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ईबुक - चैतन्य पदार्थ - भाग 8 - नफे सिंह कादयान

( पुस्तक प्रकृति- पदार्थ विज्ञान ) 

चैतन्य पदार्थ 

नफे सिंह कादयान 

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भाग 1  || भाग 2  || भाग 3  || भाग 4 ||  भाग 5 ||  भाग 6 ||  भाग 7 ||


भाग 8

वनस्पति महत्व

पानी में अगर लकड़ी का टुकड़ा डाल दिया जाए तो वह उसकी सतह पर तैरता रहता है, डूबता नहीं है। वैज्ञानिक इसके बारे में अनेक तरीकों से समझाते हैं। वे कहते हैं लकड़ी पानी से हल्की होती है या टुकडा अपने आयतन से अधिक पानी हटाता है। मैं नहीं जानता कि वो यह तुलनात्मक अध्ययन किस चीज को आधार बना कर करते हैं, लकड़ी को या फिर पानी को? मेरे विचार से लकड़ी पानी में इसलिए नहीं डूबती क्योंकि वह पानी का उत्पाद है। यह उसका विरल रूप है। आदि से जारी सतत् दहन क्रिया के वेग अनुसार पानी में घुसने का उसका कोई औचित्य ही नहीं है क्योंकि लकड़ी पदार्थ की उत्पादित ऊर्जा है।

ऊर्जा एक बार पदार्थ में से निकल जाए तो वह दोबारा उसमें प्रवेश नहीं कर सकती। यह प्रकृति का वह आदि से जारी नियम है जिसमें ब्रह्मांड का सारा पदार्थ फैलता जा रहा है। पदार्थ में से जितनी बार भी ऊर्जा का ह्रास होगा वह विरल होता जाएगा। ऊर्जा ऐसे नष्ट हो जाएगी जैसे सूर्य की किरणें पृथ्वी पर पड़ने के बाद नष्ट हो जाती हैं अथवा उसके रास्ते में पड़ने वाले अवरोधकों द्वारा अवशोषित कर ली जाती हैं। ऊर्जा दहन क्रिया उस आदि प्रथम पदार्थ से शुरू होती है जो दहन क्रिया में परमाणुवीय पदार्थ की रचना करता है। यह पदार्थ प्रथम पदार्थ की रूपान्तरित विरल ऊर्जा है। इसमें ताप बाहर की ओर निकल गया व विघटित होता पदार्थ सूक्ष्म कणों के रूप में विरल हो गया।

किसी एक पिण्ड के ऊर्जा दहन का आशय है ऊर्जा का अपने स्रोत से बाहर की ओर यात्रा करके सतत् क्रमानुसार जलना। ऊर्जा अपने उद्गम स्रोत का विरल रूप होती है इसलिए बाहर की ओर क्रमानुसार जारी होती रहती है। ऊर्जावान पिण्ड में उच्च दहन उसकी पर्पटी पर होता है। यहाँ उसकी अधिकतर ऊर्जा एकत्र होती है। यह ऊर्जा विभिन्न प्रकार के रूप धारण कर के जलती है।

सभी प्रकार के जैव कारक जलती हुई ऊर्जा के घटक हैं। पदार्थ अपनी प्रथम अवस्था में अनजला होता है। दहन क्रिया द्वारा वह सूक्ष्म कणों का रूप धारण कर दूसरी अवस्था में आ जाता है। तीसरी अवस्था में दहन क्रिया द्वारा सूक्ष्म कण अपनी विशाल प्रतिलिपियां बना कर जैव इकाइयों (कोशिकाओं) की रचना करते हैं। जैव कारकों के बाद पदार्थ की दहन यात्रा गैसीय रूप में होती है।

किसी एक पेड़-पौधे की रचना मिट्टी व पानी से होती है। मिट्टी-पानी ऊर्जा का विरल रूप धारण कर पेड़-पौधे बनते हैं जो प्राणी जगत को उत्पादित करते हैं। अथवा भूमि का उत्पादन पेड़-पौधे है जो उससे ऊर्जा लेकर बढ़ते हैं व प्राणी पेड़ों का उत्पाद है जो उनसे ऊर्जा लेकर क्रियाशील रहते हैं। मिट्टी का ऊर्जावान विरल रूप पेड़-पौधे हैं और उनका ऊर्जावान विरल रूप प्राणी होते हैं। प्राणियों का विरल ऊर्जावान रूप उनके शरीरों पर उगे बाल होते हैं जो ऊर्जा श्रृंखला में प्राणियों का अतिरिक्त ऊर्जा विरलीय रूप हैं। बाल प्राणियों से ऊर्जा लेकर सतत् रूप में बढ़ते रहते हैं। यह वह स्वतंत्र विरल आबंधित कोशिकाएँ हैं जो जैव श्रृंखला की चौथी कड़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं।

मैं पेड़-पौधों की उत्पत्ति एवं संरचना के बारे में पहले ही बहुत कुछ लिख चुका हूँ। यहाँ केवल ये बतलाने की कोशिश कर रहा हूँ कि पेड़-पौधों का महत्व हमारे लिए कितना है। अगर पेड़-पौधे नहीं होंगे तो फिर हम भी नहीं होंगे क्योंकि सभी ऊर्जावान रचनाएँ अपने ऊर्जा स्रोतों पर आश्रित हैं। भू-पर्पटी अगर ऊर्जाविहीन हो जाए तो पेड़-पौधे तत्काल नष्ट हो जाएंगे। पेड़-पौधे सभी प्राणियों के ऊर्जा स्रोत हैं। वे अगर नष्ट होंगे तो जीव भी नहीं रहेंगे। ऐसे ही हमारे शरीर पर उगे बाल हमसे ऊर्जा लेकर जिन्दा हैं। हमारे नष्ट होते ही उनका भी अन्त हो जाता है। यह सब ऊर्जा रूपान्तरण चक्र होता है। प्रकृति के हिसाब से हम कोई अलग पदार्थीय रूप नहीं हैं बल्कि ऊर्जा गंवाते हुए पदार्थ का एक अति सूक्ष्म क्रियात्मक रूप हैं। हम जैव श्रृंखला से जुड़े हैं। कोई एक कड़ी टूटने पर हमारी प्रजाति लुप्त हो सकती है।

मानव को छोड़कर अन्य प्राणी प्राकृतिक रूप में जीवन व्यतीत करते हैं। अगर मानव का अवतरण न हुआ होता तो वह अभी करोड़ों वर्षों तक पृथ्वी पर बने रहते क्योंकि उनके पास ऊर्जा दहन करने वाले यन्त्र नहीं हैं। वे ऊर्जा केवल सांसों द्वारा ही दहन करते हैं। बुद्धिमान मानव ने अतिरिक्त दहन-क्रियाओं द्वारा अपने साथ-साथ शेष जीवों का जीवन भी खतरे में डाल दिया है। अब उसके पास केवल दो ही विकल्प हैं। प्रथम तो ये ही है कि वह अपनी बुद्धि को उसी मार्ग पर अग्रसर रखे जिस पर वह चल रहा है। अर्थात अधिक से अधिक ऊर्जा दहन करने के उपाय खोजता रहे। औद्योगिक इकाइयां लगाता रहे व साथ में उनसे होने वाले प्रदूषण के खतरे का पाठ भी पढ़ाता रहे। वाहन चलाता रहे और धुंए से होने वाली हानियों का प्रचार भी करता रहे। दूसरा यह की अपनी बुद्धि विवेक से ऊर्जा दहन में भारी कटौती कर मानव श्रृंखला को अधिक से अधिक समय तक बचाने के कुछ उपाय करे।

मानव अगर प्रचंड दहन क्रिया की निरन्तरता बनाए रखता है तो उसकी श्रृंखला शीघ्र ही लुप्त हो जाएगी। कोयला व पैट्रोलियम पदार्थों का दहन वह कर रहा है जिसका भण्डार अपने अन्तिम चरण में पहुंच चुका है। विद्युत दहन द्वारा वह वायु में से प्रत्यक्ष ऊर्जा दहन करता है जिसके भण्डार का, यानी आक्सीजन का बड़ी तेजी से अन्त हो रहा है। अभी कुछ अर्से बाद वह पानी को पेड़ों की तरह विभक्त करके बड़ी मात्रा में ऊर्जा निर्माण करना भी सीख जाएगा। इससे आगे उस ऊर्जा का कोई विकल्प नहीं है जिससे हम सांस लेते हैं, जो हमारे जीवन का आधार है।

निरन्तर ऊर्जा दहन करता जा रहा मनुष्य काल्पनिक विकास भ्रम जाल में उलझा हुआ है। जो उसे विकास होता दिखाई दे रहा है वह विनाश है। मानव पदार्थ का एक आश्चर्य जनक उत्पाद है क्योंकि पृथ्वी के धरातल पर पहले ऐसा कोई जीव नहीं हुआ जो पदार्थ को दहन-क्रिया द्वारा अनेक रूपों में ढाल कर उथल-पुथल मचा सके। उसके अतिरिक्त कोई जीव नहीं है जो ऊर्जा को आदि दहन क्रमानुसार अग्निशिखाओं के रूप में प्रचण्ड दहन क्रिया को दोबारा प्रदीप्त करने की क्षमता रखता हो। अगर मानव श्रृंखला उसकी अपनी प्रज्वलित की हुई अग्नि में भस्म होकर नष्ट हो जाती है तो दोबारा ब्रह्मांड में ऐसा कोई जीव उत्पन्न हो सकेगा इसमें सन्देह है।

निरन्तर ऊर्जा-दहन कर रहे मानव के पास दूसरा विकल्प दहन-क्रिया को रोककर अपनी श्रृंखला को अधिक से अधिक लम्बे समय तक बनाए रखने का है। इसमें तात्कालिक तौर पर परेशानी होगी मगर दीर्घकालीन समय में उसे सुखद अनुभव होगा। यह सब संभव है। इसमें एक-एक मनुष्य को भौतिकवाद से विमुख कर अध्यात्म की तरफ मोड़ना होगा। उसे बचपन से ही ऐसी शिक्षा देनी होगी जिसमें वह मन, इन्द्रियों पर काबू पा कर शांतिमय, सुखमय जीवन व्यतीत कर सके।

अगर ध्यान से देखा जाए तो पता चलता है कि साईंस एवं टैक्नोलोजी ने दुनिया भर के सभी मानवों का जीवन स्तर ऊँचा नहीं उठाया बल्कि एक होड़ को जन्म दिया है। यह होड़ मानव मुल्यों को दरकिनार करते हुए व्यक्ति को व्यक्ति से लड़ाने की है। इसने व्यक्ति के मानस पटल पर संसाधनों के जखीरे एकत्र करने का जनून पैदा कर दिया है। अधिकतर मानव विश्व के तमाम संसाधनों पर कब्जा करने का प्रयास कर रह हैं। यह सब एक मानव दूसरे मानव को कुचल कर करता है। भौतिकता वाद ने एक ऐसे आदमी को पैदा कर दिया है जो मशीन बन चुका है। जिसमें मानवता का कोई अंश बाकी नहीं रह गया है।

