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इटली की लोक कथाएँ–1 : 4 और सात // सुषमा गुप्ता

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एक बार एक स्त्री थी जिसके एक बेटी थी। उसकी वह बेटी बहुत बड़ी और मोटी थी। जब उसकी माँ उसके लिये मेज पर सूप लाती थी तो वह उसका पहला कटोरा पीत...

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एक बार एक स्त्री थी जिसके एक बेटी थी। उसकी वह बेटी बहुत बड़ी और मोटी थी। जब उसकी माँ उसके लिये मेज पर सूप लाती थी तो वह उसका पहला कटोरा पीती, फिर दूसरा, फिर तीसरा और फिर भी वह माँगती ही रहती।

उसकी माँ भी उसका कटोरा भरती ही रहती और गिनती रहती – “यह तीसरा”, “यह चौथा”। जब वह लड़की सूप का सातवाँ कटोरा माँगती तो उसकी माँ बजाय उसका कटोरा भरने के उसके खाली कटोरे को उसके सिर पर मारती, चिल्लाती और कहती “और यह सात”।

एक बार एक बहुत ही अच्छे कपड़े पहने एक नौजवान उधर से गुजर रहा था कि उसने उस लड़की की माँ को खिड़की से देखा कि वह सूप का कटोरा उस लड़की के सिर पर उलटा करके मार रही थी और उससे कह रही थी “और यह सात”।

उस नौजवान को उस मोटी लड़की से प्यार हो गया। वह अन्दर चला गया और उसने पूछा — “सात क्या माँ जी?”

अपनी बेटी की इतनी भूख से शरमिन्दा माँ बोली — “सात ऊन कातने की तकली बेटा। यह मेरी बेटी है जो ऊन कातने के पीछे इतनी पागल है कि उसने आज सुबह से भेड़ के ऊपर के बालों से सात तकली ऊन कात ली हैं।

क्या तुम सोच सकते हो कि उसने इस सुबह से सात तकली ऊन कात दी है और अभी और भी कातना चाहती है। उसी को रोकने के लिये मुझे उसे मारना पड़ा।”

वह नौजवान बोला — “अगर यह इतनी ही मेहनत करने वाली लड़की है तो आप इसे मुझे दे दें। मैं कोशिश करूँगा कि अगर आप सच बोल रही हैं तो मैं इससे शादी कर लूँ।”

माँ ने अपनी उस बेटी को उस नौजवान को दे दिया और वह नौजवान उसको अपने घर ले गया। घर ले जा कर उसने उसको एक कमरे में बन्द कर दिया।

उस कमरे में बहुत सारी ऊन पड़ी थी कातने के लिये। उसको वहाँ ले जा कर वह नौजवान उससे बोला — “मैं समुद्री जहाज का कप्तान हूँ और अभी मैं एक समुद्री यात्रा पर जा रहा हूँ। अगर तुम यह सारी ऊन मेरे वापस आने तक कात दोगी तो मैं अपनी यात्रा पर से आ कर तुमसे शादी कर लूँगा।”

इस कमरे में बहुत सुन्दर सुन्दर कपड़े और जवाहरात भी रखे थे क्योंकि वह कप्तान बहुत अमीर था। उसने उससे यह भी कहा — “जब तुम मेरी पत्नी बन जाओगी तब ये सारी चीज़ें तुम्हारी हो जायेंगी।”

यह कह कर वह उसको उस ऊन के साथ वहीं छोड़ कर अपनी यात्रा पर चला गया।

अब क्या था। अब तो वह लड़की थी और वह कमरा था। वह रोज नयी नयी पोशाकें पहनती नये नये जवाहरात पहनती। उसके दिन तो बस ऐसे ही गुजरने लगे। वह उन कपड़ों और गहनों को पहन कर अपने को शीशे में देखती और अपनी तारीफ करती।

बाकी समय वह यह सोचने में गुजारती कि वह क्या खायेगी और फिर घर के नौकर उसके लिये वही बनाते जो वह उनसे बनाने के लिये कहती।

अभी तक उसने उस ऊन को हाथ तक नहीं लगाया था जो उसको कातनी थी और अब कप्तान के आने में केवल एक दिन ही बाकी रह गया था। लड़की ने उस कप्तान से शादी की सारी उम्मीदें छोड़ दीं और रो पड़ी।

