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ईबुक - चैतन्य पदार्थ - भाग 7 - नफे सिंह कादयान

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( पुस्तक प्रकृति- पदार्थ विज्ञान )  चैतन्य पदार्थ  नफे सिंह कादयान  भाग 1   || भाग 2   || भाग 3   || भाग 4 ||  भाग 5 ||  भाग 6 || भाग 7 प...

( पुस्तक प्रकृति- पदार्थ विज्ञान ) 

चैतन्य पदार्थ 

नफे सिंह कादयान 

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भाग 1  || भाग 2  || भाग 3  || भाग 4 ||  भाग 5 ||  भाग 6 ||


भाग 7


पर्यावरण की रक्षा

पर्यावरण रक्षा का आशय उस युक्ति से है जिसे अपना कर मानव के साथ-साथ अन्य सभी प्राणी भी प्रदूषण रहित साफ वातावरण में जीवित रह सकें। ऐसे कुछ उपाय होने चाहिये जिनसे कल-कारखानों, वाहनों से निकलने वाले धुएं व हानिकारक कचरे का उचित प्रबंधन हो सके। वह जहरीली गैसें जो मानवजन्य दहन क्रियाओं से जारी है उन्हें जितना संभव हो सके अधिक से अधिक रोक कर ऐसे उपाय करने की आवश्यकता है जिनसे मानव की मूलभूत जरूरतें भी पूरी होती रहें और वातावरण भी शुद्ध रहे।

एक बात तो तय है कि जिस उपभोक्तावाद के हिसाब से वर्तमान में विश्व सिस्टम चल रहा है ऐसे में पर्यावरण की रक्षा करना बहुत ही मुश्किल काम है। हां एक तरीका तो हो ही सकता है, अगर विश्व की आबादी कम हो जाए। इसके लिए लोगों को जागरूक कर बेहतर परिवार नियोजन के तरीके लागू किए जाएं तो बहुत बड़े स्तर पर प्रदूषण से निजात पाई जा सकती है। जनसंख्या वृद्धि के चलते ही लोगों को अधिक से अधिक संसाधन उपलब्ध करवाने के लिए बहुत ज्यादा कल कारखानों, मशीनरी की आवश्यकता पड़ रही है। विश्व में जनसंख्या वृद्धि के कारण ही वनस्पतिक भूमि पर कांक्रीट की बहुत बड़ी चादर बिछती जा रही है। वह ऊर्जा बड़ी तेजी से नष्ट होती जा रही है जिसमें मनुष्य सांस ले कर जीवित रहता है।

पृथ्वी एक ऐसा ऊर्जावान पिण्ड है जिसकी ऊर्जा का ह्रास इसके निर्माण काल से आज तक जारी है। इसमें प्रचण्ड दहन-क्रिया जारी थी जो धीरे-धीरे शांत होती गई। इस दहन-क्रिया में हल्का ऊर्जावान पदार्थ भू-पर्पटी पर एकत्र हो गया जो जल व अनेक प्रकार के ज्वलनशील पदार्थों के रूप में मौजूद है। जल ऊर्जा का एक बहुत बड़ा भण्डार है जिसका सेवन सभी जड़, चेतन जीव करते हैं। जल है तभी पृथ्वी पर जीवन है अन्यथा जल के अभाव में जैव पदार्थों की उत्पत्ति संभव नहीं है।

समस्त जैव क्रियाएँ पृथ्वी की प्रथम प्रचण्ड दहन क्रिया के रूपान्तरित प्रतिरूप हैं। प्रचण्ड दहन का आशय है धरातल का लपटों के साथ जलना और रूपान्तरण जैव क्रियाओं के अन्तर्गत भी पदार्थ का जलना ही होता है। अर्थात जैव ऐसी क्रियाओं के उत्पत्ति कारक है जिनसे दहन-क्रिया का कार्य आगे बढ़ता जा रहा है। यह क्रिया पदार्थ से ऊर्जा लेकर सम्पन्न होती है।

वनस्पति जगत भूमि से ऊर्जा लेता है जो जल व अन्य ऊर्जायुक्त तत्वों के रूप में होती है। कोई एक पेड़ जल को विघटित कर उसमें से ऊर्जा अलग कर देता है और अन्य पदार्थ खींच कर उससे अपने ढांचों (तना, जड़, पत्तों) का निर्माण करता है। पादप जीवों द्वारा भूमि से ऊर्जा लेकर उसे स्वतंत्र करना व प्राणी जगत का पादप ऊर्जा को रूपान्तरित करना एक प्राकृतिक व सामान्य दहन क्रिया है जो आदिकाल से स्वत्‌ जारी है। यह प्रथम दहन का प्रतिरूप है मगर मानव द्वारा की जा रही दहन क्रियाएँ सामान्य दहन में नहीं आती बल्कि यह अतिरिक्त दहन क्रियाएँ हैं। अथवा मानव आरम्भिक उच्च दहन क्रिया को दोबारा प्रचण्ड रूप देने की कोशिश करने वाला कारक है।

मानव का सभी प्रकार के ऊर्जा स्रोतों को जलाना भू-पर्प़टी को ऊर्जा रहित करने का असामान्य कार्य है। पृथ्वी के आस-पास अनेक ग्रह मौजूद हैं। उन पर चट्टान, पत्थर, पहाड़ सागरीय गड्डे भी हैं मगर पृथ्वी की तरह उनकी सतह पर जल भण्डार नहीं हैं। जल ऊर्जा का अथाह भण्डार है इसके अभाव में दहन-क्रिया संभव नहीं है क्योंकि दहन के लिए ऊर्जा (आक्सीजन) की उत्पत्ति जल से ही होती है। वह ग्रह निर्जीव हैं वहाँ जीवन का नामोंनिशान नहीं है। वहाँ जीवन इसलिए नहीं है क्योंकि सभी प्रकार के जैव कारक दहन-क्रियाओं के रूप हैं और तभी तक जीवन होता है जब तक दहन क्रिया जारी रहती है।

ब्रह्मांड में अगर कहीं किसी पिंड पर धीमी दहन-क्रिया चल रही होगी तो वहाँ जीवन अवश्य होगा चाहे वह किसी भी रूप में क्यों न हो। वहाँ पर पृथ्वी जैसे जैव कारक भी हो सकते हैं और इससे अलग प्रकार के ऊर्जा दहक जैव कारक भी हो सकते हैं। जीवन का ये ही मतलब नहीं है कि वह हुबहु पृथ्वी के धरातल जैसा ही हो।

