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ललित व्यंग्य // भूख-प्यास // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

भूख-प्यास

डा. सुरेन्द्र वर्मा

ललित व्यंग्य // भूख-प्यास // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

जैसे ज़िंदगी में सुख-दुःख लगा रहता है, वैसे ही भूख-प्यास भी लगी रहती है। थोड़ी देर के लिए भले ही भोजनोपरांत भूख शांत हो जाए, पर वह दुबारा लगने लगती है। यही हाल प्यास का है। इधर पीने से बुझी नहीं, कुछ समय बाद दुबारा नमूदार हो जाती है। जिसे भूख-प्यास नहीं लगती, समझो वह जीवित प्राणी है ही नहीं। ज़िंदगी है तो भूख-प्यास भी है। ज़िंदगी के साथ आती है और ज़िंदगी के साथ ही चली भी जाती है। सुख-दुःख की तरह भूख और प्यास भी जुड़वां हैं। साथ साथ रहते हैं। भूख शांत हुई तो प्यास, और प्यास बुझी तो भूख लगने लगती है। काम बड़े ताल-मेल से होता है।

भूख को शांत करने के लिए कैसे कैसे तो पापड़ बेलने पड़ते हैं। रोटी के लिए पैसा कमाना पड़ता है। कई लोग तो सचमुच पापड़ बेल कर ही पैसा कमा पाते है ताकि आहार खरीदा जा सके और पेट की भूख मिटाई जा सके। कुछ ऐसे भी हैं जो दूसरों के कमाए पैसों पर ऐश करते हैं। कुछ, जैसी की कहावत है, न खाते हैं न खाने देते हैं। लेकिन हमारी सरकार को ऐसे ही लोग पसंद हैं। सबको भूखा मारने पर जुटी हुई है।

भूख इन दिनों चर्चा में है। दिल्ली में तीन लड़कियां भूख से मर गईं। उनके पेट में अन्न का एक दाना भी नहीं मिला। उधर मध्य- प्रदेश में लाखों टन अन्न गोदामों में भरा पडा है, सड़ रहा है। कोई खरीदार नहीं है। बड़ी विडम्बना है। सारी गलती तो सरकार की ही है। न तो भूखे बच्चों की भूख देख पाती है और न ही सड़ते हुए अनाज के प्रति उसकी कोई संवेदना है। एक प्रसिद्ध लेखक ने कहा था, भूख मेरे जीवन का सबसे बड़ा गुस्सा है। मैं उस व्यवस्था का दुश्मन हूँ जो लोगों को भूख से मरने के लिए तड़पता छोड़ देती है। लेकिन लेखकों की सुनता कौन है। ज्यादह चूँ चपड़ की तो सबसे पहले लेखकों को ही धर दबोचा जाता है।

कई शहरों में पीने के पानी की इतनी किल्लत हो गई है कि लोग भूख-हड़ताल करने की सोचने लगे। पहाड़ों की रानी शिमला प्यास से तड़प रही है। बेंगलूर की प्यास कब बुझेगी कोई नहीं जानता। प्यास से मुनाफाखोरी की जा रही है। पानी, जो कभी इफरात से मुफ्त में उपलब्ध था, मंहगा होता जा रहा है। लोग हमेशा की तरह सो रहे हैं। पानी की ज़बरदस्त कमी है, लेकिन.... पीने वाले पी रहे हैं। न तो पीने वालों की कमी है न पिलाने वालों की। जितना भी मना कीजिए, लोगों की पीने की प्यास और भी बढ़ जाती है।

भूख और वज़न का एक अटूट रिश्ता है। ज्यादह भूख, ज्यादह खाना। ज्यादह खाना, ज्यादह वज़न। स्त्रियाँ अपना वज़न कम करने के लिए अक्सर कम खाने लगती हैं, डाइटिंग करती हैं। इसका कितना असर होता है वे ही जानें। वैसे भी भारत में इतने व्रत- त्यौहार हैं कि न चाहते हुए भी उन्हें भूखा रहना पड़ता है। आदमी लोग डाइटिंग के इन चक्करों में ज्यातर पड़ते ही नहीं, जबतक डाक्टर ही न कह दे कि वज़न बहुत बढ़ गया है, कम कीजिए। लोग फिर भी सुनते कहाँ हैं। कुछ लोग खूब खाते हैं और उनका वज़न नहीं बढ़ता। ये ‘खावा लजावा’ किस्म के लोग होते हैं।

कितनी कितनी प्यास और कैसी कैसी भूख है। पैसे की भूख, पद और प्रतिष्ठा की भूख। इज्ज़त और ओहदे की भूख। प्रसिद्धि की प्यास। किसी को चैन नहीं है। पैसे की भूख तो ऐसी है, जितना आए उतना ही कम। अमीरों में प्रतियोगिता हो रही है। कौन कितना रईस है। बाकायदा तालिका बनाई जाती है। रईसी जो ठहरी। किसी ने शायद ठीक ही कहा है, कंगालों की मुफलिसी का कारण शायद यही है। पैसे की कभी न खत्म होने वाली रईसों की भूख। वैसे ये तालिका देखे बिना रहता मैं भी नहीं हूँ। एक संतोष सा मिलता है, न सही मैं, कुछ तो हैं इतने रईस। पर थोड़ी जलन भी होती है कि हाय,मैं न हुआ।

जो जहां है, वहीं असंतुष्ट है। भूख असंतुष्टि है। भूख चाहत है। भूख मनुष्य की आवश्यकता है, उत्कट इच्छा है। बेचैन कर देने वाली विकलता है। मास्टर, हेड मास्टर होना चाहता है। क्लर्क, हेड क्लर्क होना चाहता है। प्रोफ़ेसर, वीसी बनाना चाहता है। सांसद, मिनिस्टर होना चाहता है। मिनिस्टर, चीफ मिनिस्टर बनना चाहते हैं। चीफ मिनिस्टर, प्रधान मंत्री बनने की प्यास पाले हैं। सभी मिलकर प्रधान मंत्री की टांग खींचते हैं, भले ही अपनी ही टांग क्यों न तुड़वा लें। टांगें टूट रही हैं पर प्यास है कि बुझती नहीं।

हर किसी की अलग अलग प्यास है और हर प्यास की अलग अलग वांछना है। गला खुश्क होता है तो उसे पानी की दरकार है। प्यासी अंखियों को दर्शन की दरकार है। धरती प्यासी हो तो उसे वर्षा चाहिए। विरही प्यासा हो तो उसे मिलन की दरकार है। प्यास मेरी जो बुझ गई होती / ज़िंदगी फिर न ज़िंदगी होती।

घबराइए नहीं। भूख से, प्यास से, घबराइए नहीं। कहते हैं, आपके भीतर एक वास्तविक प्यास है तो रास्ता ज़रूर मिलेगा। आपकी भूख प्यास ही आपके लिए रास्ता बनेगी। तथा अस्तु।


--डा, सुरेन्द्र वर्मा / 10-एच आई जी, 1- सर्कुलर रोड / इलाहाबाद –

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