जल तू जलाल तू - 5 // प्रकृति और जीव के अन्तःसम्बन्धों का सशक्त उपन्यास // प्रबोधकुमार गोविल

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जल तू जलाल तू

प्रकृति और जीव के अन्तःसम्बन्धों का सशक्त उपन्यास

प्रबोधकुमार गोविल


अध्याय 1 | अध्याय 2 | अध्याय 3 | अध्याय 4 |

पांच

उस दिन वाशिंगटन में धूप के तेवर कुछ नरम थे। जहाँ रात को नौ बजे दिन छिपता था, वहाँ शाम की शुरुआत ही कुछ धुँधले बादलों ने जल्दी कर डाली।

व्हाइट हाउस के सामने के लम्बे-चौड़े लॉन पर टहलनेवालों की आमदो-रफ्त रोजाना जैसी ही खुशनुमा थी। एक ओर युवकों और बच्चों के घेरे में तो जैसे चहल-पहल का मेला ही लग रहा था। लोग कौतूहल से देख रहे थे, उस छोटे-से ब्राजीलियन नस्ल के पप्पी को, जो लोगों के घेरे में घूम-घूमकर अपने पैरों पर खड़ा नाच रहा था। उसे किसी ने शायद शराब पिला दी थी। वह ऐसे उन्माद में नाच रहा था कि उसके गले में पड़ा सुनहरा स्कार्फ किसी परचम की तरह हवा में लहरा रहा था। उसे देखकर खुशी से ताली बजानेवालों में केवल बच्चे ही नहीं, बल्कि खुद उस नन्हे कुत्ते की मालकिन मॉम ग्रेटा भी शामिल थी, और उसके साथ न्यूयॉर्क से आई उसकी मित्र भी। कुछ ही दूर पर खड़े एक फोटोग्राफर ने इस बेमिसाल मंजर को कैमरे में कैद भी करना शुरू कर दिया था। फोटोग्राफर जिस कार्यक्रम को तस्वीरों में उतारने वहाँ आया हुआ था, उसके शुरू होने में थोड़ा-सा वक्त अभी बाकी था।

किन्जान अपनी होनेवाली दुल्हन को लेकर अभी तक वहाँ पहुँचा नहीं था, बस उसी का सबको इन्तजार था। अमेरिका के राष्ट्रपति भवन के ठीक सामने थोड़ी ही दूर पर एक बेहद खूबसूरत फव्वारे के समीप किन्जान के कुछ मित्र भी इसी इन्तजार में थे। डान्स करता ब्राजीलियन डॉग और वे महिलाएँ भी किन्जान के निमन्त्रण पर ही वहाँ पहुँचे थे।

मुश्किल से दो मिनट ही गुजरे होंगे कि फूलों से सजी एक आलीशान कार वहाँ आकर रुकी। उसे अर्नेस्ट चला रहा था। पीछे दूल्हा-दुल्हन की पोशाक में किन्जान और उसकी प्रेमिका बैठे थे। पलक झपकते ही आकर्षण का केन्द्र नन्हे कुत्ते की जगह कार से उतरा युगल हो गया। सभी ने उन्हें बधाई दी।

फोटोग्राफर ने किन्जान दम्पति और उनके मेहमानों का एक यादगार फोटो उतारा जिसमें वे सभी एक साथ हवा में लयबद्ध उछाल लेकर अपनी खुशी के अतिरेक का इजहार कर रहे थे। वो शानदार क्षण - अक्स इस बात की सनद था, कि किन्जान ने धरती से लेकर आकाश तक के जीवन-सफर में, मित्रों को हाजिर-नाजिर जानकर अपनी प्रेयसी के साथ दुनिया की तमाम दूरियाँ तय करने का संकल्प ले लिया। मखमली मुलायम लॉन शेम्पेन से जैसे सींच दिया गया।

किन्जान के दमकते चेहरे पर नए जीवन का उन्माद रच गया।

शाम को और गहराने का मौका दिए बिना ही वे सभी लोग तीन-चार कारों में बैठकर एक लजीज रेस्तराँ में रात्रि-भोज के लिए प्रस्थान कर गए। वहीं किन्जान ने पेरिना से सबका परिचय कराया, जिसे वह पन्नी नाम से पुकारता था। एक खुशगवार शाम और दिल के नजदीकी लोगों की उपस्थिति ने किन्जान के तमाम वे पल धो-पोंछ डाले, जिन्होंने पिछले दिनों तरह-तरह से उसका इम्तहान लिया था। देर रात मादक आलम के बीच अर्नेस्ट ने गाड़ी को बफलो की सड़क पर डाला, और मित्रों ने हाथ हिलाकर विदा ली...किन्जान और पेरिना घर आ गए।

