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ओमप्रकाश तिवारी की कहानी : कुड़ीमार

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कहानी कुड़ीमार -ओमप्रकाश तिवारी वह नहर के किनारे खड़े होकर उसमें बहते पानी को बड़े गौर से देख रहा है। उसे देखकर लगता है कि उसकी कोई चीज...


कहानी

कुड़ीमार

-ओमप्रकाश तिवारी

वह नहर के किनारे खड़े होकर उसमें बहते पानी को बड़े गौर से देख रहा है। उसे देखकर लगता है कि उसकी कोई चीज पानी में खो गई है। नहर का गंदा पानी मंथर गति से बह रहा है। नहर जो कि शहर के बीच से निकलती है, किसी गंदे नाले की तरह हो गई है। उसमें लोग कूड़ा-करकट भी फेंक देते हैं। हालांकि उसका पानी सिंचाई के लिए है। वह अकसर यहां आ कर खड़ा हो जाता है और घंटों नहर के पानी को बहते हुए देखता है। फिर अचानक चिल्ला पड़ता है। हां-हां मैं कुड़ीमार हूँ... मैंने कुड़ीमारी है... लेकिन सभी कुड़ीमार हैं...। वो शर्मा, वो कोहली, ढिल्लन, ढिल्लों, कपूर, चावला, मिश्रा, पांडेय, यादव सभी कुड़ीमार हैं...

यह कुलदीप सिंह है। कुछ ही दिन पहले जेल से छूटकर आया है। तब से अकसर इस तरह बोलता रहता है। उसे लगता है कि उसके कान के पास कोई कुड़ीमार... कुड़ीमार...कहता रहता है। वह काफी देर तक इसे बरदाश्त करता है, लेकिन जब सहन नहीं होता तो चीख पड़ता है -हां-हां, मैं कुड़ीमार हूँ.. कुड़ीमार हूँ..।

लोग समझते हैं कि जेल में रहकर उसका दिमाग खिसक गया है। वह पागल हो गया है।

दरअसल, वह नहीं चाहता था कि उसे तीसरी बेटी हो। बेटे की चाहत में उसकी पत्नी कुलवंत कौर एक बार फिर उम्मीद से हुई तो कुलदीप सिंह की चिंता बढ़ गई। उसकी रातों की नींद और दिन का चैन उड़ गया। यदि फिर लड़की हुई तो...? यह सोचकर वह परेशान रहता।

कुलदीप सिंह को लड़कियों से न तो चिढ़ थी न ही वह इनसे नफरत करता था। वह अपनी दोनों बेटियों को बहुत प्यार करता था। वह लोगों से कहता भी था कि हमारी बेटियां ही बेटा हैं। इन्हीं को पढ़ा-लिखाकर बड़ा करना है। किसी काबिल बनाना है। आजकल बेटे-बेटी में कोई फर्क नहीं है। जो काम बेटे करते हैं, वही बेटियां कर रही हैं। बल्कि लड़कियां दो कदम आगे हैं। वह गर्व से कहता कि सानिया मिर्जा को देखो। मां-बाप का ही नहीं पूरे देश का नाम रोशन कर रही है। सवाल मौका, अवसर, समानता और आजादी मिलने का है। लड़कियों को भी यदि लड़कों जैसा महत्व दिया जाए। आजादी दी जाए। वैसी ही परवरिश की जाए तो वे भी वह सब हासिल कर सकती हैं जो लड़के करते हैं।

अपनी इसी सोच की वजह से वह तीसरा बच्चा पैदा करने के हक में नहीं था। लेकिन उसकी घरवाली और माता-पिता चाहते थे कि एक बेटा पैदा हो जाए। बेटा नहीं होगा तो बुढ़ापे का सहारा कौन बनेगा? वंश कौन चलाएगा? इन सवालांे का जवाब वह केवल इतना कह कर देता कि जमाना बदल गया है। लड़कियां या नहीं कर रही हैं। लेकिन हर कोई उसके तर्क को खारिज कर देता और वह हार जाता।

वह अपनी पत्नी से कहता कि हमारी आर्थिक स्थिति एक और बच्चे की इजाजत नहीं देती। बच्चों का पालन-पोषण और पढ़ाई-लिखाई कितनी मुश्किल होती है, तुम अच्छी तरह से जानती हो। पहले ही घर की सारी जमा-पूंजी अपनी पांच बहनों की शादी करने में गंवा चुका हूँ। उसकी पत्नी उसकी बातों को ध्यान से सुनती और चुप रहती। वह भी सोचती कि कह तो ठीक ही रहे हैं। लेकिन वह एक बेटे की इच्छा को दबा न पाती। दूसरी ओर पति की बात से सहमत भी थी। यही कारण था कि उसने बेटे के लिए कभी जिद नहीं की, लेकिन परिवार वालों का दबाव और पड़ोसियों का तंज उससे बरदाश्त न होता। उसे निपूती कहा जाता तो वह तिलमिला उठती। वह तो लोगों को सुनाती हुई कहती भी कि दो-दो फूल जैसी बच्चियों को पैदा किया है। बांझ नहीं हूँ। कहने वाले पहले अपनी तरफ देखें। लेकिन इससे उसके दिल को तसल्ली न होती। उसे भी लगता कि बिना बेटे के जीवन निर्वाह मुश्किल होगा। बेटियां तो अपने घर चली जाएंगी। फिर उनका या होगा? वह तो बु़ढापे में अकेले ही रह जाएंगे।