किसी एक जंगल में रहने वाले प्राणियों को वहाँ उत्पन्न होने वाले कन्द-मूलों पर बराबर का हक होता है। आम के पेड़ पर पके फलों पर जब अनेक तोते आकर बैठते हैं तो वे सभी मीठे आम खाते हैं न की चार-पांच पक्षी आमों को अपने कब्जे में करके बाकी पक्षियों को भूख से मरने देते है। जंगल के बुद्धिहीन प्राणियों को अपना पेट भरने के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता बल्कि सभी भरपेट बराबर भोजन करते हैं। जंगल की सम्पत्ति पर उन सभी का बराबर अधिकार होता है।

बुद्धिमान मानव शक्ति के आधार पर जीवन व्यतीत करता है। जो शक्तिशाली है उसे सभी प्रकार के संसाधनों पर कब्जा करके कमजोर लोगों को भूखा रखने का हक होता है। यह औद्योगिक क्रान्ति का चमत्कार है कि आज केवल लगभग 10 प्रतिशत लोगों ने तमाम संसाधनों पर कब्जा किया हुआ है। बाकी लोगों के बच्चे आम, अंगूर, सेब व अन्य फल-फ्रू्ट बाजार में केवल दूर से देख सकते हैं। उन्हें खाने की हैसियत उनकी नहीं है। गरीब आदमी सब्जियां देख कर खुश तो हो सकता है मगर उसे अगर नमक-रोटी भी नसीब हो जाए तो समझो वह बहुत भाग्यशाली है। यह तस्वीर केवल भारत की नहीं है बल्कि पूरे विश्व में आम आदमी का औद्योगिक इकाइयों ने जीना दुश्वार कर दिया है। ये ऐसे धन-कुबेरों को जन्म दे रही हैं जिनको मानवता से कोई मोह नहीं है। यहाँ हमारे देश में ही केवल आठ-दस घराने हर प्रकार के संसाधनों व खाद्य पदार्थों पर कब्जा करते जा रहे हैं। इनके हर शहर में बड़े-बड़े स्टोर खुलते जा रहे हैं जिनमें ये हर प्रकार के खाद्य पदार्थ बेचेंगे।

कृषि योग्य जमीन को ये प्रशासन तन्त्र के सहारे कब्जाते जा रहे हैं। अगर पूरे देश की जमीनों पर केवल पांच दस घरों का कब्जा हो जाए और उनमें मिल बैठ कर समझौता हो जाए तो वह एक हजार रूपये किलो आलू, प्याज, टमाटर, आटा, नमक बेचेंगे। क्या उन्हें ऐसा करने से कोई रोक सकता है जबकि मौजूदा सरकार के पार्टी फंड में उनका करोड़ों रूपया दिया हुआ हो। पांच-दस घरानों की यूनियन बनने के बाद आम आदमी उनका गुलाम होगा। ऐसी स्थिति में वह सुनिश्चित करेंगे की किस व्यक्ति को भोजन देना है और किसे भूखा रखना है। यह कपोल कल्पना नहीं है बल्कि अगर चन्द लोग ऐसे ही संसाधनों को कब्जाते रहे तो अगले कुछ ही दशकों में यह स्थिति आ जाएगी और उसके बाद भूख से मरता हुआ आदमी वो ही करेगा जो अनेक देशों में कर चुका है।

भूखा आदमी जब अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए संघर्ष करता है तो भारी मात्रा में रक्त-पात होता है जैसा की रूस व अन्य देशों में हुआ था। यह स्थिति आने से पहले ही अगर सरकारें सचेत होकर पूंजीवाद का उच्चतम बिन्दु तय करे तो ऐसी किसी स्थिति से बचा जा सकता है। किसी एक व्यक्ति को उस बिन्दु पर संसाधन एकत्र करने का अधिकार दिया जाए जहां गरीब आदमी को दाल-रोटी के लिए संघर्ष न करना पड़े। कोई ऐसी नीति लागू होनी चाहिए जिसमें गरीब सभी प्रकार के खाद्य पदार्थों का आनन्द ले सके। ऐसा नहीं होना चाहिए कि साधन सम्पन्न व्यक्ति के बच्चे रस मलाई खाएं और गरीबों के बच्चे उन्हें देखकर तरसते रहें।

मानव सहित सभी प्राणियों द्वारा उपभोग किए जाने वाले खाद्य पदार्थ प्रकृति की देन है। भोजन, वायु एवं पानी किसी व्यक्ति की निजी सम्पत्ति नहीं है बल्कि यह पृथ्वी की देन है। केवल शक्ति के आधार पर ही इन पर किसी व्यक्ति या राष्ट्र का कब्जा होता है, वरना तो ईश्वर किसी को जमीन, पानी, वायु नहीं बेचता। उसके लिए सभी जीव-जंतु एक समान होते हैं। वह जितना प्यार मानव से करता है उतना ही कुत्ते-बिल्लियों, चील, कौवों से भी करता है। प्रकृति किसी से भेद-भाव नहीं करती, वो ही तो ईश्वर है।

भू-पर्पटी का तीन चौथाई भाग जल में डूबा हुआ है जो सागर कहलाता है। इसमें स्थल से सैंकडों गुणा अधिक जीव जन्तु पाए जाते हैं। व्हेल जैसे प्राणी का घनत्व लगभग सौ व्यक्तियों के बराबर होता है। सागर में स्थल की तरह शाकाहारी व मांसाहारी दोनों प्रकार के जीव पाए जाते हैं। शार्क जैसी खूंखार मछलियों की उपस्थिति में भी सागर के खाद्य पदार्थों पर सभी का बराबर का हक है। अगर शार्क अपने क्षेत्र की छोटी मछलियों को पकड़ कर अस्सी रूपए किलो अन्य शार्कों को बेचने लगे तो आधी शार्कें भूख से ही मर जाएंगी।

एक मानव द्वारा भू-पर्पटी पर कब्जा करके दूसरे मानव को खाद्य पदार्थों से वंचित कर देना प्रकृति के विरूद्ध है। भोजन, वायु व पानी सभी को बराबर व नि:शुल्क मिलने चाहिए। प्राकृतिक संसाधनों की खरीद-फरोख्त पर रोक लगाई जानी चाहिए। भूमि सबकी सांझी है इस पर उगने वाली वनस्पति को खाने का अधिकार सभी का है इसलिए ऐसी कोई नीति बनाई जाए जिसमें भोजन वायु-पानी किसी को खरीदना न पड़े। गरीब हो या अमीर सभी का प्राकृतिक संसाधनों पर बराबर का हक होना चाहिये। भोजन, पानी नि:शुल्क हो उसके लिए निम्नलिखित उपाय होने चाहिएं....

।-गहूँ, चावल, मकई व गन्ना ऐसी फसलें हैं जिनसे हर रोज इस्तेमाल होने वाले अधिकतर खाद्य पदार्थ बनते हैं। सबसे पहले तो देश की जनसंख्या के हिसाब से इनका उत्पादन किया जाए। यह उत्पादन निजी भूमि कब्जाधारियों के बजाए राज्य सरकारों के अधीन होना चाहिए। जिसमें बड़े-बड़े फार्म बना कर वैज्ञानिक पद्धति से खेती की जाए।

2-भूमि पर मालिकाना हक किसी व्यक्ति का नहीं होना चाहिए बल्कि यह राष्ट्रीय सम्पत्ति होनी चाहिए। भूमि प्रबन्धन सभी राज्यों में जिला स्तर पर किया जाए। कृषि कार्य वार्ड बन्दी के आधार पर संयुक्त रूप से करवाया जाए। ग्रामीण काश्तकार शहरों को अन्न भेजेंगे व शहरी समूहों द्वारा उनके लिए कपड़ा, दवाईया एवं अन्य आवश्यक संसाधनों की पुर्ति की जाएगी।

3-अनेक सड़कों, रेलवे लाईनों के किनारों, अन्य जगहों पर बड़े-बड़े प्लाट प्रापर्टी डीलरों, सरकार व अन्य लोगों द्वारा खाली छोड़ दिए गए हैं। कई-कई वर्ष तक ये ऐसे ही पडे़ रहते हैं। ऐसी भूमि पर फसलें व फलदार पेड़ लगाए जा सकते हैं। जो इमारतें वर्षों से जर्जर होकर खाली पड़ी हैं उन्हें हटाकर वृक्ष लगाए जाए। देश का एक भी ऐसा कोना खाली नहीं होना चाहिए जहां वनस्पति उगाई जा सकती थी मगर वह ऐसे ही पड़ा हो। सड़कों व रेलवे लाईनों के किनारों पर फलदार वृक्ष लगाए जाए ताकी कोई व्यक्ति बच्चे इनके खाने से वंचित न रहें।

4-भूमि पर वनस्पति लगाने का कार्य युद्ध स्तर पर जारी होना चाहिए। यह प्राथमिकता से जारी रहना चाहिये क्योंकि खाद्य पदार्थ सबसे जरूरी हैं। बाकी आराम देने वाले संसाधन बाद में आते हैं। चारों ओर वृक्ष लगाने से सभी को शुद्ध ऊर्जा सांस लेने के लिए मिलेगी और प्रदूषण कारकों में कमी आएगी। फल सब्जियां भरपूर मात्रा में उगाई जाए तो खाद्यान्नों का संकट आने का सवाल ही पैदा नहीं होता।

आज अव्यस्था के चलते लोग भूखे-प्यासे रह रहे हैं। फसलें उगाई ही नहीं जा रही हैं। जो भूमि उपजाऊ है उस पर कारखाने लगाए जा रहे हैं। अनेक स्थान ऐसे हैं जहां सौ-सौ एकड़ भूमि लोगों ने खरीद कर छोड़ दी है और वो बंजर पड़ी हैं। आज स्थिति यह है कि हर प्रकार की खाद्य सामग्री का अभाव है। हर प्रकार की जीन्सों के दाम आसमान छू रहे हैं। अगर किसी चीज का उत्पादन ही नहीं होगा तो उसकी कमी तो होगी ही। इस संकट को तब तक नहीं रोका जा सकता जब तक व्यवस्थित तरीके से हर प्रकार की वनस्पति न उगाई जाए।

