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कहानी संग्रह // तर्जनी से अनामिका तक ( प्रेरणादायक कहानियाँ एवं संस्मरण ) - भाग - 10 // राजेश माहेश्वरी

कहानी संग्रह

तर्जनी से अनामिका तक

( प्रेरणादायक कहानियाँ एवं संस्मरण )

राजेश माहेश्वरी

कहानी संग्रह //  तर्जनी से अनामिका तक ( प्रेरणादायक कहानियाँ एवं संस्मरण )  // राजेश माहेश्वरी

पिछले भाग से जारी...

हृदय परिवर्तन

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के निर्माण का महामना मदन मोहन मालवीय जी ने प्रण लिया था। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत सामर्थ्य के अनुसार धन दान कर दिया था परंतु यह एक बहुत बडा कार्य था, जिसके लिये बहुत धन की आवश्यकता थी। मालवीय जी ने इस पावन कार्य के लिए धन एकत्रित करने का अभियान प्रारंभ किया। उनके निवेदन पर सभी वर्ग के लोगों द्वारा अपने सामर्थ्य के अनुसार दान देना प्रांरभ कर दिया गया। श्री मालवीय जी पर सबका विश्वास था कि उनके द्वारा दिये गये धन का एक पैसा भी दुरूपयोग नहीं होगा। श्री मालवीय जी अपने एक संकल्प की पूर्ति के लिये शहर शहर घूम रहे थे। एक दिन एक गाँव में रात हो जाने के कारण उन्हें रूकना पड़ा उनके सभी साथीगण दान में प्राप्त धन की गिनती कर रहे थे। उसी समय एक चोर ने अंधेरे का फायदा उठाकर धन की एक थैली चुरा ली और वहाँ से भागने लगा। दूसरी दिशा से आ रहे मालवीय जी ने चोर को भागते हुए देखा तो उन्होंने उसे पकड़ लिया और उससे पूछा कि तुम इतने घबराये हुये और इतनी तेजी से क्यों भाग रहे हो ? क्या बात है ? उसी समय पीछे से भागते हुए आ रहे लोगों ने चोर चोर कहकर मालवीय जी के पास आकर उस चोर की पिटाई शुरू कर दी। मालवीय जी ने किसी तरह से उस चोर को भीड़ से बचाया और उसे विनम्रतापूर्वक समझाया कि तुम्हें ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए। चोरी करना बहुत खराब कार्य है। एक अच्छे कार्य के लिए इकट्ठे किये जा रहे धन को चुराना नैतिकता, हमारी सभ्यता, संस्कृति और संस्कारों के विपरीत है। तुम एक अच्छे हट्टे कट्टे नौजवान व्यक्ति हो फिर ऐसा घृणित कार्य क्यों कर रहे हो ? तुम्हें मेहनत से धन कमाना चाहिए ना कि लूटपाट करके। मेहनत की कमाई से तुम समाज में मान सम्मान के साथ जी सकते हो।

मालवीय जी की इन बातों का उस चोर पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा और उसकी आँखों से अश्रुधारा निकल पडी। वह मालवीय जी के पैरों में गिरकर उनसे क्षमा माँगने लगा। अब उसका हृदय परिवर्तन हो चुका था उसने चोरी किये हुये धन के साथ साथ पूर्व में जितना भी धन चुराया था वह सब कुछ लाकर मालवीय जी को सौंप दिया और संकल्प लिया कि अब वह चोरी की घृणित प्रवृत्ति छोड़कर ईमानदारी और मेहनत से धनोपार्जन करेगा।

साहसिक निर्णय

हमारे देश में प्रतिभावान साहसी और निर्भीक व्यक्तित्व के लोगों की कोई कमी नहीं है। इसी संदर्भ में श्री जे.आर.डी. टाटा भी अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं। वे एक सफल उद्योगपति के साथ साथ नये नये चमत्कारिक प्रयोग करने के लिए भी जाने जाते थे। इसी संदर्भ में एक दिन उन्होंने मन में दृढ़ निश्चय कर लिया कि बंबई से कराची तक भारत में निर्मित पूर्णतः स्वदेशी विमान को उड़ाकर ले जाया जाए। उनकी इस भावना की काफी तारीफ की गई परंतु ऐसा करना खतरे से खाली नहीं था। हमारा देश उस समय तक इतना विकसित नहीं हुआ था कि विमान के सभी कलपुर्जों के निर्माण पर विश्वसनीयता बनी रहे। जब जे.आर.डी. टाटा को इस बात से अवगत कराया गया तो उन्होंने तुरंत यह निर्णय लेकर सभी को आश्चर्यचकित कर दिया कि वे इस विमान का स्वयं ही अकेले उडाकर ना केवल कराची जायेंगे बल्कि वहाँ से इसे वापिस लेकर गृहनगर भी लौंटेंगे।