कुलदीप सिंह के पिता करतार सिंह एक मामूली किसान थे। लेकिन उन्होंने तीन बेटे और पांच बेटियां पैदा कर दीं। इतने बच्चों को पाल-पोस कर बड़ा करने और उन्हें किसी काबिल बनाने में ही सारी जमीन बिक गई। आज कुलदीप के सभी भाई एक अदद नौकरी के मोहताज हैं। जमीन बिकने, गांव छोड़ने का दर्द और मजदूर बनने की पीड़ा कुलदीप के जेहन में नासूर बनकर रह गई है। जब भी इनकी याद आती है वह तड़प उठता है और लंबी सांस लेकर कहता है कि काश! पिता जी इतने बच्चे न पैदा किए होते...।

एक हादसे में चोट लगने के बाद कुलदीप सिंह के पिता ने चारपाई पकड़ ली तो बहनों की शादी की जिम्मेदारी तीनों भाइयों पर आ गई। सभी ने मिलजुल कर अपनी औकात से अधिक खर्च करके बहनों का विवाह किया। लेकिन एक भी बहन अपने घर खुश नहीं है। एक का तलाक हो गया। एक ने ससुराल वालों से प्रताड़ित होने के बाद आत्महत्या कर ली। बाकियों की जिंदगी भी खुशहाल नहीं है। इनकी वजह से भी कुलदीप को बहुत पीड़ा मिलती है। वह सोचता है काश! वह इतनी बहनों का भाई न होता...। अभी उसे अपना दुख और बहनों का भी दुख सहना पड़ता है। इन्हीं सब कारणों से उसने तय किया था कि वह दो बच्चे ही पैदा करेगा। चाहे बेटा हो या बेटी। लेकिन दो बेटियों के बाद जब उसे तीसरे बच्चे को इस दुनिया में लाना पड़ा तो वह विचलित हो गया।

एक दिन उसने अपनी चिंता अपने एक दोस्त को बताई। दोस्त ने सलाह दी कि वह लिंग परीक्षण करवा ले। यदि लड़की हुई तो गर्भपात करवा दे। कुलदीप को दोस्त की बात अच्छी नहीं लगी। वह गर्भपात के पक्ष में कभी नहीं रहा। उसकी नजरों में यह एक हत्या और पाप है। वह यह पाप नहीं कर सकता। लेकिन उसके पास इसके अलावा दूसरा रास्ता यही था कि वह बच्चे को इस दुनिया में आने दे।

उसने इसकी चर्चा कुलवंत कौर से की तो उसने भी झिड़क दिया। बोली यह या फालतू का सोचते रहते हैं आप? कुड़ी हो या मुंडा, है तो अपना ही खून ना? उसकी हत्या हम कैसे कर सकते हैं?

- लेकिन यदि फिर बेटी हो गई तो? कुलदीप ने अपनी आशंका प्रकट की।

- तो पाल-पोस लेंगे। यदि एक बेटा पाल-पोस सकते हैं तो एक और बेटी क्यों नहीं? लेकिन गर्भपात कभी नहीं। कुलवंत पूरी गंभीरता से अपना निर्णय सुना दिया। इससे कुलदीप परेशान हो गया। उस समय तो वह चुप्पी लगा गया, लेकिन कुछ ही दिन बाद वह फिर गर्भपात के मु े पर आ गया। इस बार भी मियां-बीवी में काफी बहस हुई और अंतत: हथियार कुलवंत को ही डालना पड़ा।

आखिरकार कुलदीप ने तय कर ही लिया कि वह डा टर से मिलेगा। पत्नी को लेकर वह डा टर के पास गया तो डा टर ने भ्रूण परीक्षण करने से साफ इनकार कर दिया। यह भी बताया कि यह कानून जुर्म है। इस पर कुलदीप ने डा टर से सवाल कर दिया कि डा टर साहब सभी तो ऐसा कर रहे हैं? मैं क्यों नहीं कर सकता? इस पर डा टर नाराज हो गई। उसने धमकी दी कि यदि उसने फिर ऐसी बात कही तो वह उसे पुलिस के हवाले कर देगी। कुलदीप सिंह डर गया और घर आ गया। लेकिन उसकी समझ में नहीं आया कि लोग किस डा टर के पास जाते हैं, जो लिंग परीक्षण करके गर्भपात भी कर देता है।

वह सोचता यदि डा टर लिंग परीक्षण नहीं करते तो प्रदेश में इतनी तेजी से महिला-पुरुष अनुपात घट क्यों रहा है? उसे अखबार में पढ़ी वह खबर याद आई कि कन्या भ्रूण हत्या में प्रदेश अव्वल है। वह सवाल करता कि जब लिंग परीक्षण ही नहीं होता तो कन्या भ्रूण हत्या कहां से हो रही है?

