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ईबुक - चैतन्य पदार्थ - भाग 6 - नफे सिंह कादयान

( पुस्तक प्रकृति- पदार्थ विज्ञान )

चैतन्य पदार्थ

नफे सिंह कादयान

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भाग 1  || भाग 2  || भाग 3  || भाग 4 ||  भाग 5 ||


भाग 6

मानवजन्य दहन क्रियाएँ एवं उनका प्रभाव

मानव जन्य दहन क्रियाओं का आशय पृथ्वी पर अतिरिक्त अप्राकृतिक ऊर्जा दहन से है जिसे मनुष्य दिन रात जारी रखे हुए है। भोजन पकाने से लेकर अंतरिक्ष में छलांग लगाने तक जितने भी वह कार्य करता है सभी में ऊर्जा का दहन होता है। उसने जितनी भी मशीनों का निर्माण किया है सभी ऊर्जा दहन के सिद्धांत पर कार्य करती हैं, ऊर्जा नष्ट करती हैं। मानव अन्य सभी जीवों की तरह सांसों द्वारा कम ऊर्जा दहन करता है मगर अपने क्रिया कलापों द्वारा व्यापक स्तर पर दहन क्रियाओं को अंजाम देता है।

मनुष्य अपने आप को पृथ्वी का सबसे बुद्धिमान प्राणी मानता है। उसे लगता है कि वह सभी प्राणियों से अलग कुछ ऐसा कार्य कर रहा है जिससे उसकी प्रजाति हमेशा के लिए सुरक्षित हो जाएगी। उसे लगता है कि वह निरन्तर विकास करता जा रहा है। आईये देखें कि वह क्या करता जा रहा है। क्या वह वाकई विकास कर रहा है अथवा विनाश की और अग्रसर है?

मनुष्य जैव श्रृंखला का सबसे अधिक ऊर्जा नष्ट करने वाला प्राणी है। ऊर्जा नष्ट करने में वह चतुराई का इस्तेमाल करता है। यह चतुराई सभी प्राणियों में उनके वजूद के हिसाब से अलग-अलग पाई जाती है। सभी जैव कारक अपना बचाव करने की प्रवृत्ति रखते हैं। ये ही प्रवृत्ति चतुराई होती है। बिना किसी संघर्ष के दूसरे जीवों से आत्मरक्षा व पोषण के लिए शरीर में विशिष्ट शक्तियां निर्मित कर लेना चतुराई कहलाती है। अर्थात कोई ऐसी विधी जिसमें शरीर को कम से कम कष्ट हो और भरपूर भोजन भी मिलता रहे व शत्रुओं से रक्षा भी होती रहे।

नीम वृक्ष कड़वा होता है इस लिए पशु उसे नहीं खा सकते। बेर, बबूल जैसे अनेक पेड़-पौधों की टहनियां, पत्तों पर कांटे उगे होते हैं जो उनकी रक्षा करते हैं। कई प्रकार के बेल पौधों में ऐसा गुण पाया जाता है कि उन्हें ऊपर से जितनी बार काट दो वो फिर हरे-भरे हो जाते हैं। सांप, बिच्छु जैसे अनेक जीव जहर द्वारा अपनी रक्षा करते हैं। जिस प्रकार हर प्राणी अपनी रक्षा के लिए कोई न कोई चतुराई पूर्ण गुण रखता है ऐसे ही मनुष्य भी अपने सभी कार्य बुद्धिमानी से करता है जो अन्य जीवों की तरह चतुराई की उच्च शक्ति का नमूना है।

अगर ध्यान से देखा जाए तो मनुष्य अपनी बुद्धिमानी द्वारा जितने भी कार्य करता है पृथ्वी में चलने वाले सतत् दहन चक्र के हिसाब से ही करता है जो कि अन्य सभी प्राणी भी करते हैं। शेष प्राणी अधिकतर दहन क्रिया शारीरिक क्रियाओं के माध्यम से करते हैं जबकि मनुष्य पदार्थ दहन में बुद्धिमानी का प्रयोग करता है। उसका शरीर भी अन्य प्राणियों की तरह अरबों-खरबों इकाइयों (कोशिकाओं) का ढांचा है। ये इकाइयां अधिक से अधिक समय तक अपना अस्तित्व बनाए रखने की प्रवृत्ति रखती हैं।

मानव शरीर उसकी श्रृंखला की आदि प्रथम इकाइयों द्वारा बनाया गया एक ऐसा ढांचा है जिसमें वह आराम से रह कर अपनी वंश-वृद्धि करती हैं। यह सभी पृथ्वी की सूक्ष्म प्रतिलिपियां हैं इसलिए ऊर्जा दहन इनका प्राकृतिक स्वाभाविक कार्य है। यह अपने ढांचे के माध्यम से ऊर्जा प्राप्त करती हैं, उसे जलाती हैं, और कचरे के रूप में अपशिष्ट जला हुआ पदार्थ बाहर निकाल देती हैं। इससे अलग हटकर ये कोई कार्य नहीं कर सकती क्योंकि ये स्वयं भी ऊर्जा दहक कारक हैं और अपने शारीरिक ढांचे से भी ऊर्जा दहन का कार्य ही करवाती रहती हैं।

मनुष्य की इन इकाइयों की तुलना जलते हुए ऊर्जावान ईंधन से की जा सकती है जो तब तक जलता रहता है जब तक ईंधन रूपी ऊर्जा मौजूद है। जलता हुआ पदार्थ केवल स्वाभाविक रूप में बिखर सकता है अन्यथा वह न तो पदार्थ निर्माण कर सकता है और न ही अन्य अपने स्वभाव से हटकर कुछ कर सकता है।

मनुष्य की इकाइयां बाहय ईंधन लेकर निरन्तर दहन कार्य कर रही हैं। सभी इकाइयों द्वारा दहन कार्य को अधिक से अधिक समय तक बनाए रखने के लिए अपने ढांचे में चेतना को प्रदीप्त किया गया जो निरन्तर दहन से उत्पन्न रोशनी का केन्द्र बिन्दु है, अथवा मस्तिष्क में स्थित इकाइयों द्वारा धनात्मक व ऋणात्मक शक्तियां दहन क्रिया द्वारा चेतना की रचना करती हैं। यह बादलों में उत्पन्न विभवांतर जैसी क्रिया है। जैसे बादलों में चमक पैदा होती है ऐसे ही मस्तिष्क की इकाइयां चमक पैदा करती हैं जिससे मस्तिष्क प्रदीप्त रहता है। उसकी सभी इकाइयों द्वारा बुद्धि नामक चतुराई की रचना की गई जिसके माध्यम से वह अपने वजूद को अधिक से अधिक समय तक बनाए रखने का प्रयास करती हैं।

एक परिकथा के अनुसार कोई जिन्न बोतल में बंद था। एक व्यक्ति ने उसका ढक्कन हटा दिया। जिन्न बाहर निकला और व्यक्ति से बोला कि मुझे कोई कार्य बताओ नहीं तो मैं तुझे खा जाऊंगा। व्यक्ति अपनी सुरक्षा हेतु अनेक कार्यों को उससे करवाता रहा मगर जिन्न उन्हें चन्द मिनटों में कर देता था। कथा का अन्त यह है कि व्यक्ति बुद्धिमानी का प्रयोग कर जिन को बोतल में घुसने का चैलेंज देता है। जिन्न जैसे ही बोतल में घुसता है व्यक्ति वापिस उसे बोतल में बंद कर देता है।

मनुष्य की कथा में उसकी शारीरिक इकाइयां व्यक्ति हैं, और उनकी अपनी सुरक्षा के लिए तैनात मन, बुद्धि जिन्न रूपी शैतान हैं जो शांत नहीं रह सकती, पर वह पूरी तरह से इकाइयों का उत्पाद है इसलिए उसकी इकाइयों ने उसे ऐसे कार्य पर लगा दिया है जो उनका अपना स्वत्ः चलने वाला एकमात्र कार्य है, और वह है पदार्थ दहन कार्य। अर्थात जब मानव बुद्धि उसके शरीर की कोशिकाओं के नियंत्रण से बाहर होने लगी तो उन्होंने उसे पदार्थ रूपांतरण के आदि कार्य पर लगा दिया।

शेष प्राणियों की इकाइयों ने अपनी सुरक्षा एवं पोषण के लिए चतुराई (बुद्धि) को बनाया मगर उन्होंने उसका कार्य ढांचे के अन्दर कुशलता से ईंधन पहुंचाने तक ही सीमित रखा। अन्य प्राणियों को उन्होंने दहन की इजाजत नहीं दी पर मनुष्य की बुद्धि जब जिन्न की तरह अनियंत्रित हो गई तो उसकी शारीरिक इकाइयों ने उसे ऊर्जा दहन का अतिरिक्त कार्य सौंप दिया, फिर वह अपने सभी प्रकार के क्रिया कलापों के द्वारा ऊर्जा नष्ट करने लगा। मानव निम्रलिखित प्रकार से ऊर्जा दहन कर रहा है-

खाद्य पदार्थों को पका कर-

मनुष्य और शेष प्राणियों के रास्ते उस समय अलग हुए जब उसने अपने भोजन को आग में पका कर खाना शुरू कर दिया। यह उसका शेष प्राणियों से अलग हट कर प्रथम दहनात्मक कार्य था। यहीं से मनुष्य का अतिरिक्त ऊर्जा नष्ट करने का सिलसिला शुरू हुआ। अगर वह भोजन को पका कर न भी खाता तब भी इसी प्रकार जीवित रह सकता था जैसे शेष प्राणी रह रहें हैं।

भोजन पका कर खाने से उसे कोई लाभ हुआ है ऐसा दिखाई नहीं देता। ऐसा कोई पैमाना नहीं है जिससे ये मापा जा सके की भोज्य पदार्थों को पका कर वह शेष प्राणियों से अधिक आनन्द लेता हो या उनसे अधिक पौष्टिकता प्राप्त करता हो अथवा उन्हें अधिक स्वादिष्ट बना देता हो। हो सकता है कि शेष प्राणी भोज्य पदार्थों को कच्चा खाने में मनुष्य से अधिक आनन्द लेते हों। वैसे भी डॉक्टरों का कहना है कि भोजन को अधिक पका कर खाने से उसके विटामिन नष्ट होते हैं तो फिर उसे पकाया ही क्यों जाए। चना दाल को अगर रात को भीगो कर रख दें तो वह आसानी से खाई जा सकती है और स्वादिष्ट भी बहुत लगती है।

