रश्मि तारीक की कहानी - आत्मसम्मान

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  तालियों की आवाज़ में देव प्रकाश जी की रुंधी हुई आवाज़ को शायद किसी ने महसूस नहीं किया !चश्मा थोडा सा ऊपर कर वो अपनी आँखों के कोरो को रुमाल ...

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तालियों की आवाज़ में देव प्रकाश जी की रुंधी हुई आवाज़ को शायद किसी ने महसूस नहीं किया !चश्मा थोडा सा ऊपर कर वो अपनी आँखों के कोरो को रुमाल से पोंछ रहे थे !उम्र के आखिरी पड़ाव पर आकर उन्हें एहसास हुआ कि जीवन में कुछ सीखना हो तो उम्र मायने नहीं रखती न ही उम्र बंधन है !बस कुछ भी पाना हो और अपनी मंजिल पर पहुंचना हो तो बस एक जज्बा ही होना चाहिए! और ये एहसास उनकी अपनी बहू स्नेहा ने दिलाया जो स्टेज के पीछे खड़ी उन्हें हाथ हिला कर अपनी ख़ुशी से भीगी आँखों से मौन बधाई दे रही थी ! देव प्रकाश जी गदगद ह्रदय से दिल से बहू को आशीष दे रहे थे ! आज उन्हें अनाथ बच्चों को पढाने और उन्हें हर संभव सहायता करने के लिए सम्मानित किया जा रहा था !उनकी पत्नी को भी,गरीब लडकियो को सिलाई कढाई सिखाने के लिए सम्मानित किया जा रहा था !

सविता देवी खुद कुछ ज्यादा पढ़ी नहीं थी पर जितना आता था ,जितना उन्होंने अपने परिवार को अपनी समझ और सूझबूझ से संभाला, वही अनुभव उन गरीब लड़कियों के जीवन को संवारने में अर्पित कर रह थीं! देव प्रकाश जी की डबडबआई आँखों में वो पल घूम गए जब इसी बहू स्नेहा को उन्होंने स्वीकार ही नहीं किया था !बहुत खरी खोटी सुनाई अपने मंझले बेटे को जो प्रेम विवाह कर अपनी विजातीय पत्नी को सीधा घर ले आया था !मालूम था उसे कि पूछने पर उसे स्वीकृति नहीं मिलेगी इसलिए हिम्मत कहो या महेश के प्रेम की इंतहा कि स्नेहा को ब्याह कर परिवार वालो के सामने खड़ा कर दिया बस!बहुत आगा बबूला हुए थे उस दिन देव प्रकाश जी !

देखा....!महेश की बेवकूफी को ?इसकी इतनी हिम्मत की इसने बिना पूछे बिना हमें बताये शादी भी कर ली !

चिल्ला पड़े देव प्रकाश जी सविता देवी पर ! साथ ही एक तरफ जाकर बैठ गए ! दरवाजे की दहलीज़ पर बेटा बहू दोनों खड़े अन्दर आने की इजाज़त की इंतज़ार में खड़े एक दूजे को देख रहे थे मानो कह रहे हो की अब क्या होगा !महेश ने आँखों ही आँखों में तसल्ली दी स्नेहा को कि चिंता न करे! इतने में देव प्रकाश जी की बड़ी बहू आरती का थाल लिए बाहर आई !

देव प्रकाश जी झल्ला पड़े बहू पूजा पर .....किस से पूछ कर तुम आरती उतारने जा रही हो इन दोनों की ?कह दो इन से हमारा रिश्ता खत्म आज से !हम क्या मर गए थे जो अपने आप शादी कर आया कमबख्त ?

ये कह कर देव प्रकाश जी बरामदे में पड़ी अपनी कुर्सी पर बैठ गए और बढ़ बढ़ाते रहे !सविता देवी ने इशारे से बड़ी बहू को नवदंपत्ति का स्वागत करने की आज्ञा दी और देव प्रकाश जी को शांत करने एंव मनाने के लिए समाज के ऊँचनीच का हवाले दे कर आश्वासित करने लगी !देवप्रकाश जी उठे और पत्नी के साथ अनमने भाव से ही सही दरवाजे के पास आ गए !बेटा बहू ने पैर छूकर आशीर्वाद लिया और इस तरह घर में थोड़ी चहल पहल हुई !बहू बेटे को उनके कमरे तक पहुंचा कर सब अपने अपने कमरों में चले गए !रात को भी सबने चुपचाप खाना खाया ! न किसी ने कोई नौक झोंक की न किसी ने कोई उत्साह या ख़ुशी दिखाई छोटी बहू के आने की !

