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हरीन्द्र दवे का धारावाहिक उपन्यास : वसीयत 5

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सुप्रसिद्ध गुजराती कवि, विवेचक, पत्रकार, उपन्यासकार स्व. श्री हरीन्द्र दवे के उपन्यास 'वसीयत' का हिंदी अनुवाद धारावाही रूप में (किश्...

सुप्रसिद्ध गुजराती कवि, विवेचक, पत्रकार, उपन्यासकार स्व. श्री हरीन्द्र दवे के उपन्यास 'वसीयत' का हिंदी अनुवाद धारावाही रूप में (किश्तों में ) प्रस्तुत कर रहे हैं श्री हर्षद दवे. प्रस्तुत है चौथी किश्त.

पहली किश्त | दूसरी किश्त | तीसरी किश्त | चौथी किश्त

 

वसीयत – ५ – हरीन्द्र दवे – भाषांतर : हर्षद दवे

---------पृथ्वी ने दरवाजा खोला.

पेंट-शर्ट में एक आदमी उस के सामने खड़ा था. उसने विनयपूर्वक कहा: ‘सोरी, आप को कष्ट दे रहा हूँ. लेकिन क्या आप का कुछ वक्त ले सकता हूँ?’

उस आदमी की आवाज का लहजा अभी अभी फोन पर सुनी हुई आवाज से बिल्कुल भिन्न था. पृथ्वी ने पूछा: ‘आप__’

‘आप को पहले से बताये बगैर ही चला आया हूँ. परन्तु समय रहते बात करने की गुंजाइश ही नहीं थी, न तो उसका कोई मतलब था. आप होटल में है यह में जानता था. और आप से मिलना मेरे लिए जरुरी था.’ उस ने रूम में प्रवेश करते हुए कहा.

रूम का दरवाजा बंद करते हुए पृथ्वी ने संदिग्ध आवाज में पूछा: ‘अभी आपने फोन नहीं किया था?’

‘नहीं, आप मेरी आवाज पहली बार सुन रहे हैं. क्यों किसी ने आपको मेरे नाम से फोन किया था?’

‘मैं आपका नाम कहाँ जानता हूँ कि आपके सवाल का जवाब दे पाता?’ पृथ्वीसिंह ने हंसकर कहा. मन ही मन वह कुछ हताश हुआ था. कुछ देर पहले सुनी मोटी सी आवाज में कुछ अपनापन था. इस अपरिचित आदमी की आवाज में मधुरता के साथ साथ शुष्कता भी थी. पृथ्वीसिंह ने कहा: ‘बैठिये. मैं आप के महानगरों के आतिथ्य की रस्में नहीं जानता, इसलिए सीधे ही पूछ लेता हूँ. चाय लेंगे या कोफ़ी?’

‘नहीं, थेंक यू. बाय द वे, अभी किस का फोन आया था?’ उस आदमी ने सोफे पर बैठते हुए पूछा.

‘अनजान लोगों को फोन कर के सीधे मिलने चले आ कर आप लोग ऐसी उलझन में डाल देते हो कि मुझे नाम पूछना तक याद नहीं आता. न मैंने उस फोन करनेवाले का नाम पूछा, न आपका. मेरा नाम पृथ्वीसिंह है, आप का?’ सामने की कुरसी पर बैठते हुए पृथ्वीसिंह ने कहा.

आगंतुक हंसा. उसने जेब से आइडेन्टीटी कार्ड निकाला. ‘इन्स्पेक्टर न्यालचंद राजपूत, राजस्थान स्टेट पुलिस, जयपुर.’ ऐसा परिचय उसमें दर्शाया गया था. कार्ड पर जो तसवीर नजर आ रही थी वह आनेवाले की ही थी. पृथ्वीसिंह ने आइडेन्टीटी कार्ड लौटाते हुए कहा: ‘ वेलकम इन्स्पेक्टर साहब, कहिये, मैं आप के लिए क्या कर सकता हूँ?’

‘मुझे कुछ सवालों के जवाब चाहिए.’

‘अभी हाल?’

‘हाँ, जहाँ तक संभव हो अभी हाल.’

‘पुलिस में मानवता कम होती है ऐसा मैंने पढ़ा था. आप दिखने में सज्जन लगते हैं. क्या आप को पता है कि मैं अभी अभी सीधा स्मशानगृह से आ रहा हूँ?’

‘हाँ, जो कुछ भी हुआ है उस से मैं काफी व्यथित हूँ. आप को इस वक्त प्रश्न करने पड़ रहे हैं इस बात का मुझे भी दुःख है, किन्तु हमारे व्यवसाय को देखते हुए मुझे इसी समय आप से कुछ पूछना आवश्यक लगता है.’

