आध्यात्मिकता से एकता एवं समन्वय : अध्याय : ४ - आध्यात्मिकता, धर्म और विज्ञान - लेखक : डॉ. निरंजन मोहनलाल व्यास - भाषांतर : हर्षद दवे

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

image

आध्यात्मिकता से एकता एवं समन्वय

लेखक

डॉ. निरंजन मोहनलाल व्यास

भाषांतर

हर्षद दवे

--

प्रस्तावना | अध्याय 1 | अध्याय 2 | अध्याय 3 |

अध्याय : ४

आध्यात्मिकता, धर्म और विज्ञान

किसी भी विषय में वैज्ञानिक अन्वेषण करने के लिए उस विषय की परिभाषा देना आवश्यक है. जिससे हम संबंधित विषय पर अपने खुद के अभिप्राय को अलग रखते हुए निष्पक्ष रूप से सुव्यवस्थित खोज कर सकें. जिसका प्रमुख ध्येय प्रमाणित मूल्यांकन करना है ऐसे किसी भी प्रकार के अनुसन्धान के लिए ऐसी वैज्ञानिक पद्धति अपनाना आवश्यक है. अधिकतर वैज्ञानिक एवं विशेषज्ञ शोधकर्ता ईश्वर और आध्यात्मिकता के बारे में बातचीत करने के लिए अनिच्छुक होते हैं क्योंकि ईश्वर और आध्यात्मिकता का प्रमाणित मूल्यांकन करना अत्यंत मुश्किल होता है.

पश्चिम की पद्धति के अनुसार किसी भी विषय का मूल्यांकन करने में उसको नापा जा सके ऐसे उचित साधनों या मानदंडों का उपयोग किया जाता है. उदाहरण के लिए कोई विषय या उस का कद, आकार, गति, प्रवृत्ति, मूल्य इत्यादि...जो वैज्ञानिक साधनों से नापा जा सकता है. जब कि पूर्व में - मतलब कि हमारी संस्कृति में ऐसे नापने के साधनों का होना अनिवार्य नहीं माने जाते. हमारे शास्त्रों की विचारधारा ऐसी है कि जो तत्व अथाह है, जिस को कोई नाम नहीं दिया जा सकता, जो तर्क बुद्धि से समझा नहीं जा सकता, जो वाचा से पर है यही मूल और महान सत्य है. इस अमाप-अपरिमेय को नापने का पागलपन हमारे ऋषिओं ने नहीं दिखाया. मानदंड भौतिक जगत के लिए उपयुक्त है, इस बात का हमारी सभ्यता ने स्वीकार कर लिया है.

ब्रिटेन के सुविख्यात भौतिकशास्त्री डेविड बोह्म ने (David Bohm) अपनी सुप्रसिद्ध पुस्तक 'होलनेस एंड दि इम्प्लिकेट ऑर्डर' (Wholeness and the Implicate Order) में इस विषय पर बहुत अच्छी बात कही है: 'पश्चिम के समाज ने अधिकतर माप और मूल्यांकन के ऊपर आधारित विज्ञान और टेक्नोलोजी के विकास पर जोर दिया है. यह तत्व मापा नहीं जा सकता और इसलिए यह भौतिक विज्ञान का विषय नहीं बन सकता. यदि हम इस प्रश्न पर सावधानी से सोचते हैं तो हमें पता चलता है कि पूर्व की विचारधारा इस गहन और अथाह तत्व को महान सत्य के रूप में देखते हैं. यह सब को समझने की बात है.

मापन मनुष्य के द्वारा आविष्कृत साधनों के द्वारा पाई गई दृष्टि या समझदारी है, किंतु जो हमारे लिए गहन एवं अथाह है और जो विश्व का प्रारंभिक तत्व है, यह मनुष्य के द्वारा आविष्कृत भौतिक साधनों के द्वारा नापा नहीं जा सकता और समझा भी नहीं जा सकता. वास्तव में देखा जाए तो ऐसी प्रमाणित वैज्ञानिक पद्धति कुछ भी जानने के लिए इतनी अधिक प्रचलित हो गई है कि इस में परिवर्तन करना तक़रीबन असंभव सा लगता है. इस के कारण हम ऐसी वैज्ञानिक पद्धति के द्वारा विश्व के मूलभूत और गहन तत्व को समझने में और जानने में उलझ जाते हैं और अंततः मतभेद उत्पन्न होते हैं.

हम ऐसा अंदाजा लगा सकते हैं कि पहले के समय के बुद्धिमान लोग इसी मूल तत्व को अंतिम सत्य के रूप में देख पाए होंगे. साथ साथ वे यह भी जानते होंगे कि अपनी इन्द्रियों के द्वारा देखाई पड़ते इस बाह्य जगत को समझने के लिए मापन की प्रमाणित पद्धति महत्वपूर्ण है, जो कि हमारे जीवन में व्यवस्था लाने में सहायक बन सकती है. परंतु जब उन्होंने ऐसा कहा होगा, तब हकीकत में कई लोगों ने उसे आंतरिक जगत का अंग मान लिया होगा और फिर शैक्षणिक संस्थानों में इस पद्धति का प्रसार हुआ और समाज को भी इस की शिक्षा दी गई. अब इस प्रमाणित पद्धति का उपयोग व्यापक रूप से एक यांत्रिक परम्परा सा बन गया है. इस परम्परा से बाहर निकालने के लिए हमें गहन समझदारी से काम लेने की आवश्यकता है. जिस में मानसिक विचार किस प्रकार से काम करते हैं इस की समझदारी का भी समावेश होता है. इस प्रकार जीवन के दोनों पहलू - शारीरिक व मानसिक क्रियाएँ - किस प्रकार से कार्य करतीं हैं उस के भीतर गहराई में जाने की आवश्यकता है. शायद यही ध्यान (Meditation) का सही अर्थ है.

ऐसी समझदारी हो तब क्या नापा जा सकता है और क्या नहीं यह द्विधा अपने आप छूट जाएगी. तब हमारे बाह्य जगत से संबंधित विचार और आंतरिक जगत के विचारों में सुसंगतता स्थापित हो जाएगी और इस अखंड एवं परमतत्व की गहरी समझदारी भी जागृत हो जाएगी. ऐसी जाग्रति मनुष्य अपने प्रत्येक चरण, प्रत्येक दृष्टिकोण में अनुभव कर पाएगा. ऐसी सच्ची अनुभूति ही जीवन की महत्वपूर्ण अवस्था है.

v विश्व को समझने में विज्ञान की अवरोधक मर्यादाएं :

१) खगोलशास्त्र:

आज से करीब १८ अरब वर्ष पूर्व ब्रह्माण्ड एक सूक्ष्म विन्दु के रूप में था. वर्तमान खगोलशास्त्र के अनुसार उस समय वह अगम्य-अज्ञात बिंदु का महान विस्फोट (Big Bang) होने से ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति हुई. इस विस्फोट से अनगिनत कण (अणु) चारों ओर अत्यंत शीघ्रता से फ़ैल गए और गुरुत्वाकर्षण के कारण उनमें से तारे बनें. गुरुत्वाकर्षण से ही इन तारों के समूह बनें जिन्हें हम आकाशगंगाएं (Galaxies) या नीहारिकाएँ (Nebula) कहते हैं. कई तारकों से ग्रह उत्पन्न हुए और ऐसे ग्रह जहाँ जीवन के अनुकूल वातावरण बना था, वहां जीवन फलाफूला. हमारी पृथ्वी ऐसी अरबों आकाशगंगाओं में से एक आकाशगंगा का अंग है!

इस महाविस्फोट का प्रभाव हम आज भी देख सकते हैं. अवकाश में अभी भी तारें बनने के बाद शेष बची तारिका-धूलि (रजकण) से नए सितारे और नई नई आकाशगंगाएं बनती रहती हैं. इस प्रचंड विस्फोट की शक्ति इतनी प्रचंड थीं कि आज भी आकाशगंगाएं एक दूसरे से बलपूर्वक दूर चली जातीं हैं और ब्रह्माण्ड निरंतर रूप से फैलता जा रहा है.

ब्रह्माण्ड का यह विस्तारण एडविन हबल (Edwin Hubble) नामक वैज्ञानिक के द्वारा दिए गए नियम के अनुसार हो रहा है जिसे वेग-अंतर का नियम कहते हैं. इस नियम के अनुसार कुछ आकाशगंगाओं की दूरी हमसे जीतनी अधिक उतनी उस की दूर चले जाने की गति कम होती है. यह नियम हबल के वर्षों के निरीक्षण के ऊपर आधारित है. इस नियम के अनुसार यदि अनुमान किया जाए तो हम चकित कर देनेवाले ऐसे नतीजे पर आते हैं कि जिस में विज्ञान की बड़ी अवरोधक मर्यादा का हमें परिचय मिलता है. इस नियम को ध्यान में रखते हुए कई आकाशगंगाएं हम से इतनी अधिक दूरी पर है कि वे करीब करीब प्रकाश की गति से हम से दूर जा रहीं हैं! ऐसी आकाशगंगाओं का प्रकाश हम कभी देख नहीं पाएंगे और इन के बारे में कोई जानकारी भी हमें नहीं मिल सकती. दूसरे शब्दों में कहा जाए तो हम सृष्टि की सारी आकाशगंगाएं कभी देख नहीं सकते, न ही उनकी निश्चित संख्या जान पाएंगे. चाहे हम कितने ही शक्तिशाली, विशाल या आधुनिक टेलीस्कोप से देखें, फिर भी विज्ञान की इस मर्यादा को हम कभी भी लाँघ नहीं सकते.

२) अणुविज्ञान :

खगोलशास्त्र का दूसरा छोर अणुविज्ञान है. ब्रह्माण्ड अथाह है. परमाणु सूक्ष्मतम है. अणुविज्ञान की एक शाखा जो क्वोंटम मिकेनिक्स (Quantum Mechanics) के नाम से प्रसिद्ध है, उसका विकास पिछले ५० वर्षों में अत्यंत तेजी से हुआ है. इस के वैज्ञानिक अणु एवं परमाणुओं की सूक्ष्मातिसूक्ष्म अवस्था में उनके दो प्रकार के बर्ताव दर्शाता है या उस के दो प्रकार का स्वभाव हमारे सामने आता है: एक यह कि यह परमाणु जैसी अवस्था दर्शाता है और दूसरा यह कि उस का बर्ताव मौजें (तरंगें) जैसा होता है.