आदि में हमारे किसी पूर्वज को जंगल में लगी आग के बाद किसी जानवर का भुना मांस मिला होगा जो उसे कच्चे की अपेक्षा खाने में अधिक आसानी हुई होगी या उसे उसका अलग स्वाद मिला होगा। तभी से उसने खाद्य पदार्थों को पका कर खाना शुरू कर दिया। बहरहाल वजह जो भी रही हो मगर हजारों वर्षों से अन्न को पका कर खाने के बाद ये बात अटपटी सी लगती है कि अब वह कच्चा भोजन करने लग जाएगा।

(आगे लिखने से पहले मैं पुस्तक पढऩे वाले सभी सज्जनों से विनम्र निवेदन करना चाहता हूँ कि मैंने जो कुछ भी लिखा है या आगे लिख रहा हूँ वह किसी पर अपने विचारों को थोपने के लिए नहीं है। और जरूरी नहीं की यह सब सत्य विचार हों। यह केवल मेरे लिए सत्य हैं या फिर मेरे जैसी विचारधारा के व्यक्तियों को सत्य लग सकते हैं।)

अन्न पका कर खाने से लाभ तो कोई दिखाई नहीं देता मगर जहां तक हानि होने का प्रश्न है तो उसके लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता ही नहीं है। चारों ओर बैठे दांतों के डाक्टर। हर गली चौराहों पर खुले हुए हस्पताल इसका प्रमाण हैं कि उसे भोज्य पदार्थों को पका कर खाने से कितनी हानि हुई है।

दांतो व पेट की अनेक बीमारियां मनुष्य ने भोज्य पदार्थों को पका कर खाने से ही लगाई हैं जबकि शेष प्राणियों के दांत जीवन भर उनका साथ निभाते हैं।

ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है कि शेर, हिरणों के दांत खराब होते हों। अगर कुत्ते बिल्लियों, गाय भैंसों जैसे कुछ पालतू जानवरों के दांत खराब भी होते हैं तो वह केवल मनुष्य द्वारा उपयोग किए जाने वाले खाद्य पदार्थ खाने के कारण ही होते हैं। वे अगर बीमार होते हैं तो केवल मनुष्य के संपर्क में आने पर ही होते हैं।

संघर्ष में ऊर्जा दहन-

संघर्ष का आशय जीवों की उस प्रवृत्ति से है जिसमें वह अपने वजूद को सर्वोपरि सुरक्षित रखते हुए बाकी जीवों को नष्ट कर देना चाहते हैं, अथवा हर प्राणी अपने वजूद को सुरक्षित रखने के लिए शेष प्राणियों का शोषण करता है। मनुष्य सहित सभी प्राणी भोजन, आवास व सेक्स क्रिया के लिए अन्य प्राणियों से संघर्ष करते हैं। मनुष्य को छोड़कर बाकी प्राणियों के संघर्ष में दहन क्रिया जन्य कारकों का इस्तेमाल न के बराबर होता। वह केवल अपने-अपने ढांचों के प्राकृतिक सुरक्षा कवचों का इस्तेमाल कर अपनी सुरक्षा एवं पोषण के लिए अन्य प्राणियों से संघर्ष करते हैं। मनुष्य की शारीरिक इकाइयों ने मिल कर उसकी सुरक्षा के लिए बुद्धि नामक चतुराई की रचना की है ताकी वह शेष प्राणियों से भी अधिक बेहतर तरीके से अपनी रक्षा कर सके। वह अपनी रक्षा बुद्धिमानी से करने की कोशिश करता है।

शेष प्राणियों के पास अपनी रक्षा के लिए अनेक उपाय हैं। वे सींगों, दांतों, नाखूनों, जहर जैसे अनेक उपायों से अपनी रक्षा करते हैं। जल, थल में अनेक प्राणी मनुष्य से शारीरिक रूप में बहुत शक्तिशाली हैं। वह केवल अपने शरीर के भरोसे पर उनका मुकाबला नहीं कर सकता इसलिए उसकी शारीरिक इकाइयों ने उसे बुद्धि जन्य चतुराई नामक हथियार प्रदान कर दिया। इसी बुद्धि के बल पर वह सभी जीवों से शक्तिशाली बन गया है।

आदि में मानव चतुराई का इस्तेमाल अन्य जीवों की तरह ही करता था। वह अन्य प्राणियों के हमलों से बचने के लिए पेड़ो पर चढ़ कर या गुफाओं में शरण लेता था। चतुराई का बुद्धि में रूपांतरण उस समय हुआ जब उसने आक्रमणकारी जानवर को पत्थर मार कर भगा दिया। फिर वह भक्षण के लिए भी पत्थरों से उनका वध करने लगा। अब वह संघर्ष एवम् पोषण दोनों में पत्थरों का इस्तेमाल करने लगा। पत्थरों से हथियार बनने लगे फिर हडिड्यों को भी नुकीला कर उपयोग में लाया जाने लगा। तत्पश्चात तलवारों भालों का युग आरम्भ हुआ और यहीं से मनुष्य ने संघर्ष में ऊर्जा दहन का कार्य शुरू किया।

पृथ्वी में आदि दहन क्रियाओं से बना अधजला पदार्थ मानव के हाथ लग गया। उसने उसे दहन द्वारा पिंगला कर विभिन्न रूपों में ढाल लिया। इस पदार्थ से उसकी तलवारें, बंदूकें, गोला बारूद, टैंक बख्तरबंद गाड़ियां बनने लगी। इतने हथियारों की आवश्यकता ही नहीं थी मगर मानव को तो उसकी शारीरिक इकाइयों द्वारा पदार्थ जलाने का काम मिला हुआ है जिसमें वह गुटों में बंटकर अधिक से अधिक ऊर्जा दहन करता है। यह अनियंत्रित बुद्धि का पागलपन है, और इसका परिणाम आज तक शून्य से अधिक नहीं है वरना तो वह पृथ्वी पर समानता के आधार पर बिना कोई सीमा रेखा बनाए रह सकता है।

मानव द्वारा पृथ्वी को शक्ति के आधार पर अनेक काल्पनिक सीमा रेखाओं में बांट दिया गया है जो सभी देशों की सरहदें कहलाती हैं। इनका उल्लंघन करना दंडनीय अपराध होता है। इनमें अलग-अलग मानव समूह निवास करते हैं। ईश्वर ने सभी जीवों को बराबर जीने का हक दिया है मगर मानव द्वारा अन्य प्राणियों का कहीं कोई हिस्सा नहीं छोड़ा गया। वे उसके रहमो करम पर जीवित रहते हैं। उनका कोई देश है न कोई गांव-शहर।

सभी मानव समूह एक दूसरे से डरे हुए हैं। इसी डर की वजह से वे सुरक्षा के नाम पर हथियारों के जखीरे एकत्र कर रहे हैं। यह बहुत आश्चर्यजनक बात है कि पृथ्वी का सब से बुद्धिमान प्राणी अपनी श्रृंखला के विनाश के लिए घातक हथियार बनाता है। वह जो चंद्रमा, मंगल जैसी दूसरी धरती पर बस्तियां बसाने के लिए प्रयासरत है। वह सभी मानव समूह हथियार एकत्र करने की होड़ में सम्मिलित हैं। एक समूह अति मारक क्षमता का हथियार बनाता है तो दूसरा उससे भी अच्छा बना लेता है इसलिए उस हथियार की कोई अहमियत नहीं होती मगर उसे बनाने में जो ऊर्जा नष्ट होती है वो हो चुकी होती है।

स्थल चर प्राणियों में शेर को सबसे हिंसक पशु माना जाता है मगर ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता जिसमें शेर अपनी ही श्रृंखला के अन्य शेरों को मार कर खा गया हो। क्या किसी शेर ने भूमि के किसी टूकड़े, पोषण, सैक्स या बिना किसी मकसद के किसी शेर की हत्या की है। ऐसा न के बराबर होता है जबकि बुद्धिमान मनुष्य अपनी ही श्रृंखला के व्यक्तियों को उपरोक्त सभी कारणों से मार देता है। अगर मनुष्य पशु ही रहता तो क्या एक मनुष्य दूसरे मनुष्य को नष्ट कर सकता था? इसका जवाब हमें पेड़ों पर उछल कूद करने वाले बन्दरों से मिल सकता है। मानव भी ऐसी ही किसी प्रजाति का उत्कृष्ट रूप है। क्या बंदरों की लाशें मानव की तरह घरों सड़कों जंगल में पड़ी मिलती हैं जबकि मानव कई बार तो मनोरंजन के लिए ही लोगों का कत्ल कर देता है।

हथियार बनाने से मनुष्य को कोई लाभ नहीं हुआ बल्कि हानियां ही हानियां हुई हैं। समूह संघर्ष के लिए बनने वाले हथियारों से व्यापक स्तर पर ऊर्जा दहन होता है जो मनुष्य के लिए अत्यधिक हानिकारक है क्योंकि जितना अधिक पदार्थ ऊर्जाहीन होता जाएगा वनस्पति जीवों के पैदा होने में उतनी ही बाधाएं आयेंगी। मनुष्य वनस्पति का उत्पाद है और वनस्पति से ही जिन्दा है इसलिए अन्य जीवों के साथ उसे भी परेशानी उठानी पड़ेगी।