कहते हैं, जमीन चाहे जैसी भी हो, उस पर कभी-न-कभी हरियाली की रंगत आती ही है। कुदरत की झोली में हर किस्म की मिट्टी के लिए बहारों के नुस्खे हैं, बस सही मौसम के आने तक धैर्य रखने की दरकार होती है। किन्जान का वह घर जो पिछले कई महीनों से तरह-तरह के असमंजस झेल रहा था, पेरिना के आते ही गुलजार हो गया। दीवारें ‘घर’ की शक्ल में ढल गईं। छत के कोनों में बने जाले और कीट-पतंगों के अस्थाई आवास ऐसे गुम होने लगे, जैसे उनकी एक्सपायरी डेट आ गई हो। जिस तरह कलईसाज बर्तनों पर जस्ते की कलई से चमक ला देता है, पेरिना के हाथों ने घर की हर चीज पर चमक ला दी।

कुछ दिन के लिए किन्जान ने अपने धन्धे से भी मोहलत निकाली, और बफलो से बाहर कुछ दिन बिताने का कार्यक्रम बनाया। किन्जान के मित्रों ने इसे मधुचन्द्र ट्रिप कहा। इस ट्रिप में मित्रगण कोई नुकसान नहीं होने देते हैं, और अपने साथी के काम को ऐसे मनोयोग से सम्भालते हैं, मानो उनका मित्र किसी आध्यात्मिक जगत की यात्रा पर हो।

किन्जान के मन के किसी कोने में अपने बचपन के उस छोटे-से शहर ग्रोव सिटी की यादें किसी किताब में रखे फूल की तरह रखी थीं, जहाँ के एक स्कूल में उसने कुछ दिन तक पढ़ाई की थी। उसने जब पेरिना के सामने वहाँ चलने का प्रस्ताव रखा, तो वह खुशी से मान गई। कहते हैं कि शादी के बाद लड़कियाँ लड़कों के वर्तमान से ज्यादा उनके अतीत को जानना पसन्द करती हैं। उनके लिए ये उस लॉकर को खोलने के समान होता है, जिसमें उन्हें विरासत में मिला खजाना रखा हो। ये खोज उन्हें आह्लादित करती है कि जिस पेड़ के साए में उन्होंने अपना आशियाना बनाया है, वह किस नर्सरी में उगा, और किस हवा-पानी में जवान हुआ है? कुछ ही दिनों बाद वे पिट्सबर्ग होते हुए डेट्रोइट में थे। एक लम्बी काली लिमोजीन में सफर करते हुए पेरिना उस रास्ते को देखकर गद्गद् थी, जहाँ किन्जान उसे ले जा रहा था। किन्जान को सोच के दरिया में यादों की हजारों रंग-बिरंगी मछलियाँ तंग कर रही थीं। लाल बड़े पत्थरों से बना यह कस्बा उसे हवा में घुले गुलदस्ते की तरह लग रहा था। इसकी गोल घुमावदार सड़कें सारे शहर की एकता बयाँ करती थीं। एक-एक इन्सान की आँखों के हिस्से में बेतहाशा फैला मंजर आता था।

वे जिस निराले-से होटल में रुके उसके पिछवाड़े गजब की शान्ति और हरारत थी। माहौल के जिस्म के पोर-पोर में उमंग-भरा उठान था। जब रात आई, सब छिप गया।

न जाने कहाँ-कहाँ क्या-क्या होता रहा। मनु और श्रद्धा को लेकर किसी दूर देश में जयशंकर प्रसाद ‘कामायनी’ रचते रहे...लन्दन के आसपास घर लौटते कवि को डेफोडिल फूल दिखाई दिए...यूनान में कहीं कोई आदम और हव्वा के लिए थिरकन की थाप गढ़ता रहा... ध्रुवों पर न बीतनेवाली रात बिक रही थी...किसी के पास समय होता तो जाकर खरीद लाता... जो चन्द्रमा पूनम की रात में चाँदनी की परात की तरह चमकता दिखाई देता है, वही थोड़ी देर बादलों से आँख-मिचौनी खेलकर कच्ची बर्फ के गोले-सा धूमिल भी हो जाता है। शहद की मिठास भी तृप्त कर देती है। और फिर चारों ओर दिखाई देने लग जाता है।

किन्जान ने एक सुबह पेरिना को अपना वह स्कूल भी दिखाया, जिसे याद करके वे लोग यहाँ चले आए थे। पेरिना को उस इमारत या जगह में ऐसा कुछ भी नहीं दिखा, जिसे लेकर बरसों तक उसे याद रखा जाए। किन्जान ने भी शायद पेरिना की यह प्रश्नवाचक मुद्रा भाँप ली, और इसीलिए उसने अब पेरिना को वहाँ आने का असली कारण बताया।