निश्चित दिन और निश्चित समय पर जे.आर.डी. टाटा पायलट की ड्रेस में हैट लगाकर आये और सीधे अपने विमान में चढ़ गये। उन्होंने इंजिन चालू किया हैट हिलाकर सबका अभिवादन किया और हवाई जहाज को उडा लिया। उस समय वहाँ पर उपस्थित सभी जन टाटा जी की हिम्मत और दृढ़ व्यक्तित्व की प्रशंसा तो कर रहे थे परंतु साथ ही साथ कोई दुर्घटना ना हो इसकी प्रार्थना भी प्रभु से की जा रही थी। श्री जे.आर.डी. टाटा सफलतापूर्वक विमान को कराची तक ले गये और वहाँ उतारकर थोड़ी देर रूकने के बाद उसे उडाकर वापिस ले आये। उनकी यह ऐतिहासिक यात्रा टाटा की विमान सेवा का यह आधारभूत स्तंभ था एवं टाटा समूह की विमान सेवा उसके राष्ट्रीयकरण होने तक सफलतापूर्वक जनता की सेवा में अपना योगदान देती रही। आज भी भारतीय विमान सेवा का आधारस्तंभ जे.आर.डी. टाटा को माना जाता है।

हेन सेंग की व्यथा

यह घटना उस समय की है जब हमारा देश सोने की चिड़िया कहलाता था। नालंदा विश्वविद्यालय में एक चीनी पर्यटक हेन सेंग भी अध्ययन करने एवं भारतीय संस्कृति से अवगत होने आया था। वह जब वापिस चीन चला गया तो उसने अपनी आत्मकथा में उसके जीवन की सबसे उल्लेखनीय एवं लोमहर्षक घटना का विवरण लिखा और साथ में उसके व्यक्तिगत मत के अनुसार यह अनुकरणीय थी या महज एक उत्तेजना की परिणिति थी।

एक दिन वह भारत के पुराने धर्म ग्रंथों, प्राचीन पांडुलिपियों एवं कीमती वस्तुओं को लेकर एक नौका के माध्यम से दूसरी तरफ जाने के लिए बैठ गया। उस समय तक मौसम एक दम साफ था, नौका के बीच मार्ग पहुँचने पर तेज हवाएँ चालू हो गयी और तूफान आने का भी अंदेशा होने लगा था। नाविक के द्वारा नौका को वापिस ले जाने या नदी के दूसरे पार तट पर ले जाने, दोनों में समान खतरा था। नाविक ने परिस्थितियों को देखते हुए नौका का भार कम करने के लिए सभी सवारियों को अपना सामान नदी में फेंक कर नौका का भार कम करने का निवेदन किया ताकि वे किसी तरह से सुरक्षित तट पर पहुँच सकें।

हेने सेंग बोला कि मुझे मृत्यु का भय नहीं है मैं भार कम करने के लिए नदी में उतरकर तैर कर बचने को प्रयास करूँगा परंतु तुम मेरे साथ इस बहुमूल्य आध्यात्मिक धरोहर को संरक्षित रखना। उसकी यह बात नाव में बैठे हुए नांलदा विश्वविद्यालय के पाँच छात्र सुन रहे थे। उन्होंने आपस में कुछ वार्तालाप किया और तुरंत ही वे सभी नदी में कूद गये। उनका यह कृत्य एक प्रकार से आत्महत्या करने के समान था और नाविक भी इस अद्भुत दृश्य को देखकर अपनी आँखों से आंसू नहीं रोक सका। हेने सेंग नहीं समझ पा रहा था कि इस घटना को वह क्या कहे ?

ज्ञान की खोज

एक विख्यात संत जी नर्मदा नदी के किनारे अपनी कुटिया में रहते थे। उनके एक शिष्य ने एक दिन अचानक ही उनसे पूछा कि स्वामी जी जीवन क्या है ? संत जी ने कहा कि इसका उत्तर तो तुम्हें ही खोजना पडेगा। मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूँ, आओ मेरे साथ चलो।

अब वे दोनों नदी किनारे उस पार एक महात्मा जी जिनकी बहुत प्रसिद्धि थी, उनके पास पहुँचे। वे उस समय साधना में बैठे हुये थे। उनकी जब साधना समाप्त हुयी तब संत जी ने उनसे पूछा कि जीवन क्या है ? यह जानने के लिए हम दोनों आपके पास आये है। वे संत जी यह सुनकर भड़क गये और बोले कि यह मेरी प्रार्थना का समय है, आप दोनों बेवजह मेरा समय नष्ट मत कीजिए। यह सुनकर वे दोनों वहाँ से चले गये और नदी किनारे खेती कर रहे एक व्यक्ति के पास पहुँचे। उससे से भी उन्होंने वही प्रश्न किया तो वह मुस्कुराते हुए बोला खेत जोतना, फसल उगाना और उसका विक्रय कर अपना जीवन यापन करना, मैं तो बस इतना ही समझता हूँ कि यही मेरा जीवन है।

