मोहसिना जिलानी की कहानी - फटी चादर

SHARE:

फटी चादर वो सफेद बुर्के में लिपटी हुई पाँच वर्षीय फज़लू का हाथ थामें तेज़ी से चल रही थी ।   फजलू के पैर, फिलिप फ्‍लॉप चप्‍पलों में जो उसक...

image

फटी चादर

वो सफेद बुर्के में लिपटी हुई पाँच वर्षीय फज़लू का हाथ थामें तेज़ी से चल रही थी  फजलू के पैर, फिलिप फ्‍लॉप चप्‍पलों में जो उसकी साइज से बड़ी थी धूल में अट रहे थे। खुले गरेबान की बड़ी सी शर्ट और घुटनों तक लटकी हुई नेकर- वो माँ का हाथ मज़बूती से थामे उसके तेज़ तेज़ कदमों का साथ देने की अनथक कोशिश कर रहा था। छोटे-छोटे ख़तरों ने उस नन्‍हें मस्‍तिष्‍क को घेर रखा था। अगर कहीं माँ का हाथ छूट गया तो वो खो जायेगा, और फिर उसे घर का रास्‍ता भी नहीं मालूम सीधी सड़क से निकल कर वो एक गली में प्रवेश कर गई। गर्मियों की सुनसान दोपहर, एक गली से दूसरी गली पार करते-करते वो पसीने में चूर हो चुकी थी, गर्म हवा की उल्‍झी-उल्‍झी साँसें उसके चेहरे को छू रही थी। हर तरफ सन्‍नाटा था, और गली सुनसान थी। लेकिन ख़दीजा एक ऐसी भीड़ में खो जाना चाहती थी जहाँ उसे कोई पहचानता न हो, चलते-चलते वो इतनी निढ़ाल हो गई कि उसे दम लेने के लिये रुकना पड़ा। फ़ज़लू इस बात से अंजान था कि आखिर वे कहाँ जा रहे हैं शायद माँ को बहुत ज़रूरी काम है, जब वो किसी ज़रूरी काम से निकलती है तभी उसके पैरों में इतनी तेज़ी आती है।

तेज़-तेज़ क़दमों से चलते-चलते एक बार फिर वो सपनों की दुनिया में लौट गई थी। पिछली रात शरफू की दी हुई गुलाबी साड़ी का खयाल उसकी खुरदरी उँगलियों में अजीब सी सन्‍तुष्‍टि का एहसास पैदा कर रहा था, सुलगते हुए गुलाबी रंग ने उसके शरीर में आँच सी लगा दी थी- और शरफू का प्‍यार छतनार बन कर उसके जलते तन को ठन्‍डक पहुँचा रही थी। लेकिन शादी की ये कैसी कड़ी शर्त थी “अपने बच्‍चे को कहीं ठिकाने लगा दे जब तक ये तेरे साथ है। मेरा तेरा निबाह नहीं उसने साफ़-साफ़ कह दिया था- ख़दीजा को अचानक फ़ज़लू के पिता का ख़याल आ गया। मज़दूरी करने एक दिन ऐसा निकला कि फिर वापस ही नहीं आया। कुछ दिनों बाद खबर मिली कि शहर में बच्‍चा ट्रक के नीचे आकर कुचल गया है। उस बस्‍ती में न जाने कितने लोग थे जो ऐसी दुर्घटनाओं का शिकार होते रहते हैं। उनके लिये ये अनहोनी बात न थी कि खदीजा इस ग़म को सीने से लगा कर बैठ जाती, रो धोकर संतोष कर लिया। वो इस बस्‍ती में अकेली न थी मुसीबतों ने जैसे उसका घर भी देख लिया था। वो सोचा करती, जब से फ़ज़लू पैदा हुआ था उस पर एक न एक मुसीबत टूटती रहती ये बच्‍चा उसके लिये भाग्‍यवान साबित नहीं हुआ था, मगर फिर भी अपना ख़ून था- गोद में लिये, सीने से चिपटाये वो घरों में बरतन धोती फिरती। पाँव-पाँव चलने लगा तब भी उसका आँचल पकड़े साये की तरह साथ-साथ था, अगर उसे अच्‍छा घर मिल जाये, अच्‍छे लोग मिल जायें तो क्‍या अच्‍छा हो, और अगर शरफ़ू मेरा हो गया तो उस जैसे चार बेटे और पैदा कर लूँगी अब तो मैं उसे पेट भर खाना भी नहीं दे सकती मगर... मगर इसे लेगा आख़िर कौन?