स्नेहा ख़ामोशी से सबके चेहरों को पढ़ने की कोशिश करती रही और उनके चेहरे के हाव भाव से उनको समझने की कोशिश !अन्दर ही अन्दर उसका मन भी भर आया ऐसा अनपेक्षित व्यवहार देख कर परन्तु ये तो होना ही था ! खुद दोनों ने कदम उठाया था मंदिर में शादी करने का तो अब ये सब तो झेलना ही पड़ेगा न!
समय बीतता गया ! स्नेहा ने अपने आपको महेश के परिवार के हिसाब से ढाल लिया था !पर इतने समय में उसने महसूस किया की उसके जेठ जेठानी बस अपने काम से काम रखते और छोटा देवर अपने कॉलेज और पढाई में मस्त रहता!सास ससुर बस या तो चुपचाप खोये से रहते और अपने कमरे में बंद रहते या खीजते रहते और कभी किसी पर कभी किसी पर छींटाकशी करते रहते फिर चाहे वो कोई पड़ोसी भी क्यों न हो !परिवार की ये दिनचर्या खासकर सास ससुर की तबियत को देखते हुए और उन्हें मानसिक तनाव में यूँ रहते हुए स्नेहा को कई बार चिंता होती थी ! उसने महेश से एक दो बार ज़िक्र भी किया कि माँ बाबूजी को किसी कार्य में व्यस्त रहना चाहिए वर्ना वो और भी बीमार हो जाएँगे पर महेश एक ही बात कहता ,''देखो स्नेहा ,माँ बाबूजी की इस उम्र में किसी भी आदत को बदलना नामुमकिन है ! तुम व्यर्थ चिंता मत करो और जब सब अपने आप में मस्त हैं तो तुम क्यों इतना सोचती हो ?हां उनके स्वास्थ्य की चिंता मुझे भी है और मैं उनका चेकअप भी करवाता रहता हूँ !''
स्नेहा यह बात सुनकर आश्वस्त नहीं हो पाती थी !कहीं न कहीं वो माँ बाबूजी के लिए कुछ सोचने लगी थी !फिर एक दिन अचानक उसको एक सूत्र हाथ में लगा !हुआ यूँ कि किसी काम से उसको अचानक अपने पड़ोस में जाना पड़ा जहाँ मि ० शर्मा अपनी पत्नी के साथ अपने घर की बरामदे में कुछ बच्चो को पढ़ा रहे थे और मिसेज शर्मा कुछ लड़कियों को सिलाई सिखा रह थीं ! स्नेहा मंत्रमुग्ध सी उस दम्पति को देख रही थी !इतने में मिसेज शर्मा ने उसे देख कर कहा ..''आओ,आओ बेटी !कैसी हो ?स्नेहा ने कहा ,''मैं ठीक हूँ आंटी !आप कैसे हो'' और पूछे बिना रह न सकी कि  ''आंटी , आप और अंकल इन बच्चों को पढ़ा और सिखा रहे हैं ,आपका तो परिवार आपके ही साथ है फिर आप कैसे ये सब कैसे कर लेती हैं ?''
                              ''तो क्या हुआ बेटी ,हमारा परिवार हमारे साथ है तो क्या हम किसी और को सहारा नहीं दे सकते ? स्नेहा ,हम सम्पूर्ण हैं तो भी किसी अपूर्ण को सम्पूर्णता दे सकते हैं !किसी को सहारा देना, मदद करना जिनको हमारी आवश्यकता है तो देनी चाहिए न !'' और किसी की मदद करने से जो आत्मिक संतुष्टि मिलती है उसका तुम अंदाजा भी नहीं लगा सकती !जहाँ तक तुम्हारा सवाल है हमारे अपने परिवार के लिए तो ईश्वर की दया से बेटा बहू दोनों नौकरी करते हैं और पोता पोती दोनों बड़े हैं और स्कूल में दसवीं और बारहवीं में पढ़ते हैं !बेटा सब व्यस्त हैं अपने अपने कार्यों में तो हम अकेले खाली बैठ कर क्या करते ?घर के छोटे मोटे कार्यों से निर्वत्त होकर अनाथ बच्चों को पढ़ाने और गरीब लड़कियों को सिलाई, कढाई सिखाने में समय कब व्यतीत हो जाता है पता ही नहीं चलता !''


