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शरद जायसवाल की हास्य व्यंग्य कविताएँ व ग़ज़लें

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‘ आशा की किरण फूटी है ‘ पढ़ी लिखी है वो हम उससे कमतर जमीं पे हम वो आसमां को छूती है ! प्रेम के धागे को तुम कच्‍चा मत समझो ...

शरद जायसवाल sharad jaiswal

आशा की किरण फूटी है

पढ़ी लिखी है वो

हम उससे कमतर

जमीं पे हम

वो आसमां को छूती है !


प्रेम के धागे को

तुम कच्‍चा मत समझो

वो रेशम की थान

इधर गठान सूती है !


हूं तो शहरी

शक्‍ल से दिखूं वनवासी

उधर भोग है छप्‍पन

इधर जड़ी बूटी है !


जब हुई शाम

वो अंधेरे में सिमट गई्र जानो

मैं हूं बत्‍ती उसे गुल मानो

लाइन में खड़े होते हैं

हम सटकर

लोग समझते हैं

जगह छूटी है !


उसकी चाल चकरघिन्‍नी सी

खनकती रहती है वो सिन्‍नी सी

हम तो उसके बदन पे लटके

फालतु कपड़े

वो दीवार पे लगी

शानदार खूंटी है !


सुबह-शाम था हमारा

छत पे जाना

वहीं शु्‌रु हुआ अफसोसनाक़ अफ़साना

हमने तो औरों पे डोरे डाले थे

उसने लंगड़ फंसा

पतंग लूटी है !


अब तो चैन लेटा हूं

उसकी बाहों में

सपने रंगीन हैं अब

निगाहों में

कल ही गांव से आई है

उसकी बहना

एक आशा की किरण फूटी है !

---

अब कैसे करें

दिल लगा कर गधी से , कुछ इस तरहां हमने कहा !

चार पायों पे खड़े तुम , दीदार अब कैसे करें !!


इस कदर आंधी चली कि , टीन टप्‍पर उड़ गया !

सब निहारें गौर से , हम प्‍यार अब कैसे करें !!


तुम जमीं को देखते , यूं चर गए सारा जहां !

सर के तो गायब हुए , एतवार अब कैसे करें !!


हममें नहीं तुममें बहुत है , भाई चारे का जुनून !

मेनका दीदी तुम्‍हारी , तुमपे वार अब कैसे करें !!


खूब सेवा हो रही , दिन रात अब आठों पहर !

मिचलियों का दैार , सरहद पार अब कैसे करें !!


मैं तो हूं सादा सुखनवर , वो तो हाईटेक है !

एक पे फुलस्‍टाप , दो से चार अब कैसे करें !!


एक तो है पास , दूजे के लिए बेचैन मन !

साला थानेदार , दूजी नार अब कैसे करें !!

...

एक कप चाय


व्‍यवहारिकता और प्रेम की पर्याय

एक कप चाय !


जब लगाती है गुहार !

तभी खुलते हैं

हमारी बुद्धि के द्वार !

पत्‍नी की सौत !

जाड़े की मौत !

गरीबों का सहारा !

अमीरों ने इसे

बेड टी पुकारा !

चाय की चुश्‍की !

जवानी की मुश्‍की !

दफ्‍तर की शान !

बाबुओं की जान !

एक कप चाय !


आपकी इज्‍जत बचाय !

अगर नहीं है

घर में चाय

उल्‍टे पांव आपको

बाजार की सैर कराय !

आराम से बैठ

इसे लोग

तसल्‍ली से पीते !

कुछ पल ही सही

ख्‍़यालों में जीते !

अंग्रेजों ने इसे

हमें पीना सिखाया !

ज़हर धीमा-धीमा

नसों में समाया !

खुद तो चले गए

औलाद छोड़ी !

गुलामी की जंजीरें

हमारे जीवन से जोड़ीं !

एक समय यारों

एैसा भी आएगा !

अपराध जगत में

सुपारी का काम

एक कप चाय में हो जाएगा !

बोलते-बोलते थका है गला !

भगवान करे आप सभी का भला !

इर्श्‍वर आपको हर मुसीबत से बचाए !

तो फिर हो जाए एक कप चाय !

 

....

चार लोगों की बदौलत


दो इधर थे दो उधर थे

बीच में थे ख़ैरख्‍़वाह !

हम सनम दुनिया में आए
चार लोगों की बदौलत !!


पत्‍थरों के दौर में

मेरा निशाना लग गया !

तुम टूट के बाहों में आए

चार लोगों की बदौलत !!


हमारे तुम्‍हारे प्‍यार के

चर्चे ज़ुबां पे आ गए !

हमने तुमने घर बसाए

चार लोगों की बदौलत !!


यूं बदन को ढांपते

बस्‍तियां गुजरा किए !

सुर्खियां हम ही बने

अब चार लोगों की बदौलत !!


चार दिन का शौक था

इत्र जैसे के उड़ गया !

पंख हमने फड़फड़ाए

चार लोगों की बदौलत !!


सीख ली हमने कलाएं

सीख ली अय्‍यारियां !

फ़न तुम्‍हीं पे आजमाए

चार लोगों की बदौलत !!


सर तलक कर्जे में डूबे

बाल भी अब हैं कहां !

हम नहीं पहुंचे यहां तक

चार लोगों की बदौलत !!


हम चले थे जिस जगह से

उस तरफ जाना है अब !

हम वहां तक पहुंच पाएं

चार लोगों की बदौलत !!

.....

जरा सा

ज़रा सा

छू दो तो

झनझना जाते !

दिल में

कसे तार

बारीक़

हुआ करते हैं !!

