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अनूपा हरबोला की 2 लघुकथाएँ - शहीद स्मारक / कद्र है...


शहीद स्मारक

"धन्य है, वो माँ जो ऐसे पूत को जन्म देती है,ऐसे बेटों की माँ महान है,हर माँ को इन माताओं से प्रेरणा लेनी चाहिए जिन्होंने अपने बेटे को खोने का ग़म भुला कर उसकी मौत को शहादत का दर्जा दिया और मृत बेटे को गर्व से शहीद बोला है,कोई आसान बात नहीं है ये। अब हम लोगों को इनके आँसू पोंछने है, ये हम सब का कर्तव्य है" ।

,जैसे ही शहर के विधायक मूलराम जी ऐसा बोलते है तालियों की गड़गड़ाहट पूरे सभागार में गूँज जाती है।

अपने भाषण के उपरांत वो शहीदों की याद में बने "शहीद स्मारक" का लोकार्पण करते हैं।

मंच से ही पास बैठे अपने सचिव को बोलते है, इन शहीदों के परिवारों का खयाल रखा जाय तथा शहीदों के परिवार जनों को आश्वासन देते है कि उन्हें कोई भी परेशानी हो तो उन्हें संपर्क करें,ऐसा बोलकर वो मंच से नीचे उतर जाते हैं

पुनः तालियां गूँजती है सभागार में।

"चल यार,जल्दी चल घर पहुंचना है मेरे घर मेहमान आए है" विधायक जी अपने ड्राइवर को बोलते हैं, विधायक जी को अपनी समस्याएं बताने के लिए शहीदों के परिवार जन उनकी कार का पीछा करते है,पर विधायक जी अपनी सरकारी कार में फुर्र.......


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कद्र है ...

"क्या जी! मैं सारा दिन तुम्हारा इंतज़ार करती हूं और तुम आकर सीधे अपने मम्मी- पापा के कमरे में चले जाते हो, मेरे बारे में कुछ भी नहीं सोचते" गुस्से से भरी हुई ऋतु बोली।

"दिन भर का थका-हारा आया हूँ, घर आने पर लोगों की पत्नियां चाय- पानी पिला कर, प्यार भरी मीठी- मीठी बातें करती हैं और तुम गुस्सा कर रही हो"।

"लोगों के पति भी तो ऑफिस से आने के बाद सीधे पत्नी के पास आते हैं, कहीं इधर उधर नहीं जाते ना, तुम्हें तो मेरी कोई कद्र ही नहीं"

" कद्र है जानेमन! मुझे अपनी दादी की सूनी आंखें अभी भी याद हैं, इसीलिये तो बच्चों के दादा - दादी के कमरे में जाता हूं।"

" तो क्या ?"

"आज मैं वहां जा रहा हूं तो कल बच्चे भी, तुम्हारे पास आएंगे...।"

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अनूपा हरबोला

कर्नाटक

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