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साहित्यकारों से आत्मीय संबंध (पत्रावली / संस्मरणिका) भाग - 11 // डॉ. महेन्द्र भटनागर

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. साहित्यकारों से आत्मीय संबंध (पत्रावली/संस्मरणिका) डॉ. महेंद्र भटनागर द्वि-भाषिक कवि / हिन्दी और अंग्रेज़ी        (परिचय के लिए भाग 1 में य...

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साहित्यकारों से आत्मीय संबंध

(पत्रावली/संस्मरणिका)

डॉ. महेंद्र भटनागर

द्वि-भाषिक कवि / हिन्दी और अंग्रेज़ी

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       (परिचय के लिए भाग 1 में यहाँ देखें)

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भाग 1 || भाग 2 || भाग 3 || भाग 4 || भाग 5 || भाग 6 || भाग 7 || भाग 8 || भाग 9 || भाग 10 ||


भाग 11


रूपनारायण पाण्डेय (‘माधुरी’ सम्पादक)

. ‘माधुरी’ कार्यालय नवल किशोर प्रेस

लखनऊ

दि. 23-3-1944

महोदय,

वन्दे। आपकी रचना मिली। अच्छी भी है। पर हमारे पास इतनी अधिक कविताएँ एकत्र हो चुकी हैं कि अब हम कोई नई कविता स्वीकृत नहीं करते। कारण, कई महीने तक उन्हें छापना असम्भव होगा। इसलिए आप अपनी रचना किसी और पत्र को भेज दें, यह ठीक होगा।

क्षमाप्रार्थी -

रूपनारायण पाण्डेय

                                 (जन्म : 1884 / मृत्यु : 1959)


इन दिनों, ‘विक्टोरिया कॉलेज’, ग्वालियर में बी.ए. भाग प्रथम का छात्र था। रूपनारायण पाण्डेय जी अपने समय के प्रसिद्ध साहित्यकार थे। इधर, मेरे साहित्यिक जीवन का प्रारम्भ था (17-18 वर्ष का था)। ‘माधुरी’ में कविता जिस कारणवश प्रकाशित नहीं हो सकी; उपरिलिखित पत्र से स्पष्ट है। बाद में ‘महेंद्र’ नाम से, छात्र-जीवन में लिखा एक लेख - ‘उपन्यास कला’ ‘माधुरी’ में छपा था। कुछ नया न होने के कारण; इस लेख को सुरक्षित नहीं रखा। कक्षा-भाषणों में प्राध्यापक से जो सुना; उसे अपने ढंग से आकार दिया था। इस लेख को ‘माधुरी’ की फ़ाइल में देखा जा सकता है। तत्कालीन पत्र-सम्पादक नये लेखकों पर कितना ध्यान देते थे; यह रूपनारायण जी के व्यवहार से प्रकट होता है। ऐसे पत्रकार और साहित्यकार अब विरल हैं।

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डा. लक्ष्मीनारायण लाल

. दि. 12 अप्रैल 1965

प्रियवर डा. महेन्द्र भटनागर जी,

प्रणाम। मार्च के ‘जागृति’ अंक में ‘दर्पन’ पर आपकी समीक्षा देखी। आपकी पैठ और अभिव्यक्ति दोनों मुझे बहुत अच्छी लगीं। मेरे नाटकों का एक स्थान पर (एक लेख में) कोई मूल्यांकन अब तक मेरे देखने में नहीं आया है। अंग्रेज़ी में तो अनेक हुए हैं। क्या ही अच्छा हो यदि आप यह महत कार्य ‘जागृति’ के माध्यम से या अन्यत्र कर सकें।

सस्नेह आपका,

लक्ष्मीनारायण लाल

. दि. 22 फ़रवरी 1977

प्रियवर,

क्यों नहीं-आप मुझे याद हैं। ‘यक्ष प्रश्न’ का प्रतीक अस्पष्ट है तो स्पष्ट सुनें-

- यक्ष-वर्तमान समय है। चारों पाण्डव युवा पीढ़ी हैं; जो समय के प्रश्नों के उत्तर दिए बिना भोग (जल) चाहते हैं। तभी मरते हैं।

- युवा पीढ़ी केवल प्यास बुझाना चाहती है। प्रश्नों के उत्तर की ज़िम्मेदारी बुड्ढों पर (युधिष्ठिर, जयप्रकाश नारायण, मोरारजी) डाल दी है।

- युधिष्ठिर ने सहदेव को जीवित करने का वर माँगा है-कारण, सहदेव सबसे छोटा है। नीचे है। पहले जीवन यहीं से शुरू हो; तभी ऊपर के लोग जीवित होंगे।

- ‘सहदेव’ में ‘स’ है-सात स्वरों का पहला ‘स’। यहीं ‘गा’ पड़ेगा तो स्वर लग जाएगा।

- सारा दर्शक समाज प्यासा है-सबको जल चाहिए, पर प्रश्न तो वर्तमान का उससे भी बड़ा है-प्रथम है।

यदि अब भी स्पष्ट न हुआ हो तो मेरा मौन स्वीकारें!

