जोड़ा? "
अल्बर्टो की छाती शरण-स्थली हो। दोनों सुरक्षा के वलय में थे। "माय हनी, माय गर्ल, प्लीज डोंट क्राय , तुम फोन से बहुत परेशान लग रही हो,  कोई बुरी खबर है? "
कई दिनों से हर्षा को झिझक हो रही थी। पता नहीं, कैसे एक झटके में बाहर निकल आई हो: "मैंने तुम्हें एक बात नहीं बताई, अल्बर्टो। लेकिन आज मैं इसे बोलना चाहती हूं। मैं स्वतंत्र नहीं हूँ, मेरा जीवन अभी भी किसी के साथ बंधा हुआ है। मुझे आज़ाद होना चाहती हूँ। मुझे नहीं मालूम कि मुझे आजादी मिलेगी या नहीं। लेकिन मुझे आजाद होना है। वरना मेरा जीवन व्यर्थ हो जाएगा। इंसान के रूप में पैदा होने की कोई सार्थकता नहीं रहेगी। तुम जानते हो, अल्बर्टो, उसने मुझे फिर से फोन किया था। "
" किसने फोन किया था ? पिताजी ने ? "
"पिता ने मुझे अभी फोन किया है, लेकिन उसने मुझे दो दिन पहले फोन किया था। "
" कौन है? किसकी बात कर रही हो? "
मेरी इच्छा के विरुद्ध मेरा विवाह कर दिया गया था। मेरे दादा बहुत बूढ़े हो गए थे। प्राय: वह बीमार रहते थे। जिद्द कर रहे थे कि मरने से पहले अपनी नातिनी की शादी देखेंगे। "
"गजब ! तुम्हारे जीवन का निर्णय दूसरा क्यों लेगा ? "अल्बर्टो ने प्रतिक्रिया व्यक्त की, "हमारे देश में हम इस संबंध में पूरी तरह से स्वतंत्र हैं। वास्तव में तुम्हारे साथ बहुत अन्याय हुआ है। "
" घर में दादाजी की चलती थी। मेरे पिता में भी उनका विरोध करने की हिम्मत नहीं थी। वास्तव में, वह मेरे दादाजी को दुखी करना नहीं चाहते थे। उस समय मेरी उम्र बीस वर्ष थी। "
"ओह, इट इज होरीबल। यह होना उचित नहीं है। मैंने सुना है कि तुम्हारे यहाँ शादी से पहले जाति और जन्मकुंडली का भी मिलान किया जाता हैं। कुल अजनबी के साथ किसी की मानसिकता कैसे मिल सकती है? यह पूर्व और पश्चिम के बीच अंतर है। "
पता नहीं दूसरा समय होता तो हर्षा  इस मुद्दे पर अल्बर्टो से झगड़ा करती, लेकिन अभी वह एक स्रोत में बहती जा रही थी। वह इतनी तेजी से बहती जा रही थी कि उसमें खुद को रोकने की क्षमता नहीं थी। वह कहने लगी, "शादी के लिए उम्मीदवारों की खोज चल रही थी। मेरे पिता एक हेडमास्टर थे,  तब भी वह प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना नहीं कर सकते थे, उस समय उन्हें मेरी इच्छा-अनिच्छा का ध्यान नहीं आया। मेरा रोना-धोना सब व्यर्थ गया। "
अल्बर्टो ने हर्षा को और निबिड भाव से कस लिया। जैसे कि वह यह कहना चाहता हो कि चिंता की कोई बात नहीं है, कोई नहीं होने पर भी वह उसके साथ है। "देखो, मैं देवदूत की तरह कैसे आया हूं। दुख होने के कारण क्या  हम जीना छोड़ देंगे? नहीं, यहीं संदेश देने के लिए मैं पुर्तगाल से आया हूं। "