दरअसल यहाँ से कुछ ही दूरी पर एक पर्वतीय क्षेत्रा में बने बड़े चर्च के पीछे एक बहुत बड़ा फार्म हाउस था, जिसमें एक भारतीय सन्त ने कुछ साल पहले अपना आश्रम बना लिया था। अब वे सन्त अमेरिका के ही वासी होकर रह गए थे। इस आश्रम में सैकड़ों लोगों का लगातार आना-जाना लगा रहता था। गाड़ियों की भीड़ वहाँ हर समय देखी जा सकती थी। लोग बताते थे कि उस आश्रम की लगभग सत्तर देशों में शाखाएँ हैं। हजारों लोग इन सन्तजी से आकर मिलते थे, और अपनी कठिनाइयाँ बताते थे, तथा उनसे अपनी समस्याओं का समाधान पाते थे। किन्जान के मन में भी एक दबी इच्छा थी कि उसका नायग्रा झरने को पार करने का सपना कभी पूरा होगा या नहीं, वह जानना चाहता था।

पेरिना ने इस बात को तटस्थता से सुना, और सपाट प्रतिक्रिया दी। कोई दूसरा इन्सान यह कैसे बता सकता है कि एक इन्सान की कोई कोशिश पूरी होगी या नहीं? ये दिन साथ-साथ घूमने के थे। बस, उसके लिए यही काफी था कि वह किन्जान के साथ जा रही है। फिर ये फलसफा भी तो खुद पेरिना का ही था, कि यदि एक इन्सान कुछ करना चाहता है, तो दूसरा यह क्यों चाहे कि वह न करे।

वह ऐसी किसी बहस में नहीं उलझना चाहती थी कि यदि सन्तजी ने किन्जान को सफल होने का संकेत दिया, और फिर किन्जान अपने मकसद में कामयाब हो गया, तो इस सफलता का श्रेय किसे मिलेगा - सन्तजी को या किन्जान को? यदि सन्तजी ने किन्जान का सपना पूरा होने में कोई सन्देह जताया, और किन्जान फिर भी अपने मकसद में कामयाब रहा, तो सन्तजी को क्या सजा मिलेगी? यदि सन्तजी ने किन्जान को सफल होने का आशीर्वाद दिया, और किन्जान विफल हो गया, तो किन्जान को क्या मुआवजा मिलेगा? यदि किन्जान से सन्तजी ने सफल न होने की बात कही, और किन्जान सफल नहीं ही हुआ, तो एक देश में साहसिक कारनामा पूरा न होने देने का दोषी कौन ठहराया जाएगा, सन्तजी या किन्जान? और यदि सन्तजी ने कुछ भी कहा, और किन्जान के साथ कुछ भी हुआ, तो सत्तर देशों के लोग इन बातों में क्यों खर्च हो रहे हैं? लेकिन विश्व का दूसरा सबसे ‘घना’ देश इन्हीं बातों में बीत रहा हो तो इससे पेरिना को क्या? कुछ देर बाद पेरिना किन्जान की बाँह पकड़े आश्रम की सीढ़ियाँ चढ़ रही थी। जिस तरह वे आश्रम के मुख्यद्वार की ओर जा रहे थे, उसी तरह कई लोग आश्रम से बाहर आ रहे थे। पेरिना को तो इसी बात की हैरत थी कि लोगों को अपनी हिम्मत से ज्यादा भरोसा बन्द कमरे में बैठे एक दूसरे, उन जैसे ही आदमी पर था। हर बात के दो उत्तर थे - हाँ और न। इस तरह आदमी आँख बन्द करके सबको ‘हाँ’ या सबको ‘न’ भी कहे तो पचास प्रतिशत सच्चा ही होनेवाला था।

और इतनी बड़ी सफलता पर तो उसे वाहवाही मिलने ही वाली थी...

भीतर कुछ लोग इन्तजार में थे। उन्हें एक सुसज्जित कक्ष में बैठाया गया था। उन्हें पीने के लिए कोई खुशबूदार स्वादिष्ट पेय दिया गया था। अपनी बारी के लिए टोकन भी दिया गया था। और आश्रम के लिए स्वेच्छा से ‘कुछ’ देने का अनुरोध भी प्रसारित किया गया था। किन्जान अभिभूत होकर पेय का गिलास हाथ में पकड़े, वहाँ लगे सोफे पर बैठ गया। पेरिना को यह सब ऊब-भरा लगा। वह आश्रम के चारों ओर की नैसर्गिक आभा को देखने की गरज से अहाते के पिछवाड़े की ओर चली आई। पीछे की ओर एक बड़े औषधीय बगीचे में लोग तरह-तरह के काम कर रहे थे।

पेरिना ने एक वृद्ध महिला से बात करनी चाही, किन्तु वह ‘हाँ’ ‘हूँ’ के अलावा और कुछ न बोली। पेरिना मायूस होकर चारदिवारी के पास, दूर तक चली गई, और अकेले ही टहलने लगी। भीतर की भीड़ देख आई पेरिना को अनुमान था कि किन्जान का नम्बर कई घण्टों के बाद ही आ पाएगा।