5- देश के अधिकतर भागों में लोग अव्यवस्थित रूप में बसे हुए हैं। बस्तियां व्यवस्थित ढंग से निर्मित की जाएं तो वनस्पति के लिए एक बहुत बड़ा क्षेत्र खाली हो सकता है। ऐसी बहुमंजिला इमारतें बनाई जाएं जिनमें कम से कम पचास परिवार एक साथ रह सकें जो अधिक ऊँची न होकर चार-पांच मंजिल तक ही होनी चाहिए। ऐसे आवासों के चारों ओर भरपूर हरियाली होनी चाहिए। अनेक शहरों की तंग गलियों में लोग घुटन भरे माहौल में रह रहे हैं। ऐसी जगहों पर व्यक्ति को बन्दी जीवन जीने पर मजबूर होना पड़ता है। यहाँ के बच्चों को ये तक पता नहीं होता कि गेहूँ, चावल के पौधे कैसे होते है। चना, मसूर पेड़ों पर उगते हैं या पौधों पर उन्हें कुछ मालूम ही नहीं होता।

मनुष्य वनस्पति का उत्पाद है वह उससे दूर रहे ऐसा नहीं होना चाहिए। उसके आवास चारों तरफ से अनेक प्रकार के पेड़ पौधों से आच्छादित रहने चाहिये। अगर हो सके तो वह अन्य प्राणियों की तरह स्वतंत्र रहे व कन्द-मूल खाकर आनन्द पूर्वक जीवन व्यतीत करे। भोज्य पदार्थ उसके आस-पास ही उपलब्ध होने चाहिये। अगर ऐसा हो जाता है तो इस से बड़ा उसका कोई विकास नहीं हो सकता। वैज्ञानिक शोधों द्वारा संचालित विकास विनाश का द्वार है। इसमें आनन्द नहीं बल्कि रात-दिन की भाग दौड़ हताशा व भ्रम जाल है। विज्ञान जन्य विकास में मानव को लगता है कि वह ऐसा कुछ बना रहा है जिससे उसकी समस्त परेशानियों का हल हो सकता है मगर वह मृग तृष्णा के जाल में फंसा हुआ तथाकथित संसाधनों को जुटाने में ही अपने जीवन का अन्त कर लेता है।

विज्ञान ने मनुष्य के लिए इतने साधन जुटा दिए हैं कि उन्हें हासिल करते-करते वह दम तोड़ देता है। एक साइकिल सवार को लगता है कि अगर उसके पास एक बाइक हो जाए तो वह अधिक सुखी हो सकता है। वह दिन रात मशीनों के साथ मशीन की तरह कार्य करके बाइक ले लेता है मगर कुछ ही समय पश्चात उसे लगने लगता है कि एक कार लेकर ही वह सुखी रह सकता है। फिर वह कार के लिए संघर्ष करता है।

अब जिस घर में कार हो वहाँ फ्रिज, टी.वी., वाशिंग मशीन व अन्य सभी प्रकार के संसाधन भी होने जरूरी हैं। इसके अलावा घर भी ऐसा होना चाहिये जिसमें कार खड़ी होने पर अच्छी लगे। कमरों, टॉयलेट में बडिय़ा टाइलें, संगमरमर का फर्श भी जरूरी है। यही सब जुटाते हुए तो व्यक्ति भ्रष्टाचार के दलदल में फंसता है। यह साधन व्यक्ति को सुखी नहीं करते बल्कि कभी न खत्म होने वाली एक प्यास को जन्म देते हैं। किसी भी देश में फैला भ्रष्टाचार, चोरी-डकैतियां कत्लो गारत इसी प्यास के कारण होती हैं। संसाधन एकत्र करने में व्यक्ति जायज-नाजायज सभी प्रकार के कार्य करते हुए रूग्ण अवस्था में अपनी मृत्यु की तरफ अग्रसर होता है।

किसी एक व्यक्ति के पास केवल सत्तर-अस्सी वर्ष का जीवन होता है जो किसी स्वप्र की तरह व्यतीत हो जाता है। जीवन का जो वक्त गुजर चुका होता है वह स्वप्न की तरह लगता है। भविष्य पर अन्धकार की चादर पड़ी है। वर्तमान का उजाला पलों में चलता है। जो पल गुजर गया वह भूतकाल बन जाता है। हमारे साथ वह पल चल रहा होता है जिसमें चेतना प्रज्वलित बिन्दु पर सक्रिय है। चेतना अगर सुप्त बिन्दु पर है तो फिर वर्तमान पल भी अपना नहीं होता। व्यक्ति वर्तमान चैतन्य पल में ही सुख-दुख का अनुभव करता है। अगर वह संसाधनों के भ्रम जाल में फंसा हुआ है तो इस पल में वह कभी अपने को सुखी समझता है तो कभी दुख के सागर में डूबा हुआ महसूस करता है।

जीवन का ध्यान पूर्वक अवलोकन करके सत्य पहचानने वाले व्यक्ति को सुखी होने के लिए संसाधनों की बैसाखियों की आवश्यकता नहीं पड़ती। वह अगर किसी झोंपड़ी में भी होगा तो आनन्द पुर्वक रहेगा। व्यक्ति को भोजन पानी पर्याप्त मात्रा में मिलता रहे। उसका शरीर स्वस्थ हो, इतना सब होने पर व्यक्ति आनन्द पूर्वक रह सकता है। किसी व्यक्ति का अगर शरीर स्वस्थ नहीं है तो वह आनन्द से भी नहीं रह सकता फिर चाहे वह अरब पति ही क्यों न हो।

सभी जैविक रचनाओं को एक काल अवधी के पश्चात नष्ट होना ही पड़ता है। किसी एक जीव का जीवन समाप्त होते ही वह सदा के लिए नष्ट हो जाता है। उस जैसा जीव (चेतना) न तो पृथ्वी पर पहले कभी उत्पन्न हुआ था और न ही उसके नष्ट होने के पश्चात दोबारा कभी उत्पन्न होगा। जनन क्रिया के माध्यम से जीव अपनी श्रृंखला की निरन्तरता को बनाए रखता है। उसकी पुरानी कढिय़ां टूटती रहती हैं नई बनती रहती हैं।

जीवन एक बार ही है दोबारा नहीं। इस जीवन को चाहे तो कोई व्यक्ति शांतिमय, आनंदमय बनाकर जी सकता है और उसे नर्क तुल्य भी बना सकता है। ये व्यक्ति की सोच व उसके क्रिया-कलापों पर निर्भर करता है। शांति, आनन्द बाजार से खरीदी जाने वाली वस्तु नहीं हैं। इसे केवल संतोष व ध्यान से सजग अवस्था में रहकर ही प्राप्त किया जा सकता है। बचपन से ही बच्चों को अगर विज्ञान की शिक्षा देते रहेंगे तो वह बडे़ होकर विध्वंसक बनेगें। ऊर्जा दहन के अलावा उनके पास कोई ज्ञान नहीं होगा। वह मशीनों को बना कर जीवन भर मशीन बनकर पदार्थ विघटन कार्य करते रहेंगे जैसा की अभी कर रहे हैं।

वैज्ञानिकों को लगता है कि वह बहुत बड़ा नेक कार्य कर रहे हैं। मानवता की भलाई कर रहें हैं। जबकि विज्ञान ने मानव को रसातल में पहुंचा दिया है। आज ग्लोबल वार्मिग के कारण मानव जाती के विलुप्त होने का खतरा उन्हीं के कारण है। भू-पर्पटी पर फैला हुआ गन्दा प्लास्टिक कचरा, औद्योगिक इकाइयों से निकला जहरीला धुआं व प्रदूषक पानी, परमाणुविय कचरा, वाहनों से उठने वाले धुएं के गुब्बार, यह सब वैज्ञानिकों की देन है।

ऐसा नहीं है कि वैज्ञानिक जानबूझ कर ऐसा कर रहे हैं। वे अपनी तरफ से ऐसा प्रबंध करने की कोशिश कर रहें हैं जिस से मानव अमर हो सके, उसका कभी खात्मा न हो। वह हर खोज लोगों की भलाई के लिए ही करते हैं मगर उसका जहां फायदा नजर आता है नुकसान उससे भी अधिक हो जाता है। उदाहरण के लिए सभी प्रकार के इंजिन मानवता की भलाई के लिए बनाए गए थे मगर आज जितना भी प्रदूषण फैला है उसका लगभग नब्बे प्रतिशत इन्हीं इंजिनों के कारण ही तो है।

पृथ्वी के प्रदूषण रूपी जहर से निपटने के लिए बच्चों को विज्ञान की नहीं बल्कि ज्ञान-ध्यान की शिक्षा देनी होगी। उन्हें मशीनी मानव बनाने की अपेक्षा इन्सान बनना सिखाना होगा। साधनों का कम से कम उपयोग करते हुए वह शान्ति व आनन्द से रहें ये ही उनकी शिक्षा का कुल सार होना चाहिए। बच्चों को योग की शिक्षा दी जानी चाहिए। उन्हें ऐसी विधियों का ज्ञान कराया जाना चाहिए जिसमें वह दवाइयां खाए बिना ही शरीर को अधिक से अधिक स्वस्थ रख सकें।

मनुष्य द्वारा की जाने वाली सभी प्रकार की दहन-क्रियाओं का मकसद स्वयं की सुरक्षा व अधिक से अधिक सुख प्राप्त करने से होता है। उसकी प्रगति का आशय है कि किसी ऐसे बिन्दु पर पहुँचा जाए जहां पर वह सभी प्रकार के दुखों से निजात पा कर अपने शरीर को अधिक समय तक बनाए रखे। उसका मन चाहता है कि वह सदा अजर-अमर बना रहे।

ब्रह्मांड के रहस्यों को जानने का प्रयास करने के लिए किए जाने वाले वैज्ञानिक प्रयास स्वयं को जानने की कवायद होते हैं। मानव द्वारा जैव उत्पत्ति से सबन्धित खोजों का मकसद ऐसी किसी युक्ति का जानना होता है जिससे उसे अमर बनाने का कोई सुराग मिल जाए। स्वयं को सुरक्षित करने के चक्कर में मानव अपने विनाश की और चल निकला है। यह सब अति का फल है। अति हर प्रकार से हानिकारक होती है। अगर भोजन में भी अति की जाए तो हम बीमार हो जाते हैं।

मानव द्वारा दहन-क्रियाओं में अति की जा रही है जिसका हानिकारक फल प्रदूषण रूपी जहर है जिसने मानव जीवन को लीलना शुरू कर दिया है। सांस की बीमारियों से होने वाली असमय मोतें, कैंसर, हार्ट अटैक, किडनियां फेल होकर मृत्यु होना ये सभी प्रदूषण रूपी जहर के कारण हो रहा है।