“जानते हो, मैं  बहुत अच्छी छात्रा थी। मेरी प्रतियोगी परीक्षा पासकर आईएएस या अलाइड बनने की तीव्र इच्छा थी। मगर मेरे सपनों से किसी को कोई मतलब नहीं था। बारंबार मुझे दूल्हे के उम्मीदवारों के सामने नाश्ता  और चाय की ट्रे लेकर जाने के लिए कहा जाता था। बहुत बार मुझे उनके अप्रासंगिक प्रश्नों का जवाब देना पड़ता था। किसी ने मुझे गाना गाने के लिए कहा, मगर मुझे गाना नहीं आता था।
"लेकिन, यह सब क्यों ? तुम्हें ऐसा क्यों करना पड़ा ? "
"दिस इस द वे। इस तरह वे लड़की को अपने जीवन-साथी बनाने के लिए चुनते हैं। रूप और बुद्धिमता, चाल- चरित्र, स्वभाव और सामर्थ्य - इन सभी चीजों की परीक्षा होती है। घर से भागने की इच्छा हो रही थी, लेकिन सभी लड़कियां ऐसा नहीं कर सकतीं, अल्बर्टों। सभी लड़कियां तो क्या अधिकांश लड़कियां घर छोडकर नहीं भाग पाती है। ज्यादातर लड़कियां अपने परिवार के फैसले को स्वीकार कर लेती हैं। वह आदमी टाटानगर में डॉक्टर था। उनके पिता डीएसपी थे, पश्चिमी ओडिशा के बरगढ़ में। वह मेरे पिता के बचपन के दोस्त थे, नौकरी के खातिर वहाँ रह रहे थे। फोटो देखकर उस आदमी ने मुझे पसंद कर लिया था। उसने मुझे शादी से पहले एक बार भी नहीं देखा था। मेरा ससुराल पुरी से कुछ किलोमीटर दूर था। पिताजी  और दादाजी के अनुसार वह कुलीन परिवार का लड़का था। "

शादी के बाद, आदमी ने दिल का दरवाजा पीटने की बजाय उसके शरीर का दरवाजा पीटने लगा। हर्षा चुपचाप बैठी हुई थी। अल्बर्टो अपनी उंगलियों से उसके बाल सहला रहा था। अचानक उसने उसे कमर से पकड़कर बाहों  में लेते हुए उसके होठों पर अपने होठ सटा दिए, मानो वह उसके सारे दुःखों को पीना चाहता हो। लंबे समय से जैसे सूखी नदी अचानक उफान पर आ गई हो। जैसे अनियंत्रित बाढ़ की तरह चारो ओर पानी ही पानी होता है, वैसे ही उत्तेजना की बाढ़ हर्षा में उमड़ पड़ी थी। दोनों पक्षी बंधन तोड़कर आजाद हो गए। अल्बर्टो ने पूछा: "इस चीज से ऐसी क्या नाराज़गी?"
"ओ, अल्बर्टो, देट न्यूड बॉडी, सो अगली, आई हेव नोट इमेजीन एवर। उस आदमी का चेहरा देखने से पहले मैंने उसका नग्न शरीर देखा था। "
"ओह, सो क्रेज़ी, " अल्बर्टो ने कहा।

" उस आदमी की आवाज सुनने से पहले मैंने उसकी हुंकार सुनी थी। हे भगवान! देट इज द डेस्टिनी ऑफ ए वूमेन।  तुम विरोध नहीं कर सकती हो, क्योंकि ऐसा करने का उसे अधिकार नहीं दिया गया है। तुम्हें चीरा जाएगा, तुम्हारे टुकड़े किए जाएंगे, तुम्हें दबाया जाएगा, मारा जाएगा, निचोड़ा जाएगा, चूसा जाएगा, घुस जाएगा और अंत में उलटी में डुबोया  जाएगा। तुम कुछ नहीं कह सकती हो क्योंकि तुम्हारे ऊपर उसका कब्ज़ा हैं।  वह चावल की थाली में शराब डाल सकता है, तुम उसे ऐसा करने से रोक नहीं सकती हो। "
  दक्षिण दिशा की ओर खिड़की खोलकर रात भर इंतजार कर रही उस लड़की के बारे में जरा सोचो। अल्बर्टों के दिमाग में क्या ख्याल आएगा, अगर उसने दरवाजा नहीं खोला ? उसके लिए उसे क्रूस पर चढ़ाया जाएगा। इससे बच नहीं सकते हैं।