लेकिन पेरिना को यह देखकर अच्छा लगा कि वही वृद्ध महिला कुछ देर के बाद पेरिना की ओर आने लगी। कुछ ही देर में वह पेरिना से मुखातिब थी।

महिला लगभग चालीस साल से उस आश्रम में काम कर रही थी और वहाँ की गतिविधियों के बारे में काफी कुछ जानती थी। महिला ने सबसे पहले तो पेरिना से इस बात के लिए क्षमा माँगी कि वह ड्यूटी पर रहते हुए उससे कोई बात नहीं कर सकी। वहाँ किसी से काम के वक्त बात करने पर सख्त पाबन्दी थी। अब, ड्यूटी का समय खत्म होते ही महिला पेरिना के पास चली आई।

महिला नार्वे के ओस्लो की रहनेवाली थी। आश्रम की विश्वास-पात्र थी, और कई देशों की यात्रा कर चुकी थी। पेरिना को अपनी मित्र बनाने में उसे ज्यादा वक्त नहीं लगा, क्योंकि वह वाचाल भी थी। शायद आश्रम में जब-तब बोलने की पाबन्दी के कारण उसकी वाचालता को हवा मिली हो।

कंकड़ों की तरह बजती आवाज में बहुत कुछ बताने के बीच महिला ने पेरिना को फुसफुसाकर भी कुछ बातें बताईं। और इसी से पेरिना को मालूम हुआ कि आश्रम के मुख्य सन्तजी भारत के नहीं, बल्कि म्याँमार के रहनेवाले हैं।

महिला की दी इस जानकारी ने तो पेरिना को चांका ही दिया कि लगभग नब्बे साल पहले यह आश्रम बना था। तब भारत से एक कृशकाय वृद्ध व्यक्ति को लगभग बन्दी बनाकर ही यहाँ लाया गया था। लोग बताते थे कि भारत में पहाड़ी कन्दराओं में जाकर वर्षां तपस्या करके सिद्धियाँ प्राप्त करने की बहुत पुरानी परम्परा है। ऐसे तपस्वी न कुछ धनोपार्जन करते थे, और न ही अपनी सिद्धियों के एवज में किसी से कुछ लेते थे। उनके ज्ञान की बदौलत उन्हें ऐसे पूर्वानुमान हो जाते थे, जिन्हें लोग जानना चाहते थे।

बाद में ऐसे लोगों को कुछ व्यापारिक बुद्धि के समर्थ लोग जबरन आश्रय प्रदान करके छिपे तौर पर अपने साथ रख लेते थे, और उनके चमत्कारिक ज्ञान के बूते पर अपनी दुकान चलाते थे। भारतीय रजवाड़ों ने ऐसे तपस्वियों को सहारा देकर कई देशों में अपनी पैठ बनाई। पेरिना का मन हुआ कि वह महिला बोलते-बोलते रुके, तो जाकर किन्जान को सचेत कर दे... जिसे पेरिना आसान काम समझ रही थी, वह इतना आसान नहीं था। वह महिला इतनी जल्दी चुप हो जाने को कतई तैयार नहीं थी। लिहाजा पेरिना को उससे कई बातें और भी पता चलीं। उसने बताया कि आश्रम शुरू होने के समय जिन जर्जर और कृशकाय वृद्ध को लाया गया था, वे तो अब जीवित नहीं हैं, किन्तु अब भी सौ वर्ष से अधिक आयु के एक महात्मा वहाँ मौजूद हैं, जिन्हें आश्रम के बेसमेण्ट की एक छोटी कोठरी में रखा गया है। ये नाममात्र का भोजन करते हैं, और निर्वस्त्री रहते हैं। कोठरी एक प्राकृतिक गुफा की शक्ल में है, और यह बाबा पहली नजर में किसी को भी पागल नजर आते हैं। लेकिन असलियत यह है कि इन्हीं के ज्ञान से हमारे सन्तजी चारों दिशाओं में नाम कमा रहे हैं।

ऐसा कहते ही महिला ने बेबसी से चारों ओर देखा, कि कहीं उनकी बात कोई सुन न रहा हो।

पेरिना की इच्छा हुई कि वह चाहे आश्रम के मुख्य सन्तजी से मिले या न मिले, किन्तु उस वृद्ध महात्मा को एक नजर जरूर देखे। अब पेरिना की दिलचस्पी उन बाबा के बारे में और जानने में हुई।

कुछ देर बाद पेरिना को किन्जान सामने से आता हुआ दिखा। वह उसे ही ढूँढता हुआ पिछवाड़े चला आया था।

वृद्ध महिला से इतनी देर की आत्मीयता ने पेरिना को यह साहस दे दिया कि वह बाबा से मिलने की अपनी इच्छा के बारे में उसे बता दे।

