चंद्रेश कुमार छतलानी की कहानी - आत्मा का वस्त्र

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  आत्मा का वस्त्र “अमोदा, तुमसे दूर नहीं रह सकता । ओ..... तुमने क्यों किया ऐसा? मेरे लिए जीने से आवश्यक तुम हो । और अगर तुम मेरे जीवन में...

 

आत्मा का वस्त्र

“अमोदा, तुमसे दूर नहीं रह सकता । ओ..... तुमने क्यों किया ऐसा? मेरे लिए जीने से आवश्यक तुम हो और अगर तुम मेरे जीवन में नहीं हो तो मृत्यु का वरण ही सही है।”, 

अनुराग मन ही मन ये सोचता चला जा रहा था। समुद्र की लहरों की तरह सदैव प्रसन्न रहने वाला अनुराग का अंतर-मन आज समुद्र की तरह गहरा हो गया था। अंतर-मन की हलचल किसी को दिखाई नहीं दे रही थी, आँखे थोड़ी सी नम थी लेकिन ह्रदय बहुत ही तीव्र था। गले से शब्द नहीं निकल रहे थे, लेकिन मस्तिष्क में इतने विचार आ रहे थे कि हर विचार को देखना भी असंभव लग रहा था।

मनुष्य के जीवन में जब स्वयं के विचार ही विकार उत्पन्न करना आरम्भ कर दें तो यह मस्तिष्क में रोग उत्पन्न कर सकता है और धीरे-धीरे विकृत विचार, मानसिकता को भी विकृत करना आरम्भ कर देते हैं और इस निराशा में व्यक्ति कुछ भी कर सकता है, रोगी हो सकता है, आत्मघातक भी हो सकता है और अपराध भी कर सकता है। सोचने-समझने की शक्ति क्षीण होने पर ऐसा होना स्वाभाविक है।

अमोदा और अनुराग बचपन से ही साथ पढ़ते थे और अमोदा, अनुराग को पहले दिन से ही मोहित करती थी, अनुराग आरम्भ में तो समझा नहीं, लेकिन धीरे धीरे अमोदा उसके जीवन का अभिन्न अंग बनती गयी। दोनों का नाम भी स्कूल से लेकर कॉलेज तक के उपस्थिति रजिस्टर में भी आगे-पीछे ही रहा। अनुराग का बचपन मन युवा होने तक समझ गया था कि अमोदा उसके जीवन के लिए ही है। अनुराग मितभाषी, अंतर्मुखी व्यक्ति था लेकिन अमोदा इसके विपरीत सबके साथ हंसती रहती और हंसाती रहती थी। अमोदा, अनुराग के प्रेम को भी हंसी ठठ्ठा ही समझती थी और अनुराग उसके लिए एक अच्छे मित्र के सामान था।

आज अमोदा ने बड़ी मासूमियत भरी खुशी से अपनी मंगनी की बात सबको बताई थी। अनुराग हक्का-बक्का रह गया, उसके जीवन की सबसे बड़ी खुशी, बड़ी खुशी के साथ उससे दूर जा रही थी और उसको खुश देखकर वो निराश हो रहा था। वो अपने कॉलेज से निकल कर समुद्र तट पर आ गया और उसी समुद्र में विलीन होने के विचार उसके मन में स्वतः ही प्रकट होने लगे। वो सोच रहा था कि काश ये लहरें अपने साथ में उसे भी ले जाए और वह फिर कभी भी लौट कर धरती पर नहीं आये।

आत्मघात के विचार उसके मस्तिष्क पर हावी हो चुके थे। और उसने निर्णय कर लिया कि अब वो जीवित नहीं रहेगा। किसी भी हाल में नहीं, अमोदा उसका जीवन थी अब जब वो ही बिछड़ गयी तो जीवन ही बिछड़ गया। अब तो मृत्यु ही साथी है।