सूर्य एक ऊर्जावान पिण्ड है यहाँ प्रचण्ड दहन क्रिया चल रही है। प्रचण्ड दहन में जैव क्रियाएँ संभव नहीं हैं, क्योंकि यहाँ दहन अवरोधक नहीं हैं। यहाँ पर सतत् दहन जारी है। एक काल अवधी के पश्चात जब सूर्य अपनी आरम्भिक ऊर्जा गंवा कर ठोस धरातलीय रूप धारण कर जायेगा तो यहाँ पर जैव कारक उत्पन्न हो सकते हैं। मगर इनका स्वरूप पृथ्वी के जैव कारकों से भिन्न हो सकता है। यहाँ सूर्य द्वारा जैव क्रियाओं के स्वरूप का निर्धारण किया जाएगा। पृथ्वी की अधिकतर जैव रचनाएँ सूर्य के अभाव में नष्ट हो सकती हैं जबकि सूर्य के आस-पास ऐसा कोई ऊर्जावान विशाल पिण्ड नहीं है जो उसकी जैव क्रियाओं को सम्पन्न करने में अपना योगदान कर सके। हां ऐसा हो सकता है कि सूर्य ऊर्जा गंवा किसी बड़े तारे के क्षेत्र में जाकर चक्कर काटने लगे तब उस पर बिल्कुल पृथ्वी की तरह अवश्य जीवों की उत्पत्ति होगी।

सूर्य जब ऊर्जा गंवा कर ठोस अवस्था धारण करेगा तो उस पर पृथ्वी की ही तरह जल के अथाह भण्डार होंगे। वहाँ प्रथम दहन अवशेषों में पहाड़ गड्डे सभी होंगे। वहाँ अथाह जल चक्र का दूसरा रूप मौजूद होगा। वहाँ पर जल चक्र तब तक चलेगा जब तक सूर्य की पर्पटी में कहीं न कहीं ज्वालामुखी प्रचण्ड रूप में मौजूद रहेगें। सूर्य पर विशाल सागरों का निर्माण होगा और वहाँ जैव रचनाएँ भी बनेगीं मगर यह सब पृथ्वी के निर्जीव होने से करोड़ों वर्ष बाद होगा। तब तक पृथ्वी पर भी चन्द्रमा, मंगल व अन्य पिण्डों की तरह धरातलीय जल नजर नहीं आएगा।

जल विशाल ऊर्जा भण्डार है मगर यह ऊर्जा ऐसे पदार्थ के साथ मिश्रित है जो इसे परोक्ष जलने से रोकता है। धरातल की प्रथम दहन-क्रिया के दौरान जले हुए पदार्थ अवरोधों में लिपटकर बहुत से ऊर्जा भण्डार जलने से बच गए थे। जल उनमें से ही एक है। जल दहन में ऊर्जा को उससे मुक्त होना पड़ता है। यह कार्य पादप जीव कर रहे हैं। पादप जीवों के द्वारा जल रूपान्तरण का कार्य हो रहा है। वे बड़ी मात्रा में जल रूपांतरण कर उनसे वह ऊर्जा मुक्त करते हैं जिससे सभी प्राणी सांस लेते हैं।

सागरों से जल वाष्पित होकर नदियों के माध्यम से बहकर वापिस सागर में पहुंच जाता है। रास्ते में स्थलीय प्राणी इसका कुछ उपयोग कर लेते हैं। मानव द्वारा जल के साथ भी व्यापक स्तर पर अतिरिक्त छेड़-छाड़ की गई है। प्राकृतिक रूप में शुद्ध जल प्राणियों के केवल पीने के लिए है मगर मानव बड़े स्तर पर इसका दोहन करता है। जो प्रकृति के विरूद्ध है। इसको अप्राकृतिक रूप में प्रयोग करने के कारण ही मानव के साथ अन्य जीवों का जीवन भी खतरे में पड़ चुका है।

जल-चक्र में वर्षा का पानी भू-पर्पटी में एकत्र हो जाता है जिसे मानव पीने के लिए इस्तेमाल करता है। औद्योगिक इकाइयों से निकले जहरीले रसायन इस जल में मिलते रहते हैं जिससे यह पानी किसी के पीने योग्य नहीं रहता। दिल्ली जैसे महानगरों की जमीन में पानी अन्य जगहों की तरह एकत्र है। मगर इसमें मानव निर्मित रसायन मिलने के चलते यह पीने योग्य नहीं रह गया है। यहाँ राजधानी में पीने योग्य जल यमुना नदी से आता है जिसे फिल्टर करके पीने योग्य बनाया जाता है।

नदियों में भी मानव ने इतना कचरा मिला दिया है कि इसे पशु भी पीकर बीमार होने लगे हैं। पहले पानी इतना शुद्ध होता था कि उनके आस-पास रहने वाले लोग उसका पानी पीते व भोजन पकाने के काम में लाते थे। देश की अधिकतर नदियां जमें हुए शुद्ध जल के ग्लेशियरों से निकलती हैं जो अपने उद्गम स्थल से शुद्ध रूप में यात्रा करती हुई मानव बस्तियों में पहुंच कर मलिन होती रहती हैं। मानव इनमें अनेक प्रकार के हानिकारक जले व अधजले पदार्थों को मिलाता है जो स्वयं उसके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक तो हैं ही साथ में जलीय जीव इससे नष्ट हो रहे हैं। प्राणियों की अनेक प्रजातियां मानव जन्य कचरा पानी में मिलने से विलुप्त हो चुकी हैं, कुछ विलुप्ति के कगार पर हैं।

मानव द्वारा निरन्तर व्यापक स्तर पर की जा रही दहन-क्रियाओं के फलस्वरूप प्राकृतिक सन्तुलन नष्ट हो रहा है। ऊर्जा के अत्यधिक ह्रास के कारण भू-पटल गर्म होता जा रहा है जिससे ग्लेशियर पिघल कर नष्ट होते जा रहे हैं। गंगा, यमुना व अन्य बारामासी नदियां जो कि ग्लेशियरों के कारण ही सारा साल बहती है चार-पांच दशक बाद बरसाती नालों का रूप धारण कर जाएंगी। अभी यहाँ वैज्ञानिक लोगों को केवल चेतावनियां दे रहे हैं, मगर इसका कारण नहीं बतलाते क्योंकि इससे औद्योगिक इकाइयां बन्द करनी पडेग़ी। वाहनों पर प्रतिबन्ध लगाना पडेग़ा।