अब वहाँ से वे नदी किनारे चलते चलते पास ही स्थित एक श्मशान गृह में पहुँच जाते हैं। यहाँ पर दोनों देखते हैं कि एक चिता जल रही है। वे उनके परिजनो को सांत्वना देकर वही प्रश्न पूछते हैं ? उनके परिवारजन कहते हैं कि जीवन और मृत्यु एक शाश्वत सत्य है। मनुष्य जन्म से लेकर मृत्यु तक जीवन में कामनाओं की पूर्ति के लिए जीता है, यही उसका जीवन है। यह वार्तालाप वहाँ पर उपस्थित एक धनवान व्यक्ति भी सुन रहा था। वह उन दोनों के पास पहुँचकर बोला जीवन में सुख, शांति और संपन्नता से रहना ही जीवन है, चाहे इसके लिए हमें ऋण भी क्यों ना लेना पडें। किसी महापुरूष के द्वारा बताए गए इस सिद्धांत को मैं जीवन मानता हूँ।

अब संत जी अपने शिष्य के साथ वापिस अपनी कुटिया आ जाते हैं और उससे कहते हैं कि मैंने तुम्हें इतने लोगों से मिलाकर उनके विचारों को तुम्हारे सामने प्रस्तुत करके, तुम्हें जीवन के विभिन्न दृष्टिकोण से अवगत कराया है। अब तुम स्वयं अपने जीवन के विषय में चिंतन मनन करके अपने जीवन की दिशा स्वयं निर्धारित करो।

अनुकरणीय आदर्श

आज के नेतागण अपनी आय विलासिता पूर्ण जीवन जीने में ही खर्च करते हैं। ऐसे व्यक्तित्व बिरले ही मिलते हैं जो कि राजनीति में मितव्ययिता के सिद्धांत पर चलते हुए जनता के धन का दुरूपयोग नह़ीं करते हैं। ऐसा ही एक उदाहरण हमारे देश के राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद जी का रहा है। यह वृतांत आज से कई वर्ष पूर्व का है, एक बार उनका जूता खराब हो गया था, उसे बदलने के लिए उनका सचिव बाजार से उन्नीस रूपये का जूता खरीद कर ले आया यह देखकर उन्होंने कहा जब ग्यारह रूपये के जूते से काम चल सकता है तो फिर यह उन्नीस रूपये का जूता लाने की क्या आवश्यकता थी। इसे आप लौटा दीजिए और मुझे वही सस्ता जूता मेरे लिए ला दीजिए। उनके निजी सचिव, जूता बदलने के लिए अपनी कार की ओर बढ़े तो राष्ट्रपति जी ने उनसे कहा कि पहले तो महँगा जूता लेकर आये अब उसको बदलने के लिए ना जाने कितने रूपये का पेट्रोल खर्च करोगे। यदि हम जनता के धन का इस प्रकार दुरूपयोग करेंगे तो यह नैतिकता के खिलाफ होगा। हमें यह देखना चाहिए कि जनता का पैसा व्यर्थ बर्बाद ना हो।

स्वर्गीय राजेंद्र प्रसाद जी का जीवन सादगी की एक मिसाल थी। वे कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष थे एवं किसी कार्य हेतु पटना जा रहे थे। रास्ते में इलाहाबाद स्टेशन पर उस समय ट्रेन 1 घंटे से भी अधिक समय तक रूकती थी। उन्हें उनके मित्र लीडर अखबार के संपादक श्री चिंतामणि जी से मिलकर अपना एक इंटरव्यू भी देना था। उनका कार्यालय स्टेशन के नजदीक ही था इसलिए वे ट्रेन से उतरकर पैदल ही उस ओर चल पडे और रास्ते में हल्की बूंदा बांदी के कारण वहाँ तक पहुँचते पहुँचते उनके कपड़े भीग गये थे। उन्होंने लीडर अखबार के कार्यालय पहुँचकर अपना परिचय पत्र चपरासी को दिया जिसने उसे ले जाकर चिंतामणि जी की टेबल पर रख दिया और बाहर आकर कह दिया कि साहब अभी व्यस्त है थोड़ा समय लगेगा। कुछ समय पश्चात जब चिंतामणि जी ने कार्ड देखा तो वे हड़बड़ाकर तुरंत कुर्सी से उठे और लगभग दौडते हुए बाहर आये और चपरासी से पूछा कि वे सज्जन कहाँ है तो चपरासी ने उन्हें इशारे से बताया कि वे बरामदे की ओर गये है। चिंतामणि जी यह सुनकर तुरंत उस दौड़े और यह देखकर हतप्रभ रह गये कि राजेंद्र प्रसाद जी अपने गीले कपडों को सुखा रहे थे। वे चिंतामणि जी का देखकर हंसते हुए बोले कि तुम व्यस्त थे इसलिए मैंने सोचा कि समय का सदुपयोग कर लिया जाए। यह भी तो एक जरूरी काम था। सादगी का इससे अच्छा उदाहरण और क्या हो सकता हैं। हम आज के नेताओं की तुलना इन पुराने नेताओं से करे तो जमीन आसमान का फर्क नजर आयेगा।

स्वर्गीय राजेंद्र प्रसाद जी को हरे भरे पर्वतीय श्रृंखलाओं, बाग बगीचों एवं प्राकृतिक सौंदर्य का बहुत शौक था। वे प्रतिवर्ष एक माह के लिए मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल पचमढ़ी जिसे सतपुडा की रानी के नाम से भी जाना जाता है, आते थे। उन्होंने इस रमणीय स्थल को पर्यटन के रूप में विकसित करने का सुझाव देकर इसे एक बहुत सुंदर स्वरूप प्रदान कर पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बना दिया था। पचमढी में आज भी एक पर्वत श्रृंखला को राजेंद्र गिरि के नाम से जाना जाता है।

