संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 43 : उन्मुक्त आकाश में परिंदों की उड़ान सा बचपन // अमित शर्मा

SHARE:

प्रविष्टि क्र. 43 उन्मुक्त आकाश में परिंदों की उड़ान सा बचपन अमित शर्मा बचपन ज़ीवन का सबसे खूबसूरत दौर होता है। गौर करने वाली बात यह है कि केव...

प्रविष्टि क्र. 43

उन्मुक्त आकाश में परिंदों की उड़ान सा बचपन

अमित शर्मा

बचपन ज़ीवन का सबसे खूबसूरत दौर होता है। गौर करने वाली बात यह है कि केवल “ज़ीवन” ही नहीं बल्कि निश्चित रूप से प्रेम चोपड़ा से लेकर अमरीश पुरी तक, सबके लिए बचपन खूबसूरत दौर रहा होगा। भौगोलिक दृष्टि से मेरा जन्म राजस्थान के भीलवाड़ा जिले में हुआ था। मेरा जन्म, परिवार में ऐतिहासिक और धार्मिक घटना माना गया क्योंकि मेरा जन्म काफ़ी मिन्नतों के बाद हुआ था। मेरे जन्म पर मिठाइयाँ और बधाइयाँ थोक के भाव में बाँटी गई थी। ब्राह्मण होने का टीका तो जन्मजात लगा हुआ था लेकिन फिर भी सुरक्षा की दृष्टि से नज़र और पोलियो के टीके समय से पूर्व लगवा लिए गए थे।

ब्राह्मण परिवार (शर्मा) में खाने को ज़्यादा महत्व दिया जाता है, पीने को नहीं। पीने के लिए चाय और नींबू पानी के अतिरिक्त मैंने अपनी हरकतों से घर के वरिष्ठजनों का सुकून भी पिया था, ऐसा आभास और स्वीकारोक्ति मुझसे अब बड़ा होने पर जबरन करवाई जाती है। बचपन में, मैं बहुत गोल -मटोल था। वृहद जनकल्याण के लिए, विनम्रता का अतिक्रमण करके कहना ही होगा कि, ज़रूर मुझे देखकर ही विज्ञानियों ने कंफर्म किया होगा कि पृथ्वी गोल है। गोरेपन का तो मानो, मैं वरदान लेकर पैदा हुआ था। अगर फेयर एंड लवली वाले अपनी क्रीम का उस ज़माने में मुझसे विज्ञापन करवाते तो शायद आज बाबा रामदेव को इस क्षेत्र में उतरने की ज़हमत ना उठानी पड़ती।

होश सँभालने से पहले मुझे केवल शरारतों का मोर्चा सँभालने का अनुभव था। शरारतों की कई वैध-अवैध खदानों का मैं मालिक था। मैं,घर के सभी बच्चों के साथ मिलकर शरारत पथ पर बड़ी शराफत से चलने का प्रयास करता था। पुरानी किसी शरारत को दोहराना हमारी शान के ख़िलाफ़ था। हर बार नई शरारत से हम शरारत और शैतानी जैसे रचनात्मक कार्य को नीरस होने से बचाते थे।

मैंने बचपन में शरारतों का जो प्रतिघंटा औसत स्थापित किया है, उसे आगे चलकर तोड़ना हमारे परिवार के किसी भी बच्चे के लिए काफ़ी मुश्किल होगा। अन्य बच्चे अपनी शरारतों से माँ-बाप की नाक में दम कर देते है लेकिन मैं थोडा ज़्यादा प्रतिभावान था, नाक के साथ साथ कान में भी दम कर देता था।