.                                    आपका : लक्ष्मीनारायण लाल

मेमेरे अभिन्न डा. वासुदेवनन्दन प्रसाद

ओह! समादरणीय अग्रज बंधु डा. वासुदेवनन्दन प्रसाद जी अब इस लोक में नहीं रहे - यह दुखद समाचार मुझे हतप्रभ कर गया। हृदय को कुछ ऐसा ही मर्मान्तक आघात लगा था - पूज्य पिताश्री (17 जुलाई 1959) और पूजनीया माताश्री (14 जुलाई 1977) के निधन पर! वासुदेव बाबू बहुत जल्दी चले गये। उनके (2 मार्च 1925) और मेरे (26 जून 1926) जन्म में लगभग सवा साल का ही अन्तर है। 8 जून 1994 को वे नहीं रहे। वासुदेव बाबू को अपने न रहने का पूर्वाभास हो गया था। यह बात उनके जीवन-काल में समझ में नहीं आयी। नव-वर्ष (सन् 1994) के कुछ दिन बाद उन्होंने अपने पत्र में न जाने क्यों लिखा कि मुझे आज अपने आत्मीय जनों की बहुत याद आ रही है। खेद है, उनका यह पत्र बहुत खोजने पर भी नहीं मिला। स्पष्ट है, ऐसा उन्होंने अपने अनेक आत्मीयों को लिखा होगा। उनके इस वाक्य पर, तब ध्यान तो गया था; किन्तु तब इस उद्गार को पारस्परिक निकटता व अपनेपन की भावना-मात्र समझ कर ग्रहण किया। किन्तु आज मेरे लिए यह कथन कितना अर्थगर्भी है, यह अपने हृदय व मस्तिष्क की सम्पूर्ण चेतना से अनुभव कर रहा हूँ। इसे स्मरण कर एक अद्भुत रहस्यपूर्ण अनुभूति बार-बार होती है।

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वासुदेव बाबू से कब और किस प्रसंग से परिचित हुआ; याद नहीं आता। सर्वप्रथम उन्होंने मेरे कविता-संग्रह ‘बदलता युग’ पर एक स्वतंत्र लेख ‘वीणा’ (सितम्बर 1953) में लिखा। ‘भारती भवन’ (पटना) से प्रकाशित ‘यशोधरा : एक समीक्षा’ (द्वितीय संस्करण) की प्रति मेरे पास सुरक्षित है। यह कृति उन्होंने मुझे दिनांक 20 सितम्बर 1954 को भेंट की है। संचय करने की प्रवृत्ति न होने के कारण; उनके भी अधिकांश पत्र मेरे पास हैं नहीं। उनकी एक कृति ‘विचार और निष्कर्ष’ (भारती साहित्य मंदिर, दिल्ली से प्रकाशित) मेरे पास है; जो दिनांक 11 जुलाई 1956 को मुझे मिली थी। इस कृति के आठवें खण्ड में, ‘नवोदत हिन्दी-कलाकार’ के अन्तर्गत एक चार पृष्ठीय आलेख ‘कवि महेन्द्र भटनागर’ शीर्षक से समाविष्ट है। सम्भवतः इसी कारण प्रकाशक ने यह कृति मुझे उपहार-स्वरूप भेजी। उनकी सर्वाधिक पठित कृति ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ सन् 1959 में प्रकाशित हुई।