जब तक प्रदूषण फैलाने वाले स्त्रोत बन्द नहीं किए जाएंगे तब तक मानव प्रदूषण जन्य रोगों से छुटकारा नहीं पा सकता। अभी सांस व त्वचा संबन्धित रोगों की शुरूआत है जिसके भयानक परिणाम सामने आने लगे हैं। किसी हस्पताल में जाकर पता चलता है कि इन रोगों के कितने मरीज हैं। अगले कुछ ही वर्षों में दूषित वायु फेफड़ों में जाने से बड़ों के साथ बच्चे भी दमा जैसे रोगों से पीडि़त होने लगेंगे। हर व्यक्ति की त्वचा पर अनेक प्रकार के फोड़े-फिन्सियां उभरने लगेंगी जो ला इलाज होंगी। डॉक्टर एक बीमारी का इलाज खोजेंगे तब तक दूसरी बन जाएगी। दूसरी ठीक करेंगे तो तीसरी का जन्म होगा।

अगले कुछ ही दशक में मानव द्वारा निर्मित ऊर्जा दहक यन्त्रों से निकले जहर रूपी प्रदूषण के इतने भयानक परिणाम सामने आएंगे जिनकी अभी कल्पना भी नहीं की जा सकती। ऑजोन पर्त नष्ट होने से सूर्य की किरणें ऐसे ही पृथ्वी पर पहुंचेगी जैसे चन्द्रमा पर वायुमण्डल के अभाव में पहुंचती हैं। अगर ऐसा होता है तो फिर वह प्रलय आएगी जिसका वर्णन अनेक धार्मिक ग्रंथों में मिलता है।

मैंने बचपन से ही अपने बुजुर्गों के मुख से एक कहानी कई बार सुनी है। जिसे मैं कोरी गप्प मानकर अनसुनी कर देता था। मगर अब लगता है कि उस कहानी में कहीं न कहीं जीवन की वास्तविकता छुपी हुई है। बुजुर्ग बतलाते थे कि वर्तमान में जारी कलियुग के अन्तिम पड़ाव पर जब कलि का शासन होगा। (उनका कलि के शासन का आशय था कि जब कलपुर्जों अर्थात मशीनों का शासन होगा। जब मशीनें मानव के ऊपर हावी होकर उसे अपने अधीन कर लेंगी) तब धरती पर भयंकर अकाल पड़ेगा।

आकाश से आग बरसेगी जिसमें जगतवासी (पृथ्वी वासी) एक-एक दाने के लिए तरसेंगे। (अन्न के अभाव में भूखे मरेंगे) अन्न पानी न मिलने के कारण जगत की आधी आबादी खत्म हो जाएगी। फिर महाप्रलय होगी जिसमें जल आकाश से मिलेगा। उसमें पूरा जगत तबाह हो जाएगा। उसके बाद पहाड़ों में केवल पांच पुरूष, पांच स्त्रियां बचेंगी जो पवित्र आत्माएं होगी। उन्हें आकाश मार्ग से यमदूत (खुदा के फरिश्ते) स्वर्ग में श-शरीर लेकर जाएंगे जहां उन्हें उनके अच्छे कर्मों से खुश होकर ईश्वर धरती की बहन के पास भेज देगा। इस नई धरती पर उनकी आयु चार युग यानी करोड़ों वर्ष होगी। उनके करोड़ों वंशज होंगे जो वहाँ सुख पूर्वक जीवन व्यतीत करेंगे।

अब समय का मापन सैकन्ड, मिनट, घन्टों, सप्ताह, महीनों, वर्षों में होता है मगर हमारे बुजुर्ग पहले पल, गढ़ी, पहर, दिन, मास, साल व युगों में काल गणना करते थे। हिन्दुस्तान में धार्मिक ग्रन्थों में चार युग होते हैं जो सत्ययुग, त्रेता युग, द्वापर युग व कलियुग कहलाते हैं। धार्मिकों के कथनानुसार तीन युग गुजर चुके हैं और हम चौथे युग में जीवन व्यतीत कर रहें हैं जो कलियुग है। उनके अनुसार इस युग का अन्त होते ही पृथ्वी की आयु पूर्ण हो जाएगी और प्रलय के द्वारा पृथ्वी अपना स्वरूप बदल लेगी जिससे सभी प्राणियों का अन्त हो जाएगा।

अगर ध्यान से देखा जाए तो प्रकृति किसी काल गणना में बंधी हुई नहीं है। ब्रह्मांड को समय में नहीं बांधा जा सकता। वह बिन्दु ही नदारद है जहां से काल गणना शुरू की जा सके। समय बीत रहा है या शुरू हो रहा है कुछ मालूम नहीं है। पृथ्वी पर सूर्य की उपस्थिति-अनुपस्थिति में दिन-रात बनते है जबकि ब्रह्मांड में ऐसे अनेक स्थान है जहां हर समय अंधकार छाया रहता है, अर्थात रात्रि होती है और कई जगह हमेशा प्रकाश की उपस्थिति में दिन ही निकला रहता है।

पृथ्वी पर भी दिन-रात जैसे शब्द भ्रम पैदा करते हैं क्योंकि चेतना प्रकाश की उपस्थिति में देखती है। अगर वह अन्धकार की उपस्थिति में देखती व प्रकाश में कुछ दिखाई न देता तो दिन-रात ही उल्टे हो जाते। काल गणना का आशय है कि मानव चेतना बुद्धि के माध्यम से अपने शरीर की गणना करने की चैष्टा करती है।

मानव समय की गणना मृत्यु बिन्दु को आधार बना कर करता है। कितने अर्से बाद व्यक्ति की मृत्यु होगी इसी को आधार बना कर काल गणना की गई है। इसलिए तो समय को टुकड़ों में बांट दिया गया है। बुद्धि मन को सन्देश देती है कि शरीर नष्ट होने में बहुत समय है। पहले दिन-महीने गुजरेंगे फिर वर्ष बीतते जाएंगे। अनेक वर्षो बाद शरीर नष्ट होगा मगर फिर भी चिन्ता की कोई बात नहीं है। शरीर नष्ट होने के बाद तुझे नया शरीर मिल जाएगा।

मन-बुद्धि शरीर को सुरक्षित करने के चक्कर में इतनी अति कर देते हैं कि उसके नष्ट होने के पश्चात फिर से उसे हासिल करने की लालसा रखते हैं। मानव द्वारा शरीर को मृत्यु जन्य स्थितियों तक समय के अनुरूप सुरक्षित करने की कवायद काल गणना कहलाती है।

बुजुर्गों का कथन है कि जब कलियुग अपने अन्तिम चरण में पहुंचेगा उस समय कलपुर्जों का शासन हो जाएगा। अर्थात मशीनें आदमी को गुलाम बनाकर उस के ऊपर शासन करेंगी। यह बात सत्य हो चुकी है। आदमी पूरी तरह मशीनों का गुलाम बन चुका है। आज का भौतिकवादी मानव मशीनों के अभाव में जीवन व्यतीत करने की कल्पना भी नहीं कर सकता। क्या मानव ये सहन कर सकेगा अगर सभी प्रकार की औद्योगिक इकाइयां बन्द कर दी जाएं। वाहन सड़कों से हटा दिए जाए। टी. वी. मोबाईल, इन्टरनेट अगर बन्द कर दिए जाए तो क्या वह जिन्दा रह पाएगा?

विश्व के शीर्ष बुद्धिमान शायद इस गलत-फहमी का शिकार हैं कि वे मशीनें बनाकर लोगों को विकास की और ले जा रहे हैं। अगर कोई वैज्ञानिक दस ऐसे मशीनी मानव बना देता है जो अपनी रक्षा करने में शत्-प्रतिशत सक्षम हों। अर्थात मानव द्वारा बनाए गए किसी भी प्रकार के हथियार का उन पर कोई असर न होता हो। उसका एक ही रोबोटों (मशीन) किसी देश की पूरी सेना को खत्म करने में सक्षम हो। अगर उन्हें बनाने वाले उस वैज्ञानिक की मृत्यु हो जाती है तो वे मशीनें मानव के साथ क्या सलूक करेंगी जबकि उनकी संरचना के ज्ञान रखने वाले सुत्र का ही खात्मा हो जाए।

कोई वैज्ञानिक ऐसे कुछ रोबोट बना लेता है जिनमें वह अपनी बुद्धि के आधार पर ऐसी मैमोरी डाल देता है जो व्यक्ति कि तरह सोचने की शक्ति रखते हों। उनका शरीर ऐसे मैटिरयल से बना हो जिस पर सभी प्रकार के हथियार बे असर हो अथवा इन रोबोटों में ऐसी क्षमता हो कि वे मानव द्वारा उन पर दागे गए हथियारों को रास्ते में ही नष्ट करने की प्रणाली रखते हों। अगर ऐसी मशीनें बनाने वाले वैज्ञानिक की मृत्यु हो जाए या वह उन्हें बना कर भूल जाए की उनमें किस प्रकार की बुद्धि डाली गई है, अथवा वो दस्तावेज ही गुम हो जाएं जिनमें उनको निष्क्रिय करने का उपाय लिखा हो। ऐसा भी हो सकता है कि कोई वैज्ञानिक ऐसे रोबोटों में स्वयं संज्ञान लेकर कार्य करने की क्षमता डाल दे। उसे लगे कि वे मानव की भलाई के लिए कार्य करेंगे।

मनुष्य रोबोट बनाने शुरू कर चुका है। वह ऐसी मशीन बनाने के चक्कर में है जो उसकी प्रतिलिपी हों। जो उसकी तरह ही कार्य कर सकें। अभी रोबोट की प्रदर्शनियां लगती हैं। जापान व अन्य देशों के बुद्धिमान दिखाते है कि हमारे बनाए हुए रोबोट क्या-क्या कार्य कर रहे हैं। जिसके बनाए हुए रोबोट मानव की तरह अधिक से अधिक कार्य सम्पन्न कर सके उसे भारी इनाम दिया जाता हैं। धीरे-धीरे इन मशीनों में स्वयं संज्ञान लेने की क्षमता डाली जा रही है। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि भविष्य में मानव अपनी बुद्धि की तरह बुद्धिमान रोबोट तैयार कर लेगा।