शरारत करते -करते मैंने बहुत चोंटें और उसके बाद घर वालों की मार, दोनों खाई थी जिससे पेट और दिमाग हमेशा भरा हुआ ही रहता था। मुझे पटाखे चलाने का भी बहुत शौक था। हर दीपावली पर, मैं मिठाइयों और पटाखों के धुंए दोनों का “एवन-सेवन” करता था। पटाखों को ज़मींदोज किए बिना बचपन की कोई दीपावली मैंने नहीं बीतने दी। मुर्गा छाप से लेकर ओनिडा छाप तक सभी ब्रांड के पटाखे चलाए। किसी ब्रांड के साथ व्यक्तिगत स्तर पर कोई भेदभाव नहीं होने दिया। फुलझड़ी, रॉकेट और अनार सभी को मैंने अपने कर -कमलों से माचिस दिखाकर उनको अपने जीवन का उद्देश्य पूरा करने में मदद की। एक दीपावली की रात को, मैं इसी तरह से एक “अनार जी” को माचिस दिखा रहा था लेकिन “अनार जी” मेरे माचिस दिखाने के तरीके से कुपित हो गए और जलती माचिस के रास्ते से अपनी जीवन यात्रा के अगले पड़ाव पर निकलने से मना कर दिया।

बालहठ में, मैं “अनार जी” के इरादे भांपने से चूक गया और ज़ब दूसरी बार ज़िद में उनको माचिस दिखाई तो अनार जी का गुस्सा रॉकेट की तरह सातवें आसमान पर जा पहुँचा। इस गुस्से में अनार जी दाने छोड़ने के बजाय फट पड़े और मेरा हाथ जलाने के बाद ही उनका गुस्सा और जीवन शांत हुआ। इस दुर्घटना के तुरंत बाद, मौका-ए-वारदात से मुझे सीधे प्राथमिक उपचार हेतु हॉस्पिटल पहुँचाया गया। प्राथमिक उपचार के बाद ज़ब स्थिति नियंत्रण में आई तो सबने मेरे जले हुए हाथ के पीछे, मेरा ही हाथ बताया, मतलब मुझे ही दोषी ठहराया और अपना बचाव करने के लिए मेरे पास “अनार जी” के मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट को दोष देने के अलावा और कोई चारा नहीं था।

बचपन में होश से मेरी कभी मुठभेड़ नहीं हुई , बेफिक्री ने उसका अपहरण कर उसे अंजान जगह बंधक बना रखा था। घर के बड़ों ने अपने बड़प्पन के खाद-बीज से मेरे बचपन को खूब सींचा, बचपन रूपी पौधे को विशाल वटवृक्ष बनने का धैर्य और ध्येय दोनों दिखाया। मैं घर का इकलौता चिराग हूँ और चिराग से घर को पर्याप्त मात्रा में रोशनी मिलती रहे इसीलिए बचपन में राग-अनुराग की आपूर्ति, माँग की तुलना में कही ज़्यादा थी। राग-अनुराग की इतनी अधिक आपूर्ति की खपत ना कर पाने के कारण, राग-अनुराग का स्टॉक ठीक उसी प्रकार ख़राब हो जाता था जिस प्रकार से गोदामों में पड़ा हुआ अन्न ख़राब हो जाता है। दुःख होता था लेकिन बाल सुलभ भावनाएं राग-अनुराग का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने से रोक और टोक देती थी। सामान्य लोगों के लिए बचपन, मस्ती की पाठशाला होता है लेकिन हमारे जैसे बालकों के लिए बचपन “मस्ती का विश्वविद्यालय” होता है जहाँ विद्यार्थी से लेकर कुलपति तक सभी केवल “मस्तीनोपषद” का अखंड पाठ करते रहते है।

मम्मी-पापा ने हमेशा गोद में चढ़ाया लेकिन कभी सर पर नहीं चढ़ाया और ना ही मैं कभी चढ़ पाया क्योंकि चढ़ने के लिए कभी कोई ऐसी सीढ़ी ही उपलब्ध नहीं थी। बचपन में दादा-दादी की आँखों का मैं तारा हुआ करता था लेकिन कभी-कभी वो बहुत लाड़-प्यार से मुझे सूरज और चंदा भी कह देते थे।