वाहनों से ऊर्जा दहन-

पृथ्वी की दहन क्रिया में जब भू-पर्पटी ने ठोस रूप धारण किया उस समय बहुत सी ऊर्जा जलने से बच गई थी जिसमें पैट्रोलियम, कोयला, यूरेनियम व अन्य कई प्रकार के ऊर्जा भण्डार थे जो भू-पर्पटी पर होने वाली आरम्भिक उथल-पुथल में बच गए थे। इन भण्डारों को जलाने का कार्य अब बड़े स्तर पर मनुष्य कर रहा है। वाहनों से ऊर्जा दहन का आशय दहन क्रिया द्वारा पदार्थ को विभिन्न रूपों में डाल कर ऊर्जा भण्डारों को जलाने से है। यह वो ही क्रिया है जिसमें पदार्थ स्वयं ही जल रहा था मगर भू-पर्पटी जमने के पश्चात दहन क्रिया की गति धीमी हो गई थी। अब मनुष्य द्वारा उसे दोबारा तेज से तेजतर किया जा रहा है।

मनुष्य द्वारा जितने भी वाहन बनाए गए हैं या बनाए जा रहे हैं सभी ऊर्जा नष्ट करके बनाए गए हैं, और ये अपने जीवन काल में जब तक चलते हैं निरन्तर ऊर्जा नष्ट करते हैं। अगर विश्व के सारे वाहनों के दहन की एक साथ गणना की जाए तो इससे हजारों वर्ग किलोमीटर के किसी एक बड़े भू-भाग पर प्रचण्ड अग्रिशिखाएँ उत्पन्न होने जैसा दृश्य दिखाई देगा। तेल की खपत इस प्रकार से हो रही है जैसे कोई बहुत विशाल तेल की नदी वाहनों में घुस रही हो।

एक काल अवधी के बाद मनुष्य विश्व के कोयला, पेट्रोलियम जैसे ऊर्जा भण्डारों को रूपान्तरित करके जले हुए पदार्थ में बदल देगा। इसके बाद भी अनेक ऊर्जा भण्डार है जिन्हें मनुष्य रूपान्तरित करेगा। सबसे विशाल ऊर्जा भण्डार सूर्य है जिसका उपभोग करना वह शुरू कर चुका है। ऊर्जा बहुत है, मनुष्य के अग्रिदहन सिद्धांतों से उसका खात्मा नहीं होगा बल्कि मनुष्य श्रृंखला उससे बहुत पहले ही नष्ट हो चुकी होगी क्योंकि उसके ऊर्जा रूपान्तरण कार्य से जो जला हुआ पदार्थ चारों ओर फैलता जा रहा है उससे ही मानव का अन्त निश्चित है।

एक कमरे में किसी व्यक्ति को बन्द कर अंगीठी जलाई जाए तो वह दो-तीन घण्टे बाद ही मर जाता है। ऐसे हादसे अक्सर होते रहते हैं जिनमें सर्दियों में लोग किसी मकान या दुकान में शटर बन्द कर कमरा गर्म करने के लिए अंगीठी जला कर रख देते हैं। सुबह उसमें सोये सभी लोग मृत पाए जाते हैं। बुद्धिजीवी घोषणा करते हैं कि कमरे में आग जलने से फलां जहरीली गैस फैल गई इसलिए उनकी मृत्यु हो गई। गैस तो वाकई फैल गई मगर सच्चाई ये होती है कि आग के दहन से कमरे की वह सारी ऊर्जा रूपान्तरित हो गई जो मनुष्य को जीवित रखती है, जिसमें वह सांस लेता है। अब कमरे में जले हुए पदार्थ का कचरा फैल गया है जिसे वैज्ञानिक भाषा में मॉनोआक्साईड बनना कहते हैं। मानव को जीवित रहने के लिए शुद्ध हवा चाहिये। जीवन दायिनी हवा के अभाव में उसे अपना अस्तित्व बचाए रखना असंभव है।

दहन करने के लिए पेट्रोलियम के अलावा बहुत से विकल्प है मगर वह ऊर्जा जिसमें मनुष्य सांसे ले रहा है वह सीमित है। उसे केवल पेड़-पौधे ही बना रहे हैं। उसके अथाह भण्डार नहीं हैं इसलिए मनुष्य जितना तेज भागेगा उतने ही तेजी से वह ऊर्जा दहन करेगा, और उतने ही तेजी से वह अपने अन्त की तरफ अग्रसर होगा। हजारों किलोमीटर प्रति घण्टे की रफ्तार से वाहनों को चलाने वाला मनुष्य अपने अन्त की तरफ उसी तेजी से अग्रसर है।

मनुष्य अब जो भी कार्य कर रहा है उन सभी में ऊर्जा नष्ट हो रही है। उसने जिस प्रकार की अब तक मशीनें बनाई हैं सभी दहन क्रिया द्वारा बनाई गई हैं, और सभी में दहन चलता है। वह जो कपड़े, जूते पहनता है, वह ऊर्जा दहन करके ही बनाए जाते हैं। वह जो ज्ञान-विज्ञान की किताबें पढ़ता है दहन क्रिया से बनाई जाती हैं। मनुष्य का खाना-पीना, सोना-जागना और चलना तथा सांस लेना सभी में ऊर्जा दहन होता है। सांस लेकर सभी प्राणी ऊर्जा नष्ट करते हैं मगर कपड़े पहन कर केवल मनुष्य ही दहन करता है। इनके निर्माण में इतनी ऊर्जा नष्ट होती है जितनी शेष प्राणियों के सांस लेने में भी खर्च नहीं होती।

आवास के लिए ऊर्जा दहन-

आदि में मनुष्य शेष प्राणियों की तरह प्राकृतिक रूप में रहता था। वह पेड़ों को अपना निवास बनाता था या फिर प्राकृतिक रूप से पहाड़ों में बनी गुफाओं, कंदराओं को घर के रूप में इस्तेमाल करता। बाद में वह लकड़ी, सरकंडों की झोपडिय़ां बना कर रहने लगा। यह शेष प्राणियों वाला प्राकृतिक तरीका था जिसमें वह अपने को व अपने नवजात शिशुओं को सुरक्षित बचाए रखने के लिए चतुराई से अतिरिक्त आवरण की व्यवस्था करते थे जैसा की अन्य पशु-पक्षी घोंसले मांदे बना कर करते हैं।

मनुष्य द्वारा आवास बनाने का अप्राकृतिक तरीका वह है जिसमें वह पदार्थ को दहन क्रिया द्वारा पका कर ईंट व इस्पात का उत्पादन कर घर बनाने में इस्तेमाल करता है। इसके लिए वह ईंट, सीमेंट, सरिया और भारी मात्रा में लकड़ी का इस्तेमाल करता है। आज पृथ्वी के एक बड़े भू-भाग पर दहन क्रिया से बनाई हुई छोटी-बड़ी इमारतें खड़ी हैं जबकि इस स्थान पर मनुष्य को जीवन देने वाली वनस्पति हुआ करती थी। पदार्थ को पका कर घर बनाने की क्रिया कुछ ऐसी है जिसमें मनुष्य भू-पर्पटी को जला कर एक ऐसा रूप देता जा रहा है जिसमें एक भी पौधा उगना असंभव है।

मनुष्य द्वारा पहले आवास आवश्यकता अनुसार सीमित रूप में बनाए जाते थे मगर जैसे-जैसे लोग सम्पन्न हुए अनावश्यक रूप में घरों का निर्माण करने लगे। अब केवल एक साधन सम्पन्न परिवार ही अनेक शहरों में अपनी अय्याशियों के लिए बड़े-बड़े बंगले बनाता है। कुछ लोग तो अपने इन बंगलों में साल में एक दो बार ही जाते हैं। सरकारें भी अनेक प्रकार की बिल्डिंगें बना कर खाली छोड़ देती हैं। हस्पताल, थाना, कचहरियों व अन्य अनेक प्रकार की पुरानी जर्जर सरकारी इमारतों को खंडहरों के रूप में ऐसे ही छोड़ दिया गया है जबकि उनका मलबा हटाकर वहाँ वनस्पति उगाई जा सकती है।

जहां-जहां पर माटी पकाने के लिए भटठे लगे हुए हैं वह भूमि बंजर हो चुकी है। चारों तरफ कंकरीट के जँगल नजर आते हैं जिनमें बड़ी-बड़ी इमारतें व सड़कें हर तरफ फैली हुई हैं। अनेक बड़े शहरों की तंग गलियों में रहने वाले लोगों को तो पेड़-पोधों के दर्शन किए हुए महीनों गुजर जाते हैं। वह अन्य जीवों की तरह जंगल से ही जुड़ा एक प्राणी है। प्राकृतिक रूप से मानव निवास के आस-पास भरपूर हरियाली होनी आवश्यक है नहीं तो वह माईग्रेन, अवसाद, टैंशन जैसी बीमारियों की चपेट में आ जाएगा।

मनुष्य अन्धा-धुन्ध पदार्थ को पका कर निरन्तर इमारतें बनाता जा रहा है। वह उस बिन्दु के बारे में नहीं जानता जहां उसे अन्न पैदा करने के लिए उपजाऊ जमीन नहीं मिलेगी। न ही उसने अभी तक ऐसी कोई गणना की है। अगर पूरी पृथ्वी के धरातल को सड़कों भवनों से ढक दिया जाता है तो क्या होगा ये लिखने की आवश्यकता ही नहीं है।

पृथ्वी निरन्तर गर्म हो रही है। ग्लोबल वार्मिंग को लेकर पूरी मनुष्य जाति के कर्णधार चिन्तित दिखाई देते हैं। हर वर्ष पर्यावरण सुधार को लेकर राष्ट्रीय अंर्तराष्ट्रीय स्तर पर बडे़-बड़े सम्मेलन बुलाए जा रहे हैं। अभी ऐसा ही सम्मेलन अमरीका में बुलाया गया था जिसमें विश्व के शीर्ष नेता आए थे।

पृथ्वी के सबसे बुद्धिमान मनुष्य पर्यावरण बचाने के लिए किसी एक स्थान पर उन हवाई जहाजों, मोटर गाडिय़ों में सवार होकर आते हैं जो एक घण्टे में सैंकडों लीटर पेट्रोल पी कर जहर उगल देते हैं। ये जहर प्राणी जगत के लिए विनाशक है। ये ही वह जहर है जिसके कारण मनुष्य को पृथ्वी गर्म होती दिखाई दे रही है।