इस से आगे आइनस्टाइन ने इस की स्पेशल थियरी ऑफ रिलेटिविटी (Special Theory of Relativity) में कहा कि पदार्थ का ऊर्जा-शक्ति में रूपांतर हो सकता है और ऊर्जा-शक्ति का पदार्थ में रूपांतर हो सकता है. इस सिद्धांत से ही अणुबम की खोज हुई! इस में किसी खास पदार्थ के एक अणु के विस्फोट से बहुत शक्ति उत्पन्न की जा सकती है. प्रवर्तमान अणुविद्युत मथक नियंत्रित अणुविस्फोट से ही विद्युत उत्पन्न करते हैं.

आइनस्टाइन ने उदहारण के साथ यह साबित किया कि प्रकाश दो अलग अलग गुणधर्म दर्शाता है. एक तरह से यह प्रकाश कणों (Photons) का याने कि पदार्थ का बना लगता है जब कि दूसरी तरह से यह तरंगों से बना है ऐसा लगता है और यह तरंग की भांति गतिशील बनता नजर आता है. यह विज्ञान की एक अत्यंत विस्मयकारी घटना है जिसका स्पष्टीकरण विज्ञान आज तक नहीं दे पाया है. यह बात विज्ञान की दूसरी मर्यादा की ओर संकेत करती है.

प्रकाश का ऐसा पदार्थ व तरंग जैसा विरोधाभासी तत्व हमें विज्ञान के सब से विचित्र और अज्ञात नियम की ओर ले जाता है. इस नियम को अनिश्चितता का सिद्धांत (Law of Uncertainty) कहते हैं. यह सिद्धांत ऐसा सूचित करता है कि यदि हम पदार्थ की इलेक्ट्रोन (Electron) की स्थिति को (Location) अत्यंत निश्चित रूप से जान पाते हैं, तो उस की गति के बारे में निश्चित रूप से नहीं जान पाते; और यदि गति को निश्चित रूप से जान पाते हैं तो उस की स्थिति के बारे में निश्चित रूप से नहीं जान सकते. दूसरे शब्दों में कहा जाए तो उस की स्थिति और गति, दोनों को एक साथ नहीं जाना जा सकता. परमाणु जगत को जानने की विज्ञान की कोशिश उस के लिए यह एक और मर्यादा बन जाती है.

आधुनिक न्यूक्लियर भौतिकशास्त्री पदार्थ की मूल रचना (Building Block) अथवा मूलभूत कण खोजने के लिए अत्यंत शक्तिशाली मशीन जिसे हाई एनर्जी पार्टिकल एक्सेलरेटर (High Energy Particle Accelerator) कहते हैं उनका प्रयोग करते हैं. इस मशीन में चुम्बकों के द्वारा परमाणुओं की गति को करीब करीब प्रकाश की गति तक ले जा कर एक दूसरे के साथ टकराकर उनके मलबे से नए नए परमाणु उत्पन्न कर के उनका निरीक्षण करते हैं. इस प्रयोग के द्वारा आज के वैज्ञानिक यह जानने की कोशिश करते हैं कि जब महान विस्फोट (Big Bang) हुआ उस समय ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति हुई और जो परमाणु उत्पन्न हुए तब ये परमाणु कैसे थे? किंतु इस प्रयोग करने पर उन को और भी नए परमाणु मिलें और आखिर में मूलभूत परमाणु कौन सा है यह सुनिश्चित नहीं किया जा सका. विज्ञान अभी इस मर्यादा की सीमा रेखा से आगे नहीं जा सका.

दूसरी तरफ वैज्ञानिकों को इस सूक्ष्मातिसूक्ष्म कणों में एक प्रकार की व्यवस्था व संवादिता नजर आती है जिस का वे अस्वीकार भी नहीं कर सकते. पदार्थ के बारे में उन के विश्लेषण से हमें ठोस (घन) लगता पदार्थ, विज्ञान के गहन निरिक्षण में तरल-तरंगों की संभावना और झलक सी दिखाई पड़ती विशेषता में बदल जाते हैं. विज्ञान की खोज ऐसा कहती है कि हमारी इन्द्रियों की भौतिक वास्तविकता क्या है उस के बारे में हमें भ्रमित करती है और केवल भ्रांतिपूर्ण जानकारी ही प्रकट करती है. इसीलिए हमारे महान चिन्तक (दार्शनिक), आदी शंकराचार्यजी ने जगत को मिथ्या कहा है. ऐसी हैं आधुनिक विज्ञान की सबसे बड़ी मर्यादाएं.

v पूर्ति करने का सिद्धांत: (Principle of Complementarity)

हम ऐसा सोचने के आदी हैं कि भौतिक जगत विभिन्न प्रकार के गुणधर्म, कद, आकार धारण करनेवाले पदार्थों से बना हुआ है और हम उनके निर्माण और उनकी गति के बारे में निश्चित मात्रा तक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं.

जब वैज्ञानिकों ने विद्युत अणु एवं अणु (परमाणु) Electrons and Atoms) का अध्ययन शुरू किया तब उनको पता चला कि जिन्हें पार नहीं किए जा सकते ऐसे कई अवरोध मार्ग रोके हुए हैं. इस दिशा में गहन जांच करने से ज्ञात हुआ कि प्रकृति के निश्चित नियम के अंतर्गत तय की गईं 'मर्यादाएं' स्पष्ट रूप से ऐसा कहतीं हैं कि 'आप यहां तक ही जा सकते हैं - इतनी सीमा तक ही आगे बढ़ सकते हैं, इस के आगे नहीं जा सकते.'

प्रकृति के गहन रहस्यों के मूल तक न पहुंच पाने की हमारी असमर्थता का कारण हम ऊर्जा-शक्ति अथवा अणु का विभाजन उस के मूल (तह) तक नहीं कर सकते यह है.

सुप्रसिद्ध जर्मन भौतिकशास्त्री वार्नर हैजनबर्ग (Warner Heisenburg) ने बताया कि भौतिक जगत के हमारे ज्ञान में सूक्ष्मकणों की स्थिति (Location) और गति को एक साथ नापा नहीं जा सकता. इस सिद्धांत का उपयोग इस प्रकार से कर सकते हैं कि पदार्थ के सारे तत्व, कभी स्वतन्त्र कण के रूप में तो कभी तरंग के रूप में हमारे सामने आते हैं, परंतु एक समय पर वे एक साथ कण और तरंग के रूप में सामने नहीं आते. यह बात समझने के लिए ठीक है, किंतु वास्तव में यह सिद्धांत हमारी समस्या के मूल तक पहुंचता है ऐसा नहीं लगता.

इस समस्या का समाधान अणु सिद्धांत के प्रणेता निल्स बोर (Niels Bohr) को अचानक ही मिल गया. आपने उसे 'पूर्ति करने का सिद्धांत' (Principle of Complementarity) नाम दिया. इस सिद्धांत के अनुसार निरीक्षक की परमाणु निरीक्षण की क्रिया ही परमाणु की स्थिति (अवस्था) पर प्रभावकारी है! वह उसे अलग रूप से देख नहीं सकता. इस से ऐसा समझा जा सकता है कि हमारे सिद्धांत ऐसे रूप में प्रस्तुत करने चाहिए कि जिन के साथ निरीक्षित पदार्थ और निरीक्षक के अपने निरीक्षण से ज्ञात लक्षणों के संबंध को स्पष्ट किये जा सकें.

यह खोज, आध्यात्मविद्या के विद्यार्थिओं के लिए अत्यंत रोचक है. निरीक्षण करते समय यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि उस समय निरीक्षक के मन में कुछ चल रहा है, यह जो कि निश्चित तौर पर मानसिक घटना है. अलबत्ता, उपरी तौर पर उसका कारण बाहरी जगत में कहीं पर है ऐसा निरीक्षक को प्रतीत होता है... घटना हमेशा बाह्य विश्व में घटती है ऐसी हमारी मानसिकता बाह्य विश्व की मूल वास्तविकता के साथ सुसंगत नहीं लगती. यह तो प्रकृति को दर्शाने की अपनी - मनुष्य की रीत है. बोर कहते हैं कि, 'इस घटना को दर्शाने का दूसरा तरीका भी है जो विश्व के परम रहस्य के अधिक निकट है. जब हम ऐसा अनुभव करते हैं कि हम सब इस समग्र सृष्टि के अभिन्न अंग हैं और जब हम इस कथित बाह्य विश्व का वर्णन करते हैं, तब हकीकत में हम अपने मन की विशिष्टताओं का वर्णन कर रहे होते हैं.' यह सत्य जब हमारी समझ में आ जाएगा तब हम विश्व की मूलभूत वास्तविकता की झलक पा सकेंगे.

v जीवन तथा पूर्ति करने का सिद्धांत : (Life and Complementarity)

पदार्थ की कण एवं तरंग की प्रकृति के ऐसे दो प्रकार के बर्ताव के साथ हमारा मन सहमत नहीं हो पता, मन को यह बात तर्कयुक्त नहीं लगती. इस के स्पष्टीकरण हेतु यह पूर्ति करने के सिद्धांत को खोजा गया था.

हमने देखा कि इस नियम का आविष्कार हुआ इसके पहले वैज्ञानिकों का ऐसा विश्वास था कि केवल घटना के स्थान एवं समय (कल) के पहलू पर ही ध्यान देना चाहिए. यह पहलू पदार्थ के कण के रूप में जो बरताव है उस के साथ सुसंगत है. इस में तरंग के रूप में जो बर्ताव है उसे एक अंक मान के चलते थे, जिस से कोई मार्गदर्शन नहीं मिल सकता था, जो आगे कोई पथदर्शन नहीं कर सकता था. परंतु अब पता चला है कि इन तरंगों में मार्गदर्शक चालक बल (शक्ति) होना आवश्यक है. उदाहरण के लिए इस चालक शक्ति का उपयोग विद्युत और चुम्बक की शक्ति से चलनेवाली ऐसी वस्तुओं में होता है जो कि पदार्थ से नहीं बनी. दरअसल यह विद्युत व चुम्बकीय शकित शून्यावकाश में भी प्रसारण कर सकती है, फ़ैल सकती है और यह पदार्थ से नहीं बनी. दूसरे शब्दों में कहें तो यह अलग विश्व की बात है, पदार्थ जगत की नहीं.

कण और तरंग की तरह जीवन के भी दो पहलू हैं जो एकदूसरे के पूरक हैं और दोनों सही हैं. उनमें से किसी की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती. एक पहलू हमें प्रकृति से प्राप्त यह भौतिक जगत हैं जिसे हम अपनी आँखों से देखते हैं. दूसरा पहलू हमारा आंतरिक विश्व है जिसे हम अपने मन से, मन की आन्तरिकता से देख पाते हैं.

