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विषादेश्वरी भाग 6 // उड़िया उपन्यास // सरोजिनी साहू // अनुवादक - दिनेश कुमार माली

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भाग 1 भाग 2 भाग 3 भाग 4   भाग 5 डॉ शुक्ला, सी॰एम॰ओ॰ ने अपने कनिष्ठ डॉक्टर की स्थिति की जांच की। हर्षा एक कुर्सी में उसके पास बैठी...



भाग 1 भाग 2 भाग 3 भाग 4  भाग 5
डॉ शुक्ला, सी॰एम॰ओ॰ ने अपने कनिष्ठ डॉक्टर की स्थिति की जांच की। हर्षा एक कुर्सी में उसके पास बैठी हुई थी। ड्रिप बहुत धीमी गति से चल रही थीं। जैसे  बूंद-बूंद कर जीवन भीतर घुस रहा हो। हर्षा की इच्छा हो रही थी कि ड्रिप की गति तेज कर दें ?  उसे डिटोल और आयोडिन की तेज गंध वाले अस्पताल से मुक्ति मिल जाती। रिश्तेदार अभी तक उस जगह नहीं पहुंचे थे। डॉ॰ शुक्ला ने उसे अपने कक्ष में बुलाया। वे उसके पिताजी की उम्र के सज्जन व्यक्ति लग रहे थे। उन्होंने कहा, "बैठो बेटी ! तुम्हें कुछ कहना है। तुम मेरी बेटी की तरह हो। इसलिए मैं कह रहा हूँ। तुम नव-विवाहित हो। महापात्र क्यों नहीं संभालती हो? उसकी हालत देख रही हो?  यदि तुम चाहोगी तो सब-कुछ ठीक कर सकती हो। "

हर्षा की आंखों में आँसू छलक पड़े। पता नहीं क्यों, डॉ॰ शुक्ला ने कहा, "मुझे पता है, तुम पर कितना अत्याचार हो रहा है। मैं तुम्हारे दुख कोसमझ सकता हूं। तुम्हारा तो जीवन अभी शुरू हुआ है। अभी बहुत दूर तक जाना है। जो भी वह करता है, तुम दोनों के लिए हानिकारक है। केवलमहिला ही उसे ऐसा करने से रोक सकती है। क्या वह तुम्हारी बात नहीं सुन रहा है? तुम्हें पता है, वह एक बहुत अच्छा डॉक्टर है। लेकिन इस आदत के कारण उसका केरियर कभी भी खराब हो सकता है। तुम तो देख रही कि हम सभी को उसे सामान्य स्थिति में वापस लाने के लिए कितना प्रयास कर रहे हैं। ठीक होने में थोड़ा देर हो सकती है, लेकिन वह अच्छे हो जाएंगे। लेकिन दोबारा ऐसी अवस्था नहीं होनी चाहिए। डॉक्टर कोई भगवान नहीं है, जो किसी को जीवन-दान दे सकते हैं। "
हर्षा पत्थर की मूर्ति की तरह बैठ रही। कह नहीं पाई, दक्षिण-दिशा की खिड़की खोलकर सारी रात इंतजार करने वाली लड़की की कहानी। कह नहीं पाई कि वह केवल एक शरीर है, आत्मा नहीं।
डॉ शुक्ला ने कहा, " मनु का एक श्लोक यादनहीं है? एक पत्नी को कितनी अलग अलग भूमिकाएं निभानी पड़ती है?”
“ कार्येषु दासी, कर्णेषु मंत्री
भोज्येषु माता, शयनेषु रंभा
क्षमाया धरित्री ”

हर्षा को इस पुराने डॉक्टर पर बहुत गुस्सा आ रहा था। वह उसे उपदेश क्यों दे रहा है ? हर्षा इस आदमी अलग-अलग भूमिका क्यों निभाएगी, चाहे वह उसे प्यार करता है या नहीं, यह भी अभी तक उसे मालूम नहीं है ? वह यह भी नहीं जानती कि यह आदमी रात भर कहाँ गया था। डॉ॰ शुक्ला ने उसे उपदेश देने के बजाय आदमी को क्यों निलंबित नहीं किया? क्या उसे मालूम है कि अगर हर्षा ने अपना मुंह खोलेगी तो वह उसे बेरहमी से पीटेगा?
क्या सोचकर मनु ने नारी को टुकड़ों में बाँट दिया? ऐसा क्यों नहीं सुझाया कि आदमी को औरत का दिल कैसे जीतना चाहिए? हर्षा समझ नहीं सकी कि क्या मनु का यह नियम नारी की रक्षा के लिए था, या नारी की दुरावस्था इस नियम के कारण है।

समाचार मिलते ही उस आदमी के माता-पिता वहां पहुंच गए। कुछ दिनों तक उन्होंने अपने बेटे को  विशृंखलित जीवन के लिए दोषी ठहराया, लेकिन धीरे-धीरे उनकी राय बदलती गई। उसकी सासूजी ने कहा: " उसके मन में बहुत दुख है। तुम्हारे पिता ने दो लाख रुपये दे दिए और फिर चुप बैठ गए। उनके स्टेटस के अनुसार दो लाख ठीक है? तुम्हारे पिताजी मेरे पति के बचपन के दोस्त हैं, इसलिए हम चुप रहे। मगर बेटे का मन शांत नहीं हुआ है ? आजकल ऐसे लड़के पाना वास्तव में मुश्किल है। देखो, उन्हें डॉक्टर जैसा दामाद कैसे मुफ्त में मिल गया ? "
पैसों के साथ हृदय का क्या संबंध है ? अगर पिताजी ने ज्यादा दहेज दिया होता तो क्या आदमी बदल गया होता ? क्या वह पीने की पुरानी आदत छोड़ देता? क्या वह पूरी दुनिया हर्षा पर बलिदान कर देता ? क्या वह उस पर प्रेम-चांदनी न्यौछवार करता ? क्या वह उसे सुरीले गीतों से झूले में झूलाता ? अगर किसी नारी के लिए डॉक्टर या किसी अधिकारी का कोई मूल्य है, तो क्या वह अपने प्यार से  वंचित रहेगी ?

