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लघुकथा // व्यवहारिक ज्ञान // शुभ्रा झा

पार्टी का फैसला विषय पर आधारित लघुकथा

व्यवहारिक ज्ञान

लघुकथा // व्यवहारिक ज्ञान // शुभ्रा झा

शुभ्रा झा

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गाँव के सारे लोग एकजुट हो कर आज मंत्री जी से मिलने के लिए उनके घर के बाहर इकठ्ठे थे ।

मंत्रीजी बाहर बरामदे में बैठे कुछ पत्रकारों को अगले दिन होने वाली जन सभा के बारे में विस्तृत रूप से जानकारी देने में व्यस्त थे ।

मंत्री जी ने शोर सुन अपने सहयोगी से शोर का कारण पूछा ।

"सर वो गाँव से लोग  आए है पूछना चाहते है कि अस्पताल कब तक बनेगा "सहयोगी ने जवाब दिया

"हे भगवान ये सब तो पीछे ही पड़ गए मेरे ,अब क्या मैं अपने जेब से अस्पताल बनवाऊँ।"मंत्रीजी ने झुंझलाहट में कहा ।

पास बैठे एक  पत्रकार अपनी जिज्ञासा को शांत करने हेतु मंत्रीजी से पुछा

"सर हमारी सरकार तो अस्पताल बनवाने के पैसे दे रही है फिर परेशानी क्या है।"

मंत्रीजी ने पत्रकार के एकदम पास वाली कुर्सी पर बैठ उसकी पीठ पर हाथ फेरते बोले,

"ये तो हम और आप जानते है ना!!"इन जनमानस को  हमारे अलावा बताएगा कौन?"

"और एक बार अस्पताल बन जाए तो सारे गाँव वाले को यह समझते देर नहीं लगेगी कि पिछले कुछ सालों से जो  मौतें बढ़ गयी है वो  रात दिन  मेरे कारखाने में हीरे के छंटाई और घिसाई से फेफड़ों में जमने वाली धुल के कारण ही है।"

"अब आप ही बताइए हम और आप बेवकूफ थोड़े ही है जो भावनाओं में बह कर मैं अपने करोड़ों का कारखाना  बंद कर दूं और आप लाखों का विज्ञापन! जिसे  आपके ही अखबार को देने का हमारी  पार्टी ने आज ही  फैसला लिया है।"

एक जोरदार ठहाके के साथ ही  अंदर उन्माद बढ़ता ही जा रहा है और साथ ही  बढ़ता जा रहा है,

बाहर लोगों का शोर तो अंदर पैग की संख्या।


शुभ्रा झा ,दरभंगा, बिहार

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