कुछ सोचकर महिला उन्हें बाबा के पास ले जाने के लिए तैयार हो गई।

लेकिन पेरिना को उसकी यह विचित्र शर्त माननी पड़ी कि बाबा, क्योंकि महिलाओं से नहीं मिलते हैं, उसे किन्जान के साथ मुलाकात के दौरान उन्हें छिपकर देखना होगा। किन्जान को वह कुछ संकोच के बाद जोखिम उठाकर भी मिलवाने के लिए तैयार हो गई।

महिला को स्वयं भी वहाँ जाने की अनुमति नहीं थी, इसलिए उसने बगीचे में काम कर रहे एक लड़के को किन्जान के साथ भेजने का बन्दोबस्त किया। वह महिला और पेरिना दूसरी ओर से एक छोटे झरोखे से बाबा के दर्शन के लिए छिप गईं।

बाबा को देखना आसान न था। लड़के के पीछे जाते किन्जान को ऐसा महसूस हो रहा था, कि जैसे वह किसी चिड़ियाघर में शेर को देखने जा रहा हो।

पिंजरे में घूमता शेर दर्शकों के सामने आए, या न आए, यह शेर पर निर्भर था।

इस बात का कोई महत्त्व न था कि दर्शक कहाँ से आया है, या उसने चिड़ियाघर देखने का टिकट लिया है। आश्रम की कई कन्दराओं के टेढ़े-मेढ़े रास्तों से गुजरकर किन्जान उस लड़के के साथ बाबा की गुफा के करीब पहुँचा।

बाबा उस समय दरवाजे की ओर पीठ किए आसमान की दिशा में हाथ उठाए था। दोनों युवक खामोशी और श्रद्धा के साथ चुपचाप खड़े होकर बाबा के इस तरफ देखने का इन्तजार करने लगे। उधर ऊपर की ओर से एक धूप की छोटी-सी टॉर्च जमीन से गुफा की दिशा में पड़ रही थी, जिसमें से साँस रोककर पेरिना और बूढ़ी महिला झाँक रही थीं। उन्हें अब तहखाने की उस कोठरी का एक हिस्सा तो दिख रहा था, पर बाबा के शरीर का कोई भी भाग नहीं दिखाई दिया था।

युवक ने किन्जान को बताया कि जब बाबा इधर देखें, तो वह उन्हें प्रणाम न करे। ऐसा करने से क्या होगा, यह पूछते ही...बाबा ने एकाएक पलटकर पीछे देख लिया। इससे किन्जान भी हड़बड़ा गया। उसने बाबा को अभिवादन कर डाला। बाबा जोर से हँसा और पलटकर दरवाजे के सामने की ओर आ गया। बाबा के घूमकर सामने आते ही किन्जान के साथ आया युवक पलटकर विपरीत दिशा में भागने लगा। लेकिन किन्जान उसी तरह वहाँ खड़ा रहा।

जमीन के तल से छेद में झाँककर अब पेरिना भी बाबा को देख पा रही थी।

बाबा लगभग छलाँग लगाकर किन्जान के सामने कूदा, और उसके एकदम पास आ गया। फिर बिजली की-सी गति से बाबा ने किन्जान की टी-शर्ट की जेब को पकड़ा और खींचने लगा। उसके दाँत किसी पागल की तरह ही भिंचे हुए थे।

किन्जान अब घबरा गया और उसी युवक की तरह उसी दिशा में भागने लगा।

युवक थोड़ी दूर पर खड़ा सारा नजारा देख रहा था।

किन्जान के पीछे भागते हुए बाबा ने अकस्मात् ”पन्ना-पन्ना“ चिल्लाना शुरू कर दिया।

यह सुनते ही जमीन के छेद से झाँक रही पेरिना उत्तेजित हो गई और उसने तुरन्त बूढ़ी महिला को बताया कि उसका पति किन्जान उसे ‘पन्नी’ कहकर ही पुकारता है। वह उत्तेजना में यह भी भूल गई कि महिलाओं के लिए बाबा के सामने जाना निषिद्ध है, वह दौड़कर बाबा के पास आने लगी।

लेकिन वहाँ तक आने के लिए उसे काफी घुमावदार सीढ़ियाँ उतरना जरूरी था। वह आगे बढ़ती, इससे पहले ही बूढ़ी महिला ने लपककर उसकी कलाई पकड़कर उसे रोक लिया। पेरिना बूढ़ी के हाथ की ताकत से दंग रह गई।

उधर तेजी से दौड़ते किन्जान को बाबा ने हाँफकर भागते हुए पकड़ लिया और तुरन्त उसकी टी-शर्ट की जेब में हाथ डालकर कुछ टटोलने लगा। इससे किन्जान की घबराहट कुछ कम हुई और वह रुककर खड़ा हो गया।

