---प्रायोजक---

---***---

नीचे टैक्स्ट बॉक्स से रचनाएँ अथवा रचनाकार खोजें -
 नाका संपर्क : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी यहाँ [लिंक] देखें.

अर्जुन प्रसाद की कहानी - खून का कपट

साझा करें:

खून का कपट बालूगंज के शंकरलाल के तीन पुत्र थे। नागेंद्र, राजेश और सतीश। तीनों भाइयों में नागेंद्र सबसे बड़े थे और सतीश सबसे छोटे। उनके मँझल...

image

खून का कपट

बालूगंज के शंकरलाल के तीन पुत्र थे। नागेंद्र, राजेश और सतीश। तीनों भाइयों में नागेंद्र सबसे बड़े थे और सतीश सबसे छोटे। उनके मँझले भाई राजेश जहाँ बडे़ भोले-भाले श्रद्धालु और शिष्ट थे, वहीं दूसरे दोनों भाई बड़े ही चालाक कूटनीतिज्ञ और एकदम स्वार्थी थे। उन्हें राजेश बाबू और उनके बीवी-बच्चों से कोई सरोकार न था। माता-पिता को दुनिया से आँख मूँदते ही उनमें फूट पड़ गई और वे एक-दूसरे से अलग हो गए। उनके संस्कार तो अलग थे ही, विचार भी अलग-अलग था। नागेंद्र और सतीश एक साथ थे। राजेश बाबू अकेले और उनसे अलग-थलग थे। अलग होने के बाद फिर तीनों में कभी पटी नहीं।

नागेंद्र बड़े ही शातिर मक्कार और चालू किस्म के थे। उनकी नजर में सब कुछ रूपया ही था। वह कहते- बाप बड़ा न भइया, सबसे बड़ा रूपइया। राजेश की शरीर थी तो बहुत दुबली-पतली, पर थे वह खूबसूरत। बड़े ही नीतिज्ञ और विनम्र, सजजन पुरूष थे। वह रूपए-पैसे को अधिक महत्व न देते थे।

उनका विचार था कि भाई कैसा भी क्यों न हो, होता वह भाई ही है। फिर बड़ा तो बड़ा ही होता है। सतीश को वह पुत्रवत मानते। क्योंकि अनुज बड़े भाई के लिए बेटे के समान ही होता है। तिस पर भी नागेंद्र का स्वभाव बड़ा ही कठोर और अधार्मिक था। वह बड़े लोभी ओर कुमार्गी पुरूष थे। धर्म और दयाभावना उनमें बिल्कुल भी न थी।

पर, सतीश दोनों भाइयों से अलग ही थे। उनमें कहीं कोई समानता न थी। अपनी-अपनी ढपली और अपना-अपना राग। बल्कि यह कहें कि सतीश चंद्र बडे काहिल और दब्बू स्वभाव के थे। उनमें बुद्धि और विवेक नाम की कोई चीज ही न थी। नागेंद्र की आज्ञा का पालन आँखें मूंदकर करते। गुलाम की भाँति बिना किसी ना-नुकर के चुपचाप नागेंद्र का कहना मानते। बचपन से ही नागेंद्र उन पर पूरी तरह हावी थे।

सतीश के अंदर पुरूषार्थ का अभाव तो था ही, उनकी चाल-ढाल भी बड़ी बेढंगी थी। बड़े मनचले भी थे। उचित-अनुचित का उन्हें कोई फर्क ही न मालूम था। नागेंद्र जो कुछ भी कहते, दीन-हीन की तरह सुन लेते। बड़े कमजोर पुरूष थे। नागेंद्र से कुछ पूछने का साहस ही न कर पाते। बड़े ही मरदूद थे वह। माँ-बाप के रहते उनमें अगाध प्रेम था। सद्भाव और अपनापन था। घर में सब कुछ ठीक चल रहा था। कहीं कुछ भी गड़बड़ न था।