'स्नेहा ने पूछा ,''आपके बेटा बहू ने कोई एतराज़ तो नहीं किया?''
इस पर मिसेस शर्मा बोली ,'' नहीं बल्कि मुझे तो मेरी बहू ने ही ये रास्ता सुझाया ''!घर में सब व्यस्त हैं पर किसी को भी किसी से कोई शिकायत नहीं और जो वक़्त हमे मिलता है उस में हम सब मिल बैठ कर अपनी बातें अपनी दिनचर्या बताते हैं और इसी तरह वक़्त बीतता रहता है !'' स्नेहा बेटा ,घर बैठ कर बच्चो की ज़िन्दगी में दखलंदाज़ी करके और उन्हें ताने मारने से क्या फ़ायदा ? घर का माहोल भी ख़राब होता है और हम सब दुखी ही रहते हैं तो बेहतर है खुद को व्यस्त रखें ! स्नेहा को जैसे अपने सास ससुर के लिए एक उम्मीद की किरण दिखाई दी और उसने अपने मन में ठान लिया कि वह भी अपने माँ बाबूजी को मानसिक तनाव से निकालने के लिए किसी ऐसे ही नेक काम में लगाने लिए प्रयास करेगी !था तो थोडा मुश्किल क्यूंकि उम्र के इस दौर में अक्सर इंसान अपने आप को बदल नहीं पाता !न ही चाहता है की कोई आकर उसे उसके ढर्रे से हटाने की कोशिश करे !पर कोशिश तो करनी ही पड़ेगी ,ये सोचकर स्नेहा ने माँ बाबूजी को इस कार्य में शामिल करने के लिए अपनी योजना को साकार करने के लिए प्रयत्न शुरू कर दिया और साथ ही शर्मा दंपत्ति से उनका सहयोग भी माँगा !एक अच्छे काम के लिए शर्मा दंपत्ति ने स्नेहा को सराहा भी और योगदान भी दिया !


एक दिन अचानक दरवाज़े पर घंटी बजी और एक ,दो लड़के आये और बाबूजी से बोले ,'' अंकल जी ,हम यहाँ पास के शर्मा अंकल के पास पढने आते हैं और शर्मा अंकल कहीं बाहर गए हैं आर उन्हें आने में समय लगेगा !आप संस्कृत और हिसाब अच्छा पढ़ाते हैं ऐसा हमने सुना है !प्लीज़  ,कल हमारा पेपर है आप हमारी सहायता कर दीजिये न !प्लीज़!