इन अनुसंधानों का परिणाम यह है कि अब यह बात हमारी समझ में आने लगी है कि विश्व के और हमारी स्वयं की प्रकृति के बारे में हमारा ज्ञान अत्यंत सीमित हैं.

अब हमें इस बात पर पक्का भरोसा हो गया है कि हमारे दिमाग के अंदर विद्युत प्रवाहों के जरिए जो प्रवृत्तियां चल रही हैं वे हमारी मानसिक प्रवृत्तियों का परिणाम है, कारण नहीं. और इसे भौतिकशास्त्र से कोई संबंध नहीं है. यह भौतिकशास्त्र के अध्ययन क्षेत्र के बाहर की बात है; और यह मन और प्राण के विश्व की बात है.

गुफावासी

अपनी महत्वपूर्ण पुस्तक 'द रिपब्लिक' (The Republic) में ग्रीस के प्रख्यात चिन्तक प्लेटो (Plato) ने गुफा के दृष्टांत का उल्लेख किया है. यह दृष्टांत कई देशों में बहुत बार उद्धृत किया जाता है. साधारण रूप से पश्चिम के तत्वज्ञान (Philosophy) में उस का बहुमूल्य योगदान है. यह दृष्टांत छः हजार वर्ष पूर्व के एथेंस के लोगों के लिए जितना सुसंगत था, वर्तमान आधुनिक मनुष्य के लिए भी उतना ही लागू होता है. संक्षेप में प्लेटो (Plato) अपने मित्र ग्लोकन (Glaucon) को समझाता है कि मनुष्य किस तरह से जागृत हो सकता है.

प्लेटो कल्पना करता है कि एक कम रोशनीवाली अँधेरी सी गुफा में कुछ लोग बैठे हैं. उनको अपने स्थान पर जंजीर से बांध के रखा गया है ताकि वे गुफा से बाहर न जा सकें. और पीछे मुड के भी न देख सकें. उन के सामने आग जलती है. यह आग और बैठे हुए मनुष्यों के बीच एक बाँध जैसी छोटी सी दीवार है. वहां पर कुछ लोग हैं जिन्हें गुफा में बैठे हुए मनुष्य देख नहीं पाते. ये लोग अलग अलग प्रकार की वस्तुएँ बांस के सहारे ऊपर उठा कर बैठे हुए हैं. इन चीजों की परछाईं भीतर बैठे हुए मनुष्यों के सामनेवाली दीवार पर देखी जा सकती हैं और ये सब बैठे हुए लोग परछाईं की इधर उधर हो रही गति से सही (असली) वस्तु के बारे में बहस करने में मशगूल हैं.

ठीक इसी समय एक आदमी को उसकी बैठक से मुक्त कर के जबरन गुफा से बाहर लाया जाता है. शुरुआत में प्रखर सूर्य के प्रकाश में उस की आँखें चौंधिया जातीं हैं और पहले पहल वह अंधे की तरह कुछ देख नहीं पाता. जब उस की आँखें सूर्य प्रकाश से अभ्यस्त हो जाती हैं, तो उसे हिलते डुलते असल पदार्थों के आकार नजर आते हैं जो उसने गुफा की दीवार पर देखे हुए आकारों से कुछ कुछ मिलते है ऐसा लगता था. ये अज्ञात और विचित्र पदार्थों को ध्यान से देख कर वह फिर से गुफा में जाता है. उसने गुफा के बाहर जो देखा, जाना और जो नई सी खोज की उस के बारे में वह गुफा में बैठे हुए साथियों को बताने के लिए उत्सुक हो जाता है. उसने उनको कहा कि, 'इस दीवाल पर जो परछाइयाँ हैं उन के अर्थ के बारे में वे भारी गलती कर रहे हैं. इस दुनिया के अलावा गुफा के बाहर एक अदभुत दुनिया है, जिस में इस प्रकार की कई वस्तुएँ हैं और इन के अस्तित्व से वे बिलकुल अनजान हैं.'

गुफा में रहनेवाले लोग अत्यंत अहंकारी और आत्मविश्वासी थे. उन्होंने सोचा कि यह आदमी ऐसा कह रहा है कि हम सही बात को स्पष्ट रूप से परखने में असमर्थ हैं, उस का कहना है कि हमें ज्ञान नहीं है. इस पर वे आग बबूला हो गए. उन में से सब से अधिक सयाने लोगों ने अपने आसपास के जगत की सही स्थिति को गहराई से जांच कर के बड़े बड़े लेख लिखें हैं. और यह मनुष्य ऐसा कहता है कि उसने हमारी इस दुनिया से बहार की किसी ओर दुनिया को देखा है! ऐसा लगता है उसे निश्चित ही ऐसा दु:स्वप्न देखा है जिस से वह अपना दिमागी संतुलन खो बैठा है. उस की ऐसी बेसिरपैर की और बेढंगी बातों से प्रभावित हो कर क्या हमारा युवा बर्ग भटक नहीं जाएगा? ऐसा सोच कर उन्होंने निर्णय लिया कि उसे मार डालना चाहिए.

प्लेटो की गुफा के इस संक्षिप्त दृष्टांत से यह आसानी से समझा जा सकता है कि कथाकार ने किस कौशल्य के साथ मानव स्वभाव की लाक्षणिकता का निरूपण किया है. यह दृष्टांत आधुनिक विज्ञान की मूलभूत प्रकृति का कितनी सूक्ष्मता से वर्णन करता है इस का अध्ययन करना अत्यंत रोचक बात है.

'गुफा' में दीवार की परछाईं भौतिकशास्त्र और उस के साथ संबंधित विज्ञान का अध्ययन करने में आते भौतिक पदार्थों का रूपक है. टेलीस्कोप का उपयोग कर के जिस में 'गुफा' के गहनतम व गहरे भाग का अवलोकन करते हुए हम अपना अध्ययन जारी रख सकते हैं. सूक्ष्मदर्शक यंत्र का उपयोग कर के हम गुफा की बारिक बातों का विश्लेषण कर सकते हैं और परछाईयों में हो रहे छोटे से छोटे परिवर्तनों को ध्यान में ले सकते हैं. किंतु हम चाहे कितने भी भौतिक साधनों का उपयोग करें, परंतु उन से हमें जो ज्ञान प्राप्त होगा वह फिर भी केवल परछाईंयाँ के सन्दर्भ में ही होगा, इस से अधिक जानकारी प्राप्त नहीं की जा सकती. जिन्हें हम 'प्रकृति के नियम' कहते हैं, ये सर्वसामान्य नियम ऐसे रूप में प्रस्तुत किए जाते हैं कि जिन्हें 'गुफावासी' समझ पाएं. ये लोग इस भरोसे पर मुश्ताक रहते हैं कि वे अत्यंत जानकारी रखते हैं. वास्तव में वे बहुत ही कम जानकारी रखते हैं.

यदि हम यह स्वीकार करें कि हमारे लिए अपने आसपास के विश्व की सही प्रकृति के बारे में कुछ जानना और सीखना अधिक महत्वपूर्ण हैं और यदि हम अपने खुद के जीवन का अर्थ जानने व सिखने के लिए उत्कट इच्छा रखते हैं, तो हमें अपने मर्यादित व संकुचित विश्वासों की, धारणाओं की और कल्पनाओं की 'गुफा' से बाहर निकलने की और अपनीं आँखें चकाचौंध कर देनेवाली आध्यात्मिक वास्तविकता के परम प्रकाश का सामना करने की तैयारी रखनी चाहिए.

v यह जगत केवल छाया (भ्रांति) है :

हम मोह माया के मिथ्या जगत में जी रहे हैं. विज्ञान ने पिछले कुछ वर्षों में पदार्थ और अणु के विषय में, विकिरण और ऊर्जा के बारे में तथा हमारे जीवन के बारे में भौतिक पद्धतिओं के द्वारा, जटिल एवं बिलकुल यथार्थ व निश्चित परिणाम देनेवाले साधनों की सहायता से हमें बहुत जानकारी दी है. हमारे आसपास की दुनिया के विषय में हमारे वर्तमान ज्ञान का विवेचनात्मक विश्लेषण हमें इस विस्मयकारी नतीजे पर पहुंचा दिया है कि यह समूचा ज्ञान भ्रामक है, आभासी है. इस ज्ञान रूप का वर्णन करता है. हकीकत में रूप में भी परिवर्तन होता है और उस का पुनरावर्तन भी होता रहता है. जिस में एक भ्रम से दूसरा भ्रम उत्पन्न होता है. भौतिक विज्ञान इसे अपनी चेतना के परदे पर चल रहा भ्रांति का नाटक कहता है. परंतु विज्ञान हमें यह छाया किस की है उस मूल तत्व के बारे में कुछ भी कह पाने में संपूर्ण रूप से असमर्थ है. उस मूलतत्व के आधार पर ही हमारी इन्द्रियां हमें उस परम वास्तविकता के बारे में जानकारी देती है और ये परछाईंयाँ तो केवल उसका भ्रन्तिमूलक प्रतीक है.

गंभीरता से कोई ऐसा संदेह नहीं कर रहा कि परछाईं का कुछ गहन अर्थ है. और यदि हम आंतरिक रूप से इस अर्थ के बारे में कुछ जान पाते हैं तो ऐसी जानकारी हमारे रोजमर्रा के जीवन में मानवजाति के विकास में अवरोधक मुश्किलों को दूर करने में सहायक बन सकती है.

