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ज़ंज़ीबार की लोक कथाएँ // बच्चा शिकारी एमको जीचूनी[ // सुषमा गुप्ता

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देश विदेश की लोक कथाएँ — पूर्वी अफ्रीका–ज़ंज़ीबार : ज़ंज़ीबार की लोक कथाएँ संकलनकर्ता सुषमा गुप्ता 7 बच्चा शिकारी एमको जीचूनी [1] सुलतान मजनूँ क...

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देश विदेश की लोक कथाएँ — पूर्वी अफ्रीका–ज़ंज़ीबार :

ज़ंज़ीबार की लोक कथाएँ

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संकलनकर्ता

सुषमा गुप्ता


7 बच्चा शिकारी एमको जीचूनी[1]

सुलतान मजनूँ के सात बेटे थे और उसके पास एक बड़ा बिल्ला था। वह इन सबको बहुत प्यार करता था।

सब कुछ ठीक चल रहा था कि एक दिन उसका बिल्ला बाहर गया और एक बछड़ा पकड़ लाया। जब लोगों ने शिकायत की कि वह उनका बछड़ा पकड़ लाया तो सुलतान ने उनसे कहा — “यह बिल्ला भी मेरा है और यह बछड़ा भी मेरा है। ” इस पर लोग चुप हो गये और चले गये।

कुछ दिन बाद वह बिल्ला फिर बाहर गया और एक बकरे को पकड़ लाया। जब लोगों ने उसकी शिकायत की कि उसका बिल्ला उनका बकरा पकड़ लाया तो सुलतान ने फिर कहा — “यह बिल्ला भी मेरा है और यह बकरा भी मेरा है। ” यह सुन कर लोग फिर चुप रह गये और चले गये।

दो दिन बाद वह बिल्ला फिर बाहर गया और एक गाय पकड़ लाया। जब लोगों ने सुलतान से इसकी शिकायत की तो सुलतान ने फिर वही जवाब दे कर उन लोगों को चुप कर दिया — “यह बिल्ला भी मेरा है और यह गाय भी मेरी है। ” यह सुन कर वे बेचारे फिर वापस चले गये।

दो दिन बाद वह बिल्ला एक गधे को पकड़ लाया। फिर लोग आये और फिर सुलतान ने उन सबको वही कह कर वापस कर दिया कि “यह बिल्ला भी मेरा है और यह गधा भी मेरा है। ” फिर वह एक घोड़ा पकड़ लाया और उसका भी वही नतीजा हुआ।

अगली बार वह बिल्ला एक ऊँट पकड़ लाया। लोग फिर आये तो सुलतान गुस्से में भर कर बोला — “क्या बात है तुम लोग मुझे क्यों परेशान कर रहे हो? यह मेरा बिल्ला था और यह मेरा ऊँट था।

मुझे ऐसा लगता कि आप लोग मेरे बिल्ले को पसन्द नहीं करते और चाहते हैं कि वह मार दिया जाये इसी लिये रोज ही कोई न कोई कहानी ले कर चले आते हैं। जो कुछ भी वह खाना चाहता है उसको खाने दो न। ”

कुछ समय बाद वह एक बच्चे को पकड़ लाया और फिर एक बड़े आदमी को पकड़ लाया पर फिर भी सुलतान ने मामले को हमेशा की तरह यही कह कर दबा दिया कि बिल्ला भी उसका था और जो पकड़ा गया था वह भी उसी का था।

इस बीच वह बिल्ला और भी ज़्यादा निडर हो गया। अब वह शहर के आस पास पानी भरने जाने वाले लोगों पर कूद पड़ता और उन जानवरों को खा जाता जो उस रास्ते से घास खाने जाते।

आखिर कुछ लोगों ने हिम्मत बटोरी और सुलतान के पास फिर से जाने का विचार किया।

वे सुलतान के पास फिर गये और बोले — “सुलतान, यह सब क्या है? आप हमारे सुलतान हैं आपका काम हमारी रक्षा करना है, और ऐसा होना भी चाहिये।

आपने इस बिल्ले को अपनी मनमानी करने की इजाज़त दे रखी है। अब तो यह केवल शहर से बाहर ही रहता है और उधर से जो कोई भी गुजरता है उसी को खा लेता है। रात में शहर के अन्दर आ जाता है और वहाँ भी यह यही करता है। हम लोग क्या करें?”