‘क्यों?’ पृथ्वीसिंह ने आश्चर्य दर्शाया.

‘इस शहर में आप अभी नए हो. आप के सोलिसिटर ने अभी आप के साथ पेशे से सम्बंधित कोई बात नहीं की है. आप के वकील के बतौर कौन रहेंगे यह भी मैं नहीं जानता. अभी आप को धाराशाश्त्रीओं से सलाह-मशविरा भी नहीं हुआ है. इसलिए आप से पूछताछ करने का यही उचित समय है.’

‘आप मेरा पीछा कर रहे हैं?’ पृथ्वीसिंह ने चौंक कर पूछा.

‘जवाब अप्रिय है फिर भी कहता हूँ: हाँ, किन्तु सिर्फ आप ही का नहीं, और भी कुछ लोगों का हम पीछा कर रहे हैं. मामला ही कुछ पेचीदा है. आप तो जानते ही हैं.’

‘आप गलत ठिकाने पर आये हैं, इन्स्पेक्टर. अभी मेरी सब से बड़ी परेशानी यह है कि मैं कुछ भी नहीं जानता.’ पृथ्वीसिंह ने कहा. उसे लगातार उस ‘हितचिन्तक’ की याद आती रही. यदि वह पहले आ गया होता तो शायद यह मुलाकात कुछ कम परेशानी वाली हो जाती. ‘ कहीं वह अचानक आ धमका तो.’ और ‘यदि वह सरदार होगा तो उस आदमी का मेरे साथ क्या रिश्ता है इस के बारे में कुछ गलत-सलत अनुमान तो नहीं लगा लेंगे?’ यह प्रश्न उसे सता रहा था.

‘सरदार पृथ्वीसिंह...’

‘एक यतीम लड़के के लिए यह जातिवाचक संबोधन भी काफी बड़ा लगता है, इन्स्पेक्टर साहब, केवल पृथ्वीसिंह कहेंगे तो...’

‘मैं श्रीमती मोहिनी पंडित के वसीयतनामे में लिखे हुए नाम का प्रयोग कर रहा हूँ, ठीक है न?’

‘आप ही ने कहा न, इन्स्पेक्टर साहब, कि अभी मुझे किसी धाराशास्त्री की सलाह मिली नहीं है. वसीयतनामे की केवल बात सुनी है मैंने. अभी तक मैंने उसे पढ़ा नहीं है. अब पढ़ने को मन ही नहीं करता. आप भी एक यतीम लड़के को ये जायदाद कैसे मिल गई ऐसा कुतूहल दर्शाने के लिए ही आये हैं?’ पृथ्वीसिंह ने कहा. उस की आँखों में अश्रु उभर आएं.

इन्स्पेक्टर की आवाज भी नम हो गई. ‘नहीं पृथ्वीसिंह, मुझे वसीयत या संपत्ति में दिलचस्पी नहीं है. मेरा प्रश्न यह है कि श्रीमती पंडित की हत्या हुई है. उसकी मृतदेह को आप अभी अग्नि को सौंप कर आ रहे हैं. मैंने जब श्रीमती मोहिनी पंडित को देखा तब वह निश्चेतन – मृत थी. उसकी मृतदेह पर मैंने इन्क्वेस्ट की थी. उस की पोस्टमोर्टम की रिपोर्ट के बाद उसकी देह को बैंगलोर भेजने में ‘नो ओब्जेक्शन सर्टिफिकेट’ भी मैंने ही दिया है. अब उन के हत्या करनेवाले तक मुझे पहुंचना है. मैंने आप के मर्मस्थान पर चोट पहुंचाई हो तो माफ करना, पृथ्वीसिंह, परन्तु वसीयत के साथ मेरा कोई सम्बन्ध नहीं. मेरा आप से एक ही प्रश्न है कि आप श्रीमती पंडित को कैसे जानते है?’

‘इन्स्पेक्टर, मैं उन्हें जानता ही नहीं.’

‘फिर__’

‘फिर वो मुझे अपना वारिस क्यों नियुक्त करती गईं यही आप पूछना चाहते हैं न? सब को इसी बात पर आश्चर्य है. मैं खुद भी हैरान हूँ.’

‘आप को आप के जीवन में कभी भी इस स्त्री के साथ संपर्क में आना हुआ हो, कहीं आपने उनका कोई काम किया हो ऐसा कुछ याद आता है?’ इन्स्पेक्टर न्यालचंद ने प्लास्टिक के कवर से निकाल कर एक तसवीर पृथ्वीसिंह के हाथों में रखी. तसवीर में एक पतली सी, सुन्दर – सुडौल स्त्री कमीज-सलवार पहने खड़ी थी और उसके चेहरे पर प्रसन्न स्मित था. यह चेहरा कहीं, पूर्वजन्म में उसने देखा हो ऐसा आत्मीय लग रहा था. परन्तु इस जन्म में यह स्त्री उसे कभी नहीं मिली. उसने कहा: ‘काश! मैं इस स्त्री से आँखे मिला पाया होता! तो आज मुझे उन का मेरे प्रति जो असीम स्नेह था उस का रहस्य मैं जान पाता!’

