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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 39 // अपाहिज // विनोद कुमार दवे

 

प्रविष्टि क्रमांक - 39

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             विनोद कुमार दवे

• अपाहिज

“तेरे बाप के पास इतनी जमीन है। बेच क्यों नहीं देता। पड़ी-पड़ी क्या दूध दे रही है?”

“भाई बेचने नहीं देता।”

“उस लंगड़े के क्या करना है जमीन का, चल तो सकता नहीं। ढो क्यों रहे हो उसे, लुढ़का दो न?”

“लड़की देखी रही है उसके लिए, मेरी लुगाई।“

“तेरी लुगाई पागल है। उस अपाहिज को ब्याह के कहा जाना है। मेरा मान, अगर उसकी शादी हो गई तो जायदाद के टुकड़े हो जाएंगे बेमतलब। तेरी बीबी को समझा दे। कहीं ले जाकर धक्का दे इस अपाहिज को। वो मरा तो तू लखपति, नहीं तो बेटियों की शादी के लिए दहेज कहाँ से जुटाएगा?”

आये दिन दारू पार्टी में इसी तरह की चर्चा होती थी। दौलतराम बुधिया के मन में जहर भरता। बुधिया के बूढ़े बाप के पास जमीन जायदाद की कोई कमी नहीं थी। लेकिन शराब के लिए बुधिया को घर से कोई पैसे नहीं देता था। एक बार बुधिया के नाम हो जाए खेत, फिर तो उन खेतों को औने पौने दामों पर खरीदना दौलतराम के बाएं हाथ का खेल था। बस इसी लालच में फोकट की दारू पिला पिला कर उसने बुधिया को अपने वश में कर लिया था। शराब ने बुधिया के दिमाग को बंध्या कर दिया। उसकी बीबी अपाहिज देवर के लिए लड़की देख रही थी। बुधिया दिन रात ये ही सोचता, अपने अपाहिज भाई को रास्ते से कैसे हटाया जाए। फिर बीबी बच्चे हो जाएंगे उसके भी, जायदाद के टुकड़े ही टुकड़े। बुधिया के दिल में जहर भरता जा रहा था। उसने फैसला कर ही लिया, एक दफ़ा दोपहर को घर लौटा तब जहर की शीशी उसके हाथ में थी।

बाऊजी अहाते में पड़े-पड़े खांस रहे थे। बीबी देवर को खाना परोस रही थी। उसने घर में जाने की बजाय खिड़की से उनकी बातों को ध्यान से सुनने की कोशिश की, उसके कान खड़े हो गए, आखिर उसके पीछे क्या गुलछर्रे उड़ाए जा रहे है?

“भैया की संगत खराब है, उस दौलतराम से मुझे नफरत है। हमारी जमीन पर नज़र है उसकी।“

“आप चिंता न करो देवरजी। बाऊजी जीवित है तब तक जायदाद का बंटवारा करवा देते है। बाऊजी गुजर गए तो रोते रहोगे जिंदगी भर। आपके भैया दारू की बोतल में खेत भी डुबो देंगे। आपके लिए लड़की तो ढूंढ ही रही हूं। शादी करके अलग हो जाना। शराब पीकर रोज की मारपीट और गालियों से तो बचे रहोगे। मैं तो इनके पीछे आई हूं तो जो होगा, भुगतना ही है।“

“नहीं भाभीजी। बंटवारा नहीं करना। आपके भी तीन बेटियां है। जमीं जायदाद की आपको ज्यादा जरूरत है। मेरे तो बस दो टाइम खाना चाहिए। हाथों का कोई हुनर आ जाए, तो दो पैसे कमाकर पेट भर लूंगा। भैया दिल के बहुत साफ है, बस उन के दारू और बुरी संगत छूट जाए तो देखना, बहुत खुश रहेंगे हम सब मिल जुल कर।“

अपाहिज भाई की बातें सुनकर बुधिया ने खुद की मानसिक विकलांगता महसूस की। जहर की शीशी उसने नाली में उड़ेल दी और अपने विकलांग भाई की शादी के लिए लड़की ढूंढने निकल पड़ा।

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परिचय:

कई प्रमुख पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित। अन्तर्जाल पर विभिन्न वेब पत्रिकाओं पर निरंतर सक्रिय। 21 साझा संकलन प्रकाशित। 11 साझा संकलन प्रकाशन की प्रकिया में। एक ईबुक ‘आख़िरी रात का आख़िरी ख़्वाब’ (कहानी संग्रह) किंडल पर प्रकाशित।

सम्मान/पुरस्कार= प्रतिलिपि कविता सम्मान।

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206,बड़ी ब्रह्मपुरी

                                           मुकाम पोस्ट=भाटून्द

                                           तहसील =बाली

                                           जिला= पाली

                                           राजस्थान      306707

                                    

                                 ई मेल= davevinod14@gmail.com

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