“मुझे जीवित नहीं रहना है”, उसने अंतिम निर्णय ले लिया।

उसने एक स्थान तलाश कर लिया, जहां पर सैलानी और अन्य लोग नहीं जाते थे क्योकि वह स्थान संकटमय था और वहां कई दुर्घटनाएं पहले भी हो चुकी थी। आज भी उस स्थान पर कोई नहीं था। कुछ क्षण अनुराग नम आँखों से लहरों का उतार-चदाव देखता रहा, उसे हर लहर में अमोदा का अक्स दिख रहा था और उसने ठान लिया कि उसे अमोदा में विलीन होना है, उसकी हंसी के साथ एकाकार होना है, और ये लहरें अमोदा का ही प्रतिरूप है।

अमोदा मैं आ रहा हूँ, तुम्हारे पास”, अनुराग चिल्ला कर बोला, उसकी वाणी में दर्द के साथ कुछ मस्तिष्क की विकृति भी झलक रही थी, और यह कहते ही उसने बड़े बड़े क़दमों के साथ एक चट्टान की तरफ चलना आरम्भ कर दिया, उस चट्टान से पहले भी कई दुर्घटनाएं हो चुकी थी और कुछ व्यक्ति मर भी गए थे।

उसने उस चट्टान पर चढना शुरू कर दिया, चट्टान पर फिसलन थी, लेकिन उसका मन केवल वही शब्द दुहरा रहा था, “अमोदा मैं आ रहा हूँ...... तुम्हारे पास”, मृत्यु उसके समीप आ रही थी यह कहना सही नहीं होगा, लेकिन अनुराग मृत्यु के समीप जा रहा था, उसे पता था, कुछ क्षणों के पश्चात उसकी आत्मा इस शरीर को त्याग देगी, आत्मा जिसे पानी नहीं गला सकता है, आग नहीं जला सकती है, शस्त्र नहीं काट सकता है..... लेकिन ये शरीर अमोदा रूपी लहरों से एक होने वाला है और उसी में हमेशा के लिए समा जाएगा। अमोदा, यही प्रेम की पराकाष्ठा है। अपने जीवन का त्याग कर देना। इन्हीं विचारों के साथ अनुराग चलता ही जा रहा था कि एक तीव्र ध्वनि ने उसका ध्यान भंग कर दिया,

“रुको... मरने जा रहे हो तो जाओ, लेकिन मुझे कुछ दे जाओ।”

उसने मुड कर देखा, तो एक भिखारी किस्म का व्यक्ति, जिसकी दाढी बड़ी हुई थी, चेहरे पे वक्त की कालिमा थी, बिखरे अधपके बाल, फटे हुए कपडे, लेकिन आँखों में कुछ चमक सी थी, चट्टान के नीचे खड़ा हुआ था।

अनुराग ने भर्राई धीमी आवाज़ में पूछा, “क्या चाहिए?”

उस व्यक्ति की आँखों की चमक बढ़ गयी, बोला, “तुम तो मरने जा रहे हो, कुछ क्षणों में तुम ईश्वर के पास चले जाओगे, शरीर ना रहकर आत्मा बन जाओगे, आत्मा तो निर्विकार है और निरंकार है, उसे वस्त्रों की क्या आवश्यकता? आत्मा के वस्त्र तो होते नहीं। तो अपने वस्त्र तुम मुझे दे दो। बाकी चाहो तो तुम जाओ मरने, हमारा क्या? हम तुम्हें लम्बी उम्र की दुआ भी नहीं देंगे।”

एक भिखारी किस्म के व्यक्ति के मुंह से ऐसी बात सुनकर, अनुराग की गंभीरता बढ़ गयी और चेहरा थोड़ा और सख्त हो गया। उसने कहने की कोशिश की लेकिन आवाज़ बहुत धीरे निकली, “तुम्हे पता है मुझे क्या दुःख है?”

उस व्यक्ति ने कहा, “तुम मरने जा रहे हो, तो कोई ऐसा दुःख होगा, जिससे बड़ा दुःख कुछ भी नहीं हो सकता, वो असहनीय होगा, तभी इतना बड़ा निर्णय लिया।”

अनुराग ने कहा, “हाँ!! जिस लड़की से मैं बचपन से प्रेम करता हूँ, उसकी आज मंगनी किसी और से हो गयी। अब मैं मरने के अलावा और क्या करूँ?”