लेकिन मजनूँ सुलतान ने फिर वही जवाब दिया — “मुझे यकीन है कि आप सब मेरे बिल्ले को पसन्द नहीं करते और चाहते हैं कि मैं उसको मार दूँ पर मैं ऐसा कुछ नहीं करने वाला। वह जो कुछ भी खाता है वह मेरा है। ”

सारे लोग अपनी इस मुलाकात के नतीजे पर बहुत ही दुखी थे। और क्योंकि किसी की उस बिल्ले को मारने की हिम्मत नहीं थी सो वे सब बिल्ले के रहने की जगह के आस पास से भी दूर कहीं और चले गये।

पर इससे भी हालत में कुछ सुधार नहीं आया क्योंकि जब उस बिल्ले को कोई नहीं मिलता तो वह उधर ही आ जाता जहाँ वे लोग रहते थे।

धीरे धीरे शिकायतें बढ़ती गयीं और इतनी बढ़ीं कि सुलतान मजनूँ को अपने नौकरों को यह हिदायत देनी पड़ी कि अगर कोई उसके बिल्ले के खिलाफ शिकायत ले कर आये तो उससे कह दो कि सुलतान उससे नहीं मिल सकते।

अब लोगों ने अपने जानवर भी बाहर निकालने बन्द कर दिये और खुद भी बाहर निकलना बन्द कर दिया। जब बिल्ले को शहर में खाना मिलना बन्द हो गया तो वह शहर के बाहर चला गया और वहाँ जा कर जानवर, पानी की चिड़ियें और जो भी कुछ उसको मिल जाता वही खाने लगा।

एक दिन सुलतान ने अपने बड़े वाले छह बेटों को बुलाया और उनसे कहा कि वह अपना देश देखने जा रहा है अगर वे उसके साथ चलना चाहें तो चल सकते हैं। सो वे भी उसके साथ चले गये।

सातवाँ बेटा इधर उधर जाने के लिये बहुत छोटा समझा जाता था इसलिये उसको हमेशा ही स्त्र्यिों के पास घर में छोड़ दिया जाता था। उसके भाई भी इसी लिये उसको एमका जीचोनी बुलाते थे जिसका मतलब होता है – रसोई में बैठने वाला[2]

सो सुलतान अपने छहों बेटों को साथ ले कर अपना देश देखने चल दिया। वे सब एक ऐसी जगह आ गये जहाँ बहुत सारे घने पेड़ थे। पिता आगे आगे जा रहा था और उसके बेटे उसके पीछे पीछे। तभी वह बिल्ला आया और उसने झपट्टा मार कर सबसे पीछे चल रहे तीन भाइयों को खा लिया।

सुलतान के नौकर चिल्लाये — “बिल्ला, बिल्ला। ”

और सुलतान से पूछा कि क्या वह उस बिल्ले को ढूँढ कर मार दें?

सुलतान ने उसको मारने के लिये तुरन्त ही हाँ कर दी पर फिर बोला — “यह बिल्ला नहीं है यह तो नूनडा[3] है। उफ़ इसने तो मुझसे मेरे ही बेटों को छीन लिया। ”

किसी ने नूनडा को पहले कभी देखा नहीं था पर वे सब जानते थे कि नूनडा कोई बहुत ही भयानक जानवर था जो सबको मार कर खा जाता है।