‘यह स्त्री पंजाब की है. आप वहां कभी उन के पिता के परिवार के परिचय में आये हैं?’

‘साहब, वह दौलतमंद और समृद्ध खानदान था ऐसा कहा जाता है. हम अनाथाश्रम के बच्चे जब चन्दा मांगने निकलते थे तब कभी ऐसे दौलतमंदों के वहां जाते थे. कहाँ कौन से परिवार की चौखट पर हमने ‘ये दीन अनाथ की मदद करें’ ऐसी बिनती करते हुए पंजाबी भाषा के गीत गाये थे, वह आज याद नहीं. आप ही कहिये साहब, जयपुर के किसी अनाथाश्रम का बच्चा मेहमान बनकर कभी आप के घर भोजन करने आया है? कभी आप ने ऐसा महसूस किया है कि ऐसे एक-दो यतीम बच्चों को उनका भी कोई घर है ऐसा एहसास दिलाऊं? तो फिर इस पंजाबी परिवार का परिचय मुझे हो ऐसी कल्पना भी कैसे की जा सकती है?’

इन्स्पेक्टर न्यालचंद की आँखें एक बार फिर सजल हो गईं. वे खड़े हुए. पृथ्वी भी खड़ा हुआ. वे पृथ्वीसिंह के पास गए. उस का हाथ अपने हाथों में ले कर दबाया और कुछ देर तक उसकी आँखों में आँखें डालकर देखते रहे. फिर कहा, ‘पृथ्वी, मैं फर्ज निभाने आया था, पर तुम्हारा मित्र बनकर जा रहा हूँ. जयपुर आओ तब मोहिनी पंडित के वारिस की हैसियत से नहीं, परन्तु मेरे युवान मित्र के तौर पर मैं तुम्हें अपने घर आने की दावत देता हूँ.’

पृथ्वीसिंह ने चैन की सांस ली.

इन्स्पेक्टर की उपस्थिति में वह ‘हितचिन्तक’ नहीं आया उस बात की उसे खुशी थी. न जाने क्यों उसे ऐसा लग रहा था कि इस इन्स्पेक्टर के साथ उस आदमी की जमेगी नहीं. पंजाबी भाषा में उसने उस व्यक्ति के साथ की हुई बात उसे रह रह के याद आती थी. ‘मैं नजदीक से ही फोन कर रहा हूँ और अभी आ रहा हूँ’ ऐसा उसने कहा था. अभी तक वह क्यों नहीं आया? वह खिड़की के पास गया. खिड़की बंद थी. सेंट्रली एअरकंडीशंड रूम था. बाहर अब शाम ढल चुकी थी. रास्ते की बत्तियाँ अलग अलग तरह के आकार बनातीं थीं. उस को ऐसा लगा ‘अब वह अज्ञात ‘हितचिन्तक’ आएगा ही नहीं.’ वह फोन के पास जा कर कुछ खाने का ऑर्डर देनेवाला था कि द्वार पर दस्तक हुई.

वह उठा. दरवाजा खोला. सामने एक तगड़ा आदमी खड़ा था. उसने पंजाबी में कहा: ‘उस इन्स्पेक्टर की वजह से मुझे कुछ देरी हो गई. मुझे विश्वास था कि तूं मेरी राह देख रहा होगा.’

पृथ्वी आगंतुक की ओर देखता रहा. वह मध्यम उम्र का था. उस के सिर के बाल सफ़ेद भूरे से थे. चेहरे पर उम्र का असर नहीं दिखता था. उस का चेहरा, उस की धारदार नाक एवं आगे निकली ठोड़ी की वजह से कुछ अलग ही दिखता था. उस की आँखें तेज एवं पैनी थीं. उसके होंठ मोटे थे. वह आकर्षक न होते हुए भी प्रभावक था.

आनेवाले ने ही दरवाजा बंद किया और पृथ्वी के कंधे पर हाथ रखकर बोला: ‘इस अपरिचित शहर में तुझे, बिना बाप के लड़के को, सब काफी परेशान कर रहे हैं, सही बात है न? परन्तु अब फ़िक्र करने की कोई जरूरत नहीं है. मैं जो आ गया हूँ.’ और फिर उसने रूम में इधर उधर देखा और सोफे पर बैठ गया और फिर पृथ्वी का हाथ खिंच कर उसे अपने पास बिठाया. ‘पृथ्वी’, तुम ने कहीं किसी को कुछ भी लिख के तो नहीं दिया है न?’ उसने अधीर हो कर पूछा, ‘और यह राजपूत क्यों आया था यहाँ?’