कहाँ और सुना जाता रहा है कि मूलधन (बच्चों) से ज़्यादा ब्याज (बच्चों के बच्चे) प्यारा होता है इसीलिए मेरे पैदा होने के बाद मेरे दादा-दादी ने अपने लाड़- प्यार और दुलार की सारी संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा मेरे नाम कर दिया था जिस पर घर के सभी सदस्यों ने अपनी सहमति के अदृश्य हस्ताक्षर कर रखे थे। दादा-दादी का प्यार गंगा के पानी जितना निर्मल और गीता की सौगंध जितना पवित्र होता है। 24 कैरेट सोने में खोट निकल सकती है लेकिन दादा-दादी से मिले स्नेह और वात्सल्य में किसी प्रकार की खोट मिलना उतना ही मुश्किल है जितना मुश्किल आज की राजनीति में ईमानदार नेता मिलना। दादा-दादी सांप्रदायिक विचारो के थे , गाय पालते थे और साथ में पूरा परिवार भी। मेरे अंदर धार्मिक संस्कारों की नींव बचपन से मेरे दादा-दादी ने ही रखी थी। वे सुबह 4 बजे उठ जाते थे और इसके लिए कभी उन्होंने घडी के अलार्म की गुलामी नहीं की। इतना जल्दी उठकर वे भगवान की पूजा अर्चना में लग जाते थे। मेरी नींद अक्सर उनके द्वारा की जाने भगवान की आरती की घंटी से ही खुलती थी। उठते ही आरती के बोल कानों में पड़ते थे, जो कानों के रास्ते ह्रदय में उतर जाते थे। भयंकर सर्दी हो या गर्मी, दादा-दादी का जल्दी उठकर भगवान की पूजा अर्चना करने का नियम ,मेरे देरी से उठने के नियम की तरह अटूट था। दादी हमेशा रात को सोने से पहले कहानियां सुनाया करती थी , उस समय टाइम पास करने के लिए फेसबुक, वाट्सएप नहीं होते थे लेकिन दादी की कहानियां फेसबुक और वाट्सएप की पोस्ट्स से कहीं ज़्यादा रोचक और शिक्षादायक होती थीं। दादी की कहानियों पर हम फेसबुक और वाट्सएप की पोस्ट्स से ज़्यादा कमेंट्स करते थे। बचपन में दादा-दादी मेरे लिए किसी राजनैतिक दल के हाईकमान जैसी हैसियत रखते थे जिनका समर्थन हमेशा मेरे साथ ही होता था। खेल कोई भी हो, वो हमेशा मेरे पाले में ही नज़र आते थे। माता-पिता की डांट और फटकार और कभी-कभी मार से रक्षा के लिए हाईकमान का समर्थन मेरे लिए बुलेटप्रूफ जैकेट का काम करता था। दादा-दादी ने हमेशा मेरी वकालत करते हुए भी सही और गलत का अंतर समझाया, नम्रता का पाठ पढ़ाया और जीवन में मेहनत का महत्व समझाया। हालाँकि उनके समझाने को मैं उतनी ही गंभीरता से लेता था जितनी गंभीरता से चुनाव जीतने के बाद नेताजी जी अपने चुनाव क्षेत्र को लेते है।