लेकिन, संसार से उनके विदा होते ही भाई से भाई विछड़ गया। आपस में बँटवारा हो गया। बाप-दादे की जमीन-जायदाद सब बँट गई। धन-दौलत और खेत, मकान बँटते ही जन्म-जन्म के बौरी की भाँति भाइयों के दिल भी बँट गए। देखते ही देखते मन रूपी चमन उजड़कर विखर गया। राजेश के दो पुत्र थे और एक पुत्री। काफी छोटा परिवार था। पति-पत्नी में लगाव और बड़ी मधुरता थी। कहीं कोई अभाव न था। तीनों बच्चे अच्छे-अच्छे स्कूलों में पढ़ते-लिखते थे। उनकी पत्नी करूणा मानो ममता की मूर्ति थी। कम पढी-लिखी होने पर भी उसके विचार बहुत अच्छे थे। वह एक कुलीन घराने की बेटी थी। घर में रूपए-पैसेां की अपार दौलत थी।

वहीं नागेंद्र बाबू का परिवार बहुत लंबा था। पूरे आधे दर्जन बच्चे थे। चार पुत्र थे और दो पुत्रियां। शायद, उनका वश चलता तो क्रिकेट की पूरी टीम ही तैयार कर देते। ऐसा नहीं और बच्चे पैदा ही नहीं हुए, पैदा तो हुए लेकिन, धनाभाव में उनका पालन-पोषण भलीभाँति ठीक प्रकार से न होने से असमय ही काल के गाल में समा गए। जो बच गए, उन्हें पढ़ाना-लिखाना तो दूर, दो वक्त की रोटी भी नसीब न होती थी। सबके कपड़े मौले-कुचैले ही रहते। फटे-पुराने वस्त्र पहनने के लिए वे बेचारे विवश थे। भूखमरी ओर तंगी के चलते नागेंद्र और उनकी पत्नी में सदैव खटपट होती रहती। राजेश के बच्चों का अच्छी जगह पढ़ना-लिखना देखकर वे मन मसोसकर रह जाते। पति-पत्नी के हृदय में बड़ी ईष्र्या उत्पन्न होती।

नागेंद्र की पत्नी कामिनी आए दिन उन्हें जली-कटी सुनाने लगती। कभी-कभी अपने तकदीर को कोसने लग जाती। नागेंद्र से वह जब भी शिकायत करती कि हमें और बच्चे नहीं चाहिए। जो हैं, उनका ही लालन-पालन बड़ी मुश्किल से हो पा रहा है। इतनी बड़ी फौज का गुजारा भला कैसे होगा? हमारे बच्चे आज के जमाने में भी चीथड़े पहनने को विवश हैं।

तब नागेंद्र तर्क देते कि ईश्वर ने जब जन्म दिया है तो वह पालेगा भी। तुम इतनी चिंता क्यों करती हो? तुम्हें इस बारे में फिक्र करने की कोई जरूरत नहीं। क्या तुम्हें यह नहीं मालूम कि बच्चे भगवान की देन है। जैसे एक आँख को भी कोई आँख कहते, वैसे ही एक पुत्र को पुत्र भी नहीं। अकेला चना भाड़ थोड़े ही फोड़ सकता है। तुम जरा उनके बारे में सोचो, जिन लोगों के पास एक भी बच्चा नहीं। उनका सारा जीवन रो-रोकर गुजरता है। ये जब बड़े होकर कमाने-धमाने लगेंगे तो लोग देखते ही रह जाएंगे। थोड़ा-थोड़ा भी कमाएंगे तब भी बहुत होगा। कैसी विडम्बना है कि कोई बच्चों से परेशान है और कोई एक बच्चे के लिए तरस रहा है।

अपने इसी सोच के चलते नागेंद्र धीरे-धीरे धनहीन और दरिद्र हो गए। किंतु सतीश नि:संतान ही थे। काफी देव अर्चना के बाद भी उन्हें कोई औलाद ही न नसीब हुई। इसलिए काफी सोच-विचार के बाद वह नागेंद्र की ओर मिल गए। नागेंद्र और सतीश ने आपस में मिलते ही राजेश बाबू को अकेला छोड़ दिया। परन्तु उनसे अलग-थलग होने पर भी उन पर कोई विशेष फर्क न पड़ा।

परिवार की गाड़ी पूर्ववत चलती रही। मनुष्य कितना स्वार्थी हो गया है कि दूसरे का पनपना देखकर वह मन ही मन कुढ़ने लगता है। भाई, भाई को भी भूल जाता है। उनका रहन-सहन देखकर दोनों भाइयों को राजेश के बीवी-बच्चों से द्वेष होने लगा उनके हृदय में ईष्र्या की ज्वाला भड़क उठी। उनके नीयत में खोट आ गई। नागेंद्र सोचने लगे- सतीश बे-औलाद हैं। उनकी सारी संपत्ति तो अपनी है ही। हर्रै लगे न फिटकिरी और काम भी चोखा। राजेश के हिस्से की खेती-बाड़ी और मकान भी अगर अपने नाम हो जाय तो क्या कहने? एकदम सोने पर सुहागा होगा। सतीश की दौलत और जमीन मिलने की पति-पत्नी को आशा तो थी ही। वे राजेश का हिस्सा भी हड़पने का उपाय सोचने लगे।