पर्यावरण के सुधार हेतु हर साल किसी न किसी देश में सम्मेलन बुलाए जाते हैं जिनमें तथाकथित सुधारवादी एकत्र होकर हो-हल्ला मचाते हैं। इन सम्मेलनों से आज तक फायदा तो नहीं हुआ बल्कि जिन वाहनों पर चढ़कर ये आते हैं उनसे उल्टा प्रदूषण ही फैलता है। क्या आज तक एक भी औद्योगिक इकाई बन्द हुई है जो जहर उगल रही हैं? क्या निरन्तर वाहन बनाने व उनको चलाने पर मनुष्य अंकुश लगा सकता है? क्या समूह संघर्ष का मनुष्य कोई हल निकाल सकता है जिससे कुल प्रदूषण का लगभग आधा भाग फैलता है? आइये सबसे पहले तो यह देखें कि ग्लोबल वार्मिग आखिर है क्या? जैसे कि वैज्ञानिक, भू-गर्भशास्त्री कह रहे हैं। क्या वाकई पृथ्वी का तापमान निरन्तर बड़ रहा है। वह गर्म होती जा रही है या ये लोग कुछ वहम पाले हैं।

जैसा की मैं पहले लिख चुका हूँ पृथ्वी अपनी आरम्भिक अवस्था में सूर्य की तरह धहक रही थी। धीरे-धीरे ऊर्जा गवाती हुई वह ठंडी हुई और उसकी ऊपरी पर्त ठोस अवस्था धारण कर गई। भू-पर्पटी बनने के पश्चात भी पृथ्वी निरन्तर ऊर्जा गंवाती हुई ठण्डी होती आ रही है। उसका यह दहन कार्य धीमा अवश्य हुआ है मगर वह क्रमवार निरन्तर जारी है। मनुष्य अब इस दहन क्रम को तेज से तेजतर करने में लगा हुआ है।

पृथ्वी निरन्तर गर्म होती जा रही है वैज्ञानिकों द्वारा प्रचारित किया जाने वाला यह वाक्य ही गलत है। वैज्ञानिक पृथ्वी का सही आकलन करने में असमर्थ हैं या फिर जान बूझकर भ्रम की स्थिति बनाए हुए हैं मुझे नहीं मालूम। पृथ्वी तभी गर्म हो सकती है जब उसके आन्तरिक भाग में अचानक अतिरिक्त ऊर्जा का उत्पादन शुरू हो गया हो या फिर सूर्य ने ही अतिरिक्त ऊर्जा विसर्जित करनी शुरू कर दी हो जबकि दोनों में से ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। पृथ्वी व सूर्य दोनों अपने घनत्व के हिसाब से ऊर्जा गंवाकर ठण्डे होते आ रहें हैं। वह जो गर्म होता दिखाई दे रहा है वातावरण में फैला मानवजन्य कचरा है। मानव का विकास, वनस्पति का ह्रास ही ग्लोबल वार्मिंग है।

अगर कोई सचमुच ये देखने को उत्सुक है कि ग्लोबल वार्मिंग क्या है और वनस्पति ह्रास का उसके साथ क्या कनेक्शन है तो उतरी भारत में मई जून महीने की गर्मी में ऐसी जगह पर बैठ जाएं जो लोगों द्वारा वनस्पति विहीन कर दी गई हो। जहां पर कोई फसल, पेड़ पौधा न हो। उसके बाद उठ कर किसी सूरजमुखी, बरसीम के खेत के पास बैठकर देखें। उसे अपने आप पता चल जाएगा की ग्लोबल वार्मिग क्या है। क्यों पृथ्वी गर्म होती दिखाई दे रही है। गर्मियों के दिनों में जब वनस्पति के साये में रहने वाले ग्रामीण लोग दिल्ली जैसे महानगरों में घुसते है तो उन्हें ये समझाने की आवश्यकता नहीं होती की पृथ्वी किन कारणों से गर्म होती दिखाई दे रही है।

मनुष्य की बुद्धि विकसित होने से पहले वह अन्य प्राणियों की ही तरह जीवन व्यतीत करता था। धरातल के स्थल भाग पर उस समय चारों ओर जंगल ही जंगल थे। पूरा भू-भाग वनस्पति से आच्छादित था। मनुष्य उस समय ऐसे रहता था जिस प्रकार बन्दर, गोरिल्ला या वनमानुष रहते हैं। मनुष्य की तुलना इनसे की जा सकती है क्येंकि वह ऐसी ही किसी एक श्रृंखला का बुद्धिजन्य चतुराई युक्त रूप है। वह जंगलों में स्वतन्त्रता पूर्वक रह कर अन्य प्राणियों की तरह अपनी निरन्तरता बनाए हुए था।

जब मनुष्य बुद्धिमान नहीं था उस समय प्रकृति का सन्तुलन बना हुआ था। पेड़-पौधे पर्याप्त मात्रा में ऊर्जा मुक्त करते थे और प्राणी उसे सांसो द्वारा नष्ट करते थे। ऊर्जा की कहीं कोई कमी नहीं थी बल्कि उसका वायु में विशाल भण्डार बना हुआ था। जमीन से ऊर्जा सोख कर वनस्पति जगत इतनी विशाल मात्रा में ऊर्जा मुक्त करता था जिसका समस्त प्राणियों के द्वारा एक भाग ही नष्ट होता था। जंगलों में आग लगना व ज्वालामुखियों में दहन से यह ऊर्जा नियन्त्रित होती रहती थी मगर फिर भी ऊर्जा की कोई कमी नहीं थी।

मनुष्य की बुद्धि का विकास ही ऊर्जा का ह्रास है। जैसे-जैसे बुद्धि विकसित होती गई वैसे-वैसे वह जंगलों को नष्ट करता गया। दहन क्रियाओं को बढ़ाता गया जिससे प्राकृतिक संन्तुलन नष्ट हुआ है। स्थल के अधिकांश भाग को मनुष्य ने वनस्पति विहीन कर दिया है। यहाँ सड़कें, भवन, औद्योगिक संस्थान बन गए और ये निरन्तर बनाए जा रहे हैं।

अभी (2008 ई.) मानव की खाद्य सामग्रियों पर बहस छिड़ी हुई है। विश्व में उनकी कीमतें लगातार बढ़ने के समाचार आ रहे हैं। कई देशों में गेहूँ, धान व दालों के उत्पादन में भारी कमी आई है। लोकतान्त्रिक सरकारें हिल रही हैं उन्हें ये तो पता है कि महंगाई के कारण उनके शासन को जनता खत्म कर सकती है मगर ये मालूम नहीं है कि खाद्य पदार्थों का उत्पादन क्यों नहीं हो पा रहा है। यहाँ (हरियाणा में) सरकार द्वारा पच्चीस हजार एकड़ उपजाऊ भूमि एक ग्रुप को औद्योगिक जॉन बनाने के लिए दी गई है। उधर नंदीग्राम में भूमि अधिग्रहण को लेकर हिंसा भड़की हुई है। वे ग्रामीण तथाकथित नीति निर्धारक, बुद्धिमानों से अधिक समझदार साबित हो रहे हैं। उन्हें मालूम है कि अगर यहाँ कारखाने ही कारखाने होंगे तो वे अन्न कहां ऊपजाएंगे। अगर अन्न नहीं होगा तो वह भूखे मरेंगे। इससे तो अच्छा है कि बुद्धिमानों की गोली से ही मर जाएं।

एक बार दो नावों में सवार हो कुछ व्यक्ति सागर में किसी निश्चित स्थान की और जा रहे थे मगर बीच रास्ते में वे भटक गए। उनकी सारी खाद्य सामग्री खत्म हो गई। खाने का प्रबन्ध तो उन्होंने मछली मार कर कर लिया मगर प्यास बुझाने के लिए पानी की समस्या हो गई। प्यास से बेहाल वे भटक कर एक निर्जन द्वीप पर पहुंच गए जहां मीठे पानी की एक नदी बह रही थी। उन्होंने जी भरकर पानी पिया और कुछ दिन उसी द्वीप पर ठहर गए।

एक रोज एक नाव के व्यक्ति द्वीप पर टहलने निकल पडे़। कुछ दूर जाने पर वे यह देख कर आश्चर्य चकित रह गए कि वहाँ एक चट्टान के नीचे बड़ी पोटली में सोने, चांदी व हीरे रखे हुए थे। करोड़ों का माल था पर उन्हें उसको दूसरी नाव के व्यक्तियों में बांटने में परेशानी होने लगी। उन्होंने तय किया कि चुपके से वहाँ से निकल चलें और माल को रास्ते में ही सब बांट लेंगे। उन्होंने पोटली उठाई और दूसरे नाव सवारों से छुप कर नाव में बैठ गए मगर दूसरों को भी पता चल गया कि उनके पास पोटली में ऐसी कोई कीमती चीज है जिसे वे छुपा कर ले जा रहे हैं।

दूसरी नाव वालों ने रास्ते के सफर के लिए मश्कों में नदी का मीठा जल भरा और अपनी नाव में बैठ कर पहली नाव वालों के पीछे-पीछे चलने लगे। पहली नाव के सवार बहुत खुश थे। करोड़ों का सोना चांदी, हीरे-जवाहरात उनके कब्जे में थे। बांटने के बाद हरेक के पास इतना धन आना था जिससे वे सभी अमीर हो सकते थे मगर खुशी और छुप कर भागने की हड़बड़ी में वे नदी से पानी लेना भूल गए। यह कोई मामूली भूल नहीं थी बल्कि भयंकर भूल थी। इसका पता उन्हें तब चला जब रास्ते में उन्हें प्यास लगने लगी।

