शेख चिल्ली की कहानियाँ - 6 : किस्सा काजी का

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शेख चिल्ली की कहानियाँ अनूपा लाल   अनुवाद - अरविन्द गुप्ता   किस्सा काजी का बेटा तुम अब कोई कामकाज ढूंढो - शेख चिल्ली की मां ने उसे...

शेख चिल्ली की कहानियाँ

अनूपा लाल

 

अनुवाद - अरविन्द गुप्ता

 

किस्सा काजी का

बेटा तुम अब कोई कामकाज ढूंढो - शेख चिल्ली की मां ने उसे एक शाम खाना परोसते हुए कहा

'' तुम अब एक नौजवान हो। जल्द ही हमें तुम्हारे लिए .एक पत्नी की तलाश करनी होगी! परंतु जो आदमी कुछ कमाता ही न हो उसे भला कौन अपनी लड़की देगा? अब जाकर कोई अच्छी पक्की नौकरी ढूंढो। मैं अब बूढ़ी हो रही हूं। कब तक अकेले दोनों के लिए कमाई करूंगी?''

'' ज्यादा देर तक नहीं अम्मी शेख ने प्यार से कहा। '' तुम बस थोडा सा और इंतजार करो। कल शाम तक मेरी नौकरी लग गई होगी। '' '' बेटा ऐसा ही हो!'' अम्मी ने काफी भावुक होकर कहा।

कहना तो आसान था परंतु नौकरी मिलना एक कठिन काम था! वो किसके पास जाए इस बारे में शेख सोचने लगा। गांव में कई लोगों ने उसे पहले नौकरी पर रखा था। परंतु कोई भी नौकरी चंद हफ्तों से अधिक नहीं टिकी थी। अगली सुबह उसने लाला तेलीराम से पूछने का निश्चय किया कि क्या उन्हें एक और नौकर चाहिए?

पहले एक बार लालाजी के काम पर जाते समय शेख चिल्ली एक नमक का बोरा लेकर तालाब में जा गिरा था। पर शेख यह उम्मीद लगाए बैठा था कि शायद लालाजी उस बात को अब तक भूल गए होंगे। आखिर वो सारा नमक कहां गया? शेख इस सोच में इतना गहरा डूबा था कि वो सामने से आते दो भाइयों से टकरा गया। जिन कुछ सालों के लिए शेख गांव के स्कूल में पढ़ा था उस समय यह दोनों भाई उसकी ही कक्षा में थे।

'' मियां आप फिर दिन में सपने देख रहे हैं?'' बड़े भाई ने पूछा। '' तभी तो मौलवी साहब ने आपको स्कूल से निकाल दिया था। ''

'' भाई मैं तो नौकरी छूने की बात सोच रहा था शेख ने कहा। '' अम्मी का कहना है कि अगर मेरी नौकरी नहीं लगेगी तो कोई मुझसे शादी नहीं करेगा। ''

यह सुनकर दोनों भाई हंसने लगे। '' उनका कहना बिल्कुल ठीक है एक ने कहा '' और हम अभी तुम्हें एक नौकरी सुझा सकते हैं ' काम आसान न होगा। तुम्हें एक बेहद कंजूस काजी के लिए काम करना होगा। वो तुम्हें महीने के बीस रुपए तनख्वाह देगा। साथ में मुफ्त खाना और रहने का स्थान भी मिलेगा। परंतु फिर वो तुम्हारी जान हराम कर डालेगा और तुम झक मारकर नौकरी छोड़ने को मजबूर हो जाओगे। जब तुम नौकरी छोड़ोगे तो तुम्हें उस महीने की तनख्वाह नहीं मिलेगी और साथ में काजी तुम्हारे कान का थोड़ा सा टुकड़ा भी कतर लेगा! हमारे साथ-साथ उस काजी ने और बहुत से लोगों के भी कान कुतरे हैं। उसका आखिरी नौकर अभी दो दिन पहले ही रोता हुआ वापिस आया था। ''

'' अगर नौकर के नौकरी छोड़ने की जगह काजी खुद नौकर को निकालता है तो? शेख ने पूछा। उसे वो बहुत सारे मालिक याद आए जिन्होंने उसे निकाला था। '' क्या फिर काजी खुद अपना कान कतरवाने को राजी होगा?''