क्या अपनी इन्द्रियों के द्वारा प्राप्त जानकारी के आधार पर हम उस परछाईं के पीछे रही वास्तविक दुनिया के बारे में कुछ बता पाएंगे? इस प्रश्न का जवाब पाने के लिए सब से पहले हमें यह जानना चाहिए कि हमारे अनुभव के जगत में ऐसा कुछ है जिस का वर्णन नहीं किया जा सकता. इसलिए यह विज्ञान अथवा भौतिकशास्त्र के द्वारा वर्णित जगत या भ्रांति से संबंधित नहीं है. यह कोई ऐसा तत्व है जो अपार्थिव, अभौतिक जगत का है. भौतिक विज्ञान के पाठ्य पुस्तकों में दर्शाई गई पद्धतियों से अपार्थिव जगत के बारे में ज्ञान पाने की जो अपेक्षा रखी जाती है उससे कई अधिक गहरा ज्ञान हमारे पास है. क्यों कि हमारा मूल तत्व उसी का ही एक अंश है. उसे फोटोग्राफ्स में देखा नहीं जा सकता या गणित के समीकरण में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता. यह केवल संबंध दर्शाता है, परंतु वह उस वस्तु को नहीं दिखा पाता जिस के साथ हम संबंधित हैं. इस अपार्थिव जगत मन का ऐसा सुपरिचित जगत है कि जिस के साथ हम निरंतर संवाद करते रहते हैं और जिस का हम स्वयं अंश हैं.

v वास्तविकता - परम की खोज:

रोम के पास वेटिकन में 'द स्कूल ऑफ एथेंस' (The School of Athens) नामक रफाएल (Raphael) का बनाया हुआ एक भित्ति चित्र है. इस पेंटिंग में एथेंस की सुप्रसिद्ध अकादमी के कुछ महान तत्वज्ञानीओं को हम पहचान सकते हैं. हमें मध्य में वृद्ध प्लेटो और युवा अरस्तू को साथ साथ चलते हुए और तत्वज्ञान संबंधित विषयक कोई बातचीत कर रहे हैं ऐसा दिखाई देता है. प्लेटो का दायाँ हाथ ऊपर के स्वर्ग को दर्शाता है, जब कि अरस्तू का हाथ नीचे धरा की ओर है. हम सोच सकते हैं कि प्लेटो और अरस्तू, शाश्वत प्रश्न: 'सत्य क्या है और वह हमें कहाँ मिल सकता है?' इस विषय पर बातें कर रहे है. प्लेटो अपनी बात का आग्रह रखता है कि, 'हमें सत्य खोजने के लिए, जगत के सारे ज्ञान के अंतिम उदभव स्थान के लिए, धरती के उस पार जाना चाहिए.' जब कि अरस्तू का कहना ऐसा है कि, 'यदि हमें स्वर्ग तक ऊपर जाना है तो हमें प्रथम बिलकुल पास की वस्तुओं को जानना चाहिए.'

प्लेटो और अरस्तू के दृष्टिकोण के बीच जो भेद है उस पर शांतिपूर्ण ढंग से सोचने के बाद बहुत कुछ समझ में आता है. प्लेटो दृष्टा और आध्यात्मिक थे और आपने अपनी अंतर्दृष्टि से दुनिया देखी थी. भीतर भी झाँका था और विश्व को ब्रह्माण्ड की एक संपूर्ण व्यवस्था के रूप में भी अच्छे से देखा था. जब कि अरस्तू ने अपने चर्म चक्षु से जगत को अनगिनत संख्याओं में दृश्यमान, स्वतन्त्र पदार्थों से बना हुआ देखा था. उस का ऐसा दावा था कि इन पदार्थों का और उनके परस्पर आपसी संबंधों का अध्ययन करने से हम प्रकृति को उचित रूप से समझ पाएंगे और उस से बहुत कुछ ऐसा जान पाएँगे जो हमारे जीवन के लिए अत्यंत लाभप्रद सिद्ध हो सकेगा.

प्लेटो के द्वारा कल्पित जगत की परम वास्तविकता मनुष्य का अंतर मन है जो इन्द्रियों से पर एवं अगोचर है. परंतु यह हमारे आसपास के भौतिक जगत में परदे पर नजर आते चलचित्र की भांति दृश्यमान बनता है. इस अंतर्मन के विचारों का मूल परमात्मा की वैश्विक चेतना में है, जो कि मानसिक व भौतिक रूप की सारी वस्तुओं का अंतिम उदभव स्थान है. संक्षेप में ये विचार दर्शाते हैं कि हमारे भीतर की परम चेतना ही इस दृश्यमान भौतिक जगत का वास्तविक उदभव स्थान है. यह विचार जितने स्पष्ट रूप से जगत के सुविख्यात और महान बुद्धिमान जिऑर्डनो बुनो (Giordano Buno) ने प्रस्तुत किया है उतने स्पष्ट रूप से शायद आज तक किसी ओर ने नहीं किया. सन १६०० में बुनो को 'ईश्वर सर्वव्यापी है' ऐसा उपदेश देने के लिए एक खम्भे से बांध कर जला दिया गया था!

बाद के वर्षों में यह हकीकत अधिक स्पष्ट होती गई कि यह अखिल सृष्टि एक अखंड अस्तित्व है, और यह पूर्ण है. इस प्रकार यह प्लेटो की अंतर्दृष्टि के साथ सुसंगत बनती है. साथ साथ यह विद्वान अरस्तू की भी ऋणी है, क्योंकि आपने प्रकृति के पहलू का विस्तृत अध्ययन करने पर जोर दिया और तर्कशास्त्र की ऐसी स्वीकृत पद्धति विकसित की कि जिसका आज तक कोई विरोध नहीं कर पाया है.

इस विचार-विमर्श से एक विस्मयकारी बात यह सिखने मिली कि प्रकृति के नियम मनुष्य के मन के मूलभूत तत्वों के सूचक मात्र हैं, और इस विश्व को हम केवल इन्द्रियों के द्वारा जिस प्रकार से जानते हैं यह मूलभूत सत्य नहीं. किंतु इस मूलभूत सत्य को संभावना से वास्तविकता में परिवर्तित करने के लिए शारीरिक व मानसिक, दोनों प्रकार की प्रेरणा की आवश्यकता है.

सर्वोच्च स्तर पर हम यह सीखते हैं कि जिस में हम जी रहे हैं, क्रियाएँ, चेष्टा करते हैं तथा अपना अस्तित्व रखते हैं, हम उस परम सर्वशक्तिमान सत्ता के निरंतर संपर्क में होते हैं.

v क्या वैज्ञानिक ईश्वर पर विश्वास करता है?

ओस्लो, नॉर्वे में एक पुस्तक प्रकाशित हुई थी जिसका शीर्षक था: 'क्या वैज्ञानिक ईश्वर पर विश्वास करता है?' यह पुस्तक सुविख्यात शिक्षणशास्त्री फ्रेडरिक टी. रिक्टर (Fredrik T. Rikter) ने नॉर्वेजियन भाषा में लिखी थी. इस पुस्तक में प्राचीन और आधुनिक ऐसे कई जानेमाने वैज्ञानिकों के ईश्वर विषयक विचारों का संकलन किया गया है. इस पुस्तक की शुरुआत अर्नेस्ट हेकल (Earnest Haeckel) की प्रसिद्द पुस्तक 'द रिडल ऑफ दी यूनिवर्स' (The Riddle of the Universe) से निरीश्वरवाद का आंदोलन समग्र सभ्य जगत में किस प्रकार फ़ैल गया उस के वर्णन से होती है. हेकल ने स्पष्ट रूप से घोषणा की थी कि इस पुस्तक का आशय यह दर्शाने का है कि, 'विज्ञान की दृष्टि में ईश्वर जैसा कुछ भी नहीं है और ईश्वर को अखिल सृष्टि की सर्वशक्तिमान सत्ता नहीं माना जा सकता.' हेकल के समय में तत्पश्चात विज्ञान में बहुत सारी नई जानकारियां प्राप्त हुईं हैं. अब वैज्ञानिक ऐसा नहीं मानते हैं कि भौतिक विश्व की सारी मूलभूत समस्याओं का समाधान मिल गया है अथवा उनका समाधान अभी मिलनेवाला ही है. वर्तमान वैज्ञानिकों के अभिप्राय के अनुसार अब ऊर्जा, पदार्थ, जीवन और चेतना की उत्पत्ति के परम उदभव स्थान के रूप में और सृष्टि के एक अनिवार्य तत्व के रूप में ईश्वर की धारणा का स्वीकार किया गया है.

इस समय के अधिकतर वैज्ञानिक अब आइझेक न्यूटन (Isaac Newton) के साथ सहमत हो रहे हैं. आइझेक न्यूटन ने कहा था कि, 'मुझे ऐसा लगता है जैसे मैं छोटा बच्चा हूँ और सागर किनारे दूसरे बच्चों के साथ खेल रहा हूँ. ऐसे में मानों मुझे दूसरे बच्चों से अधिक सुन्दर एवं मुलायम पत्थर मिल गया हो, जब कि हकीकत में मुझे ऐसी प्रतीति अक्सर होती है कि मेरे सामने ही फैले विशाल समंदर में या उस के उस पार देखना अभी शेष है.'

हाल ही के वर्षों में प्रसिद्द वैज्ञानिकों के ईश्वर अथवा सृष्टि की सर्वशक्तिमान सत्ता विषयक विश्वासों एवं धारणाओं से संबंधित विधानों की एक सूची बनाई गई है. इस सूची को विभिन्न क्षेत्रों के वैज्ञानिकों के नाम विषय अनुसार नीचे दर्शाए गए हैं:

· खगोल विज्ञान :

१) सर जेम्स जीन्स : (Sir James Jeans)

'पिछली शताब्दी के प्रारंभ में हम ऐसा सोचते थे कि परम वास्तविकता की शाब्दिक परिभाषा दी जा सकती है. अब अखिल सृष्टि को एक विशाल यंत्र के रूप में देखने के बजाय एक महान विचार (संकल्पना) के रूप में और अखिल सृष्टि में एक सर्जनात्मक तत्व देदीप्यमान है, विद्यमान है इस प्रकार से देखा जाता है.'

२) पोल हीगार्ड : (Poul Heegard) कोपन हेगन युनिवर्सिटी :

'संभवतः ब्रह्माण्ड का खगोलशास्त्रीय चित्र वास्तव में आध्यात्मिक जगत का एक आवरण मात्र है. विज्ञान की पद्धतियों से आध्यात्मिक जगत को जाना नहीं जा सकता.'

३) डबल्यु. एम. स्मार्ट : (W.M.Smart) ग्लासगो युनिवर्सिटी :

'हमें यह अनिवार्य रूप से स्वीकारना पड़ रहा है कि सर्जनात्मक शक्ति का अस्तित्व ऐसा है कि जो हमारी समझदारी की मर्यादा से परे है.'

· शरीर विज्ञान : (Physiology)

१) जोन बर्ग : (John Barg): स्टॉकहोम के मेडिसिन के प्रोफ़ेसर :

'मुझे ईश्वर के अस्तित्व पर कभी भी संदेह उत्पन्न नहीं हुआ. जैसे जैसे में अपने भीतर की सूक्ष्म आवाज को सुनना सीखता जाता हूँ, वैसे वैसे यह बात मेरी समझ में आ रही है कि इस भीतरी आवाज का हेतु मनुष्य को उसकी नैतिक सम्पूर्णता के प्रति ले जाना है. नाझारेथ के जीसस (इशु-ख्रिस्त) के सिवा अब तक उससे अधिक सम्पूर्णता किस प्रकार से पाई जा सकती है यह कोई नहीं कह सका है.'