‘कौन राजपूत?’

‘अभी आया था वह – इन्स्पेक्टर न्यालचंद राजपूत. कल से यहीं पर है.’

‘आप उसका पीछा कर रहे हैं या उस ने पीछा करने के लिए रखे हुए आदमियों में से आप एक हैं?’ पृथ्वी ने पूछा और वह उठ बैठा. आगंतुक उसकी ओर देखता रहा. पृथ्वी ने सामने वाली कुर्सी पर बैठते हुए कहा: ‘आप मेरा नाम जानते हैं. आप कौन हैं? आप यहाँ क्यों आये हैं?’

‘मैं तुम्हारा मित्र हूँ. तूं यहाँ अज्ञात भेदियों के बीच फंसा हुआ है. सब को लगता है कि एक बिना बाप का लड़का इतनी दौलत का मालिक कैसे बन बैठा? सब तुझे कुछ उपेक्षा से एवं कुछ तिरस्कृत इर्ष्या से देखते हैं.’

‘आप को कैसे पता?’

‘मुझे यह भी मालूम है कि अभी तू भूखा बैठा है. तुझे किसी ने खाने तक को नहीं पूछा है.’

पृथ्वीसिंह उस की ओर देखता रहा.

‘अब तुझे थोड़ी देर और भूखा रहना होगा, मैं यहाँ हूँ तब तक कुछ भी मंगवाने की जरुरत नहीं. यहाँ खंड में मैं तेरे साथ बैठा हूँ इस बात का पता किसी को नहीं लगना चाहिए.’

’क्यों? आप ऐसा बर्ताव कर रहे हैं जैसे कि आप इस होटल के मालिक हो. जैसे मुझे बरसों से जानते हो ऐसे हक के साथ आप बातें करते हैं. आप कौन हैं? आप ने कहा कि आप मित्र हो, हितचिन्तक हो. किन्तु आपका क्या कोई नाम नहीं है?’

‘नहीं, मेरा कोई नाम नहीं. इस समाज में कभी नाम के बगैर भी व्यर्थ घूमने के कर्तव्य का पालन करना पड़ता है.’

‘आप पंजाबी भाषा अच्छी तरह से बोल लेते हैं. आप कहाँ से हैं?’

‘वक्त आने पर सब मालूम हो जाएगा. मैं कौन हूँ यह भी तू जान पाएगा. तब तुझे खुशी होगी. तू गलत आदमी से नहीं मिला. तुझे संत लोंगोवाल ने कहा था कि पंथ को तेरे जैसे युवकों की जरुरत है. तू पंथ को मत भूलना. यह सन्देश तुझे सदा याद रहे इसीलिए वाहे गुरूजी ने मुझे तेरे पास भेज दिया है. वाहे गुरूजी का खालसा, वाहे गुरूजी की फतह.’

पृथ्वीसिंह चौंका. यह आदमी मेरे बीते हुए कल की बातें भी जानता है. कौन है यह आदमी? वह कहीं पर जरा सा भी संकेत नहीं दे रहा अपने बारे में. उस ने दाढ़ी बढ़ाई नहीं है फिर भी ‘वाहे गुरूजी की फतह’ की बातें कर रहा है.

‘आप सीख हैं?’

‘हाँ, परन्तु अभी गुप्त भेष में फिर रहा हूँ इसलिए, गुरु के ध्येय के लिए, दाढ़ी-मूंछ कटवा के छिपते छिपाते रहना पड़ता है.’

‘क्यों छिपते छिपाते रहना पड़ता है? क्यों?’

‘पंथ के लिए. पंथ का नाम रोशन करने के लिए. पंथ के सामने हो रहे अन्याय के खिलाफ लड़ने के लिए. हरमंदिर साहब की प्रतिष्ठा के लिए. अमृतसर पवित्र नगर घोषित हो इस लिए. सीख जाती सीख पंथ का विकास कर सके ऐसा शासन सीख राष्ट्र में कर सके इस लिए. इस लिए मैंने अपना नाम भूला दिया है. मैंने मेरे जीवन को आग लगा दी है. मैंने अपने प्रेम को, अपने प्यार को कुचल कर मार डाला है. जाति पहले – बाकी सब बाद में. पंथ पहले, बाकी सब कुछ बाद में.’