जिन देशों में शासनकर्ता ही उद्योगपति हों या उनकी कठपुतली हों वहाँ पर्यावरण में सुधार करना आसान नहीं है। और वैसे भी विश्व के अधिकतर नेता उद्योगपति ही हैं। कुछ सरकारें ये परोक्ष चला रहे हैं तो कुछ अपरोक्ष रूप से चला रहे हैं। ये जब तक वातावरण सुधार के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठायेंगे जब तक प्रदूषण से इन्हें परेशानी नहीं होगी।

उदाहरण के लिए अगर यमुना नदी का पानी सूख जाता है तो वो करोड़ों आदमी कहां जाकर बसेंगे जो दिल्ली में रहते हैं। यमुना के अलावा उनके पास पानी का कोई विकल्प नहीं है। यमुना के नष्ट होते ही उस पर निर्भर रहने वाले व्यक्ति किस भयावह स्थिति से गुजरेंगे इसका अन्दाजा शायद अभी हमारे देश के कर्णधारों को नहीं है जो राजधानी में ही बैठे हैं।

हमारे यहाँ देहात में एक कहावत है कि अपना भरा, जगत का भरा, अपना खाली तो जगत का खाली। अर्थात अगर अपना पेट भोजन से भरा हो तो सारे जहां का पेट भरा हुआ दिखाई देता है, और अगर स्वयं भूख लगी हो तो दूसरों को भूख कैसे लगती है इसका ज्ञान हो जाता है।

देश को चलाने वाले हर प्रकार से साधन सम्पन्न हैं। इनके घरों में पानी की रेल-ठेल है। पीने का पानी तो बोतलों में पैक होकर आता है। अगर कोई पानी की कमी देखना चाहता है तो दिल्ली में ही नेताओं के घरों से कुछ दूरी पर बसी कालोनियों में देख सकता है। कई बार तो यहाँ पानी की एक एक बाल्टी के लिए खून-खराबा हा जाता है। बुराड़ी कालोनी जैसी दिल्ली की सभी स्लम बस्तियों में हर रोज पानी की एक-एक बूंद के लिए जंग होती है।

अभी पिछले हप्ते ही मुबई में टी. वी. चैनल पर पानी के लिए एक औरत की पिटाई दिखाई जा रही थी। मोहल्ले के कुछ तथाकथित समाजसेवी समाज कल्याण के लिए एक महिला को बालों से पकड़ कर घसीटते हुए दिखाए जा रहे थे। उस मजलूम का कसूर ये बतलाया जा रहा था कि उसने किसी सार्वजनिक पाईप पर वाटर मोटर रख कर पानी की चोरी कर ली थी।

पानी और चोरी, इसका मतलब तो ये हुआ कि अभी बीस-तीस साल बाद सांस लेने वाली ऑक्सीजन की भी चोरी होने लगेगी क्योंकि वायु तो सांस लेने योग्य रहेगी नहीं। फिर सभी को कमर पर सिलैंडर लटकाने पड़ेंगे। ऐसे में सब को अपने सांसों की रखवाली भी करनी पड़ेगी।

पानी का कितना महत्व है, और उसका प्रदूषण कैसा होता है, यह हिमाचल की बावडिय़ों व नदी, नालों का पानी पीने वाले वहाँ के नागरिक जानते हैं जो पानी की पूजा करते हैं। यमुना का पानी कितना गन्दा है ये ताजे वाला हैड से लेकर दिल्ली तक उसके तट के पास बसे हरियाणा व उत्तर प्रदेश के लोगों को अच्छी प्रकार से पता है। अगर ये गन्दा पानी भी सूख जाता है तो इसके आस-पास बसे लाखों किसान बरबाद हो जाएंगे। राजस्थान जहां यमुना के पानी से खेती होती है दोबारा रेगिस्तान बन जाएगा।

यह केवल एक नदी का उदाहरण है। इसके अलावा गंगा, ब्रह्म्पुत्र, व्यास, सतलुज व अन्य नदियां जो बर्फ के ग्लेशियरों से निकलती हैं अगर सभी सूख जाती हैं तो देश की आबादी के लगभग सत्तर प्रतिशत उस हिस्से पर बसने वाले लोगों का क्या होगा जो इन नदियों के कारण ही जिन्दा है। ये नदियां लोगों के लिए अनाज सब्जियां उगाती हैं, उन्हें पीने के लिए पानी देती हैं। एक बड़ी आबादी इनमें मछलियां पकड़ कर अपनी जीविका चलाती है। सारांश यह है कि देश की आबादी का एक बड़ा भाग नदियों के सूखने पर नष्ट हो सकता है।

कुछ बुद्धिजीवी कहते आ रहे हैं कि अगला विश्व युद्ध पानी के लिए लड़ा जायेगा। यह क्यों लड़ा जायेगा शायद इसके बारे में लोगों को मालूम न हो। विश्व युद्ध तो बाद में होगा सबसे पहले तो पानी के लिए हर देश में गृह युद्ध शुरू होगा जिसमें अराजकता फैल कर भारी मात्रा में रक्तपात जारी होगा। अराजक तत्व ऐसे अवसरों के ही इन्तजार में रहते हैं। अगर कहीं ट्रेन हादसा हो जाए तो ये यात्रियों को लूटने दौड़ते हैं। अगर दंगा हो जाए तो घरों को लूटते हैं। अगर उत्तरकाशी जैसी भयावह प्राकृतिक त्रासदी आ जाए तो फिर साधु सन्यासी भी बाड़ में मरे लोगों के गहने उतारने के लिए कान, उंगलियां काट लेते हैं। अगर पानी के अभाव में गृहयुद्ध होता है तो उसका परिणाम भयावह होगा। हत्याएं होगी, लूटपाट मचेगी और पानी न मिलने से व्यक्ति व जानवर सभी का खात्मा होना निश्चित है।

अभी शायद कुछ लोगों को ये बातें कपोल कल्पना नजर आ रही होंगी। जो लोग ये भविष्यवाणियां कर रहें है कि अगला विश्व युद्ध पानी के लिए लड़ा जायेगा शायद वो कुछ लोगों को पागल नजर आ रहे होंगे क्योंकि अभी प्यास बुझ रही है। चाहे पानी के कुछ अभाव में ही बुझ रही हो। नदियां बहती दिखाई दे रही हैं। और शायद कुछ लोग इस खुशफहमी का भी शिकार हों कि अगर ग्लेशियर पिघल भी गए, व नदियां लुप्त भी हो गई तो जमीन में तो पानी मौजूद है ही, वह पीने के काम आयेगा। और फिर सागर तो हैं ही पानी से लबालब भरे हुए। उनके पानी को शुद्ध करके इस्तेमाल कर लिया जाएगा।