२) फ्रेडरिक रिंके : (Friedrik Reinke): जर्मनी, रोस्टोक की एनेटोमिकल इंस्टीट्यूट:

'जिस के मूल के बारे में हमें नहीं पता ऐसी परम शक्ति की उपेक्षा करना एक जीवशास्त्री (Biologist) के लिए असंभव है. इसीलिए हमें अखिल सृष्टि का संचालन करनेवाले किसी सचेतन अस्तित्व का स्वीकार करना ही पडता है.'

३) अलेक्सिस करेल : (Alexis Carrell): सुविख्यात शरीर वैज्ञानिक:

'पदार्थमय विश्व के वारे में हमारी सोच संकुचित है. मनुष्य भी भौतिक अस्तित्व ही है, किंतु यह स्थान व समय से परे ऐसे जगत से आया हुआ अस्तित्व है.'

· रसायन शास्त्र :(Chemistry)

१) जस्टस वोन लिबिग : (Justus Von Liebig):

आपको 'रसायनशास्त्र के राजकुमार' कहा जाता है. वे अपनी एक पुस्तक में लिखते है: 'यह जगत सर्वशक्तिमान की सत्ता एवं विद्धिमानी का इतिहास है. प्रकृति का हमारा अध्ययन हमें उस सर्जक की महानता की प्रशंसा करने को बाध्य करता है. हमारी कल्पनाशक्ति और तर्कशक्ति उस सर्वशक्तिमान के बारे में हमें चाहे कुछ भी कहे, उस का परिणाम साबुन के पानी के सुन्दर रंगीन बुलबुले से विशेष कुछ भी नहीं है.'

· वनस्पतिशास्त्र : (Botany)

१) लुईस पाश्चर :(Louis Pasteur) :बेक्टेरिया के संशोधक फ्रेंच विद्वान:

आप बहुत ही पवित्र आदमी थे और हमेशा अपनी प्रयोगशाला के कार्य में मदद करने के लिए ईश्वर को प्रार्थना करते थे. ऐसा कहा जाता है कि १८९५ में उनकी अंतिमयात्रा में पूरे फ़्रांस के सरकारी अधिकारी अंत तक एक, पवित्र स्थान तक शामिल रहे थे. इस यात्रा में जिन्हें ईश्वर से कोई सरोकार नहीं था ऐसे लोगों का भी समावेश हुआ था. इस पवित्र स्थान को पुनरुत्थान और शाश्वत जीवन का प्रतीक माना जाता है.

२) जे. एस. हल्डेन : (J.S. Haldane) :

यह सुविख्यात ब्रिटिश जीवशास्त्री (Biologist) अपनी पुस्तक, 'द फिलोसोफी ऑफ द बायोलोजिस्ट' में लिखते हैं कि, 'भौतिक और आध्यात्मिक जगत के अंतिम विश्लेषण में ईश्वर का आविर्भाव है.'

३) जोह्न्निस रिंके : (Johannes Reinke):

जर्मनी की केइल युनिवर्सिटी के यह प्रोफ़ेसर अपनी पुस्तक 'द वर्ल्ड एज फैक्ट' (विश्व एक हकीकत) में लिखते हैं कि, 'सृष्टि की परम चेतना का मन भौतिक शक्तियों का उपयोग कुछ इस प्रकार से करता है जैसे कोई मशीन बनानेवाला अपने मशीन के पुर्जे बनाते समय कर रहा हो. हम देखते हैं कि मशीन जिस प्रकार से मानवबुद्धि की खोज है, इसी प्रकार से हम जीव जगत की प्रक्रियाओं के पीछे रही परम चेतना को देखते हैं.'

· पदार्थविज्ञान : (Physics):

१) आर्थर एच. कोम्प्टन :(Arthur H. Compton) :

नोबेल पुरस्कार प्राप्त यह विद्वान सेंट लुइस, मिसोरी की वोशिंग्टन युनिवर्सिटी के चांसलर (कुलाधिपति) हैं और आप लिखते हैं कि, 'जो वैज्ञानिक ईश्वर का स्वीकार करता है उसे ऐसा लगता है कि ईश्वर प्रकृति में है और यह भौतिक जगत ईश्वर की इच्छा का ही प्रकट स्वरूप है.'

२) वोरेन विवर : (Warren Weaver) :

रोकफेलर इंस्टीट्यूट के विद्वान लिखते हैं कि: 'जब वे यह जानना चाहते हों कि कोई बात सही है या गलत, तब ईश्वर उन्हें स्पष्ट आवाज में जो नैतिक रूप से सही है यह बताते हैं. मुझे मेरे जीवन की एक भी घटना याद नहीं कि जब मुझे ईश्वर से जवाब नहीं मिला हो.'

३) मेक्स प्लेंक : (Max Planck) :

आपने विज्ञान की शायद आज तक की सब से बड़ी खोज की है जो क्वोंटम ऑफ एक्शन का नियम है. आपने कहा है कि, 'वैज्ञानिकों ने अब यह समझने की शुरुआत की है कि उनके संशोधनों का प्रारंभिक हिस्सा इन्द्रियों के द्वारा संपूर्ण रूप से जाना नहीं जा सकता. और भौतिकशास्त्र अध्यात्मशास्त्र के कुछ अंशों के बगैर आगे बढ़ नहीं सकता.'

४) अल्बर्ट आइनस्टाइन : (Albert Einstein) :

आप कहते हैं कि 'सच्चा धर्म अंधविश्वास के द्वारा समझ में नहीं आता, परंतु हमारे बौद्धिक ज्ञान के विस्तारण के द्वारा आता है.'

विश्व के बहुत सारे महानतम वैज्ञानिकों ने इस बात का स्वीकार किया है कि ईश्वर अपने आप को अपने आसपास की प्रकृति में प्रकट करता है, परंतु हम में से अधिकतर लोगों को ईश्वर, सब से अधिक स्पष्ट रूप से, मानव मन में प्रकट होते हैं ऐसा लगता है.

अब आगे गत शताब्दियों के दो सुविख्यात वैज्ञानिकों के महत्वपूर्ण संशोधन एवं आध्यात्मिक जगत के बारे में उनके दृष्टिकोणों को प्रस्तुत किया गया है. यह विवरण आध्यात्मिकता को और हमारे अस्तित्व के रहस्य को समझने में अत्यंत महत्वपूर्ण है.

v मेक्स प्लेंक :

वर्तमान समय के सब से महान वैज्ञानिक मेक्स प्लेंक ने 'क्वोंटम् ऑफ एक्शन' की खोज की और इस संशोधन से आपने भौतिक विज्ञान की दुनिया में बिलकुल नया दर्शन प्रकट किया. इस खोज से आज के वैज्ञानिक प्रकृति की सूक्ष्म रचना में गहरे उतरने के लिए प्रोत्साहित हुए हैं. प्लेंक की खोज भौतिक जगत की वास्तविकता के नजदीक पहुँच पाई है, आम तौर पर ऐसा स्वीकार किया गया है. इस खोज हमारे सामने आदिकाल से अज्ञात रहस्य प्रकट हुआ है.

मेक्स प्लेंक केवल एक महान पदार्थ वैज्ञानिक ही नहीं थे, आप महान तत्वचिन्तक भी थे. इस महान वैज्ञानिक-दार्शनिक ने अपनी पुस्तक 'वेअर इज द सायंस गोइंग?' में दिए गए सारांश में से कुछ निष्कर्षों का यहां पर उल्लेख करना आवश्यक लग रहा है:

अंग्रेज तत्वचिन्तक ज्होन लोकी (John Locke) ने ऐसा दवा किया था कि हमारा सारा ज्ञान ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा (सेन्स डेटा से) आता है. प्लेंक इस बात से सहमत नहीं हुए और आपने लिखा कि: ज्ञानेन्द्रियों का प्रभाव हमें परमतत्व (अल्टीमेट रियालिटी) के बारे में कोई जानकारी नहीं दे सकता. हालाँकि ये हमें हम जिस जगत में जी रहे हैं उस से संबंधित व्यावहारिक मूल्यों का बेशुमार ज्ञान दे सकता है. अपनी ज्ञानेन्द्रियों के उपरांत मनुष्य के पास मन भी है और उसकी सहायता से वह सर्वशक्तिमान सत्ता कि जो भौतिक ज्ञानेन्द्रियों से पर है, उस की हल्की सी झलक पा सकता है. अपनी ज्ञानेन्द्रियों की मर्यादा दूर करने के लिए मनुष्य को आध्यात्मज्ञान के विश्व में प्रवेश करना ही पड़ता है. यह विश्व रहस्यमय भूमि का प्रदेश है. अध्यात्म की प्रकृति को मनुष्य की विचारशक्ति से पाया नहीं जा सकता, परंतु हम उस की सुसंवादिता और उस के सौंदर्य को समझने का प्रयास करते हुए ही उस के बारे में कुछ जान सकते हैं.

विषय की गहराई में जाता हुआ प्लेंक का विश्लेषण भौतिक कार्य-कारण और हमारी स्वतन्त्र इच्छा के बीच स्पष्ट रूप से नजर आते घर्षण की समस्या का उपाय ढूँढने की प्रामाणिक कोशिश करता है.

जिस विश्व में हम जी रहे हैं उसी का हम अखंड अंश हैं. जिसे हम प्रकृति की व्यवस्था कहते हैं यह सृष्टि की अन्य सारी घटनाएँ कार्य-कारण के अधीन हो कर घट रही हो तो फिर मनुष्य की कार्य करने की स्वतंत्रता को इस व्यवस्था से अलग रूप में कैसे देखा जा सकता है? कार्य-कारण का सिद्धांत सर्वव्यापी रूप से लागू नहीं होता हो तो हम उस की सीमा रेखा कैसे और कहाँ तक तय कर सकते हैं? सृष्टि के सर्जनों में कहाँ पर यह सिद्धांत लागू होता है और कहाँ यह नियम लागू नहीं होगा? यह देखना चाहिए और ऐसा क्यों होता है यह जानना चाहिए.