"मेरे माथे पर निशान देख, टेबल के किनार से मुझे मारा गया। प्रतिरोध करने का यह नतीजा है। देख मेरी  दाहिनी हथेली पर छोटे-छोटे निशान, सिगरेट की तरह, देख सकते हो, अल्बर्टों ? "
लाल लोमश छाती एक गेहूंआ शरीर से भीग गई थी। "हाना, माय डार्लिंग, माय स्वीटेस्ट गर्ल ऑफ ईडन, डोंट क्राय। फील मी, आई एम नोट देट मेन, माय हाना, माय प्रिंसेज। "
  "मैंने कई दिन खाना नहीं खाया। चारदीवारों के भीतर मेरा हृदय हाहाकार कर रहा था। अस्पताल का चपरासी घर के लिए मटन लाया। रोगियों ने बहुत सारे उपहार दिए थे। मगर घर में चावल नहीं, दाल नहीं, उस आदमी ने कभी मेरे दाल-रोटी के संसार के बारे में कोई जानकारी नहीं ली। 
कई बार सुबह-सुबह उठने के बाद  मैंने देखा कि वह आदमी मेज पर सुबह सात बजे से शराब की बोतल लेकर बैठा हुआ है; तुम उसका विरोध नहीं कर सकती हो। यदि तुम ऐसा करती हो तो वह तुम्हारा अस्तित्व अपनी  लम्बी जीभ से चाट जाएंगा। तूफान से भी ज्यादा प्रचंड, हड्डियों को चूर-चूर करने वाला आक्रोश, अज्ञात शहर में खोए हुए रास्तों का अंधकार, वमन कराने जैसी कुत्सित गंध,  पूरे शरीर पर मानचित्र, सीने में आर्त, आँखों के कोने में आँसू – ऐसे दृश्य किसी भी समय घटित हो सकता है। घर एक निर्जन द्वीप की तरह दिखाई देने लगा। आँखें घुमाने पर ओडिशा काफी दूर नजर आने लगा। बार-बार आंखों के सामने नजर आने लगता था सागर किनारे वाला छोटा शहर पुरी। क्या यह सब मेरा प्रारब्ध है? या यह एक महिला का भाग्य है? "
थक गई थी हर्षा। पूरी तरह से क्लांत। अल्बर्टों के स्पर्श से उसकी आँखें मूँदने लगी थी। अल्बर्टों के सम्मान उसे ठंडी समुद्री हवा का अनुभव होने लगा। उसकी पलकें बंद होती जा रही थी। खोलना चाहने पर वह नहीं खोल पा रही थी।
5
“ कार्येषु दासी, कर्णेषु मंत्री
भोज्येषु माता, शयनेषु रंभा
क्षमाया धरित्री ”
 
डॉक्टर शुक्ल ने यह श्लोक उस दिन सुनाया था। उस समय उस आदमी की हालत गंभीर थी। लीवर सिरोसिस से पीड़ित था वह। वह आदमी लगभग लगातार उल्टी करने से निस्तेज होकर पड़ा हुआ था। शरीर का तापमान कम नहीं हुआ था। यद्यपि हर्षा शुरु से ही उस आदमी को पसंद नहीं करती थी, मगर वह संकट के समय  उसे नहीं छोड़ सकती थी। वह बहुत अच्छी तरह से जानती थी कि वह ठीक हो जाएगा तो अपना दोगुना पौरुषत्व दिखाएगा।
 
ऐसा कहा जाता है कि इंसान का दिल इतना नरम होता है कि यदि कोई व्यक्ति कुछ दिनों तक शैतान के साथ रहता है, तो भी दोनों माया के बंधन से बंध जायेंगे। बेशक, वह उस आदमी के साथ छह महीने रही। लेकिन पता नहीं क्यों उसके सीने में ममता का फूल नहीं खिला ?
 
