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रंजना भाटिया (रंजू) की कविता : सुहानी सुबह हो रही है...

कविता

suhani subah

- रंजना भाटिया

सुहानी सुबह हो रही है

खिले रात की गहराई में
सपनो की हकीकत
चाँद के साथ रतजगा ,
ओढ़ के चांदनी की चादर
पेड से लिपटी लता सी
पुष्प पल्लवित घटा सी
शब्द की जुबान
निशब्द हो रही है ,


सीपी में बंद बूँद सी
प्यार की बारिश घनेरी
मोती सी खिल के
बिस्तर की सलवटों में
सपनों में खो रही है,
सृजक बनी मेरी हर रचना
तुझ से ही मिले प्रेरणा बीज
साँसों की वीणा के संग
बस पल्लवित हो रही है


हाँ देखो ,एक नई गीत की
एक नई प्रीत की
सुरीली सी आहट
हो रही है
विरह की रात ढल चुकी अब
सुहानी सुबह हो रही है !!

-रंजना [रंजू]

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(कलाकृति - रेखा)

4 टिप्पणियाँ

  1. बेनामी8:13 pm

    sundar banayaa hai.
    keep it up
    badhaayee.
    ssneh -
    avaneesh

    जवाब देंहटाएं
  2. हाँ देखो ,एक नई गीत की
    एक नई प्रीत की
    सुरीली सी आहट
    हो रही है
    विरह की रात ढल चुकी अब
    सुहानी सुबह हो रही है !!

    आपकी कविता में नयेपन की झलक है। नयापन बदलाव का दूसरा नाम है। सच बहुत खूबसूरत लहजा है। इसके भाव बहुत सच्चे है। अपने आसपास ही घूमते दिखते हैं।

    जवाब देंहटाएं
  3. बेनामी9:39 pm

    हाँ देखो ,एक नई गीत की
    एक नई प्रीत की
    सुरीली सी आहट
    हो रही है
    विरह की रात ढल चुकी अब
    सुहानी सुबह हो रही है !!

    आपकी कविता में नयेपन की झलक है। नयापन बदलाव का दूसरा नाम है। सच बहुत खूबसूरत लहजा है। इसके भाव बहुत सच्चे है। अपने आसपास ही घूमते दिखते हैं।

    जवाब देंहटाएं
  4. हाँ देखो ,एक नई गीत की
    एक नई प्रीत की
    सुरीली सी आहट
    हो रही है
    विरह की रात ढल चुकी अब
    सुहानी सुबह हो रही है !!

    आपकी कविता में नयेपन की झलक है। नयापन बदलाव का दूसरा नाम है। सच बहुत खूबसूरत लहजा है। इसके भाव बहुत सच्चे है। अपने आसपास ही घूमते दिखते हैं।

    manvinder bhimber

    जवाब देंहटाएं

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