प्राची अप्रैल 2016 : लघुकथाएँ

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लघुकथा पवित्रा अग्रवाल बयार बेटे के घर पुत्री पैदा हुई थी. बेटे बहू कुछ उदास थे. उसी शहर में अपने पति के साथ अलग रह रही मां को पता चला तो...

लघुकथा

पवित्रा अग्रवाल

बयार

बेटे के घर पुत्री पैदा हुई थी. बेटे बहू कुछ उदास थे.

उसी शहर में अपने पति के साथ अलग रह रही मां को पता चला तो वह मिठाई का डिब्बा लेकर अस्पताल पहुंची और दादी बनने की खुशी में नर्सों, मिलने आने वालों को मिठाई खिलाई.

मां की इस हरकत पर बेटे बहू को बहुत गुस्सा आया.

‘मां हमारे बेटा नहीं बेटी हुई है.’

‘हां मुझे मालूम है लक्ष्मी आई है.’

‘मां, माता-पिता से अधिक दादा-दादी को पोते की चाह होती है और तुम पोती के आने की खुशी में लड्डू बांट रही हो.’

‘बेटा पहली बात तो मुझे बेटियां भी उतनी ही प्यारी हैं जितने बेटे. वैसे भी मैं ने बेटी का सुख कहां जाना है. भगवान ने बेटी दी ही नहीं और तू भी उदास मत हो. समय बदल रहा है, आज बेटियां भी किसी से कम नहीं हैं’

‘फिर भी...’

‘फिर भी क्या बेटा? आजकल बहुत से घरों में बेटे के घर माता-पिता को प्रवेश नहीं मिलता, बेटी के घर में फिर भी थोड़ी पूछ हो जाती है. अपनी सास को ही देख लो. उनको तुम लोग जितनी इज्जत देते हो, उनका बेटा कहां देता है?...तो बेटा जैसी चले बयार पीठ तब तैसी दीजे.’

सम्पर्कः घरौंदा 4-7-126

इसामियां बाजार, हैदराबाद-500027

मो. : 09393385447

भूले बिसरे

जे.एन. यू. का एक सच यह भी

किताबें चुरा लीं?

24 अक्तूबर, 81 को एक छात्र ने आकर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के पुस्तकालय अध्यक्ष को सूचना दी, ‘‘चुरायी गयी पुस्तकों के दो बक्स और एक बंडल नर्मदा हॉस्टल से आई.टी.आई. ले जाए जा रहे हैं.’’

पुस्तकालय अध्यक्ष ने अपने सहायक को कार्रवाई करने को कहा, जिसके फलस्वरूप सुरक्षा अधिकारी ने अपने कई आदमी नर्मदा हॉस्टल के चारों तरफ तैनात कर दिये. फिर चोरों के कमरे पर छापा मारा गया, परन्तु वहां ताला लगा हुआ था. इसलिए ताले पर ताला लगाकर चोरों की प्रतीक्षा की गयी. वे करीब शाम सात बजे आये और उनके पास 300 पुस्तकें बरामद हुईं, जिनमें से 200 नेहरू विश्वविद्यालय की थीं और बाकी दिल्ली तथा उड़ीसा की दूकानों अथवा पुस्तकालयों से उड़ायी गयी थीं. वे चोर तीन छात्र थे और तीनों उड़ीसा से आए हुए थे. बहरहाल उन्हें मुअत्तल कर दिया गया.

जे.एन.यू. पुस्तकालय वाले पिछले दस साल से कह रहे थे कि खिड़कियों पर जाली लगवा दी जाये, परन्तु कुछ नहीं हुआ. फलस्वरूप पहली मंजिल से किताबें लेकर नीचे फेंक दी जाती थीं, जहां से नीचे तैयार खड़ा छात्र उन्हें उठाकर ले जाता था. यहीं नहीं प्रशासन की चुस्ती का एक नायाब नमूना और भी है.