वह अभी रो ही रही थी कि खिड़की से चिथड़ों का एक थैला उसके पैरों के पास आ कर गिर पड़ा।

उसने उस थैले की तरफ देखा तो वह कोई चिथड़ों का थैला नहीं था बल्कि वह तो एक बुढ़िया थी जिसकी लम्बी लम्बी पलकें थीं। उसने लड़की से कहा — “डरो मत। मैं तुम्हारी सहायता करने आयी हूँ। मैं यह ऊन कातती हूँ और तुम इस ऊन की लच्छी बनाती जाओ।”

बच्चों, तुमने कहीं भी कोई भी इतनी तेज़ ऊन कातता नहीं देखा होगा जितनी तेज़ वह बुढ़िया ऊन कात रही थी। 15 मिनट के अन्दर अन्दर उसने वह सारी ऊन कात दी।

वह जितना ज़्यादा ऊन कातती गयी उसकी पलकें उतनी ही ज़्यादा लम्बी होती गयीं। पहले वे उसकी नाक से लम्बी हुईं, फिर उसकी ठोड़ी से लम्बी हुईं और फिर वे एक फुट लम्बी हो गयीं। फिर भी वह लम्बी होती ही जा रही थीं।

जब उसका काम खत्म हो गया तो लड़की ने पूछा — “मैम, मैं इसके बदले में आपको क्या दूँ?”

वह बुढ़िया बोली — “तुम्हें मुझे इसके बदले में कुछ देने की जरूरत नहीं है। बस जब तुम्हारी शादी की दावत हो तब मुझे उस दावत में बुला लेना।”

“पर मैं आपको बुलाऊँगी कैसे?”

बुढ़िया बोली — “बस तुम कोलम्बिया बोल देना और मैं आ जाऊँगी। पर भगवान तुम्हारी सहायता करें अगर तुम मेरा नाम भूल गयीं तो इसका मतलब यह होगा कि जैसे मैंने कभी तुम्हारी सहायता की ही नहीं थी और तुम्हारा यह सब काम बेकार हो जायेगा।”

अगले दिन कप्तान जब घर वापस आया तो उसने देखा कि उसकी तो सारी ऊन कती पड़ी है। कती हुई ऊन देखते ही वह तो बहुत खुश हो गया और उसके मुँह से निकला “वाह, बहुत बढ़िया। मुझे लगता है कि तुम ही वह लड़की हो जिसको मैं अपनी शादी के लिये ढूँढ रहा था।

लो ये कपड़े और जवाहरात लो। ये मैंने तुम्हारे लिये ही खरीदे थे। पर अभी मुझे एक और समुद्री यात्रा पर जाना है। तब तक तुम एक इम्तिहान और दे दो।

यह उस ऊन से दोगुनी ऊन है जो मैंने तुमको पहले दी थी। अगर जब तक मैं अपनी यात्रा से वापस आऊँ तब तक तुम इसको कात दो तो मैं तुमसे वहाँ से आ कर शादी कर लूँगा।” इतना कह कर वह नौजवान वहाँ से फिर चला गया।

उसके जाते ही जैसे उस लड़की ने पहले किया था वैसे ही वह अब की बार भी करती रही। कप्तान के वापस आने तक वह कपड़ों और गहनों को पहन पहन कर देखती रही और अच्छे अच्छे खाने खाती रही जब तक कि कप्तान के आने का आखिरी दिन नहीं आ गया। और वह सारी ऊन कातने के लिये वहीं पड़ी रही।

जब कप्तान के आने का आखिरी दिन आया तो वह फिर रोने बैठ गयी। तभी कमरे की चिमनी के रास्ते से एक पोटली आ गिरी और उसके पैरों तक लुढ़कती चली आयी।

पहले की तरह से उस पोटली में से भी एक बुढ़िया निकल आयी। इस बुढ़िया के होंठ नीचे तक लटक रहे थे।

इस बुढ़िया ने भी इस लड़की से कहा कि वह उसकी सहायता करने के लिये वहाँ आयी थी। उसने इससे पहले वाली बुढ़िया से भी ज़्यादा मेहनत और तेज़ी से काम किया।

जितना ज़्यादा वह ऊन कातती जाती थी उसके होंठ उतने ही ज़्यादा नीचे को लटकते जाते थे। इस बुढ़िया ने वह सारी ऊन आधा घंटे में कात कर रख दी।