चाणक्य

भारत के सुप्रसिद्ध दार्शनिक, राजनीतिज्ञ एवं कूटनीतिज्ञ आचार्य चाणक्य के कार्यकाल में एक विदेशी विद्वान उनसे भेंट करने के लिए आया। उसने आचार्य चाणक्य के व्यक्तित्व की बहुत प्रशंसा सुनी थी और इससे अभिभूत होकर वह उनसे मिलना चाहता था। गंगा तट पर स्नान कर रहे एक व्यक्ति से उसने चाणक्य के निवास स्थान का पता पूछा उसने इशारा करके गंगा जी के किनारे घास फूस से बनी हुयी एक साधारण सी कुटी की ओर इशारा करके बताया कि आचार्य जी वहाँ पर निवास करते हैं। वह आश्चर्यचकित होकर मन में विचार करता हुआ उस कुटिया के पास पहुँच गया। उसने देखा कि वही व्यक्ति गंगा जी में स्नान करके एक घड़े में जल भरकर ला रहा था। उसने उस व्यक्ति से पूछा कि मैं आचार्य चाणक्य से भेंट करना चाहता हूँ। क्या मेरी उनसे मुलाकात हो सकती है ? यह सुनकर वह व्यक्ति बोला कि आपका इस नगर में स्वागत हैं। मैं ही चाणक्य हूँ। उसे कुटिया के अंदर ससम्मान बुलाते हुये पूछा कि आप बताए मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ ?

वह आश्चर्य से मन में सोचने लगा कि क्या यही व्यक्ति चाणक्य है, यह तो दिखने में अत्यंत साधारण दिख रहा है। इसके पास कोई नौकर चाकर भी नह़ीं है। सिर्फ एक खाट, मोटे मोटे ग्रंथों का संग्रह और लिखने के लिए मेज है। तभी आचार्य चाणक्य ने उससे कहा कि आप पिछले तीन दिनों से हमारे नगर के विभिन्न स्थानों पर भ्रमण कर चुके है। आप हमारे नगर में किस उद्देश्य से आये हुए हैं और मैं आपकी क्या सहायता कर सकता हूँ ? यह सुनकर वह व्यक्ति आश्चर्यचकित रह गया और उसने आचार्य से पूछा कि आपको यह कैसे मालूम हुआ कि मैं पिछले तीन दिनों से इस नगर में हूँ ? आचार्य चाणक्य ने मुस्कुराते हुए कहा कि हमारी गुप्तचर प्रणाली इतनी मजबूत है कि जैसे ही आपने हमारे नगर की सीमा में प्रवेश किया उसके कुछ देर पश्चात ही मुझे इसकी सूचना मिल गयी थी, किंतु आप के पास कोई शस्त्र नह़ीं था और आपकी गतिविधियाँ भी संदिग्ध नह़ीं थी इसलिये आपको नगर के विभिन्न स्थानों पर विचरण करने से रोका नहीं गया। यह सुनते ही वह आश्चर्यचकित रह गया और आचार्य चाणक्य से काफी देर तक चर्चा करता रहा। वह उनसे चर्चा करके इतना अधिक प्रभावित हो गया कि अपने देश लौटकर वहाँ के लोगों को उसने चाणक्य की महानता, त्याग, संयम और सादगी पूर्ण जीवनशैली के विषय में बताया और कुछ माह के बाद वापिस भारत आकर आचार्य चाणक्य का शिष्यत्व ग्रहण कर लिया।

जनसेवा

मुंबई महानगर के एक बहुत संपन्न परिवार में एक बालक का जन्म हुआ था जिसका नाम रमेश रखा गया था। उसमें बचपन से ही दया एवं सेवा भावना की प्रवृत्ति थी। वह किसी का भी दुख दर्द देखकर द्रवित हो जाता था एवं यथासंभव उसकी सहायता करने के लिए तत्पर रहता था। वह जब वयस्क हो गया तो अपने पारिवारिक व्यवसाय कपड़े की दुकान का कामकाज देखने लगा। एक दिन एक गरीब व्यक्ति जिसके तन पर फटे हुए कपड़े थे, को देखकर उसकी दरिद्रता पर रमेश को बहुत मानसिक वेदना हुई और उसने अपनी दुकान से कुछ कपडे उसे दे दिये। इस बात का पता जब उसके पिताजी को हुआ तो वे बहुत नाराज होकर उससे बोले कि अगर ऐसी दया तू करता रहेगा तो एक दिन हमारा दिवाला निकल जाएगा।