बाबूजी कुछ सोचकर बोले ,''अरे बेटा मुझे काफी समय हो गया है ये पढाई वढाई छोड़े हुए'' !''इस पर बच्चों ने कहा आप एक बार कोशिश तो कीजिये न ''!बच्चों की जिद्द के आगे उनकी एक न चली और वो काफी देर तक बैठे रहे और उन्हें पढ़ाते और समझाते रहे ! बाबूजी के चेहरे पर एक आत्मसंतुष्ट्ती देख माँ और स्नेहा दोनों ही खुश थीं ! फिर ऐसे ही एक दिन कुछ लड़किओं ने बहाने से आकर माँ से भी कुछ सिलाई के नमूने सीखे !
धीरे धीरे माँ बाबूजी शर्मा दंपत्ति के यहाँ भी जाने लगे और वहां पर बच्चों को अपना यथासंभव सहयोग देने लगे !सिखाने वाले बढे तो सीखने वाले बच्चों की तादाद भी बढ़ी !अब बाबूजी और माँ अपना अधिकतर समय इसी परोपकार और आत्मसम्मान मिश्रित कार्यों में लगाने लगे और खुश रहने लगे ! इन्हीं प्रयत्नों के फलस्वरूप उन्हें शहर में जब सम्मानित करने के लिए बुलाया गया तो शर्मा दंपत्ति ने माँ बाबूजी को सब सच बता दिया और कहा की आज उनके इस सम्मान के लिए उनकी बहू स्नेहा का भी हाथ है तो माँ बाबूजी के आश्चर्य की सीमा न रही और वो आत्मविभोर से हो गए !
अपना नाम पुकारे जाने पर जब बाबूजी स्टेज पर आये और फूलों के हार और तालिओं से जब स्वागत हुआ और उन्हें कुछ बोलने को कहा गया तो देव प्रकाश जी बोले ,,''मेरे हमउम्र भाइयो , बहनों और अतिथिगण !आज मैं जो कहने जा रहा हूँ वो बात जिन्हें अच्छी लगे वो गाँठ बाँध कर रखे और जिन्हें न पसंद आये वो कृपया मुझे माफ़ करें  !भाईयों और बहनों हम अक्सर ये सोचते हैं कि हमारे बच्चे हमारे बुढ़ापे में हमारा सहारा बनेगे या नहीं ?कहीं वो हमे छोड़ तो नहीं देंगे दर दर की ठोकरें खाने के लिए ?हम अपनी सारी जमा पूंजी अपने बच्चों के लिए खर्च कर देते हैं और बदले में ताउम्र उनसे जुडी अपेक्षाओं का पिटारा अपने पास बंद करके रखे रखते हैं और जरा सी भी चूक पर उन्हें कोसने से बाज़ नहीं आते ! हम ऐसा क्यों करते हैं ?कुछ अपवाद छोड़कर मैं कहता हूँ कि या तो हमें अपनी जमा पूंजी में से कुछ हिस्सा अपने लिए सुरक्षित रख कर संतुष्टि से जीवन व्यतीत करना चाहिए और अगर नहीं भी है कोई पूंजी हमारे पास तो ईश्वर ने हमें जो यह शरीर दिया है ,दिमाग दिया है उसका इस्तेमाल करके अपने लिए दो वक़्त कि रोटी का जुगाड़ तो कर सकते हैं न ?क्यों हम इतने आश्रित हो जाते हैं अपने बच्चों पर कि खुद को पंगु बना लेते हैं?और फिर कोसने लगते हैं अपने ही बच्चों को ? आज जरुरत है तो थोड़ी सी समझदारी और अपने आत्मसम्मान को बरकरार रखने की ताकि हम खुद को असहाए न समझ सके ! अपने बड़े होने के अहंकार को दरकिनार करके ही छोटों से सम्मान पाया जा सकता है !मैं आज शुक्रगुजार हूँ अपनी बहू का जिसने मुझे और मेरी पत्नी को आत्मसम्मान के मार्ग पर चलने की दिशा दिखाई ताकि मैं फख्र से अपनी बाकी बची ज़िन्दगी जी सकूँ !दोस्तों ,इसी बहू को एक वक़्त मैंने स्वीकार करने में हिचकिचाहट दिखाई थी, क्यूंकि हम अक्सर जातीय विजातीय के आडम्बरों में खुद को घेरे रखते हैं और इंसान को पहचानने में देर लगा देते हैं !मैं भी इन्हीं उलझनों से घिरा था पर आज उसी बहू ने बेटी बन कर हम माँ बाप को जीने की वजह दिखाई !मेरी इल्तेज़ा है सब से कि बेटों के साथ दोस्ती का और बहू के साथ बेटी का रिश्ता बना कर देखो ज़िन्दगी अपने आप स्वर्ग बन जाएगी!अंत में इतना ही कहूँगा मित्रगण....

..
   ''मेरे हौसलों को अब तुम चुनौती मत देना ...!!
कि यारों मुझ में अभी हिम्मत है बाकी ''..!!

एक बार फिर तालिओं के साथ देव प्रकाश जी का स्वागत हुआ ! उनकी बातों को सुनकर कुछ ने अश्रुपूरित आँखों से स्वीकृति दी तो कुछ लोगो मन ही मन में ठान लिया कि अब वो भी आत्मसम्मान की ज़िन्दगी जीयेंगे !खुद भी स्वच्छंद रहेंगे और अपने बच्चो को भी स्वच्छंद आकाश में उड़ने के लिए मुक्त कर देंगे !

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रचनाकार: रश्मि तारीक की कहानी - आत्मसम्मान
रश्मि तारीक की कहानी - आत्मसम्मान
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