'' ऐसा आज तक तो हुआ नहीं है और न ही इसके होने की कोई संभावना है। तुम थोड़े सावधान रहना मियां। काजी साहब बहुत ही चालाक आदमी हैं!''

'' मुझे उनका पूरा नाम और पता दो शेख चिल्ली ने कहा। '' मैंने अम्मी से वादा किया है कि आज शाम तक मैं कोई नौकरी ढूंढ निकालूंगा 1 ''

शेख कई मील चलकर उस शहर में पहुंचा जहां काजी रहते थे। काजी तभी कचहरी से लौटे थे।

'' सलाम सरकार शेख ने कहा। '' मैं आपके लिए काम करने आया हूं। ''

काजी ने शेख के भोले चेहरे को देखा। चलो एक और बकरा फंसा! उन्होंने सोचा। यह भी बहुत ज्यादा दिन नहीं टिकेगा! उन्होंने जोर से कहा '' क्या तुम्हें नौकरी की शर्तें पता हैं?''

शेख ने अपना सिर हिलाया। '' जी सरकार! बीस रुपए महीना तनख्वाह और साथ में मुफ्त खाना और सोने की जगह। ''

'' इसके बदले में तुम्हें जो भी काम दिया जाएगा उसे तुम्हें करना होगा काजी ने कडे शब्दों में कहा। '' मैं तुम्हें नौकरी से नहीं निकालूंगा। परंतु अगर तुमने नौकरी छोड़ी तो तुम्हें उस महीने की तनख्वाह नहीं मिलेगी। साथ में मैं तुम्हारा थोड़ा सा कान भी कुतरूंगा जो तुम्हें सारी जिंदगी तुम्हारे बेकार काम की याद दिलाएगा! आयी बात समझ में? क्या तुम्हारे कोई सवाल हैं?''

'' सिर्फ एक सरकार शेख ने कहा। '' अगर आप मुझे नौकरी से निकालेंगे तो... ''

'' वो कभी नहीं होगा!'' काजी ने उसकी बात को बीच में काटते हुए कहा।

'' लेकिन अगर ऐसा हुआ तो मैं आपसे एक साल की तनख्वाह लूंगा और साथ में आपके कान का थोड़ा सा टुकड़ा भी कुतरूंगा काजी का मुंह लटक गया! किसी ने भी आज तक उनसे इस तरह की बात कहने की जुर्रत नहीं करी थी। यह लड़का सच में बिल्कुल ही बेवकूफ होगा!

'' चलो ठीक है उन्होंने रुखाई से कहा। '' मुझे तुम्हारी शर्तें मंजूर हैं। अब अंदर जाओ। बेगम साहिबा तुम्हें काम के बारे में बता देंगी। '' शेख को इस नौकरी में लगभग सभी काम करने थे - घर की झाडू और सफाई कपड़े धोना बर्तन मांजना बाजार जाना और काजी के तीन साल के बेटे की देखभाल करना। शेख हर आदेश का मुस्कुराते हुए अपनी धीमी गति से पालन करता। उसका नतीजा यह होता कि कभी कोई भी काम पूरा नहीं होता था। जब काजी की पत्नी उसे बर्तन मांझने के लिए बुलातीं तो वो अधूरे धुल कपड़े छोड्‌कर वहां चला जाता। वो बर्तन भी आधे धुले छोड़ देता क्योंकि तब तक बाजार जाने का वक्त हो जाता।

'' इस बार तुमने कितने बड़े बेवकूफ को पकड़ा है काजी की पत्नी शिकायत के लहजे में कहतीं थीं। '' एक भी काम ऐसा नहीं है जो वो ठीक से करता हो। ''

'' सीख जाएगा काजी जवाब मैं कहते। '' या फिर वो काम छोड़ देगा। बस थोड़ा धैर्य रखो और उससे जी-तोड़ काम लो। ''

रात होने तक शेख थककर चूर-चूर हो जाता। एक रात जब शेख सपने में दूल्हा बना हुआ था तभी काजी ने आकर उसे झकझोर कर जगाया।

'' देखो जरा बच्चे को पेशाब कराना है काजी ने कहा। '' उसे बाहर ले जाकर घर के पीछे नाली के ऊपर बैठा दो। ''

शेख को अपने सुहाने सपने में दखल डालने पर बड़ा गुस्सा आया। परंतु वो उठा और काजी के बेटे को बाहर ले गया। बाहर अंधेरा था और तेज हवा चल रही थी। बच्चा शेख से कसकर चिपट गया।