एक दिन उसकी ननद ने उसे एक प्रिय सहेली की तरह बताया कि किश्कू अपने भाई के पतन के लिए जिम्मेदार है।
"किश्कू? यह किश्कू कौन है? "
"मेरा भाई मरीयम किश्कू नामक एक आदिवासी महिला डॉक्टर से शादी करना चाहता था। ब्राह्मण होने के नाते, एक ईसाई के साथ शादी कैसे हो सकती थी? जानती हो, भाभी, किश्कू बहुत दारू पीती थी। भाई के पीने की आदत वहीं पैदा हुई। "
किश्कू ने उसे पीना सिखाया था, उसने उसे प्रेम भी सिखाया होगा, हर्षा ने सोचा, लेकिन प्रेम कहाँ गायब हो गया? नहीं, ये सब झूठ हैं,। केवल सांत्वना, केवल बहानेबाजी है।
हर्षा ने फोन पर अपनी मां को बताया: "आपने मेरी इच्छा के विरुद्ध विवाह कर दिया। मेरा जीवन इस आदमी के साथ नरक बन गया है। आओ और देखो कि आपकी बेटी इस नर्क में कैसे जी रही है। "
"जब तक तुम्हारे बच्चे नहीं होते है, तब तक मैं तुम्हारे घर कैसे आ सकती हूं? जब तुम्हारे बच्चे हो जाएंगे, देखोगी, अपने आप सब-कुछ ठीक हो जाएगा। उसका अपने परिवार और घर के प्रति मोह पैदा हो जाएगा। जो भी हो, बच्चे अपना खून होते हैं। "

कब से उसका शरीर सूखे खेत की तरह हो गया था। दरारें पड़ने लग गई थी मिट्टी में, वह आदमी व्यर्थ में बीज बोते जा रहा था। जब मिट्टी से कोई लगाव या स्नेह नहीं होगा, तो कभी फसल उग सकती है। 
फसल? व्यर्थ। हर्षा को कभी भी इस बात का खेद नहीं था। बल्कि वह खुश थी कि वह मुक्ति के मार्ग की कल्पना कर सकती थी। जब भी वह घर लौटगी, तो अपने पिताजी को बताएगी कि उन्होंने घाटे का सौदा किया है। "आप एक असफल व्यापारी हो, आपने जिसे दो लाख रुपए में खरीदा था, उसकी अच्छे ढंग से पूछताछ क्यों नहीं की। "
हर्षा आदमी से कुछ भी नहीं बोल पाती थी। एक बार उसने विरोध किया था, तो उस आदमी ने उसे धक्का दे दिया था। "तुम एक बित्ता की लड़की हो और मुंह लगती हो। "

टेबल के किनारे से टकराकर वह धराशायी हो गई थी। उसे चिढ़ाने के लिए उसने अपने लंबे पाँव टेबल पर रखकर बोतल पीने लगा। उसके बाद वह घर छोड़ कर चला गया और उस दिन नहीं लौटा।
पास-पड़ोस के लोग उसकी पीने की बुरी आदत के कारण उसके घर जाना पसंद नहीं करते थे। लेकिन जब वह बीमार हुए तो वे लोग देखने अवश्य आए। एक बार शराब पीकर क्लब में अपनी पैंट खोल दी थी, इसलिए कोई भी महिला उसके घर आने की हिम्मत नहीं करती थी। लेकिन फिर भी कहते कि वह बहुत अच्छा डॉक्टर है। मरीजों को स्पर्श करते ही ठीक हो जाते थे। भगवान का यह कैसा प्रहसन है ? शैतान के हाथ में जादू की छड़ी दे दी है ? छूते ही रोगी स्वस्थ हो जाते हैं? जबकि वह उसके नरम दिल को छूने में समर्थ नहीं है ? इसमें हर्षा की गलती कहाँ है? वह किश्कू की जगह लेने यहां नहीं आई थी। इसके अलावा, उसके और किश्कू में बहुत अंतर है। अगर उसे प्रेम मिले, तो क्या वह उसे बदले में प्रेम नहीं देगी ?

नहीं, किश्कू कारण नहीं थी। हर्षा को एहसास हुआ कि यदि किश्कु ने भी उस आदमी से विवाह किया होता, तो उसका भी भाग्य वैसा ही होता। सास ने कहा कि बचपन से ही इसको बहुत लाड़-प्यार मिला था; वह छह बेटियों के बाद इकलौता बेटा पैदा हुआ था, इसलिए उसकी मांगों को तुरंत पूरा किया जाता था, नहीं तो फिर प्रलय हो जाता। एक बार जब वह चार साल का था, तो उसके पिताजी उसे पेशाब कराने के लिए बाहर ले जा रहे थे। लेकिन वह इतना क्रोधित हुआ था कि उसने पिता के ऊपर पेशाब कर दिया। मगर पढ़ाई में वह बहुत तेज और बुद्धिमान था।

हर्षा आश्चर्यचकित थी अपने पिताजी पर उसके पेशाब करने की कहानी को उनकी सास दिग्विजय के रूप में सुना रही थी।
उसके दादाजी की मृत्यु हो गई। हर्षा पुरी आई। वह अपने पति के घर और नहीं लौटेगी, इस जिद्द पर अडिग थी। "जिनके लिए आपने मेरी शादी करवाई थी, वे तो अब दुनिया में नहीं है, अब आपको किसी भी तरह की सफाई नहीं देनी पड़ेगी, आप मुझे यहाँ रहने दे, मैं वहां नहीं जाऊंगी। सच कहती हूँ, मैं किसी पर बोझ नहीं बनूँगी। मुझे जाने के लिए और मत पूछना। "
घर में तूफान पैदा हो गया था।
पिताजी ने कहा, "मैं अपना चेहरा कैसे दिखाऊंगा? किसे क्या जवाब दूंगा ? लोग क्या कहेंगे मुझे ? तुम छोटी हो ये सारी बातें तुम्हारी समझ में नहीं आएगी। "
" अगर मैं छोटी बच्ची हूँ तो आपने मेरी शादी क्यों करवाई ? मेरी सहेलियाँ स्नातकोत्तर कर रही हैं, मैं भी अपनी पढ़ाई जारी रख सकती थी। "

वह आदमी भी उसे छोटी लड़की कहता था। लेकिन इतनी छोटी लड़की देखकर चेहरा क्यों बिगाडता था! हर्षा नाखुश थी। उसकी उम्र थी चौतीस साल, उससे चौदह वर्ष बड़ा। लगातार पीने से मोटापा बढ़ गया था। हर्षा ने कभी नहीं सोचा था कि ऐसा आदमी उसके जीवन में आएगा। काश! वह नहीं पीता होता और नहीं वह पीकर अपने होश खोता। पता नहीं, शराब का नशा उतर जाने के बाद उसके शरीर में दर्द नहीं होता। शायद सब कुछ भूलकर उसने अपनी भावनाओं के साथ समझौता कर लिया था। अधिक नहीं तो, एडजस्टमेंट करने से जीवन कट जाता। मगर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, वह आदमी कभी भी उसका दोस्त नहीं बन सका।