यतीमख़ाना या फिर चौधरी साहब जिनके घर वो बरतन धोती है। पर यूँ तो वो हर समय उसके सामने रहेगा। उसने घबरा कर सर ना में हिलाया... और ठंडी साँस भर कर सोचा... फिर मैं क्‍या करूँ आख़िर...।

वो बहुत देर तक सोचती रही, और अपने अन्‍दर उठने वाले तूफ़ान से लड़ती रही- मुहब्‍बत और ममता... दोनों टकरा रही थीं। सामने नुक्‍कड़ पर उसे नल नज़र आ गया वो बहुत प्‍यासी थी। सड़क पार करते-करते और नल तक पहुँचते उसने फैसला कर लिया था। उसका सर झुका हुआ था और मुहब्‍बत जीत गई थी वो बड़े पीर के मज़ार पर जा रही थी। जहाँ गुरुवार का मेला लगा था। उसने नल से ओक लगा कर पानी पिया, ये नल कब से टूटा पड़ा था। पानी हर वक़्‍त रिसता रहता था। किसने सफ़ेद कपड़े की एक चिंदी उसमें बाँध दी थी। पानी टप-टप बहता रहता, जैसे नल का न, हो चीखता चिल्‍लाता शोर मचाता नासूर।

“तू भी पानी पी ले... अभी दूर जाना है। कितनी गरमी है।” उसने फ़ज़लू को पुकारा वो पानी तक आया, छोटे-छोटे हाथों की ओक बनाकर... उनमें लबालब पानी भरा और बड़े मज़े में मुँह पर पानी से छींटे डालने लगा। चप्‍पलों में फँसे हुए पैरों पर पानी के छीटें पड़ने लगे और पैरों में लगी रेत साफ़ होने लगी।

“जल्‍दी कर” ख़दीजा बोली- फिर उसने अपने मैले बुर्के के कोने से उसके मुँह हाथ पोंछे और उसका हाथ पकड़कर फिर से सड़क पर निकल आई... उसके पास इतना वक़्‍त कहाँ था जो मुँह धोने जैसी बेकार हरकतों पर बर्बाद करती, अंधेरा होने से पहले उसे फ़ज़लू को ठिकाने लगा कर घर वापस आना था। चलते-चलते शाम के साये लम्‍बे होने लगे थे। न सूरज की तपिश कम हो रही थी, न ही शरीर को सुकून का एहसास हो रहा था। फिर दूर ही से शोर शराबे की आवाज़ सुनाई देने लगी। बडे़ पीर का मज़ार क�रीब आ रहा था। पीर साहब की करामात की बातें सारे गाँव में मशहूर थीं हर गुरुवार को लोग झुन्‍ड के झुन्‍ड में दूर-दूर से मज़ार पर आते, फूल बताशें क़ब्र पर चढ़ाते और मुरादें माँगते और मुरादें पूरी हो जाती तो मज़ार पर खाने पकाते, देगें चढ़ती, क़व्‍वालियाँ होतीं और कान पड़ी आवाज़ सुनाई न देती। सालों से ऐसा होता आया था, मगर ख़दीजा पहली मरतबा यहाँ आई थी । उसे मेले से कोई रुचि नहीं थी, वो तो यहाँ भीड़ में कुछ खोने आई थी।

मज़ार के आसपास- लाचार- अंधे, लूले, लँगडे़ और गूंगे फ़कीरों ने अपनी फटी हुई दरियाँ और मैली गोनिया बिछा दी थीं। अपने सामने खाने के बरतन फैलाये वे विचित्र-विचित्र आवाज़ें निकाल रहे थे। इतने सारे लोगों के हाथ पैर कटे हुए देखकर ख़दीजा को लगा जैसे पूरी कौम लँगड़ी और गूंगी हो गई हो। उसने अपने आप को लम्‍बे सफ़ेद बुर्के़ में अच्‍छी तरह से टाँक लिया उसकी घबराहट ख़त्‍म हो रही थी- वो सब उस जैसे थे, उससे भिन्‍न नहीं थे- वो उनमें से एक थी, मोतिया के गजरों, अगरबत्तियों और बिरयानी की मिलजुली सुगंध उसकी नाम में घुसी तो उसकी भूक चमक उठी। यहीं उन लोगों की लाइन में लग जाये, खाना बँटने ही वाला है- वो फ़कीरों की लाइन में उकड़ू होकर बैठ गई- फ़ज़लू भी झट से माँ के कंधे से लटक कर बैठ गया। उसने माँ को याद दिलाया- “मगर हमारे पास प्‍याला नहीं है- बिरयानी, कैसे खायेंगे?” कुछ खाने के लिये प्‍याला भी कितना ज़रूरी है- उसने चारों तरफ़ देखा, पास बैठे हुए एक टाँग वाले फ़क़ीर ने अपना तांबे का प्‍याला उनके आगे बढ़ा दिया।