मेरे पिताजी और चाचाजी शादी से पहले दामाद की स्थिति देखने गए थे। वह मेरे पिताजी के पुराने दोस्त के पुत्र थे, इसलिए आपत्ति होने का सवाल ही नहीं था। मगर औपचारिकतावश दोनों टाटानगर गए थे। वह अस्पताल में नहीं मिला।  चपरासी उन्हें  क्वार्टर में ले गए। घर अंदर से बंद था। पड़ोसियों ने बताया कि उन्होंने कल सुबह से डॉक्टर को घर से बाहर नहीं देखा था। अंदर सो गए लगते  है। दोपहर का समय था। मेरे पिताजी और चाचाजी दोनों दरवाजा खटखटाते-खटखटाते थक गए थे। भीतर कोई होता तो निश्चय बाहर आ जाता। पड़ोसी और क्या कहते? कहने लगे, अगर बाहर गए है तो उन्हें मालूम नहीं है। पिताजी  और चाचाजी ने  दरवाजे की फांक से अंदर झांकते हुए देखा कि वह आदमी फर्श पर सो रहा है। उसने अपनी पैंट में पेशाब किया था, जिसकी छाप फर्श पर दिखाई दे रही थी, जिसके चारों ओर चींटियां ही चींटियाँ। अगर उन्हें उसके  खर्राटों की आवाज नहीं सुनाई पड़ती, तो वे सोचते कि वह आदमी मर चुका था। मेरे पिताजी बहुत निराश हो गए थे। उन दिनों वे भयानक मानसिक द्वंद्व से गुजर रहे थे। मेरे चाचाजी ने बताया कि जिस अस्पताल में वह काम कर रहा है, वह बहुत बड़ा था। डॉक्टर के रूप में उसकी उच्च प्रतिष्ठा है। क्वार्टर भी बहुत बड़ा था। तुम्हें इतना चिंतित होने की जरूरत नहीं है, शादी के बाद वह निश्चित रूप से बदल जाएगा। सभी लोग चाचा की बातों से सहमत हुए थे। हर्षा से किसी ने राय नहीं पूछी। चाचाजी ने उत्साहित होकर कहा, “ हम जिस टैक्सी से स्टेशन से उसके घर गए थे, टैक्सी वाला कह रहा था कि डॉक्टर साहब का ऑपरेशन में हाथ बहुत साफ है। लेकिन ...”
 
'लेकिन' शब्द ने मेरी माँ को चौंका दिया था। आखिर वह एक माँ थी; उस आदमी के पीने की आदत की खबर पहले ही उसके कानों में पहुंच चुकी थी, वह अपनी बेटी को उस आदमी के हाथ में देने से डर रही थी वह। "
 
"'यह एक आदत है”, चाचाजी ने कहा, 'अकेला आदमी है इसलिए। सब-कुछ शादी के बाद ठीक हो जाएगा। ''
 
हां, उस आदमी का अच्छा नाम था, शल्य चिकित्सा में सिद्ध-हस्त, मगर उसका हृदय ? यही कारण है कि उसने हर्षा के हृदय को छूने से पहले उसके शरीर को छुआ।
 
वह जैसे ऑपरेशन टेबल पर है
श्वेत-चादर से ढका उसका निर्जीव शरीर
हरे रंग के अप्रोन- मुखौटे के नीचे
दो आँखें चमक रही थी
उसके एक हाथ में चाकू और दूसरे में फोरसेप
उसके दुःख-दर्द उसकी पहुंच से परे
हृदय से कविता की एकाध पंक्ति तक नहीं
 
जैसे वह केवल जानता हो
अलिंद, निलय, शिरा-प्रशिरा,
हृदय केवल एक मांसल यंत्र
नहीं, उसे मालूम नहीं, कहाँ छुपा है
कविता का ठिकाना
 