हर्षा अपनी मां को सब-कुछ नहीं बता पाई। वह आदमी शराब के बोतल की तरह उसके शरीर से प्यार करता था। वह आदमी उसके शरीर से प्यार करता था क्योंकि उसे शराब से प्यार था। शराब की बोतल के प्रति उसकी ममता थी, लेकिन उसके प्रति कोई लगाव नहीं था। माँ ने कभी ध्यान नहीं दिया कि शरीर के अंदर एक सूक्ष्म मन भी है। "मेरी बातों को बच्चों की बातें समझकर नजरंदाज मत करो, इस शरीर और मन को दुख पहुंचता है। "
माँ ने हर्षा की करीबी सहेली सरिता को बुला दिया, हर्षा के मन की वेदना को जानने के लिए। सरिता हर्षा की बातें सुनकर हंसने लगी: "क्या तुम पागल हो? यह नहीं मिलने से लड़कियां पागल हो जाती हैं और तुम कहती हो कि यह तुम्हारे दुख का कारण है, तुम्हारी वेदना का कारण है।

वह सरिता को समझा नहीं सकी अथवा सरिता उसे समझ नहीं पाई ? सरिता समझने लगी कि हर्षा नखरे कर रही है। सभी की यह ही राय थी। दया करने के बजाय उन्हें क्रोध आने लगा।
हर्षा किसी को भी अपना दुःख या पीड़ा नहीं समझा सकी। वह अपनी सबसे बड़ी बुआ के पास गई और कहने लगी, "महिलाओं को इतना दुख क्यों मिलता है?"
बुआ ने हँसते हुए कहा: "सभी कान्हा की लीला है। तुम किस दुख के बारे में बात कर रही हो? मुझे क्या पता, ससुराल या पति का प्यार क्या होता है? कान्हा का ध्यान करो और सब-कुछ ठीक हो जाएगा। "
धत्! उसे बुआ से सुझाव नहीं लेना चाहिए था, जिसने सुहाग-रात तक नहीं देखी हो? हर चीज उसकी कल्पना है जैसे कि उसका कान्हा।

छोटी बुआ भी हर्षा को समझाने आई। "यह बात तुम्हारे ससुराल तक न चली जाए, इसलिए तुम बात को मत बढ़ाओ, बेटी। पुरी से तुम्हारा ससुराल है कितनी दूर! अगर ये बातें उनकी कानों तक पहुंच गई तो वे तुम्हारे चरित्र पर संदेह करेंगे। छोटी बुआ ने शादी के समय आई॰ए॰ पूरा किया था, उसके बाद वह फूफाजी के प्रयास से वह बी॰ए॰, बी॰एड॰कर प्रशिक्षित स्नातक बन गई। अब वह एक शिक्षिका थी। फूफाजी साई कॉलेज में व्याख्याता थे। बुआ ने फूफाजी को हर्षा की समस्या के बारे में अवश्य बताया होगा। घर में सभी को मालूम है यह बात। पहली बार उसे संकोच महसूस हो रहा था। अपने माता-पिता पर बहुत गुस्सा आ रहा था।
छोटी बुआ ने उसे सांत्वना दी: "तुम्हारी बातें सुनकर लोग हंसते हैं? मुझे सच बताओ, क्या वह आदमी तुम्हारे साथ अप्राकृतिक संबंध रखता है? "
"'अप्राकृतिक' का मतलब क्या है? “

सरिता के समान उसकी भी यह ही राय थी: "यदि संबंध अप्राकृतिक नहीं है, तो समस्या क्या है?"
" मेरे अंतरात्मा में भयानक दर्द है। मुझे लगता है कि आदमी मेरे और वेश्या के बीच कोई अंतर नहीं समझ रहा है। नशे में उसे बर्दाश्त किया जा सकता है। हां, नशे की हालत में उस आदमी पर दया आती है। लेकिन अगर वह नशे में नहीं है, तो मुझे ज्यादा अपमान लगता है। जानती हो, सरिता, हर बार इस शरीर के रथ पर चढ़ने समय वह मुझे कुछ-न-कुछ उपहार देता है। कभी झुमके की जोड़ी, कभी साड़ी। कभी मेरी गोद में बहुत सारे सिक्के डाल देता है। क्या मुझे इन सभी की आवश्यकता है? यदि वह आदमी घर सजाने में मेरी मदद करता, खाना बनाने में मेरी मदद करता और झुमके के बजाए मेरे लिए कुछ 'जलेबी' खरीदकर लाता, तो मुझे बहुत अधिक खुशी होती। वह आदमी मेरे शरीर का मालिक बनता है तो कम से कम एक बार ही सही वह इस शरीर की प्रशंसा तो कर सकता था। मुझे पता है, आप लोगों को मेरी पीड़ा कभी महसूस नहीं होगी। "
सरिता ने पूछा: "यदि तुम्हें कोई और दुःख है, तो बताएं; हम कुछ रास्ता खोज लेंगे। "

हर्षा ने उत्तर दिया: "आप लोग क्या उपाय करेंगे? क्या आप जानते हैं, वह आदमी निर्लज्ज है। यहां तक ​​कि घर में सभी की उपस्थिति में भी वह मुझे अंदर ले जाता है और अंदर से दरवाजा बंद कर देता है। उस पल मैं अपने शरीर को धिक्कारने लगती हूँ। "
सरिता कुछ समय के लिए चुप बैठी रही। जैसे वह उत्तर की तलाश कर रही हो। केवल इतना कहने लगी:"मुझे देखो? मेरे माता-पिता मेरे लिए वर खोजते-खोजते परेशान हो गए हैं, लेकिन सब व्यर्थ। इस संदर्भ में तुम कितनी भाग्यशाली हो! जिसका ससुर डीएसपी हो, पति डॉक्टर हो, ऐसे कितने भाग्यशाली हैं? "
"भाग्य?" हर्षा उदास हंसी हंसने लगी "मैंने कितनी रातें दक्षिण-खिड़की के पास बिताई हैं इंतजार करते हुए, गेट के चरमराने, कालिंग बेल की आवाज या दरवाजे के कड़ों की खनखनाहट सुनते हुए, सिल्हूट दूरी से जूतों के आवाज की कल्पना करते हुए। सरिता, क्या तुमने कभी कल्पना की उस आदमी की , जो नशे के घोड़े पर सवार होकर आधी रात या सुबह-सुबह घर लौटता हो? "