नागेंद्र और उनकी पत्नी राजेश बाबू को अपने विकास मार्ग का सबसे बड़ा काँटा समझने लगे। पाप ने घेरा तो नागेंद्र, सतीश और उनकी पत्नी नेहा को राजेश बाबू के विरूद्ध भड़काना शुरू कर दिए। आहिस्ता-आहिस्ता कुछ और वक्त बीतने के बाद वह राजेश को रास्ते से हटाने की सोचने लगे। दोनों भाई अपनी-अपनी पत्नियों के साथ मिलकर षड़यंत्र रचने लगे। खून अपने खून के साथ ही छल-कपट करने की जुगत में व्यस्त हो गया।

सतीश को सच-झूठ और न्याय-अन्याय का कोई ज्ञान तो था नहीं। नागेंद्र जो कहते, मान लेते। ना-नुकर बिल्कुल भी न करते। सिर झुकाकर बड़े भाई की बड़े अदब से हामी भर देते।

नागेंद्र ने उन्हें इतना अधिक उसकाया कि सतीश की पत्नी नेहा ने एक दिन पुलिस थाने में जाकर राजेश और उनकी पत्नी करूणा के खिलाफ एक बे-बुनियाद और झूठा मुकदमा दर्ज करा दिया। उसने रिपोर्ट में राजेश और सुधा को नामजद करते हुए लिखाया कि मेरे मँझले जेठ राजेश और उनकी पत्नी करूणा मुझे पीहर से कम दहेज लाने के लिए मानसिक रूप से प्रताडि़त करने साथ-साथ शारीरिक रूप से भी तरह-तरह का अपार कष्ट देते हैं। वे मुझे नाहक ही आए दिन सताते रहते हैं। रात-दिन भाँति-भाँति की पीड़ा पहुँचाते हैं। जब होता है तब गाली-गलौज करते हुए दोनों मुझे डंडों से मारते-पीटते भी हैं। कभी-कभी वे हाथों से ही बाल पकड़कर मेरी ताबड़तोड़ पिटाई करते हैं। मेरी जान हरदम खतरे में है। मुझे शक है कि कहीं किसी रोज वे जान से ही न मार डालें।

थाने के दरोगा ठाकुर थानसिंह, राजेश के बड़े भाई नागेंद्र के परिचित थे ही। बड़े ही अन्याई और दुराचारी स्वभाव के थे। गरीब और शरीफों का गला रेतनें में बड़े अभ्यस्त थे। ऐसे लोगों को सताने में उन्हें बड़ा आनंद आता। हजार-दो हजार की लालच में न्याय ओर कानून को दिन दहाड़े ठेंगा दिखा देते। जनता से शिकायत मिलने पर बड़े-बड़े अफसर भी उनका बाल भी बाँका न कर पाते। बड़े नि:संकोची और रिश्वतखोर अधिकारी थे वह। नागेंद्र के मन मुताबिक मामला दर्ज करानें में सतीश और नेहा को ज्यादे मसक्कत न करनी पड़ी। आखिर चोर ने मौसेरे भाई का साथ खूब निभाया।

थानसिंह जबसे वहाँ के थाना प्रभारी बने, इलाके में गरीबों और शरीफों का जीना मानो मोहाल हो गया। किसी के दु:ख-दर्द से उन्हें कुछ लेना-देना न था। मुकदमा दर्ज होते ही नेहा का कथन सुनकर थानसिंह भड़क उठे। वह कहने लगे- अच्छा! तो उनकी यह मजाल कि मेरे इस थाने में रहते हुए भी वे तुम्हें इस कद्र सताएं? मेरा भी नाम ठाकुर थानसिंह है। इतना तेाड़ूंगा कि जिंदगी भर याद रखेंगे। उन्हें सारी उम्र जेल में सड़ा दूँगा। सबसे पहले तो जी भर मैं उनकी पिटाई करूँगा। जब मारते-मारते थक जाऊंगा तो उठाकर जेल में ठूँस दूंगा। वे भी क्या याद करेंगे? ऐसा कर दूंगा कि वे सौ बार सोचने पर विवश हो जायं कि किसी थानेदार से पाला पड़ा था।

