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कहानी : ... एडीटर बुल्लेशाह का

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किस्सा बी सियासत भठियारिन और एडीटर बुल्लेशाह का


-अमृतलाल नागर

जाड़े की रात. नया जंगल. एक डाल पर तोता, एक डाल पर मैना. हवा जो सनसन चली तो दोनों कांप उठे. मैना अपने पैरों को समेटकर बोली की अय तोते, तू भी परदेशी, मैं भी दूसरे देश की. न यहाँ तेरा आशियाना और न मेरा बसेरा. किस्मत ने हमारा घर बार छुड़ाया, लेकिन मुसीबत ने हमें साथी बनाया, इसलिए अय तोते, अब तू ही कोई जतन कर कि जिससे रात कटे, कोई किस्सा छेड़ कि मन दूसरा हो.

तोता बोला कि अय-मैना, सुन! मैं देश-परदेश उड़ा और सरायफानी देखी. उसके भठियारे का नाम इलाही, और भठियारिन हैं बी सियासत, जो जिन्दगी की सेज से उतरने का नाम ही नहीं लेती. उन्हें ढली जवानी में नयी नवेली बनने का शौक चर्राया है कि अल्लाह अल्लाह! उनके साज सिंगार की फरमाइशों ने मियाँ इलाही की सरायफानी को सुनार की दुकान बना रखा है. चारों ओर भट्टियाँ धधक रही हैं, दिमाग का सोना गलाया जा रहा है. हर तरफ ठक-ठक का शोर इस कदर कि भठियारे मियाँ इलाही के हुक्के की गुड़गुड़ाहट ही दब गई. ग्राहकों की तौबातिल्ला और शिकायतों से सरायफानी का छप्पर उड़ने लगा. मगर ऐ मैना, अजब ढंग हैं बी सियासत के कि कल का ख्याल ही नहीं, उन्हें तो आजी में कल नहीं पड़ती. घड़ी में सुनारों की छाती पर सवार और दम-दम में जाम आजादी का दौर. ढली जवानी का बगूला इस जोर से भड़का कि कत्तालेआलम बन गईं. और अब तो जानेजहाँ इस बात पर मचली हैं कि हम आग से आग को बुझाएंगे.

भनक एडीटर बुल्लेशाह को पड़ी. अक्ल की फरीरी पर शक्ल की अमीरी अपनाई, खुदा के नूर पर मेहँदी रचाई, जुल्फ़ों में तेल डाला, और फिर जो सुरमीली नजरों को तिरछा घुमा के फेंक दिया तो जहान में आग लग गई. सीना-चाक, दहन फाड़कर बुल्लेशाह चिल्लाए कि ऐ बी सियासत, जाने-मन!

उल्फत का जब मजा है

कि दोनों हो बेकरार,

दोनों तरफ हो आग

बराबर लगी हुई.

...लो आओ, बुझाओ!

गमक के उठीं बी सियासत, भठियारे से बोलीं, ले मर्दुए, अपनी दुनिया सम्हाल, मैं तो चली.

बन ठन के चली मैं पी की गली

मुए काहे को शोर मचावत है.

हरजाई बनी, तोसे नाहीं बनी,

तू तो दीन की बीन बजावत है!

...ऐ निगोड़े, मैं ठहरी सियासत, मुझे तेरे चरम-ईमान से क्या काम? तेरे ग्राहकों के चैन-आराम से क्या निस्बत? मुझे बगलें गरमाने में मजा आता है, आज इसकी, कल उसकी हुई.

भठियारा बोला कि ऐ बीवी, शरीफों का चलन चल, नेकबख्त बन. बदी में मजा नहीं प्यारी, रग-रग, पोर-पोर में चुभन होगी, दामन चाक-चाक हो जाएगा.

मैना ने पूछा, तब!