सरिता ने पूछा: "क्या तुम सच कह रही हो या बढ़ा-चढ़ाकर ? कभी-कभी मुझे विश्वास नहीं होता तुम्हारी बातों पर। बीच-बीच में डाक्टरों को आपातकालीन ड्यूटी करनी पड़ती है। कभी-कभी उन्हें आधी रात को बुलाया जाता है। कभी-कभी उन्हें बाहर बहुत समय बिताना पड़ता हैं। वे रोगी को मौत के मुंह में छोड़कर नहीं आ सकते है। "
हर्षा उस आदमी के प्रति सरिता की सहानुभूति देखकर आश्चर्यचकित थी। क्या वह उसकी सहेली है या मेरी ? उसने केवल इतना ही कहा: "मैं इतनी छोटी नहीं हूं कि मुझे ये सब बातें समझ में नहीं आएगी। ठीक है, तुम मेरी सहेली नहीं हो, अगर होती तो मेरी मानसिक यातना को समझ पाती। "

सरिता से उसका विश्वास उठ गया था। लंबे समय से जीवन के प्रति भी उसका विश्वास खत्म हो गया था। इस बीच एक-दो महीने बीत गए, लेकिन वह वापस नहीं लौटना चाहती थी। धीरे-धीरे वह पूरे घर पर एक बोझ बन गई। जितना वह नहीं रोई , उससे ज्यादा उसकी मां रोई। बेटी ससुराल जाना नहीं चाहती थी। पिताजी पूरी तरह से परेशान हो गए थे। कैलिफोर्निया से भाई ने उसे मनाने की पूरी कोशिश की। अंत में, केवल उसने ही उसका दर्द समझा। वह आदमी जरूर टार्चर करता है, अन्यथा हर्षा क्या पागल है जो अपने ससुराल नहीं जाना चाहती है ?
जैसे ही हर्षा ने अपनी आँखें बंद की तो उसे अपने सामने भयंकर अंधेरा नजर आने लगा, मानो उसके सपने टुकड़े-टुकड़े हो गए हो, उसके जीवन का अंत हो गया हो और आगे कुछ भी नजर नहीं आ रहा था। आँखें खोलते ही चारों ओर शून्य ही शून्य। उसे किसी से भी बातें करना अच्छा नहीं लग रहा था। मां रोते-रोते छत पर चली गई। क्या मां यह चाहती है कि वह फिर से यातना के कुएं में डुबकी लगा दें ?

उसने स्वयं को सभी से पृथक कर लिया था। घर में बैठकर किताबें पढ़ने लगी। शेक्सपियर से लेकर दादाजी की पुरानी पुस्तक-पत्र सभी। वेदों और उपनिषदों को पढ़कर उसने अनेक चीजों की जिनकी उसे जानकारी नहीं थी, पढ़ने लगी। वह इन बौद्धिक गतिविधियों में अपने सारे दुःखों को भूल गई थी।
उसके ससुराल वाले पुरी आए। कितने बहाने कर हर्षा की वापसी को घर वाले रोक सकते थे ? सास ने पूछा, " और कितने महीनों तक अपनी बेटी को रखोंगे?"
"बेटे को वहाँ दिक्कत हो रही है। "

हर्षा ने जिद्द पकड़ ली कि वह और नहीं जाएंगी। अंदर से दरवाजा बंद कर बैठी रही। उसके पिता, मां और अन्य सभी ने दरवाजा खटखटाया, लेकिन उसने कुछ जवाब नहीं दिया। मँझली बहन भोपाल से आई थी।
" तुम यहाँ क्या नाटक कर रही हो? रिश्तेदार तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं, "माँ ने कहा "दरवाज़ा खोलो, हर्षा, अन्यथा मैं ज़हर खा लूंगी, सच कह रही हूँ। "
घर में शोरगुल, दरवाजे पर खटखटाहट, रोना-धोना उसके ससुराल वालों के कान में कैसे नहीं पहुंचता ?
सास ने पूछा: "क्या आपकी बेटी पहले किसी और से प्यार करती थी? पुलिस अधिकारी की पत्नी होने के कारण पूछताछ कैसे नहीं करती ? "

"हे भगवान, मैं पहले यह जानती तो उसे बहू के रूप में बिलकुल स्वीकार नहीं करती। "
माँ ने दहलीज पर अपना सिर पीटना शुरू किया। हर्षा अपने को और संभाल नहीं पाई , इसलिए उसने दरवाजा खोल दिया। नहीं, वह अपने बारे में और नहीं सोचेंगी। भले ही, वह उस आदमी द्वारा बार-बार बलात्कार का शिकार हो जाएगी, मगर वह अपने माता-पिता को कभी दुखी नहीं करेगी।
उसने अपनी मँझली बहिन की सहायता से सूटकेस सजाया। अपनी साड़ी बदली। माँ उसे अपने ही हाथों से पखाल (चावल) खिलाना चाहती थीं, लेकिन हर्षा खा नहीं सकी, उसे बार-बार उल्टी करने का मन हो रहा था।
सास ने उससे कहा, जितनी जल्दी हो सके तैयार हो जाओ, क्योंकि उन्हें गांव के रास्ते से जाना है और देर होने से अंधेरा हो जाएगा।

हर्षा का चेहरा लाल, नथुने लाल और आँखें लाल हो गई , फिर उसकी आँखों से आँसू गिरने लगे। वह गाड़ी में बैठ गई। पिताजी ने कहा: " पहुंचने के बाद फोन करना, बेटी"। हर्षा ने उनकी आँखों में आँसू की छुपी हुई बूंदें देखी। अभी तक पिताजी चिंताग्रस्त थे, कभी उनकी आँखों में आँसू नहीं आए थे, उसके ससुराल पहली बार जाते समय भी, लेकिन इस बार उनकी आँखों में आंसू आ गए थे। आखिर, वह कर भी क्या सकते थे?
“देट इज द डेस्टिनी ऑफ ए वुमेन। "

वे लोग पुरी से बाहर आए। उसका सिर घूमने लगा। रास्ता-घाट धुंधले दिखाई देने लगे। अंधेरा छाने लगा था। उसके पेट में दर्द होने लगा। उसे उल्टी जैसा लगने लगा। चारों ओर धुंधला अंधेरा। उसकी इच्छा हो रही थी, किसी को कहने की। अंधेरे में वह बिन्दु होती जा रही थी।
सास को लगा, शायद कुछ खा लिया है: "देखो, उसके साथ क्या हुआ है? क्या हुआ? क्या? उसके अंग सुन्न और बेजान होते जा रहे हैं, क्या कुछ लिया है? सच बताओ, तुमने क्या खाया है? देखो, उसने क्या किया है?"
गाड़ी बंद कर ससुर पीछे की सीट पर पहुंचे।
"गाड़ी चालू कर, चलें, चलो, आस-पास कहीं अस्पताल। "