उसके पिता की यह बातें उसे अच्छी नहीं लगी। उसने पिताजी से कहा कि जिस व्यक्ति के पास उसकी आवश्यकताओं से अधिक धन है, उसका सदुपयोग गरीबों एवं असहाय लोगों की सेवा में खर्च करना चाहिए, यही हमारी भगवान के प्रति सच्ची पूजा है। इस प्रकार के सत्कर्मों से ही मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। उसके पिताजी ने उसके यह उपदेश सुनकर उसे बहुत डाँटा जिससे उसे बहुत बुरा लगा और वह अपना घर छोड़कर एक निर्जन स्थान पर एक छोटी सी कुटिया में रहने लगा। अब वह प्रतिदिन गरीबों, असहायों की मदद करने में अपना समय देने लगा और अपना शानो शौकत का जीवन छोड़कर “सादा जीवन उच्च विचार “के सिद्धांत को जीवन में अपनाने लगा।

उसकी समाज सेवा की भावना से प्रभावित होकर अनेक व्यक्ति जिनके मन में भी दया एवं करूणा थी, उसके पास आने लगे। इस प्रकार अनेक लोगों के योगदान से रमेश के पास इतनी रकम उपलब्ध हो गई कि वह प्रतिदिन भूखे गरीब लोगों को निःशुल्क भोजन उपलब्ध कराने लगा। उसने कुछ दिनों के बाद एक ट्रस्ट बनाकर इस सेवा कार्य को दूर दराज के इलाकों तक विस्तारित कर दिया। इन सेवा कार्यों के कारण रमेश को लोग संत के रूप देखकर उसका सम्मान करने लगे।

नैतिकता का तालाब

यह घटना कई वर्ष पूर्व की है परंतु पीढी दर पीढी वहाँ के आसपास के निवासियों की जुबान पर आज भी रहती है। जबलपुर को तालाबों को शहर भी कहा जाता था जिनमें से एक तालाब के निर्माण का अदभुत प्रसंग है जो कि आज भी हमारे लिए आदर्श है।

रामानुज नाम के एक जमींदार के यहाँ एक बालक का जन्म हुआ परंतु दुखद बात यह थी कि उस बालक की माता उसे अपना स्वयं का दूध पिलाने में असमर्थ थी। ऐसी विकट परिस्थिति में एक धाय माँ ने उसे अपने बच्चे के समान दूध पिलाकर उसका लालन पालन किया। वह धाय माँ और उस बच्चे के बीच इतना भावनात्मक प्रेम हो गया था कि वह उसका लालन पालन बिल्कुल अपने बच्चे के जैसा करती थी। उसकी इस निस्वार्थ सेवा, प्रेम और स्नेह को देखते हुए उस बच्चे की माँ ने उस धाय माँ से कहा कि जब बालक बडा होकर धन कमाने लगेगा तो इसकी पहली कमाई पर तुम्हारा ही अधिकार होगा।

समय बीतता गया और यह बात आई गई हो गई। कालांतर में वह बालक संस्कृत का प्रकांड विद्वान बना और उसकी प्रतिभा से प्रभावित होकर एक दिन वहाँ के राजा ने उसे अपने गले से हीरों का हार उतारकर उसे सम्मानपूर्वक दिया। उसने वह हार अपनी माँ को घर आकर पहली कमाई के रूप में दे दिया। वह हार इतना कीमती था कि उसे देखकर अच्छे से अच्छे व्यक्ति का मन भी डोल जाए परंतु उसकी माँ को बचपन में धाय माँ को दिया हुआ वचन आज भी याद था उसने अपने बेटे को यह हार अपने हाथों से उस धाय माँ को देने का निर्देश दिया। यह सुनकर धाय माँ हतप्रभ रह गई और हार को अपने हाथों में लेकर भेंट स्वीकार करके उसे पुनः वापस कर दिया और कहा कि इतने महँगे हार का मैं क्या करूंगी ? अब लड़के की माँ ने कहा कि मेरे वचन के अनुसार यह हार तुम्हारा हो गया हैं और मैं इसे किसी भी कीमत पर वापिस स्वीकार नहीं करूंगी। अब धाय माँ को उसे वापिस लेना ही पड़ा और उसने उस हार को बेचकर उससे प्राप्त धनराशि से जनता के उपयोग के लिए एक तालाब का निर्माण करवा दिया। इस घटना को लोग आज भी नैतिकता और त्याग के रूप में आज भी याद करते हैं।

जीवन को सफल नहीं सार्थक बनाएँ

रामनगर नाम के एक शहर में हरिदास नाम का एक गरीब व्यक्ति रहता था। वह एक बहुत महत्वाकांक्षी व्यक्ति था और उसके मन में प्रबल इच्छा थी कि वह एक दिन धनवान बनकर सुख सुविधा पूर्ण जीवन जीते हुए राजनीति में भी अपनी पैठ बना सके। वह अपनी कड़ी मेहनत,बुद्धिमत्ता एवं परिश्रम से धीरे धीरे धन कमाकर काफी अमीर बन गया। अब उसने राजनीति में भी अपने पैठ बना ली थी एवं शहर में एक आलीशान मकान का निर्माण करके उसमें रहने लगा।