मनुष्य हाड़-मॉंस का पुतला है मगर मशीनें फौलाद से बनाई जाती हैं। अगर फौलाद से मानव प्रतिलिपी बनाई जाएगी तो वह उसका मुकाबला करने में असमर्थ होगा। ऐसी मशीने मानव को गुलाम बना कर उस पर शासन करेंगी। मनुष्य धीरे-धीरे गुलामी के ऐसे ही परिपथ पर आगे बढ़ता जा रहा है। मशीनों की गुलामी अनेक रूपों में होती जा रही है। अब वह उस मुकाम पर पहुंच चुका है जहां से पीछे लोटने में उसे डर लगता है। मशीनों में उसे अपना सुनहरा भविष्य दिखाई दे रहा है जबकि कुछ काल अवधी बाद मशीनें मानव में अपना सुनहरा भविष्य तलाश करने लगेंगी।

मानव अरबों-खरबों सजीव इकाइयों का संयुक्त रूप है। चेतना उनकी गुलाम है। इन इकाइयों का जो आदि कार्य है उससे अलग हट कर वह कोई कार्य नहीं कर सकती। ये इकाइयां निर्जीव पदार्थ का उत्पाद है, अर्थात उसके नियंत्रण में हैं इसलिए दहन द्वारा पदार्थ रूपान्तरण इनका आदि कार्य है। और ये ही आदेश वह चेतना को देती हैं। वह भी दहन क्रिया से अलग हट कर कोई कार्य नहीं कर सकती। वह केवल अपने शरीर जैसी प्रतिलिपियां बना कर दहन-क्रिया करवाती है। ये ही उसका सभी प्रकार की मशीनें बनाने का आधार है। सभी प्रकार के इंजिन शरीर की प्रतिलिपी हैं। इंजिन शरीर को आधार बना कर निर्मित किए गए हैं जो दहन करते हैं।

आदि से ही रूपान्तरित होता हुआ पदार्थ अपने जैसे स्वरूप बनाता हुआ विरल अवस्था प्राप्त करता जाता है। प्रथम पदार्थ परमाणुओं के रूप में विभक्त होकर अपनी प्रतिलिपियां बनाता है। परमाणु मिलकर अणुओं की रचना करते हैं। अणुओं से जैव कोशिकाएँ बनती हैं जो अपने उत्पाद स्रोत की प्रतिलिपियां होती हैं। कोशिकाएँ सघन अवस्था धारण कर मानव ढांचा बनाती हैं जो सभी कोशिकाओं का संयुक्त रूप होता है जिसमें वह निर्जीव पदार्थ से शुरू हुई दहन श्रृंखला का कार्य आगे बढ़ाता है, अर्थात जैव श्रृंखला के माध्यम से पदार्थ विभिन्न प्रकार की ऊर्जा दहक जन्य रचनाएँ बनाता हुआ सघन अवस्था त्याग कर विरलता की और गति करता है।

इसी क्रम में मानव मशीनों के रूप में अपनी ऊर्जा दहन जन्य प्रतिलिपि बनाता है। यह उसकी बुद्धि का प्रतिफल दिखाई देता है मगर ऐसा हरगिज नहीं है। मानव ये गलत-फहमी पाले हुए है कि उसने अपनी तेज बुद्धि का प्रयोग कर मशीनों का निर्माण किया है। मशीनें बुद्धि का उत्पाद नहीं हैं बल्कि उसकी इकाइयों द्वारा बनाई गई अपनी प्रतिलिपियां हैं। अर्थात पदार्थ अपने स्वभाव अनुसार कोशिकाओं के माध्यम से बड़े स्तर पर ऊर्जा दहक रचनाओं का निर्माण करने की चेष्टा कर रहा है।

एक बहुत ही खतरनाक स्थिति की तरफ आज तक किसी भी वैज्ञानिक का ध्यान नहीं गया। कोई भी जैव-अजैव संरचना जब अपने स्रोत से ऊर्जा खींचती है तो उसे हानि अवश्य पहुंचाती है। पेड़ भूमि को ऊर्जा रूपी हानि पहुंचा कर ऊँचा होता है। पेड़ भूमि का माईनस ऊर्जा रूप है। जीव पेड़ों के उत्पाद हैं इसलिए वे वनस्पति को हानि पहुंचाते हैं। जीवों की शक्ति का ह्रास करने के लिए उनके शरीर में परजीवी बनते हैं जो अनेक आकार प्रकार के होते हैं। कई सूक्ष्म परजीवी तो इतने खतरनाक होते हैं कि अपने स्रोत जीव से ऊर्जा चुराते हुए उसको कुछ ही समय में नष्ट कर देते हैं। मानव असाध्य बीमारियों में अधिकतर ऐसे ही सूक्ष्म परजीवियों के कारण मरता है।

मानव शरीर मशीनों के रूप में अपना परजीवी उत्पादित करने की कोशिश कर रहा है जो उसे अपार हानि पहुंचा रहा है। हरेक मशीन मानव की ऊर्जा का ह्रास करती है। उदाहरण के लिए हमारे बुजुर्ग अपने निवास से कार्य करने के लिए दस-बारह किलोमीटर तक पैदल चला करते थे। जिनकी आने जाने की दूरी औसतन बीस-पच्चीस किलोमीटर होती थी। इस दूरी में वे कई बार भारी वजन उठा कर भी चलते थे। फिर साइकिल रूपी मशीन आई तो उसने उनकी पैदल चलने की क्षमता छीन ली। अब वे साइकिल पर यात्रा करने लगे चार-पांच वर्ष बाद ही उनकी पैदल चलने की शक्ति का ह्रास हो गया। इसका मतलब ये हुआ कि साइकिल रूपी मशीनों ने मानव के पांव काट कर अपने पांव लगा दिए। बाइक व कारें आई तो उन्होंने साइकिल को फैल कर मानव को और अधिक पंगु बना दिया है। अब एक कार सवार साइकिल पर बीस-पच्चीस किलोमीटर की दूरी तय करने की सोचता भी नहीं है।

मशीनें मानव का उप-उत्पाद है जो उसके शरीर पर आधारित हैं। उसके शरीर में दिल रूपी पम्प लगा है जो रक्त की आपूर्ति करता है। बुद्धि ने उसी को आधार बना कर इंजन का आविष्कार कर दिया। मस्तिष्क को आधार बना कर मानव कम्पयूटर, मोबाइल, रोबटो जैसी मशीनों का आविष्कार करता है। सभी प्रकार की मशीनों को बनाने का प्रयास इस प्रकार से है जिसमें मानव ऐसा परजीवी उत्पादित करना चाहता है जो उससे भी आगे की बुद्धि रखता हो। रोबोट बनाने का आशय है कि किसी ऐसी मशीन का आविष्कार किया जाए जो उसकी तरह ही क्रियाशील रह कर उसके सभी कार्य करने की क्षमता रखती हो। अर्थात वह स्वयं अक्रिय रहे व उसके द्वारा बनाया गया मशीन रूपी उत्पाद सक्रिय रह कर उसकी सेवा करे।

मशीनें मानव का स्थान लेकर उसे अक्रिय करती जा रही हैं। यह बुद्धिमत्ता भरा कार्य नहीं है। मशीनें दहन तन्त्र की वह स्वत्‌ आदि श्रृंखलाएँ बनाती हैं जिसमें पदार्थ ऊर्जा गंवाता हुआ निरंतर फैल रहा है। पदार्थ का ऊर्जा गंवाना मानव हित में नहीं है। पृथ्वी की दहन-क्रिया के अपने एक निश्चित बिन्दु पर पहुंचने के बाद क्रमवार सभी जैव इकाइयां नष्ट हो जाएंगी इसलिए ऊर्जा को नष्ट होने से बचाने के लिए उपाय करना ही मानव हित में है। समस्त दहन क्रियाओं को रोक कर वैज्ञानिकों द्वारा ऐसे उपाय किए जाने चाहिये जिसमें भू-पर्पटी से भी कम से कम ऊर्जा ली जाए। तभी मानव एक लम्बी अवधी तक पृथ्वी नामक इस सुंदर ग्रह पर रह सकता है।

ब्रह्मांड में मानव प्रजाति को बचाने के लिए सबसे पहले ऐसे उपाय करने होंगे जिनसे वह तब तक पृथ्वी पर बनी रहे जब तक वैज्ञानिक किसी अन्य ऊर्जावान पिण्ड की खोज न कर लें। चन्द्रमा व मंगल जैसे निष्क्रिय पिण्डों की खाक छानने से कुछ हासिल नहीं होगा। इन पर किसी भी विधि द्वारा लम्बे समय तक मानव को नहीं बसाया जा सकता। ये मृत ग्रह हैं। मानव श्रृंखला को बनाए रखने के लिए सूर्य की और किसी ऊर्जावान पिण्ड की आवश्यकता होगी अथवा ऐसा कोई पिण्ड खोजना होगा जो पृथ्वी के समकक्ष ऊर्जावान हो और किसी अन्य ऊर्जावान तारे के पास हो।

बुजुर्गों का कहना है कि जब प्रलय आएगी, कलपुर्जों का शासन होगा तो प्रचण्ड अग्निवर्षा होगी। मानव वनस्पति का उत्पाद है इसलिए उससे ऊर्जा सोखता है। अर्थात उसे निरंतर नष्ट करता रहता है। या फिर जीवित रहने के लिए अपने स्रोत से ऊर्जा हासिल कर उसे शक्तिहीन करता है। मशीनें भी मानव का उत्पाद है इसलिए वह हर वो कार्य करेंगी जिससे मानव का अस्तित्व नष्ट होता चला जाए। अग्निवर्षा का आशय है कि जब मानव अपने समकक्ष अपनी प्रतिलिपी रूपी मशीन का उत्पादन कर लेगा तो वह मानव नियन्त्रण से आजाद होकर उसे अग्नि द्वारा नष्ट करेंगी।

मानव जाति का खात्मा मशीनें अग्नि द्वारा ही करेंगी क्योंकि वह अग्निदहक यन्त्र हैं। किसी एक रोबोटो के अनियन्त्रीत होने पर वह मानव को पहला आदेश ये ही देगा की जहां-जहां ऊर्जावान पदार्थ है उसे पूर्ण रूप से जलाया जाए। वह उन सभी स्रोतों को अग्नि की भेंट करवाएगा जिनसे मानव ऊर्जा पाता है। प्राकृतिक ऊर्जादहन क्रमानुसार मानव के उप-उत्पादन का यह कर्तव्य बनता है कि वह अपने उत्पादकर्ता को नष्ट करे इसलिए वह मानव को अग्नि में भस्म करके ही नष्ट करेगा।

मानव के शेष प्राणियों से अलग हट कर किए गए सभी कार्य ऊर्जा दहन पर आधारित हैं इसलिए उसके बनाए हुए रोबट आजाद होने पर उससे हजार गुणा अधिक ऊर्जा दहन करके आनन्दित होंगे। जहां भी उन्हें पट्रोल, डीजल, कोयले के भंडार दिखाई देंगे वह उन्हें पल भर में अग्रि की भेंट कर देंगे। रेलें, मोटर गाडिय़ां व सभी प्रकार के वाहन एक साथ जलाए जाएंगे।