"सच बता, तुमने क्या खाया है?" सास बार-बार पूछ रही थी। हर्षा कोई शब्द नहीं बोल पाई। दाँत भींच रहे थे। वह अंधेरे में एक बिन्दु बनकर रह गई थी। सास मुंह लटकाकर उस पर पड़ी हुई थी। उसकी आँखें बंद होती जा रही थीं। वह इसे रोक नहीं पा रही थी। सास चिल्लाने लगी:"तुमने क्या खाया है, चांडाली? मैंने तुम्हें क्यों लाया?" कहीं पर गाड़ी रुकी। कोई उसे उठाकर ले जा रहा था, वह अभी भी तंद्रावस्था में थी। किसी ने उसे टेबल पर सुला दिया। "हमें बताओ कि तुमने क्या खाया है?"
वह तकलीफ से जीभ उठाने का प्रयास कर रही थी, बहुत कष्ट से होंठ हिलाने की चेष्टा कर रही थी। बहुत ज़ोर लगाकर कुछ कहने की कोशिश कर रही थी।
उसके चेहरे पर झुककर किसी ने पूछा, "क्या तुमने ज़हर लिया है?"
"नहीं, आल आऊट , आ...ऊ....ट .....आऊट। "
6.
पता नहीं, रात के कितने बजे होंगे, कांपते कोमल पत्ते की तरह पहली वर्षा की बूंदों से देह में उठती सिहरन की तरह, सुनसान रात में झरने की कल-कल की तरह कंपन करते हुए नीरव हो गया उसका मोबाइल फोन। हर्षा को नींद नहीं आ रही थी। सुख-दुःख के सारे अनुभव टुकड़े-टुकड़े होकर भावनाओं के कोलाज बन गए। बिस्तर पर पड़े-पड़े बार-बार वह करवट बदल रही थी, शायद तभी एक मैसेज उसके मोबाइल पर आया। लेकिन इतनी रात को ? इस समय किसने एसएमएस भेजा होगा ? उसने तकिया के नीचे से मोबाइल बाहर निकाला।
पिताजी ने उसे दिन में फोन किया था, जब वह अल्बर्टो के पास थी। भाई उसे कभी भी एसएमएस नहीं भेजता था। तब और कौन हो सकता है ? भैरवी या नवीना?

" माय स्वीट हार्ट, हाना, माय लव। सॉरी फॉर माय बिहेवियर व्हिच माइट हर्ट यू। माय डार्लिंग, आई एम सेंडिंग दिस टू टेल यू, हाऊ मच आई नीड़ यू एंड वांट यू। ए बिग किस, अल्बर्टों। "
हर्षा का शरीर पसीने से भीग गया था। उसने कमरे में लाइट लगाई। फिर से वह अल्बर्टो का मैसेज पढ़ने लगी। इतने दिनों के दौरान अल्बर्टो से पहला एसएमएस उसे मिला था। संभवत: वह एसएमएस से कुछ कहना चाहता था, जिसे वह मुंह से नहीं बोल पा रहा हो। क्या अल्बर्टो इतनी रात तक सोया नहीं ? वह बैठे-बैठे क्या कर रहा होगा? वह खुद पुस्तकों के ढेर में छिपा होगा या वह उसकी तरह सो नहीं पा रहा हो ? मानसिक द्वंद्व के कारण वह बिस्तर पर करवट बदल रहा होगा।

उस दोपहर में ऐसा क्या हुआ, जिसने उसका जीवन बदल दिया ? क्या उसने कभी सोचा था कि जिंदगी उसे ऐसे मुकाम पर लाएगी ? जैसे कोई उसके शरीर के चारों ओर एक सरीसृप की तरह, एक लता की तरह लिपट गया हो। कोई शायद नरम हथेलियों से उसके दोनों कोमल फूलों को स्पर्श कर रहा हो। कोई उसके कान में फुसफुसा रहा हो, समय बहुत कम है, बहुत कम; देखो, चंद्रमा आकाश में सिर के ऊपर है। किसी ने उसके होंठ छुए? कोई उसके शरीर को भेद रहा हो ? क्या इस शरीर में इतना सुख है जो शरीर भेदकर आत्मा को स्पर्श कर रहा हो? वह यह जानने में सक्षम नहीं है कि इस महेंद्र वेला में किसने दिया या किसने लिया?

हर्षा दोपहर के अनुभव से सिहर उठी। अल्बर्टो के बिस्तर पर उसने संतुष्ट किया था अपना रतिक्लांत शरीर। उसे नहीं पता था कि यह सब कैसे घटित हुआ। अपने दुःखों का पिटारा खोलकर बैठी वह, जिसे उसने कभी किसी से पहले नहीं कहा था। इतने दिनों के बाद निबुज कोठरी के सारे दुख बाहर निकल गए थे। क्या कुछ आँसू दुःखों के साथ लुढ़क गए थे? तब अल्बर्टो ने उसे अपनी छाती तक क्यों उठाया? उनके शरीर की दीर्घ जड़ता अचानक टूट गई और दोनों अनजाने में एक-दूसरे में विलय हो गए।

अल्बर्टो के स्पर्श से उसकी आँख लग गई। पता नहीं, कब वह पिघलना शुरू हुई।
उसने अपने आपको चारे की तरह फैला दिया था
झुक गए ईश्वर उस पर क्षुधार्त भंगी से
उसकी सारी नसों में दौड़ रही थी, एक प्रचंड क्षुधा
बुझाने के लिए ईश्वर की आशा
उसी ने 'विश्वरूप' सृष्टि का रहस्य दिखाया
ऊर्जा का मूल स्रोत, विज्ञान के सभी संसारिक तत्व