जब इस लड़की ने उस बुढ़िया से पूछा कि वह उसको इसके बदले में क्या दे तो इसने भी यही कहा कि उसको इसके बदले में कुछ देने की जरूरत नहीं है। बस जब उसकी शादी कप्तान से हो तब वह उसको अपनी शादी की दावत में बुला ले।

लड़की ने पूछा कि वह उसको कैसे बुलाये।

तो उस बुढ़िया ने भी वही जवाब दिया — “बस तुम मुझे कोलम्बरा कह कर पुकार लेना मैं आ जाऊँगी। पर मेरा नाम मत भूल जाना क्योंकि अगर तुम मेरा नाम भूल गयीं तो मेरा यह सब किया धरा बेकार हो जायेगा। और फिर तुमको इसका फल भुगतना पड़ेगा।” यह कह कर वह वहाँ से चली गयी।

अगले दिन कप्तान अपनी यात्रा से वापस आ गया। उस सारी ऊन को कता हुआ देख कर वह तो आश्चर्य में पड़ गया पर ऊन तो कत चुकी थी सो इसमें अब शक की तो कहीं कोई गुंजायश ही नहीं थी।

पर फिर भी उससे रहा नहीं गया तो उसने उससे पूछ ही लिया — “यह सब ऊन तुमने काती है?”

“हाँ मैंने अभी अभी अपना काम खत्म किया है।”

“तुम ये कपड़े और जवाहरात लो। मैंने ये भी तुम्हारे लिये ही लिये थे। अब अगर तुम यह तीसरा ढेर भी मेरे वापस आने तक कात दो तो मैं तुमसे वायदा करता हूँ कि अब की बार मैं तुमसे शादी जरूर कर लूँगा। यह ढेर उन दोनों ढेरों से कहीं ज़्यादा बड़ा है।”

इतना कह कर वह नौजवान अपनी तीसरी समुद्री यात्रा पर चला गया। इस लड़की ने इस बार भी वही किया जो पहली दो बार किया था। उसने अपना सारा समय नये नये कपड़े और गहने पहनने में और अपने आप को शीशे में देखने में और अच्छा अच्छा खाना खाने में बिता दिया और वह ऊन वहाँ ऐसे ही पड़ी रही।

कप्तान के आने से पहले दिन वह फिर रोने बैठ गयी। तभी कमरे की छत की नाली के छेद से फिर से एक फटे कपड़ों की पोटली उसके पैरों के पास आ गिरी और पहले की तरह से उस पोटली में से भी एक बुढ़िया निकल आयी।

इस बुढ़िया के आगे के दाँत बहुत आगे की तरफ निकले हुए थे। इस बुढ़िया ने भी आते ही ऊन कातनी शुरू कर दी। पर यह बुढ़िया तो उन दोनों बुढ़ियों से भी ज़्यादा तेज़ी से ऊन कात रही थी जो उससे पहले उसकी ऊन कात कर गयी थीं।

जितनी ज़्यादा ऊन वह कातती जाती थी उसके दाँत उतने ही और ज़्यादा आगे की तरफ निकलते जाते थे। उसने वह सारी ऊन बहुत जल्दी ही खत्म कर दी।

जब बुढ़िया का काम खत्म हो गया तो इस लड़की ने इस बुढ़िया से भी पूछा कि वह उसको इस काम के बदले में क्या दे।

इस बुढ़िया ने भी वही कहा जो पहली दो बुढ़ियों ने कहा था कि अभी उसको कुछ भी देने की जरूरत नहीं है। बस केवल जब उसकी शादी कप्तान से हो तो वह उसको अपनी शादी की दावत में बुला ले।

पूछने पर कि वह लड़की उस बुढ़िया को अपनी शादी की दावत में कैसे बुलाये वह बुढ़िया बोली “बस तुम मुझे कोलम्बन कह कर बुला लेना मैं आ जाऊँगी। पर अगर तुम मेरा नाम भूल जाओगी तो बस समझ लेना कि जैसे तुमने मुझे पहले कभी देखा ही नहीं था।” यह कह कर वह बुढ़िया वहाँ से तुरन्त ही गायब हो गयी।