पृथ्वीसिंह को धीरे धीरे इस मोटी आवाज में बोले जा रहे शब्दों का नशा चढ़ रहा था.

‘तूं लुधियाना में रहता था. तुझे मालूम है कि सीख गुरूद्वारे में सिगरेट के पैकेट फेंके जाते है?’

‘हिंदू मंदिरों में गाय की पूंछ भी तो फेंकी जाती है.’

‘गलत. तेरे जैसा युवक भी हिंदुओं के प्रचार की असर में है. लेकिन जाने दे, बाद में इस के बारे में बात करेंगे. अभी पंथ का अस्तित्व भय में है. पंथ को तेरे जैसे युवकों की जरुरत है. तुझे करोड़ों की जायदाद मिलनेवाली है, वह मोहिनी पंडित ने नहीं दी. वाहे गुरु की कृपा से उसे वसीयत में तेरा नाम रखने की प्रेरणा हुई है. इस संपत्ति के एक एक पैसे का हिसाब पंथ तुझ से मांगेगा. पंथ के लिए ही तुझे जीना है.’

पृथ्वीसिंह इन शब्दों को शराब की तरह पी रहा था. इस आदमी की सख्त सी लगती, एक सी लग रही आवाज में जैसे कोई जादू था.

‘पृथ्वी,’ उस ने कहा.

‘जी.’

‘फिलहाल मेरा नाम त्यागी है. निहाल त्यागी, निहाल सिंह नहीं. मैं पंजाबी हिंदू हूँ ऐसा ही बर्ताव तुझे रखना है. जहाँ तक संभव हो वहाँ तक मेरे बारे में किसी से बात मत करना. परन्तु यदि कोई तुझे मेरे साथ देख लेता है तो निहाल त्यागी तुझे मिला था ऐसा ही कहना. किसी भी स्थिति में घबराना नहीं. मुझे याद करना.’

‘त्यागी साहब, अलाउद्दीन के चिराग को घिसने से प्रकट होते जीन की तरह आप प्रकट होंगे या अलीबाबा वाला ‘खुल जा सिम सिम’ कहने से आप आ जाएँगे?’

‘लड़के,’ निहाल की आवाज सख्त हुई, ‘मेरे साथ ज्यादा स्मार्ट बनने की कोशिश मत कर. तुझे मैं अपना ठिकाना देता हूँ. परन्तु इस के पहले तुझे एक सौगंध लेनी है.’ निहाल ने जेब से श्री गुरु ग्रन्थ साहिब का गुटका निकला. फिर अपनी हथेली में उसे रखकर पृथ्वी का हाथ उस पर रखवाया: ‘जान चली जाए फिर भी मेरे बारे में किसी को कोई भी बात कहने की नहीं है.’

धार्मिक और भावनाशील पृथ्वी ने गुटके पर हाथ रखकर कहा: ‘आप के बारे में कोई भी बात किसी से भी नहीं कहुंगा.’

निहाल ने कहा: ‘मैं तुझे एक नंबर देता हूँ...वह तुझे याद रह जाए ऐसा है. तू अगर इसे कहीं भी लिखे तो उस में से दो अंक बदल कर लिखना. जैसे कि पहला अंक तीन है तो उसे पांच लिखना. तीसरा अंक सात है तो उसे नौ लिखना. फोन करते समय पहले और तीसरे अंक में से दो घटाना याद रखना. यह नंबर अंजुम गेस्ट हाउस का है. वहां पूछना: ‘त्यागीजी हैं?’ तुझे जवाब मिलेगा ‘यहाँ पर कोई त्यागी नहीं है.’ बस, इस के बाद कुछ देर में मेरे फोन का इन्तजार करना.’

‘आप मित्र हैं, मेरे हितचिन्तक हैं. पंथ की रक्षा के लिए जान की बाजी लगा रहे हैं. दरअसल आप कौन हैं?’ पृथ्वी ने पूछा.

‘वक्त आने पर सब मालूम हो जाएगा. मुझसे पूछे बिना किसी कागज़ पर दस्तखत नहीं करना. हाँ, एक बात याद रखना कि अमीन हमारा मित्र हैं.’

‘आप उनको जानते हैं?’

‘हाँ, परन्तु वह मुझे नहीं जानता. दिवाकर पंडित की एवं मोहिनी की तमाम जायदाद पर तुझे दावा करना है. इस प्रकार के दावे को दर्शाता आवेदन लेकर अमिन शायद तेरे पास आएगा. तूं ने वकालत की पढ़ाई की है. ठीक से पढ़कर उस आवेदन पर दस्तखत करना. परन्तु अन्य किसी समझौते या प्रस्ताव पर दस्तखत करने से पहले मुझसे पूछना.’