तोता बोला : तब खूने-आशिक की हिना से रंगी उंगलियों को नचाकर, भंवें मटका, मुंह बिचकाकर बोली बी सियासत की ऐ मुए दाढ़ीजार, तुझे शायर का कलाम याद नहीं, कि गुलों से खार बेहतर हैं जो दामन थाम लेते हैं. फिर तेरे पास धरा ही क्या है? तेरे नाम की माला जपने से क्या हासिल? उधर बुल्लेशाह के लाखों मुरीद हैं, हिन्दी में, उर्दू में, तमिल, गुजराती, मराठी, बंगाली में, चीनी, जापानी में, अंग्रेजी में, रूसी, फ्रांसीसी में, गर्जे कि हर जबान में बुलबुले फूटते हैं. शाह का मंतर जमाने के सिर पर चढ़ के बोलता है. सुफेद कागज पर स्याह हुरूफों से ढलकर उनकी आवाज बुलन्द होती है. जिस पर उनकी मेहर की नज़र हो जाती है, वह तिल से ताड़ बन जाता है, और जिससे उनकी नज़र फिर जाती है वह सूरज की तरह रोशन होकर भी बुझा चिराग माना जाता है. ऐसे सनम के गले में बाहें डालकर मैं जो एक आह करूं तो गली-कूचों में शोर मच जाए, जो चाह करूं वह पूरी हो, जो गुनाह करूं वह छिप जाए, मेरी वाहवाही हो, मेरी धूम मच जाए. इसलिए ऐ निगोड़े मुए भठियारे मैं तुझे छोड़ चली, मुँह मोड़ चली...

जाके घर-घर में आग लगाऊंगी मैं.

तेरे खल्क को खाक बनाऊंगी मैं.

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कहके बी सियासत ने अपनी ओढ़नी सम्हाली... तिरंगी छटा छहरी, सातों सितारे चमके, हिलाले ईद उगा, पट्टियाँ और धारियाँ लहराईं, हंसिया-हथौड़ा ठमका ... नजर जिसकी भी पड़ी उसी ने हाय भरी, कसके कलेजे को थामा, दुनिया दीवानी बनी, बी सियासत की ओढ़नी के गुन गाने लगी.

बोली मैना कि अय तोते, तेरा किस्सा आला है, तर्जेबयां निराला है, मगर यह क्या बात है कि हर वार बेचारी औरतजात पर है? अरे कुछ तो इन्साफ कर. मर्दों के कसूर को तू मर्द होने से मत माफ कर. कुछ तो बता कि बुल्लेशाह ने क्या किया?

तोता बोला कि अय मेरी प्यारी मैना, उतावली न दिखा, बेचैन न हो. सुन...

बोला बुल्लेशाह कि ऐ परी पैकर. फोटू तुम्हारी देखकर दिल पर हुआ असर. मैं भूल गया गैली प्रूफ, प्रेस का मैटर. अब तो रहम कर. मैं तोड़ता हूँ आज से नाता जहान से कलचर से, लिटरेचर से, दीनो ईमान से. तेरे ही गुण गाऊंगा ऐ बीवी सियासत. कदमों पे लुटा दूंगा मैं कुल अपनी रियासत. तू चल के बैठ तो जरा टाइपों के केस में, हर फ़ॉन्ट में, पैका मैं, हर पुर्जे के प्रेस में. फिर देख मेरे जौहर कि तेरे शौहर को नाकों चने न चबवा दूं तो मेरा नाम बुल्लेशाह नहीं, झब्बू!

सुन के बी सियासत मुसकराई, बुलाक की लटकन ने बल खाया. चितवन ने बांका वार किया, बुल्लेशाह के गले में बाहें डालकर बोलीं,

हमें तो अब किसी पहलू नहीं आराम आता है.

तुम्हीं इस दिल को ले लो ये तुम्हारे काम आता है.

अभी तो इब्तदाए इश्क है, अय हजरते ‘फरहत'

तुम्हारे समाने क्या देखना, अन्जाम आता है.

मगर अंजाम की परवा किसको है. तोते ने कहा कि अय मैना, यह हौसला मर्द का ही होता है, जिसने तिरछी नजर से वार किया उस पर दिलो जान सब निसार किया. एडीटर बुल्लेशाह की एड़ी जो तर हुई तो जोशेजुनूं में दहन फाड़कर चीखे कि ऐ मेरी प्यारी, तू देख मेरा करिश्मा. यों कहके गले लगाया. नाक पे चश्मा और कलम को म्यान से निकाल लिया. पश्चिम में बैठे और पूर्व में टांगें फैलाईं, उत्तर की ओर मुँह किया और दक्खिन में आग लगाई. यों चारों कोने जीतकर बोले वो एडीटर, अब तेरे लिए क्या करूं बोल ऐ मेरी जिगर. तू कह तो इलाही की मैं मूंछें उखाड़ लूं. दुनिया सरायफानी को पल में उजाड़ दूं. सूरज की राह रोक करूं चाँद को फना. दरिया को सोख लूं कि करूं आग को मना. तांबे में तेरे कर दिए प्रेसट्रस्ट-रायटर. तेरे गुलाम हो गए मेरे रिपोर्टर.