सुलतान बेचारा अपने बेटों के मरने के दुख में रो पड़ा।

जिन्होंने भी उसका रोना सुना वे बोले — “मालिक, नूनडा अपना शिकार चुनता नहीं है। वह यह नहीं कहता कि “यह मेरे मालिक का बेटा है इसलिये मैं इसको छोड़ देता हूँ। ” या “यह मेरे मालिक की पत्नी है मैं इसको नहीं खाऊँगा। ” उसको तो जो खाना होता है वह बस खा लेता है।

जब हमने आपसे कहा था कि बिल्ले ने हमारे जानवर खाये थे तब आपने कहा था कि “बिल्ला भी मेरा है और वह जानवर भी मेरा है। ” पर अब जब उसने आपके बेटों को खा लिया है तो हमें इसमें कोई शक नहीं है कि वह आपको भी खा सकता है। ”

सुलतान बोला — “शायद तुम ठीक कहते हो। ”

जो सिपाही उस बिल्ले को पकड़ने गये थे उनमें से कुछ मारे गये और कुछ भाग गये। सुलतान और उसके बचे हुए तीन बेटे अपने तीनों भाइयों की लाशें ले कर घर आ गये और उनको दफना दिया।

जब सातवें बेटे एमका जीचोनी ने सुना कि नूनडा ने उसके तीन बड़े भाइयों को मार डाला है तो उसने अपनी माँ से कहा कि वह नूनडा को ढूँढने के लिये बाहर जाना चाहता था। या तो नूनडा उसको खा लेगा या फिर वह नूनडा को मार देगा।

पर उसकी माँ को उसका यह विचार अच्छा नहीं लगा। वह बोली — “बेटा, मैं नहीं चाहती कि उसको ढूँढने के लिये तुम जाओ। मेरे तीन बेटे तो पहले ही मर चुके हैं और अगर उसने तुम को भी मार दिया तो मेरे तो घाव पर घाव हो जायेगा। ”

पर एमका जीचोनी नहीं माना। वह बोला — “माँ मुझे तो जाना ही है, मैं नहीं रुक सकता पर तुम पिता जी से नहीं कहना। ”

उसकी माँ ने उसके लिये कुछ केक बना दी और कुछ नौकर उसके साथ कर दिये। उसने ब्लेड की तरह तेज एक भाला लिया, एक तलवार ली, सबसे विदा ली और नूनडा की खोज में चल दिया।

क्योंकि वह हमेशा घर पर ही रहता था उसको यही पता नहीं था कि वह क्या ढूँढने जा रहा था। वह शहर से कुछ ही दूर बाहर निकला था कि उसने एक बहुत ही बड़ा कुत्ता देखा।

उसको लगा शायद वह इसी को ढूँढ रहा था सो उसने उस कुत्ते को मारा और रस्सी से बाँध कर गाता हुआ घसीटता हुआ घर ले आया।

घर आ कर ऐमका जीचोनी माँ से बोला — “माँ, देखो मैंने नूनडा को मार दिया जो लोगों को खाता था। ”

उसकी माँ उस समय ऊपर थी। जब उसने यह सुना कि उसका बेटा नूनडा को मार कर ले आया है तो खिड़की से नीचे झाँका और देखा कि वह क्या ले कर आया था तो उसने कहा — “बेटे, यह आदमियों को खाने वाला नूनडा नहीं है। यह तो कुत्ता है। ”

सो उसने उस कुत्ते का ढाँचा बाहर ही छोड़ दिया और नूनडा के बारे में बात करने के लिये माँ के पास आया।

माँ ने कहा — “मेरे बेटे, नूनडा तो इससे बहुत बड़ा जानवर है। अगर मैं तुम्हारी जगह होती तो इस सबको छोड़ कर घर बैठती। ”

एमका जीचोनी बोला — “नहीं माँ, यह घर में बैठना मेरे लिये नहीं है। जब तक कि मैं नूनडा से लड़ कर उसे मार न लूँ मैं घर में नहीं बैठ सकता। ” सो वह फिर चल दिया।

अब की बार वह पहले दिन से और ज़्यादा दूर गया और एक बहुत बड़े बिल्ले को देखा। उसने सोचा कि शायद वही नूनडा है सो उसने उसको मारा और पहले की तरह गाता हुआ घसीटता हुआ घर ले आया।