उसे ध्यान आया कि जितनी अस्पतालों में वह गया है, वहां यह जरूर लिखा होता है कि इत्थो लिंग निर्धारण नहीं कीता जांदा है। यह कानून जुर्म है। करने और कराने वाले को सजा हो सकती है। कुलदीप सोचता कि फिर भी लोग कन्या भ्रूण हत्या करा और कर रहे हैं।

एक दिन तो उसने अखबार में पढ़ा कि लोग इंटरनेट से जानकारी लेकर अमेरिका से कोई किट मंगा कर कन्याओं को पेट में ही मार डाल रहे हैं। उसने सोचा वह भी इंटरनेट से इस जानकारी को हासिल करेगा। उसने अखबार में से उस वेबसाइट का नाम भी नोट कर लिया। अगले दिन वह साइबर कैफे गया। एक घंटे तक मगजमारी करता रहा, लेकिन उसकी समझ में कुछ नहीं आया। हार कर घर आ गया।

कुलदीप सिंह को अपने गांव का हाकम सिंह याद आया। उसने अपनी पत्नी का तीन बार गर्भपात कराया था। क्योंकि उसकी पत्नी के गर्भ में लड़कियां थीं। यह बात उसे लिंग परीक्षण से ही पता चली थी। चौथी बार जब उसे लिंग परीक्षण से यह ज्ञात हुआ कि उसकी घरवाली के गर्भ में लड़का है तभी उसने उसका गर्भपात नहीं कराया।

एक बार हाकम सिंह की पत्नी हरदीप कौर ने उससे कह दिया कि उसे एक बेटी चाहिए। इस पर वह बिफर गया। गुस्से में घरवाली को गालियां तो दी हीं उसकी पिटाई भी की। इसके बाद से हरदीप कौर की उससे अपनी चाहत को बताने की हिम्मत नहीं हुई।

एक बार हाकम सिंह किसी से डींग मार रहा था कि उसे बेटी-सेटी नहीं चाहिए।

- क्योंकि बेटी को पालो-पोसो, लिखाओ-पढ़ाओ और ब्याह कर किसी हरामी के साथ विदा कर दो। यह मुझसे नहीं हो पाएगा।

- तुम भी तो किसी की बेटी अपने बेटे के लिए लाओगे?

- मेरी बात और है।

- लेकिन, यदि तुम्हारे जैसा ही सभी सोचने लगें और करने लगें तो इस दुनिया के सभी बेटे कंुवारे रह जाएंगे।

- रह जाएं, मेरी बला से। मैंने दुनिया ठेका नहीं ले रखा है।

- तुम्हें बेटियों से इतनी नफरत क्यों है?

- बेटियां कई बार मां-बाप की नाक कटवा देती हैं। प्यार-वार कर बैठती हैं। रोको तो भाग जाती हैं। इससे कितनी बदनामी होती है। यही नहीं, बेटी घर से निकलती है तो सोहदे उसे छेड़ते हैं। कई बार गुंडे उठा ले जाते हैं। बलात्कार कर देते हैं। इससे उनके मां-बाप को कितना शर्मसार होना पड़ता है। इससे तो अच्छा ही है न कि इन्हें पैदा ही न किया जाए।

कुलदीप सिंह सोचता ऐसा क्यों होता है? बलात्कार औरत से ही क्यों होता है? बलात्कार होने पर औरत की ही इज्जत क्यों जाती है? उसी के मां-बाप को क्यों शर्मसार होना पड़ता है? रही बात प्यार की तो इसमें या दोष है? प्यार तो रब की अनमोल देन है। आदमी अपने अहम में समझ नहीं पाता, तभी तो प्रेमियों को भागना पड़ता है। या फिर जान देनी पड़ती है। इसमें लड़कियों का या दोष है? दोष तो हमारे समाज में है। हमारे मन में है। सोच में है और सजा औरत को दे रहे हैं। आखिर कब तक यह चलेगा? कहां जाकर रुकेगा यह अन्याय?

कुलदीप सिंह का किसी को कहा याद आया कि राजे-रजवाड़े पैदा होते ही बेटियों को मार डालते थे। उनके यहां तो बाकायदा एक दाई हुआ करती थी। जिसे यह साफ हिदायत होती थी कि यदि रानी या ठकुराइन को बेटी पैदा होती है तो उसका तुरंत काम तमाम कर दिया जाए...। दाई बेटी पैदा होते ही उसे मार डालती थी और कह देती थी कि बच्चा मरा हुआ पैदा हुआ। कैसे औरत ही औरत की दुश्मन बन जाती है? बन जाती है या बना दी जाती है। दाई यदि नवजात बच्ची की हत्या न करती तो या वह जीवित रह सकती थी? जाहिर है अपनी जान बचाने के लिए वह बच्ची को मार डालती थी। ऐसी भी कहानियां सुनने को मिलती हैं कि कई दाइयों ने कई बार नवजात बच्चियों को बचाया भी है किसी और को देकर। कुलदीप सोचता कि यदि राजे-रजवाड़े ऐसे थे तो प्रजा कैसी रही होगी?

