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कहानी // प्यास // आइवर यूशिएल

धर्म और विज्ञान की मिली जुली सोच पर आधारित एक रचना - 'प्यास '

कहानी // प्यास // आइवर यूशिएल धर्म और विज्ञान की मिली जुली सोच पर आधारित एक रचना - 'प्यास '

आइवर यूशिएल

लोकप्रिय बाल विज्ञान लेखक

युवा पत्नी की निष्प्राण देह सामने थी और वह धारोंधार रोये जा रहा था। पत्नी से उसका सिर्फ संग और स्वार्थ ही नहीं जुड़े़ थे वरन् उसके वर्तमान के साथ-साथ संस्कारगत उसका पूर्व जन्म भी जुड़ा था और जुड़े थे भविष्य के सपने भी जिन्हे साकार करने की प्रेरणा उसे इसी पत्नी से ही मिलनी थी।

परिजन अन्तिम क्रिया की तैयारी में व्यस्त थे ताकि वे रस्म अदायगी कर जल्दी से जल्दी अपने-अपने घर पहुँच सकें। इतने में ‘अलख निरंजन’ का स्वर सुन उसकी दृष्टि घर के दरवाजे पर खडे़ साधु पर स्वतः ही जा पड़ी। लम्बा चौड़ा शरीर, उन्नत ललाट, वस्त्र के रूप में एक लम्बा गेरुआ चोगा, हाथ में कमण्डल और चेहरे पर तेज लिए ड्योढ़ी पर खड़े बाबा को उसने देखा तो भीगी आंखों से दो पल के लिए देखता ही रह गया।

‘अरे बच्चा किसके लिए विलाप करता है ? क्या है जो तूने खो दिया जिसके लिए इस तरह दुखी है ? शरीर को प्यार करता है तो वह तो तेरे सामने अभी भी मौजूद है और अगर इसके अंदर मौजूद आत्मा से लगाव है तो उसे क्या हुआ है ? वह तो अजर है, अमर है, नष्ट न तो की जा सकती है, न स्वतः होती है। फिर बिना कारण इतना विलाप क्यों ?’ सामने मौजूद परिस्थिति को भांपकर भिक्षा के लिए आये बाबा ने उसे सांत्वना देने का प्रयास किया। सुना तो सुनकर चुप रह गया। बोलता भी क्या ?

समय बीता। उस दिन हाइड्रोजन से भरे सिलिण्डर्स अपने गोदाम से निकलवाकर फैक्टरियों में भिजवाने की तैयारी कर रहा था जहां इनकी मदद से अमोनिया व मीथेनॉल आदि तैयार होती थी कि तभी ‘अलख निरंजन’ की परिचित सी आवाज सुन कर वह चौंक गया.। मुड़कर देखा तो गोदाम के फाटक पर एक बाबा खड़े थे। वही बाबा, एकदम वही! पहचानने में तनिक भी देर नहीं लगी थी उसे, पर इस बार उपदेशक की नहीं, याचक की मुद्रा में थे ।

‘बहुत प्यासा हूं ,पानी मिलेगा ?’

उसने बाबा को ध्यान से देखा, वही थे बिल्कुल वही। बाबा के उपदेश ही नहीं बल्कि उसका स्वरूप आज भी उसके मन के अन्दर कहीं गहरे तक धंसा हुआ था ।

‘ हां ,हां ,क्यों नहीं !

उसने भरा हुआ एक सिलिण्डर बाबा के सामने रखवा दिया।

‘यह क्या ?’ मैंने तो पानी मांगा था बच्चा।’ सिलिण्डर सामने पाकर बाबा ने अपनी जरूरत एक बार फिर स्पष्ट कर दी।

‘वही तो दिया है बाबा ! पानी क्या है - हाइड्रोजन और आक्सीजन का मिश्रण ही तो। हाइड्रोजन से भरा सिलिण्डर आपके सामने पड़ा है और आक्सीजन तो पूरे वातावरण में ही फैली हुई है, जितनी चाहें ले सकते हैं।’

इस बार चुप रहने की बारी बाबा की थी । कहते भी तो क्या ?

प्रकृति में प्रचुर मात्रा में मौजूद आक्सीजन का हाइड्रोजन के साथ संयोग हो जाने पर ही किसी प्यासे व्यक्ति के लिए जिस तरह इनकी उपयोगिता है ठीक उसी तरह सांसारिक व्यक्ति के लिए रिश्तों के बीच पनपने वाले प्रेम की प्यास, आत्मा और शरीर के योग से बुझती है, आत्मा और शरीर की अलग-अलग उपस्थिति का ज्ञान दर्शाने से नहीं। इन दोनों का अलग हो जाना ही जरूरत मंद प्यासे के लिए दुःख और कष्ट का कारण बन जाता है - ऐसा वह सोचने लगा हालांकि यह महज उसकी अपनी सोच थी , नितांत अपनी और वह स्वयं नहीं जानता था कि उसका इस तरह सोचना सही भी था या नहीं और अगर सही था तो किस हद तक ?

आइवर यूशिएल

ज्ञाशिम,

सी-203, कृष्णा काडण्टी,

मिनी बाईपास, बरेली 243122

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