भारत में जितने भी कृषि योग्य स्थान हैं वह सभी नदियों की मिट्टी से बने हुए मैदान है। नदियों ने ही यहाँ उपजाऊ जमीनें दी हैं। जमीन के नीचे जो जल भण्डार नजर आता है वह नदियों के पानी से ही बना है। नीचे कोई अथाह समुद्र नहीं है बल्कि नदियों द्वारा पानी के बहाव से बनाई हुई रेत की परतें हैं। ये पर्तें उनके बार-बार जल धारा रूख को बदलने के कारण जमीन के नीचे चली गई हैं। इन्हीं परतों में नदियों का पानी रिसकर एकत्र होता रहता है, व कुछ मात्रा में वर्षा का पानी भी नीचे चला जाता है। ये एक तरह कि भूमिगत नदियां हैं जो ऊपरी नदियों की तरह समुद्र की तरफ बहती हैं।

मानव द्वारा किए जा रहे ऊर्जा दहन के कारण जब ऊपरी नदियां लुप्त होंगी तो उसके लगभग दो या तीन वर्ष बाद ही भूमिगत नदियां भी लुप्त हो जाएंगी क्योंकि इनका आधार गंगा, यमुना व अन्य नदियां हैं। बरसाती मौसम में जो पानी नीचे जाता है वह इतना कम है कि दो-चार शहरों-गांवों की चार महीने भी प्यास नहीं बुझा सकेगा उससे खेती करना तो दूर की बात है। अभी नदियों के भरपूर इस्तेमाल के बावजूद भी कृषकों के पास पानी का अभाव है। पानी का इतना अधिक दोहन हो रहा है कि भूमिगत जलस्तर हर वर्ष घट रहा है। उसकी मात्रा इतनी कम हो गई है जिससे कृषकों का कार्य भी ठीक प्रकार से नहीं चल पा रहा है।

हरियाणा, पंजाब में 1970 के दशक तक ऊपरी भूमि जलस्तर लगभग आठ-दस फुट जमीन के नीचे था। लोग गड्डे खोद कर बाल्टियों से पानी खींच सब्जियां फलों के पेड़ उगा लेते थे। पिछले तीस-चालीस वर्षों में भूमि का जलस्तर निरन्तर कम होता गया है। अब स्थिति यह है कि कहीं-कहीं 350 फुट से 500 फुट नीचे पानी मिलता है। अनेक स्थान तो ऐसे है जहां पानी ही नहीं है। जो कुएं पीने के पानी के स्रोत हुआ करते थे वो कभी के सूख चुके हैं। नलकूपों में पानी नहीं आता। अब पानी के लिए गहरे सबमर्सिबल टयूबवैल लगाए जाते हैं जो विद्युत पर आधारित है। गांव देहातों में भी अब प्यास का संबंध बिजली के साथ जुड़ गया है। यहाँ भी अब प्राकृतिक स्रोत सूख चुके हैं। बिजली आएगी तो पानी मिलता है अन्यथा प्यासा ही रहना पड़ाता है।

अगर नदियां सूख जाएंगी तो फिर बिजली भी नहीं मिलेगी क्योंकि बिजली का लगभग अस्सी प्रतिशत उत्पादन तो नहरों के माध्यम से ही होता है। कोयला व परमाणु ईंधन द्वारा जो बिजली बनाई जा रही है वह केवल कुछ ही शहरों को रोशन कर सकती है मगर बिन पानी के तो वह भी नहीं बन सकती। थर्मल प्लाटों व परमाणु रियक्टरों में बिजली बनाने के लिए भी भारी मात्रा में पानी चाहिये। हिमाचल, जम्मू-कश्मीर व सभी पहाड़ी राज्य पूरी तरह से नहरी बिजली डैमों पर आश्रित हैं। कई अन्य मैदानी राज्य भी अधिकतर नदियों द्वारा बनाई गई बिजली की खपत करते हैं। यह विद्युत ग्लैशियरों के पिघलने से बहने वाले साफ पानी से बनाई जाती है।

बरसात के दिनों में जब नदियां उफान पर होती है तो उनमें सूखे पेड़-पौधे, पत्थर, घास-फूस बह कर नीचे आता रहता है। बरसात के दिनों में अनेक नदियों से बिजली उत्पादन रोकना पड़ता है। इसका अर्थ यह हुआ कि अगर पहाड़ों पर बर्फ का भण्डार होगा तभी विद्युत उत्पादन होगा अन्यथा केवल बरसाती पानी से उत्पाद नहीं किया जा सकता।

नदियों के सूखते व भूमिगत जल के नष्ट होते ही स्थलीय वनस्पति भी पानी के अभाव में नष्ट हो जाएगी, फिर मनुष्य सागरों की तरफ रूख करेगा। तब तक शेष स्थलीय प्राणियों की लगभग सारी नस्लें नष्ट हो चुकी होंगी। विश्व के अरबों आदमी समुद्री तटों पर नहीं रह सकते। उनके सामने अनेक गंभीर समस्याएं आएंगी। आवास कहां बनेगा? विद्युत की आपूर्ति कैसे की जाएगी? और सबसे बड़ी समस्या खाद्य पदार्थों की होगी। कृषि के लिए भूमि का कैसे प्रबन्ध होगा। ऐसी स्थितियों में ही तो लड़ा जाएगा पानी के लिए व समुद्र तटों पर कब्जा जमाने के लिए विश्व युद्ध।

समन्दर से निकल कर उल्टी गंगा पहाड़ पर नहीं चढ़ सकती है। मानव सागरीय जीव-जन्तु व उसके शेवाल जैसी वनस्पति खाएगा मगर स्थलीय इलाकों से पलायन करके सागर की और जाने वाले अनेक व्यक्ति वहाँ के वातावरण के साथ समायोजन न करने के कारण नष्ट हो जाएंगे।

व्यक्ति शब्द का तात्पर्य किसी एक व्यक्ति या अनेक व्यक्तियों से नहीं है बल्कि यह मानव की उस श्रृंखला से है जिसकी आदि से ही निरन्तरता बनी हुई है। व्यक्ति की औसत आयु लगभग अस्सी वर्ष है। इस अवधि के आस-पास उसे मरना ही होता है। सौ वर्ष के अन्तराल में पूरी पीढ़ी बदल कर नई बन जाती है।