बाबा ने किन्जान की जेब से जैसे ही हाथ बाहर निकाला, किन्जान यह देखकर चौंका कि उसकी जेब से सुनहरी केसरिया इमली के आकारवाली मछली निकलकर बाबा के हाथ में आ गई। मछली मरी हुई थी। लेकिन किन्जान डर से थर-थर काँपने लगा, क्योंकि इसी मछली को दूर फेंकने की कोशिश में किन्जान ने भयंकर सपना देखा था। वह फिर भी मछली को फेंक नहीं सका था, और मछली गायब हो गई थी। अब बाबा के हाथ में न जाने कहाँ से वही मछली किन्जान की जेब से निकलकर आ गई थी।

किन्जान ने भी बाबा के ‘पन्ना-पन्ना’ चिल्लाने की आवाज सुनी थी और वह कुछ समझा नहीं था। इतना उसके दिमाग में भी कांधा कि वह पेरिना को कभी-कभी प्यार से पन्नी कहकर पुकारता है।

अब वह युवक पलटकर नजदीक आया और बाबा का हाथ पकड़कर उसे वापस उसकी गुफा की ओर ले जाने लगा। किन्जान भी संयत होकर एक ओर खड़ा हो गया।

बूढ़ी महिला पेरिना को बताने लगी कि पन्ना भारत का एक कीमती पत्थर होता है, जिसे लोग चाव से अपने गहनों, जैसे अँगूठी आदि में जड़वाकर पहनते हैं।

पेरिना इस जानकारी से बहुत खुश हुई। लेकिन बूढ़ी उसके इस सवाल का कोई जवाब नहीं दे सकी, कि बाबा ने किन्जान की जेब से मरी मछली कैसे निकाली, और मछली को हाथ में लेकर चिल्लाने का क्या प्रयोजन था। यह जिज्ञासा तो खुद बूढ़ी को भी थी... बूढ़ी महिला ने तो चुपचाप पेरिना को बाबा के दर्शन करवा देने चाहे थे, पर इससे इतना बखेड़ा खड़ा हो जाएगा, यह उसने न सोचा था। वह भी असहज हो गई, और उसने जल्दी-जल्दी किन्जान दम्पति को विदा किया।

लौटते समय पेरिना बहुत खुश थी। उसे यह भी याद न रहा कि कम-से-कम किन्जान से ये तो पूछे कि उसकी मुख्य सन्तजी से मुलाकात में क्या हुआ।

किन्जान ने खुद ही उनसे मुलाकात का थोड़ा विवरण दिया। किन्जान उनकी सम्पन्नता और विनम्रता से अच्छा-खासा प्रभावित था। सन्तजी ने उसके सपने के पूरा होने के बारे में यही कहा था कि वह यहाँ आता रहे, और उससे चौथी मुलाकात में वे यह बता देंगे कि किन्जान नायग्रा फाल्स को पार करने के अपने मकसद में कभी कामयाब होगा कि नहीं, और यदि होगा तो कैसे? उत्तेजित किन्जान अब सन्तजी से दूसरी और तीसरी बार नहीं, बल्कि चौथी बार मिलने के बारे में ही सोच रहा था।

पेरिना की इच्छा अब किसी ज्वैलरी की दुकान में जाने की थी। किन्जान उसे ‘हनीमून’ उपहार देनेवाला था, और पेरिना के जेहन में भारतीय पन्ने जगमगा रहे थे। वह न केवल पन्ने का कोई आभूषण लेना चाहती थी, बल्कि उनके बारे में जानना भी चाहती थी। उसके भीतर महिला-सुलभ वही प्रदर्शन-प्रियता पैठ चुकी थी कि वह अगली बार नार्वे की उस महिला से आश्रम में जब भी मिले, तो पन्नों का कीमती हार पहनकर ही मिले। इसे वह बाबा के प्रति सम्मान के रूप में देखती थी।

पेरिना ने पता लगा लिया कि पन्ना केवल कुछ ही देशों में पाया जानेवाला कीमती पत्थर है, जो भारत में सबसे ज्यादा मिलता है। शाम को जब किन्जान ने डिनर के समय रंगीन मदिरा का ग्लास पेरिना को पेश किया तो पेरिना को उस चमकते शीशे के एक-एक कोण से बेशकीमती पन्ने चमकते दिखाई दिए। भोजन में जब साबुत बटेर शोरबे में रखा आया, तो उसकी खुली आँखों में पेरिना ने पन्ने ही जड़े देखे।

लेकिन ये तमाम चमक उस समय फीकी पड़ गई, जब देर रात होटल के खुशबूदार अहाते में झाँकते, खिड़की का परदा फैलाते हुए किन्जान ने नाइट-लैम्प का स्विच ऑफ किया। खिड़की से झाँकते आसमान के सैकड़ों पन्ने उन दोनों को अकेला छोड़कर परदे के पार रह गए। अँधेरे में पेरिना किसी मानसरोवर से मोती चुनने की मुहिम पर निकल गई। किन्जान ने रात और नींद को सौतिया डाह में जलती दो पड़ोसनों की तरह लड़ता छोड़ दिया। न रात बीतती थी, न दिन उगता था।