एक छात्र एक पुस्तक चुराते हुए पकड़ा गया. उसने अपना जुर्म भी स्वीकार कर लिया, परन्तु प्रशासन ने उसे सजा सुनाने में आठ महीने लगा दिये. और जब उसके लिए ‘दो महीने तक पुस्तकालय में प्रवेश

निषेध’ की सजा सुनायी गयी, तब वह अपना पाठ्यक्रम पूरा करके वहां से जा चुका था.

(साभारः सारिका, 1 दिसम्बर, 1981)

कथासार

धर्म बनाम प्रेम

नोबोल पुरस्कार प्राप्त पोलैंण्ड के प्रथम लेखक हेनरिक सीनकीविच के चर्चित उपन्यास ‘को वाडिस’ का कथा-सार

ह नीरो का समय था. नीरो, जिसकी निरंकुश राजशाही तले पनपते बर्बर दमन से रोमवासी ईसाई बेतरह आक्रांत थे. ऐसे समय में लिजिया ने अपना प्रेमी विनिशियस को चुना जो पैगेन (रोम निवासियों का धर्म) था. विनिशियस की धर्मांधता का अहसास लिजिया को उसके महल में जाने पर हुआ. विनिशियस का पूरा महल ईसाई विरोध में आकंठ डूबा हुआ था. वहां जाते ही लिजिया का भी जीवन असुरक्षित हो उठा. लेकिन उसके वफादार नौकर अर्सस ने उसकी मदद की और लिजिया जान बचाकर महल से निकल भागी.

वह भागकर ईसाइयों के बीच छप गयी. विनिशियस उसका पीछा कर रहा था. धर्म के उन्माद ने उसके मन में लिजिया के प्रति प्रेम की स्मृति तक पोंछ डाली थी. विनिशियस अपने प्रयत्न में सफल नहीं हो सका और लिजिया पर खुले आक्रमण में लिजिया के नौकर अर्सस द्वारा बेतरह घायल हुआ. ईसाई विरोधी होने के बावजूद ईसाइयों द्वारा ही उसकी देखभाल की गयी जिसके परिणामस्वरूप वह न सिर्फ मरने से बच गया वरन् पूर्ण स्वस्थ भी हो गया. ईसाई लोगों के मानवीय प्रेम और सेवा-भावना ने उसे इस कदर प्रभावित किया कि वह स्वयं भी ईसाई मत को मानने-स्वीकारने लगा और लिजिया के प्रति उसका मन फिर से प्रेमिल हो उठा.

इस बीच नीरा की कूटनीति के अनुसार रोम में आग लगा दी गयी, ताकि यह आरोप ईसाइयों पर मढ़ कर उन्हें दंडित किया जा सके. विनिशियस ने लिजिया को बचाने का प्रयत्न किया लेकिन सफल न हो सका. लिजिया और अर्सस को गिरफ्तार कर, जंगली सांड़ के सींग से बांध अखाड़े में लाया गया जहां अर्सस ने सांड की गर्दन मरोड़ दी और एक बार पुनः लिजिया को बचा लिया. यह देख दर्शकों ने लिजिया और अर्सस को छोड़ देने का आग्रह किया. जिसके फलस्वरूप दोनों को मुक्त कर दिया गया. मुक्त होते ही लिजिया ने अपने प्रेमी विनिशियस से विवाह कर लिया. अंततः प्रेम ही विजयी हुआ और धर्मांधता परास्त हुई.

(साभारः सारिका, 16 अक्तूबर, 1982)

 