पृथ्वी को मानव विहीन करने के क्या-क्या उपाय हो सकते हैं ऐसा रोबटो नामक मशीनों की बुद्धि अनुसंधान करेगी। जिस प्रकार मानव पदार्थ को जला कर अनेक प्रकार की मशीन रूपी अपनी प्रतिलिपी बनाने के प्रयोग करता है मशीनें भी उसी प्रकार मानव को काट-छांट कर अपने समकक्ष अपनी प्रतिलिपी बनाने की चेष्टा कर सकती हैं।

बुजुर्गों ने कहा कि प्रलय की स्थिति में पहले भयंकर गर्मी पड़ेगी फिर जल आकाश से मिल जाएगा। मशीनों द्वारा जलाई जा रही आग से पृथ्वी का सतही वातावरण इतना गर्म हो जाएगा की पहाड़ों व उतरी, दक्षिणी ध्रुवों पर जमें हुए विशाल बर्फ के भण्डार पिघल कर जल का रूप धारण कर जाएंगे। ओजोन पर्त के नष्ट होने पर सतह पर दिन का तापमान सौ डिग्री सैंटिग्रेड से भी ऊपर पहुंच कर सागर के जल को उबालेगा जिसका परिणाम यह होगा की पानी विरल रूप धारण कर स्थल के बाकी बचे शेष एक भाग को भी डुबो देगा।

ऐसी स्थिति में पृथ्वी पर बुजुर्गों के अनुसार कुछ ही व्यक्ति बच सकते हैं। वह भी उस स्थिति में जब वह पृथ्वी पे न होकर अन्तरिक्ष में किसी अन्तरिक्ष स्टेशन पर मौजूद हों या फिर चंद्रमा जैसे उपग्रह पर कोई अनुसंधान कर रहे हों। बुजुर्गों ने कहा की कुछ स्त्री, पुरूष अपने अच्छे कर्मों के कारण जिन्दा बचेंगे जिन्हें यमदूतों द्वारा आकाश मार्ग से श-शरीर ईश्वर के पास स्वर्ग में ले जाया जाएगा जहॉं से उन्हें पृथ्वी की छोटी बहन को सौंप दिया जाएगा। इस कथन का आशय ये हुआ की एक काल अवधी के बाद जब प्रलय जैसी स्थितियां आएंगी तो वैज्ञानिक पृथ्वी जैसे किसी ग्रह को खोज कर चुके होंगे और वह उस पर कुछ स्त्री, पुरूषों को ले जाने में कामयाब भी हो जाएंगे। जहॉं पर वह नये सिरे से जैवचक्र को आरम्भ करेंगे।

यह कहानी झूठ है या सत्य है ये तो आने वाला समय बताएगा मगर ये सत्य है कि आदमी मशीनों का गुलाम बनता जा रहा है। धीरे-धीरे वह उस पर कब्जा करती जा रही हैं। मशीनों ने मनुष्य को पंगु बना दिया है और अगर मानव द्वारा निर्मित रोबट स्वयं संज्ञान ले कर उससे विद्रोह कर दे तो स्थितियां अत्यन्त जटिल हो सकती हैं। ऐसी किसी स्थिति से मानव निपट सकता है या नहीं इसमें सन्देह हैं।

पर्यावरण की सुरक्षा कैसे की जा सकती है? प्रदूषण फैलाने वाले कौन-कौन से कारक हैं? मानव पर प्रदूषण का क्या असर हो रहा है? वातावरण प्रदूषित हो कौन- कौन सी बीमारियां फैल रही हैं? कानून में प्रदूषण फैलाने वाले व्यक्ति को दण्डित करने के लिए क्या-क्या प्रावधान किए गए हैं? यह सब बतलाने के लिए लगभग दर्जन भर बुद्धि जीवियों द्वारा स्कूली छात्रों को शिक्षा देने के लिए 'पर्यावरण शिक्षा, नामक पुस्तक लिखी गई है। पुस्तक 250 पृष्ठ की है और इसमें बहुत ही सूक्ष्म ढंग से समझाया गया है कि प्रदूषण से बचने के क्या-क्या उपाय हो सकते हैं?

पुस्तक बहुत ही अच्छे ढंग से लिखी गई है मगर इसमें भी वो ही खामी है जो शक्तितंत्र (सरकार) में है। शक्तितंत्र में लोगों को निर्देश दिए जाते हैं कि शराब मत पीयो, शराब पीना सेहत के लिए हानिकारक है। प्लास्टिक थैलियों का प्रयोग न करें क्योंकि इनसे जल गमन अवरुद्ध होता है, कचरा फैलता है। वाहनों में से कम से कम मात्रा में धुआं निकालो इससे वायु प्रदूषण फैलता है। ऐसी और भी अनेक हिदायतें हैं जो जनता को दी जाती हैं। जनता के पास शक्तितन्त्र का अभाव है। वह जनशक्ति प्रदर्शन उस समय करती है जब पानी सिर के ऊपर से होकर गुजरने लगता है।

प्रदूषण फैल रहा है। वाहन धुंआ उगल रहे हैं। जनता बीमार रहे या स्वस्थ, सरकार को कुछ लेना देना नहीं है। इसके लिए वह निर्देश दे देती है, लोग न माने तो क्या हो सकता है। सरकार टैक्स लगाने में माहिर है। उसने प्रदूषण से भी पैसा बनाने की जबरदस्त स्कीम निकाली है। इसमें जो व्यक्ति अपने वाहनों से जितना धुआं निकालता है उसे उसके हिसाब से ही प्रदूषण पर्ची बनवानी पड़ती है अन्यथा प्रशासन हजारों रूपये जुर्माना ठोक देता है।

जनता को निर्देश दिए गए है कि वह प्रदूषण मापकों के अनुसार धुआं निकाल सकती है। ये अलग बात है कि उन्हें यह नहीं बतलाया जाता की ये वाहन धुआं मापन प्रतिशत कौन से बिन्दु से शुरू किए गए है। वो कौनसा आधार है जिससे तय हो की इतने से कम प्रतिशत धुआं निकालने से प्रदूषण नहीं फैलेगा।

एक ट्रक दस मोटर साइकिलों से भी अधिक धुआं वातावरण में फैलाता है। छोटे-छोटे सड़कों पर चलने वाले थ्री व्हीलर अपने पीछे धूएं का गुबार छोड़ते हुए चलते हैं। प्रदूषण पर्चियां लागू कर पैसा जरूर एकत्र किया जा सकता है मगर इससे प्रदूषण फैलने से नहीं रोका जा सकता है।  यह तभी बन्द होगा जब वाहन बनाने वाले उद्योगों को ही बन्द कर दिया जायेगा या धुंआ रहित वाहन बनाए जाएंगे। प्लास्टिक थैलियों का इस्तेमाल अपने आप बन्द हो जायेगा अगर प्लास्टिक बनाने वाले उद्योग बन्द करा दिए जाएं।

अभी पांच-सात वर्ष पहले वाहनों के कन्डम टायर यहाँ-वहाँ डेरों के रूप में पड़े हुए दिखाई देते थे। मगर अब कहीं नहीं दिखाई देते। कबाड़ी वाले उन्हें वाहनों के टायरों में पन्चर लगाने का कार्य करने वाले लोगों से दो-तीन रूपये किलो के हिसाब से खरीद कर ईंट बनाने वाले भटठों, गुड़, सिमेंट बनाने वाले व शैलर मालिकों के पास बेच देते हैं जहां उन्हें सस्ता ईंधन उपलब्ध हो जाता है। ये लोग इन्हें अपने उत्पाद को पकाने के लिए भट्ठियों में जलाते हैं। यहाँ पर रबड़ जलने से विशाल मात्रा में जहर आसमान में फैल जाता है। टायर जलाने से कितना प्रदूषण फैलता है इसका मापन करना कठिन है। एक टायर में अगर आग लगा दी जाए तो वह सैंकड़ों ट्रकों के बराबर धुआं उगलने लगता है।

सरकार में बैठे व्यापारी हों या फैक्टरियों के व्यापारी सभी अपना तत्कालिक लाभ देख रहे हैं। आने वाली नस्लों को फैलते हुए प्रदूषण रूपी जहर से कितनी हानि होगी किसी को इसकी परवाह नहीं है। बच्चों को पर्यावरण की शिक्षा देना आसान है। प्रदूषण फैलाने वाले कारकों की गिनती कराना आसान है। किसी भी समस्या के बारे में भाषण देने में मजा आता है मगर जब समाधान करने की बारी आती है तो मुश्किल हो जाती है। इसमें ऐसा कुछ खोना पड़ता है जिसे मानव किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहता।

वाहन बनाना बन्द करोगे तो देश पीछे चला जाएगा। कारखाने बन्द करोगे तो लोग वापिस आदिम युग में पहुँच जाएंगे। पीछे हटने में बहुत समस्या है, आगे निश्चित मृत्यु है। व्यक्ति वैसे भी मृत्यु ही की तरफ कदम बढ़ाता रहता है अत: आगे कोई कोई समस्या नहीं है।

निरन्तर ऊर्जा दहन करता हुआ मनुष्य निश्चित मृत्यु की और अग्रसर है। यह मृत्यु किसी व्यक्ति विशेष की नहीं है बल्कि मानव श्रृंखला की है। एक अर्से बाद व्यक्ति को तो मरना ही होता है। सिगरेट पीने वाले व्यक्ति को कितने ही तर्क दे कर समझाओ की सिगरेट उसे बिमार कर देगी मगर वह उसे नहीं छोड़ेगा। सिगरेट से होने वाली हानियों से व्यक्ति को सजग करने के लिए बड़े-बड़े ग्रन्थों की रचना करके उन्हें शिक्षित किया जाए तब भी लोग सिगरेट पीते ही रहेंगे मगर किसी व्यक्ति को अचानक डाक्टर सुचित करे की उसे सिगरेट पीने से टी. बी., केंसर हो गया है तो वह फौरन उसका त्याग कर देगा। मगर ये कोई बुद्धिमत्ता पूर्ण निर्णय नहीं होता। इसमें जो हानि होनी थी हो चुकी होती है। अब उस व्यक्ति को मरना ही है वह चाहे सिगरेट पीता रहे या छोड़ दे कोई फर्क नहीं पड़ता। अगर यह कदम वह पहले ही उठा लेता तो निश्चित मृत्यु की काल अवधी को अन्य व्यक्तियों के समकक्ष कर सकता था।