- वे ऐसा क्यों करते थे? कुलदीप ने उस आदमी से पूछा था।

- क्योंकि यदि किसी राजा के यहां सुंदर कन्या हुई तो दूसरा राजा उसके राज्य पर आक्रमण कर देता था और उसकी बेटी से जबरन शादी करता था। इस कारण राजा बेटी पैदा ही नहीं करते थे। उस समय लिंग परीक्षण नहीं होता था अत: उन्होंने बच्चियों को पैदा होते ही मार डालने की व्यवस्था कर दी थी।

- चलो वह तो राजा थे, लेकिन प्रजा?

- जैसा राजा वैसी प्रजा। कहावत ऐसे ही थोड़े कही गई है। इसका कुछ तो मर्म होगा ही। प्रजा की बेटियों पर राजा, सामंत, जमींदार, सेनापति और अन्य सरकारी अधिकारी बुरी निगाह रखते थे। इन्हें किसी की कोई लड़की पसंद आई नहीं कि उसे उठवा लेते थे। ऐसे में कौन है जो बेटी पैदा करने चाहे? हमारा समाज कहने को आज आधुनिक हो गया है, लेकिन औरत को लेकर उसका नजरिया अब भी नहीं बदला है। पहले दबंग लोग दूसरों की बहू-बेटियों से बलात्कार करते थे। आज तो हालात यह है कि घर में ही बेटी सुरक्षित नहीं है। पिता, चाचा और भाई तक की निगाह गंदी हो गई है। ऐसे में कौन बेटी पैदा करना चाहेगा? बेटी जवान हुई नहीं कि मां-बाप के दिलों की धड़कनें बढ़ जाती हैं। माना कि आज लड़कियां घर के बाहर निकल रही हैं। लेकिन वह कितनी सुरक्षित हैं? छोटे शहरों, कसबों और गांवों को छोड़ भी दें तो महानगरों तक में लड़कियों की आबरू सुरक्षित नहीं है। मैं तो कहता हूँ कि लड़कियों को लेकर हमारा डर, हमारी कुंठा हमारे डीएनए (जीन) में समा गई है। पीढ़ी दर पीढ़ी बहू-बेटियों पर हुए अत्याचार से हमारे मन में बेटियों की एक निरीह और प्रताड़ित-पीड़ित स्त्री की छवि बन गई है। आज हम इस छवि से भागने के लिए ही भ्रूण हत्या कर रहे हैं। जबकि जरूरत अपना नजरिया बदलने की है।

उसने कहना जारी रखा। हमारे प्रदेश में यह कुप्रथा इसलिए भी ज्यादा है, क्योंकि यह सीमा प्रांत क्षेत्र रहा है। विदेशियों के अधिकतर हमले इधर से ही हुए। उनका हमला देश पर ही नहीं हमारी बहू-बेटियों की आबरू पर भी होता था। जब-जब ऐसा होता कई मां-बाप यह कसम खाते कि वह बेटी नहीं पैदा करेंगे। फिर हुआ देश का बंटवारा। यह प्रांत विभाजित हो गया। सांप्रदायिक दंगे हुए तो उसकी सबसे ज्यादा मार हमारी बहू-बेटियों पर पड़ी। कितनी महिलाओं ने अपनी इज्जत बचाने के लिए खुद ही अपनी जान ले ली और कितनों की अस्मत लूट ली गई, इसका कोई हिसाब-किताब नहीं है। इस दुर्घटना के बाद भी कई मां-बाप ने यह कसम खाई कि वह बेटी नहीं पैदा करेंगे। कालांतर में यही कसम हमारे डीएनए में समा गई और अशिक्षा, गरीबी, दहेज और अन्य आधुनिक बुराइयों ने उसे मानसिक रूप से मजबूत कर दिया। परिणाम आज कन्या भ्रूण हत्या रोके नहीं रुक रही है। राज्य में एक हजार पुरुष पर ७७५ महिलाएं हैं। दिनोंदिन यह स्थिति भयावह ही होती जा रही है। यह धरती हीर-रांझा की है। सोनी-महिवाल की है। आज यह किस्से बन गए हैं। हम इन्हें सम्मान से सुनते-देखते हैं। इनका आदर करते हैं और पूजने की हद तक चाहते भी हैं। कभी इन्होंने एक दूसरे से प्रेम किया था। लेकिन तब जमाना इनके खिलाफ था। यह एक दूसरे से मिल नहीं पाए। यही हालत आज भी है। प्रेम करने वालों को हमारा समाज आज भी बरदाश्त नहीं कर पाता। प्रेमी युगलों को आए दिन जहर खा कर अपनी जान देनी पड़ती है, क्योंकि उनका प्रेम जमाने को स्वीकार नहीं होता। लड़की के प्यार की भनक लगते ही पहले तो मां-बाप-भाई उसे पीट-पीट कर सही करने का प्रयास करते हैं। इसके बाद भी यदि वह नहीं मानती तो उसे अपनी जान से हाथ धोना पड़ता है और यदि मान जाती है तो पूरी जिंदगी ऐसे आदमी के साथ जीवन व्यतीत करती है जिसे वह चाहती ही नहीं। प्यार ही नहीं करती। उसके सीने में एक याद हमेशा शूल की तरह चुभती रहती है। जिसकी पीड़ा को वह आंसू के रूप में भी नहीं व्यक्त कर पाती।