घर आ कर उसने फिर अपनी माँ से कहा — “माँ, देखो मैंने नूनडा को मार दिया जो लोगों को खाता था। ”

उसकी माँ ने जब उस बिल्ले को देखा तो कहा — “बेटे, यह आदमियों को खाने वाला नूनडा नहीं है। यह तो बस एक बिल्ला है बड़ा बिल्ला। ”

उसकी माँ ने उसे फिर रोकने की कोशिश की पर उसने उसकी एक न सुनी। उसने उस बिल्ले को फेंक दिया और फिर नूनडा की तलाश में चल दिया।

इस बार वह पिछले दिन से भी और दूर गया और एक बहुत बड़ा बिल्ला देखा। उसने उसको पकड़ा, मारा और घसीटता हुआ और गाता हुआ घर ले आया।

आ कर वह फिर अपनी माँ से बोला — “देखो माँ, मैं नूनडा को मार कर ले आया जो आदमियों को खाता था। ”

उसकी माँ ने फिर कहा — “बेटे, यह आदमियों को खाने वाला नूनडा नहीं है। यह तो केवल एक बड़ा वाला बिल्ला है। ”

अब की बार वह यह सुन कर बहुत परेशान हो गया तो उसकी माँ ने पूछा — “तुम क्या सोचते हो कि तुमको नूनडा कहाँ मिलेगा? तुमको तो यह भी नहीं पता कि वह है कहाँ, और तुम यह भी नहीं जानते कि वह दिखता कैसा है।

इस तरह से अगर तुम और घूमते रहे तो बीमार हो जाओगे। तुम अभी भी बहुत अच्छे दिखायी नहीं दे रहे हो। आओ घर बैठो। ”

इस पर वह लड़का बोला — “मेरे पास करने के लिये तीन काम हैं – या तो मैं मर जाऊँ, या फिर नूनडा को ढूँढ लूँ और मार दूँ और या फिर असफल हो कर घर लौट आऊँ। सो इन तीनों कामों के लिये मुझे फिर से बाहर जाना ही पड़ेगा। ” और एमका जीचोनी फिर चल दिया।


इस बार वह और आगे तक गया और उसने एक ज़ीब्रा[4] देखा। उसने उसको मारा और गाता हुआ और घसीटता हुआ घर ले आया। आ कर माँ से बोला — “देखो माँ, मैं नूनडा को मार कर ले आया हूँ जो आदमियों को खाता था। ”

उसकी माँ ने फिर कहा कि वह नूनडा नहीं था जो आदमियों को खाता था। वह तो ज़ीब्रा था।

फिर उसने कहा — “देखो तुम्हारे भाई भी तो हैं जो इस तरीके से नूनडा को ढूँढते नहीं घूम रहे हैं। वे तो घर में बैठे हैं और अपना काम देख रहे हैं फिर तुम ऐसे क्यों घूम रहे हो?”

एमका जीचोनी बोला — “माँ, सारे भाई एक से नहीं होते। मैं अपने इरादे में पक्का हूँ और मैं तब तक इस काम को नहीं छोड़ूँगा जब तक कि इस नूनडा को खत्म न कर लूँ। ” और यह कह कर वह फिर चला गया। इस बार वह पहले से कहीं दूर तक गया।

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रास्ते में उसने एक राइनोसिरस[5] को एक पेड़ के नीचे सोते हुए देखा। वह अपने नौकरों की तरफ देखता हुआ बोला — “आखिर मैंने नूनडा को पा ही लिया। ”

वे खुशी से चिल्लाये — “कहाँ मालिक?”

“वह देखो उस पेड़ के नीचे। ”

उन्होंने पूछा — “अब हम क्या करें?”

