नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

बुन्देली लोक कथा- * महाते की महिमा * संकलन- डॉ आर बी भण्डारकर।

बुन्देली लोक कथा-

       * महाते की महिमा *

संकलन- डॉ आर बी भण्डारकर।

image

      एक गाँव में एक महाते हते।महाते कों ज पद अंगेरजी सिरकार की राज-विवस्था में मिलो हतो सो गाँव में उनको रुतवा कछू जादईं हतो। महाते एक काम ज करत हते क़ै गाँव में या आस पास मिडोपन में कहूँ काउ कें कछूँ शादी-व्याह या और कछूँ कारज

होत्तो तौ वा में वे खुद नइँ जात्ते,गाँव वाले काउ आदमी के हांतन भेंट-व्यवहार और अपइं पनहैंया पहुँचाय देत्ते और कभाय देत्ते कै हमाइं पनहैंयन कों ही हमाई हाज़िरी  मानी जय।

पुराने जमाने के लोग हते, महाते की इज्जित करत्ते सो कोऊ कछू नइँ कहात हतौ। अब समय बल्दौ,अँगरेजी राज चलौ गओ लेकिन तोऊ महाते मुखियन कौ रितवा कछूँ दिनन तक बैसोइ चलत

रह्यो।

इतेऊ ज़मानों बल्दौ, लरिकन की नई खैल आइ गयी।उन्ने जब  महाते की  ज हरकत देखी तौ उन्हें भौत बुरौ लगौ।

      इते संजोग ज परौ कै कछू दिनन मेंईं महाते कें बिटिया कौ बिआव आय गओ।गाँव, मुहल्ला और मिडोपन में खूब नौते बटे। मौका देख केँ गाँव और मिडोई लरकन ने एक योजना बनाई।ज योजना की भनक जब गाँव के बड़े-बूढ़िन  कों लगी तौ उन्ने लरिकन कौं समझाओ कै देखौ लरिका हौ! बिटिया कौ बिआव तौ पुन्न कौ काम होत है सो जामें कौनौ  गलत हरकत करबौ बिल्कुलऊँ ठीक बात नहियाँ।

     सिब लोग बात मान गए सिबन्नेइं खूब  शौक से बिआव में भाग लओ।

   फिर अगर साल में महाते कैं लरका कौ बिआव आय गओ।अबकी बेर महाते ने नाते-रिश्तेदारी में,गाँव में खूब शौक सें कछूँ जादईं नौते बंटवाए। बिआव कौ दिन जब ढिंगनइँ आय गओ तब गाँव और मिडोई के लरकन नें अपयें पुरखन सें कही, देखौ दद्दा, हम पेहलें तौ तिहाई बात मान गए ते, अकेले अबकी बेर हमें अपयें मन की कल्लेन देउ।सिबने कही ठीक है भई तुम्हें जैसो ठीक लगै तैसो करौ।

    लरकन ने का करौ कै गाँव में और मिडोपन में जा जा कें महाते कौ नौतौ आओ हतौ उन सिबके घर सें उनकी पनहैंयाँ इकट्ठी करीं,उन्हें एक पुटरिया में बांधो ,फिर एक आदमी कों पटओ  और बाय बिआव के दिना बा पुटरिया लेकें और सिबकौ भेंट-व्यवहार  लेकें महाते के घरै पहुँचाय दओ,और सिबकी ओर सें कभाय दई कै महाते दद्दा हम सिबकी इन पनहैंयन कों ईं हम सिबकी हाज़िरी मानौ जय।

   अब बिआव के दिना महाते के घरै पाँच-दस मेहमान और एक हज़ार पनहैंया हाज़िर।महाते ने माथौ पीट लओ।

.....................

0 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.