'' तुमने कभी भूत देखा है? शेख ने लड़के से पूछा। यह सुनकर लड़का शेख से और जोर से चिपट गया। '' घबराओ नहीं शेख ने उससे कहा। '' मुझे नाली में कुछ तैरता नजूर आ रहा है। परंतु वो भूत नहीं हो सकता। क्योंकि भूतों को तैरना नहीं आता। ''

यह सुनकर लड़का दहाड़े मार कर रोता हुआ वापिस घर में अपनी मां के पास भागा। शेख फिर से उस सपने का मजा लेने लगा जिसमें वो एक दूल्हा बना था। इस बीच में काजी के बेटे ने अपनी मां के बिस्तर को गीला ही कर दिया!

बेगम तो आग-बबूला हो उठीं। '' इस बेवकूफ से मेरा पिंड छुड़ाओ!'' उन्होंने अगले दिन सुबह के समय अपने पति से कहा। '' यह आदमी तो बच्चे को रात को पेशाब कराने जैसे सरल काम भी नहीं कर सकता है। ''

'' मैं उसे नौकरी से नहीं निकाल सकता काजी ने गंभीरता से कहा। '' परंतु मैं उसे एक ऐसा सबक सिखाऊंगा जिसे वो जिंदगी भर नहीं भूलेगा। '' उन्होंने शेख चिल्ली को बुलाया और कहा '' शहर के बाहर जंगल के पास मेरी 1० बीघा जमीन है। तुम अभी वहां पर जाओ। मेरे हल-बैल मेरे पड़ोसी के पास है। तुम जाकर उस 1० बीघा जमीन को हल से जोत कर आओ। हां जुताई अच्छी तरह से करना। जो कुछ तुमने किया है उसका मैं कल आकर मुआयना करूंगा। और घर वापिस आने से पहले तुम्हें यह दो काम और करने हैं। एक मोटा सा खरगोश पकड़ कर लाना। मुझे आज रात को खाने के लिए स्वादिष्ट गोश्त चाहिए। हां और आते वक्त अपने सिर पर जलाऊ लकड़ी का गड़वा भी रखकर लाना मत भूलना। और शाम को मेरे कचहरी से लौटकर आने से पहले ही घर वापिस आ जाना। अच्छा अब तुम जाओ। '' '' मैंने आज सुबह इस बेवकूफ को कुछ खाने-पीने को भी नहीं दिया है काजी की बेगम ने फर्माया। '' इसे जरा भूखे पेट मेहनत-मशक्कत करने दो!''

'' तुम आज रात को उसे कुछ हड्‌डियां चूसने को दे देना!'' काजी ने एक कड़वी हंसी के साथ कहा। '' मुझे तो लगता है कि इतनी कड़ी मेहनत से वो पहले ही भाग लेगा और खाना देने की नौबत ही नहीं आएगी!''

शेख चिल्ली की जेब में जो सिक्के थे उससे उसने चने खरीदे पानी पिया और फिर वो काली की जमीन की ओर चला। उसने हल-बैल से काजी के खेत को दोपहर होने तक जोता। अचानक उसे बाकी दो और काम याद आए और वो जलाऊ लकड़ी ढूंढने लगा। काटने लायक लकड़ी के सभी पेड या तो बहुत बड़े थे या फिर वे बहुत दूर थे। फिर उसकी निगाह हल के ऊपर पड़ी। उसने आश्चर्यचकित राम सिंह से कुन्हाड़ी मांगी और बैलों को रिहा करने के बाद कुल्हाड़ी से हल के टुकड़े-टुकड़े कर डाले!

अब काजी के रात के भोजन के लिए उसे सिर्फ एक खरगोश पकड़ना बाकी था। खरगोश की तो बात दूर की रही शेख को खेतों में एक चूहा तक नहीं दिखा था। परंतु उसे सड़क पर एक मरा हुआ कुत्ता जरूर दिखा।

वो शाम को काली के घर वापिस लौटा। उसके सिर पर हल के टुकड़ों का गरजा था और वो एक मरे हुए कुत्ते की पूंछ को खींच कर ला रहा था।

'' सरकार उसने मुस्कुराते हुए कहा। '' यह कुत्ता किसी भी खरगोश से बड़ा है। इससे आपके भोजन के लिए बढ़िया गोश्त बनेगा! और मैं बहुत सारी जलाऊ लकड़ी लाया हूं जिसके लिए हल की लकड़ी मेरे बहुत काम आई!''