दरोगा जी के हुक्म की तामील होते ही राजेश और करूणा आनन-फानन में हिरासत में लेकर गिरफतार कर लिए गए।थानसिंह पहले उन्हें दुश्मन की भाँति मारे-पीटे। रिश्वत ने न्याय का गला घोंट दिया। नायब कोर्ट दरोगा जी का मातहत तो था ही। सरकारी वकील सक्सेना जी भी उनके पक्ष में हो गए। पूरा अभियोजन अब राजेश और करूणा के खिलाफ था।

आखिर,जज साहब पति-पत्नी को जमानत देने में विवशता जाहिर कर दिए। फिर थानेदार साहब, पति-पत्नी को अदालत से चालान कटाकर उनकी जमानत का विरोध करते हुए हवालात भेज दिए। नागेंद्र इतने शातिर बदमाश थे कि गाँव का कोई आदमी या रिश्तेदार मारे डर के उनकी जमानत लेने को तैयार ही न हुआ। तारीख पर तारीखें पड़ती रहीं। मुकदमा लंबा खिंच गया। न्याय की सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया। इंतजार की घडि़या लंबी होती ही हैं। ये मनुष्य को चिंतामग्न कर देती हैं।

राजेश और करूणा हवालाती बनकर तब तक जेल में ही थे कि ढाई-तीन साल का समय बीत गया। राजेश बाबू के बच्चे कुछ दिन जरा-मरा ठीक रहने के बाद भूखों मरने लगे। उनके पुत्र-पुत्री माँ-बाप के जीते जी दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हो गए। राटियों के लाले पड़ने लगे। वे अपने माता-पिता को याद करके तड़प उठते। उनका दिन तो किसी तरह गुजर जाता पर, रात बीतने का नाम ही न लेती। तीनों बच्चें को उनकी चिंता सताने लगी। उधर कचहरी में गवाहियों का दौर चला तो सतीश और नेहा के साथ-साथ अन्य सभी सरकारी गवाहों ने भी हृदय पर पत्थर रखकर राजेश और करूणा के विरूद्ध ठोंककर गवाही दी।

तदोपरांत कोर्ट का फैसला भी आ गया और पति-पत्नी को सात-सात साल की कठोर कारावास की सजा हो गई। वे काल कोठरी में डाल दिए गए। वे जेल के जेल में ही रह गए। बच्चे उन्हें बहुत याद आते। उनकी याद आते ही वे सिहर उठते। दोनों प्राणी का कलेजा दहल उठता। उनके मुँह से आह निकल जाती। नेत्रों से अश्रुधारा बहने लगती। विवशतावश वे पंखहीन पक्षी की भाँति फड़फड़ाते रह जाते।

अदालती दंड मिलने के बाद नागेंद्र एक रोज उनसे मिलने जेल गए और हमदर्दी जताने की गरज से ढोंग का चोला ओढ़कर उन्हें झूठी तसल्ली देते हुए बोले- भाई, क्या करें? मजबूरी है। अच्छा-भला घर था। न जाने किसकी नजर लग गई। आज ऐसा दिन देखना पड़ रहा है। न जाने किसने सतीश का कान भरकर सारा खेल बिगाड़ दिया। लेकिन, तुम चिंता बिल्कुल भी न करो। रही बात बच्चों की तो उनकी फिक्र भी करने की जरूरत नहीं है। हम हैं न? हमारा भी कुछ फर्ज है। मैं उन्हें पढ़ाऊंगा, लिखाऊंगा। कोई तकलीफ न होने पाएगी। हम पर भरोसा रखो। आखिर हम तुम्हारे अग्रज हैं। वक्त-वक्त की बात है। धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा।

राजेश ने सोचा-जैसी बहे बयार पीठ तस दीजौ। खूँखार से खूँखार और खतरनाक, पशुवत मनुष्य भी कभी न कभी बदलता ही है। हो सकता है भाई साहब भी सुधकर रास्ते पर आ गए हों।

