नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

अनिरूद्ध सिन्हा की ग़ज़लें



**-**

ग़ज़ल 1
अंधेरों में उजालों की कसम तुमको मुबारक हो
समय की बेवफाई का भरम तुमको मुबारक हो

हमारी चीख की कोई कहानी बन नहीं पाई
तुम्हारे प्यार के किस्से का ग़म तुमको मुबारक हो

अभी मासूम ख़्वाहिश को वफ़ाएँ तोड़ देती हैं
मुहब्बत में ज़माने का सितम तुमको मुबारक हो

हमारे जख़्म पे मरहम लगाकर उंगलियाँ रखना
सियासत में नुमाइश का धरम तुमको मुबारक हो

कहाँ हँसते हुए देखा कभी बेजान पत्थर को
फरिश्ता है वही तो ये वहम तुमको मुबारक हो

**-**

ग़ज़ल 2
मेरे जज़्बात मेरे नाम बिके
उनके ईमान सरेआम बिके

ऐसी मंडी है सियासत जिसमें
तेरे अल्लाह मेरे राम बिके

पी के बहका न करो यूँ साहब
अब तो मयख़ाने के हर जाम बिके

उनकी बातों का भरोसा कैसा
जिनके मजमून सुबह-शाम बिके

कैसे इजहार करूं उल्फत के
मेरे अरमान बिना दाम बिके

*--*--*

ग़ज़ल 3
ग़म यहीं है हवा किधर जाए
सिर से चादर न फिर उतर जाए

खेल ही खेल में किधर जाए
जो इधर आग है उधर जाए

सूखे पेड़ों से आग बरसेगी
धूप में आईना ठहर जाए

एक जंजीर है जो टूटेगी
इस कलाई का जख़्म भर जाए

हम जरूरत नहीं मुहब्बत हैं
उस हुक़ूमत को ये ख़बर जाए

**-**

ग़ज़ल 4
ग़म हमारा मलाल उनका है
ये भी कहिए कमाल उनका है

ये सफ़र का अजीब हिस्सा है
याद उनकी खयाल उनका है

हम परंदे नहीं जो उड़ जाएँ
जाने कैसा सवाल उनका है

एक शीशे-सा टूट जाना है
ऐसे रिश्ते का हाल उनका है

फ़िक्र है तो यक़ीन भी होगा
ये गुज़स्ता-सा साल उनका है

**--**

5 टिप्पणियाँ

  1. बेनामी12:42 pm

    ग़ज़ल की तमाम शर्तों का निर्वाह करतीं ग़ज़लें एक जमाने के बाद नेट पर पढ़ने को मिली.सिन्हा साहब मुबारक हो.पहली ग़ज़ल बहरे हज़ज़ मुसम्मन सालिम अरकान मफाईलुन एक मिसरे में चार बार
    (1222) अन्य पाठक इसका वज़न मशहूर गीत मुझे तेरी मुहब्बत का सहारा मिल गया होता. समझें.
    अन्य ग़ज़लें भी सही वज़न में हैं.
    एक जगह खेल ही खेल में किधर जाये की जगह खेल ही खेर में हो गया है.उसे सधारा जा सकता है.

    कथ्य भी ताज़गी भरा है.बैठे ठाले दिल की हाय हाय नहीं. रविरतलामी जी को भी बधाई.वैसे वे नेट तकनीक के मर्मज्ञ है.आजकल उन्हें खूब पड़ रहा हूँ.ढेर सारी शुभकामनाओं के साथ-
    subhsh_bhadauriasb@yahoo.com

    जवाब देंहटाएं
  2. सुभाष जी,
    ग़लती की ओर ध्यान दिलाने का शुक्रिया. इसे ठीक कर दिया है.

    ग़ज़ल आपको पसंद आई, इसके लिए अनिरूद्ध जी बधाई के पात्र हैं. उन्होंने वाकई उम्दा ग़ज़लें लिखी हैं.

    जवाब देंहटाएं
  3. बेनामी7:02 pm

    भाई रवी रतलामीजी परंदे को परिन्दे भी कर लें वैसे ये क्षतियाँ जल्दबाजी में रह ही जाती हैं.
    subhash_bhadauriasb@yahoo.com

    जवाब देंहटाएं
  4. भाई, वाह वाह! २ नं की गज़ल पर मेरी खास दाद!! सिन्हा जी को और रवि भाई को बहुत बधाई!!

    जवाब देंहटाएं
  5. बेनामी6:18 pm

    ग़ज़ल बढ़िया लगी | लेखक को धण्यबाद |

    जवाब देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.