'' अरे बेवकूफ!'' काजी गुस्से में चिल्लाया। उनका चेहरा गुस्से से आग-बबूला हो गया था। '' अभी मेरे सामने से दफा हो जाओ! मैं तुम से बाद में निबटूंगा। ''

तुमने इस आदमी को नौकरी से क्यों नहीं निकाला?'' काजी की परेशान बीबी ने रात को उनसे पूछा।

'' मैं अपना कान कुतरवाऊं और इस हरामखोर को एक साल की तनख्वाह भी दूं और साथ में पूरे शहर का मजाक भी बनूं मैं ऐसा कभी नहीं करूंगा। ''

'' तब तुम एक काम करो। एक और नौकर ढूंढो बीबी ने गुस्से में कहा। '' और इस बेशकीमती शेख चिल्ली को तुम सिर्फ अपने काम के लिए ही रखो। ''

'' बहुत अच्छा काजी ने कहा। '' तुम शेख चिल्ली को अब से कम-से-कम खाना देना। बस इतना खाना देना कि वो मरे नहीं। मैं उसे रोजाना अपने साथ कचहरी ले जाया करूंगा। देखते हैं कि वो बिना काम और भोजन के कितने दिन जिंदा रह पाता है। ''

परंतु काजी को जल्दी ही अपनी गलती का अहसास हो गया। शेख कचहरी के बाहर बैठे-बैठे दिन में सपने देखता या फिर और लोगों से गप्पे लगाने में काफी खुश था। जब लोगों को यह पता चला कि उसे इतना कम खाना मिलता है तो लोगों ने खुद उसे अपना भोजन देना शुरू कर दिया!

एक दिन काजी की पत्नी ने नए नौकर के हाथ कचहरी में काजी के लिए एक संदेश भेजा। उन्हें आटा खरीदने के लिए तुरंत कुछ पैसों ' की जुरूरत थी। दरबान ने नौकर को कचहरी के अंदर घुसने नहीं दिया। '' मैं तुम्हारी मदद करूंगा शेख ने कहा। वो कचहरी के दरवाजे पर खड़ा होकर चिल्लाया '' सरकार घर में न तो पैसे हैं और न ही आटा! आप जल्दी कुछ करें!''

काजी को यह सुनकर बहुत शर्म आई। '' बेवकूफ!'' उन्होंने बाद में शेख को डांटा। '' खबरदार! जो आज से तुमने दुबारा कचहरी में इस तरह का अड़ंगा डाला!''

कुछ दिनों बाद काजी के घर में आग लग गई। बेगम का नया नौकर दौड़ता हुआ कचहरी में काजी को इसकी सूचना देने के लिए आया। '' तुम घर जाकर मदद करो शेख ने उससे कहा। '' मैं काजी साहब को इसके बारे में बता दूंगा। '' क्योंकि शेख को कचहरी के समय काजी साहब के काम में अडंगा डालने के लिए सख्ती से मना किया गया था इसलिए वो शाम तक धैर्य से इंतजार करता रहा। तब तक काजी का आधे से ज्यादा घर जलकर राख हो चुका था!

काजी की पत्नी एक रईस व्यवसायिक परिवार की थी। काजी ने घर को दुबारा बनाने के लिए कर्ज की मांग के लिए अपनी ससुराल जाने की ठानी। उन्होंने शैतानी से दूर रखने के लिए शेख चिल्ली को भी घोड़े पर अपने साथ ले लिया।

काजी की ससुराल कोई पचास मील दूर होगी। बीच में काजी को दस्त लगे और उन्हें शौच के लिए जंगल में जाना पड़ा। तभी सड़क पर से एक काफिला गुजरा। वो शेख चिल्ली को ही घोड़े का असली मालिक समझ बैठे।

'' उन्होंने उससे कहा - हम तुम्हें इस घोड़े के लिए 2०० रुपए देंगे। क्या तुम इतने में उसे बेचोगे?''