“ये ले लो- खाना खाकर वापस कर देना- मेरे पास एक और भी है” फ़ज़लू ने फ़कीर को प्‍यार से देखा- “कितना अच्‍छा है ये!”

उसने जीवन में पहली बार इतनी स्‍वादिष्‍ट और इतनी ज़्‍यादा बिरयानी खाई थी। उसने चारों तरफ देखा, तो हर कोई खाने पर टूटा पड़ा था जैसे वे सब ज़िन्‍दगी भर के अभावों का बदला ले रहे हों- आखिर माँ हर दिन यहाँ क्‍यों नहीं आ जाती? उसने सोचा कैसी अच्‍छी जगह है, और ये कैसे अच्‍छे लोग हैं जो माँ से बिना काम कराये यूँ मुफ़्‍त में ख़ाना दे देते हैं। मेदे के साथ-साथ उसका सर भी भारी हो रहा था। और उसे बड़े ज़ोरों की नींद आ रही थी। माँ से लगकर वो ऊँघने लगा-मगर आँखे मूँदे-मूँदे माँ को छूकर देख लेता, मौजूद है या कहीं चली तो नहीं गई। चंद पलों में वो बेखबर सो रहा था। ख़दीजा ने उसे ज़मीन पर लिटा दिया- खाने की एक पोटली बनाकर उसके पास रखी और खुद ... अपने आपसे बोली, जैसे पास वाले फ़कीर को सुनाना चाहती हो। “ज़रा पीर साहेब से मुराद माँग लूँ- अभी आई” फ़ज़लू ने कसमसा कर आँखें खोलीं तो वह बोली-“आराम से सो जा मैं अभी आई”। “जल्‍दी आना अम्‍माँ”- वो नींद में बड़बड़ाया।

ख़दीजा का दिल एलार्म बन कर चीख़ रहा था जैसे अभी सीने की दीवार चीरकर बाहर निकल पड़ेगा। वो तेज़ तेज़ क़दमों से मेले से बाहर निकली और फिर तकरीबन वो भागने लगी। कहीं फ़ज़लू जाग न जाये- बाजे ताशे की आवाज़ उसका पीछा कर रही थी। वो पीछे मुड़ मुड़कर देख रही थी। एक गली से दूसरी गली में छिपती-छिपाती वो शरफू के पास जा रही थी। आखिरी बार उसने मुड़कर पीछे देखा और मुँह में बड़बड़ाई।

“पीर साहेब, मियाँ साहेब, मेरे फ़ज़लू की देखभाल करना। बड़े-बड़े आँसू आँखों के पोर भिगो गये- उसने हाथों से आँखों को मला।

चारपाई पर पड़ी हुई गुलाबी गोटा किनारे वाली साड़ी, चाँदी का जेवर और आईना उसका इंतज़ार कर रहे थे। शरफ़ू ने उसे अपनी बाहों में समेट लिया। एक सप्‍ताह कितना अच्‍छा लगा। खुशियाँ ही खुशियाँ, कोई फ़ज़लू को पूछता तो झट से कह देती। अपनी मौसी के गाँव गया है। बस आ जायेगा। और फ़ज़लू... दिन में न जाने कितनी बार चला आता, आइने में अपना मुँह देखते, रोटियाँ बेलते, झाडू़ देते और गायें को भूसा डालते वो चुपके से चला आता...