फिल्मों की नायक-नायिका को हम बेशक समर्थन देते हैं, लेकिन जब वही कहानी हमारे घर में घटित होती है तो हम बरदाश्त नहीं पाते हैं। हम खलनायक से बड़ा हैवान हो जाते हैं। हमारी क्रूरता हिंसा की सारी हदें पार कर जाती है। हमारे समाज को इस दोहरे चरित्र को त्यागना होगा। सृष्टि के लिए जितना पुरुष जरूरी है उतना ही औरत भी। फिर दोनों के साथ समान व्यवहार क्यों नहीं किया जाता? बेटी होते हुए भी बेटे की आकांक्षा क्यों? यदि हमने अपना नजरिया नहीं बदला और कन्या भ्रूण हत्या इसी तरह होती रही तो एक दिन यह मानव सभ्यता खत्म हो जाएगी।

कुलदीप सिंह सोचता कि बेटी को पेट में मारना पाप है और अपराध भी, लेकिन मेरे लिए ही क्यों? सभी तो गर्भ में ही बेटियों को मार डाल रहे हैं। फिर मेरे तो दो बेटी पहले से ही है। या ऐसा नहीं होना चाहिए कि जिसे दो बेटी हो उसे कानून लिंग परीक्षण कराने और गर्भपात की छूट होनी चाहिए। कुलदीप ने किसी से सवाल किया था।

- तब लोग इसका भी दुरुपयोग करेंगे। उस व्यक्ति ने अपनी आशंका प्रकट की थी।

- कानून का दुरुपयोग तो अब भी हो रहा है। मेरी समझ से कानून न्याय संगत होना चाहिए। जिसे दो बेटी हो उसे लिंग परीक्षण और गर्भपात की छूट मिलनी ही चाहिए।

- हां, तेरी बात में दम तो है। सरकार को इस नज़रिये से भी सोचना चाहिए। लेकिन शायद वह डरती है कि यदि यह छूट दे दी गई तो लोग इसका बेजा इस्तेमाल करेंगे। फिर असली गुनहगारों पर शिकंजा नहीं कसा जा सकेगा।

- सब बकवास है। कुलदीप सिंह झुंझला गया। बोला- जो कानून का दुरुपयोग कर रहे हैं उनका कुछ नहीं हो रहा है। न कोई पकड़ा जाता है और न किसी को सजा होती है। मेरे बाप ने पांच बेटियां पैदा कीं, अब मैं सात पैदा करूं तो समाज का संतुलन बना रहेगा? पूरे समाज का ठेका मैंने ही लिया है या? कहते हैं राज्य में लिंग अनुपात में भारी गड़बड़ी हो गई है। पुरुषों के मुकाबले औरतों की संख्या कम हो गई है। ऐसा इसलिए हो रहा है कि लोग बेटियों की हत्या पेट में ही कर दे रहे हैं। ये कौन लोग हैं जो ऐसा कर रहे हैं? मैं तो डा टर के पास गया तो उसने साफ कह दिया कि यह कानून अपराध है। वह लिंग परीक्षण नहीं करती। जब लिंग परीक्षण ही नहीं होता तो पेट में कन्या भ्रूण हत्या की बात कहां से आ गई? लेकिन नहीं। यह तो हम गरीबों के लिए है। जिनके पास पैसे हैं, जो रसूख वाले हैं, उनके लिए कानून जेब में होता है। लिंग परीक्षण भी होता है और गर्भपात भी...। धनाढ्य घरों और पढ़े-लिखे शिक्षित घरों में देखिए। या संतुलन होता है? एक बेटा और एक बेटी। यह संतुलन यों ही नहीं बन जाता है...। इसे बनाया जाता है...। जैसे हाकम सिंह बना रहा है। कुलदीप सिंह को याद आया कि पिछले ही दिनों तो एक अखबार में यह खबर छपी थी कि पढ़-लिखे और पैसे वाले लोग कन्या भ्रूण हत्या में सबसे आगे हैं।

यह सोचते-सोचते कुलदीप को नींद आ गई। सोते में वह सपना देखता है। वह ऐसे लोक में चला गया है जहां औरतें हैं ही नहीं। वहां सभी आदमी उदास हैं। जिसे देखो वहीं मुंह लटकाए घूम रहा है। उसने सोचा यहां के लोग इतने उदास क्यों हैं? उसने देखा कि यहां केवल आदमी ही हैं। न औरत है और न ही बच्चे। आदमी भी कोई युवा नहीं है। सभी के सभी बू़ढे। उसने सोचा ऐसा कैसे हुआ? जब कुछ समझ में नहीं अया तो एक आदमी से पूछ लिया। पहले तो उस आदमी ने उसे गौर से देखा और देखता रहा। जैसे वह दूसरे ग्रह का प्राणी हो। फिर वह मुस्कराया और फिर जोर से हंसने लगा और तब तक हंसता रहा जब तक कि वह थक नहीं गया। इस बीच कुलदीप उसे आश्चर्य से देखता रहा। हंसने से वह थक गया था। हंसी थमी तो थोड़ी देर तक हांफता रहा फिर बोला -भाई साहब, यह तो आप जानते ही होंगे कि बिन जननी घर भूत का डेरा। जवाब में कुलदीप ने कहा - हां।