पर्यावरण की रक्षा से ही मानव श्रृंखला की निरन्तरता बचाई जा सकती है। अगर मानव को समुद्र में निवास करना पड़ा तो उसका जीवन बद् से बद्तर होता चला जाएगा। आने वाली नई नस्लों को आज के तथाकथित बुद्धिमानों की गलतियों का दण्ड भोगना पड़ेगा। ऐसे जैसे हम अपने बुजुर्गों की गलती का दण्ड भोग रहे हैं। यह गलती उन्होंने जनसंख्या के बारे में की थी। जिसकी कीमत हम यानी उन की संतानें चुका रही हैं।

देश की आजादी के समय जनसंख्या पूरे नियंत्रण में थी। लोगों के लिए आवास व खेती करने के लिए पर्याप्त भूमि होती थी। जनसंख्या इतनी कम थी की लोग मिन्नत खुशामद कर बाहरी लोगों को अपने गांव में लाकर बसाया करते थे। साथ में उन्हें रहने की जगह भी बिना कोई पैसा लिए दे देते थे। उस समय लोग मस्त मौला थे। भैंस बकरियां पालते और उनका दूध, दहीं मक्खन खाकर मस्त रहते। आज की तरह भाग-दोड़ भरी जिंदगी नहीं थी। इसी मस्ती के आलम में उन्होंने एक भारी गलती कर दी। वह गलती थी अधिक बच्चे पैदा करने की।

आजादी के बाद हमारे बुजुर्ग बच्चे पैदा करने में भी आजाद हो गए। फिर एक-एक दम्पत्ति द्वारा दर्जन के आंकड़े के आस-पास बच्चे पैदा किए गए। इसका परिणाम ये हुआ की घर बंट गए, खेत बंट गए। जो किसान सौ एकड़ का मालिक था उसके वंशजों के पास दो-दो एकड़ भूमि रह गई। आज भूमि के लिए महाभारत वाली जंग हर घर में होती है। एक-एक इंच भूमि के लिए तलवारें-बंदूकें चल जाती हैं। आज बाहरी लोगों को बसाना तो दूर की बात है, भाई अपने सगे भाई को ही उजाड़ देता है। आज परिवार के ही लोग भूमि के लिए एक दूसरे के कट्टर दुश्मन बने हुए हैं।

मानव के साथ समस्या यह है कि जब उसे किसी कठिनाई के मध्य से होकर गुजरना पड़ता है तो ही वह सचेत होता है। परिवार नियोजन चलाने वाले लोगों को शायद यह गलत फहमी होगी की उनके प्रयासों से लोग दो बच्चे पैदा कर रहे हैं। जी नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं है। अब कठिनाई देखकर लोगों को अक्ल आ चुकी है। वे जान चुके है कि जो बच्चे वे पैदा कर रहे हैं उनके रहने के लिए जगह कहां से आएगी। उनके लिए संसाधन कैसे उपलब्ध करवाए जायेंगे। उन्हें स्कूल कॉलेजों में अच्छी शिक्षा कैसे दिलवाई जाएगी। उन्हें ये ज्ञान हो चुका है कि जितने कम बच्चे पैदा होंगे उतने ही व अधिक सुखी रहेंगे।

आजादी के बाद अगर कोई लोगों को जनसंख्या बढ़ने से होने वाली परेशानियों के बारे में सचेत करता तो कोई भी उसकी बात पर अमल नहीं करता बल्कि लोग उसे मूर्ख समझते क्योंकि उस समय जनसंख्या सीमित थी। जब लोग परेशानी से गुजरने लगे तो ही कम बच्चे जनने लगे। यहाँ इस समस्या का पूरा कंट्रोल व्यक्ति के हाथ में है। वह चाहे तो जनसंख्या को कम या अधिक कर सकता है।

ग्लैशियर पिघल कर अगर नदियां लुप्त होती हैं तो इसका मानव के पास कोई समाधान नहीं है। इसे आज से ही नियन्त्रित किया जा सकता है। इसमें अगर वक्त हाथ से निकल गया तो उसकी क्षतिपूर्ति अंसभव है। यह जनसंख्या जैसा मामला नहीं है कि व्यक्ति जब चाहे इसे कंट्रोल में ला दे। इसमें व्यक्ति विनाशक की भूमिका अदा कर रहा है। अभी तो मैं भी जानता हूँ कि जो भी लिख रहा हूँ कुछ लोगों को ये कपोल कल्पना लगेगी। वे सोचेंगे की नदियां तो लाखों वर्षों से बह रही हैं वो कभी नहीं सूख सकती।

विश्व के कुछ बुद्धिमान व्यक्ति सचेत कर रहे है कि प्रदूषण पर लगाम लगाओ नहीं तो मानव संकट में आ जाएगा। ग्लोबल वार्मिग के बारे में सचेत कर रहे हैं मगर इसके समाधान के लिए कोई भी व्यक्ति गंभीर नहीं है। शीर्ष पदों पर बैठे हुए लोगों को तत्कालीन फायदे के अलावा कुछ दिखाई नहीं देता। वे केवल अपनी शक्ति बनाए रखने के लिए प्रयासरत हैं। भावी पीढिय़ों को होने वाली परेशानियों से उन्हें कुछ भी लेना देना नहीं है।

अभी यहाँ दिल्ली में कुछ शक्तिशाली नेता लोगों ने आदेश दिया की राजधानी में चलने वाली औद्योगिक इकाइयों को यहाँ से बाहर स्थानांतरित कर दो क्योंकि ये यहाँ प्रदूषण फैला रही है। वो लोग इस प्रकार बात कर रहे हैं जैसे ये औद्योगिक इकाइयां बाहर जाकर अक्लमंद हो जाएंगी और धूआं उगलना बंद कर देंगी। इन प्रदूषण कारकों को चाहे कहीं पर ट्रान्सफर करो ये पूरा प्रदूषण फैलाएँगीं और कोई भी व्यक्ति इस गलत फहमी में न रहे कि अगर किसी निश्चित स्थान से औद्योगिक इकाइयां हटा दी गई तो उसका असर वहाँ नहीं होगा। एक औद्योगिक इकाई में किया जाने वाला ऊर्जा दहन पूरी पृथ्वी वासियों के लिए हानिकारक है। इन्हें इधर-उधर करके इस जहर से मानव बच नहीं सकता।

