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बारुद के ढेर पर // डॉ. विजय शिंदे

विश्व में भारत की प्रतिमा अहिंसावादी और शांतिप्रिय देश के नाते है। यह सही भी है क्योंकि भारत का इतिहास यहीं बयां करता है। लेकिन आज-कल जो कुछ घटनाएं देश भर में घटित होती है, उसे व्यापक जातिवादी और धार्मिक रंग दिया जाता है। भारतवासी इस रंग में रंग भी जाते हैं, तब अहिंसावादी और शांतिप्रिय विचार प्रणाली को ठेस पहुंचती है। भारत के भविष्य और विकास गति को असुरक्षित करने का कार्य जातिवादी और धार्मिक कट्टरपंथी ताकतें कर रही है। इस विषय को लेकर कई लोगों ने, कई विचारकों ने और कई समाज हितैषियों ने लिखा है। मैं किसी अलग बात को आपके सामने रख रहा हूं ऐसी बात नहीं। बस सबके मन में जो बातें उठ रही है उसे ही दुबारा उठा रहा हूं या युं कहे कि दोहरा रहा हूं। लेकिन यह दोहराव जरूरी है, इन विचारों का बार-बार चिंतन करना, कागज पर उतरना... जरूरी है। जिन घटनाओं से हम लोग आहत होते हैं, घायल होते हैं उससे ऐसे लगता है कि क्या हम लोग, हमारा समाज, हमारा देश बारुद के ढेर पर खड़ा है? कभी ऐसे भी लगता है कि हम लोग ज्वालामुखी के शिखर पर खड़े हैं। ऐसी स्थिति में बारुद और ज्वालामुखी के फटने का खतरा हमेशा बने रहता है।

यह विचार आज हमारे-आपके मन में उठने का कारण यहीं है कि सामाजिक मनमुटाव कहीं-न-कहीं कम होते जा रहा है। छोटी सी घटना आग बन जाती है और दो समाज, दो जातियां, दो धर्म, दो देश एक-दूसरे के सामने खड़े हो जाते हैं। इन दोनों का दोहरापन समाज की शांति को भंग करने पर आमदा होता है। हमारा बचपन ‘एकता की ताकत’ वाले कई पाठ, कई कहानियां, कई निबंध सुनते-लिखते गुजरा है, परंतु असल जिंदगी में हमेशा फुट, अलगाववाद का ही रास्ता अख्तियार लिया है। एक भाई दूसरे के साथ रहना नहीं चाहता, बेटा बाप के साथ रहना नहीं चाहता और बाप बेटे के साथ रहना नहीं चाहता। खून के रिश्ते भी एक-दूसरे के विरोध में दुश्मनी पाले बैठे हैं, ऐसी स्थिति में दो जाति और दो धर्मों की दोहाई देना तथा एकता की बात करना मूर्खतापूर्ण और मजाकिया ही लगेगा! खैर समाजहित और देशहित के लिए ऐसी मूर्खताएं बार-बार करनी चाहिए, इसलिए कर रहे हैं। आज इन विचारों की पृष्ठभूमि में भीमा-कोरेगांव की घटना है, जिससे दो समाज और दो जातियां एक-दूसरे के सामने खड़ी हो गई, मारने-मरवाने पर उतारू हो गई। जिन दृश्यों को खबरों में देखा, समाचार पत्रों में पढ़ा उससे कई गुना भयानक दृश्य सोशल मीडिया में आग की तरह फैलते भी देखे हैं। आज भी इन दृश्यों को समाज विघातक प्रवृत्ति के लोग सोशल मीडिया में चटखारे के साथ प्रसारित करने का काम करते हैं। इन पर कोई पाबंदी नहीं? मजे लिए जा रहे हैं, आग लगाकर, तोड़-फोड़ करके, खून-खराबा करके। भयानक है। इतनी बड़ी आबादी वाले देश में इंसानी जिंदगी कीड़े-मकौड़ों जैसी बन गई है। कहानियों में पढ़ा-सूना, फिल्में में भी देखा कि एक बुरी प्रवृत्ति, बुरे इंसान को कितनी बार भी मारने की कोशिश करें मरता ही नहीं, उल्टा उस पर जितनी बार हमला करें, खत्म करने की कोशिश करें, वह उतनी ही ताकत के साथ उठ खड़ा होता है। वैसे ही भारत की भरपूर आबादी के बीच यह प्रवृत्ति एक राक्षस की तरह बढ़ती जा रही है। ऐसी स्थिति में ‘बारुद के ढेर पर’ खड़े होने का एहसास होता है। भारत के प्रसिद्ध वकील ऍड. उज्ज्वल निकम जी ने इसीलिए तो कहा कि ‘अब यहां से आगे मैं जातिगत रंगों वाले मुकदमों की पैरवी नहीं करूंगा। मेरी कोशिश रही है कि सच्चाई की जीत हो, अपराधी को सजा हो लेकिन देखा है कि पराजित पक्ष हमेशा अपने अपराधों को नजरंदाज कर मुझे ही जातिवादी या जातिविरोधी साबित कर रहा है...।’ एक प्रसिद्ध सरकारी वकील का इस कदर अभिव्यक्त होना सामाजिक बिखराव और बिगड़ाव को बता देता है। सच्चे मायने में आज समाज में स्वार्थ, हिंसा, आक्रोश, दुश्मनी, अशांति, भयावहता, अपराध... भरा पड़ा है। कुछ दिनों की शांति के बाद छोटी सी घटना बड़ी दुघर्टना का कारण बनती है, तो इसका एहसास बार-बार होता है कि हम लोग ‘बारुद के ढेर पर खड़े हैं।’