- फिर यहां भूतों का डेरा है। प्रत्युत्तर में वह आदमी बोला।

- मैं कुछ समझा नहीं। अपने ही थूक को बड़ी मुश्किल से गले के नीचे उतार पाया कुलदीप।

- भाई साहब, हमारे यहां औरतें नहीं हैं। बिना औरत के जीवन में उमंग होती है या? उत्साह होता है या? आदमी का प्रेम सूख जाता है। जीने की इच्छा खत्म हो जाती है। यहां आप देख ही रहे हैं। हर आदमी ऐसे जी रहा है जैसे जीना उसकी मजबूरी हो। बिना औरत के जीना तो जीना मजबूरी ही हो जाता है। जानते हैं, आदमी की जिंदगी औरत होती है। यदि औरत ही नहीं तो जिंदगी कहां? यहां किसी के पास जिंदगी नहीं है। सब अपने मरने का इंतजार कर रहे हैं। एक-एक कर सभी मर रहे हैं और एक दिन सभी मर जाएंगे। फिर यहां कोई नहीं होगा। सृष्टि के साथ हमने जो खिलवाड़ किया है उसका परिणाम भुगत रहे हैं। वह आदमी एक सांस में बोल गया और फिर हांफने लगा।

- या यहां शुरू से ही औरतें नहीं थीं?

- नहीं।

- फिर?

- यह तो हमारी बेवकूफी का परिणाम है। सभी लोगों ने मिलकर कन्याओं की हत्या मां के पेट में करनी आरंभ कर दी और आज आप देख ही रहे हैं कि या दशा है। एक दिन यहां भूत रहेंगे। यह भूत लोक कहलाएगा। वैसे तो यह आज ही भूत लोक हो गया है। यहां जो लोग हैं उन्हें आप इनसान नहीं कह सकते।

कुलदीप सिंह की आंख खुल गई। मैंने यह सपना क्यों देखा? उसने सोचा। या यह कोई संकेत है? उसने इस सपने का जिक्र अपने एक दोस्त से किया तो उसने झट कहा कि हां, संकेत ही तो है। इस राज्य के लोग बेटियों की हत्या पेट में ही कर दे रहे हैं और बेटों की शादी के लिए दूसरे राज्यों से लड़कियां खरीदकर ला रहे हैं। यदि यह सिलसिला ऐसे ही चलता रहा तो एक दिन यहां भी ऐसी ही नौबत आ जाएगी। दोस्त की बात सुनकर कुलदीप बड़बड़ाने लगा। - मेरी बला से। पूरे समाज की चिंता करना मेरा ही काम तो नहीं है। मेरे यहां तो पहले ही दो बेटियां हैं। मैं तीसरी और नहीं पैदा कर सकता।

एक दिन कुलदीप सिंह के एक दोस्त ने उसे एक डा टर से मिलवाया। वह पैसे लेकर लिंग परीक्षण करने को तैयार था। कुलदीप सिंह अगले ही दिन अपनी घरवाली को लेकर उसके क्लीनिक पर चला गया। डा टर ने लिंग परीक्षण करके बताया कि उसकी घरवाली के पेट में बच्ची है। इस पर कुलदीप ने तुरंत कहा कि वह गर्भपात कर दे।

डा टर बताया कि बच्चा छह माह का हो गया है। अब गर्भपात नहीं हो सकता। हां, एक रास्ता है। इसे आपरेशन करके निकाल देते हैं।

- फिर तो वह जिंदा रहेगा? कुलदीप की घरवाली का यह मासूम सवाल था।

- जिंदा तो तब भी रहता है जब उसकी सफाई की जाती है। लेकिन आजकल कौन इन च करों में पड़ता है।

- हमें रब से डरना चाहिए। यह तो साफ-साफ हत्या है। कुलदीप की घरवाली साफ बोल गई।

- आपकी मरजी। मैंने तो आठ-आठ महीने की बच्चियों को ठिकाने लगाया है। यही नहीं सामान्य प्रसव के बाद भी हमारे यहां बच्चियों को ठिकाने लगा दिया जाता है। बस रकम थोड़ा ज्यादा लगती है।

- यह अस्पताल है कि कत्लगाह। कुलवंत कौर के मुंह से बरबस ही निकल गया। उसे वह डा टर साक्षात यमराज नजर आया। वह डर गई और मन ही मन सोची कि यह आदमी है कि शैतान। लेकिन वह प्रत्यक्ष कुछ बोल नहीं पाई। केवल इतना ही कहा कि आप ठिकाने लगाइए। हमें नहीं करना यह पाप। कहते हुए वह अस्पताल से बाहर आ गई। उसके पीछे-पीछे कुलदीप भी आ गया। उसे अपनी पत्नी पर गुस्सा भी आ रहा और नहीं भी आ रहा था। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि उसकी पत्नी ने सही किया कि गलत। इसी असमंजस में वह चुपचाप घर आ गया। तब उसकी जुबान खुली।

-यह तुमने ठीक नहीं किया कुलवंत।

- और तुम ठीक करने जा रहे थे? ऐसा काम कसाई करते हैं। वह डा टर तो पैसे के लिए कसाई हो गया है। हम भी वैसे हो जाएं। जब हम एक बेटा पाल सकते हैं तो एक बेटी और क्यों नहीं पाल सकते? अब जबकि वह पेट में आ ही गई है तो हम कौन होते हैं उसे मारने वाले?