अत: संतुष्ट होकर वह सिर हिलाते हुए हामी भरकर बोले-ठीक है भाई साहब, उन्हें आप अपने पास ही रख लें। वरना, उनका जीवन बर्बाद होने में तनिक देर न लगेगी। एक बार धोखा देने वाले के दुबारा मित्रतापूर्ण व्यवहार को स्वार्थहीन समझने वाला सदैव धोखे में रहता है। राजेश इतने साफ दिल के इंसान थे कि नागेंद्र से एक बार तगड़ा झटका खाकर भी पुन: उनकी मीठी-मीठी बातों में आ गए।

नागेंद्र के मन में आन बगल में छुरी थी ही। पति-पत्नी को सांत्वना देकर घर लौट आए और अपने घिनौने इरादों को कामयाब बनाने में जुट गए। न जाने किस मिट्टी के बने थे वह। मानव होकर मानवता को भूल गए। वह एक तीर से दो शिकार करने की ठान ही चुके थे। सच-झूठ का सहारा लेकर एक ओर पति-पत्नी को जेल की हवा खाने को मजबूर कर दिए दूसरी ओर राजेश के बच्चों को अपने ही पास रखकर कहीं अन्यत्र जाकर सुरक्षित बचने से रोक लिए। बच्चे बेचारे मानो अजगर के मुँह में ही चले गए।

समय पंख फैलाकर उड़ता रहा। कई वर्ष गुजर गए। राजेश बाबू के बच्चों की पढ़ाई-लिखाई सब छूट गई। वे कहीं के न रहे। उनका जीवन बिल्कुल वीरान हो गया। हकीकत को दूर, उन्हें कोई झूठ को भी पूछने वाला न था। पढाने-लिखाने को कौन कहे? वे दो जून की रोटियों को भी तरसने लगे। अगर पंख होता तो वे उड़कर मां-बाप के पास चले जाते। उनके फूलों जैसे कोमल चेहरे कुम्हला गए। उनसे अपना दुखड़ा कहकर दिल का बोझ हल्का कर लेते। पर पिजड़े में बंद पक्षी की भाँति वे एकदम लाचार थे। उन्हें कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था।

इसी बीच राजेश बाबू की इकलौती बेटी रीता शादी योग्य हो गई। माता-पिता जेल में ही थे। नागेंद्र के मन में फर्क तो पहले ही आ गया था। शनै:-शनै: उनका ईमान पूरी तरह डगमगाने लगा। उनके कदम तेजी से बेईमानी की राह पर बढ़ने लगे। लालच ने उन्हें चारों ओर से धर दबोचा। तब वह आसुरी शक्तियों के वशीभूत होकर एक और बड़ी फितरती चाल चलने की सोचने लगे। राजेश बाबू की खेती-बाड़ी हथियाने के मकसद से वह रीता का विवाह अपनी उम्र के एक अधेड़ आदमी से करने के लिए उस पर तरह-तरह का दबाव डालने लगे। बल्कि यों समझिए कि वह उसे बेचने का यत्न करने लगे। लेकिन माता-पिता की गौर-मौजूदगी में रीता को यह शादी कदापि रास न आ रही थी।

वह विवश होकर बोली-संसार में मातृ-पितृ प्रेम ही सत्य और अक्षय है। बाकी सब कुछ मिथ्या है। रीता विकल होकर आपे से बाहर हो गई। बड़ी दिलेरी से वह उनका खुलकर विरोध करने लगी। खुल्लम-खुल्ला बगावत करने पर उतर आई। मेरे माँ-बाप जेल में सड़ रहे हैं और आपको मेरी शादी करने की सूझ रही है।

यह सुनते ही दिन-प्रतिदिन नागेंद्र और कामिनी के तरह-तरह के दबाव की पराकाष्ठा सारी हदें पार कर गई। उस पर जोर-जुल्म बढ़ता ही गया।

अंत में कोई वश चलता न देख हार-थककर नागेंद्र धमकी भरे लहजे में रीता से बोले-तुम्हारे माता-पिता पिछले कई साल से जेल की रोटी तोड़ रहे हैं। तुम लोग मेरी कमाई पर यहाँ मौज कर रहे हो। यह बताओ, अब तुम्हें भर-भर पेट कमाकर खिलाएगा कौन? शादी कर लो। इसी में तुम सबकी भलाई है। आखिर विवश होकर रीता एक दिन शाम को मरने के लिए घर से बाहर निकल पड़ी। उस समय उसका कलेजा कुम्हार के आवें की तरह सुलग रहा था। पास में पैसे तो थे नहीं कि कहीं से जहर खरीदकर खा लेती। परंतु उसके पास एक फूटी कौड़ी तक न थी।