“माँ-माँ तू मुझे क्‍यों छोड़ आई? माँ मुझे अकेले डर लगता है... माँ..” वो सर झटक-झटक कर इस खयाल से पीछा छुड़ाती- दिन में जाने कितनी बार... दिल में छुपी हुई फाँसी की तेज़ी उसका जिगर काटकाट देती हाथ काम करते-करते रुक जाते- वो रोहाँसी हो जाती। लेकिन उस रात सारी की सारी फाँसें दिल के आर पार हो गईं। जिस रात उसने शरफू के साथ एक नई लड़की को देखा- वो उससे ज़्‍यादा कमसिन और उससे ज़्‍यादा सुन्‍दर थी। माँ-बाप ने उसे शरफू के हाथ बेच दिया था। या वो खुद चली आई थी उसे कुछ नहीं मालूम था।

वो नई नवेली दुल्‍हन की तरह लजाती- लाल कपड़े पहने, होंटों पर गुलाबी गहरा रंग लिये,आरसी, कंगन और चाँदी के गहनों से लदाफदी उसे यूँ देख रही थी जैसे कह रही हो। “अब तुम्‍हारा यहाँ क्‍या काम भला...” और शरफू ने इस खुशी में इतनी पी ली थी कि वो अपने होश हवास में नहीं था। “ये मेरी बीवी है... इससे ... मैंने निकाह कर लिया है” वो टूटे फूटे शब्‍द जोड़ रहा था। “अब तू अपने फ़ज़लू के पास चली जा... वो बहुत याद... आता था ना .... तुझे” वो कह रहा था।

ख़दीजा के तन का सारा खून सर-सर करता उसके सर में चढ़ गया..“ तू.. तू अपने होश हवास में नहीं है तेरे लिये मैंने अपने बच्‍चे को खो दिया। वो अटक-अटक कर कह रही थी। मैं तेरा क़तल कर दूँगी। तेरा खून पी जाऊँगी कमीने ज़लील।”

जवाब में शरफू के कहकहे उसके कान फाड़ने लगे। वो जितना चिल्‍लाती चीखती, शरफू उतना ही अधिक ज़ोरों से कहकहे लगाता- कहकहे बढ़ते रहे और नई नवेली दुल्‍हन मुस्‍कुराये जा रही थी। कोठरी में उसका दम घुटने लगा तो वो घबरा कर बाहर निकल आई- जब भ्रम टूट जाये तो क्‍या रह जाता है? उसे यूँ लगा जैसे वो मिट्टी की गुजरिया है, जिसकी सुनहरी मिट्टी जगह-जगह से झड़ गई है और उसे मोखल (ताक़) से उठाकर घूरे पर फेंक दिया गया है और उसकी जगह नई गुजरिया ने ले ली है। लोग ठीक कहते थे कि शरफू किसका हुआ जो तेरा होगा- इतना जल्‍दी न कर लेकिन ज़िन्‍दगी भर का अभाव और कच्‍ची उम्र की नातजु़र्बेकारियाँ उसका आँचल कस कर पकड़े थीं- शरफू उसके मस्‍तिष्‍क पर आंधी तूफान बनकर छा रहा था।

कहकहे रुक गये थे और हर तरफ़ दम घोंटने वाला सन्‍नाटा छा गया था, केवल सुहाग की चूड़ियों की छनक और पायल की दबी-दबी चीखें उसका दिल मसोस रही थीं, वो बाहर खुले आसमान तले गाय के खूंटे के पास चुपचाप बैठ गई- हवा दम साधे थी और घने पीपल के पत्ते खामोश थे। गहरे काले आकाश में दूर एक कोने में टंगा हुआ एक तारा उसके साथ रो रहा था। क्‍या उस आसमान पर ईश्‍वर रहता है? क्‍या वो किसी के साथ इंसाफ करता है- क्‍या बड़े पीर ने मेरे फ़ज़लू की देखभाल की होगी? वो न जाने कहाँ होगा। मैं उसे किधर ढूँढू अब? गाय ने जुगाली करते करते सर उठाकर ख़दीजा को हसरत से देखा, और उसके गले में पड़ी घण्‍टियाँ बज उठी- दोनों में कितनी समानता थी- दोनों बेजु़बान थीं और दोनों को ही विरोध करना नहीं आता है। दुख की एक गम्‍भीर चादर उनके सरों पर तनी हुई थी। दोनों बंधी हुई थीं और बगैर आँसुओं के रो रही थीं। दो सप्‍ताह के बिछड़े को माँ से दूर शरफू ने सिर्फ इसलिये बाँध दिया था। कि वो माँ का सारा दूध न पी सके और... माँ उसे बडीं हसरत से मुँह उठाकर उठाकर देखती और हृदय विदारक आवाजें निकलती रहतीं मगर उस घर में सब बहरे थे कौन सुनता? सारी रात वो गाय के खूंटे से लगी बैठी रही, जैसे पत्‍थर की हो गई हो। सुबह की पहली अज़ान कान में पड़ी तो उसने झट आँगन में बने चूल्‍हे के ऊपर खूंटी पर टंगे बुर्कें को उतारा और सर पर डालकर तेज़ी से बाहर निकल आई वो तेज़ी से पीर साहब के मज़ार की तरफ जा रही थी। उसकी टाँगों में बला की शक्‍ति आ गई थी। फ़ज़लू को ढूँढने निकली थी।