उस रात सन्तजी के आश्रम में अपने कमरे में सोती बूढ़ी महिला को भी आसानी से नींद नहीं आई। वह सोचती रही, कि बाबा ने पेरिना के पति का ‘पन्ना-पन्ना’ कहते हुए पीछा क्यों किया? वह बरसों से यहाँ थी, और थोड़ा-बहुत यहाँ की गतिविधियों को समझती भी थी, और मन-ही-मन वह समझ रही थी कि पेरिना वापस जरूर आएगी। और इसीलिए वह चाहती थी कि इस पहेली को किसी तरह सुलझा ले। पेरिना से उसे एक किस्म का लगाव-सा भी हो गया था। नई-नई दुल्हन...हनीमून के अगले ही दिन अपने पति के साथ क्या सोचकर यहाँ चली आई? भला बैरागी के आश्रम में ऐसे युवा बच्चों का क्या काम? बूढ़ी महिला किसी-न-किसी तरह उस पहेली को सुलझा लेना चाहती थी।

उसका मन कहता था कि वह पेरिना की मदद करे, और यदि वह अकारण किसी मुसीबत में घिरनेवाली है तो वह उसकी जानकारी कर पेरिना को पहले से सचेत करे। बाबा से महिलाओं का मिलना चाहे निषिद्ध हो... बाबा से मिलने के लिए बूढ़ी महिला, एमरा उस शर्त को मानने के लिए भी तैयार थी, जिसकी वजह से सन्तजी ने महिलाओं का बाबा से मिलना निषिद्ध घोषित किया था। उसे तो हर कीमत पर पेरिना की मदद करनी थी। उसका दिल भीतर से यह कहता था कि वह ऐसा करे।

लेकिन उसके बाद सालों गुजर गए, न किन्जान वहाँ आया, और न ही पेरिना।

शायद वे दोनों ही उन बातों को भूल गए कि वे आश्रम में किस मकसद से गए थे। उन्हें केवल यह याद रहा, कि उनकी शादी के बाद ये उनका हनीमून ट्रिप था, जो बहुत आनन्ददायक रहा। बफलो पहुँचकर वे दोनों अपनी गृहस्थी में खो गए, और किन्जान जी-जान से अपने कारोबार में जुट गया।

कभी गाहे-बगाहे उसके मन में अपने सपने का खयाल आता भी, तो वह यही सोचता कि उसे अपने बचपन की अभिलाषा किसी सन्त-महन्त के मन्त्र-ताबीज से नहीं, अपने जीवट और हौसले से पूरी करनी है।

किन्जान उम्र और अनुभव के साथ समझ भी प्राप्त कर रहा था। वह सोचता, यदि ये महाज्ञानी लोग अपने ज्ञान और टोने-टोटके से लोगों का जीवन सुधारने की क्षमता रखते हैं, तो फिर ये सम्पन्न मुल्कों में क्यों चले आते हैं? ये अपने उन पिछड़े देशों में ही रहकर काम क्यों नहीं करते, जहाँ विपन्नता के कारण इनकी जरूरत है।

और तब इनके ज्ञान पर लगा प्रश्न-चिह्न ऐसा लगता, मानो दाल में कुछ काला हो।

कुछ भी हो, पेरिना की दिलचस्पी कीमती, हीरे-पन्नों में बढ़ गई। वह जब शहर में किसी एशियाई या भारतीय परिवार को देखती, तो विवाहिताओं के हाथ में पड़ी हरे काँच की चूड़ियाँ उसे आकर्षित करतीं। बल्कि कभी-कभी तो चूड़ियाँ और पन्ना जड़ी अँगूठी वह भी पहनती, जिसे उसने अपनी यात्राओं के दौरान ढूँढ ही लिया था।

पेरिना के मन में एक फाँस और चुभकर रह गई थी। उसे वह केसरिया सुनहरी मछली भी कभी नहीं भूलती थी, जो बाबा ने अकस्मात् किन्जान के पीछे भागकर उसकी जेब से निकाली थी।

और उस दिन किन्जान के साथ बोस्टन में घूमते हुए उसने विशालकाय मछलीघर देखा तो उसकी याद और ताजा हो गई। इस शानदार व अत्याधुनिक एक्वेरियम में उसकी आँखें अपनी चिर-परिचित उसी मछली को तलाश करती रहीं।