कुछ साधन सम्पन्न व्यक्ति जो प्रदूषण कारकों को खड़ा कर अय्याशियां कर रहे हैं उनको शायद यह वहम हो कि वह वातावरण में निरन्तर फैलते जा रहे जहर रूपी प्रदूषण से खुद को दौलत की मदद से बचा लेंगे मगर ऐसा हरगिज नहीं है। इससे होने वाली क्षति का सामना अमीर-गरीब सभी को करना होगा। मेहनत मजदूरी करने वाले श्रमिकों ने अपने शरीर को गर्मी-सर्दी के अनुकूल बना लिया है। उनके फेफडे़ काफी हद तक प्रदूषण सहने की क्षमता हासिल कर चुके हैं क्योंकि वे प्रदूषक कारकों की उपस्थिति में दिन-रात कार्य करते रहते हैं। अत: वे बाद में मरेंगे, एयर कंडीशनरों की कृत्रिम ठण्डक में आराम करने वाले साधन-सम्पन्न वर्ग की मृत्यु मजदूरों से बहुत पहले होगी।

मानव अपनी दिनचर्या में अधिकतर अर्ध-सुप्त चेतन अवस्था में अनियंत्रित रूप से विचारमग्न रहता है। जहां उसे तात्कालिक लाभ दिखाई देता है वहाँ वह कुछ सजग होता है। सामूहिक हितों के मामलों में वह बिल्कुल ही उदासीन अवस्था में रहता है। प्रदूषण फैलाने का कार्य लोग व्यक्तिगत रूप में करते हैं मगर जिम्मेदारी समाज पर डाल देते हैं। समाज अनियंत्रित भीड़ का नाम है जो अच्छे कार्य की और बहुत ही कम अग्रसर होती है मगर विध्वंसक गतिविधियों की तरफ तेजी से बढ़ती है।

मानव प्रवृत्ति तोड़ने में है इसलिए वह ऐसे बहाने तलाशता रहता है। तोड़-फोड़ की तरफ समाज को आसानी से ले जाया जा सकता है। मगर जब समाज को कोई अच्छे कार्य के लिए उत्प्रेरित करता है तो वह व्यक्ति में तब्दील हो जाता है। ऐसे कार्य में एक-एक व्यक्ति अपना निजी हित देखने लगता है, अर्थात अगर लोगों को अनेक तर्क देकर नि:शुल्क पेड़-पौधे लगाने की अपील की जाए तो सैंकडों में से इक्का-दुक्का ही तैयार होंगे। अगर कोई तर्क देकर लोगों से कहे की दंगा करो, हड़ताल करो, लोगों के घर जलाओ, सरकारी सम्पत्ति को आग लगाओ तो ऐसे कुकृत्यों के लिए हजारों व्यक्तियों की भीड़ जमा हो जाती है। ऐसे कार्यों में व्यक्ति पूरे जोश व मजे में होता है।

मानव प्रवृत्ति ऐसी है कि वह निर्माण कार्यों में उब जाती है, तोड़ने में उसे मजा आता है। यह व्यक्ति के बस की बात नहीं है। सतत् एकसारीय रूप में परवर्तित होता हुआ पदार्थ निरन्तर टूटता रहता है। मानव कोशिकाएँ भी विभक्त होती रहती हैं अत: उसका स्वभाव तोड़ने में बन गया है।

किसी एक उत्कृष्ट प्रजाति की प्राणी श्रृंखला बनने में लाखों, करोंड़ो वर्ष लगते हैं मगर जब उसकी श्रृंखला लुप्त होती है तो विपरीत परिस्थितियों में हप्तों, महीनों में ही हो जाती है। मानव पृथ्वी का एक अनूठा प्राणी है जिसने अपनी श्रृंखला की लाखों वर्षों से निरन्तरता बनाई हुई है। उसके शरीर की संरचना एवं बुद्धि को वर्तमान रूप तक पहुंचने में एक बहुत लम्बी काल अवधी लगी है। कभी वह भी धरती पर रेंगने वाला एक छोटा सा कीट पतंगा था।

किसी भी जैव श्रृंखला का प्राणी अपना सफर केवल एक इकाई (कोशिका) से शुरू करता है जो अनुकूल परिस्थितियों में अपना विकास करती है। विकास का आशय जीवों द्वारा अपनाई गई उस युक्ति से होता है जिसमें वह अपने शरीर को अधिक से अधिक समय तक बचाए रखने का प्रयास करते हैं। इकाइयों द्वारा संयुक्त रूप धारण करके एक ढांचा (शरीर) बना कर उसमें रहना विकास के अन्तर्गत आता है।

जैव इकाइयों द्वारा अनेक प्रकार के ढांचों का निर्माण पर्यावरणीय बाधाओं के अनुरूप किया जाता है। विकास के आदि चरण में अरबों-खरबों इकाइयों में से उत्कृष्टता के आधार पर जैव श्रृंखला की अगली कड़ी बनती है। पदार्थीय हलचलों में इकाइयों का लगभग नब्बे प्रतिशत भाग नष्ट हो जाता है। वे केवल दस प्रतिशत ही तत्कालिक खतरों का मुकाबला करने की क्षमता हासिल कर पाती हैं। अनुकूल परिस्थितियों में इकाइयां अपना विकास करने की चेष्टा करती हैं मगर विपरीत आवेग उन्हें बाधित करते रहते हैं। यह आवेग तूफान, वर्षा, भूकम्प, जैसे अनेक रूपों में हो सकता है। एक इकाई का दूसरी को नष्ट कर देना भी विपरीत आवेग की श्रेणी में आता है। इन आवेगों से बचाव करने की क्षमता पैदा होने पर ही कोई एक इकाई अगले चरण में प्रवेश करती है।

आवेगों से बचाव करने के लिए इकाइयां संयुक्त रूप धारण कर ढांचे में रहने की क्षमता हासिल करती हैं। आवेगों से बचाव करता हुआ ढांचा विभिन्न रूप धारण करता है। किसी निश्चित आवेग के आने पर अनेक शरीर नष्ट हो जाते हैं। ऐसे कुछ बच जाते हैं जो आवेग में अपने शरीर को प्रतिकूल बना लेते हैं। किसी एक ही प्रकार के आवेग में से गुजर कर जीव अगर बच जाता है तो उसी आवेग के दोबारा आने पर वह उससे निपटने का प्रबन्ध कर लेता है। बार-बार आवेगों से निपटने की शक्ति ही जीव के शरीर को विशेष रूप देती है। शक्ति हासिल करने के बाद आवेग जीव को कोई क्षति नहीं पहुंचा सकता, इसे ही हम जैव विकास कह सकते हैं।

अलग-अलग प्रकार के आवेगों से जैविक ढांचों में अनेक प्रकार की शक्तियां पैदा हो जाती हैं। प्राणी का दृष्टि तंत्र, श्रवण तंत्र, टांगे, बाजू, पाचन तंत्र, जनन तंत्र, चतुराई व अन्य शक्तियां आवेगों का प्रतिफल हैं। वनस्पतियों में लम्बे तने, कॉटे उगना, क्षतिग्रस्त अंगों का दोबारा बढऩा व अन्य अनेक शक्ति कारक आवेगों के प्रतिफल होते हैं। आवेग आने पर जीवों की शक्ति का ह्रास होता है मगर वह उसके गुजरने पर अतिरिक्त शक्ति हासिल कर लेते हैं। दोबारा वैसा ही आवेग आने पर अतिरिक्त शक्ति ही उसका सामना करती है। निरन्तर एक ही प्रकार के आवेग अतिरिक्त शक्ति को स्थाई शक्ति में बदल देते हैं।

जीवन की प्रथम रचनाएँ इतनी सूक्ष्म होती हैं की वो सूक्ष्मदर्शी की भी पकड़ में बमुश्किल आ पाती हैं। अनेक रचनाएँ मिलकर ही बड़े ढांचे बनाती हैं। मानव सहित सभी बड़े ढांचे आवेगों का ही प्रतिफल हैं। उनके जितने भी कार्य करने वाले अंग हैं सभी आवेगों से गुजरने के बाद बने हैं।

उदाहरण के लिए किसी एक पौधे विशेष पर पलने वाले कीड़े पौधे के नष्ट होने पर आवेग की चपेट में आ जाते हैं। भूख में यह दूसरे पौधे से भोजन लेने की कोशिश करते हैं मगर यह पौधा उनके अनुकूल न होने की वजह उनमें से अधिकतर नष्ट हो जाते हैं, कुछ शक्तिहीन हो जाते हैं मगर जीवित रहते हैं।

आवेग में किसी विशेष पौधे पर पलने वाले कीड़े अन्य पौधे से शक्ति लेकर नष्ट हो जाते हैं। उनमें से दो-चार कीडे़ निर्बल तो होते हैं मगर प्रथम आवेग को सहन कर जीवित बच जाते हैं। बचे हुए कीड़े फिर उसी पौधे की शक्ति को अपना कर अतिरिक्त शक्ति पैदा कर लेते हैं। इस प्रकार आवेग से इन में दोनों प्रकार के पौधों के पत्तों को खाने की शक्ति आ जाती है। अब इनकी आने वाली सन्तानें भी दोनों प्रकार के पौधों को खाकर शक्ति हासिल करती हैं। आवेग द्वारा उनमें ऐसा स्थाई पाचन अंग बन जाता है जो दो प्रकार के पौधों को पचाने की शक्ति रखता है।

किसी एक पौधे पर रहने वाले कीड़े उसके पत्ते खाकर आनन्द पूर्वक जीवन व्यतीत करते हुए अपनी वंश वृद्धि करते जाते हैं। स्थानीय आवेगों में वह एक पत्ते से दूसरे पत्ते पर जाने की शक्ति हासिल करते हैं। कुछ अर्से बाद पौधे की टहनियों पर दक्षता से सरकने की शक्ति उनमें आ जाती है। पौधे के नष्ट होने पर उनके लिए प्रलय आ जाती है।

प्रथम आवेग में वह भूमि पर आ गिरते हैं। वे केवल पौधे की टहनियों पर ही जीवन भर चले थे। उनके पूर्वजों ने पौधे पर ही अपना सारा जीवन व्यतीत किया था। भूमि के बारे में वे अन्जान थे। मगर अब वे भूमि पर पड़े हैं। प्रथम आवेग की मृत्युजन्य परिस्थितियों से बचने के लिए वे भूमि पर सरक कर इधर-उधर चलने लगते हैं। पेड़ की वह टहनियां बहुत कोमल थी जिन पर वे सरका करते थे मगर भूमि उनके पेट को किसी रेगमार की तरह चीर रही है, वे घायल हो रहे हैं, मर रहे हैं।