सागर पानी से लबालब भरा था मगर यह किसी यात्री की प्यास बुझाने में असमर्थ है। पहली नाव वालों के पास माल बहुत था पर पानी नहीं था। प्यास लगी थी, सभी का गला सूख चुका था इसलिए उन्होने एक मत से फैसला किया की मामूली सा माल दूसरी नाव वालों को देकर पानी खरीद लिया जाए। सो उन्होंने अपनी नाव को दूसरी नाव के पास लगा कर कहा की हमें बहुत से हीरे-जवाहरात मिले हैं, तुम्हे हम एक-एक हीरा दे रहे हैं। हमारे पास पानी नहीं है इनके बदले तुम हमें पानी दे दो।

दूसरी नाव के व्यक्तियों के पास पानी तो था मगर रास्ता बहुत लम्बा था इसलिए यह निश्चित नहीं था कि उनका पानी मंजिल तक साथ दे सकेगा। वे समझदार थे सो उन्होंने पानी देने से इन्कार कर दिया। पहली नाव सवार प्यास से बेहाल हो चुके थे। गर्मी बहुत तेज थी, उन्हें यह अहसास होने लगा मानो हल्क में कांटे चुभ रहे हों। वे इतनी दूर आ चुके थे कि पानी के अभाव में पीछे द्वीप पर भी जिंदा नहीं लोट सकते थे। उनकी जीभ पर एंठन आ चुकी थी। उनमें से एक यात्री की प्यास जब बर्दाश्त से बाहर हो गई तो वह दूसरी नाव वालों से बोला तुम मेरे हिस्से का सारा माल ले लो पर कृपया मुझे पानी पिला दो। कुछ देर में ही उस नाव के सभी यात्री रोने गिड़गिड़ाने लगे। हमारा सारा माल ले लो मगर हमें पानी पिला दो। दूसरी नाव वालों को पता था कि अगर उन्हें पानी दे दिया तो वे खुद प्यास से मर जायेंगे। एक नाव के सवारों की मृत्यु निश्चित थी क्योंकि मंजिल तक यह पानी एक ही नाव के यात्रियों को प्यास बुझा कर उन्हें जीवित रख सकता था।

सोना, चांदी व हीरे मनुष्य की प्यास नहीं बुझा सकते। लाखों एकड़ उपजाऊ भूमि को बलात् अधिग्रहण करके उस पर लगने वाले कारखानों से किसी व्यक्ति के लिए एक रोटी व एक गिलास पानी का उत्पादन नहीं किया जा सकता। व्यक्ति रोटी खाता है वह कारें-हवाई जहाज, गोला बारूद नहीं खा सकता। जब कारखाने नहीं थे, दहन क्रिया जन्य संस्थान नहीं थे, तब भी मनुष्य अच्छी प्रकार जीवन व्यतीत कर रहा था।

जीवन सभी को प्यारा होता है। कोई मरना नहीं चाहता इसलिए दूसरी नाव वाले हीरे-जवाहरात के बदले पहली नाव के मालदारों को पानी क्यों पिलाएँगे। वैज्ञानिक जिसे पृथ्वी का गर्म होना बतला रहे हैं वह मनुष्य द्वारा अनावश्यक रूप से व्यापक स्तर पर ऊर्जा नष्ट करके बिगाड़ा हुआ ऊर्जा सन्तुलन है। उसने अपने क्रिया-कलापों से ऊर्जा दहन कर उसका कचरा जहरीली गैसों के रूप में पैदा कर दिया है जिससे पृथ्वी की ऊपरी भू-स्तह और उससे लगती निचली भारी गैस कणों वाली वायू मण्डलीय सतह का तापमान निरन्तर बड़ रहा है। ये ही ग्लोबल वार्मिंग है जिसको लेकर दुनिया भर के वैज्ञानिक व राजनेता चिन्तित दिखाई देते हैं मगर कोई उपचार नहीं करते। वरना तो पृथ्वी आदिकाल से ही ऊर्जा गंवाती हुई ठण्डी होती आ रही है।

आदि में पृथ्वी दहन क्रिया में भू-पर्पटी के ठोस रूप धारण करने के बाद ऊर्जा का विशाल भण्डार जलने से बच गया। इसमें से एक बड़ा भाग भू-पर्पटी के अन्दर दब गया जिसका मनुष्य पट्रोलियम-कोयले के रूप में दोहन कर रहा है। दूसरा भाग वायुमंडल में गैसीय रूप में स्थापित हुआ जिसे वैज्ञानिक भाषा में ओजोन परत कहते हैं। यह ऊर्जा का अति शुद्ध रूप है। मनुष्य जिस ऊर्जा का उपयोग कर जीवित रहता है वह वनस्पतिक ऊर्जा है। दहन क्रियाओं से इन दोनों प्रकार की ऊर्जाओं का ह्रास हो रहा है। जो गैसें इनके रूपान्तरण से बनती हैं वह सूर्य की किरणों से इतनी गर्म हो जाती हैं कि उनसे भू-पटल का तापमान निरन्तर गर्म होता दिखाई देता है।

मानवजन्य ऊर्जा दहन क्रिया से मुक्त हुआ कचरा सूर्य के तापमान को सोख कर अत्याधिक गर्म हो जाता है। मनुष्य द्वारा किए जा रहे अन्धाधून्ध पदार्थ रूपान्तरण में बड़े पैमाने पर यह कचरा गैसों के रूप में वायुमंडल में एकत्र होता जा रहा है। अभी ऊर्जा दहन के स्रोत बड़ते ही जा रहें हैं। एक भी ऐसा क्षेत्र नहीं है जहाँ पर किसी देश के प्रबुद्ध लोगों ने इस पर कटौती की हो। कुछ लोगों को यह वहम है कि वाहनों को विद्युत ऊर्जा से चलाकर प्रदूषण नहीं फैलता है। मगर इन सभी में भी दहन क्रिया होती है और जहाँ पदार्थ दहन है वहाँ जहर पूरा फैलेगा। विद्युत मोटरों में धुंआ निकलता दिखाई नहीं देता क्योंकि यह ऊर्जा को लगभग सारा ही जला देती हैं।

अग्नि का प्रज्वलन होना ही प्रदूषण है चाहे वह किसी भी रूप में जल रही हो। विद्युत ऊर्जा, पेट्रोलियम पदार्थ एवं अन्य ज्वलनशील गैसें सभी मनुष्य के लिए जहर पैदा कर रहे हैं। सभी औद्योगिक इकाइयां, वाहन, सैनिक साजो सामान, इलैक्ट्रोनिक समान, सभी ऊर्जा दहक कारक हैं। ये ही मनुष्य के जीवन को समाप्त करने के लिए निकट भविष्य में उत्तरदायी साबित होगें। जो लोग प्रदूषण को लेकर शोर मचा रहे हैं वो ही सबसे अधिक जहर वायु में घोल रहे हैं। हरेक देश के कर्णधार बढ़ते प्रदूषण को लेकर एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं मगर इसे रोकने को लेकर कोई गम्भीर नहीं है।

सभी देशों के मुखिया अक्सर गर्व के साथ ये घोषणा करते हुए दिखाई देते हैं कि हम विकास दर में अन्य देशों को पछाड़ते हुए आगे निकल रहे हैं। अथवा हमने विकास दर का लक्ष्य इतने प्रतिशत रखा हुआ है जिसे पाने के लिए हम जी-जान से लगे हुए हैं। क्या है ये विकास दर? सभी देशों के नीति निर्धारकों की बुद्धिमतापूर्ण सोच ये है कि जितने अधिक कारखाने लगेगें। पक्की सड़कें बनेंगी। ऊँची-ऊँची बहुमंजिला इमारतें बनेंगी। सोने-चांदी के भण्डार अधिक होंगे। शरीर को जड़ करने के लिए हाथों की बजाए मशीनों के अधिक इस्तेमाल होने से लोगों का जीवन स्तर ऊपर उठ जाएगा। ये ही तथाकथित विकास गति की परिभाषा है।

एक साधन-सम्पन्न व्यक्ति के पास घूमने के लिए अनेक महंगी कारें हैं। दूर-दराज के क्षेत्रों में जाने के लिए अपना हवाई जहाज है। पहनने के लिए इतने कपडे़-जूते हैं कि उसे गिनती भी याद नहीं है। खाने के लिए इतनी तरह के व्यंजन हैं कि जिन्हें खाते-खाते उसका घनत्व एक क्विंटल पार कर चुका है। अब उसकी अलमारी में बीमारियों की वजह से दवाइयों का मेडिकल स्टोर बन चुका है। बदहजमी, शुगर, जोड़ो का दर्द, उसके अतिरिक्त वसा युक्त भोजन करने के कारण हो चुका है। कार में उठा कर बैठाने के लिए नौकर बहुत हैं। वो ही उसे खाना खिलाते हैं, नहलाते बैड पर लिटाते हैं। मंहगे बैड पर लेटता तो है मगर अस्वस्थ होने के कारण रात भर सो नहीं पाता।

क्या यह व्यक्ति का विकास है या विनाश? उपरोक्त अधिकतर विकासशील व्यक्तियों का उदाहरण है। जितना अधिक विकास के लिए भागोगे दिमागी बीमारियां इनाम में पाओगे। जिस हिसाब से खाओगे उस हिसाब से ही शारीरिक बीमारियां मिलेंगी। गलत खान-पान ऐशोआराम व भाग-दौड़ भरी दिनचर्या के फलस्वरूप अगर किसी गंभीर बीमारी की चपेट में कोई व्यक्ति आ जाए तो फिर अनेक बॉडीगार्ड, दुनिया भर के डॉक्टर भी उसको नहीं बचा सकते।

किसी पहाड़ पर चारों ओर वृक्ष लगे हैं। वहाँ सुन्दर फूल बूटे खिलते रहते है। प्रदूषण का नामो-निशान नहीं है क्योंकि वहाँ वाहनों की आवाजाही नहीं है। कारखाने भी नहीं है जिनकी चिमनियां धुँए का गुब्बार फेंकती हैं। एक लकड़ी की झोपड़ी बना कर कोई व्यक्ति वहॉं आनन्द पूर्वक रहता है। उसने गाय, बकरियां पाली हुई हैं। वहीं वह अपने गुजारे लायक खेती करता है। वह रोटी व जंगल से कंद-मूल खाकर अपना पेट भरता है। वह दूध पीता है, मस्त रहता है। उसे याद नहीं की अन्तिम बार कब उसे बुखार हुआ था। सिर के दर्द का तो उसे पता ही नहीं है कि वह कैसे होता है। क्या यह व्यक्ति असभ्य है? क्या इसका विकास नहीं हुआ है?