उस व्यक्ति ने कहा, “तुम्हारे माता-पिता से प्रेम नहीं है, वो तुम्हें उतना ही प्रेम उस क्षण से करते हैं, जिस क्षण तुम पहली बार धरती पर आये”

अनुराग ने कहा, “है, क्यों नहीं है, लेकिन अमोदा मेरा जीवन है। चलो तुम मेरे वस्त्र ले लो। आत्मा को तो वस्त्र की आवश्यकता नहीं होती।”

उस व्यक्ति ने कहा, “ऐसा नहीं है कि आत्मा को वस्त्र की आवश्यकता नहीं होती। आत्मा का वस्त्र है शरीर। अगर तुम्हें यह लग रहा है कि अपने शरीर को समाप्त करके, तुम अमोदा को भूल जाओगे तो तुम गलती कर रहे हो। तुम्हारी आत्मा भटकती रहेगी, अपने वस्त्र के लिए, क्योंकि अपने वस्त्र के साथ ही वो अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति कर सकती है। बिना वस्त्र के तुम्हारी आत्मा बिना अभिव्यक्ति के केवल तड़पती रहेगी।”

अनुराग ने कहा, “लेकिन मुझे अमोदा में मिलना है, वो मुझे इन लहरों में दिखाई दे रही है।

उस व्यक्ति ने कहा, “अमोदा तुम्हें अगर इन लहरों में दिखाई देती है तो मृत्यु के पश्चात् तुम्हारा निर्जीव शरीर तो इन लहरों में गल जाएगा लेकिन आत्मा इन लहरों से बाहर आ जायेगी, तुम आत्मा बन जाओगे, और फिर अमोदा में मिलने के लिए अपने वस्त्रों के लिए तरसोगे।”

एक भिखारी के मुंह से इतनी ज्ञान भरी बात सुन कर अनुराग थोड़ा चौंका, अब तक वो थोड़ा संयत भी हो चुका था। उसने धीरे से पूछा, “तुम्हें ये सब बातें क्या पता? क्या तुम कोई साधू हो?”

उस व्यक्ति ने कहा, “नहीं, मैं साधू नहीं हूँ। तुमसे कपडे मांग रहा हूँ, लेकिन भिखारी भी नहीं हूँ। मैं नमक का व्यापारी हूँ। नमक की खानें हैं मेरी। एक दिन मैं अपने परिवार के साथ तिरुपति बालाजी में तीर्थ के लिए गया हुआ था, एक महीने तिरुपति में रहने के बाद जब हम वापस लौट रहे थे तो कुछ अनजान लोगों ने हमला कर दिया, और मेरी पत्नी और दो बच्चों को लेकर पता नहीं कहाँ चले गए।”

उस व्यक्ति का गला भर्रा गया, लेकिन वो कहता रहा,”वो बच्चे, जिनसे मैं उनके पहले क्षण से उतना प्यार करता हूँ, जितना तुम अमोदा से करते होंगे, मुझसे बिछड़ गए। मैं पागल सा हो गया, पुलिस ने तहकीकात  की, अपने जासूस लगाए, मंत्रियों से सिफारिश लगवा कर सब जगह ढूंढवाया, लेकिन कुछ पता नहीं चला। जैसे तैसे मैं अपने घर पर पहुंचा, वहां जाकर पता चला कि, मेरा चचेरा भाई अब मालिक बन गया है, उसने धोखे से मेरा सब कुछ हथिया लिया, मेरी खानें, मकान, धन और मुझे विश्वास हो गया कि उसीने मुझ पर हमला करवाया था।”

कुछ क्षण रुक कर उसने फिर कहा, “मैं हर तरह से बेसहारा हो गया। मेरे पास मेरा कहने कुछ भी नहीं रहा। मुझे पता नहीं मेरा परिवार कहाँ है, इस धरती पर भी है या नहीं, मैं तुम्हारी तरह खुशकिस्मत नहीं हूँ, कम से कर तुम्हें पता तो है कि तुम्हारी अमोदा, इस धरती पर खुश है और तुम चाहो तो उसे और भी खुशियाँ किसी ना किसी तरह से दे सकते हो और मैं अपने परिवार को खुश कैसे रखूँ, मुझे ये भी नहीं पता”