मेरी स्कूली शिक्षा अढ़ाई साल की उम्र में ही शुरू हो गई थी और मेरा स्कूल मेरे घर से, शतरंज के घोड़े की अढ़ाई चाल जैसी दूरी पर ही था। इतने नज़दीकी स्कूल में भर्ती करवाने का एकमात्र मुख्य उद्देश्य यहीं था कि मैं आपातकालीन स्थितियों में जल्द ही वापस घर भेजा जा सकूँ। मुझे तैयार करके स्कूल भेजना घरवालों के लिए एक मिशन की तरह होता था क्योंकि मैं स्कूल जाने में ठीक उसी तरह से आनाकानी करता था जैसे सांसद संसद सत्र में भाग लेने से करते है। स्कूल जाते वक़्त मैं, माँ और दादी से लिपट-लिपट कर रोने लगता था मानो मुझे स्कूल नहीं सीमा पर लड़ने भेजा जा रहा हो। स्कूल ना जाने के लिए मैं कई बार पेट दर्द और सर दर्द जैसे बहाने भी बनाया करता था जो कभी-कभी स्वीकृत हो जाता था और कभी-कभी तिरस्कृत। मुझे भूख बहुत लगती थी, इसीलिए एक टिफ़िन बॉक्स साथ में होने के बावजूद लंच के समय में राहत सामग्री की एक अतिरिक्त खेप, मेरे घर से तुरंत हेड मास्टर जी द्वारा मँगवा ली जाती थी। हेड मास्टर साहब से स्कूल में ही घर जैसा संबंध स्थापित हो गया था। वे स्कूली समय में, मेरे और घर वालों के बीच सेतु का कार्य करते थे। एक ऐसा सेतु जो किसी भी हेतु, कभी भी उपयोग में लाया जा सके।

कुछ शुरुआती व्यवधानों के बाद मैं स्कूल जाने का अभ्यस्त हो गया था, फिर घरवालों को भेजना नहीं पड़ता था, मैं खुद ही जाने को तत्पर रहता था। स्कूल जाने के लिए दूसरों पर मेरी निर्भरता समाप्त होने को, घर में एक पर्व की तरह से सेलिब्रेट किया गया। हमारे स्कूल में लड़के और लड़कियां साथ पढ़ते थे,केवल पढ़ते ही नहीं थे, हर काम साथ करते थे। क्लास वर्क और होमवर्क दोनों, मैं अपने मूड के हिसाब से करता था ना कि अध्यापकों के मूड के हिसाब से। अध्यापकों ने भी शीघ्र ही मेरी प्रतिभा पहचानकर मुझसे ज़्यादा उम्मीद रखना बंद कर दिया था जिसका सबसे बड़ा फायदा ये हुआ कि मेरे सर पर कभी भी अध्यापकों की उम्मीदों को तार-तार करने का पाप नहीं लगा। मुझे शुरू से समझ आ गया था कि आशा ही निराशा का मूल कारण है इसी वजह से मैंने अपने शिक्षकों को किसी भी तरह की आशा से वंचित रखकर उन्हें निराश होने से बचा लिया।

पढाई में मैं कभी कमज़ोर नहीं रहा तो कभी दारा सिंह भी नहीं हो पाया। पढाई के क्षेत्र में मेरी स्थिति भारत की तरह विकासशील देश की तरह रही, जो अच्छा तो करना चाहता था लेकिन ज़्यादा कुछ कर नहीं पाता था। हालाँकि मैंने हर परीक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की लेकिन फिर भी मैंने अपनी प्रतिभा के साथ न्याय नहीं किया क्योंकि मुझमें बुरा करने की पूरी प्रतिभा अपने दल-बल के साथ मौजूद थी लेकिन अच्छा करने की कुचेष्टांए हमेशा उन पर भारी पड़ जाती थी। अब ज़ब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि मुझे अपने स्कूली जीवन में और बेहतर करना चाहिए था। मैं हर परीक्षा में और भी अच्छे अंको का मालिक बन सकता था अगर मैंने माता-पिता की झिड़कियों को गंभीरता से लिया होता तो, अगर व्यर्थ समय नहीं गंवाया होता तो। लेकिन लौटा हुआ समय, कालेधन की तरह वापिस नहीं आता है। स्कूली जीवन में एक औसत छात्र होने के बावजूद भी आगे चलकर, मैंने मेहनत और लगन से महागठबंधन करके CA जैसी प्रतिष्ठित परीक्षा में सफलता पाई। मेरे CA बनने के बाद, मेरे कई बचपन के दोस्तों और रिश्तेदारों को झटका लगा क्योंकि उनको कतई इसकी उम्मीद नहीं थी। उनके रिएक्शनस देखकर लगता था कि मैंने उनको अँधेरे में रखकर, उनके साथ बहुत बड़ा धोखा किया हो।