निहाल के शब्दों में जैसे कोई आदेश हो ऐसा कुछ था. इस प्रकार उसके साथ बात करनेवाला यह आदमी कौन होगा इस का विचार करने का मौक़ा पृथ्वी को मिले उस से पहले वह आदमी दरवाजा खोलकर चला गया. दोनों छोर पर सुनसान कोरिडोर के आलावा कुछ नहीं था.

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‘शेफाली, तुझे इस कागजात पर दस्तखत करने है,’ कृष्णराव ने कहा.

‘क्या है?’ शेफाली ने पूछा. ‘मुझे कायदे के ऐसे कोई झगड़े में दिलचस्पी नहीं है, मैं मुंबई जा कर अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहती हूँ. मुझे डॉक्टर बनकर सब की सेवा करनी है. डॉक्टर अंकल की यह एक ही विरासत काफी है मेरे लिए. अन्य किसी जायदाद के लिए मैं झगडा करना नहीं चाहती.’

‘शेफाली, यह विरासत का सवाल नहीं है. डॉक्टर अंकल की पसीने की कमाई की संपत्ति यदि किसी अयोग्य आदमी के हाथों में चली जाये...’ कृष्णराव कह रहे थे, कि उन्हें बीच में रोक कर शेफाली ने कहा, ‘ पप्पा, आप उस आदमी को किस कारण से अयोग्य कहते हैं? क्या आप उसे जानते हैं? मोहिनी आंटी ने उसे बाकायदा अपना वारिस माना है.’

‘तू तैश में मत आ बेटी. मुझे तेरी संपत्ति में से फूटी कौड़ी भी नहीं चाहिए. परन्तु डॉक्टर अंकल की जायदाद का उपयोग उन की इच्छा के अनुसार ही होना चाहिए. बाकायदा जिस पर तेरा हक हो ऐसी कोई भी संपत्ति तू हाथ से निकल जाने दे और डॉक्टर अंकल को पसंद न हों इस प्रकार से कोई और इसका इस्तमाल करें यह उचित नहीं.’

‘किन्तु मैं___’

‘तू बहोत कुछ कर सकती है,’ कृष्णराव ने शेफाली की बात को काटते हुए कहा: ‘डॉक्टर अंकल मैसिव हार्ट अटेक में चल बसे. इस विषय में संशोधन करने के लिए एक बड़ा केन्द्र स्थापित किया जा सकता है. तू स्वयं कार्डियोलोजीस्ट बनकर इस केंद्र का संचालन कर सकती है. इस संपत्ति से तू या तेरा परिवार दौलतमंद हो जाए इसलिए यह आवेदन नहीं है, लीजिए बैरिस्टर साहब भी आ गए, तू उनके साथ ही बात कर ले.’

‘क्यों क्या हुआ शेफाली?’

‘अंकल, मैं डॉक्टर अंकल की और आन्टी की मौत के बाद वसीयत के इस झमेले से हट जाना चाहती हूँ, मुझे यह सब पसंद नहीं है. मैं तो पढ़ाई जारी रखने के लिए दो दिन में मुंबई वापस चली जाना चाहती हूँ.’

‘बेटी, तुम्हारी बात सही है, मैं भी इस झंझट में नहीं पड़ता. किन्तु इस जायदाद पर किस का हक लगता है यह तो तय करना ही चाहिए. जब तक यह तय नहीं हो जाता, तब तक हम अपना हक छोड़ नहीं सकते.’

‘ऐसा लगता है कि ईश्वर की मर्जी ही यह तय नहीं हो ऐसी होगी. मेरा कहना है कि मेरा हक मुझे मिले; मोहिनी आंटी का हिस्सा उन के वारिस को मिले. शेष सारी संपत्ति का दोनों की इच्छा के अनुसार ट्रस्ट गठित किया जाए.’

शेफाली के सुझाव से कृष्णराव का मुंह फीका पड़ गया. उन्होंने कहा : ‘यह तो अन्त में चली जा सके ऐसी चाल है, सर का पत्ता है यह चाल. शेफाली तुम्हारी बात सही है. परन्तु यदि मैं सामनेवाले के पक्ष का धराशाश्त्री होता तो कहता कि प्रतिवादी को अंगूर खट्टे लग रहे हैं इसलिए अपना हक त्याग रहे हैं. हकीकत में मेरे मुवक्किल का हक ही इस संपत्ति पर है.’

शेफाली सोच में डूब गई.

‘शेफाली, तू इस में हस्ताक्षर कर दे. कल हम ‘स्टे’ ले लेंगे.’

शेफाली पलभर के लिए रुकी. उसने अपने कक्ष में दीवार पर लगी डॉक्टर दिवाकर पंडित की छवि की ओर देखा और फिर हस्ताक्षर कर दिए.