अगले दिन कप्तान अपनी समुद्री यात्रा से लौट आया और इतनी सारी ऊन कती देख कर तो उसने आश्चर्य से अपने दाँतों तले उँगली दबा ली। पर क्योंकि अब ऊन तो कती पड़ी थी इसलिये आज भी शक की कोई गुंजायश नहीं थी।

यह सब देख कर वह बोला — “अब हमारी तुम्हारी शादी होगी।” और उसने शादी की तैयारियाँ शुरू कर दीं। उसने अपनी शादी में शहर के सभी कुलीन लोगों को बुलाया था। शादी की तैयारियों में वह लड़की उन बुढ़ियों को बिल्कुल ही भूल गयी।

जिस दिन उसकी शादी होने वाली थी उस दिन सुबह उसको याद आया कि उसको तो उन तीनों बुढ़ियों को भी बुलाना था जिन्होंने उसको ऊन कातने में सहायता की थी। पर जब वह उनके नाम याद करने लगी तो उनमें से तो उसको एक का भी नाम याद नहीं आया। वे उसके दिमाग से बिल्कुल ही निकल गये थे।

उसने अपने दिमाग पर बहुत ज़ोर डाला कि वे नाम उसको किसी तरह से याद आ जायें पर उसको तो उन तीनों में से एक का नाम भी याद नहीं आया।

वह हमेशा खुश रहने वाली लड़की दुख के सागर में डूब गयी। कप्तान ने यह भाँप लिया कि वह लड़की बहुत परेशान है तो उसने उससे पूछा — “क्या बात है तुम इतनी परेशान क्यों हो?”

पर वह उसको क्या बताती। जब कप्तान को उसके दुखी होने का कुछ पता न चल सका तो उसने सोचा कि शायद शादी का यह दिन ही ठीक नहीं है सो उसने अपनी शादी की तारीख उस दिन से बदल कर उसके अगले वाले दिन के लिये तय कर दी।

पर उसका अगला दिन तो और भी खराब था। और उसका अगला दिन, यानी शादी का दिन, कैसा था यह तो बताने की जरूरत ही नहीं है। कप्तान को अपनी शादी की तारीख फिर से बदलनी पड़ी।

पर जैसे जैसे दिन बीतते जाते थे वह लड़की और ज़्यादा दुखी और चुप सी होती जाती थी। उसके माथे पर सिकुड़नें पड़ी रहतीं जैसे वह कुछ सोच रही हो और उसको उसकी परेशानी का हल न मिल रहा हो।

कप्तान ने उसको हँसाने की बहुत कोशिश की – उसको चुटकुले सुनाये, हँसी की कहानियाँ सुनायीं पर उसकी कोई भी कोशिश उस लड़की को खुश न कर सकी।

अब क्योंकि वह उसको खुश नहीं कर सका तो एक दिन उसने शिकार पर जाने का प्रोग्राम बनाया। जब वह शिकार के लिये जंगल गया तो इत्तफाक से बीच जंगल में काफी ज़ोर का तूफान आ गया और वह उस तूफान में घिर गया। पास ही में उसको एक झोंपड़ी दिखायी दे गयी सो उस तूफान से बचने के लिये वह उस झोंपड़ी में चला गया।

वह वहाँ पर अँधेरे में खड़ा था कि उसने वहाँ कुछ आवाजें सुनी — “ओ कोलम्बीना, ओ कोलम्बरा, ओ कोलम्बन, मक्का का दलिया बनाने के लिये बरतन आग पर रख दो। लगता है कि वह लड़की तो हमको अपनी शादी की दावत में बुलाने वाली नहीं है।”

यह सुन कर उसने पीछे मुड़ कर देखा तो वहाँ उसको तीन पतली दुबली बदसूरत बुढ़ियें दिखायी दीं। उनमें से एक की पलकों के बाल जमीन तक गिरे हुए थे, तो दूसरी के होंठ उसके पैरों तक आ रहे थे और तीसरी के ऊपर के दाँत इतने बड़े थे कि वे उसके घुटनों तक आ रहे थे।

अब उस कप्तान की कुछ कुछ समझ में आया कि उसकी होने वाली पत्नी दुखी क्यों थी। अब वह उसको ऐसा कुछ बता सकता था जिससे वह हँस सके। और अगर वह इस बात पर भी न हँस सकी तब फिर वह किसी बात पर भी नहीं हँस सकेगी।