मानव द्वारा औद्योगिक इकाइयों, वाहनों व अन्य दहन कारकों के माध्यम से फैलाए जा रहे जहर से सबसे पहले उसकी अपनी श्रृंखला लुप्त होगी शेष बाद में मरेंगे। अन्य प्राणी वातावरण के अनुसार अपने शरीर को आसानी से ढालने की क्षमता रखते हैं। उदाहरण के लिए गाय, भैंस, बकरियां, कुत्ते, हिरण, हाथी व सभी प्राणी जो हमें नजर आ रहे हैं ये मानव से अधिक स्वस्थ है। इन प्राणियों में कितनों को टी. बी., केंसर, एड्स, पीलिया, दमा जैसे रोग हैं। कितने पशुओं की किडनियां फेल हो रही हैं। कितने पशु हार्ट-अटैक के कारण मर रहे हैं। ये शोध का विषय है कि आखिर मानव के अंग ही क्यों बेकार होते जा रहे हैं।

क्या आपने कभी किसी पक्षी को बीमारी के कारण घोंसले में लेटा हुआ देखा है। मानव जो जहर फैला रहा है उसका असर शेष प्राणियों पर कम व उस पर अधिक हो रहा है। सभी शेष प्राणी मानव से अधिक स्वस्थ हैं। अब अगर पालतू पशु थोड़े बहुत बीमार भी होते हैं तो वे केवल मानव के खाद्य पदार्थ खाने से ही होते हैं।

मानव अपने समस्त क्रिया-कलापों के द्वारा अपने जीवन को शांतिमय, सुखमय, दीर्घायुमान बनाना चाहता है। वह चाहता है कि अधिक से अधिक स्वस्थ रहे इसलिए करोंड़ो चिकित्सक उसे निरोगी रखने के लिए तैनात हैं। उसने जो भी औद्योगिक इकाइयां लगाई हुई हैं उसे वहम है कि ये उसे स्वस्थ कर सकती हैं मगर ऐसा हरगिज नहीं है। उसके शरीर की इकाइयां अपने आप ही बीमार होने पर उसे स्वस्थ करती हैं। ऐसी कोई औद्योगिक इकाई नहीं है जो मानव को सुखमय बना सके, शांति दे सके। अपनी इंद्रियों को नियन्त्रण में रख कर ही वह आनन्दमय अवस्था में रह सकता है।

अगर सरकारें औद्योगिक धंधों को नियंत्रित तरीके से नहीं चलाना चाहती। वाहनों को भी अधिक अधिक से अधिक बनाना चाहती हैं तो कोई बात नहीं इसके अलावा भी दो तीन ऐसी विधियां हैं जिनको अगर विश्व सरकारें अपनाती हैं तो उनका मानव जाति पर बहुत बड़ा उपकार हो जाएगा। इनसे थोड़ा सा प्रयास करने पर बहुत बड़े स्तर पर वातावरण प्रदूषित होने से भी रोका जा सकता है व तेल की भारी मात्रा में बचत भी की जा सकती है। इनसे किसी का अहित भी नहीं होगा। पर्यावरण सुधार के लिए निम्रलिखित उपाय तो किए ही जा सकते हैं-

सड़कें धारा रेखीय बना कर-

मानव अपने सभी क्रिया-कलापों में बुद्धि का प्रयोग करता है। वह सभी कार्य व्यवस्थित ढंग से करने की चेष्टा करता है। जंगल में प्राकृतिक रूप से उगे हुए पेड़-पौधे अव्यवस्थित होते हैं मगर मानव उचित दूरी बना कर लाइनों में पेड़ लगाता है ताकी वह दिखने में सुन्दर लगें। उचित फासला होने पर उन्हें पनपने में कोई रूकावट न हो। ऐसे अनेक कार्य होते हैं जो व्यवस्थित तरीके से किए हुए अच्छे लगते हैं मगर कई बार वह किसी मामूली सी समस्या देखकर या अपने हितसाधन के कारण किसी कार्य में अव्यवस्थित तरीका अपना लेता है जिसमें लम्बी अवधी तक एक ऐसी समस्या बनी रहती है जिसका समाधान हो सकता था, और वह अब भी किया जा सकता है।

भारत एक बहुत ही विशाल देश है। इसमें पक्की सड़कों के ऐसे जाल बनाए गए हैं जो गांव-शहरों को आपस में जोड़ते हैं। इनको बनाते समय कोई व्यवस्थित तरीका नहीं अपनाया गया। मैदानी इलाकों में जहां यह धारा-रेखीय बन सकती थी इन्हें टेढ़ा-मेढ़ा बनाया गया है। पहाड़ी इलाकों में सड़कें बल खाती हुई चलती हैं। वहाँ मजबूरी है मगर मैदानी इलाकों में सड़कें अनेक मोड़ों वाली बनाई जाती हैं। खासकर ग्रामीण सड़कें तो बहुत ही अधिक टेढ़ी-मेढ़ी बनाई गई हैं जिन पर चलने वाले वाहनों में अतिरिक्त ईंधन जलता है। वाहनों को ऐसी सड़कों पर चक्कर काटते हुए गन्तव्य पर जाना पड़ता है।

मैदानी इलाकों में सड़कें धारा-रेखीय बनाई जा सकती थी मगर कृषकों की जमीनों पर मालिकाना हक होने के कारण ये बल खाती हुई बना दी गई जबकि किसानों को मुआवजा देकर अब भी ये सीधी बनाई जा सकती हैं। बड़ी हैरानी की बात है जहां ऊर्जा-दहन का सवाल हो। प्रदूषण फैलाना हो तो ऐसे मामलों में सरकार बड़ी तेजी से कार्य करती है जैसा कि अभी कारखाने लगाने के लिए किसानों से बलात् भूमि ली जा रही है। सड़कें व्यवस्थित ढंग से बनाने में किसानों को बहुत कम स्थानों पर मुआवजा देना पड़ता क्योंकि रास्ते सभी जगह छूटे हुए थे। किसानों को रास्ते की जमीन देकर काम चलाया जा सकता था।