एमका जीचोनी बोला — “ऐसा करते हैं पहले हम खाना खा लेते हैं बाद में इसको मारेंगे। हमको यह ठीक जगह पर मिल गया है हालाँकि हमें पता नहीं अगर यह हमें मार दे तो पर जो कुछ भी हो। ” सो सबने पेट भर कर अरारोट की बनी केक खायीं।

खाना खाने के बाद एमका जीचोनी ने अपने नौकरों से कहा — “तुम सब लोगों के पास दो दो बन्दूकें हैं। एक अपने पास जमीन पर रख लो और एक अपने हाथ में ले लो। और हम सबको एक ही समय पर एक साथ उसको गोली मारनी हैे। ”

“ठीक है मालिक। ”

सो वे सब रेंगते हुए पेड़ के दूसरी तरफ राइनो के पीछे पहुँच गये। फिर वे सब उसके चारों तरफ उसके बहुत पास आ गये और सबने उसके ऊपर एक साथ गोली चला दी। राइनो कूदा, थोड़ी दूर भागा भी पर जल्दी ही मर कर गिर गया।

उन्होंने राइनो को बाँधा और पूरे दो दिन तक उसको खींच कर शहर तक लाते रहे।

जब शहर आ गया तब एमका जीचोनी ने गाना शुरू किया। “माँ देखो मैंने नूनडा को मार दिया जो आदमियों को खाता था। ” पर इस बार भी उसको अपनी माँ का वही जवाब मिला कि वह नूनडा नहीं था।

बहुत सारे आदमी राइनो कोे देखने आये और उसको देख कर सुलतान के बेटे के लिये दुखी हुए। उसके माता पिता ने भी उससे काफी कहा कि वह अब नूनडा की तलाश छोड़ दे।

उसके पिता ने तो यहाँ तक कह दिया कि अगर वह घर रह जाये तो वह उसको कुछ भी देने को तैयार है पर वह यह कहते हुए फिर नूनडा की तलाश में चल दिया कि मुझे आपकी कोई बात नहीं सुननी।

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अब की बार वह जंगल में और आगे तक चला गया। वहाँ उसको दोपहर में एक पेड़ के साये में एक हाथी सोया मिल गया।

उसने अपने नौकरों से कहा कि अब हमको नूनडा मिल गया। उन्होंने फिर पूछा कहाँ है?

“देखो वह उस पेड़ के नीचे सो रहा है। ”

“हाँ मालिक, क्या हम चलें उसके पास?”

“अगर हम उसके पास जायेंगेे और उसने हमें देख लिया तो वह हमारी तरफ आयेगा और हममें से कुछ लोग मर सकते हैं। मेरे ख्याल से पहले हममें से एक को उधर चुपचाप जाना चाहिये और यह देखना चाहिये कि उसका मुँह किधर है। ”

सबको यह विचार बहुत पसन्द आया। एक नौकर कीरोबोटो[6] अपने हाथों और घुटनों के बल रेंग कर उधर गया और उसको खूब अच्छी तरह देखा।

जब वह उसी तरह लौट कर आया तो एमका जीचोनी ने उससे पूछा — “तुम्हारा क्या खयाल है क्या यह नूनडा है?”

कीरोबोटो बोला — “पता नहीं मालिक। पर मुझे लगता है कि वह नूनडा ही है क्योंकि वह बहुत चौड़ा है, बहुत बड़े सिर वाला है और मैंने इतने बड़े कान तो आज तक किसी के देखे ही नहीं। ”

एमका जीचोनी बोला — “ठीक है, तो पहले खाना खाते हैं और फिर उसको मारने चलते हैं। ” उन्होंने अपनी अरारोट की केक निकालीं और शहद की केक निकालीं और पेट भर कर खाना खाया।

फिर एमका जीचोनी अपने नौकरों से बोला — “हो सकता है कि हम लोग एक दूसरे को आखिरी बार देख रहे हों इसलिये हम एक दूसरे से विदा लेते हैं। जो बच जायेंगे वे बच जायेंगे और जो मर जायेंगे वे मर जायेंगे पर अगर मैं मर गया तो जो बच जाये वह मेरे माता पिता से जा कर कह दे कि वे मेरे लिये दुख न करें। ”