समाधान

राजेश माहेश्वरी

रागिनी एक संभ्रांत परिवार की पढ़ी-लिखी, सुंदर एवं सुशील लड़की थी. उसका विवाह एक कुलीन परिवार के लड़के राजीव के साथ संपन्न हुआ था. उसके माता-पिता आश्वस्त थे कि उनकी बेटी उस परिवार में सुखी रहेगी, परंतु वहां पर उसके विवाह के कुछ माह बाद ही उसे दहेज के लिये पीड़ित किया जाने लगा और उसकी यह पीड़ा प्रतिदिन उस पर हो रहे अन्याय से बढ़ती जा रही थी. उसका पति भी प्रतिदिन नशे का सेवन कर उसके साथ दुर्व्यवहार करने लगा था जिससे वह बहुत दुखी हो गयी थी. एक दिन तो हद ही हो गई जब उसके पति ने उस पर हाथ उठा दिया. उसके पड़ोसी भी उसके प्रति सहानुभूति रखते हुए उसे सलाह देते थे कि वह यह बात अपने माता-पिता को बताये एवं पुलिस की मदद भी प्राप्त करे, परंतु रागिनी समझती थी कि इससे कुछ समय के लिये राहत तो मिल सकती है, परंतु यह स्थायी समाधान नहीं है.

जब उस पर अत्याचार की पराकाष्ठा होने लगी तो उसने गंभीरतापूर्वक चिंतन मनन करके एक कठोर निर्णय ले लिया जो कि सामान्यतया भारतीय नारी के लिये चुनौतीपूर्ण था उसका पति प्रतिदिन की आदत के अनुसार शाम को नशा करके घर आया और रागिनी को ऊंची आवाज में डांटता हुआ उस पर हाथ उठाने लगा. तभी रागिनी ने उसका हाथ अपने हाथ से जोरों से पकड़ लिया और जब उसने दूसरा हाथ उठाने का प्रयास किया तो रागिनी ने अपनी पूरी शक्ति और ताकत से उसके इस प्रहार को रोककर उसे जमीन पर पटक दिया. वह साक्षात रणचंडी का अवतार बन गयी थी. वह समाज को यह बताना चाहती थी कि नारी अबला नहीं सबला है और वह अत्याचार का प्रतिरोध भी कर सकती है. अब उसने पास ही में पड़े एक डंडे से राजीव पर प्रहार कर दिया. राजीव डंडे की चोट से एवं अपनी पत्नी के इस रौद्र रूप को देखकर दूसरे कमरे की ओर भाग गया. यह एक कटु सत्य है कि नशा करने वाले व्यक्ति का शरीर अंदर से खोखला हो जाता है. वह ऊंची आवाज में बात तो कर सकता है परंतु उसमें लड़ने की शक्ति खत्म हो जाती है. राजीव की बहन उसे बचाने हेतु बीच में आयी, परंतु वह भी डंडे खाकर वापस भाग गयी.

यह घटना देखकर मुहल्ले वाले राजीव के घर के सामने इकट्ठे होने लगे और महिलाओं का तो मानो पूरा समर्थन रागिनी के साथ था. रागिनी एक स्वाभिमानी महिला थी जिसने अपने माता-पिता के पास न जाकर एक मकान उसी मोहल्ले में किराए पर ले लिया. वह स्वावलंबी बनना चाहती थी. वह पाक-कला में बहुत निपुण थी. उसने इसका उपयोग करते हुए अपनी स्वयं की टिफिन सेवा प्रारंभ कर दी. शुरू-शुरू में तो उसे काफी संघर्ष एवं चुनौतियों का सामना करना पड़ा, परंतु धीरे-धीरे सफलता मिलती गयी.

आज वह एक बड़ी दुकान की मालिकन है जिसमें सौ से भी ज्यादा महिलाएं कार्य कर रही हैं. उसकी प्रगति देखकर राजीव और उसका परिवार मन ही मन शर्मिंदा होने लगा और अपनी हरकतों के कारण पूरे मुहल्ले में सिर उठाने के लायक नहीं रहा. हमें जीवन में संकट से कभी घबराना नहीं चाहिये. जीवन में कभी भी चिंता करने से समस्याएं नहीं सुलझती हैं. समाधान पर ध्यान केंद्रित कर इस दिशा में कर्म करना चाहिए.

नाम

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मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर 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जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: प्राची अप्रैल 2016 : लघुकथाएँ
प्राची अप्रैल 2016 : लघुकथाएँ
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