बचपन से मैं काफ़ी अध्ययन-प्रिय रहा हूँ। हमारे मोहल्ले का कॉमिक्स किराए पर देने वाला लड़का आज भी आधी रात को इस बात की गवाही देने को तैयार रहता है क्योंकि उसकी दुकान मेरी वजह से ही चलती थी। गर्मी की छुट्टियों में रोज़, मैं एक रूपया प्रति कॉमिक्स की दर पर दो-तीन कॉमिक्स घर लाता था और सबका रट्टा मारने के बाद ही उनको वापस लौटाता था। चाचा चौधरी, साबू, नागराज, बांकेलाल और लंबू-मोटू जैसे कॉमिक हीरो को लेकर मैं उतना ही भावुक और समर्पित होता था जितना कि कांग्रेसी ,गांधी परिवार को लेकर है। कॉमिक्स पढ़ने का चस्का इतना था कि मेरे द्वारा कॉमिक्स पढ़ने में प्रतिदिन बिताए गए समय में तो आजकल के नेता और सामाजिक कार्यकर्त्ता 2-3 आमरण अनशन सफलतापूर्वक संपन्न कर ले। प्राचीन कारणों से हमारे यहाँ कॉमिक्स पढ़ना अच्छा नहीं माना जाता था किंतु मेरे भागीरथी प्रयासों से “कॉमिक्स-पाठन” को सम्मानित कर्म का दर्ज़ा प्राप्त हुआ। आज भी जानकार लोग हमारे क्षेत्र में “कॉमिक्स पाठन” का सशक्तिकरण कर समाज में इसे समुचित दर्ज़ा दिलाने का श्रेय मुझे ही देते है। कॉमिक्स पढ़ना मेरे लिए केवल टाइमपास या मनोरंजन का साधन नहीं था बल्कि व्यापक समाज हित में, मैं इसे ज़िम्मेदारी भरा कार्य मानता था इसीलिए कॉमिक्स पढ़ने के बाद मैं उसकी गंभीर समीक्षा भी करता था जो कई बार चर्चा करने के बाद दूसरों के दिमाग में प्रकाशित भी हुई थी। कॉमिक्स पढ़ने की दीवानगी हद से तो नहीं गुजरी थी लेकिन हद के पास वाले सर्विस रोड से अक्सर गुजर जाती थी। कॉमिक्स की तरह ही अगर मैंने कोर्स की किताबें पढ़ी होती तो मैं हमेशा मेरिट लिस्ट में स्थान बनाता लेकिन त्यागी प्रकृति का होने के कारण मैंने इस गलाकाट प्रतिस्पर्धा को कम कर मुझसे कम प्रतिभाशाली बच्चों को मेरिट में आने दिया। उम्मीद करता हूँ कि आने वाला समय मेरी इस त्याग-परायणता की कद्र करते हुए मुझे उचित रूप से सम्मानित करेगा।

