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लघुकथा // आज की सावित्री // रचना सिंह"रश्मि"

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सत्तू के पेट में रात से ही बहुत तेज दर्द हो रहा था मुझे लगा शराब के लिए नाटक कर रहा है......

अब कुछ ज्यादा ही तड़प रहा था।

मैं सत्तू को अस्पताल ले आई डॉक्टर साहब रात से ही पेट दर्द बता रहे कुछ खाया भी नहीं है रात से  डाक्टर सत्तू को पेट दबा कर देखने लगे कभी उसकी आंखें देखते हैं कभी उसकी जीभ देखते। ऐसा लग रहा है जैसे कुछ समझ में नहीं आ रहा है। सत्तू को डॉक्टर साहब ने बाहर भेज दिया। यह शराब पीता है । इसको इसको तुम बड़े अस्पताल ले जाओ। मैंने हैरानी से देखा सब ठीक है न। उनकी तरफ देखा और पूछा डॉक्टर साहब सब सही तो है ना। हां सब कुछ सही है। यहां जाँच  नहीं हो सकती। बड़ा अस्पताल है वहां पर बडे डॉक्टर और जाँच मशीने भी है । वहाँ जांच करवाओ।

बड़े अस्पताल में सत्तू की जांच से पता चला कि उसकी दोनों किडनी खराब हो चुकी है। अब वह जी नहीं पाएगा। डाक्टर ने भर्ती करने.को कह दिया दो जिससे इलाज शुरू हो सके। अस्पताल वाले जो कहते गये, मैं करती गयी । सब बिक गया गाँव की जमीन का भी सौदा कर दिया । सब कुछ बेच दिया कहाँ से लाऊं पैसा।  मैं और सत्तू ही थे बस अगर उसे कुछ हो गया तो.........भागदौड़ से थक गयी थी ।अचानक कब मेरी आँख लग गयी पता ही चला। सामने यमराज खड़े बोले मैं सत्तू को लेने आया हूँ। सावित्री रोने लगी। प्रभु ऐसा मत करो कैसे जी पाऊँगी लोग मुझे जीने नहीं देंगे नोच  खाएंगे। ये जैसे भी है मेरे पति हैं। मैं खुद  को बेचकर अपने पति का इलाज कराऊंगी उनको छोड़ दो प्रभु। बेटी  इतनी ही आयु है इसकी।  इसने तुमको कभी कोई सुख नहीं दिया। मैं इसको नहीं छोड़ सकता बाकी तुम कुछ भी मांग लो। प्रभु अभी आपने मुझे बेटी बोला है ।

तो क्या एक पिता अपनी बेटी को विधवा करेगें ? अभी तो मैंने मातृत्व भी नहीं पाया मेरा सारा जीवन अंधकार में हो जाएगा। यदि आप सत्तू को ले जायेंगे

आपको मेरे प्राण भी लेने होंगे । यदि आप मेरे प्राण नहीं लेंगे तो मैं आत्महत्या करूंगी । प्रभु आपको मेरी आत्म हत्या का पाप लगेगा । प्रभु मैं इसकी अर्धांगिनी हूँ। इसके बिना अधूरी हूँ । आप मेरे पति को छोड़ दें।  सावित्री अपनी बात पर अटल थी।  यमराज को सत्तू को छूने भी न दे रही थी।

आखिरकार यमराज को सावित्री की जिद के आगे हारना पड़ा....बोले - बेटी तुमको अपनी आधी जिंदगी अपने पति को देनी होगी। मैं तैयार हूँ । आप मेरी पूरी जिंदगी ले लें।  यमराज तथास्तु कहकर मन ही मन सोचते हुए - सावित्री चाहे सतयुग की हो या कलयुग की हो,  सावित्री से हारना ही पडता है - अंतरध्यान हो गये। सावित्री लगातार बोल रही थी - मेरी जिंदगी ले लो तभी नर्स ने झकझोरा । तुमको डा.साहब बुला रहे। घबराते हुए उसने पहले सत्तु को देखा फिर डाक्टर के पास गयी। सावित्री तुम्हारे लिए अच्छी खबर है।  कल ही तुम्हारा और सत्तू को आपरेशन है।  तुम्हारी किडनी मैच हो गयी है।  तुम्हारा पति बच जाएगा। सावित्री खुशी से उछल पड़ी । आखिर यमराज से आधी जिंदगी का सौदा जो गया था । होश में आने पर सावित्री ने डाक्टर को देखा डाक्टर ने कहा अब तुम और सत्तू दोनों ठीक हो । मन ही मन यमराज को धन्यवाद दिया

                              रचना सिंह"रश्मि"

                                  आगरा उ.प्र

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