विजय शिंदे के दो लघु आलेख - एक लड़की एक लड़का, हद हो गई

SHARE:

एक लड़की एक लड़का                                 डॉ. विजय शिंदे                                     मनुष्य की पहचान है, मानवीयता। मनुष्य बनता...


एक लड़की एक लड़का
                                डॉ. विजय शिंदे
                               
    मनुष्य की पहचान है, मानवीयता। मनुष्य बनता ही है मानवीयता के कारण। जहां मानवीयता का हनन होता है वहां मनुष्य का हनन होकर राक्षस बन सकता है, जो सारी मनुष्यता की सीमाओं को लांघकर अमानवीय एवं राक्षसी व्यवहार करता है। उसकी यह कृति सारी प्रकृति के लिए हानिकारक हो सकती है। राष्ट्रीय स्तर पर विषय पर इस बार-बार चर्चा हुई, चिंता प्रकट की गई एवं कार्रवाइयां भी हुई। जैसे-जैसे उसकी तह में जाने की कोशिश होती गई वैसे-वैसे हमारे ‘मनुष्य’ होने के दांवे का खात्मा कर रही थी। ‘स्त्री भ्रूण हत्या’ विषय की गंभीरता की ओर सबका ध्यान केंद्रित करना उद्देश्य है। पुरुष की तुलना में स्त्रियों की घटती संख्या प्राकृतिक नहीं तो मनुष्य द्वारा निर्मित आपत्ति है, जो उसके अमानवीय, राक्षसी प्रवृत्ति का द्योतक है। हम कल्पना भी..... हां कल्पना भी नहीं कर सकते कितनी कन्याओं की हत्या की होगी, सालों साल से। ‘हत्या’ कानूनी अपराध है और वर्तमान भारतीय समाज धड़ल्ले से हत्याएं करते जा रहा है; और आधार विज्ञान, विद्वान, डॉक्टर, घर-परिवार के सदस्य, पुरुष और स्त्री भी, बाप और मां भी सभी उस छोटी बच्ची के दुश्मन बने हैं, ‘हत्यारे‘ बने हैं, और कानून आंखों पर पट्टी बांधे हाथ पर हाथ धरे बैठा है


    कौनसा अपराध है उस बच्ची का? हम जो कल्पना करते हैं उसके उल्टा सत्य होता है। आम तरीके से कहा जाता है ग्रामीण-अनपढ़ इलाकों में कन्या भ्रूण हत्याएं ज्यादा होती है। पर नहीं आंकडे तो यह बता रहे हैं कि पढ़ा-लिखा, बुद्धिमान, शिक्षित शहरी समाज ही कन्या भ्रूण हत्याएं ज्यादा कर रहा है। यहां प्रश्न कौन कम कौन ज्यादा का नहीं। शहरी लोग ज्यादा कन्या भ्रूण हत्याएं कर रहे हैं इससे ग्रामीण समाज छूटता नहीं है। दोनों क्षेत्रों का अपराध उतना ही घृणास्पद अमानवीय है। इस सामाजिक घिनौने कृत्य के लिए दोनों भी उतने ही दोषी और सजा के हकदार है।


    यंत्रों और डॉक्टरों के विरोध में व्यापक मुहिम कानूनी तरीके से छिड़ चुकी है। इसका होना अत्यंत आवश्यक है, पर इससे बड़ी पहल मनुष्यों की मानसिकता को बदलने की हो। सामाजिक मानसिकता दोषी है, उसे पकड़कर सजा देना असंभव है, परंतु बदला जरूर जा सकता है। अर्थात् समाज मन में परिवर्तन और दुरुस्ति अत्यंत आवश्यक हो गई है। कानून को अब सख्त होना पड़ेगा। देश की बढ़ती आबादी को रोकने के लिए ‘हम दो हमारे दो’ का नारा लगाया और उसे कानूनी स्वरूप भी दिया। बीच में इसका भी प्रचलन आया ‘हम दो हमारा एक’ और वह ‘एक’ लड़का हो ऐसी अपेक्षा से हत्याएं-दर-हत्याएं। लालच, अमानवीयता, राक्षसी कृत्य। अब कानून को  सख्त होकर पुराने नारे को कड़ाई से दुबारा लागू करना होगा- ‘हम दो हमारे दो, एक लड़की एक लड़का।’
                           --------------