उसके नौकर बोले — “आप ऐसी बात न करें मालिक। हममें से कोई नहीं मरेगा। भगवान से प्रार्थना करिये। ” सो वे सब भगवान की प्रार्थना करने के बाद हाथों और घुटनों के बल रेंग कर उस हाथी के पास जा पहुँचे।

नौकरों ने मालिक से प्लान पूछा तो एमका जीचोनी बोला कोई प्लान नहीं सिवाय इसके कि हम सब उसके ऊपर एक साथ मिल कर गोली चलायें।

जैसे ही उन सबने एक साथ गोली चलायी कि वह हाथी उन सब पर कूद पड़ा। वे सब लोग सावधान थे सो उन्होंने अपने पास की सारी चीज़ें वहीं छोड़ीं और पेड़ पर चढ़ गये।

हाथी सीधा भागा और थोड़ी दूर जा कर गिर कर मर गया। वे लोग दोपहर के तीन बजे से सुबह के छह बजे तक पेड़ों पर बिना खाने के और बिना कपड़ों के बैठे रहे।

एमका जीचोनी बेचारा पेड़ पर बैठा बैठा रोता रहा — “मैं नहीं जानता कि मौत क्या होती है पर इस सबको देखने से पता चलता है कि वह कुछ ऐसी ही होती होगी। ”

क्योंकि कोई एक दूसरे को देख नहीं पा रहा था इसलिये एमका जीचोनी को पता ही नहीं था कि उसके नौकर कहाँ हैं। हालाँकि वह पेड़ से उतरना चाहता था पर उसको लगा कि हो सकता है कि नूनडा नीचे हो और उसको खा जाये।

असल में हर आदमी यही सोच रहा था। वह नीचे उतरना चाहता था पर कहीं नूनडा नीचे न हो इससे डरता था। कीरोबोटो ने हाथी को गिरते हुए तो देख लिया था पर वह भी नीचे उतरते में डर रहा था क्योंकि उसको लग रहा था कि हालाँकि वह नीचे तो गिर पड़ा था पर अगर वह मरा न हो तो।

उसी समय कीरोबोटो ने देखा कि एक कुत्ता आया और हाथी को सूँघने लगा। तब उसको लगा कि वाकई वह मर चुका था। यह देख कर वह जितनी तेज़ी से पेड़ पर से उतर सकता था उतर आया और बहुत ज़ोर से चिल्लाया जो दूसरों को यह बताने के लिये था कि सब ठीक है।

उसको उसकी चिल्लाहट का जवाब भी मिल गया पर फिर भी उसको यह पता नहीं चला कि वह जवाब कहाँ से आया।

सो वह दोबारा चिल्लाया और फिर ध्यान से सुनने की कोशिश करने लगा। अब की बार जब जवाब आया तो उसको पता चल गया कि वह जवाब किधर से आया था सो वह उसी पेड़ की तरफ दौड़ चला।

वहाँ उसके दो साथी एक ही पेड़ पर चढ़े हुए थे। उसने उनसे कहा कि नीचे आ जाओ नूनडा मर गया है। वे तुरन्त ही नीचे आ गये और दूसरे लोगों को इधर उधर ढूँढने लगे जब तक कि उनको उनका मालिक नहीं मिल गया।

उन्होंने मालिक को बताया कि नूनडा मर गया है। तो मालिक और दूसरे लोग भी सब नीचे आ गये और उन्होंने अपने अपने कपड़े और बन्दूकें उठा लीं।

अब वे सब ठीक थे पर सब भूखे और कमजोर थे सो उन्होंने सबने एक जगह बैठ कर थोड़ा आराम किया और खाना खाया। फिर वे अपना किया गया शिकार देखने गये।

जैसे ही एमका जीचोनी ने हाथी को देखा तो वह बोला — “यही है नूनडा, यही है नूनडा। ”