वह अपने जीवन में बहुत खुश था कि उसके जीवन की तीनों इच्छाएँ पूरी हो चुकी थी। एक दिन शहर में एक महात्मा जी का आगमन हुआ जिनकी बहुत प्रसिद्धि आसपास के इलाके में थी। हरिदास भी एक दिन उनका आशीर्वाद लेने गया उसने देखा कि वहाँ श्रद्धालुजनों की काफी भीड़ थी और महात्मा जी सबको बारी बारी से बुलाकर अपने आशीर्वचन देकर उन्हें विदा कर रहे थे।

हरिदास का क्रम आने पर वह स्वामी जी से मिला उसे देखकर वे मुस्कुराए परंतु कुछ बोले नहीं। यह देखकर हरिदास ने उनसे आशीर्वाद पाने की आकांक्षा व्यक्त की स्वामी जी बोले मैं तुम्हें क्या आशीर्वाद दूं ? प्रभु की कृपा से तुम्हारे जीवन की तीनों महत्वाकांक्षाएँ पूरी हो चुकी है। तुम शहर के सफल व्यक्तियों में से एक हो, हाँ एक बात जरूर कह सकता हूँ कि तुम्हारा जीवन सफल तो है परंतु सार्थक नहीं हुआ है। हरिदास यह सुनकर चौंका और उसने बड़ी विनम्रता से महात्मा जी से पूछा कि यह सार्थकता क्या है ? और इसकी प्राप्ति कैसे हो सकती है ? महात्मा जी ने कहा मैं तुम्हें एक छोटा सा उदाहरण देता हूँ, तुम समझदार हो आगे की बात अपने आप समझ जाओगे।

एक चिडिया अपने नर चिडवा के साथ अपनी मेहनत से बनाए हुए घोंसले में रहती है। वह अपने बच्चों का लालन पालन अच्छे से अच्छे ढंग से करती है एवं भोजन के लिए दाने का भी प्रबंध कर लेती है। उसकी इतनी ही आवश्यकताएँ है जिन्हें पूर्ण करके वह सुखी रहती है। ईश्वर ने मानव की संरचना करके उसे चिंतन, मनन और मंथन की बुद्धि दी हैं। वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाने के पश्चात् इस दिशा में अंतर्मन एवं अंतर्चेतना से सोचने का प्रयास करे।

यह सुनकर हरिदास वापिस अपने घर आ गया और रात में गंभीरतापूर्वक महात्मा जी के वचनों का अर्थ समझने का प्रयत्न करता रहा। अब उसके जीवन में धीरे धीरे परिवर्तन होने लगा। वह अपने धन, राजनीति एवं संपर्कों का उपयोग गरीब जनता के हित में, गरीब विद्यार्थियों को शिक्षा प्राप्ति हेतु मदद करने, गरीब कन्याओं के विवाह एवं अन्य सामाजिक कार्यों में अपने धन का मुक्त हस्त से खर्च करने लगा। उसके इस व्यवहार से शहर में उसका बहुत मान सम्मान भी बढ़ गया था और उसकी छवि एक व्यापारी के साथ साथ कृपालु, सज्जन एवं दानी व्यक्ति की भी हो गई थी।

एक वर्ष के बाद उन्हीं महात्मा जी का शहर में वापिस आगमन हुआ। हरिदास भी उनसे मुलाकात हेतु गया। स्वामी जी ने अब उसे आशीर्वाद देते हुए कहा कि पहले तुम धन उपार्जन करके एक सफल व्यक्ति थे परंतु अब उस धन का सदुपयोग करके अब तुम्हारा व्यक्तित्व सार्थक भी हो गया है। इसलिए कहा जाता है कि मानव जीवन सफलता के साथ साथ सार्थक भी होना चाहिए।

युवा

रामसिंह एक बहुत ही होनहार, बुद्धिमान, शिक्षा के प्रति समर्पित व्यक्तित्व का धनी था। उसने वाणिज्य विषय में स्नातक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करने के उपरांत नौकरी के लिये कई जगह प्रयास किया परंतु उसे निराशा ही हाथ लगती थी। एक दिन वह गंभीरतापूर्वक मन ही मन सोच रहा था कि युवा देश की शक्ति होता है। उसके कंधों पर राष्ट्र की प्रगति एवं उन्नति का भार है। वही देश की सभ्यता, संस्कृति और संस्कारों का प्रणेता होता है। आज वह युवा है, ऊर्जावान है, मन में कुछ नया करने की अभिलाषा है। यह सोचते सोचते उसके मन में अचानक ही भाव आता है कि वह एक शिक्षाविद् है और क्यों ना छात्रों के लिये कोचिंग इंस्टीट्यूट बनाये और उसे यह स्वरोजगार का माध्यम बहुत उत्साहित करता है।