हद हो गई
                                    डॉ. विजय शिंदे

    ‘हद हो गई’ जैसे शब्दों का कोई ऐसे ही इस्तेमाल नहीं करता। सारी मर्यादाएं एवं सीमाएं लांघने के बाद ही इसको मुंह से निकाला जाता है। प्राकृतिक तौर पर जब इंसान असल में इंसान था, अपनी प्राचीन-आदिम अवस्था में। प्रकृति के साथ जुड़कर जैसे प्राकृतिक ताकतों ने भेजा था, रखा था वैसे रह रहा था। आज वह बिल्कुल वैसे नहीं हैं, उसने विकास की सीमाओं को लांघा है। शेष प्राणीजगत् एवं प्राकृतिक जीवजंतुओं में इंसान की प्रगति को देखे तो ‘हद हो गई’ कहा जाएगा। परंतु प्रश्न यह उठता है कि क्या मनुष्य ने सच्चे मायने में सही विकास किया है? वह अपनी सभ्यता और संस्कृति को भी विकसित कर पाया? इन प्रश्नों का उत्तर देते नहीं बन पाता। मैं क्यों आप भी और अन्य सभी उत्तर स्वरूप चुप ही रहेंगे। अगर कोई ‘हां’ या ‘ना’ में उत्तर देने की कोशिश करेगा तो ‘ना’ ही कहेगा। इंसान ने भौतिक सुख-सुविधाओं के दृष्टि से अचंभित करनेवाली प्रगति को छुआ है। उसके लिए वह अभिनंदन का  पात्र है। उसके प्रगति की हद हो गई। पर सभ्यता एवं सांस्कृतिक दृष्टि से वह पतित और पतित होते जा रहा है, अर्थात् कहा जाएगा कि हद हो गई उसके पतन की। व्यक्ति वेशभूषा परिवर्तन से, भाषा शुद्घ बोलने से एवं हेअर स्टाईल बदलने से सभ्य नहीं होता, उसका आंतरिक हृदय, विचार एवं कृति सभ्य होनी चाहिए, जो आज नहीं के बराबर है।


    यह विचार आपको निराश कर सकते हैं। या आप कह सकते हो कि निराशावादी लेखन है। पर करें क्या? निराशा, दुःख, पीडा, आतंक ही पैदा होता है आस-पास के माहौल को देखकर, देश-दुनिया की स्थितियों को देखकर। मेरा संकेत ‘दिल्ली की दरंदगी’ से है। क्या इससे पहले किसी महिला, लड़की, बच्ची के साथ बलात्कार नहीं हुआ? हां हुआ है। सालों-साल से हो रहा है। युगों से हो रहा है। दिल्ली के सामूहिक रेप कांड के पश्चात् पूरे देश भर में कोहराम मचा। देश भर की मीड़िया में खबरें छपी और चर्चाएं होती रही। एक के पश्चात् एक रेप की घटनाओं की खबरें छापी जा रही हैं। दो-चार-पांच साल की बच्ची से लेकर साठ साल की औरत पर अत्याचार  की खबरें। यह खबरें आज आ रही हैं, इसका अर्थ ‘रेप’ इन दिनों हो रहे हैं ऐसा नहीं युगों से हो रहे हैं। जब से मनुष्य ने अपनी सभ्यता और संस्कृति को छोड़कर भौतिकवाद के पीछे दौड़ना शुरू किया और अपनी हवस के लिए हदों को पार किया। आप, हम, देश और दुनिया स्त्रियों की घटती आबादी पर चिंता कर रहे हैं, विचार-मंथन शुरू है, संगोष्ठियां ले रहे हैं पर सामाजिक बदलाव नहीं हो रहा है, जो होना चाहिए। स्त्रियों का सम्मान होना चाहिए वह नहीं हो रहा है।


    जिस समाज में लड़की के जन्म को नकारा जाता है उसके पीछे एक नहीं हजारों कारण होते हैं। जहां लड़कियों पर बलात्कार हो, दहेज के लिए जलाया जाए, वस्त्रहरण हो, मार-पिट हो, विधवा जीवन की त्रासदी हो, हजारों सामाजिक पाबंदियां हो, अग्निपरीक्षाएं हो, जीवन पत्थर बनाया जाए, गुलामी हो, परिवार वालों से यौनत्याचार हो.... वहां स्त्री जीवन का स्वागत न स्त्री कर सकती है न पुरुष। अपने घर में केवल पुरुष नहीं तो स्त्री भी जन्म ले रही लड़की को नकारती है उसका कारण है समाज में घटित हजारों दुर्घटनाएं, जिसमें उसके जीवन को ध्वस्त किया जाता है। इस पर स्त्री ने और पुरुष ने भी उपाय ढूंढ़ निकाला, अपने घर मे लड़की के प्रवेश को निषिद्घ करो। शुरू हो गई स्त्री भ्रूण हत्याएं । अब चारों ओर ढोल नगाड़े बजाए जा रहे हैं स्त्री जन्म का स्वागत करें। परंतु किसके घरों में हमारे, अपने नहीं तो दूसरों के घरों में। वाह रे! दोगली सामाजिक मानसिकता। कितनी बड़ी विड़ंबन है! अपने घरों में क्यों नहीं?