बच्चा कोरे कागज की तरह खाली दिमाग के साथ पैदा होता है। उसके आसपास रहने वाले व्यक्ति उस पर जैसी इबारत बनाते हैं वैसी ही बन जाती है। स्कूल में दाखिला कराते ही उसे सभ्य बनाने की मुहिम शुरू हो जाती हैं। पहली कक्षा से उसके दिमाग में दूसरों के बनाए हुए सिद्धान्तों, विचारों का कचरा भरना शुरू कर दिया जाता है। उसे राजनीति सिखाई जाती है ताकि वह भ्रष्टाचारी बन सके। उसके दिमाग में ज्ञान-विज्ञान के प्रयोग ठूंसे जाते हैं ताकी वह कारखाने चलाए मोटर कारें बनाए। उसके पास जितने अधिक ऊर्जा दहन करने के उपाय होंगे उतना ही वह सभ्य कहलाएगा। ये ही तस्वीर है आज के सभी विश्व भर के बच्चों की है जो आगे चल कर अधिक से अधिक प्रदूषण फैलाने वाले कारक साबित होंगे और पूरी मनुष्य जाती को विनाश के कगार पर लेकर जायेंगे।

राजनेताओं, बुद्धिजीवियों का मत है कि मनुष्य के पास जितने अधिक संसाधन होंगे वह उतना ही सुखी होता जाएगा जबकि संसाधनों के जखीरों ने मनुष्य का सुख-चैन छीन लिया है। अब वह लगातार सरपट भाग रहा है। रात-दिन भाग रहा है। किसी देश में अगर एक दिन की भी देश व्यापी हड़ताल हो जाए तो बुद्धिमान तिलमिला कर फोरेन मीडिया के माध्यम से घोषणा करेंगे की आज हड़ताल की वजह से इतने हजार करोड़ का नुकसान हो गया। यानी अगर आप घर पर विश्राम करते हो या रात को सो रहे हों तो समझो इससे नुकसान हो रहा है।

अभी तीस-पैंतीस साल पहले आम आदमी के घरों में नगण्य संसाधन होते थे। अब वह इन संसाधनों के चक्कर में ऐसा पड़ा है कि अनावश्यक वस्तुओं के बिना भी नहीं रह सकता। जो वस्तुएं धनाड्य वर्ग की अय्याशियों का साधन बनी हुई थी उनका कम्पनियों ने ऐसा प्रचार किया की वे अब आम आदमी की जरूरत बन गई हैं। बल्कि हर आदमी इनका गुलाम बनता जा रहा है।

आजादी के बाद यहाँ हरियाणा में 1970 ई. तक गांवों में बिजली की सुविधा न के बराबर थी। पूरे गॉंव के पॉंच-सात बड़े जमीनदारों के घर पर ही बिजली जलती थी, बाकी लोग रात को दीये या लालटेन से रोशनी करते थे। कूलर-पंखे नहीं थे। हाथ के पंखों से ही काम चलाते थे। बिजली के आने न आने से कोई परेशानी नहीं होती थी। अब हम बिजली के पूरे गुलाम बन चुके हैं। अब दो दिन अगर बिजली नहीं आती तो हड़तालें होती हैं। बसों के सीसे तोड़े जाते हैं। ऐसा लगता है कि बिजली के अभाव में लोग पागल हो जाएंगे।

बिजली का अभाव अब सरकारों को हिला रहा है। कुछ लोगों को शायद ये लगता है कि विद्युत ऊर्जा के इस्तेमाल से प्रदूषण नहीं फैलता होगा क्योंकि विद्युत से चलने वाली मोटरों व अन्य उपकरणों में धुऑं निकलता दिखाई नहीं देता मगर सभी विद्युत से चलने वाले उपकरण व्यापक स्तर पर ऊर्जा दहन करते हैं। यह दहन परोक्ष रूप में होता है। यह ऊर्जा दहन का वह रूप है जिसमें दहन के लिए कोयला-लकड़ी अथवा तेल जैसे किसी माध्यम की आवश्यकता नहीं होती। ये सभी वायु की उपस्थिति में जलते है जबकि विद्युत जन्य उपकरणों में ऊर्जा सीधे ही जलती है। विद्युत दहन-क्रिया में वह ऊर्जा बडे़ पैमाने पर नष्ट होती है जो सभी प्राणियों के सांस लेने के काम आती है जो उनके जीवन की रक्षा करती है।

पिछले दो-तीन दशकों से सभी सरकारें बिजली का अधिक से अधिक उत्पादन कर लोगों को खुश करने की जी तोड़ कोशिशें कर रही हैं मगर विद्युत उपकरण बनाने वाली कम्पनियों ने सरकार की सभी कोशिशों को विफल कर दिया है। गॉंवों में ही पहले आटा पीसने, चावल कूटने, चारा काटने, दूध से मक्खन निकालने व अन्य कई प्रकार के कार्य हाथों द्वारा किए जाते थे मगर अब इनके लिए विद्युत मशीनें आ चुकी हैं। घरेलू कार्य में इस्तेमाल होने वाले हीटर-मोटरें बहुत अधिक बिजली की खपत करते हैं। कई बार तो ऐसा देखा जाता है कि लोग अनावश्यक रूप से बिजली खपत करते हैं।

अगर ध्यान से देखा जाए तो मनुष्य की तीन मूलभूत आवश्यकताएँ हैं। भोजन, आवास व वस्त्र। प्रथम तो मनुष्य को जीवित रहने के लिए भोजन की ही आवश्यकता होती है जिसमें खाने के लिए खाद्य पदार्थ, सांस लेने के लिए वायु व पीने के लिए पानी की आवश्यकता होती है। आवास व वस्त्रों के अभाव में व्यक्ति जीवित तो रह सकता है मगर क्योंकि आदिकाल से ही इनका मनुष्य उपयोग करता आ रहा है इसलिए ये भी आवश्यक बन गए हैं। अब इनके अतिरिक्त उपभोग की वस्तुओं के मनुष्य निरन्तर अम्बार लगाता जा रहा है जिसका अन्तहीन सिलसिला जारी है। उपभोग की जो भी वह वस्तु बनाता है सभी ऊर्जा दहन विधि द्वारा बनाई जाती हैं। जब तक कोई वस्तु किसी घर में नहीं होती उसके बिना काम चलता रहता है पर उसके आने पर वह जरूरत बन जाती है।

मनुष्य अगर निरन्तर ऊर्जा दहन कारकों का इस्तेमाल कर प्रदूषण फैलाता रहेगा तो सबसे पहले उन जीवों की श्रृंखलाएँ नष्ट होंगी जो वातावरण के अनुसार अपने शरीर में परिवर्तन करने में असफल हैं। इनमें स्वयं मनुष्य जहरीले वातावरण में अपने अस्तित्व को बचाए रखने में असमर्थ है। मनुष्य की श्रृंखला अमर नहीं है। वह अपने बारे में जो भी खुशफहमी रखता हो मगर हकीकत यह है कि उसकी श्रृंखला ऐसे ही लुप्त हो सकती है जैसे पृथ्वी से अनेक प्राणी श्रृंखलाएँ लुप्त हो चुकी हैं। उसके काल्पनिक ईष्ट देव उसको किसी भी सूरत में नहीं बचा सकते। वह उसके साथ ही नष्ट हो जाएंगे क्योंकि बचे हुए कीट-पतंगे तो उनकी पूजा वंदना करने से रहे। हां अगर मानव चाहे तो स्वयं अपने संज्ञान द्वारा ऊर्जा दहन कारकों को बन्द करके अधिक से अधिक समय तक अपनी श्रृंखला बनाए रख सकता है मगर उसे अजर-अमर हरगिज नहीं कर सकता। पृथ्वी के दहन क्रम में सभी जैव कारकों का नष्ट होना तय है। देखना तो यह है कि मनुष्य दहन कारकों द्वारा वायुमण्डल के ऊर्जा चक्र को कितने समय में तोड़ता है।

मानव श्रृंखला नष्ट होने के बाद भी लाखों वर्षों तक शेष जीवों की कुछ ऐसी प्रजतियां बनी रहेंगी जो दूषित वातावरण में अपने वजूद को ढालने की क्षमता रखती हैं, और कुछ ऐसी नई प्रजातियां उत्पन्न होंगी जिनका शरीर ऊर्जा का कम से कम उपयोग करके जीवन की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करेगा। जो जीव प्रदूषित वातावरण में खुद को डालने की क्षमता रखेगा वो ही सबसे बाद तक इस ग्रह पर अपनी प्रजाति को लुप्त होने से बचाए रखेगा।

जैव प्रक्रिया तब तक जारी रहेगी जब तक पृथ्वी में आन्तरिक ऊर्जा दहन जारी रहेगा। दहन क्रम के बंद होते ही सारा आन्तरिक तरल पदार्थ (लावा) चट्टानों के रूप में जम जाएगा। अधिक ठण्डा होने पर यह संकुचित होगा और इसमें हजारों किलोमीटर गहराई तक दरारें पड़ जाएंगी। ऐसी अवस्था में सतह पर मौजूद जल पृथ्वी के गर्भ में समा जाएगा। तत्पश्चात यह चन्द्रमा, मंगल व अन्य निर्जीव, जलविहीन पिण्डों के समान हो जायेगी मगर यह स्थिति आने में अभी लाखों वर्षों की दूरी है। मनुष्य इससे काफी समय पहले ही पृथ्वी से लुप्त हो चुका होगा।

आइये देखें उसकी प्रजाति को अधिक से अधिक समय तक बचाए रखने के क्या क्या उपाय हो सकते हैं--