अध्ययन के साथ-साथ, मैं खेल-कूद में भी रूचि रखता था या यूँ कहे कि खेल-कूद मुझमे संभावनाएं तलाशने के लिए रूचि दिखा रहा था। भिन्न- भिन्न खेलो से, मैं विभिन्न तरीके से खिलवाड़ करता था। क्रिकेट,सितोलिया, गिल्ली-डंडा, छिपन-छिपाई, पकड़नी आदि खेलो को मैं बचपन के प्रथम चरण में ही निपटा चुका था। क्रिकेट से मुझे विशेष प्रेम था लेकिन क्रिकेट ने मेरे साथ प्रेम संबंध में होने के कभी कोई संकेत नहीं दिए थे। इसके बावजूद भी मैं एक तरफ़ा प्रेमी की तरह लगा रहा। बैटिंग, बॉलिंग, विकेट कीपिंग सबमे, मैं हाथ और किस्मत दोनों आजमा चुका था। अपने मोहल्ले की टीम का मैं महत्वपूर्ण हिस्सा था क्योंकि मेरे पास कई बैट्स थे जिनके बिना टीम, मैदान और दिल में नहीं उतर सकती थी। हमारे मोहल्ले की टीम, दूसरे मोहल्ले की टीम से मैच का आयोजन रखती थी जिसे देखने के ज़्यादा “जन” नहीं जुट पाते थे लेकिन फिर भी रोमांच काफ़ी होता था। मैच की ईनामी राशि 11 रूपये से लेकर 51 रूपये तक होती थी जो टीम के सभी खिलाड़ियों द्वारा समान मात्रा में अपने ही घरों में सेंध मार कर जुटाई जाती थी। बॉल को बिना देखे ही हिट करने की क्षमता को देखते हुए मुझे टीम का जयसूर्या और सहवाग कहाँ जाने लगा। इस बात की खबर अगर जयसूर्या और सहवाग को लग जाती तो शायद अभी तक मैं मानहानि के मुकदमों में चप्पल रगड़ रहा होता। इन महान खिलाड़ियों से तुलना होने के बाद मुझ पर अच्छा प्रदर्शन करने का दबाव, महँगाई की तरह बढ़ चुका था । इसी दबाव को कम करने के लिए मैंने अपने नियमित प्रदर्शन को ताक पर रखते हुए एक मैच में, 18 बॉल्स पर अर्धशतक भी जड़ डाला था। इस पारी में मैंने कई बार बॉल को पर्यटन के लिए मैदान के पार भेजा था। इतने अच्छे प्रदर्शन के बाद भी, मुझे मैन ऑफ द मैच के रूप में केवल शाबाशी ही मिली थी क्योंकि अथक प्रयासों के बाद भी उस मैच में ईनामी राशि का जुगाड़ नहीं हो पाया था। इस घटना से पता चलता है कि किस तरह से हमारी सामाजिक व्यवस्था और तानाबाना, प्रतिभाओं को दबाने और हतोत्साहित करने का काम करता है। अगर उस मैच में मुझे मैन ऑफ द मैच का इनाम मिलता तो मैं और ज़्यादा अच्छा खेलने को प्रोत्साहित होता लेकिन होनी को मेरा दूसरा धोनी बनना मंज़ूर नहीं था। बैटिंग के अलावा मैं बॉलिंग को भी अच्छे से ठिकाने लगा लेता था। पहले मैं फ़ास्ट बोलिंग किया करता था लेकिन विकेट नहीं मिलते इसीलिए फिर फ़ास्ट से स्पिन बॉलिंग पर आ गया क्योंकि इतना भागकर बॉलिंग करने के बाद भी अगर विकेट ना मिले तो दिल में दुःख और पैरो में दर्द दोनों होते थे। स्पिन बोलिंग में आराम से टहलते हुए भी बॉल फेंकने की सुविधा होती है और अगर विकेट ना मिले तो भी कोई विकट समस्या नहीं होती है।

केवल खेलने ही नहीं, क्रिकेट देखने का भी मुझे उतना ही जुनून था। भले ही अफगानिस्तान और बांग्लादेश के मैच का सीधा प्रसारण क्यों ना आ रहा हो, मैं बेड पर उल्टा लेटकर उसे पूरी गंभीरता से और सम्मानित निगाहों से देखता था क्योंकि अगर दर्शक खिलाड़ियों से गंभीरता की अपेक्षा करता है तो उसे खुद भी गंभीरता दिखानी होगी।