उसकी आँखों में आंसू आ गए।

उसने फिर कहा, “लेकिन फिर भी एक आस है, आज नहीं तो कल मेरा परिवार मुझे फिर मिलेगा, मैं फिर कानूनी लड़ाई लड़ कर अपनी खुशियाँ फिर से पा सकता हूँ। इसलिए मुझे कुछ कपड़ों की आवश्यकता है ताकि उनकी तलाश में कुछ तो आसानी हो।”

अनुराग के पास एक दिन में दूसरी बार हक्का-बक्का होने का क्षण आ गया था, उसके पूर्व विचार कहीं छुप गए थे और उसे केवल यही सुनाई दे रहा था कि, “....... तुम्हारी अमोदा, इस धरती पर खुश है और तुम चाहो तो उसे और भी खुशियाँ किसी ना किसी तरह से दे सकते हो ...... और मैं अपने परिवार को खुश कैसे रखूँ, मुझे ये भी नहीं पता........... ”

अचानक से उसे बोध हुआ कि उसकी आत्मा उसीके स्वरुप में उसके सामने खड़ी हो गयी है, और उससे कह रही है, “अनुराग....!!! अनुराग का अर्थ होता है प्रेम और अमोदा का अर्थ आनदं, प्रेम के भीतर आनंद ही आनंद है लेकिन आनंद के भीतर प्रेम हो, आवश्यक नहीं। अमोदा सदा तुम्हारे भीतर है, तुम अमोदा के भीतर हो या नहीं इसकी तकलीफ को छोड़ दो। यह कोई दुःख नहीं है। जो चीज़ तुम्हारे भीतर है, उसे बाहर तलाश मत करो, उसके लिए दुखी मत हो, उसकी कोई आवश्यकता नहीं। तुम्हारा शरीर मेरा वस्त्र है, और मैं तुम्हारे भीतर हूँ, मैं केवल तुम्हारा ही नहीं अमोदा का प्रतिरूप भी हूँ, लेकिन तुम दोनों के प्रतिरूप बनने के लिए मुझे मेरा वस्त्र चाहिए। मैं ही प्रेम और आनंद का स्वरुप हूँ, फिर भी अदृश्य हूँ......................... अब अपने अनुराग में अमोदा को तलाश करो.... अपने जीवन को आनंदमय (अमोदामय) कर दो... कर दो अनुराग” उसकी आत्मा यह कहते हुए कहीं लुप्त हो गयी।

अनुराग ने मन ही मन दुहराया, “अमोदा, तुमसे दूर नहीं रह सकता, लेकिन मैं भूल गया था कि तुम तो हमेशा मेरे साथ हो, अगर मैं दुनिया में प्रेम बांटता हूँ तो मुझे आनंद अपने-आप ही मिल जाएगा, मुझे मेरी अमोदा मिल जायेगी। मेरी अमोदा इन समुद्र की लहरों में नहीं, मेरे द्वारा दी गयी आखों की चमक  में है, दुनिया में बहुत दुःख भरा है... थोड़ा भी कम कर दूं तो अमोदा मेरे साथ है ।”

अनुराग ने उस व्यक्ति का हाथ पकड़ लिया और चल दिया... उसके साथ उसका परिवार ढूँढने के लिए... 

- चंद्रेश कुमार छतलानी

३ प् ४६, प्रभात नगर 

सेक्टर-५, हिरन मगरी 

उदयपुर - राजस्थान 

फोन: 9928544749

chandresh.chhatlani@gmail.com

http://chandreshkumar.wetpaint.com

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रचनाकार: चंद्रेश कुमार छतलानी की कहानी - आत्मा का वस्त्र
चंद्रेश कुमार छतलानी की कहानी - आत्मा का वस्त्र
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