।-विश्व से सभी प्रकार के इंजनों का उत्पादन बंद कर दिया जाए।

2-विद्युत उत्पादन रोक दिया जाए व सभी प्रकार की दहन क्रियाओं पर अधिक से अधिक अंकुश लगाया जाए।

3-हाथ से चलने वाले कुटीर उद्योग लगाए जाएं।

4-सैनिक साजो सामान का उत्पादन बंद किया जाए और उस डरजन्य स्थितियों का कोई हल निकाला जाए जिसमें समूह संघर्ष की आशंका से हथियार बनाने की आवश्यकता होती है।

5-भवन निर्माण कार्यों पर अंकुश लगाया जाए, ऐसी निर्माण संबंधी सामग्री पर पूर्ण प्रतिबन्ध हो जिसमें पदार्थ को दहन क्रिया में पकाया जाता है।

उपरोक्त सभी क्रियाओं को अगर रोक दिया जाता है तभी दहन क्रियाओं पर अंकुश लग सकता है। मगर किसी भी अर्थशास्त्री, राजनेता या वैज्ञानिक के लिए उपरोक्त दहन निरोधक विचार किसी पागल आदमी की कल्पना ही हो सकते हैं क्योंकि इस से दुनिया के सभी विकास कार्य रूक सकते हैं। व्यवस्था चौपट हो सकती है। मानव आदिम युग में पहॅुच सकता है। चारों ओर अव्यवस्था फैल सकती है। रक्तपात की संभावना बन सकती है। यह सब हो सकता है क्योंकि लोग आधुनिक साजो सामान के अभ्यस्त हो चुके हैं।

भारत में आम आदमी के पास अब मोबाइल फोन है। अभी आठ-दस साल पहले (2000ई तक) यह महानगरों में ही इक्का-दुक्का खास साधन सम्पन्न व्यक्तियों के पास होता था। आमजन को इसके न होने से कोई परेशानी नहीं थी। अब यह शहर गांवों में लगभग हर परिवार के पास है। परिवार क्या उसके हर सदस्य के पास मोबाईल है। पहले इसको फैशन के तौर पर रखते थे मगर अब यह जरूरत का सामान बन गया है।

धीरे-धीरे व्यक्ति मोबाइल फोन का गुलाम बनता जा रहा है। अगर कोई घर पर भूल जाए तो वह परेशान हो जाता है। पांच-सात साल बाद एकाएक सभी मोबाईल अगर बंद कर दिए जाएंगे तो अनेक व्यक्ति पागल हो जाएंगे। कुछ आत्महत्याएं भी कर सकते हैं व दंगा-फसाद भी भड़क सकता है जैसा की अब बिजली न आने से होता है।

तथाकथित विकास क्रम में आगे बढ़ता हुआ मनुष्य पीछे लोटने की कल्पना भी नहीं करना चाहता। यह विकास क्रम नहीं बल्कि इसे दहन क्रम कहा जाए तो अधिक ठीक रहेगा क्योंकि विकास के लिए प्रयुक्त होने वाला हर साधन ऊर्जा दहन से निर्मित होता व कार्य करता है। आज के संदर्भ में ऐसी कोई मशीन नहीं है जिसमें ऊर्जा दहन न होता हो। ऐसा कोई रास्ता निकालना अति आवश्यक है जिसमें विकास क्रम भी न रूके और दहन क्रिया भी कम से कम हो। क्या ऐसा संभव हो सकता है? आइये देखें--

। -ऐसी कोई युक्ति खोजना जिसमें सभी प्रकार के वाहनों को वायु से चलाया जाए मगर वायु संपीडित करने के लिए इंजन पम्प का प्रयोग न किया जाए।

2 -पानी से चलने वाले वाहन बनाए जाएं (भांप से नहीं) जिनमें ऊर्जा प्रयुक्त न हो।

4 -ऐसी किसी विधि का निर्माण करना जिसे अपना कर मनुष्य दहन रहित अवस्था में वायु मार्ग से सफर कर सके।

5 -बचपन से ही बच्चों को दहन-क्रियाओं से होने वाले विनाश के बारे में सचेत करना। उन्हें उपभोक्ता वाद के बजाए अध्यात्म वाद के पाठ पढ़ाना।

साइकिल एक ऐसा वाहन है जिसके निर्माण में ऊर्जा दहन होती है मगर उसके बाद उसके चलाने से कोई दहन नहीं होता। दस-बारह किलोमीटर के दायरे में कार्यरत कोई भी व्यक्ति इसके इस्तेमाल से अपने गन्तव्य तक आसानी से पहुंच सकता है। कार्यालयों में कार्यरत ऐसे कर्मचारी जिनको दिन-भर कुर्सी पर बैठना होता है वे अक्सर पेट की बीमारियों से परेशान रहते हैं। अगर ये लोग साइकिल का उपयोग करे तो प्रदूषण भी नहीं होगा और शरीर भी स्वस्थ रहेगा। शेष आस-पास कार्यरत सभी लोग साइकिल इस्तेमाल कर सकते हैं।

साइकिल सबसे सुलभ व सस्ता वाहन है मगर लोग इसे चलाना अपनी शान के विरूद्ध मानते हैं। साइकिल चलाने वाले को लोग पिछड़ा हुआ समझते हैं। जैसे सरकार व सामाजिक संस्थाएं भ्रूण हत्या, दहेज प्रथा, एड्स व बाल विवाह के विरूद्ध लोगों में जन-चेतना पैदा कर रही हैं। ऐसे ही ऊर्जा दहन के प्रति लोगों को सचेत करने के लिए विश्वयापी अभियान चलाने की आवश्यकता है।

अभी दैनिक ट्र्रिब्यून में समाचार लिखा है कि चीन की सरकार साइकिल सवारों को प्रोत्साहित करने के लिए अनेक कदम उठा रही है। उन्हें वहाँ बैस्ट सिटीजन समझा जाता है और वहाँ सभी पक्की सड़कों पर दोनों और साइकिल सवारों के लिए अलग से लेन बनाई जाती है। ये बहुत सुखद समाचार है।

हमारे देश में भी ऐसा ही होना चाहिये। यहाँ अनेक मुख्य मार्गों पर साइकिल से यात्रा करना जोखिम पूर्ण बना हुआ है। जब आमने-सामने के वाहन ऑवरटेक करते हैं तो साइकिल सवार को कच्चे में उतरना पड़ता है। जिससे कई बार वे दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं। वाहनों के नीचे कुचले जाते हैं। मैंने कई बार ऐसी घटनाएं देखी हैं। अत: हमारे यहाँ भी इनके लिए अलग लेन बनाई जानी चाहिए। अभी यहाँ कुछ फोर लेन सड़कों पर सफेद पट्टी लगा कर पैदल व साइकिल वालों के लिए अलग जगह छोड़ने लगे हैं जो की सरकार द्वारा उठाया गया एक सराहनीय कदम है। इसी प्रकार सब सड़कों पर जगह छोड़ी जानी चाहिये।

विश्व में इस समय वाहनों से सबसे अधिक प्रदूषण फैल रहा है। वाहनों का निर्माण तब तक बंद नहीं हो सकता जब तक मनुष्य को पक्का यकीन न हो जाए कि वह निश्चित मृत्यु की तरफ बड़ रहा है। इसका अहसास हमारी आने वाली नस्लों को तब होने लगेगा जब प्रदूषण की वजह से उनका जीवन कठिन से कठिनतर होता चला जाएगा। वैसे अब भी दमा, एलर्जी, किडनियां फैल, टी. बी. कैंसर जैसे रोगों के मरीजों से हस्पताल अटे पड़े हैं। यह सब प्रदूषित वातावरण व जहरीली दवाइयों द्वारा उपचारित अन्न सब्जियों के कारण हो रहा है।

सरकारें वाहनों के निर्माण पर अंकुश नहीं लगा सकती मगर उनमें दहन-क्रिया कम करने के उपाय जरूर कर सकती है, मगर वह इस तरफ उदासीनता बरते हुए है। सौ सी. सी मोटर बाइकों पर आराम से दो व्यक्ति यात्रा कर सकते हैं। यह ईंधन की कम खपत करती हैं। कम्पनियों द्वारा कुछ ऐसा भ्रम पैदा किया हुआ है कि जो जितना अधिक ईंधन जलाएगा वह उतना ही बड़ा आदमी समझा जाएगा। झूठे स्टेटस सिंबल के सवाल पर लोग लाखों खर्च रहे हैं।

स्टेट्स का काल्पनिक प्रचार कर वाहन निर्माता चालाकी से अधिक मुनाफा कमाने के लिए 150 से 500 सी. सी. व इससे भी अधिक सी. सी. की मोटर साइकिलें बना रहे हैं जबकि इनके ऊपर भी दो ही व्यक्ति बैठ सकते हैं। यह ईंधन की खपत अत्यधिक करती हैं। अधिक प्रदूषण फैलाती हैं। इसी प्रकार 4सीटर कारों में 800 सी. सी. कारें कम तेल खर्च करती हैं और उनमें चार व्यक्ति आराम दायक स्थिति में यात्रा करते हैं जबकि कम्पनियां 1200 से 2000 व इससे भी अधिक सी. सी. की कारें बनाती हैं और उनमें भी चार ही व्यक्ति बैठते हैं या इतने बैठाने की सरकार परमीशन देती है जबकि वे बड़ी मात्रा में ईंधन की खपत करती हैं।

अनावश्यक रूप में वाहन चलाने पर भी प्रतिबंध लगाया जाना चाहिये। अनेक लोग ऐसे हैं जो घर से पांच-सात फर्लांग पर पान-बीड़ी, नाई की दुकान पर भी जायेंगे तो बाइक या कार में ही जायेंगे। ये अत्यधिक हानिकारक स्थितियां हैं। कई साधन सम्पन्न लोग तो दिन भर बिना किसी मकसद के ही वाहन इधर-उधर घुमाते फिरते हैं। ऐसे व्यक्तियों पर रोक लगाई जानी चाहिये। कई बार निजी वाहन चालक अत्यधिक ईंधन खपत करने वाले वाहनों में बैठकर सैंकड़ों किलोमीटर की यात्रा अकेला ही करता है जबकि उसके साथ उस कार में तीन-चार व्यक्ति और भी बैठ सकते हैं। बड़ी गाडिय़ों में तो दस बारह व्यक्ति एक साथ यात्रा कर सकते हैं।