मेरी इसी गंभीरता पर पिताजी बहुत गंभीर हो जाते थे, उन्होंने मेरे टीवी पर मैच देखने पर अघोषित प्रतिबंध लगा रखा था पर मैंने दोस्त के घर पर पढाई के बहाने मैच देखने का प्रबंध कर प्रतिबंध का तोड़ निकाल रखा था। भारत के मैच तो मैं पूरे लाइव देखने के बाद हाइलाइट्स भी देखकर देश और दर्शक धर्म की गरिमा का पूरा पालन करता था। सचिन, गांगुली और द्रविड़ के सेंचुरी बनाने या जल्दी आउट हो जाने पर हर्ष और शौक के स्पन्दन ,मेरे रोमकूपों से पसीने की तरह निकलते थे।

क्रिकेट के बाद कंचे मेरी प्राथमिकता की सूची में दूसरे नंबर पर आते थे। क्रिकेट को ज़्यादा समय देने के कारण कई बार, कंचे मेरी उपेक्षा का शिकार भी हुए थे लेकिन फिर भी कभी उन्होंने इसकी शिकायत व्यक्तिगत रूप से दर्ज़ नहीं करवाई। उस ज़माने में 1 रुपये में 60 कंचे आते थे, मैं प्लास्टिक की बोतल में कंचे भरकर रखता था। जितने कंचे बोतल में होते थे उससे कहीं ज़्यादा दिल में भरे होते थे। घर के पास के खाली पड़े प्लॉट्स में कंचों की इंडोर प्रतियोगिता चलती रहती थी जहाँ आस-पास के सभी प्रतिभाशाली प्रतिभागी, किंचित भयभीत हुए बिना, कंचों पर सवार होकर अपने कंचात्मक हुनर का प्रदर्शन करते थे। कंचे से कंचे टकराने की ध्वनि मुझे किसी सुमधुर शास्त्रीय संगीत का आभास करवाती थी। विपक्षी से जीते गए कंचे, कंचों की संख्या और आत्मविश्वास दोनों में समान रूप से वृद्धि करते थे। घर में कंचे ऐसी जगह छुपा कर रखने पड़ते थे जहाँ किसी की नज़र और पैर ना पड़े।

क्रिकेट और कंचों के अलावा बॉलीबाल भी मैं अच्छा खेल लेता था। नेट्स पर खड़े होकर मैं अपनी अंगुलियों पर बॉल को ऋतिक रोशन और शाहिद कपूर से भी अच्छा नचा लेता था। लेकिन दुर्भाग्य से देश की झोली में एक अच्छा बॉलीबाल प्लेयर टपकते-टपकते रह गया। देश के दुर्भाग्य ने ही मुझे हर खेल में देश के प्रतिनिधित्व करने से रोका वरना मैं किसी के रोके रुकने वाला नहीं था।

बचपन का जितना वर्णन किया जाए, उतना कम है। शब्द कम पड़ेंगे लेकिन अफ़साने बहुत होंगे बयान करने को। बचपन की सारी घटनाओं, शरारतों और अठखेलियों को शब्दों में पिरोना कठिन है। बचपन, उन्मुक्त आकाश में परिंदों की उड़ान जितना स्वछन्द होता। बेरंग से जीवन में रंगो की बौछार की तरह होता है बचपन। निराशा के घोर अंधियारे को चीरने वाली रोशनी की मानिंद होता है बचपन। नदी के कल कल छल छल बहते पानी सा प्रवाहमान होता है बचपन।

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 43 : उन्मुक्त आकाश में परिंदों की उड़ान सा बचपन // अमित शर्मा
संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 43 : उन्मुक्त आकाश में परिंदों की उड़ान सा बचपन // अमित शर्मा
https://lh3.googleusercontent.com/-_TeVBfxzATg/WLQAsAgfhOI/AAAAAAAA228/dzGY5qU0EUw/image_thumb%25255B3%25255D.png?imgmax=200
https://lh3.googleusercontent.com/-_TeVBfxzATg/WLQAsAgfhOI/AAAAAAAA228/dzGY5qU0EUw/s72-c/image_thumb%25255B3%25255D.png?imgmax=200
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2018/02/43.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2018/02/43.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content