इस प्रश्न का जवाब मात्र कल्पना या तर्क के आधार पर तय नहीं हो सकता. भौतिक वास्तविकता के उस पार जाने के लिए हमें विचारशक्ति का सामर्थ्य प्राप्त  है. और यदि हमें इस वैचारिक बुद्धि का उपहार नहीं मिला होता तो हमारे पास काव्य, संगीत या कला का ज्ञान होता ही नहीं. वस्तुतः यह मनुष्य को मिली हुई सर्वोच्च और सब से मूल्यवान शक्ति है. जब भी प्रति दिन के जीवन के बोझ के तले दबते मनुष्य को यह बोझ असह्य लगाने लगे तब वह अपने विचार द्वारा मार्गदर्शन पाने की क्षमता रखता है, यह उस के लिए बहुत ही उपकारक है.

प्लेंक का दावा है कि मनुष्य की आत्मा का उच्चतर जीवन भौतिक कार्य-कारण के नियम से मुक्त रहता है. उस का संचालन जड़ कायदे-क़ानून के बजाय अधिकतर जागृत अन्तःकरण के द्वारा होता है.

'वैज्ञानिक को चाहिए की वह धर्म के मूल्य को समझे, भले ही वह किसी भी रूप में हो, धर्म और विज्ञान के बीच कभी वास्तविक विरोध नहीं हो सकता, क्यों कि वे परस्पर एकदूसरे के पूरक हैं. हमारे ज्ञान में हो रही हर एक वृद्धि हमें अपने अस्तित्व के रहस्य से परिचित करती है.

v अल्बर्ट आइनस्टाइन :

अल्बर्ट आइनस्टाइन १९५५ में चल बसे तब आप की आयु ७६ वर्ष की थी. सैद्धांतिक भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में न्यूटन के बाद आपने बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान दिया है और समग्र विश्व उन के प्रति आदर से देखता है. परंतु बहुत से लोग आपके 'ईश्वर और प्रकृति' के साथ के संबंध के बारे में भी जानना चाहते हैं.

इस मुद्दे पर आइनस्टाइन के द्वारा कुछ विचार प्रस्तुत किए गए हैं जिस का सारांश यहां पर प्रस्तुत किया गया है:

'मैं नास्तिक हूँ' ऐसा साधारण सा ख़याल संपूर्ण गलतफहमी का परिणाम है. इस के बदले ऐसा कहना चाहिए कि 'मैं मेरे अपने ईश्वर पर विश्वास करता हूँ और मैं अपनी अंतरात्मा की आवाज से दृढ़तापूर्वक ऐसा कह सकता हूँ कि पल भर के लिए भी मैंने निरीश्वरवादी (नास्तिक) जीवनदृष्टि का समर्थन नहीं किया है. एक युवा विद्यार्थी के रूप में मैंने जीवन और उस की उत्पत्ति के बारे में पुराने प्रचलित विचारों का स्वीकार नहीं किया है.

मेरा धर्म परमतत्व की विनम्र रूप से स्तुति करने में रहा है. यह तत्व बहुत सारी छोटी से छोटी बातों में प्रकट होता है और जिसे हम हमारी समझदारी की अत्यंत मर्यादित शक्ति के द्वारा भी पा सकते हैं. ऐसे दृढ़ विश्वास से, भीतर की गहराई से जब अनुभूति होती हो तब अखिल सृष्टि में व्याप्त उस महा शक्तिमान एवं समर्थ प्रज्ञावान तत्व का अस्तित्व ही मेरे ईश्वर के प्रति विश्वास का आधार बनता है. निजी रूप से मुझे ऐसी तसल्ली हो गई है कि धर्म के अभाव में मनुष्य अब भी पशु ही रहा होता और समाज अब भी बिलकुल उस की प्राथमिक अवस्था में ही होता जिस में किसी के भी जानमाल की सलामती नहीं होती प्रत्येक मनुष्य एकदूसरे से लड़ रहा होता. मनुष्यजाति की नैतिक प्रगति के लिए हमेशा धर्म ही एक प्रेरक बल रहा है.'

'जिसे मैं वैश्विक धार्मिकता कह सकूं ऐसे अस्तित्व पर मैं विश्वास करता हूँ. जिस मनुष्य के भीतर ऐसा भरोसा बिलकुल नहीं होता उसे समझाना बहुत ही मुश्किल है. ब्रह्माण्ड के इस धार्मिक विश्वास का आविर्भाव डेविड की और कुछ पयगम्बरों की ईश्वर स्तुति में पाया जाता है. बौद्ध धर्म में यह प्रबल तत्व है. प्रत्येक युग में पाखण्डियों के सामने ऐसे मनुष्य स्पष्ट रूप से पाए जाते हैं कि जो परम उच्च कोटि की धार्मिक प्रेरणा की अनुभूति पाते हैं. इसी सन्दर्भ में देखा जाए तो उन्हें डेमोक्रेटस, असीसी के फ्रांसिस और स्पिनोझा के समकक्ष मनुष्यों की कोटि में रखा जा सकता है.'

'इस प्रकार हम धर्म और विज्ञान के संबंध में ऐसी धारणा पर आते हैं कि जो साधारण धारणाओं से बिलकुल अलग है. ऐतिहासिक रूप से इसे हम विज्ञान और धर्म को दो परस्पर विरोधी बातों के रूप में देखने के आदी हैं. इस का कारण यह है कि जो मनुष्य सृष्टि की समग्र रचना को केवल कार्य-कारण का सैद्धांतिक नियम ही मानता है, वह ऐसे अस्तित्व का स्वीकार नहीं कर पाता जो इस नियम के अपवाद के रूप में हो.'

मुश्किल यह है कि जिस भौतिक जगत में कार्य-कारण का सिद्धांत अति नियमनिष्ठ तौर से लागू होता है वहाँ 'क्वोंटम मिकेनिक्स' केंद्र स्थान पर है कि नहीं यह संदिग्ध है. 'कोपन हेगन स्कूल ऑफ थोट' में नील बोर और हाईजन बर्ग जैसे सुविख्यात वैज्ञानिकों के द्वारा ऐसा दावा किया गया है कि जब मनुष्य किसी भी तत्व या पदार्थ के सूक्ष्म प्रमाण के बारे में वर्णन करता है, तब उस के वर्तन के बारे में ऐसा कुछ संभावित है केवल इतना ही कह सकता है. हमारे आसपास के विश्व में भी कार्य-कारण का सिद्धांत दृढतापूर्वक लागू होता है ऐसा नहीं कहा जा सकता.

आइनस्टाइन का विश्वास था कि 'ईश्वर सर्वत्र विद्यमान है'. इस के बारे में बहुत ही कम संदेह है. उनका पक्का विश्वास था कि ईश्वर स्पष्ट रूप से हमारे मन में प्रकट होते हैं. धर्म ऐसे ही प्रकटीकरण का परिणाम है.

v मनुष्य की आत्मा :

अनेक जाति और धर्म के लोग मनुष्य की आत्मा की अमरता में विश्वास करते हैं. इस विचार का उदभव शायद मृत मित्र और रिश्तेदारों को फिर से मिलने की इच्छा में से हुआ हो सकता है. शायद उसे 'धार्मिक' और 'पवित्र मनुष्यों का समर्थन प्राप्त होने से दृढ़ हुआ होगा. अथवा शायद यह इन्द्रियों द्वारा अर्द्ध जाग्रत मन में हुए दूसरे विश्व के अस्तित्व के अनुभूतिजन्य ज्ञान के कारण भी हो सकता है. कई लोगों का विश्वास है कि आत्माओं की दुनिया से कुछ ऐसे सन्देश आते हैं जिन की जानकारी केवल मृत मनुष्य के सिवा किसी को नहीं होती. ऐसी जानकारी के विवरण को बाद में जांचने पर सही पाई जाती है. प्राकृतिक विज्ञान ऐसे विचारों का समर्थन नहीं करता इस का प्रमुख कारण आज का विज्ञान ऐसी घटनाओं के बारे में कोई स्पष्टीकरण नहीं दे पाता यह है.

पिछले कुछ वर्षों में स्थल और समय के भौतिक जगत के बारे में हमारे ज्ञान में काफी कुछ वृद्धि हुई है फिर भी, अभौतिक और भौतिक विश्व के संबंध के बारे में बहुत कम प्रगति हुई है. कभी इस संबंध को लोकप्रिय भाषा में मन और पदार्थ के बीच के संबंध के रूप में अथवा शरीर और आत्मा के बीच के संबंध के रूप में भी जाना जाता है.

पदार्थ का विश्व और मन का विश्व एकदूसरे से इतना भिन्न लगता है कि उन के बीच के संबंध को समझाने की कोशिश कर रहे कुछ तत्वचिंतकों ने - चैतन्य को, समानता को एक मानसिक प्रक्रिया के रूप में दर्शाने की कोशिश की है जो दिमाग के भीतरी ज्ञानतंतुओं के संवेदनशील कोशों की उत्तेजना से जुडी हुई बात है. कुछ तत्वज्ञानी ऐसा दावा करते हैं कि जिसे हम 'भौतिक विश्व' के रूप में देखते हैं यह मन की भ्रांति (छलावे) का खेल है अथवा उसे हम अपनी कल्पना से बनाई गई तसवीर के रूप में भी देख सकते हैं. हमारा सावधान रहना आवश्यक है कि कहीं इसे हम परमतत्व न समझ बैठें. यह परमतत्व हमारी बुद्धि या समझदारी की मर्यादा के उस पार है. आज सारे वैज्ञानिक इस वैज्ञानिक प्रमाण को मानते हैं कि सृष्टि की उत्पत्ति एक सूक्ष्मबिंदु के अज्ञात विस्फोट बिग बेंग के साथ हुई है. परंतु विज्ञान हमें यह नहीं कह पाता कि इस अति सूक्ष्म बिंदु में यह ऊर्जा कहाँ से आई और उसका सर्जन करने वाला कौन है?