बढ़ती हुई प्रतिस्पर्धा में वाहन निर्माता अपने उत्पाद बेचने के लिए नये-नये हथकण्डे अपना रहे है। यहाँ गांवों में 1980 के दशक तक आम आदमी के लिए कार खरीदना तो एक सपने जैसा था बाइक लेने में ही उसे काफी जोड़ तोड़ लगाना पड़ता था। वह भी साधन सम्पन्न लोग ही खरीद पाते थे। गांव के बड़े जमींदार घरानों के पास भी 80 के दशक तक एक आध मोटर साइकिल या स्कूटर होती थी।

वाहन निर्माताओं ने जब देखा कि हर कोई व्यक्ति वाहन के एकमुश्त पैसे नहीं चुका पाता इसलिए उन्होंने आसान किस्तों में अपने वाहन बेचने शुरू कर दिए। इसका ऐसा असर हुआ कि हर कोई थोड़े से पैसे देकर वाहन खरीदने लगा। इन स्कीमों से कम्पनियों के भी धीरे-धीरे वारे-न्यारे हो गए क्योंकि जो बाइक तीस हजार में बिकती थी वह ब्याज लगा कर आसान किस्तों में दो साल में ही लगभग पचास हजार की बिकने लगी। तीन-चार लाख रूपये कीमत की कार के कम्पनियां आसान किस्तों में सात आठ लाख रूपये वसूलने लगी।

सरकार का दिया हुआ कर्ज लोग मार सकते हैं मगर किसी में हिम्मत नहीं की वाहन निर्माता कम्पनियों का ब्याज सहित कोई एक रूपया भी डकार जाए। जब तक किस्तें न चुकाई जाए वाहन कम्पनी के नाम पर ही रहता है। किस्त लेट होने पर ये कम्पनियां भारी जुर्माना लगाती हैं और वाहन उठाने के लिए बाहुबलियों का सहारा भी लेती हैं जो किस्त न चुकाने पर लोगों की धुनाई तो करते ही हैं साथ में वाहन छीन कर भी ले जाते हैं। इन स्कीमों से गरीब ट्रक टैक्सी वालों के घर तक बिक गए हैं मगर हमारा ये विषय नहीं है।

वाहनों पर ऋण मिलने के बाद हर किसी के पास निजी वाहन हो गया है जिससे प्रदूषण की मात्रा तेज होती जा रही है। अब नई-नई सस्ती कारें बाजार में आनी शुरू हो गई हैं। 2030 ईं. तक सड़क पर इतनी कारें नजर आयेंगी कि वाहनों का चलना कठिन हो जाएगा। प्रदूषण तो बढ़ेगा ही साथ-साथ पेट्रोल, डीजल महँगा होता चला जाएगा। शोर की समस्या और अधिक पैदा होगी। सड़कें कम पड़ जायेंगी। नई सड़कें बनानी पड़ेंगी व पुरानी को अत्यधिक चौड़ा करना पड़ेगा। जिससे वनस्पति कारक अधिक से अधिक नष्ट होते चले जायेंगे। उनके उगने में रूकावटें बनती जाएंगी।

वैज्ञानिकों द्वारा अब तक मानव हित में जितने भी कार्य किए गए हैं, जितने भी संसाधनों का निर्माण किया गया है। सभी में जहां लाभ दिखाई देता है, वहीं हानि भी बड़े स्तर पर हो रही है। सभी प्रकार के उपकरणों में दहन क्रिया तो होती ही है साथ में इनसे मानव अक्षम बन चुका है। शारीरिक तौर पर कार्य न करने की वजह से लोग आराम परस्त होकर अनेक प्रकार की बीमारियों की चपेट में आते जा रहे हैं। दूसरी हानि यह है कि मनुष्य अज्ञात मंजिल की और बड़ी तेजी से भाग रहा है। कोई काम करता भी वह दिखाई नहीं देता और किसी के पास सांस लेने के लिए एक मिनट की भी फुर्सत भी नहीं है।

मानसिक रूप से व्यथित मानव सड़क पर इतनी तेजी से वाहन दौड़ाते हैं मानों अपनी मौत से बचकर कर भाग रहे हों। चौराहे की लालबत्ती, रेलवे फाटक पर अगर दो मिनट भी रूकना पड़ जाए तो सभी बेचैन हो जाते हैं। ऐसे में वे नियम तोड़ते हैं। रेलवे बैरियर के नीचे से निकल कर भागते हैं। कई बार तो इस चक्कर में रेल के नीचे भी कट मरते हैं। तेजी के चक्कर में वाहन रेलों के नीचे आ जाते हैं जिनमें दर्जनों लोग एक साथ मरते हैं। फिर सारी भागदौड़ खत्म हो जाती है। विकास का भूत लोगों के दिमाग में ऐसा घुसा है जिसकी कोई सत्य परिभाषा नहीं है कि व्यक्ति साधन सम्पन्नता में शांति, आनन्द व सुख से रह सकता है अथवा संतोष से सुखी रहता है।

कारखानों से दहन-

वाहनों के पश्चात दूसरे नम्बर पर औद्योगिक इकाइयां भारी मात्रा में प्रदूषण फैला ही हैं। साथ में जिस भू-भाग पर ये खड़ी होती हैं उतने ही क्षेत्र से वन व खेती योग्य भूमि नष्ट हो जाती है इसलिए इनका दोहरा नुकसान है। अगर कुछ आवश्यक वस्तुओं को छोड़ दिया जाए तो इनमें अब अनावश्यक रूप में उत्पाद बन रहे हैं। अगर हम कपड़ा बनाने की गति देखें तो हर बाजार में कपड़ा ही कपड़ा दिखाई देता है। हर घर में कपड़ों के अम्बार लगे हुए हैं जबकि 80 के दशक से पहले वर्ष भर में एक दो जोड़ी कपड़ा ही हर व्यक्ति के पास होता था। अब तो कुड़े के ढेरों पर भी अगर देखो तो यहाँ वहाँ नये कपड़े बिखरे दिखाई देते हैं।

अनावश्यक रूप से उत्पादों को पैंकिग करने के लिए व उसे मल्टिकलर रूप देने के चक्कर में बडे स्तर पर ऊर्जा दहन होता है। साथ में अनेक उत्पादों की पैंकिग में प्लास्टिक का प्रयोग किया जाता है जो मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए सबसे खतरनाक जहर है। अकेले प्लास्टिक कचरे ने मानव को बहुत परेशान किया हुआ है। सरकारें रोक लगाती हैं मगर इसके बावजूद इसका धड़ल्ले से प्रयोग होता है।

देश में प्लास्टिक कचरा बहुत परेशानी कर रहा है। बहते पानी को रोक कर यह निकासी समस्या पैदा करता है। कई बार इसे पालतू पशु गाय-भैंस खा लेती हैं जिससे उनकी मृत्यु हो जाती है। खेतों में पहुंच कर यह उपजाऊ शक्ति तो कम करता ही है साथ में पौधों को उगने में रूकावट पैदा करता है। सरकार की माया भी अजीब है, वह प्लास्टिक का उपयोग रोकने के लिए जोर-शोर से प्रचार करती है। साथ-साथ प्लास्टिक उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए उन्हें सस्ती दरों पर ऋण भी देती है। अगर सरकार ऐसे प्लास्टिक उद्योग बन्द कर दे जो हानिकारक हैं तो कचरे की समस्या अपने आप हल हो जाएगी।

प्लास्टिक पैकिंग व उससे बनी वस्तुओं के फैले हुए झंजाल को अधिक समय नहीं हुआ है। बीस वर्ष पहले बाजार में प्लास्टिक की एक भी थैली नहीं थी। उस समय भी लोग राशन-सब्जी, कपड़ा व अन्य सामान खरीदते थे। लोग थैले ले जाते थे और कागज के लिफाफे बनते थे। जब से सरकार द्वारा नये-नये उद्योगों को बढ़ावा दिया गया है तभी से यह समस्या पैदा हुई है। अगर वाकई प्लास्टिक की थैलियों पर रोक लगानी है तो इसका निर्माण करने वाले सभी कारखाने बंद करने होंगे। बाजारों में छापे मारकर गरीब दुकानदारों के चालान काटने से पैसा तो वसूला जा सकता है मगर ये जहर फैलने से नहीं रोका जा सकता।

विज्ञान वरदान है ऐसा कहना सरासर गलत है। विज्ञान ने ही मनुष्य का सुख-चैन छीना है। प्लास्टिक व अन्य घातक रासायनिक पदार्थों का उत्पादन वैज्ञानिक खोजों से ही संभव हुआ है। जितना भी पर्यावरण संतुलन बिगड़ता जा रहा है इसका एकमात्र कारण साईस एवं टैक्नोलॉजी ही है। पृथ्वी के धरातल पर होने वाली अतिरिक्त प्रदूषण जन्य दहन-क्रियाओं का एक बड़ा भाग वैज्ञानिक द्वारा की गई खोजों से ही हुआ है। आज चारों ओर जो प्रदूषण फैल रहा है वह उनके कारण ही फैल रहा है। तथाकथित विकास के लिए जो भाग-दौड़ है यह सब वैज्ञानिकों की ही देन है। अंतहीन संसाधन जुटाने के लिए अगर मानव निशाचरों की तरह रात्रि में जाग कर शिफ्टों में काम करता है तो यह विज्ञान का चमत्कार नहीं बल्कि अभिशाप है। अगर मानव बन्दरों की तरह जंगलों में रहता तो अधिक खुश व आनन्द से रह सकता था। तब उसे अस्पताल बनाने की आवश्यकता नहीं थी क्योंकि बन्दर कभी बीमार होते हो दिखाई नहीं पड़ते। हां मानव आबादियों के पास रहकर उनकी जूठन खाने वाले जरूर बीमार पड़ जाते होंगे।

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