सो वह शिकार तो भूल गया और वहाँ से तुरन्त ही अपने घर की तरफ दौड़ चला। जा कर उसने तुरन्त उस लड़की को बुलाया और अपने पास बिठा कर कहा — “पता है आज क्या हुआ? बस तुम सुन लो जो मैं तुमको बताऊँ। और देखो हाँ बीच में मत बोलना।

आज जब मैं जंगल गया तो वहाँ बहुत ज़ोर की बारिश आ गयी। और बारिश से बचने के लिये मैं एक झोंपड़ी में चला गया।

वहाँ मैंने तीन जादूगरनियाँ देखीं जिनमें से एक की पलकों के बाल जमीन पर लटक रहे थे, तो दूसरी के होंठ उसके पैरों तक लटके हुए थे और तीसरी के दाँत उसके घुटनों तक लम्बे थे। और वे एक दूसरे को कोलम्बिया, कोलम्बरा और कोलम्बीना कह कर पुकार रही थीं।”

यह सुन कर उस लड़की का चेहरा तो वाकई चमक गया और वह बहुत ज़ोर से हँस पड़ी।

जब उसकी हँसी थोड़ी सी रुकी तो वह बोली — “शादी की दावत की तैयारी करो। पर तुम मेरे ऊपर एक मेहरबानी और कर दो। क्योंकि तुमने उन तीन जादूगरनियों के नामों से मुझे हँसाया है मैं उनको भी अपनी शादी की दावत में बुलाना चाहती हूँ।”

“यह भी कोई पूछने की बात है। तुम उनको जरूर बुलाओ।” और फिर उस लड़की ने उनको अपनी शादी की दावत में बुलाया।

शादी की दावत के दिन उन तीनों के लिये अलग से एक गोल मेज सजायी गयी। वह मेज इतनी छोटी थी कि उन तीनों की आँखों की लम्बी पलकों के बाल, लटकते होठ और बड़े बड़े दाँत कहाँ थे यह किसी को भी दिखायी नहीं दिये।

जब खाना खत्म हो गया तो कैप्टेन ने कोलम्बीना से पूछा — “आपकी पलकों के बाल इतने लम्बे क्यों हैं?”

कोलम्बीना ने जवाब दिया — “बहुत ही बारीक धागा कातने की वजह से मेरी आँखों पर बहुत ज़ोर पड़ता है इसी लिये वे इतने लम्बे हो गये हैं।”

फिर कैप्टेन ने कोलम्बरा से पूछा — “मैम, क्या मैं जान सकता हूँ कि आपके होठ इतने नीचे को लटके हुए क्यों हैं?”

कोलम्बरा बोली — “क्योंकि मैं जब धागा कातती हूँ तो अक्सर अपनी उँगली गीली करने के लिये अपने होठों पर हाथ फेरती रहती हूँ इसलिये वे लटकते जाते हैं।”

फिर कैप्टेन ने कोलम्बीना से पूछा — “और कोलम्बीना जी आप? आपके दाँत इतने लम्बे कैसे हो गये?”

कोलम्बीना बोली — “क्योंकि मुझे अक्सर धागे में पड़ी गाँठें अपने दाँतों से काटनी पड़ती हैं न, इसी लिये।”

“ओह अच्छा अच्छा।”

फिर वह अपनी पत्नी से बोला — “जाओ और एक धागा लपेटने वाली तकली ले कर आओ।”

जब वह तकली ले कर आयी तो उसने उसको वहीं आग में फेंक दिया और बोला — “अब से तुम कभी धागा नहीं कातोगी।”

इसके बाद वह मोटी लड़की खुशी खुशी कैप्टेन के साथ आराम से रही। उसको कातने के लिये फिर कभी धागा नहीं दिया गया।

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं. इथियोपिया की 45 लोककथाओंको आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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गुणशेखर,1,ग़ज़लें,484,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,129,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,87,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,22,पाठकीय,61,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,309,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी 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कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,224,लघुकथा,806,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,306,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,57,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1882,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,637,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,676,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,52,साहित्यिक गतिविधियाँ,181,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,51,हास्य-व्यंग्य,52,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: इटली की लोक कथाएँ–1 : 4 और सात // सुषमा गुप्ता
इटली की लोक कथाएँ–1 : 4 और सात // सुषमा गुप्ता
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