सारे लोगों ने कहा “हाँ यही है नूनडा। ” और वे उसको बाँध कर तीन दिन में उसको गाँव तक खींच कर ले गये। जब वे गाँव के पास पहुँचे तब उन्होंने गाना शुरू किया।

“माँ देखो यह है नूनडा जो आदमियों को खाता है। ”

इस बार तो वह बहुत ही निराश हुआ जब उसकी माँ ने कहा — “मेरे बेटे, यह भी नूनडा नहीं है जो आदमियों को खाता है।

वह आगे बोली — “मेरे बेटे, तुम कितने परेशान हो रहे हो। सारे लोग आश्चर्य कर रहे हैं कि इतने छोटे लड़के में कितनी समझ कहाँ से आ गयी है। ”

आखिर उसके माता पिता ने उसको समझा बुझा कर इस बात पर राजी कर लिया कि बस अब की बार ही आखिरी बार वह नूनडा को ढूँढने जायेगा फिर उसका नतीजा चाहे कुछ भी क्यों न हो।

इस तरह वे सब फिर नूनडा की खोज में चल दिये। इस बार वे जंगल से भी आगे निकल गये और एक पहाड़ के पास आ पहुँचे। उसकी तलहटी में उन्होंने अपने डेरे लगाये और रात काटी।

अगले दिन सुबह उन्होंने चावल बनाये और खाये। खा कर एमका जीचोनी बोला — “अब हम लोग पहाड़ पर चढ़ते हैं और वहाँ से अपने पूरे देश को देखते हैं। ”

वे सब चल दिये और काफी लम्बे और थका देने वाले सफर के बाद पहाड़ के ऊपर पहुँच गये। वहाँ बैठ कर वे सुस्ताने लगे और आगे का प्लान बनाने लगे।

उनमें से एक नौकर शिन्डानो[7] इधर उधर घूमने लगा। उसने नीचे निगाह डाली तो उसको पहाड़ के नीचे जाने वाले आधे रास्ते में एक बहुत ही बड़ा जंगली जानवर दिखायी दिया। लेकिन वह उसको दूरी और पेड़ों की वजह से ठीक से दिखायी नहीं दे रहा था।

उसने मालिक को बुलाया और उसको दिखाया। एमका जीचोनी को अपने दिल के अन्दर से लगा कि यही है नूनडा। पक्का करने के लिये उसने अपनी बन्दूक और भाला उठाये और कुछ दूर नीचे तक उसको ठीक से देखने के लिये गया।

उसको वहाँ से देख कर वह बोला — “लगता तो है कि यही है नूनडा। मेरी माँ ने बताया था कि वह चौड़ा था, छोटा था सो यह भी है। उसने कहा था कि उसके ऊपर बिल्ले की तरह के दो बड़े बड़े धब्बे हैं सो इसके भी हैं। उसने कहा था कि उसकी दुम बहुत घनी है सो इसकी भी दुम बहुत घनी है। लगता है कि यही है नूनडा। ”

यह सब देख कर वह अपने नौकरों के पास गया और उनसे कहा कि वे खूब पेट भर कर खाना खा लें सो सबने खूब पेट भर कर खाना खाया।

फिर उसने उनसे कहा कि वे अपनी बेकार की चीज़ें वहीं छोड़ दें क्योंकि अगर उनको किसी भी वजह से वहाँ से भागना पड़ा तो वे जितने कम सामान के साथ होंगे उतनी ही तेज़ वे वहाँ से भाग सकेंगे। और अगर वे जीत गये तो वे वापस आ कर उस सामान को वापस ले जायेंगे।

इस तरह सारा इन्तजाम करके वे सब पहाड़ के नीचे की तरफ चल दिये। जब वे आधे रास्ते पहुँचे तो कीरोबोटो और शिन्डानो दोनों डर गये।

एमका जीचोनी ने उनको ढाँढस बँधाया और कहा — “डरते क्यों हो? सबको जीना है और सबको मरना है। डरने की कोई बात नहीं है चलो। ” सो सब चल दिये।