- क्योंकि हमें उसकी जरूरत नहीं है।

- जरूरत नहीं है तो उसकी हत्या कर दें? दो और बेटियां इनका भी गला घोंट दो। मुझे भी मार डालो। सारी बला टल जाएगी और तुम्हारे मन को शांति भी मिल जाएगी।

कुलदीप को कोई जवाब नहीं सूझा तो चुप्पी लगा गया। इस तरह दोनों मियां-बीवी एक सप्ताह तक लड़ते रहे।

एक दिन अखबारों-चैनलों में खबर आई कि एक निजी नर्सिंग होम का संचालक लिंग परीक्षण और कन्या भ्रूण हत्या के मामले में पकड़ा गया। उसके अस्पताल में दो गड्ढे थे जिसमें वह गर्भपात करके भ्रूण को फेंक देता था। उन गड्ढों से न केवल भ्रूण जैसे मांस के लोथड़े मिले, बल्कि हडि्डयां तक बरामद हुई हैं।

खबर पढ़कर कुलदीप सिंह सन्न रह गया। बड़ी देर बाद वह घरवाली से बोला कि वह डा टर तो पकड़ा गया।

- अच्छा ही हुआ। उसने कर्म ही ऐसे किए थे। मैं तो कहती हूँ कि उसे गोली मार देनी चाहिए। कसाई कहीं का।

कुलदीप चुप हो गया। सोचने लगा कि उसका या होगा। पैसा ले-देकर सब मामला रफा-दफा कर दिया जाएगा। सजा तो गरीबों को होती है। पैसे वाले तो अपराध करके भी अपराधी नहीं होते। साला एक रास्ता मिला था वह भी बंद हो गया। बुदबुदाते हुए वह घर से बाहर चला गया।

अभी तक तो कुलदीप इस बात से अनजान था कि उसके पत्नी के पेट में पल रहा शिशु या है। लेकिन अब जब कि वह जान गया कि वह कन्या शिशु है तो वह परेशान हो उठा। अब उसे इस शिशु को इस दुनिया में लाने के सिवा और कोई चारा ही नहीं बचा था। उसे याद आई अपनी बहनों की दुर्दशा। उनका दुख। दहेज के लिए आग में जलती बहन। दहेज के लिए घर से निकाल दी गई बहन। पति के दारूबाज निकल जाने से परेशान बहन। गरीबी और अभाव भरा जीवन जीती बहन। बलात्कार पीड़ित पड़ोसी की बेटी। उसके जेहन में एक भी तस्वीर ऐसी नहीं उभरी जहां से उसे राहत मिले। वह परेशान हो उठा। उस रात वह सो नहीं पाया।

इसी बीच उसके मन में यह खतरनाक विचार आया कि वह पैदा होते ही बच्ची को मार डालेगा। यह सोचकर एक बार तो वह कांप गया। नहीं, ऐसा वह नहीं कर पाएगा। लेकिन यदि नहीं करेगा तो उसे खुद आत्महत्या करनी पड़ जाएगी। फिर इनका या होगा? कहां जाएंगी मां-बेटी? नहीं, सभी को जिंदा रखने के लिए आने वाले को ही जाना होगा। इसी असमंजस में वह तब तक रहा जब तक कि तीसरी बेटी ने जन्म नहीं ले लिया। लेकिन उसके पैदा होते ही कुलदीप सिंह के अंदर बैठा शैतान जाग गया। वह उस नवजात को मां की गोद से उठा लिया और ले जाकर नहर में फेंक दिया। उस समय उसकी घरवाली बेहोश थी। जब वह होश में आई तो उसने कह दिया कि मरी हुई बच्ची पैदा हुई थी। फेंक आया। लेकिन जिस तरह उसने उससे आंखें चुराते हुए यह बात कही, वह सचाई समझ गई। उसके मुंह से केवल इतना ही निकला - यह तुमने ठीक नहीं किया। यदि एक बेटे को पाल-पोस सकते हो तो एक और बेटी को भी...। आगे वह बोल नहीं पाई। उसका गला रुंध गया और आंखों से आंसू की गंगा बह निकली। कुलदीप को लगा कि कुलवंत के आंसुओं में उसकी नवजात बच्ची डूब उतरा रही है। वह कांप उठा।

अगले दिन नहर से उस बच्ची की लाश मिली। मोहल्ले में हो-हंगामा हुआ और पुलिस ने खोजबीन करके कुलदीप सिंह को गिरफ्तार कर लिया। इस बीच घरवाली की दशा देखकर कुलदीप सिंह भी टूट चुका था। उसने अपना अपराध स्वीकार कर लिया। इस अपराध में उसे सजा हुई दस साल की।