उसने हर्षा को निचोड़ा-दबाया
दर्द से बिलबिलाती
देह बनकर वह ऑपरेशन टेबल पर
 
उसकी यंत्रणा उस आदमी की पहुंच से परे।
  दस्ताने उसके दोनों हाथों में
उसके कोमल युग्म-फूलों पर
उसके हाथ
  सिहरनविहीन, कर्कश
जो स्पर्श उसे सिहरित करता
उससे वह आहत, जर्जरित
तभी क्रूर व्यक्ति का चाकू के साथ अंधेरी गली में प्रवेश
मानो अनेक युगों से भूखा एक
अपनी अभुक्त क्षुधा मिटाने हेतु
लग गया हो एक आसुरी खेल में निरंतर
 
(क्रमशः अगले भागों में जारी...)

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर

-----****-----

-----****-----

|नई रचनाएँ_$type=list$au=0$label=1$count=5$page=1$com=0$va=0$rm=1

.... प्रायोजक ....

-----****-----

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

~ विधाएँ ~

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---


|आपके लिए कुछ चुनिंदा रचनाएँ_$type=blogging$count=8$src=random$page=1$va=0$au=0

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3844,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,336,ईबुक,192,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,257,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,105,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2787,कहानी,2116,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,486,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,130,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,90,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,22,पाठकीय,61,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,329,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,327,बाल कलम,23,बाल दिवस,3,बालकथा,50,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,9,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,17,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,238,लघुकथा,834,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,7,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,315,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,62,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1921,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,649,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,688,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,55,साहित्यिक गतिविधियाँ,184,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,58,हास्य-व्यंग्य,68,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: विषादेश्वरी भाग 5 // उड़िया उपन्यास // सरोजिनी साहू // अनुवादक - दिनेश कुमार माली
विषादेश्वरी भाग 5 // उड़िया उपन्यास // सरोजिनी साहू // अनुवादक - दिनेश कुमार माली
https://1.bp.blogspot.com/-Q2JBz1J_hE8/Ws1p0vqaDII/AAAAAAABAso/2xoX1sTKN7kiy3_4Pe4Gb7Rz_lhlggcmQCLcBGAs/s320/vishadeshvari.jpg
https://1.bp.blogspot.com/-Q2JBz1J_hE8/Ws1p0vqaDII/AAAAAAABAso/2xoX1sTKN7kiy3_4Pe4Gb7Rz_lhlggcmQCLcBGAs/s72-c/vishadeshvari.jpg
रचनाकार
http://www.rachanakar.org/2018/04/5_6.html
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/2018/04/5_6.html
true
15182217
UTF-8
सभी पोस्ट लोड किया गया कोई पोस्ट नहीं मिला सभी देखें आगे पढ़ें जवाब दें जवाब रद्द करें मिटाएँ द्वारा मुखपृष्ठ पृष्ठ पोस्ट सभी देखें आपके लिए और रचनाएँ विषय ग्रंथालय खोजें सभी पोस्ट आपके निवेदन से संबंधित कोई पोस्ट नहीं मिला मुख पृष्ठ पर वापस रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरूवार शुक्रवार शनिवार रवि सो मं बु गु शु शनि जनवरी फरवरी मार्च अप्रैल मई जून जुलाई अगस्त सितंबर अक्तूबर नवंबर दिसंबर जन फर मार्च अप्रैल मई जून जुला अग सितं अक्तू नवं दिसं अभी अभी 1 मिनट पहले $$1$$ minutes ago 1 घंटा पहले $$1$$ hours ago कल $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago 5 सप्ताह से भी पहले फॉलोअर फॉलो करें यह प्रीमियम सामग्री तालाबंद है चरण 1: साझा करें. चरण 2: ताला खोलने के लिए साझा किए लिंक पर क्लिक करें सभी कोड कॉपी करें सभी कोड चुनें सभी कोड आपके क्लिपबोर्ड में कॉपी हैं कोड / टैक्स्ट कॉपी नहीं किया जा सका. कॉपी करने के लिए [CTRL]+[C] (या Mac पर CMD+C ) कुंजियाँ दबाएँ