पूर्व से पश्चिम की और दो शहरों को जोड़ने वाली एक दस किलोमीटर लम्बी सड़क में अगर एक नब्बे डिग्री का कोण हो तो अगर वह सीधी बनाई जाती तो केवल सात किलोमीटर बनती। इस कोण के कारण तीन किलोमीटर सड़क अधिक बनानी पड़ी। अब जब तक ये सड़क बनी रहेगी हर वाहन को तीन किलोमीटर अधिक चक्कर काटना पडेगा। इस छोटी सड़क पर एक ट्रक हर रोज केवल एक चक्कर लगाता है तो उसे छ: किलोमीटर अतिरिक्त चलना पडेग़ा। उसके महीने में 180 किलोमीटर अतिरिक्त हो जाएंगे। अब अगर यह ट्रक एक लीटर तेल में छ: किलोमीटर चलता है तो इस अतिरिक्त सफर में यह 60 लिटर तेल खा कर प्रदूषण फैलायेगा जो कि सड़क के ठीक ढंग से बनाने पर बचाया जा सकता था।

देश की अधिकतर सड़कें अव्यवस्थित ढंग से बनाई गई हैं जो कि एक खतरनाक मानवीय भूल है। इन टेड़ी-मेढ़ी सड़कों पर पूरे देश में हजारों लीटर ईंधन हर रोज अतिरिक्त जलता है जो की सभी सड़कों को धारा-रेखीये निर्माण रूप देकर बचाया जा सकता है। मैदानी इलाके में यह स्थिति जब चाहे सुधारी जा सकती है अन्यथा इन सभी भूलों का अहसास उस समय होगा जब ऊर्जा-दहक कारकों द्वारा फैलाये जा रहे प्रदूषण से मानव जीवन भारी खतरे में पड़ जाएगा। तब कहां-कहां सुधार किए जा सकते थे मगर नहीं किए गए एक एक बात याद आएगी।

माल ढुलाई में अतिरिक्त ऊर्जा दहन का एक और अव्यवस्थित रूप माल ढुलाई में है। इसमें उपभोक्ताओं के लिए अनेक प्रकार के उत्पादन ट्रकों व अन्य वाहनों में भरकर उत्पादक स्थल से दूर-दराज के इलाकों में पहुंचाए जाते हैं। माल ढुलाई में कार्यरत मशीनरी पर किसी एक इकाई का नियन्त्रण नहीं है। इसमें अधिकतर कार्य अव्यवस्थित ढंग से होता है। उदाहरण के लिए यमुनानगर (हरियाणा) में स्थित चीनी मिल एशिया की सबसे बड़ी चीनी बनाने की इकाई है मगर इसके आस-पास के क्षेत्रों में चीनी सहारनपुर व अन्य जगहों से भी आती है जबकि यह इकाई अपने आस-पास के इलाकों को भरपूर चीनी दे सकती है।

अगर चीनी का एक ट्रक भर कर सहारनपुर से यमुनानगर आता है और एक ट्रक यमुना नगर चीनी इकाई सहारनपुर के समकक्ष दूरी वाले शहर में पहुंचा देती है तो यह थोड़े से लाभ के लिए फैलाया जाने वाला अतिरिक्त प्रदूषण है। ऐसे अनेक उत्पाद है जो दिल्ली से बाहर दूर-दराज क्षेत्रों में उगाए व बनाए जाते हैं मगर राजधानी इनका केन्द्रीय भण्डारण गृह है। वह पहले यहाँ लाए जाते हैं और यहाँ से फिर उन्हीं क्षेत्रों के उपभोक्ताओं के लिए भेज दिए जाते हैं, जहां पर उनका उत्पादन हुआ था।

अव्यवस्थित ढंग से माल ढुलाई में जिन वाहनों का प्रयोग होता है वह दहन कारक हैं। इस प्रकार के अतिरिक्त दहन-क्रिया को माल-ढुलाई की कोई सही नीति बनाकर रोका जा सकता है। इस क्षेत्र में लोगों द्वारा चन्द रूपायों के लालच में बहुत ही अतिरिक्त ऊर्जा दहन होता है। इसमें 'उल्टे बांस बरेली को, वाली कहावत चरितार्थ करते हुए कोई एक उत्पाद अपने उत्पादन क्षेत्र से बाहर भेज दिया जाता है और जब उसकी कमी हो जी है वो ही उत्पाद दूसरे क्षेत्रों से आयात कर लिया जाता है।

हरियाणा, पंजाब में गेहूं, चावल इतना होता है कि ये राज्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के बाद भी अपने इन अन्न उत्पादों का अन्य राज्यों को निर्यात कर सकते हैं मगर कई बार पहले यहाँ का अन्न निर्यात किया जाता है बाद में अन्न की कमी दिखा कर उसे आयात कर लिया जाता है।

ट्रक भर कर जब चार पांच सौ किलोमीटर दूरी पर माल ले जाते हैं तो कई बार वापसी में उधर से खाली आते हैं। अगर माल-ढूलाई नियन्त्रक कोई बड़ी इकाई बना दी जाए तो ऐसा नहीं होगा। ट्रक दोनों और से लोड होकर चलेंगे जिससे ईंधन व मशीनरी दोनों की बचत होगी। हर शहर में छोटी-छोटी ट्रांसपोर्ट कम्पनियां कार्यरत हैं जिन्हें एक बड़ी इकाई बना कर उसके साथ जोड़ने की आवश्यकता है। यह कार्य राज्य सरकारें कर सकती हैं। जिस प्रकार परिवहन निगम बनाए हुए हैं उसी प्रकार माल-ढुलाई निगम बनाने की आवश्यकता है। इससे माल-ढुलाई व्यवस्थित रूप से हो सकेगी।

किसी एक जिले को अधिक से अधिक आत्मनिर्भर बना कर हम अतिरिक्त ऊर्जा दहन से बच सकते हैं। ऐसी कोई नीति बनाने की आवश्यकता है जिसमें वे ही उत्पाद बाहर से मंगाए जाएं जिनके अभाव में मानव का जीवन सुरक्षित नहीं है या उस क्षेत्र में नहीं होते। उदाहरण के लिए यहाँ जिला अम्बाला में सेब, नारियल नहीं उगाए जा सकते हैं। यहाँ पर गन्ना, गेहूं, चावल, दलहन, हल्दी, मिर्च, मसाले व अन्य फसलें उगाई जा सकती हैं। ऐसे अनेक जिले है जो ईक्का-दुक्का खाद्य उत्पाद को छोड़कर बाकी सभी में आत्मनिर्भर बन सकते हैं। केवल सही रणनीति बनाने की आवश्यकता है।

