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महेंद्र भटनागर का होली फाग


 फाग


-महेंद्र भटनागर




फागुन का महीना है, मचा है फाग
होली छाक छाई है; सरस रँग-राग !

बालों में गुछे दाने, सुनहरे खेत
चारों ओर झर-झर झूमते समवेत !

पुरवा प्यार बरसा कर, रही है डोल
सरसों रूप सरसा कर, खड़ी मुख खोल !

रे, हर गाँव बजते डफ़ मँजीरे ढोल
देते साथ मादक नव सुरीले बोल !

चाँदी की पहन पायल सखी री नाच
आया मन पिया चंचंल सखी री नाच !

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होली


नाना नव रंगों को फिर ले आयी होली,
उन्मत्त उमंगों को फिर भर लायी होली !

आयी दिन में सोना बरसाती फिर होली,
छायी निशि भर चाँदी सरसाती फिर होली !

रुनझुन-रुनझुन घुँघरू कब बाँध गयी होली,
अंगों में थिरकन भर, स्वर साध गयी होली !

उर में बरबस आसव री ढाल गयी होली,
देखो, अब तो अपनी यह चाल नयी हो ली !

स्वागत में ढम-ढम ढोल बजाते हैं होली,
हो कर मदहोश गुलाल उड़ाते हैं होली !

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समता का गान [परिप्रेक्ष्य होली]




मानव समता के रंगों में
आज नहा लो !

सबके तन पर, मन पर है जिन चमकीले रंगों की आभा,
उन रंगों में आज मिला दो अपनी मंद प्रकाशित द्वाभा,
युग-युग संचित गोपन कल्मष
आज बहा दो !

भूलो जग के भेद-भाव सब — वर्ण-जाति के, धन-पद-वय के,
गूँजे दिशि-दिशि में स्वर केवल मानव महिमा गरिमा जय के,
मिथ्या मर्यादाओं का मद-गढ़
आज ढहा दो !

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आओ जलाएँ [संदर्भ होली]

आओ जलाएँ
कलुष-कारनी कामनाएँ !

नये पूर्ण मानव बनें हम,
सकल-हीनता-मुक्त, अनुपम
आओ जगाएँ
भुवन-भाविनी भावनाएँ !

नहीं हो परस्पर विषमता,
फले व्यक्ति-स्वातंत्र्य-प्रियता,
आओ मिटाएँ
दलन-दानवी-दासताएँ !

कठिन प्रति चरण हो न जीवन,
सदा हों न नभ पर प्रभंजन,
आओ बहाएँ
अधम आसुरी आपदाएँ !

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(चित्र, साभार सजीव सारथी)

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