मरने के इरादे से वह घर से काफी दूर एक सड़क के किनारे खड़ी होकर सोचने लगी- लाओ किसी बस या ट्रक के नीचे कूदकर अपनी जान दे दूँ। ऐसी स्थिति में जीने से तो मर जाना ही बेहतर है। रीता की दिमागी उलझन धीरे-धीरे बढ़ती गई। अवसर देखकर वह एक ट्रक के नीचे कूदने ही वाली थी कि वह सायं से आकर उसके आगे रूक गया।

ट्रक ड्राइवर प्रेम कुमार बड़े ही नेक और सज्जन पुरूष थे। वह बेटी समान रीता को भाँति-भाँति खूब समझाए-बुझाए। उसे ढाढ़स बंधाकर अपने घर ले गए। घर में रीता को देखकर उनकी पत्नी शकुंतला और बच्चे बड़े प्रसन्न हुए। अगले दिन सबेरे प्रेम कुमार उसे लेकर उसके माता-पिता से मिलाने जेल भी ले गए। रीता के माँ- बाप बेटी और प्रेम कुमार से बच्चों की दर्द भरी दास्तां सुनकर तड़प उठे। उनके नेत्रों से आंसुओं की धारा बहने लगी। पति-पत्नी पंख कटे पक्षी की भाँति छटपटाकर रह गए।

विधि का विधान देखिए कि ट्रक की मालकिन कोई और नहीं, बल्कि शहर की लोकप्रिय और ईमानदार दंडाधिकारी श्रीमती अनुपमा देवी थीं। प्रेम कुमार, रीता को ले जाकर उनसे भी मिला दिए। रीता की दु:ख भरी दयनीय कहानी सुनकर उनका हृदय पिघल गया। वह देखते ही देखते द्रवित हो उठीं।

आखिरकार न्यायबल ने हारकर पशुबल का सहारा लेने का निर्णय लिया। यानी अनुपमा देवी काफी माथा-पच्ची करने के बाद पुलिस के शरण में चली गर्इं। उन्होंने आनन-फानन में पुलिस को बुलाकर नागेंद्र और उनकी पत्नी कामिनी के खिलाफ सख्त से सख्त मुकदमा दर्ज करके रीता को न्याय दिलाने का हुक्म जारी कर दिया। साथ ही यह भी फरमान जारी कर किया कि रीता के माता-पिता से जुड़े पुराने मुकदमे की भी दुबारा कड़ाई और ईमानदारी से जाँच की जाय। दोषी मिलने पर नागेंद्र और कामिनी के साथ ही साथ थाना प्रभारी थानसिंह के विरूद्ध भी सख्ती से कठोर कार्रवाई की जाए।

अनुपमा देवी और प्रेम कुमार कितने नेक थे। पलक झपकते ही यह खबर जेठ के लू की तरह सारे मुहल्ले में फैल गई। खबर मिलते ही लोगों में हाय-तोबा मच गई। पुलिस ने भी हुक्म की नाफरमानी करने की मामूली सी भी जुर्रत न की।

थाने के नए दरोगा जीतनारायण बाबू ने बड़े साफदिली और नेक नियति का परिचय दिया। कोई उन पर नाहक ही ऊंगली उठाए, उन्हें कदापि पसंद न था। मामला दर्ज होते ही वह नागेंद्र और कामिनी को हिरासत में लेकर गिरफ्तार कर लिए। तदोपरांत कोर्ट में पेश करते ही दोनों को तुरंत जेल भी भिजवा दिए।

उधर मामले की छानबीन पूरी होते ही राजेश बाबू और करूणा जेल से रिहा कर दिए गए। अन्याय पर न्याय भारी पड़ा। रीता और उसके परिवार को न्याय मिल गया। दूध का दूध और पानी का पानी सब अलग हो गया।

-----.