चलते चलते वे उस जानवर के काफी पास पहुँच गये। उन्होंने देखा कि वह सो रहा था। उसको देख कर सबने कहा कि वह नूनडा ही था।

एमका जीचोनी बोला — “इस समय सूरज डूब रहा है। क्या कहते हो हम लोग सब एक साथ गोली अभी चलायें या सुबह का इन्तजार करें?” सब लोगों ने कहा कि वे उसको अभी मारना ज़्यादा पसन्द करेंगे बजाय इसके कि वे सारी रात परेशान रहें।

सो वे सब एक साथ गोली मारने के लिये तैयार हो गये। वे उसके और पास आ गये और एमका जीचोनी का इशारा मिलते ही सबने एक साथ उसके ऊपर गोली चला दी। नूनडा बिल्कुल नहीं हिला। उसके लिये तो एक ही गोली काफी थी।

उसको मार कर वे सब पहाड़ के ऊपर आ गये, खाना खाया और खाना खा कर सो गये। सुबह उन्होंने रात के बचे चावल खाये और फिर यह देखने के लिये नीचे गये कि वहाँ क्या हाल था। उन्होंने देखा कि वह जानवर अभी भी वहीं मरा पड़ा था।

दोपहर को उन्होंने फिर चावल खाये और उस जानवर को घसीट कर घर ले जाने लगे। चौथे दिन उसकी लाश में सड़ने के लक्षण पैदा हो गये पर एमका जीचोनी ने कहा कि वे उसको गाँव तक तब तक खींचते रहेंगे जब तक उसकी एक भी हड्डी बाकी है।

जब वे गाँव के पास आये तो एमका जीचोनी ने गाना शुरू कर दिया। “माँ माँ देखो मैं आ गया हूँ। सुनो माँ मैं आ गया हूँ। मैं तुमको बताता हूँ कि मैं क्या लाया हूँ। ओ माँ देखो मैं उस नूनडा को मार कर ले आया हूँ जो लोगों को खाता है। ”

यह सुन कर एमका जीचोनी की माँ फिर बाहर निकली और उस मरे हुए जानवर को देख कर बोली — “अरे यही तो नूनडा है जो आदमियों को खाता है। ”

सारे लोग एमका जीचोनी को बधाई देने आ गये। उसका पिता अपने बेटे को नूनडा की लाश के साथ देख कर बहुत खुश हुआ।

उसने अपने बेटे को ऊँचा ओहदा दिया और उसकी शादी एक बहुत ही अमीर और सुन्दर लड़की से कर दी। जब सुलतान मर गया तो एमका जीचोनी सुलतान बन गया और वह हमेशा ही लोगों का बहुत प्यारा रहा।

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[1] Mkaah Jeechonee, the Boy Hunter – a folktale of Zanzibar, Eastern Africa

[2] Who sits in the kitchen

[3] Nunda

[4] Zebra – a kind of horse which has stripes on it – see the picture above.

[5] Rhinoceros – see its picture above.

[6] Keeroboto – name of a servant

[7] Shindaano

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं के संकलन में से सैकड़ों लोककथाओं के पठन-पाठन का आनंद आप यहाँ रचनाकार के लोककथा खंड में जाकर उठा सकते हैं.

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(कहानियाँ क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3845,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,336,ईबुक,192,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,257,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,105,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2789,कहानी,2119,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा 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कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,238,लघुकथा,839,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,8,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,315,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,62,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1924,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,650,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,689,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,56,साहित्यिक गतिविधियाँ,184,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,58,हास्य-व्यंग्य,68,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian 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रचनाकार: ज़ंज़ीबार की लोक कथाएँ // बच्चा शिकारी एमको जीचूनी[ // सुषमा गुप्ता
ज़ंज़ीबार की लोक कथाएँ // बच्चा शिकारी एमको जीचूनी[ // सुषमा गुप्ता
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