कृष्णराव ने चैन की सांस ली. ‘शेफाली,’ उन्होंने कहा, ‘तुझे पता नहीं, किन्तु वह हम से पहले दावा दाखिल करनेवाला है.’

‘पप्पा, किसे पता है कि वह जायदाद किस के लिए निर्मित्त हुई है? उस का हक होगा तो उसे मिलेगी. मुझे इस बात पर कोई अफ़सोस नहीं.’

कृष्णराव फीकी हंसी हँसे और वे शेफाली के कक्ष से बहार निकल गए.

शेफाली सोचती रही: अभी कुछ दिन पहले मुंबई के हॉस्टल में वह शांति से अपनी पढ़ाई कर रही थी. कभीकभार डॉक्टर अंकल या मोहिनी आंटी के बारे में भी सोच लिया करती थी. अब अचानक सब बदल सा गया. डॉक्टर के बंगले के आउट हाउस में किराये पर रहते एक रिटायर्ड मिडल क्लास आदमी की बेटी की हैसियत से वह पली बड़ी हुई थी. सब उसे इस प्रकार से ही जानते थे. आज अचानक सब उसे लखपति नहीं, करोड़पति के रूप में देखने लगे थे. जो कभी उस के साथ दो चार आवश्यक शब्दों के सिवा ज्यादा बोलती नहीं थी ऐसी सहेलियां भी अब उसे मिलने के लिए आने लगी.

‘शेफाली, तू है बड़ी किस्मतवाली, डॉक्टरी का अभ्यास खत्म होने के साथ ही तूं एक नर्सिंग होम की मालकिन बन जाएगी. तुझे प्रेक्टिस ज़माने की भी जरुरत नहीं रहेगी.’ उसकी एक सहेली ने कहा.

‘अभी मैं प्रेक्टिस या नर्सिंग होम की फ़िक्र नहीं कर रही. अभी मुझे फ़िक्र है अपनी परीक्षा उत्तीर्ण करने की. मैं डॉक्टर बनूंगी यही बड़ी विरासत है. यही मेरा सब से बड़ा सौभाग्य है. और किसी भी चीज की जरूरत नहीं है मुझे.’

वह ऐसे जवाब देती थी और उसकी पीठ पीछे सब उसका मजाक उड़ाते थे और कहते थे: ‘एक बार पैसे हाथ में आने दो. देखते हैं फिर कैसे बदल जाएगी. अभी तो चापलूसी कर रही है कि मुझे जायदाद की परवाह नहीं.’

शेफाली इन प्रतिभावों से चौंक जाती थी. उसने संपत्ति की मात्रा के बारे में काफी कुछ सुना था. किन्तु विरासत एवं जायदाद का मानव पर इतना गहरा प्रभाव पड़ता होगा इस बात की तो उसे कल्पना ही नहीं थी. उसे वसीयत के पहलेवाले पप्पा ज्यादा पसंद थे. उस के आसपास के सारे मानव सम्बन्ध बिलकुल बदल गए हो ऐसा लगता था. सब कुछ कृत्रिम लग रहा था. वह अपनी माँ के पास गई. माँ अंदर के खंड में बैठकर कुछ गूंथ रही थी. माँ बहुत पढ़ी-लिखी नहीं थी. लोगों के बीच ज्यादा बाहर नहीं निकलती थी. उसने माँ की गोद में सिर रखा. माँ ने उसका सिर हाथ से सहलाया. उसके बालों में माँ की मुलायम उंगलियां फिरतीं रहीं. माँ ने एक शब्द भी बोले बगैर ही शेफाली को जैसे कह दिया: ‘बेटी, मैं तुम्हारी व्यथा जानती हूँ.’ माँ की गोद में सिर रख कर वह देर तक पड़ी रही. फिर सिर उठा के पूछा: ‘माँ, तूं मुझे बता कि मैं क्या करूँ?’

माँ ने मधुर हंसी के साथ कहा: ‘बेटी, डॉक्टर साहब साक्षात ईश्वर थे. मोहिनी प्रत्यक्ष देवी थी. उन की संपत्ति लक्ष्मी है. उस की पूजा करनी चाहिए. इस के लिए झगड़ा हो तो उनके जैसी देव-आत्माओं को कितना दुःख होगा?’

‘माँ, क्या मेरी तरह पंजाब से आये उस यतीम लड़के के दिल में भी घमासान मच गया होगा?’ शेफाली ने पूछा.