वह इस दिशा में बढ़कर एक कोचिंग इंस्टीट्यूट वाणिज्य विषय के विद्यार्थियों के लिए बना देता है। इसकी विशेषता यह होती है कि इसमें सीमित संख्या में विद्यार्थियों का चयन किया जाता है और उनसे किसी प्रकार की मासिक फीस ना लेकर एक नई व्यवस्था की जाती है कि वे स्वयं शिक्षक द्वारा प्रदत्त शिक्षा का स्वयं ही मूल्यांकन करें और एक बंद लिफाफे में बिना अपना नाम लिखे उसे गुरूदक्षिणा के रूप में शिक्षक को दे देंवे। इससे शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच में प्रेम बढ़ता है एवं शिक्षक द्वारा दी जा रही कोचिंग छात्रों को कितनी लाभप्रद प्रतीत हो रही है, इसका मूल्यांकन भी हो जाता है। रामसिंह ने अपने इंस्टीट्यूट का नाम गुरूकुल रखा था एवं स्वयं ही शिक्षा प्रदान कर इसका शुभारंभ किया। उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि माह के अंत में गुरूदक्षिणा के रूप में अध्ययनरत् छात्रों ने जो राशि समर्पित की वह सामान्य शुल्क से कही बहुत अधिक थी।

इस पद्धति को छः माह तक सफलता पूर्वक संचालन करने के उपरांत उसने अपने गुरूकुल का विस्तार करके अन्य विषयों को भी शामिल कर लिया। उसका यह प्रयास बहुत सफल रहा। इस पद्धति से शिक्षक और विद्यार्थी दोनों ही संतुष्ट एवं प्रसन्न रहते थे। इस प्रकार व्यक्ति को कभी निराश नहीं होना चाहिए एवं आशान्वित रहकर प्रयास करते रहना चाहिए। जीवन में सफलता अवश्य मिलेगी।

अनुभव

एक चित्रकार केनवास पर विभिन्न प्रकार के रंगों की छटाओं पर अपनी कूची से आडी तिरछी रेखाओं के माध्यम से इतनी अच्छी चित्रकारी कर रहा था कि उसे देखकर ऐसा प्रतीत होता था जैसे केनवास जीवंत हो गया हो। उसके पास उसका नाती भी खडा खडा अपने दादाजी की मेहनत, लगन एवं परिश्रम को देख रहा था। उसने सहज भाव से दादाजी से पूछा कि आप चित्र कैसे और क्यों बनाते हैं ? दादाजी ने मुस्कुरा कर कहा कि मैं अपनी मन की भावनाओं और विचारों को चित्रकला के माध्यम से केनवास पर उभारता हूँ और पेंटिग का रूप लेने के उपरांत यह मूल्यवान हो जाती है। यह कला की साधना के साथ साथ धनोपार्जन का भी माध्यम है। अब वह बालक पूछता है कि आपके पास में इतने सारे लोग पेंटिग सीखने को क्यों आते हैं ?

दादाजी ने उसे सहज भाव से समझाया और कहा कि मुझे बचपन से ही चित्रकारी का शौक रहा है जो कि अब इस उम्र में आते आते परिपक्व हो गया है। मैं अपने इस अनुभव को चित्रकला में रूचि रखने वालों के साथ बाँटता हूँ और उन्हें सिखाने का प्रयास करता रहता हूँ इससे वे चित्रकला की बारीकियों को सीखकर उनका उपयोग करते हैं। उन्होंने उसके सिर पर हाथ फेरते हुये उससे कहा कि जीवन में अनुभव बहुत महत्वपूर्ण एवं अमूल्य होता है। जब तुम छोटे रहते हो तो दूसरों से अनुभव लेना चाहिए और जब उम्रदराज़ हो जाओ तो अपने अनुभवों को दूसरों के प्रदान करना चाहिए। यह मानवीय कर्तव्य है और तुम्हें इससे मानसिक तृप्ति एवं आत्मीय संतोष प्राप्त होगा। यह सुनकर वह बालक बोला कि दादाजी मैं भी आपकी इस सोच को अपनाकर जीवन में आगे बढूँगा।

शिल्पकार की कला

एक शिल्पकार रवि पर्यटन हेतु पुरी के समुद्र तट पर विचरण कर रहा था। वहाँ समुद्र किनारे रेत का जखीरा देख उसके मन में रेत में कुछ आकृतियाँ बनाने का भाव उठा और उसने उसे क्रियान्वित करते हुए, रेत में ही बहुत सुंदर आकृतियाँ बना दी। जिन्हें देखकर लोग बहुत खुश हुये और उसे बहुत प्रशंसा मिली। रात में अचानक ही आंधी तूफान आने से तेज हवा के झोंकों के कारण रेत अस्त व्यस्त होकर आकृतियाँ मिट गई। यह देखकर वह बहुत दुखी हो गया और उसकी आँखें में आंसू आ गये।

उसी समय एक पर्यटक उसे निराश देखकर उसके पास आया उसके कंधे पर हाथ रखकर बोला मित्र तुम बहुत अच्छे शिल्पकार हो और तुम में असाधारण प्रतिभा है। तुम निराश क्यों हो रहे हो, विध्वंस और सृजन तो संसार का नियम है। जीवन में सृजन विध्वंस में परिवर्तित होता है और फिर यह विध्वंस किसी नये सृजन को जन्म देता है। तुम मेहनत और लगन से इस चुनौती को स्वीकार करो और कल से भी अच्छी कलाकृतियाँ बनाकर अपनी सृजन क्षमता का परिचय दो। वक्त और भाग्य तुम्हारी कलाकृति को मिटा सकते हैं परंतु तुम्हारी कार्यक्षमता और प्रतिभा को समाप्त नहीं कर सकते। तुम उठो और निराशा छोड़कर आशा के दीपों को मन में संजोकर अपनी पूरी क्षमता और लगन से पुनः जुट जाओ।