झुक गए ईश्वर उस पर प्रणाम भंगी से
लता गुल्म बिखरकर देखा ईडन का सेव-उद्यान
वासुकी की जीभ से चखी पहली कोमलता
होंठ से चाँटी अमृत-पात्र की आखिरी बूंद
शैतान भी बदल गया था उस पल
जिसे पाप समझ रही थी
अब पुण्य लगने लगा था।
पूर्णगर्भा नदी की तरह हर्षा परम तृप्ति से सो रही थी। अल्बर्टो बिस्तर पर मुंह मोड़कर सो गया था। वह उसके मन के भाव समझ नहीं पा रही थी। मानो वह सब-कुछ दान देकर निर्धन हो गया हो। हर्षा को उसे छूने से डर लग रहा था। दोनों निरुत्तर थे। जैसे बात करने के लिए कुछ भी नहीं था, न ही सुख और न ही दुख की बात।
जैसे पहली बार हर्षा अनुभव कर रही हो। अपने शरीर में बहते हुए झरने को। जैसे उसका जीवन पहले बार पूर्णता से भर गया हो। जबकि अल्बर्टो पास में लाश की तरह पड़ा हुआ था। धीरे-धीरे पैर संभालकर हर्षा बिस्तर से उठी। मगर अल्बर्टो वैसे ही मुंह मोड़कर पड़ा रहा। बहुत मन हो रहा था अल्बर्टो को सहलाने का। वह उसकी भावनाओं को जानना चाहती थी। यह दुर्बल आदमी उसे सबसे सुंदर दिखाई देने लगा। उसने कहा: "अल्बर्टो। "
अल्बर्टो बिस्तर से उठकर बैठ गया। उसकी दृष्टि में थी एक अद्भूत शून्यता। जैसे वह भीतर ही भीतर टूट रहा हो। जैसे वह भीतर से शून्य हो गया हो। कोई व्यथा उसकी आँखों से झलक रही थी। कुछ भी कहने से हर्षा को डर लग रहा था। अल्बर्टों हंसने लगा। वह हंसी उसके उदास मुंह पर अच्छी नहीं लग रही थी।

"तुम ठीक हो, अल्बर्टो? तुम दुखी नहीं हो तो? " वह इस तरह के बहुत सारे प्रश्न करना चाहती थी, मगर उसे डर लग रहा था। ऐसी घटना से किसी भी नारी का परेशान होना स्वाभाविक है। अपराध-बोध होना स्वाभाविक है। उसका अस्तित्व टूटकर टुकड़े-टुकड़े होना स्वाभाविक है। सब-कुछ हर्षा ने खोया था, मगर हो रहा था विपरीत। अल्बर्टो क्या अपने संयम खोने से दुखी था ? क्या यह बौद्ध अपने मन और आत्मा से अपने पाप-आचरण के लिए टूट गया है ? निवृत्ति मार्ग का अनुसरण करने वाला क्या यह आदमी प्रवृत्ति मार्ग की ओर कदम बढ़ाने के लिए दुखी है ? नहीं, ऐसे प्रश्न उठाने का यह समय नहीं है। उसे अकेले छोड़ देना ही बेहतर है:
"मैं जा रही हूँ , अल्बर्टो", हर्षा ने कहा।
नींद से उठते हुए अल्बर्टो कहने लगा: "बाय"

वह उसे छोडने के लिए बाहर तक भी नहीं आया। छाती में अतृप्त भावना के साथ वह बाहर निकली।
हर्षा को लगा कि जैसे कोई संन्यासी पथ-भ्रष्ट होकर दुःख में टूट गया हो, ऐसी स्थिति में वह उसे छोडकर आ गई। जो कुछ भी हुआ था, वह बिल्कुल पूर्व निर्धारित नहीं था, बल्कि केवल एक आकस्मिकता थी। मानो एक सुप्त कामना बहुत दिनों से इस मौके का इंतजार कर रही हो। एक पल के लिए इंद्रजाल के भूलभुलैया की तरह एक मायावी दुनिया में दोनों हाथ पकड़कर प्रवेश कर रहे हो। अल्बर्टो 'निर्वाण' की बात भूल गया था। हर्षा भी अपनी हिम-जड़ता को भूल गई। भूल गई अपनी पीड़ा।

फिर भी, वह नहीं जानती थी, क्यों वह अपराध-भावना से कुंठित हो गई है। और उस भयावह पल में उसे वह आदमी याद आने लगा। यद्यपि उसके और अल्बर्टो के बीच में स्वर्ग-पाताल का अंतर था। कभी भी उस आदमी ने उसे प्यार से अपने सीने से नहीं लगाया था; कभी सहलाते हुए दिलासा नहीं दिया था: "मैं हूँ, मैं तुम्हारे साथ हूं। " उसने उसके होंठों की कोमल पंखुड़ियों को छुआ तक नहीं। अल्बर्टो से उसे, जो कुछ भी क्षणिक सुख प्राप्त हुआ, वह उसे सारे जीवन कभी नहीं मिलेगा। अब कोई बात नहीं, अगर वह अहिल्या की तरह पत्थर भी हो जाए।
अल्बर्टो का पीला उदास चेहरा, उसकी सार-शून्य आंखें हर्षा का पीछा नहीं छोड़ रही थी। इससे तो प्राच्य-पाश्चात्य दर्शन के बारे में उनके तर्क, उनका प्रश्नोत्तरी खेल, दो गोलार्धों में सांस्कृतिक विभेद को लेकर उनके मतभेद की लड़ाई ज्यादा बेहतर थी। आखिरकार उसे लंबे समय के बाद दोस्त मिल गया था।

वह अपने कमरे में लौट आई। मगर अल्बर्टो का कोई फोन नहीं आया। उसे उम्मीद थी कि वह उसे शाम को फोन करेगा। मगर नहीं। क्या कहीं वह अपने अंतरंग दोस्त को खो तो नहीं देगी ? उसे डर लगने लगा। अगली बार जब वह अल्बर्टो से मिलेगी तो वह उसे बता देगी: "चलो भूल जाओ, जो कुछ हुआ। मैं तुम्हारा दुख समझ सकती हूँ, अल्बर्टो, पाप क्या शरीर में होता है? क्या यह शरीर की प्रवृति है? शरीर तो केवल एक नौकर है। मन उसे हमेशा चलाता है। और मन क्या है? मुझे बताएं कि मन से ज्यादा और कौन लंपट है ? मन ही लंपट मुनि है। "
कई बार अल्बर्टो को फोन करने की उसकी इच्छा हो रही थी। वह कहना चाहती थी कि बेहतर होगा कि जीवन को दर्शन के ढांचे में ढालने की तुलना में जीवन से दर्शन का आवरण हटाकर सामान्य तरीके से आगे बढ़ने दिया जाए।