यह भी देख रहे हैं कि अनपढ़ लोगों की अपेक्षा पढ़े हुए और शिक्षित लोगों में बहुत अधिक मात्रा में जातिगत और धार्मिक कट्टरता भरी है। पढ़-लिखकर और शिक्षित बनकर समाज हित का कार्य करने के बजाय लोग जातिगत और धार्मिक कट्टरता तराशे जा रहे हैं और अन्य लोगों को भी अपने विध्वंसक विचारों से प्रेरित कर रहे हैं। हाथों में अलग-अलग प्रकार के झंड़े लेकर हुजूम जिस कदर रास्तों पर उतर कर ताड़व करता है उसे देखकर घिन्न आती है कि हम लोग ऐसे समाज का हिस्सा है? हमारी पसलियों में और शरीर में ऐसे ही समाज का खुन बह रहा है? सोचकर अफसोस और हैरानी होने लगती है। जिस दिन किसी अनौरस संतान को उसके अनौरस होने का पता चलता है तब उसे अपने शरीर से जैसे घिन पैदा होती है वैसे ही आज जातिगत और धार्मिक विध्वंसों के बाद हो रही है। लगता है पूरा समाज सड़ चुका है और इस सड़े समाज की अनौरस संतानों के नाते हमारी पैदाइशें हो रही है। उसी सड़ांधता में हम भी गंदगी फैला रहे हैं, गटरों से बहते पानी में खूनी होली मना रहे हैं। आस-पास चारों तरफ गंदगी ही गंदगी है, अतः और गंदा होने में ही हमें मजा आ रहा है। ऍड. उज्ज्वल निकम जी का कई सालों की सेवा के बाद इस तरह अभिव्यक्त होना भी यहीं बता देता है कि समाज सुधरने की अपेक्षा पतन की ओर जा रहा है। जिस कदर समाज में विषवैलियां फैलती जा रही है उसे देखकर लगता है कि हम लोग ‘बारुद के ढेर’ पर खड़े हैं।

भारतीय भाषा के लेखक और कवियों का जातिगत और धार्मिक व्यवस्था के विरोध में कड़वापन हमेशा देखा जाता है। इसके विरोध में इन्होंने हमेशा आवाज उठाई है। जैसे समाज सुधारकों का प्रयास वैसे ही इनका भी प्रयास रहा है। लेकिन समाज में समय-दर-समय जो घटनाएं घटित होती है उससे कभी ऐसे नहीं लगता कि जातिगत और धार्मिक लकीरें फीकी होंगी वह दिनों-दिन गाढ़ी और गहरी होती जा रही है। उसमें कट्टरता अधिक गहराती जा रही है। ओमप्रकाश वाल्मीकि इस व्यवस्था से जल-भुनकर कठोरता के साथ कहते हैं –

"'जाति' आदिम सभ्यता का

नुकीला औज़ार है

जो सड़क चलते आदमी को

कर देता है छलनी

एक तुम हो

जो अभी तक इस 'मा*****' जाति से चिपके हो

न जाने किस हरामज़ादे ने

तुम्हारे गले में

डाल दिया है जाति का फंदा

जो न तुम्हें जीने देता है

न हमें!"

ऊपर ओमप्रकाश वाल्मीकि के लेखन और वाणी में कड़वाहट आ चुकी है। उसका कारण यह है कि बार-बार मिटाने का प्रयास करने के बावजूद भी जातिगत और धार्मिक कट्टरता का गाढ़ा होना। इस अनियंत्रित स्थितियों में अपने आपको भविष्य के भरोसे छोड़ना पड़ेगा और जो जिंदगी अपने हिस्से में लिखी है उसे जीना पड़ेगा। भारत जैसे विशालकाय, आबादी से भरपूर और विभिन्न जाति-धर्मों से भरे देश में, इन स्थितियों पर भविष्य में नियंत्रण पाना बहुत मुश्किल होगा! हां आज और भूतकाल में भी हम लोगों ने अपनी विशालता, अनेक जातीयता, अनेक धर्मीयता और विविधता की दोहाई देकर एकता की बात जरूर की है, गर्व भी किया है और अपनी पीठ भी ठोकी है; लेकिन धीरे-धीरे यह भी पता चल रहा है कि यह विविधता और अनेकता पतन, कट्टरता, कड़वाहट, विध्वंस... का सबब भी बन रही है।

डॉ. विजय शिंदे

देवगिरी महाविद्यालय, औरंगाबाद - 431005 (महाराष्ट्र).

ब्लॉग - साहित्य और समीक्षा डॉ. विजय शिंदे

फोन नं. 08275354589

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