जेल में उसे नींद न आती। आंख लगते ही कुलवंत कौर का रोता हुआ चेहरा सामने आ जाता। कुलवंत कौर के आंसुओं में डूबती-तैरती बच्ची दिखाई पड़ती। बच्ची बचाओ-बचाओ चिल्लाती। कई बार तो यह भी कहती कि पापा, मुझे मत मारो, मुझे मत मारो। मेरा या गुनाह है पापा? मैं तुम्हें कभी तंग नहीं करूंगी। आप जैसा चाहेंगे वैसा ही करूंगी। मुझे बचा लो पापा। मुझे मत मारो पापा। मेरे प्यारे पापा। वह अकबका कर उठ बैठता। आसपास देखता। चारों तरफ अंधेरा ही अंधेरा होता। इसके बाद उसे नींद न आती। वह रात भर अपनी बैरक में टहलता रहता।

किसी-किसी रात वह सपना देखता कि नहर में बच्ची को फेंक दिया है। वह चिल्ला रही है, रो रही है और वह क्रूरता से हंस रहा है। उसकी हंसी देखकर बच्ची रोना बंद कर देती है। पानी में डूबने से पहले कहती है कि कुड़ीमार तुझे जीवन में कभी चैन नहीं मिलेगा।

किसी-किसी रात उसे किसी गड्ढे में बहुत सारे मादा भ्रूण दिखाई देते। बच्चियों की हडि्डयां दिखाई देतीं। साथ ही नजर आता क्रूरता से मुस्कराता हुआ एक डा टर का चेहरा। वह कहता कि देखा मैंने या किया है? तभी सभी भ्रूण लड़की बन जाते और डा टर को उसी गड्ढे में धकेलकर उसे मिट्टी से दबा देते और खूब जोर-जोर से हँसते हुए गायब हो जाते। डा टर बचाओ-बचाओ चीखता रहता लेकिन उसकी मदद को कोई न आता।

जेल में रह कर इस तरह के सपने देखकर कुलदीप लगभग पागल ही हो गया। वह जेल में ही रह-रह कर चीखने लगा कि हां, मैं कुड़ीमार हूँ...। मैं कुड़ीमार हूँ...।

फिर भी जेल में जब उसकी बेटियां और पत्नी उससे मिलने जातीं तो वह कहता -मुझे देखने मत आया करो। मैं पापी हूँ। हत्यारा हूँ। इतना कहकर रो पड़ता। उसकी बेटियां भी रोतीं और पत्नी भी। फिर वह संभलता और बेटियों से कहता कि तुम दोनों बेटी नहीं बेटा हो। तुम्हें यह साबित करना होगा। तुम्हारा बाप कायर निकला, लेकिन तुम अपनी मां की तरह बहादुर बनना। तुम्हें मेरे माथे पर लगे कलंक को धोना होगा।

उसकी बेटियों ने उसे निराश नहीं किया। दोनों पढ़ाई में अव्वल हैं। अपने दम पर पढ़ाई कर रही हैं। आज उनका एक सपना है। वह आश्वस्त हैं कि वे अपने सपने को जरूर साकार करेंगी।

जेल से बाहर आने के बाद कुलदीप सिंह को यह जानकर बड़ी तसल्ली हुई। लेकिन जेल में अधिक चिंतन के कारण उसका मानसिक संतुलन गड़बड़ा गया है। अकसर उसे लगता है कि कोई उसके कान के पास जोर-जोर से कुड़ीमार... कुड़ीमार... कह रहा है। वह बहुत देर तक इसे बरदाश्त करता है, लेकिन जब नहीं सह पाता तो चिल्ला पड़ता है कि हां-हां मैं कुड़ीमार...हूँ, मैं कुड़ीमार...

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संपर्क : ओमप्रकाश तिवारी, वरिष्ठ उपसंपादक,

अमर उजाला, ए-५, एसएसजीसी, कपूरथला रोड, जालंधर-२१, पंजाब।

मोबाइल : ०९९१५०२७२०९

ई-मेल : op.tiwari16@gmail.com

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(चित्र - अतुल डोडिया की कलाकृति)

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर: 2
  1. कहानी विचारोत्तेजक है। एक भले व्यक्ति के हत्यारा बनने की हृदय विदारक कहानी है।
    किसी न किसी रूप में तो हम सब कुड़ीमार ही हैं, यदि भौतिक रूप से कुड़ी याने कन्या को नहीं भी मारते तो उसे मानसिक, भावनात्मक, बौद्धिक स्तर पर तो मार ही देते हैं। घर में स्त्री को बहस नहीं करने देते, अपने मन की नहीं करने देते, अपनी ही गर्भस्थ बेटी को जन्म नहीं देने देते, उसकी योग्यता के अनुसार उसे जीवन में प्रगति नहीं करने देते.
    घुघूती बासूती

    जवाब देंहटाएं
  2. बेनामी3:41 pm

    हृदय विदारक कहानी। समाज की सभी बुराइयों को परत दर परत खोलती...

    जवाब देंहटाएं
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रचनाकार: ओमप्रकाश तिवारी की कहानी : कुड़ीमार
ओमप्रकाश तिवारी की कहानी : कुड़ीमार
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