'' हां शेख ने कहा। उसने पैसे को रखा और घोड़े की थोड़ी सी पूंछ काटी और फिर जमीन में एक गड्‌ढा करके उसने पूंछ के बालों को उसमें गाड़ दिया।

'' सरकार जरा जल्दी कीजिए!'' वो काजी को आते देखकर जोर से चिल्लाया। '' अभी- अभी घोड़े को खींचकर इस चूहे के बिल में ले जाया गया हैं! अगर आप मेरी मदद करेंगे तो हम उसे खींचकर बाहर निकाल लेंगे। काजी को कुछ समझ नहीं आया फिर भी वो शेख को पकड़े रहे। और शेख जमीन में गढ़ी घोड़े की पूंछ को खींचता रहा। अंत में पूछ बाहर निकल आई परंतु शेख और काली दोनों धड़ाम से जमीन पर जाकर गिरे!

'' चूहे हमसे ताकतवर निकले सरकार! शेख ने दुखी अंदाज में कहा। '' घोड़ा सीधा जमीन के अंदर चला गया है। अब हमें उसे बाहर निकालने के लिए फावड़ा के साथ खुदाई करने वाले ताकतवर लोग चाहिए होंगे

'' तुम यह क्या बकवास बक रहे हो बेवकूफ!'' काजी गुस्से में चिल्लाए। '' भला एक घोड़ा किसी चूहे के बिल में कैसे घुस सकता है? नमकहराम! जल्दी से बताओ कि तुमने मेरे घोड़े का क्या किया है? घोड़ा कहीं खो गया है या तुमने उसे बेच डाला है? अब हम आगे का सफर कैसे करेंगे पैदल?''

'' सरकार पास ही में एक गांव है जहां से आपको एक नया घोड़ा मिल सकता है शेख ने कहा। '' एक घोड़े के गुम जाने से आप जैसे रईस आदमी को कोई फर्क नहीं पड़ेगा। ''

बड़बड़ाते हुए काजी ने अगले गांव से एक और घोड़ा खरीदा और उसे एक पल के लिए भी अपनी आखों से ओझल नहीं होने दिया! उन्होंने खुद तो घोड़े पर बैठकर यात्रा की और शेख को पहला घोड़ा खोने की सजा में पैदल दौड़ाया।

रात को वे एक सराय में रुके। काजी ने वहां खाना खाया और उसके बाद शेख की ओर कुछ सूखी रोटी फेंकते हुए कहा '' तुम रात भर उस घोड़े के साथ ही रहना। तुम उसकी मालिश करते रहना और खबरदार जो तुमने उसे अपनी आखों के सामने से ओझल होने दिया! क्या तुम मेरी बात समझे?''

'' जी सरकार शेख ने अपनी जंभाई को छिपाते हुए बडे भीरू भाव में कहा। दिन भर चलने की थकान के बाद वो घोड़े के पास ही बैठ गया और धीरे- धीरे उसकी मालिश करने लगा। शेख को कब नींद आई और कब कोई घोड़े को चुराकर ले गया इसका उसे पता ही नहीं चला! वो जब सुबह उठा तो उसने घोड़े को नदारद पाया। शेख ने उसे चारों ओर ढूंढा। अगर उसने घोड़े को जल्दी नहीं खोजा तो काजी उसकी चमड़ी उधेड् कर रख देगा! फिर उसे घास के ढेर में जिसे घोड़ा खा रहा था दो लंबे कान नजूर आए।

'' वाह!'' शेख ने कानों को पकड़ते हुए कहा '' तो तुम यहां छिपे हुए थे!'' वो कान एक खरगोश के थे। शेख जब उन्हें निहार रहा था तभी काजी भी वहां पहुंचे।

'' घोड़ा कहां है?'' काजी ने कड़कदार आवाज में पूछा।

'' यह रहा सरकार शेख ने झट से उत्तर दिया।

'' अबे गधे यह तो खरगोश है घोड़ा नहीं!''

'' सरकार यह सच में घोड़ा है। मैंने घोड़े की इतनी कसकर मालिश की कि वो छोटा होकर खरगोश बन गया। मैंने उसके कानों की मालिश नहीं की। आप देखिए! वे अभी भी घोड़े के नाप के है '' तुम दुनिया के सबसे बड़े बेवकूफ हो!'' काजी ने कहा। यह कहते हुए काजी की आवाज गुस्से से लड़खड़ाने लगी। '' और मैं दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बेवकूफ हूं कि मैंने तुम्हें नौकरी पर रखा! चलो अब तैयार हो क्योंकि अब चलने का वक्त हो गया है। ''