....

जूते उतार लेता है


बात बिगड़ जाय तो !

साथ बिछड़ जाय तो !

पाथ बिखर जाय तो !

जात बिसर जाय तो !

कुदरत का साथ देता है !

जूते उतार लेता है !



बंदगी की शान में !

गंदगी की खान में !

दरिंदगी की थकान में !

छरछंदगी की मुस्‍कान में !

उल्‍टी वो नाव खेता है !

जूते उतार लेता है !



ग़रीब ग़र है तख्‍़त पर !

करीब ग़र है वक़्‍त पर !

नसीब ग़र है रक़्‍त पर !

सलीब ग़र है भक्‍त पर !

पैसे उधार देता है !

जूते उतार लेता है !


मसखरी मुस्‍कान को !

तस्‍करी सामान को !

तश्‍तरी के पान को !

नश्‍तरी अपमान को !

फौरी मुकाम देता है !

जूते उतार लेता है !


वस्‍त्र की अंगड़ाई हो !

शस्‍त्र की लड़ाई हो !

जब दस्‍त तब सगाई हो !

जबरजस्‍त जब लुगाई हो !

पुरखों को तार देता है !

जूते उतार लेता है !


खलती कहां है


चार दिन चालीस योजन चार युग से सुन रहे

फूल के होती है कुप्‍पा बेशरम फलती कहां है !


नज़्‍म जैसी शोख है वो गीत सी रमणीक है

चुप रहे हम मनमसोसे तू बता गलती कहां है !


हुश्‍न वजनी इश्‍क जर्जर हादसा होना ही था

व्‍हील चेयर पे लदी कमबख्‍़त अब चलती कहां है !


खांचों पे खांचे खींच के हम कोशिशे मर्दा किए

सख्‍़त इतनी है ये ज़ालिम सांचे में ये ढलती कहां है !


हमको इशारे पे लिए वो इस कदर बेखौफ है

खूब भटका लौट आया हाथ ये मलती कहां है !


महफिलों के दौर हों बज़्‍मे अदब की शान गर

रौशनी फानूस की है मोम अब जलती कहां है !


मैं भिखारी सा हूं मरियम वो सेहतमंद है

सामने मुझको खिलाती बेरहम टलती कहां है !


सात जन्‍मों का है बंधन ये ना जाने कौन सा

नक्‍सली इसकी अदाएं नस्‍ल ये पलती कहां है !


इनसे है मेरी बरक्‍कत इनके बल जिंदा हूं मै

लाख कांटे हैं बदन पे गुलज़दा खलती कहां है !

...

साले का क्‍या करें

होती है शाम जब भी दिल बैठने लगता

कुंदा नहीं है दर में

उम्र आसपास है

बीवी नहीं है घर में

साले का क्‍या करें !


रौशनी से उनकी

रौशन मेरी दुनिया

चांद कुनमुनाए

उजाले का क्‍या करें !


अधरों से जाम पीकर

मदहोश हो गए

ट्रे में सजे सजाए

प्‍याले का क्‍या करें !


चटपटी ज़ुबान

आंख नमकीन है

रसोई में रखे

मसाले का क्‍या करें !


बातों से उनकी

पेट भर गया मेरा हाथ में पकड़े

ताले का क्‍या करें !

निवाले का क्‍या करें !


शक्‍ल एक सी दोनों की

रंगों से सजाई है

तस्‍वीर यार की

भुकड़ा हुआ है अब

काले का क्‍या करें !


झुमकों ने छीन ली

मेरी जेब की बहार

कानों में लटके

उसके बाले का क्‍या करें !


गंगा उतार लेते

संगम हो गया होता

जटाएं नहीं हैं पास

शिवाले का क्‍या करें !

.....

 शादी के लड्‌डू

शादी के मंडप में

वर-वधु

नजर आते हैं खिले-खिले !

होंठ होते हैं उनके सिले !

सुहाग की सेज़ पर

मन डोलता है !

केवल दिल बोलता है !

जैसे-जैसे

दिलों के अरमान जागते हैं !

शर्म और हया

दूर भागते हैं !


दुल्‍हन अपनी मां से

पेट से होकर दिल में समाने की

पाक-विद्या सीख कर आई थी !

जिसे उसने सफलता पूर्वक

अपने पति पर आजमाई थी !

कुछ ही दिनों में

पत्‍नी का प्‍यार

पति के पेट में समाया !

सीना हुआ अंदर

पेट ने अपने आकार को बढ़ाया !


बढ़ा हुआ पेट



पति के लिए

सुहाग की निशानी है !

पति-पत्‍नी के एक तरफा

मधुर संबंध की कहानी है !

अगर आप चाहते हैं

शांति से जीना !

तो अंदर ही रखिए अपना सीना !

वरना बेचारी वह आपके जुल्‍मों को

सह नहीं पाएगी !

आपके जीवन काल में ही

सती हो जाएगी !

खुद तो बनेगी प्रेत !

आपको अंदर कराएगी

परिवार समेत !


तो साहबान

शादी के लड्‌डू होते हैं कमाल के !

आराम से खाइए इसे सम्‍हाल के !

इसको खाने वाला खाकर पछताया!

ना खाने वाला इसे देख-देख ललचाया!

दाम्‍पत्‍य जीवन में पति-पत्‍नी के होते हैं

बराबरी के शेयर! प्‍लीज हैंडिल विथ केयर!

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रचनाकार: शरद जायसवाल की हास्य व्यंग्य कविताएँ व ग़ज़लें
शरद जायसवाल की हास्य व्यंग्य कविताएँ व ग़ज़लें
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