बहुमंजिला इमारतें बनाकर मानव आबादी को भी व्यवस्थित तरीके से बसाने की आवश्यकता है। जिस हिसाब से जनसंख्या बड़ रही है उसी हिसाब से उसकी बस्तियां फैलती जा रही हैं। जनसंख्या वृद्धि के चलते छोटे-छोटे गांव भी अब नगरों में तबदील हो गए हैं और शहरी क्षेत्र तो कई कई किलोमीटर के एरिये को कवर कर चुके हैं। गांवों के आसपास भी उसी में से नई-नई कालोनियां बन गई हैं। अगर इस तरह की कालोनियों को व्यवस्थित ढंग से नहीं बसाया गया तो यह आने वाले समय में पूरे उपजाऊ क्षेत्र को निगल जाएंगी।

अभी बड़े शहरों के आसपास बहुमंजिला इमारतें बनाई जा रही हैं जिनमें घरों के रेट इतने हैं की मध्यम वर्गीय परिवार के भी उसे खरीदने में पसीने निकल जाते हैं। इन्हें गरीब आदमी तो खरीदने की सोच भी नहीं सकता जबकि सभी अव्यवस्थित रूप से फैली हुई कालोनियों को ऐसी ही बहुमंजिली इमारतों में बसाने की आवश्यकता है तभी उपजाऊ भूमि को बचाया जा सकता है।

सरकार द्वारा इस कार्य को अपने हाथ में लेने की आवश्यकता है। वह गरीबों को अनेक योजनाओं में नि:शुल्क प्लाट दे रही है। अति गरीबों को तो वह घर बना कर भी दे रही है मगर इससे तो उपजाऊ भूमि नष्ट होने की समस्या और भी अधिक बड़ रही है। सरकर द्वारा दिए गए प्लाटों से एक नई कालोनी खड़ी हो जाती है। कई जगह तो ऐसा देखा गया है कि लोग पुराने मकान छोड़ कर नये में आ बसते हैं। पुराने ऐसे ही खंडहर बने खड़े रहते हैं।

सरकारें अगर मानव आबादी को व्यवस्थित तरीके से बहुमंजिली इमारतों में बसायें तो इससे शहर गांवों के आसपास फैलती जा रही कालोनियां सिमट कर ऊंचे घरों में आ जाएंगी इससे वनस्पति उगाने के लिए एक बड़ा भू भाग खाली हो जाएगा। इस प्रकार लोगों का भला तो होगा ही साथ में पर्यावरण की भी रक्षा होगी। जो कचरा ऐसी इमारतों से निकलेगा उसका प्रबंधन करना भी आसान होगा।

वर्तमान में जो कालोनियां शहरों के आसपास फैल रही हैं वह सरकार के लिए सिरदर्द बनी हुई हैं। इस प्रकार की कालोनियों में मूलभूत सुविधाएं पहुंचाना आसान काम नहीं है। प्रशासन एक कालोनी में बिजली, पानी, सड़कों की सुविधा प्रदान करता है तो इतने में दो नई कालोनियां खड़ी हो जाती हैं। इस समस्या का हल केवल एक ही है। और वह है एक बड़ी योजना बना कर पूरे देश की आबादी को बहुमंजिला इमारतों में बसाया जाए। अगर ऐसा होता है तो पर्यावरण सुधार के लिए उठाया गया यह एक बहुत ही बड़ा कदम होगा।

जब भी पर्यावरण को लेकर सम्मेलन बुलाये जाते हैं विश्व के कर्णधार एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाने लगते हैं। केवल भारत ही नहीं पूरी पृथ्वी को प्रदूषण मुक्त करने और ग्लोबल वार्मिंग के खतरे को कम करने के लिए अंर्तराष्ट्रीय स्तर पर एक ठोस विश्व नीति बनाने की आवश्यकता है। अपनी-अपनी डफली, अपना-अपना राग, को आधार बना कर इस समस्या से छुटकारा पाना मुश्किल है। इस प्रकार तो सभी देश अपनी जिम्मेदारियों से बचते हुए प्रदूषण कारकों को लेकर एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाते रहेंगे। प्रदूषण जांच के नाम पर धन्धा करते हुए नकली प्रदूषण मुक्त वाहन पर्ची बनाते रहेंगे। यह किसी एक देश की समस्या नहीं है बल्कि विश्वव्यापी समस्या है। ये ही कारण है कि कोई भी देश इसके प्रति गंभीर नहीं दिखाई दे रहा है।

विश्व का कोई भी देश प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए इसलिए गंभीर नहीं है क्योंकि इससे उसकी तथाकथित प्रगति बाधित होती है। औद्योगिक इकाइयां, सड़कें बनाना, भवन निर्माण बन्द करोगे तो विकासक्रम रूकेगा। अगर इनका निर्माण जारी रहेगा तो प्रदूषण फैलता चला जाएगा। ये ही चीजें मानव बना रहा है। इनको बन्द करने की कल्पना करना भी उसे असहनीय लगती है।

प्रदूषण रोकने को लेकर चाहे जितना मर्जी शोर मचाया जाए। औद्योगिक संस्थानों पर अंकुश लगाए बगैर इस पर काबू नहीं पाया जा सकता। सभी ऊर्जा दहक उत्पाद इन्हीं संस्थानों में बनते हैं। सड़कें व भवन वनस्पति प्रक्रिया को बाधित कर रहे हैं जिससे ऊर्जा का सन्तुलन बिगड़ता जा रहा है। अत: इन के निर्माण पर भी नियंत्रण आवश्यक है तभी प्रदूषण रूपी जहर से मुक्ति मिल सकती है।

विश्व को प्रदूषण मुक्त करने के लिए अनेक प्रकार के वृक्ष लगाए जा रहे हैं जो कि एक बहुत ही अच्छा कदम है। मगर जहां पहले से ही वनस्पति कारक उगे हों वहाँ वनों का कोई अतिरिक्त फायदा दिखाई नहीं देता। ऐसे क्षेत्र जहां पानी की वजह से वनस्पति उगाई नहीं जा सकती। ऐसे रेगिस्तानी इलाकों में अगर पेड़-पौधे उगाए जाएं तो इससे अतिरिक्त ऊर्जा निर्माण होगा। रेगिस्तान में पानी पहुंचाने का कुछ प्रयास हो रहा है। वहाँ पेड़-पौधे भी उगाए जा रहे हैं जो की एक सराहनीय कदम है। (व्यवस्थित सड़क, भवन के निर्माण बारे में विस्तार से मेरी आगामी पुस्तक ‘व्यवस्था परिवर्तन’ पढें)

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[क्रमशः अगले भाग में जारी...]

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रचनाकार: ईबुक - चैतन्य पदार्थ - भाग 7 - नफे सिंह कादयान
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http://www.rachanakar.org/2018/09/7_29.html
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