जब किन्जान एक से एक अद्भुत मछली को निहारता हुआ आगे बढ़ता, पेरिना दीवारों पर लिखी इबारतों और चार्टां तक को पढ़ती, कि शायद उसे अपनी उस चिरपिरिचित केसरिया सुनहरी मछली का कोई सुराग मिले, जिसने पेरिना के मन में शंका का बीज डालकर जिज्ञासा का खेत उगा दिया था।

एक्वेरियम के सबसे ऊपरी तल पर जब सागर के एक जीवन्त हिस्से में तैरते हुए एक युवक और युवती आए, तो पेरिना का दिल चाहा, कि वह भी उनकी तरह ठण्डे पानी में उतरकर गहराई का चप्पा-चप्पा छाने, और किन्जान की जेब में मिली मछली का प्रतिरूप ढूँढे।

दुनिया का कोई देश हो, किसी नस्ल के लोग हों, किसी उम्र के जीवनसाथी हों, अपने पति की जेब की जानकारी पाना जैसे हर पत्नी का शायद पहला कर्तव्य होता हो... कुदरत ने धरती के शृंगार के लिए दो गहने बना छोडे़ हैं - एक तो चमकती धूप, और दूसरी छिटकी चाँदनी। चाँद और सूरज को दे दिया है ये काम, कि धरती पर कभी इनकी कमी न हो, बरसाते रहो, बरसाते रहो...कभी थककर न बैठना, कोई छुट्टी-वुट्टी नहीं मिलेगी कभी। हाँ, थक जाओ तो बादल की चादर ओढ़कर आराम फरमा लो। लेकिन चलते-चलते...रुकने की इजाजत नहीं मिलेगी।

बस, इसी से कहीं कभी कुछ थमा नहीं।

धीरे-धीरे किन्जान भी सब भूल बैठा, और पेरिना भी। समय ने उन्हें जो कुछ नहीं दिया, उसके एवज में बहुत-कुछ और दिया। उनके एक प्यारी-सी बिटिया हुई।

लेकिन एक बात है, समय चाहे सब-कुछ भूल जाए, लोग नहीं भूलते। और जो लोग मन से जुड़ जाते हैं, वे तो कभी नहीं भूलते, कुछ नहीं भूलते। यही कारण था कि जब किन्जान और पेरिना ने अपनी बिटिया का पहला जन्मदिन धूमधाम से मनाया तो आनेवाले मेहमानों में न्यूयॉर्क से अपनी मालकिन मॉम के साथ आया वह नन्हा ब्राजीलियन पप्पी भी था, जिसका और किन्जान का सपना कभी एक था। हाँ, यह बात जरूर थी, कि वह नन्हा भी अब उतना छोटा न रहा था।

अच्छा-खासा शैतान-शरारती बन गया था।

इसी शानदार पार्टी में पेरिना की मेहनत और पसन्द के लाजवाब व लजीज व्यंजनों के बीच किन्जान ने मेहमानों को बताया कि उनकी बिटिया डेला का जन्म नायग्रा फाल्स से गिरते बेशुमार पानी के छींटों के बीच आधी रात को एक शिप में ही हुआ था। उनकी जिन्दगी का वह नायाब तोहफा चाँदनी रात में लहरों पर डगमगाते जहाज पर ही उनकी झोली में आया था।

यह बात तो सुखद आश्चर्य और रोमांचक खुशी की थी, लेकिन इसे बताते-बताते जब किन्जान रो पड़ा तो सबको हैरानी हुई। खुशी के इन आँसुओं ने पेरिना को भी उद्वेलित कर दिया। सब जानते थे कि किन्जान भावुक होनेवाले लोगों में नहीं है, इसलिए अब सबकी हैरानी इस बात को लेकर थी कि किन्जान की अप्रत्याशित उदासी का राज जानें। मजबूरन किन्जान को बताना ही पड़ा।

किन्जान ने सबको बताया कि डेला की दादी का जन्म जब हुआ था, तब वह एक बाल्टी पीने के पानी के लिए जेल में थी, अपने परिवार के लिए एक समय का पानी लाने के लिए उसे जबरदस्त संघर्ष करना पड़ा।

सब गमगीन हो गए। माहौल में देर तक नमी छाई रही।

किन्जान के दोस्त उसे उदासी से निकालने के लिए कुछ सोचते, इससे पहले ही पेरिना की चपल-तत्पर बुद्धि ने काम किया, और वह माहौल बदलने के लिए अपना कीमती पत्थरों का कलेक्शन उठा लाई, जिसे सब चाव से देखने लगे।

पेरिना ने सबको बताया कि उसे तरह-तरह के पन्ने जमा करने का शौक है, और उसे जहाँ भी कोई पन्ना मिलता है, वह खरीद लाती है। उसके कलेक्शन को सबने सराहा। पार्टी की रंगत फिर से हरी-भरी हो गई। बिटिया डेला को हजारों आशीषें मिलीं, जिसने दादी की प्यास को जीतकर अथाह पानी के सीने पर ही जन्म लिया था...।

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