पीर साहब की सुरक्षा में जो देकर आई थी। वहीं कहीं होगा, जायेगा कहाँ आख़िर, मिल जायेगा, ज़रूर मिल जायेगा। वो उससे बहुत नाराज़ होगा। वो उसे मना लेगी, “मेरे बेटे, मेरे लाल, मैं तुझे अब अपने से कभी अलग नहीं करूँगी।”

मज़ार तक पहुँचने वाले पल सदियों पर ठहर गये थे- सुबह आते आते कितनी देर लगी थी। उसके दिमाग़ में आंधियाँ चल रही थीं। दिल जैसे फटा जा रहा था। मज़ार पर पहुँचकर वो बेदम सी हो गई।

“पीर साहेब! बडे़ पीर साहेब!!” वो कलेजा फाड़ कर चिल्‍लाई- “ मेरा फ़ज़लू कहाँ है?” वातावरण में ख़ामोशी के सिवा कुछ न था। “फ़ज़लू, फ़ज़लू तू कहाँ है?” -फ़ज़लू, फ़ज़लू तू कहाँ है रे?” उसने अपना सर क़ब्र पर ज़ोर से टकराया- सर लहूलुहान हो गया- “बता, बता मेरा फ़ज़लू कहाँ है?” मैं सब कुछ तेरी भेंट चढ़ा दूँगी, मेरे बच्‍चे को मुझे वापस दिलवा दे।” उसने अपने हाथों से काँच की लाल चूड़ियाँ उतारीं और बड़ी श्रद्धा से कब्र पर डाल दी- फिर उसने अपना बारीक गुलाबी दोपट्टा गले से खींचकर मज़ार पर फेंका- फिर अपनी शलवार, अपनी कमीज़ उतार फेंकी और छोटे-छोटे सारे कपड़े एक-एक करके कब्र पर ढेर लगा दिये- “ ये सब तेरी भेंट सब कुछ ले ले। मेरा फ़ज़लू मुझे वापस दे दे तेरे लिये कुछ मुश्‍किल नहीं।” वो पागल अन्‍दाज़ में इतने ज़ोर से चिल्‍लाकर रोई कि पीपल के नीचे सोया हुआ मुजबिर (पुजारी) जाग पड़ा और दौड़ा चला आया। “क्‍या हुआ? तू किस को तलाश कर रही है? अरे... अरे ये तू क्‍या कर रही है?” उसने अपनी आँखें मलमल कर देखा हवा के तेज़ झोकों ने सारे पत्ते झाड़ दिये थे और चन्‍दन की लुन्‍जमुन्‍ज डाली की तरह उसका जिस्‍म सुबह की हवा में कँपकपा रहा था। उसने जल्‍दी से अपने काँधों की फटी चादर उतारकर ख़दीजा के बदन पर डाल दी। “मुझे नहीं मालूम तुझे क्‍या दुख है, तुझ पर क्‍या गुजरी है? “मगर ... मगर ये न कर बहन, कपड़े पहन ले, हिम्‍मत से काम ले... मैं... मैं तेरे हाथ जोड़ता हूँ। दो वक़्‍त की रोटी मिल जाती है... वो भी छिन जायेगी।”

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: मोहसिना जिलानी की कहानी - फटी चादर
मोहसिना जिलानी की कहानी - फटी चादर
http://lh3.ggpht.com/-TIg2rHS1W9Y/UN6UtyJR_1I/AAAAAAAARVg/zG9KsBSENVs/image%25255B2%25255D.png?imgmax=800
http://lh3.ggpht.com/-TIg2rHS1W9Y/UN6UtyJR_1I/AAAAAAAARVg/zG9KsBSENVs/s72-c/image%25255B2%25255D.png?imgmax=800
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2012/12/blog-post_809.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2012/12/blog-post_809.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content