वो बाकी रास्ते पैदल ही चल कर गए। ससुराल पहुंचने के बाद उनका काफी आदर-सत्कार हुआ।

काजी की सास शेख चिल्ली को अलग ले गयीं। '' तुम्हारे मालिक की तबीयत कुछ ठीक नहीं लगती है उन्होंने कहा '' मुझे लगता है कि लंबे सफर के कारण उन्हें कुछ थकान हो गई है। ''

'' उनका पेट कुछ खराब है शेख ने कहा।

'' फिर मैं उनके लिए कुछ खिचड़ी बना देती हूं '' बूढ़ी औरत ने कहा।

'' पर आप उसे खूब चटपटा बनाएं शेख ने कहा। '' उन्हें चटपटा खाना बहुत पसंद है। ''

रात को भोजन के समय शेख चिल्ली को सबसे स्वादिष्ट बिरयानी मटन-करी सब्जियां और खीर परोसी गई। और काजी को केवल एक कटोरा भर मसालेदार खिचड़ी ही खाने को मिली!

काजी को इतनी भूख लगी थी कि वो सब खिचड़ी खा गए। रात को उनके पेट में दर्द हुआ और उन्हें तुरंत शौच के लिए जाना पड़ा। '' मुझे बाहर जाना है उन्होंने शेख को उठाया। '' तुम भी मेरे साथ चलो। ''

'' सरकार शेख ने नींद में कहा '' वहां कोने में एक मिट्‌टी का मटका रखा है 1 आप उस का प्रयोग क्यों नहीं करते? सुबह को उसे खाली कर देंगे। ''

काजी को रात में कई बार शौच जाना पड़ा। सुबह तक वो मटका आधा भर चुका था।

'' इसे बाहर फेंक कर आओ उन्होंने शेख को आदेश दिया। '' मैं यह काम नहीं करूंगा शेख ने कहा '' मैं मेहतर नहीं हूं। '' काजी को कुछ समझ नहीं आया। गुस्से में आकर उन्होंने मटका उठाया और उसे जगंल में फेंकने चल पड़े। उनका साला उनके पीछे-पीछे दौड़ता हुआ आया। उसे आते हुए देख काजी ने शर्म के मारे अपनी रफ्तार बढ़ा दी। परंतु उनका साला तेजी से दौड़कर उनके पास पहुंच गया।

'' भाईजान आप अपने सिर पर यह बोझ लाद कर कहां जा रहे हैं? लाईए मैं आपकी मदद करता हूं। ''

'' नहीं! नहीं!'' काजी ने विरोध किया। '' नहीं ठीक है। '' और काजी ने मटके को कस कर पकड़ने की कोशिश की। परंतु मटका उसके हाथों से फिसल कर उन दोनों के बीच में जाकर गिरा जिससे दोनों लोग गंदगी से सन गए।

शेख इस पूरे नजारे को खिड़की में से देख रहा था। '' सरकार वो काजी की ओर दौड़ता हुआ चिल्लाया। '' कहीं आपके चोट तो नहीं आई! ''

काजी ने विनम्र भाव से अपने दोनों हाथ जोड़े। '' मैं तुमसे विनती करता हूं शेख चिल्ली तुम मुझे अकेला छोड़ दो उन्होंने कहा। '' मैंने तुम्हें बहुत झेला है और बर्दाश्त किया है! तुम जीते। मैं हारा। मैं तुम्हें फौरन नौकरी से निकालता हूं। तुम पूरे साल की तनख्वाह ले लो और मेरे दोनों कान भी कुतर लो परंतु मेरी निगाह के सामने से सदा के लिए दफा हो जाओ!''

'' आप अपने कान अपने पास ही रखें सरकार शेख ने कहा। '' हां यह रहे वो दो सौ रुपए जो मुझे आपका पहला घोड़ा बेचकर मिले। मुझे अफसोस है कि दूसरा घोड़ा खरगोश में बदल गया। उस रात आपने घोड़े की मालिश करने के लिए कह कर भारी गलती की!'' एक साल की पूरी तनख्वाह जेब में रखे शेख चिल्ली बड़ी जीत हासिल करके शान से घर लौटा!

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(अनुमति से साभार प्रकाशित)

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पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: शेख चिल्ली की कहानियाँ - 6 : किस्सा काजी का
शेख चिल्ली की कहानियाँ - 6 : किस्सा काजी का
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