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर

---प्रायोजक---

---***---

---प्रायोजक---

---***---

|नई रचनाएँ_$type=list$au=0$label=1$count=5$page=1$com=0$va=0$rm=1$h=100

प्रायोजक

--***--

|कथा-कहानी_$type=blogging$au=0$label=1$count=7$page=1$com=0$va=0$rm=1$src=random$h=100$d=0

---प्रायोजक---

---***---

|हास्य-व्यंग्य_$type=three$au=0$label=1$count=7$page=1$com=0$va=0$rm=1$src=random$h=100$d=0

---प्रायोजक---

---***---

|काव्य-जगत_$type=complex$au=0$label=1$count=7$page=1$com=0$va=0$rm=1$src=random$h=100$d=0

---प्रायोजक---

---***---

|आलेख_$type=two$au=0$label=1$count=7$page=1$com=0$va=0$rm=1$src=random$h=100$d=0$d=0

---प्रायोजक---

---***---

|संस्मरण_$type=complex$au=0$label=1$count=7$page=1$com=0$va=0$rm=1$src=random$h=100$d=0

---प्रायोजक---

---***---

|लघुकथा_$type=blogging$au=0$label=1$count=7$page=1$com=0$va=0$rm=1$src=random$h=100$d=0

---प्रायोजक---

---***---

|उपन्यास_$type=list$au=0$label=1$count=7$page=1$com=0$va=0$rm=1$src=random$h=100$d=0

---प्रायोजक---

---***---

|लोककथा_$type=complex$au=0$label=1$count=7$page=1$com=0$va=0$rm=1$src=random$h=100$d=0

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

~ विधा/विषय पर क्लिक/टच कर पढ़ें : ~

|* कहानी * |

| * उपन्यास *|

| * हास्य-व्यंग्य * |

| * कविता  *|

| * आलेख * |

| * लोककथा * |

| * लघुकथा * |

| * ग़ज़ल  *|

| * संस्मरण * |

| * साहित्य समाचार * |

| * कला जगत  *|

| * पाक कला * |

| * हास-परिहास * |

| * नाटक * |

| * बाल कथा * |

| * विज्ञान कथा * |

* समीक्षा * |

---***---



---प्रायोजक---

---***---

|आपको ये रचनाएँ भी पसंद आएंगी-_$type=three$count=6$src=random$page=1$va=0$au=0$h=110$d=0

प्रायोजक

----****----

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4061,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,338,ईबुक,193,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,262,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,112,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3023,कहानी,2265,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,542,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,130,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,31,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,99,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,346,बाल कलम,25,बाल दिवस,4,बालकथा,68,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,16,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,28,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,244,लघुकथा,1255,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,327,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,68,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2009,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,711,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,797,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,17,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,88,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,208,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,77,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: अर्जुन प्रसाद की कहानी - खून का कपट
अर्जुन प्रसाद की कहानी - खून का कपट
http://lh5.ggpht.com/-G2Lw_DfMqoI/UP0wQzXcrMI/AAAAAAAAS8A/FQY2NyMLZtE/image%25255B2%25255D.png?imgmax=800
http://lh5.ggpht.com/-G2Lw_DfMqoI/UP0wQzXcrMI/AAAAAAAAS8A/FQY2NyMLZtE/s72-c/image%25255B2%25255D.png?imgmax=800
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2013/01/blog-post_7339.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2013/01/blog-post_7339.html
true
15182217
UTF-8
सभी पोस्ट लोड किया गया कोई पोस्ट नहीं मिला सभी देखें आगे पढ़ें जवाब दें जवाब रद्द करें मिटाएँ द्वारा मुखपृष्ठ पृष्ठ पोस्ट सभी देखें आपके लिए और रचनाएँ विषय ग्रंथालय SEARCH सभी पोस्ट आपके निवेदन से संबंधित कोई पोस्ट नहीं मिला मुख पृष्ठ पर वापस रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरूवार शुक्रवार शनिवार रवि सो मं बु गु शु शनि जनवरी फरवरी मार्च अप्रैल मई जून जुलाई अगस्त सितंबर अक्तूबर नवंबर दिसंबर जन फर मार्च अप्रैल मई जून जुला अग सितं अक्तू नवं दिसं अभी अभी 1 मिनट पहले $$1$$ minutes ago 1 घंटा पहले $$1$$ hours ago कल $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago 5 सप्ताह से भी पहले फॉलोअर फॉलो करें यह प्रीमियम सामग्री तालाबंद है STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network सभी कोड कॉपी करें सभी कोड चुनें सभी कोड आपके क्लिपबोर्ड में कॉपी हैं कोड / टैक्स्ट कॉपी नहीं किया जा सका. कॉपी करने के लिए [CTRL]+[C] (या Mac पर CMD+C ) कुंजियाँ दबाएँ