मृत्युजन्य स्थितियों से बचे हुए कुछ भाग्यशाली कीडे़ पास के अन्य दूसरी प्रजाति के पौधे पर पहुंच गए। यहाँ आकर उन्होंने कुछ चैन की सांस ली। अब वे भूख से बेहाल थे, उन्होंने पौधे से पत्ते खाने शुरू किए मगर वे बे स्वाद, कड़वे लग रहे थे। कीड़ों का पाचन तंत्र उनके अनुकूल नहीं था। अत: यह उनके लिए दूसरा अनिष्टकारी आवेग था।

नये पौधे के पत्ते खाकर अनेक कीड़े मौत का ग्रास बन गए। कुछ क्षीण काय होकर पत्तों से चिपके रहे। इनमें इस नए पौधे के पत्तों को पचाने का गुण नहीं था मगर जैसे-तैसे वे इसको खाकर जीवित रहने लगे। अब वे उसी पेड़ से ऊर्जा पाने लगे। कुछ समय बाद ही दुर्बल कीड़ों को इसी पेड़ के पत्ते स्वादिष्ट लगने लगे। उनके जो बच्चे हुए वे दोनों प्रकार के पौधे से शक्ति लेने लगे। अब उन्हें कोई परेशानी नहीं थी उनमें तीन अतिरिक्त शक्तियां पैदा हो चुकी थी।

अब वे दोनों प्रकार के पौधों को खाकर ऊर्जा ग्रहण कर सकते थे व भूमि पर भी सरक सकते थे। वह एक पौधा नष्ट होता तो दूसरे पर चले जाते। पौधे के नष्ट होने पर अब प्रलय नहीं आती बल्कि वे आन्नदपूर्वक भूमि पर चलकर दूसरे पौधे पर पहुंच जाते।

अनुकूल वातावरण में दोबारा उन्हीं कीड़ों की आबादी बढऩी शुरू हुई। अब वे लाखों-करोड़ों बन चुके थे। एक बार उस इलाके में बाड़ आ गई जिससे चारों तरफ जल ही जल दिखाई देने लगा। पौधे पानी में डूब गए। वहाँ पानी के ऊपर सूखे पत्ते व टहनियां तैरने लगे। कीड़ों के लिए यह अलग प्रकार का विनाशकारी आवेग था। दूसरी बार फिर महाप्रलय की स्थिति पैदा हो गई । लाखों कीडे़ तत्काल डूब कर मर गए। कुछ बचे हुए ऊपर तैर रही सुखी टहनियों पर चिपक गए।

एक बार फिर बचे-हुए कीड़े शक्तिहीन हो गए । पानी में लहरे पैदा होती तो अनेक कीड़ों से टहनियों की पकड़ छूट जाती। वे दोबारा तैरने की कोशिश करते हुए दूसरी टहनी की और चलते। इससे कुछ मर जाते, कुछ पहुंच कर दूसरी किसी टहनी को पकड़ लेते। दो-तीन दिन बाद ही पानी सुख चुका था। आवेग गुजर चुका गया। पानी से मुरझाए पौधे फिर पनपने लगे, साथ में कीडे़ भी वंश वृद्धि करने लगे। अगले बरस फिर बरसाती आवेग आया मगर अब की बार मरने वाले कीड़ों की संख्या प्रथम आवेग की तुलना में कम थी। पानी भरने पर अब वे एक टहनी से दूसरी की ओर आसानी से तैर लेते थे। बरसाती मौसम में यह आवेग हर वर्ष आने लगा और कीडे़ अपने स्वरूप को पानी के अनुसार डालने लगे। वे उसमें कुशलता से तैरने लगे। अब वे पानी के अन्दर भी कुछ समय रह लेते थे।

विकट परिस्थितियों में से गुजर कर ही सभी जीवों में आवेगों से गुजरने की शक्ति पैदा होती है। बार-बार आने वाले एकसारीय आवेगों से गुजर कर वह अतिरिक्त स्थाई शक्तियां प्राप्त करते हैं। आवेगों में निर्बल जीव नष्ट हो जाते हैं। कुछ एक उत्तम जीव शक्ति हासिल कर अगले चरण में प्रवेश कर जाते हैं। आवेगों में ही श्रृंखला विभाजन बिन्दु पैदा होता है। उदाहरणत: बाढ़ जैसी स्थितियों से जूझते हुए कीड़ों में श्रृंखला विभाजन बिन्दु इस प्रकार से बना की कुछ कीड़े पानी के ऊपर तैरने में दक्ष हो गए। कुछ पानी के अन्दर भी जीवित रहने लगे। कुछ एक ऐसे भी बन गए जो जल-स्थल दोनों पर रहने में दक्ष हो गए।

जीवों में श्रृंखला विभाजन एकसारीय आवेगों में जीवन के लिए संघर्ष करते, अपने वजूद को वातावरण के प्रति अनुकूल करते समय होता है। आवेग की चपेट में आए हुए किसी जीव के शरीर की इकाइयां उसके प्रति अपने ढांचे को बचाने का उपाय करने लगती हैं। यद्यपि इसमें जीव की शक्ति का बड़े स्तर पर ह्रास होता है तथापि इकाइयां ढांचे में संयुक्त रूप धारण कर आवेग अनुरूप एक नए अंग का निर्माण करने लगती हैं। यह आवेग से निपटने की अतिरिक्त शक्ति का रूप होता है। जीवों में अतिरिक्त शक्ति किसी एक आवेग से नहीं आ पाती बल्कि किसी निश्चित अवधी के बाद बार-बार आने वाले आवेगों से निपटने के लिए वह प्रतिरोधक क्षमता हासिल करते हैं।

प्रकृति द्वारा सर्वश्रेष्ठ का चुनाव किया जाता है। शक्तिशाली ही आवेगों में जीवित रह पाते हैं, शेष नष्ट हो जाते हैं। श्रृंखला विभाजन के बाद जीव श्रेष्ठता के आधार पर वातावरण के अनुकूल गुण बना लेते हैं। सरीसृप वर्ग में भारी-भरकम मगरमच्छ पानी में रहने के अनुकूल हैं मगर वह दीवार पर छिपकली की तरह चढऩे में दक्ष नहीं हैं जबकि वह श्रृंखला की एक ही आदि कड़ी के दो जुदा रूप हैं। श्रेष्ठता का आशय आकार-प्रकार से नहीं है, बल्कि उस शक्ति से है, जिसमें वह अनिष्टकारी आवेगों का सामना करते हुए अपने शरीर को अधिक से अधिक समय तक बचाए रखते हैं और किसी विशेष क्षेत्र में रहने के लिए अपने शरीर को अनुकूल बना लेते हैं।

मानव आज जिस मुकाम पर खड़ा है वहाँ तक पहुंचने में उसे लाखों वर्ष लगे हैं। कीट-पतंगों की लाखों, करोड़ों नस्लें भू-पर्पटी पर निवास करती हैं मगर उत्कृष्ट प्राणियों की नस्लें गिनी जा सकती हैं। आदि से अब तक मानव द्वारा कितने बडे़-बड़े आवेगों का मुकाबला करके अपनी प्रजाति की श्रृंखला को बचाए रखा होगा इसका कोई भी व्यक्ति स्पष्ट आकलन नहीं कर सकता। उसका जीवन भी अन्य जीवों की तरह एक कोशीय जीव से शुरू हुआ जो श्रेष्ठता के आधार पर क्रमवार निरन्तर जारी रहा।

बहुत से साधारण कीटों में इतनी चतुराई भी नहीं होती कि वह असुरक्षित स्थान को त्याग कर सुरक्षित की और प्रस्थान करने की चेष्टा करें। वह लौ को छूने की कोशिश में भस्म हो जाते हैं। उत्कृष्ट नस्लें अनेक प्रकार के खतरों को पहले ही भांप लेती हैं। अनेक प्राणियों को इस असाधारण क्षमता को हासिल करने में एक लम्बी काल अवधी लगी है। कुछ नस्लों ने अपने बचाव के लिए शरीर में अनेक गुण पैदा कर लिए है। शरीर के आन्तरिक जटिल अंगतंत्र एवं बाहरी अंग निरन्तर आने वाले आवेगों के प्रतिरोध स्वरूप बने हैं।

मानव एक बुद्धिमान प्राणी है जिसमें पदार्थ अवलोकन करने की अद्भुत क्षमता है। पदार्थ को प्रचण्ड अग्निशिखाओं के साथ जलाने में वह महारत हासिल कर चुका है। आदि में जब ग्रह-नक्षत्रों का जन्म हुआ तो बड़े पिण्डों में भयंकर विस्फोट पैदा हुए। इन विस्फोटों से पदार्थ उनकी कक्षा से बाहर उछल जाता था, जिससे वह उपग्रहों के रूप में उनके चारों ओर चक्कर काटने लगता। मानव भी ऊर्जा दहन के क्षेत्र में ऐसी क्षमता हासिल कर चुका है जिसमें वह पृथ्वी का सुरक्षा चक्र भेद कर पदार्थ को विस्फोट द्वारा अंतरिक्ष में उछाल सकता है। अगर वह अपनी श्रृंखला को लम्बे अर्से तक बचाने में कामयाब होता है तो ब्रह्मांड का शासक बन सकता है। जब भी उसकी श्रृंखला नष्ट होगी केवल उसकी अपनी मूर्खताओं के ही कारण होगी अन्यथा वह आबादी नियन्त्रण करके व ऊर्जा दहन कारकों को नियन्त्रित कर एक लम्बी काल अवधी तक पृथ्वी पर बना रह सकता है।

पृथ्वी पर से मानव आबादी को नियंत्रित करके भी ऊर्जा बचाई जा सकती है। इस समय हर देश बढ़ती जा रही जनसंख्या के कारण परेशान है। जनसंख्या के कारण ही ऊर्जा स्रोतों का बडे़ स्तर पर ह्रास हो रहा है। बिजली पानी व अन्य संसाधनों की कमी अधिक जनसंख्या के कारण ही हुई है। अगर जनसंख्या पर नियन्त्रण हो जाता है तो बहुत सी समस्याओं से बचा जा सकता है। सभी देशों की सरकारें प्रयासरत हैं मगर यह कार्य जन-चेतना द्वारा ही पूरा किया जा सकता है। जनसंख्या के मामले में मानव अन्य जीवों की अपेक्षा बेहतर ढंग से निपट सकता है। अन्य जीवों की जनसंख्या को प्रकृति समेटती है मगर मानव स्वयं संज्ञान ले कर उसे नियंत्रित कर सकता है।

शेष फिर कभी....

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नफे सिंह कादयान, गांव- गगनपुर जिला-

अम्बाला, पो.ओ.-बरारा-133201,

[समाप्त]

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