यह सुनकर सियासत की भठियारिन मुसकराई. पनडब्बा निकाला, दो बीड़े आप जमाए और जूठन बुल्लेशाह को इनायत की. बुल्लेशाह के सात पुरखे और आने वाली सात पीढ़ियाँ निहाल हो गईं. फिर कलम चूम के बी सियासत बोलीं कि ऐ मेरे पालतू बन्दर. बस मेरे इशारे पर चला कर. मैं जो कहूँ वही लिखा कर. गर सच को कहूँ झूठ तो तू झूठ बोल दे. हक के खिलाफ बोल... बस जिहाद बोल दे. मैंने भठियारे इलाही से बदला लेने की ठानी है. सरायफानी के मुसाफिरों को मिस्मार करने की मन्नत मानी है. तवारीव के वर्क यह साबित करते हैं कि सराय इलाही की है, औ' मुसाफिरों की बस्ती है. मगर मेरी निगाह में औकात हक की सस्ती है. मैं दौलत की बहन हूँ, उसकी अजीज हूँ. सोने की आब देख बनी मैं कनीज हूँ. इसीलिए ऐ प्यारे बुल्ले, तू फूट, हजार बार फूट. झूठ से अपने तन को काला कर. बहन दौलत बोलबाला कर. मैं हक का नाम ले के नाहक करूंगी शोर. मगर इस शोर को तू सच न समझना मेरे भोले बालम. यह मेरी चाल है, मेरी अदा है, मेरा चकमा है. मेरा दफ़्तर तो बस झूठ का महकमा है. दुनिया सरायफानी के गरीब मुसाफ़िरों के लिए मैं पकवान बनाऊंगी, मगर उन्हें दौलत के चहेतों को खिलाऊंगी. रिपब्लिक का नाच नाचूंगी, मगर पब्लिक को अंगूठा दिखाऊंगी. दौलत का हो गुलाम दुनिया का हर बशर. बस आज सियासत को है कोरी यही फिकर. तू एक काम कर. जो मेरी राह के रोड़े हैं उनको तबाह कर. कल्चर और लिटरेचर, आर्ट औ' साइन्स, हिस्ट्री और हक का फलसफा... ये मुए मेरी पोल खोलते हैं. तू इनकी कमर तोड़ दे ऐ मेरे प्यारे बुल्ले, इनकी खबरें न छाप, इनकी आँख फोड़ दे. इनमें से जो मेरे गुलाम बन जाएँ, उनकी वाह-वाह कर, बाकी को तबाह कर.

मैना बोली कि ऐ तोते, इसके बाद क्या हुआ. तोते ने आह भर कर कहा कि इसके बाद जो होना था वही हुआ. बी सियासत ने कमर लचकाकर तेगेनजर का वार किया और झुककर बुल्लेशाह को चूम लिया.

मैना ने फिर पूछा कि तब बुल्लेशाह ने क्या किया?

तोते ने जवाब दिया कि बुल्ला जवानी का मारा करता क्या! सियासत के जोबन से मख़मूर हुआ. हक से बहुत दूर हुआ. ईमान उनका चूर हुआ.

यह कहकर तोते ने एक ठंडी सांस ली, और दरख़्त की डाल पर अपनी गर्दन डाल दी. मैना से उसकी यह हालत देखी न गई. फुदककर उसके पास आई, चोंच से चोंच मिलाई और बोली कि न रो मेरे साथी, न रो मेरे हरदम. हक का दर्जा ऊँचा है. सराय इलाही की है, मुसाफिरों की बस्ती है. बी सियासत और बुल्ले की ये दास्ता निहायत सस्ती है. वक्त आएगा जब अक्ल आएगी. दुनिया में फिर से बहार आएगी. ये देख भोर हुआ. परिन्दों का शोर हुआ. आओ, हम इनके साथ हों. एक होकर आवाज़ बुलन्द करें. बी सियासत और बुल्लेशाह की हस्ती क्या है जो हमारी आवाज़ को दबा सकें.

यह कहके मैना ने तोते को उठाया, नया जोश दिया. फिर दोनों पंख फैलाकर ऊँचे आसमान में तेजी से उड़ चले.

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(साभार, एक दिल हजार अफ़साने - अमृतलाल नागर की सम्पूर्ण कहानियाँ, प्रकाशक राजपाल एण्ड संज, कश्मीरी गेट, दिल्ली )

(चित्र - डॉ. प्रीति निगोरकर की कलाकृति. कैनवस पर तैलरंग)

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