फिर भी हमें भरोसा हो गया है कि शून्य से कुछ भी सर्जन नहीं होता. हम उस नतीजे पर आने के लिए प्रेरित होते हैं कि इस शक्ति का उदभव बिलकुल किसी अन्य जगत से हुआ होना चाहिए. दूसरा एक जगत ऐसा है कि जिस के बारे में हम कुछ जानकारी रखते हैं और यह स्पष्ट रूप से हमारी चेतना का मानसिक जगत है. अतः हम उचित रूप से ऐसा कह सकते हैं कि स्थान और समय के भौतिक जगत के उस पार एक मानसिक जगत है जिसे हम देखते हैं वह ऊर्जा और पदार्थ परम वैश्विक शक्ति के मनकी क्रिया द्वारा अस्तित्व में आती है. विविध संस्कृति के लोग इस शक्ति को विभिन्न नाम से जानते हैं. हम उसे ईश्वर कहते हैं.

v दृश्यमान एवं अदृश्य विश्व :

जब हमारे सामने ऐसे असामान्य तत्व आते हैं जिस के बारे में हम स्पष्टीकरण नहीं दे पाते तब अधिकतर लोग ऐसा कहते हैं कि 'मैं केवल उस बस्तु पर ही भरोसा करूँगा जिसे मैं अपनी आँखों से देख सकूं.' उन लोगों को ऐसा लगता है कि उन्हें केवल बाह्य विश्व के साथ ही निसबत है और उसे अपनी आँखों से - शायद माइक्रोस्कोप या टेलीस्कोप या फिर कैमरे से - ही अच्छी तरह समझा जा सकता है. दूसरे शब्दों में कहें तो केवल उसी वस्तु के अस्तित्व पर हम विश्वास करते हैं जिसे हम देख सकते हैं और वही वास्तविक अखिल विश्व है, वही सच है. जिसे हम देख नहीं पाते उसका अस्तित्व संदेहयुक्त है और शायद वह भ्रान्ति का परिणाम भी हो सकता है.

आज हम जानते हैं कि दृश्यमान जगत कि जिसे हम देखते हैं वह सच नहीं है, परंतु पिछली शताब्दी तक साधारण रूप से ऐसा माना जाता था कि जिसे हम देखते हैं उसी में सब कुछ समाविष्ट हो जाता है. उस समय के इस भौतिकतावादी विज्ञान ने (मतलब कि जडतावादी विज्ञान ने) ऐसा दावा किया कि यह बाह्य जगत को भौतिक गतिमान कणों के सन्दर्भ में संपूर्ण रूप से जाना जा सकता है और उसका वर्णन किया जा सकता है और उसके अध्ययन के द्वारा हम जिसे देखते हैं उस जगत के अस्तित्व को सिद्ध किया जा सकता है. गत शताब्दी के भौतिकतावादी विज्ञान का दूसरा दावा यह था कि हमारे आसपास की प्राकृतिक बातों के बारे में जितने भी प्रश्न पूछे जा सकें उनके जवाब मिल सकते हैं. प्रकाश केवल ईथर जैसे माध्यम के द्वारा तरंग के रूप में फैलते हैं ऐसा समझा जाता था और आवाज (ध्वनि) का प्रसार सिर्फ वायु में होते कंपन के द्वारा ही होता है ऐसा नियम प्रचलित था. जीवंत कोष जटिल सूक्ष्मातिसूक्ष्म कोशों की रचना से बने हुए होते हैं जिनकी रहस्यमय रचना ऐसी होती है कि जिस से वह जीवन जीने के लिए आवश्यक कार्य कर सकें और सचेत रूप से सोच भी सकें!

ऐसी विचारधारा को उस समय के विद्वानों ने गंभीर रूप से स्वीकारा जो कि वैज्ञानिक विचारधारा के इतिहास में एक दुखद घटना है.

इस शताब्दी का विज्ञान इस बात पर यकीन करता है कि हमारी भौतिक इन्द्रियों के द्वारा मिलते प्रमाण हमारे सामने बाह्य-विश्व का यथार्थ चित्र प्रस्तुत नहीं कर सकते. प्रत्येक वैज्ञानिक और तत्वज्ञानी अब जानता है कि रंग और ध्वनि मानसिक अनुभव है.

बाह्य भौतिक जगत में उसका अस्तित्व है ऐसा दावा नहीं किया जा सकता. अलबत्ता नि:स्संदेह विचार, कल्पना एवं भावों का मनुष्य और समाज पर गहरा प्रभाव हो सकता है. किंतु ये अदृश्य, अभौतिक विश्व के साथ जुड़े हुए हैं.

इस बात का समर्थन किया गया है कि हम भ्रांति (छाया) की दुनिया में जी रहे हैं, ठीक उसी प्रकार से जैसे कि परदे पर नजर आते चलचित्र को हम देखते हैं. हमारे लिए उस के मूल स्वरूप और मर्म तथा उस का उदभव कैसे होता है इस विषय में सीखना असंभव है. असल में हम इस ब्रह्माण्ड में खेले जा रहे नाटक में साझेदार है, हम केवल दर्शक नहीं. सब को अपनी अपनी भूमिका निभानी है, भले ही यह भूमिका छोटी हो या बड़ी.

एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि मानव जीवन के नाटक के दो पहलू हैं - एक, यह कि जो हम देखते हैं वह जगत में व्यक्त होता है. जब कि दूसरा पहलू अदृश्य विश्व के सन्दर्भ में है. दृश्यमान विश्व में लोग अभिनेता जैसे हैं जो कि आम तौर पर खुद को अधिक से अधिक अच्छा दिखाने की कोशिश करते हैं. जैसे कि वे हीरो-हिरोइन के अनुरूप वस्त्रों में सज्ज होते हैं, परंतु परदे के पीछे की दुनिया में आध्यात्मिक वास्तविकता के आंतरिक जगत में, वे लोग किसी भी प्रकार के मेक-अप के बगैर, बिना किसी स्क्रिप्ट संवाद बोलते हैं. उनके भीतर की प्रकृति तब गुप्त या अव्यक्त नहीं रहती.

हम देखते हैं कि इस विश्व में बहुत से छल-कपट होते हैं किंतु अध्यात्म के प्रदेश में ऐसा कुछ नहीं हो सकता क्यों कि वहां कोई भी बात हमेशा के लिए गुप्त नहीं रह पाती. भौतिक विश्व भ्रांति है, छलावा है, जब कि आंतरिक विश्व वास्तविक एवं सही विश्व है. भौतिक जगत में हमारी भूमिका क्षणिक है जब कि आंतरिक और आध्यात्मिक जगत में हमारी भूमिका शाश्वत है, सनातन है.

युगों से लगभग सभी मानवजातिओं ने उस परम आध्यात्मिक हस्ती के इस विचार का अनुमोदन किया है. यह हस्ती उच्च व महान है जिस में से सारी वस्तुएँ उत्पन्न हुईं है. (स्ट्रोम्बर्ग-१९५३). उसे विविध नाम दिए गए हैं, जैसे कि महान आत्मा (परमात्मा), यहोवाह और अल्लाह; प्लेटो ने उसे विश्व-आत्मा (एनिमा म्युंडी) कहा और जिऑर्डनो बुनो ने प्लेटो के इस ख्याल पर अपने जीवन का बलिदान दिया. हमारे वेदांत की विचारधारा में उसे परमब्रह्म कहा जाता है. यह संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है अंतिम आध्यात्मिक तत्व. अंग्रेजी भाषा में इसे ईश्वर (गोड) कहा जाता है.

ये उद्धरण 'अ सायन्टीस्ट व्यू ऑफ मेन, माइंड एंड दि युनिवर्स' गुस्ताफ स्ट्रोम्बर्ग, लोस एन्जेलस : सायंस एंड माइंड पब्लिकेशंस, १९६६, से उद्धृत किए गए हैं:

नोट: पाठकों को यह अत्यंत सुन्दर और महत्वपूर्ण पुस्तक अवश्य पढ़ने की अनुशंसा की जाती है.

इस अध्याय से संबंधित सुविचार

· जब हम किसी अत्यंत गहन एवं मनोहर भावना का अनुभव करते हैं तब हमें वास्तविकता से परे कोई रहस्यमय तत्व की भ्रांति होती है. यही तत्व सच्चे विज्ञान का उदभव स्थान है. जो मनुष्य ऐसी संवेदना का अनुभव नहीं कर सकता, वह चकित हो कर आनंदमग्न नहीं हो सकता. वह मृत मनुष्य के समान है. हम जानते हैं कि जो तत्व हमारे लिए अज्ञात है फिर भी अस्तित्व में है, जो अंतर्यामी है, जो अनन्य सौंदर्य से परिपूर्ण है वही तेज स्वरूप सर्वत्र विद्यमान है. परंतु हमारी सीमित इन्द्रियां इसे पूर्ण रूप से जानने के लिए असमर्थ हैं - केवल यही ज्ञान, यही भाव सच्ची धार्मिकता का केंद्रबिंदु है. -अल्बर्ट आइनस्टाइन:(Albert Einstein)

· वर्तमान वैज्ञानिक धारणाएं जो कि अणुविज्ञान के अनुसंधानों पर आधारित हैं, ये आविष्कार बिलकुल अज्ञात या जिन के बारे में कभी कुछ सुना न हों ऐसे नहीं हैं. पश्चिम की सभ्यता में भी इस का इतिहास है, परन्तु विशेष रूप से बौद्ध और हिंदु विचारधारा में इन संशोधनों का केंद्रबिंदु है. इस समय हमें जो ज्ञात हो रहा है वह उसके उदाहरण के रूप में है, प्रेरणा के रूप में है और इस में उन पुराने खयालों का विकास होता हुआ नजर आता है. -जूलियस रॉबर्ट ओपनहाईमर (Julius Robert Oppenheimer)

(प्रथम अणुबोम्ब का प्रणेता और विस्फोट का गुप्त प्रयोग करनेवाले अमरीकी वैज्ञानिक)

गति एवं परिवर्तन प्रत्येक पदार्थ का आवश्यक गुणधर्म है. पदार्थ को गति देनेवाला तत्व पदार्थ के बाहर है इस बात पर पुराने ज़माने के ग्रीक वैज्ञानिक दृढतापूर्वक विश्वास करते थे. किंतु इस समय के वैज्ञानिकों के अन्वेषण के अनुसार यह तत्व पदार्थ के भीतर ही मौजूद है जो कि उसका मूलभूत गुणधर्म है.

