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लघुकथा - प्रतिभा


-प्रह्लाद श्रीमाली

कॉलेज में पढ़ते हुए उदीयमान साहित्यकार कहलाने की आकांक्षा बलवती हुई. वह कविता-कहानी लिखने लगा. जिन्हें प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाएं सखेद लौटाने लगीं. तो उसने पत्रकारिता के क्षेत्र में जोर आजमाने की ठानी. तेज़-तर्रार भाषा में स्थानीय समस्या पर लेख लिखकर वह महानगर के एक नए प्रचलित होते अख़बार के दफ्तर जा धमका.

दूरदर्शी संपादक ने गर्मजोशी से स्वागत किया. लेख पर सरसरी नज़र दौड़ाई. और आवश्यक संशोधन के साथ प्रकाशित करने का वादा निभाया. लेख छपते ही वह दुगने जोश के साथ सक्रिय हो गया. अब के संपादक ने उसे आग्रहपूर्वक चाय पिलाई. उसमें एक प्रखर पत्रकार की संभावना जताई. साथ ही अख़बार के लिए विज्ञापनों की सख्त ज़रूरत बताई.

पत्रकार का रोमांचदार तमगा और प्राप्त विज्ञापन राशि पर आकर्षक कमीशन. संपादक का यह सर्वोपरि प्रलोभन कि विज्ञापन पाने के प्रयास में अनुभव और संपर्क सूत्र बढ़ेगा. साथ ही दृष्टिकोण व्यापक होगा. जो लेखन और पत्रकारिता दोनों के लिए अति उपयोगी है. प्रस्ताव जंचा और उसने इस दिशा में हाथ-पांव मारने शुरू किए. आज वह महानगर की सफल विज्ञापन एजेंसी का मालिक है. अलबत्ता संपर्क में आने वाले होनहार नौजवानों को कवि-लेखक और पत्रकार बनने के अचूक नुस्खे सुझाता रहता है.

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