"हे अल्बर्टो! ब्रह्मांड में मूल-शक्ति काम-शक्ति को मानने वाला व्यक्ति क्या शरीर से नफरत करेगा ? एक बार तुम्हीं ने प्रश्नोत्तरी के खेल में उत्तर दिया था कि ब्रह्मांड का मूल-उत्स यौन ऊर्जा है, फिर आज की इस घटना से आप दुखी क्यों हैं? क्यों तुम्हारी आँखों में कंगाल होने जैसी शून्यता दिखाई दे रही है?
अल्बर्टो! क्या तुम्हें लगता है कि ये सारी चीजें तुम्हारे 'साधना के रास्ते की बाधा हैं? क्या तुम नहीं जानते कि ज्ञान की संपूर्णता, केवल 'विद्या' या केवल 'अविद्या' से संभव नहीं है। सत्य दोनों 'विद्या' और 'अविद्या' के सामंजस्य से प्राप्त होता है। याद रखें, तुम्हें प्रवृति से दूर नहीं रहना है, बल्कि प्रवृति से होते हुए निवृत्ति मार्ग की ओर चलना हैं। शरीर और मन के सारे दरवाजे और खिड़कियां खुली रहनी चाहिए। प्रचुर आलोक, उत्ताप और जल से भर जाने दो तुम्हारा शरीर और मन। देखोगे उसके बाद तुम्हें कोई झिझक नहीं होगी; कोई भूख नहीं, कोई उम्मीद नहीं होगी और न ही कोई लालसा। मेरी छोटी बात मन पर मत लगाना। "

हर्षा को अचानक कहानी याद आ गई, पता नहीं कहाँ से, जिसे उसने अपने बचपन में सुना था। वह यह कहानी अल्बर्टो को सुनाकर उसकी प्रतिक्रिया देखना चाह रही थी।
एक बार एक गुरु और उसका शिष्य लंबा रास्ता तय कर गांव पहुंचे। वहाँ पहुँचते-पहुँचते थक गए थे। उन दोनों को बहुत भूख लग रही थी, मगर देर से पहुंचने के कारण उन्हें खाने के लिए कुछ नहीं मिला। आखिरकार एक गृहस्थ ने उनसे कहा कि अगर मांस खाने में आपको कोई आपत्ति नहीं है, तो आपका स्वागत है, क्योंकि मेरे घर में मांस के सिवाय कुछ नहीं है। गुरु ने निमंत्रण स्वीकार करते हुए मांस खाया, मगर शिष्य ने बीमारी का बहाना किया और बिना भोजन रह गया। अगले दिन वे एक और जगह के लिए रवाना हुए। उस घटना के बाद शिष्य की मानसिक शांति खत्म हो गई। वह अचानक इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि उसके गुरु बाहर से जैसे दिखाई देते हैं, वास्तव में वैसे नहीं हैं। गुरु के प्रति उसकी भक्ति कम होने लगी। धीरे-धीरे उसके मन में गुरु के प्रति घृणा पैदा हो गई और वह उनके साथ रहना पसंद नहीं करता था। एक दिन उसने गुरु के सामने अपनी इच्छा व्यक्त की। गुरु ने इसका कारण पूछा कि उसने उस दिन का घटना-प्रसंग सुना दिया कि किस प्रकार उसका मोहभंग हुआ था। उसे सुनने के बाद गुरु हँसे और कहने लगे, "मैं उसी दिन पूरी तरह से भूल गया था, जिस दिन मैंने मांस खाया था, मगर तुम इसे अभी तक नहीं भूले हो, भले ही, तुमने उसे स्पर्श नहीं किया। बताओ, फिर तुम अपने मन को 'साधना' तक कैसे साध सकते हो?

हो सकता है अल्बर्टो ने ऐसा विचार नहीं किया होगा, हर्षा ने अनुमान लगाया। शायद वह अपनी खूबसूरत पत्नी क्रिस्टिना के साथ किए गए विश्वासघात से परेशान हो गया हो। मगर एक दिन प्रश्नोत्तरी खेल के दौरान हर्षा विवाहेतर संबंधों पर उसकी राय जानना चाहती थी; अल्बर्टो ने कहा था कि इसमें कुछ भी गलत नहीं है, अगर किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचता है तो।
पता नहीं क्यों, शुरू में हर्षा अल्बर्टो के इस व्यवहार पर अपमानित अनुभव करने लगी थी। ऐसा होगा, यह उसकी कल्पना से परे था। जो कुछ घटा उसे सहज स्वाभाविक मानकर स्वीकार किया जा सकता था। क्या जरूरत थी यह नाटक करने की ? उस आदमी ने कई बार उसे अपमानित किया था, अल्बर्टो ने भी उसके प्रति अपनी मनोभावनाओं से घृणा व्यक्त की थी।

अल्बर्टो उसे क्या समझ रहा है, जानने की उत्सुकता उसके मन को दुखी कर रही थी, उसी वक्त उसका एसएमएस आया: " माय स्वीट हार्ट, हाना, माय लव। सॉरी फॉर माय बिहेवियर व्हिच माइट हर्ट यू। माय डार्लिंग, आई एम सेंडिंग दिस टू टेल यू, हाऊ मच आई नीड़ यू एंड वांट यू। "
हर्षा ने उस एसएमएस का जवाब नहीं दिया। हालांकि वह जानती थी कि अल्बर्टो भयानक मानसिक दबाव से गुजर रहा है। फिर से मोबाइल बजने लगा और उस तरफ से अल्बर्टो पूछने लगा: "तुमने मेरे एसएमएस का उत्तर क्यों नहीं दिया? क्या तुम सो गई थी? "

“मगर बदले में वह क्या जवाब देती? नहीं, मैं तुम्हारे व्यवहार से दुखी नहीं हूं ? या तुम्हारे व्यवहार पर मैं आश्चर्यचकित हूं? क्या इस तरह के जवाब का कुछ अर्थ हैं? मगर इस तरह की घटनाओं से आप जितना दूर रहेंगे, उतना ही बेहतर है। कुछ घंटों पहले अल्बर्टो वासना के दलदल में कूद पड़ा था। वही वासना अल्बर्टो के शून्य दृष्टि से उड़ गई थी बहुत समय से। भूल से वह चला गया था अंधेरे, घने जंगल के रास्ते में, मगर फिर से उसे अपने परिचित रास्ते पर लौटना पड़ेगा। हर्षा नहीं समझ पाई यह पहेली। आखिर, उसकी हर्षा से क्या उम्मीद थी? क्या उसे सचमुच पश्चाताप हो रहा है अपने किए पर या वह उसे खोने के डर से परेशान है? हर्षा ने मैसेज भेजा: "देट ओके। डेफ़िनेटली आई विल नॉट। " उसने मैसेज भेजने के बाद मोबाइल बंद कर दिया। नहीं तो सारी रात सवाल पूछकर वह परेशान करेगा।