ऐसे ही पूर्व का परमात्मा विषयक विश्वास ऐसा नहीं है कि परमात्मा ऊपर अवकाश में रहते हुए इस विश्व का संचालन कर रहे हैं, किंतु यह परमतत्व भीतर रहकर ही पूरा संचालन कर रहे हैं. [देखिए ब्रुहदारण्यक उपनिषदक : जिस में लिखा है:

'यह तत्व सब के अंदर विद्यमान है फिर भी सब से परे हैं, इस तत्व को सब जान नहीं पाते हैं किंतु यह सब के शरीर में है. जो भीतर से सब का संचालन करता है वह तत्व ही आप की अंतरात्मा है. वही आंतरिक संचालक है जो अविनाशी है.'] -फ्रिटजोफ काप्रा (Fritjof Capra)

इस जगत की मूलभूत उत्पत्ति और इस के अस्तित्व के खेले जाते नाटक में मनुष्य एक साथ कलाकार और प्रेक्षक किस प्रकार से बन सकता है और इन दोनों का सुमेल (सामंजस्य) किस प्रकार से हो सकता है इस समस्या के विषय में बुद्ध और लाओत्से जैसे महान ज्ञानी हजारों वर्ष पहले चिंतन कर चुके हैं, जो हाल के अणुशास्त्र के वैज्ञानिकों के द्वारा किए गए आविष्कार और नियम सूचित कर रहे हैं. -निल्स बोर (Niels Bohr)

हमारी साधारण विचारधारा में हमें चकित कर दें ऐसा विरोधाभास यह है कि हमारे अंतरतम अनुभवों को व्यक्त करने के लिए भाषा का उपयोग करना आवश्यक होता है जब कि ऐसे अनुभव भाषा से, अभिव्यक्ति से, परे होते है. -डी. टी. सुझुकी (D. T. Suzuki)

अणु की रचना के बारे में हमें कुछ कहना है, परंतु यह आम भाषा में व्यक्त किया जा सके ऐसा विषय नहीं है. यहां भाषा की मर्यादा का सवाल अत्यंत महत्वपूर्ण बन जाता है. -वर्नर हाईजनबर्ग (W. Heisenberg)

पूर्व के ऋषि जोर दे कर बार बार कहते हैं कि परमतत्व का साक्षात अनुभव इन्द्रियों से पर है. यह परमतत्व किसी तर्क से अथवा उदाहरण से पूर्ण रूप से दर्शाया नहीं जा सकता, न ही उसे सिद्ध किया जा सकता है. जिस बुद्धि से हम भाषा और नियम सीखते हैं, यह उस से भी परे है. इसलिए उपनिषद में कहा गया है:

'जो नाद रहित है, जिसे स्पर्श नहीं किया जा सकता, जो आकार रहित है और अविनाशी है, इसी प्रकार उसकी परख स्वादेंद्रिय एवं घ्राणेंद्रिय के द्वारा नहीं की जा सकती, वह अनंत, अविचल और परम पवित्र है. उसे पाने से अमरत्व प्राप्त होता है.'

इसी तत्व को उपनिषद दूसरे शब्दों में इस प्रकार से समझाता है: 'जहाँ दृष्टि पहुँच नहीं सकती, शब्द या मन जा नहीं सकता, या उसे जाना या समझा नहीं जा सकता. फिर उसे कैसे सिखाया जा सकता है? उसका केवल अनुभव किया जा सकता है.

चीन के महान चिन्तक लाओ त्सु इस परम तत्व को 'ताओ' कहते हैं. आप की पुस्तक 'ताओ ते चिंग' (The Tao Teaching) में लिखते हैं कि यदि 'ताओ' का वर्णन किया जा सके तो समझो वह शाश्वत - सच्चा 'ताओ' नहीं हो सकता.

इस प्रकार हम परमतत्व को बुद्धि से नहीं जान सकते, यह अज्ञात है. उस का केवल अनुभव ही किया जा सकता है. ऐसा अनुभव केवल तभी हो सकता है जब मनुष्य परम चेतना की असामान्य, रहस्यमय अवस्था में होता है. इसे हम उपासना की परम अवस्था कह सकते हैं. ऐसी अवस्था के उदाहरण पूर्व और पश्चिम के आध्यात्मिकता की चोटी तक पहुंचे हुए सत्पुरुष और महात्मा हैं. इस समय का वैज्ञानिक आविष्कार इस बात का समर्थन करता है.

-फ्रिटजोफ काप्रा (Fritjof Capra)

एक बार गर्मी के दिनों में शाम होने से पहले मैं सागर किनारे बैठकर उठती तरंगें देख रहा था, तब मेरी साँसों और उठती तरंगों का लय मिल रहा हो ऐसा मुझे एहसास हुआ. उस क्षण अचानक मुझे मेरे आसपास का वातावरण जैसे एक प्रचंड वैश्विक नृत्य के साथ जुड़ा हुआ हो ऐसा प्रतीत हुआ. भौतिकशास्त्र के एक वैज्ञानिक होने के नाते मैं जानता था कि ये आसपास की रेत, चट्टानें, पानी, हवा ये सब गतिशील अणु व परमाणुओं से बने हुए हैं. ये सब एक दूसरे की पारस्परिक गति और संयोग से नए परमाणु उत्पन्न करते हैं और पुराने परमाणुओं का विलयन होता है. मैं यह भी जानता हूँ कि पृथ्वी के वायुमंडल पर निरंतर रूप से आकाश से अत्यंत शक्तिशाली और वेधक किरणों की वर्षा से उन में रहे परमाणुओं के बीच परस्पर संघर्षण चलता ही रहता है. भौतिकशास्त्र के मेरे संशोधनों से ही मैं ये सारी घटनाओं से परिचित हूँ. परंतु इस क्षण के एहसास के पहले इस बात की मेरी जानकारी केवल आकृति, नक्शे और गणित के नियमों के बारे तक ही सीमित थी.

सागर किनारे बैठे कर मुझे मेरे संशोधन जैसे जीवंत हो उठे हो ऐसा लगा. बाहर के अवकाश से ऊर्जा की मौजें नीचे उतरकर नए परमाणु उत्पन्न कर के लयबद्ध स्वरूप में नृत्य कर रहे हो ऐसा पाया. इस वैश्विक ऊर्जा के नृत्य में मुझे मेरे शरीर के परमाणु भी जैसे लयबद्ध नृत्य कर रहे हो ऐसा महसूस हुआ. मुझे वहां कोई आवाज सुनाई दी हो ऐसा लगा. उसी क्षण मुझे लगा कि यह शिव का तांडव नृत्य है!

मैंने बरसों तक भौतिकशास्त्र का अध्ययन किया है और उसका गहन अध्ययन करके बहुत सारे संशोधन किये हैं. परंतु साथ ही मुझे पूर्व के गूढ़, रहस्यमय लेखों में भी दिलचस्पी जागृत हुई है. वर्तमान भौतिकशास्त्र के संशोधनों के साथ ये लेख कितने सामान रूप से मिलते हैं इस की समझदारी का मुझ में उदभव हुआ. - फ्रिटजोफ काप्रा (Fritjof Capra) (उनकी पुस्तक 'ताओ ऑफ फिजिक्स' से)

-------------------------------------------------------------------------------------------

लेखक की टिप्पणी

जर्मन भौतिकशास्त्री वर्नर हाईझनबर्ग का 'अनिश्चितता का नियम' (Uncertainty Principle) इलेक्ट्रोन (वीजाणु) की गति और स्थिति जानने के संशोधन से स्थापित हुआ. इस नियम के अनुसार इलेक्ट्रोन जो कि प्रोटोन के आसपास घूमता रहता है उसकी गति और स्थिति दोनों को एकसाथ जाना नहीं जा सकता. यदि स्पष्ट रूप से स्थिति के बारे में जानना हो तो उसकी गति की केवल संभावना (Probability) ही जानी जा सकती है और यदि गति को स्पष्ट रूप से जानना हो तो उसकी स्थिति के बारे में केवल संभावना (Probability) ही जानी जा सकती है.

हमारी इन्द्रियां जगत को द्वैत के रूप में देखने के लिए अभ्यस्त हो चुकी हैं. जैसे कि अँधेरा-उजाला, है या नहीं है, सुख या दुःख इत्यादि...किंतु हजारों वर्ष पहले हमारे ऋषिओं ने ऐसा अनुभव किया कि इन्द्रियातीत और अंतरमय विश्व दृश्यमान विश्व से भिन्न है. वहां द्वैत नहीं. आश्चर्य इस बात का है कि वर्तमान अणुशास्त्र का वर्तमान विज्ञान (Quantum Physics) उस के अन्वेषण से ऐसे रहस्यमय (अंतरमे) विश्व के अस्तित्व में विश्वास करने लगा है. अमरीका के विश्व प्रसिद्द अणु वैज्ञानिक रॉबर्ट ओपनहाईमर (Robert Oppenheimer), जिसने विश्व प्रथम अणुबम इजाद किया और सफलतापूर्वक उस के विस्फोट का प्रयोग अमरीका के न्यू मेक्सिको (New Maxico) प्रान्त की मरुभूमि में लोगों से अत्यंत गुप्त रूप से किया था. आप हमारी भगवदगीता के अध्ययन करनेवाले और चाहक थे. रेगिस्तान में किए गए इस विस्फोट के समय आपने जिस आश्चर्य और थरथराहट महसूस की तब आप के होटों पर श्रीमद भगवदगीता का एक श्लोक आ गया और एक खम्भे को पकड़कर आप वह श्लोक बोल रहे थे.

उपनिषद के ये शब्द आज के अणुविज्ञान के आविष्कारों के साथ कितने मिलते जुलते हैं, आइये देखते हैं:

ओपनहाइमर लिखते हैं: "उदाहरण के तौर पर हम पूछें कि इलेक्ट्रोन की स्थिति एक सामान ही रहती हैं, तो हमें कहना पड़े कि 'नहीं', यदि ऐसा पूछें कि क्या वह बदलती रहती है तो 'नहीं' कहना पड़ता है. और यदि ऐसा पूछें कि इलेक्ट्रोन स्थिर स्थिति में हैं तो भी 'नहीं' ही कहना पड़ता है. तो फिर क्या इलेकट्रोन गतिमान है? इस प्रश्न का उत्तर भी 'नहीं' है!'

अणुशास्त्र का अनुसन्धान पूर्व के ऋषिओं के अनुभवों से मिलते हैं. यह हमारे दृश्यमान विश्व के द्वैत स्वरूप की मर्यादा के परे है. ओपनहाईमर के शब्दों में हमारे उपनिषदों की गूँज सुनाई देती है:

"यह गतिमान है और गतिमान नहीं है,

यह दूर है और पास भी है,

यह सब के भीतर है और सब के बाहर भी है."

(लेखक की टिप्पणी यहां पूर्ण होती है)

=====================================================

(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

_____________________________________

0 टिप्पणी "आध्यात्मिकता से एकता एवं समन्वय : अध्याय : ४ - आध्यात्मिकता, धर्म और विज्ञान - लेखक : डॉ. निरंजन मोहनलाल व्यास - भाषांतर : हर्षद दवे"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.