उसकी बात सुनकर वह शिल्पकार बहुत प्रभावित हुआ और उसने फिर से रेत पर और भी सुंदर आकृतियाँ बनाकर सबका मन मोह लिया। उसकी कार्यकुशलता का सम्मान करते हुए क्षेत्रीय नागरिकों के द्वारा उसका अभिनंदन किया गया। अब वह प्रतिवर्ष वर्षा ऋतु के समाप्त होने के बाद वहाँ पर जाता है ओर रेत पर अपनी शिल्पकला का प्रदर्शन करके प्रशंसा प्राप्त करते हुए आत्मीय संतुष्टि का अनुभव करता है।

सेठ गोविंददास की सिद्धांतवादिता

श्रीमती पदमा बिनानी देश के सुप्रसिद्व औद्योगिक घराने बिनानी गु्रप ऑफ इंडस्ट्रीज की आधार स्तंभ है। आपका साहित्य और समाज सेवा के प्रति जबरदस्त रूझान बचपन से ही रहा है। उनसे मुंबई में मुलाकात के दौरान उन्होंने अपना संस्मरण बताते हुए कहा कि मेरे पिताजी राजनीति में देशभक्ति, ईमानदारी, त्याग और बलिदान के प्रति समर्पित थे। वे कहते थे, कि राजनेता के चरित्र और व्यवहार से यह बातें प्रकट होना चाहिए कि वह जनसेवा की राजनीति के लिये समर्पित है ना कि पद, प्रतिष्ठा और पैसे के लिये राजनीति कर रहा है। हमें सत्ता की ऐसी भूख ना हो जिसके लिये हम किस भी हद को पार कर जायें। हमें नैतिक मूल्यों और आदर्शों को स्थापित करने के लिये राजनीति करना है ताकि भावी युवा पीढी इससे कुछ प्रेरणा ले सकें। उनका मत था कि राजनेता और राजनीतिज्ञ में फर्क होता है। राजनीतिज्ञ अगले चुनाव को ध्यान में रखकर राजनीति करता है जबकि राजनेता अगली पीढी को अपने ध्यान में रखता है।

मेरे पिताश्री का संसदीय जीवन सेंट्रल असेंबली से लेकर लोकसभा तक 50 वर्षों का रहा और उन्होंने नेहरू परिवार की तीनों पीढियों पंडित मोतीलाल नेहरू, पंडित जवाहरलाल नेहरू और श्रीमती इंदिरा गांधी के साथ मिलकर कांग्रेस के लिये काम किया था। वे कांग्रेस के उन तमाम नीतियों के मुखर विरोधी थे जो गांधी जी की नीतियों से मेल नहीं खाती थी। वे गोरक्षा और राष्ट्रभाषा हिंदी के सवाल पर कांग्रेस की नीतियों के विरूद्ध जाकर लोकसभा में आवाज उठाते थे। मेरे जीवन का यह अविस्मरणीय संस्मरण है और यह प्रसंग आज भी मुझे याद है कि उन दिनों में दिल्ली स्थित उनके शासकीय आवास में ही थी। संसद का लोकसभा का सत्र चल रहा था और मेरे पिताजी को लोकसभा में अपना उद्बोधन देना था। वे कांग्रेस की नीतियों के विरूद्ध बोलने की पूरी तैयारी कर चुके थे तभी कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता उनको समझाने के लिये आवास पर आये और उन्होंने धमकी भरे लहजे में यह कहा कि यदि आपने सदन में पार्टी की नीतियों के प्रतिकूल बोला तो आप पर अनुशासनात्मक कार्यवाही की जायेगी। इस पर सेठ गोविंददास जी ने जवाब दिया कि मैं कांग्रेस से अधिक अपने देश और देशवासियों के लिये प्रतिबद्ध हूँ और मेरा त्यागपत्र मेरी जेब में है। उनके इस जवाब से वे कांग्रेस नेता स्तब्ध रह गये क्योंकि उस समय कांग्रेस में रहते हुये नेहरू जी के विरूद्ध बोलने की बात तो दूर चिंतन भी संभव ना था।

मेरे पिताश्री किसी दल और व्यक्ति के प्रति नहीं बल्कि मूल्यों की राजनीति के प्रति समर्पित थे और वे आजीवन अपनी इन नीतियों पर अडिग रहे जिसका परिणाम यह हुआ कि वे अपने पचास वर्षों के संसदीय जीवन में मंत्री पद से सदैव दूर रहे परंतु इसका उन्हें कभी कोई दुख नहीं था। आज का युवा वर्ग जो कि राजनीति में रूचि रखता है उसे जीवन में मूल्यों की राजनीति के प्रति समर्पण की प्रेरणा लेना चाहिये। मूल्यों से समझौता करके यदि सत्ता मिल भी जाये तो सत्ता का क्या मूल्य ?

(समाप्त)

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