वह देर रात तक नहीं सो पाई। इसलिए अगली सुबह उठने में उसे देर हुई। अगर कोई दरवाजे पर नहीं खटखटाता तो वह दोपहर तक सोती रहती। पड़ोसी घर की छोटी बेटी 'नवमी पूजा' की 'प्रसाद' लेकर बाहर खड़ी थी। पूड़ी, हलवा, मिठाई, नमकीन और तरकारी हर्षा को पसंद नहीं थी। पास घर की राजस्थानी महिला ने उसे नवमी के दिन कन्या-पूजा के बारे में बताया था। एक दिन पहले उसने आस-पड़ोस की छोटी लड़कियों को खाने पर बुलाया था, और हर्षा को उसकी सहायता करने के लिए कहा था। मगर हर्षा पूरी तरह से भूल गई और दिन में दस बजे तक सोती रही। वह स्त्री क्या सोच रही होगी उसके बारे में ? हर्षा जानबूझकर उसकी मदद करने नहीं आई? पड़ोसी फ्लैटों के छोटे बच्चों का कोलाहल होने लगा, शायद वे पूजा में भाग लेकर अपने घर वापस लौट रहे होंगे। हर्षा ने उस लड़की से पूछा: "क्या पूजा खत्म हो गई है?" उस लड़की ने अपना सिर हिलाकर हामी भरी और दौड़कर वहाँ से चली गई।

वह अभी तक नहाई नहीं थी। वह उसके घर कैसे चेहरा दिखा सकती थी ? उसे फिर से अपनी मां की याद आ गई और वह उदास हो गई। यदि वास्तव में माँ का हाथ जल गया होगा तो उसे कितना दुख हो रहा होगा। क्या उसे अपनी मां की देखभाल नहीं करनी चाहिए थी ? कल की घटना से वह इतनी परेशान थीं कि वह अपनी मां को फोन करना भूल गई। माँ के साथ एक बार बात करना ठीक रहेगा, सोचकर उसने मोबाइल स्विच ऑन किया। जब वह ब्रश, पेस्ट और कपड़े लेकर बाथरूम में जाने वाली थी, तो एक मैसेज आया:"मैं आ रहा हूं। अल्बर्टो। "

हर्षा चिंतित हो गई, आज ही सब-कुछ उलट-पुलट होना था। वह 'नवमी' के दिन दस बजे उठ रही है। वह एक छोटी जिम्मेदारी भी नहीं ले सकी , पड़ौसन क्या सोचती होगी ? फिर अल्बर्टो को आज ही आना था ? वह पहले कभी नहीं आया था। उसकी सहेलियाँ नवीना और भैरवी यहाँ नहीं है, तभी शायद वह यहाँ आना चाह रहा है।
अल्बर्टो ने कहा था, "हम यूरोपीयन किसी भी व्यक्ति के भीतर नहीं झाँकते हैं। हर किसी को अपनी गोपनीयता की रक्षा करने का अधिकार है। मगर तुम्हारे देश के लोग बेकार ही दूसरों के मामलों में टांग अड़ाते हैं। मेरी बात को अन्यथा नहीं लें, मगर क्या यह सच नहीं है? "
वही अल्बर्टो बिना किसी आमंत्रण के उसके घर आ रहा है। ?

जल्दी से हर्षा ने अपने बिस्तर व्यवस्थित कर दिए। नवीना और भैरवी के कागज-पत्र, कपड़े भी। नहीं, वह अल्बर्टो को मना नहीं कर पाएगी। कल उसने पूरा दिन उसके घर में बिताया था। किस मुंह से वह उसे अपने घर आने से इंकार कर सकती है ? घर सजाकर वह बाथरूम में जल्दी से घुस गई। कम से कम अल्बर्टों के पहुँचने से पहले उसे नहाने-धोने के काम पूरे कर देने चाहिए।
जब हर्षा स्नान कर रही थी , तो मोबाइल फिर से बज उठा। फिर किसने उसे फोन किया ? मोबाइल में रिंग होती रही और फिर बंद हो गया ; उसने फोन नहीं उठाया। बाथरूम से निकालकर जब वह अपने बाल सुखाने लगी, तभी किसी ने दरवाजा खटखटाया। अल्बर्टो आ गया है? सिर पर तौलिया लपेटकर उसने दरवाजा खोला।
"हे, तुम सुबह-सुबह यहाँ ?सब-कुछ ठीक है? भीतर आओ। " उसने उसे घर में आमंत्रित किया, "बैठो, मैंने अभी स्नान किया है। मुझे बहुत देर हो गई, आज उठते-उठते। "
अल्बर्टो ने चौकी खींच ली और उस पर बैठ गया। हर्षा ने कहा: "हमारा घर बहुत छोटा है। "
"नहीं, नहीं, यह ठीक है, " अल्बर्टो ने जवाब दिया।

अपने सिर से तौलिया खोलकर हर्षा ने बालकनी में सूखा दिया। अपने गीले बालों में कंघी घुमाते हुए वह पूछने लगी:"क्या तुम्हारे पास आज पूछने के लिए बहुत सारे सवाल हैं?"
"क्या तुम्हें लगता है कि मैं केवल सवाल पूछने के लिए तुम्हारे पास आऊँगा, अन्यथा नहीं? तुमने कल संक्षिप्त मैसेज भेजकर अपना मोबाइल बंद कर दिया था, इसलिए मैं चिंतित था। क्या तुम मुझसे नाराज हो, अब भी? "
"मैं तुमसे क्यों नाराज होऊंगी? लेकिन सही कह रही हूँ, मैं तुम्हारी मानसिकता नहीं समझ पाई। "

(क्रमशः अगले भागों में जारी...)

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नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3789,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,326,ईबुक,182,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,257,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,105,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2744,कहानी,2067,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,484,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,129,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी 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कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,224,लघुकथा,806,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,305,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,57,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1879,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,637,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,675,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,51,साहित्यिक गतिविधियाँ,180,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,51,हास्य-व्यंग्य,51,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: विषादेश्वरी भाग 6 // उड़िया उपन्यास // सरोजिनी साहू // अनुवादक - दिनेश कुमार माली
विषादेश्वरी भाग 6 // उड़िया उपन्यास // सरोजिनी साहू // अनुवादक - दिनेश कुमार माली
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रचनाकार
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