‘हाँ बेटी, वह लड़का अच्छा है. उस की आँखों में मैंने व्यथा देखी है. वह जब मोहिनी की मृतदेह को पुष्पहार चढ़ा रहा था तब उस के मनोभावों को यदि कोई व्यक्त करता तो ऐसा कहता: मुझे वसीयत का वारिस बनाने के बजाय काश यह नारी मुझे जीते जी मिली होती!

माँ में इतनी सारी सूझ-बूझ होगी इस की शेफाली ने कभी कल्पना ही नहीं की थी. उसने कहा : ‘माँ, आपने ऐसा कैसे मान लिया?’

‘अपने को कोई अज्ञात स्त्री इतनी सारी जायदाद का वारिस बनाकर छोड़ जाएँ, तब या तो वह माँ हो सकती है या महाभगवती! मोहिनी भगवती का अवतार थी; साक्षात् त्रिपुर सुंदरी की सी चमक उसके चेहरे पर थी.’

‘माँ हो सकती है या महाभगवती’ इन शब्दों की ध्वनि शेफाली के कानों में गूंजती रही.

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दूसरे दिन सवेरे बैंगलोर के हाईकोर्ट में दो आवेदन एक से ‘स्टे’ आर्डर के लिए पेश किये गए. बैरिस्टर मोहंती की सूचना के अंतर्गत धराशाश्त्री देव कामथ ने ये सारी जायदाद पर शेफाली का हक है और यह प्रमाणित हो तब तक जायदाद का अन्य किसी प्रकार से फैसला न हो ऐसा आवेदन दिया था. सोलिसिटर अमिन की सूचना के अंतर्गत राघव गोयडा वकील उपस्थित रहे थे और उसके आवेदन में दावा किया गया था कि वसीयत का सीधा वारिस सरदार पृथ्वीसिंह है. और इस दावे का समाधान न हो तब तक डॉक्टर पंडित या श्रीमती पंडित की किसी भी संपत्ति का अन्य किसी भी प्रकार से फैसला नहीं होना चाहिए.

न्यायाधीश ने कहा: ‘दोनों आवेदन एक सा ‘स्टे’ मांग रहे हैं. दोनों पक्ष की दलीलें समान हैं, इसलिए अभी मैं ये सारी संपत्ति का फैसला अदालत को सूचित किये बगैर करने का हक किसी को नहीं है ऐसा ‘स्टे’ जारी कर रहा हूँ. दोनों धाराशाश्त्रीओं को यह मंजूर होगा ऐसा मानता हूँ__’

‘मीलॉर्ड,’ बीच में ही तत्काल प्रविष्ट हुए एक धाराशाश्त्री ने कहा: ‘इस मुकद्दमे में एक ज्यादा महत्त्वपूर्ण पक्ष इस फैसले में शामिल नहीं किया गया है.’

न्यायाधीश को विस्मय हुआ. उन्होंने पूछा: ‘एडवोकेट हेब्बर, आप इस मुकद्दमे में किस की तरफ से उपस्थित हुए हैं? पहले से नोटिस दिए बगैर__’

‘मीलॉर्ड, इस मुकद्दमे में छानबीन कर रही राजस्थान पुलिस की ओर से मैं उपस्थित हुआ हूँ. मैं जानता हूँ कि मुझे पहले से इस मेटर का नोटिस देना चाहिए था. परन्तु इस मामले में तुरंत कुछ करने की जरुरत थी. दोनों पक्ष आज अदालत में उपस्थित होनेवाले हैं यह जानने के तुरंत बाद में मैं आया हूँ.’

‘कहिये.’ न्यायाधीश ने कहा.

‘यह मेरा आवेदन है, मीलॉर्ड, दरअसल महत्वपूर्ण प्रश्न वसीयत का नहीं है. महत्त्व इस बात का है कि इन में से एक व्यक्ति की याने की श्रीमती मोहिनी पंडित की हत्या हुई है.’

‘हाँ, यह सुविदित है.’

‘जो बात सुविदित नहीं है वह डॉ. दिवाकर पंडित के बारे में है. उनकी भी उसी रात मृत्यु हो गई. वे डॉक्टर थे. उनका पोस्टमोर्टम करनेवाले उनके ही मित्र है. इस मौत को संदिग्ध मौत मानी जानी चाहिए.’

न्यायाधीश के साथ साथ सभी चौंक उठे: ‘आप कहना क्या चाहते हैं?’

‘इन सब के पीछे कोई बड़ी साजिश है ऐसा मुझे लगता है. इसलिए यह सारी संपत्ति ज्युडीशिअल कस्टडी में ले लेनी चाहिए, यह मेरा आवेदन है.’

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रचनाकार: हरीन्द्र दवे का धारावाहिक उपन्यास : वसीयत 5
हरीन्द्र दवे का धारावाहिक उपन्यास : वसीयत 5
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