    खैर ऐसी सामाजिक मानसिकता क्यों है सोचना पड़ेगा। उत्तर एक ही भूतकाल और वर्तमान में स्त्री जीवन का सम्मान नहीं हुआ। थोड़ा हुआ, हो रहा है ऐसा बिल्कुल नहीं कह सकते। बिल्कुल साफ और स्पष्ट कहा जाएगा कि स्त्रियों का सम्मान नहीं हुआ और नहीं हो रहा है। अतः न केवल पुरुष बल्कि नारियां भी लड़की को नकारती है। यहां तक मां.... मां भी अपनी बच्ची को नकारती है। उसका कारण समय-दर-समय हो रही छेड़खानियां, बलात्कार, अपमान, शोषण, सीता जैसी अग्निपरीक्षाएं, द्रौपदी जैसा वस्त्रहरण, अहिल्या जैसा पत्थर बनाए जाना है....। चारों ओर लड़कियों एवं महिलाओं को डंसने के लिए सांपों के झुंड़ फुत्कार रहे हैं, अपनी सभ्यता और संस्कृति की हदों को लांघ कर। अज्ञेय ने सच ही लिखा है-
                   सांप!
                    तुम सभ्य तो हुए नहीं
                    नगर में बसना
                    भी तुम्हें नहीं आया।
                    एक बात पूछूं - (उत्तर दोगे?)
                    विष कहां पाया?

निष्कर्षतः  कह सकते हैं कि पुरुषों के पाशविक कृत्यों की ‘हद हो गई’ है। अब अपने आत्मसम्मान के लिए नारियों को खुद उठना है। सम्मान पुरुषों से, समाज से एवं इंसानों से मिलने से तो रहा। जहां स्त्रियों-लड़कियों पर कोई गंदी टिप्पणी एवं गंदी नजर उठती है वहां वे चप्पल उठाए, लाठी उठाए, जीभ उठाए और सांपों के फनों को कुचल दें। नारी जब तक कुचलना नहीं सिखेगी तब तक शारीरिक, मानसिक एवं बौद्घिक रेप कांड रूकेंगे नहीं। उठो रण-रागिनी बनो। आपके प्रंचड़, रागिनी, चंड़ी रूप को देखकर खुशी होगी और अनायास ही मुंह से शब्द फूट पडेंगे-‘हद हो गई’।

                                डॉ. विजय शिंदे
                                देवगिरी महाविद्यालय,औरंगाबाद.
                                फोन  :- ०९४२३२२२८०८
                                ई.मेल :-
drvtshinde@gmail.com

COMMENTS

BLOGGER: 8
  1. लड़के की चाह और लड़कियों से नफरत ये बहुत बड़ा सामाजिक सत्य है ..हद हो गयी ... वास्तव में आज के परिवेश में ये वाक्य बात बात पर मुंह से निकलता है ...सुन्दर लेख ..

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. Aaj har ladki ko m.phuleki vicharo ki jarurat hai. Aratim lekh.

      हटाएं
    2. पुरवा जी अपने सही लिखा है 'आज हर लडकी को महात्मा फुले जी के विचारों की जरूरत है।' हमारे देश में कई समाज सुधारक होकर गए। माहात्मा जोतिबा फुले और सावित्रिबाई फुले जी का लडकियों के लिए बडा योगदान है। उनको सम्मान और प्रतिष्ठा मिले इसलिए अथक परिश्रम किया दोनों ने।

      हटाएं
  2. राजेंद्र अवस्थी जी,
    आभार मेरे विचारों के साथ सहमति के लिए। चाह और नफरत के नाते आप भी युग की मानसिकता की ओर संकेत कर रहें हैं। आशा है 'आप' और 'मैं' में संपूर्ण समाज जुडे और जाग्रति का कारवां बने। लोग बहुत अच्छे हैं, कुछ लोगों के बदौलत महौल में गंदगी फैलती है; ऐसों को अच्छे जरूर औकात पर लाएंगे, ला रहे हैं। मानसिकता बदलेगी और चित्र भी बदलेगा। आशा के साथ... धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
  3. charitra ka doglapan hi sari buraaiyon ka jad hai .......satik avm sarthak charcha ......vijay jee ....

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. क्षमा निशा जी आपको जो आलेख पढने के लिए बता रहा था उसे आप पहले ही पढ चुकी है। सटिक और सार्थक चर्चा वाली टिप्पणि के लिए आभार। चर्चा वास्तववादी रूप जब धारण करेगी तब स्थितियां बदलने के लिए देर नहीं लगेगी।

      हटाएं
  4. उत्तर
    1. विन्नी जी आपकी छोटी टिप्पणी परिवार के किसी सदस्य द्वारा पीठ थपथपाने जैसे लग रहा है। चंद शब्द लेखन को साहस प्रदान करेंगे। आभार।

      हटाएं
रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4289,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2360,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,1,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: विजय शिंदे के दो लघु आलेख - एक लड़की एक लड़का, हद हो गई
विजय शिंदे के दो लघु आलेख - एक लड़की एक लड़का, हद हो गई
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2013/02/blog-post_7404.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2013/02/blog-post_7404.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content