यह कृति मात्र छात्रोपयोगी ही नहीं। हिन्दी भाषा की प्रकृति, शुद्धता व रचनागत सूक्ष्मताओं को जानने के लिए बड़े-से-बड़े साहित्यकार व अध्यापक के लिए उपयोगी व महत्त्वपूर्ण है। अपनी मातृभाषा के व्याकरण के प्रति हम प्रायः उदासीन रहते हैं। यही कारण है कि मातृभाषा के अनेक प्रयोगों का युक्तियुक्त कारण व समाधान हम प्रस्तुत नहीं कर पाते। अन्य भाषा-भाषी जब हमसे हमारी मातृभाषा के विभिन्न प्रयोगों के संबंध में प्रश्न करते हैं तो हम बड़े अज्ञानी प्रमाणित होते हैं। भाषा-ज्ञान और साहित्य-सृष्टि का हमारा सारा दर्प चूर-चूर हो जाता है। अतः शब्दकोश की तरह व्याकरण-रचना की भी उपादेयता निर्विवाद है। वासुदेव बाबू की इस विशिष्ट कृति ‘आधुनिक हिन्दी व्याकरण और रचना’ की संस्तुति ही मैंने अपने छात्रों के मध्य नहीं की; इसे स्नातक पाठ्यक्रमों में भी निर्धारित किया - जब-जब मैं ‘इंदौर विश्वविद्यालय’, ‘विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन’ और ‘जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर’ में हिन्दी-अध्ययन मंडलों का सदस्य व अध्यक्ष रहा। इस कृति के दशम संस्करण (सन् 1971) के, ‘काव्य-विवेचन’ अध्याय के अन्तर्गत ‘मुक्तछंद’ का विवेचन करते समय वासुदेव बाबू ने उदाहरण-स्वरूप मेरी एक कविता (‘जिजीविषा’ में संगृहीत - ‘जनता’, पृष्ठ 54) की कुछ पंक्तियाँ भी उद्धृत की हैं। वासुदेव बाबू मेरे काव्य-कर्तृत्व के प्रति सदैव सचेष्ट रहे। उन्होंने मुझे निरन्तर प्रोत्साहित किया। सन् 1965 में प्रकाशित, उनके द्वारा सम्पादित समीक्षा-पुस्तक ‘नई कविता’ (प्रकाशक - कल्याणमल एण्ड संस, जयपुर) में उन्होंने मेरे काव्य-कर्तृत्व पर दृष्टिक्षेप करने वाले अनेक आलोचनात्मक लेखों को सम्मिलित किया है।

वासुदेव बाबू ने मेरी कविता पर ‘विचार और निष्कर्ष’ में जो लिखा है; वह मात्र दो कविता-संग्रहों - ‘बदलता युग’ (1953) और ‘अभियान’ (1954) के आधार पर है। उन्होंने मेरी अन्य कृतियों पर भी समीक्षाएँ समय-समय पर कर मेरा उत्साह-वर्द्धन किया। ‘नई चेतना’ की समीक्षा ‘प्रतिभा’ (नागपुर) में छपी, ‘मधुरिमा’ की ‘योजना’ (नई दिल्ली) में। ‘जिजीविषा’ पर लिखित उनकी समीक्षा डा. विनयमोहन शर्मा-द्वारा सम्पादित समीक्षा-पुस्तक ‘महेन्द्र भटनागर का रचना-संसार’ में समाविष्ट है। इन समीक्षाओं का उल्लेख इसलिए कर रहा हूँ; क्योंकि इस प्रकार का बहुत-सा लेखन प्रायः अनदेखा रह जाता है - ‘रचनावली’ अथवा ‘ग्रंथावली’ अथवा ‘समग्र’ प्रकाशित हो जाने के बावज़ूद। पर, इस प्रकार का लेखन एक साहित्य-स्रष्टा के निर्माण और विकास में बड़ा सहायक होता है। डा. वासुदेवनन्दन प्रसाद जी का यह लेखन सही अर्थों में आचार्यत्व की महिमा से मंडित है। खेद है, आजकल यह परम्परा विलुप्त होती जा रही है। अधिकांश समीक्षाएँ कृति को भली-भाँति पढ़े बिना लापरवाही से लिख दी जाती हैं अथवा कभी-कभी तो उनका उद्देश्य रचनाकार के प्रति व्यक्तिगत पूर्वाग्रह व्यक्त करना होता है।


‘जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर’ में जब मैं ‘हिन्दी अध्ययन मंडल’ का अध्यक्ष एवं अन्य शैक्षणिक परिषदों का सदस्य बना (सन् 1978-83) तब मैंने डा. वासुदेवनन्दन प्रसाद जी को ‘हिन्दी शोध उपाधि समिति’ में विशेषज्ञ-सदस्य के रूप में मनोनीत किये जाने की कुलपति से अभिशंसा की। फलस्वरूप वे ‘जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर’ की ‘हिन्दी शोध उपाधि समिति’ के दो वर्ष विशेषज्ञ-सदस्य रहे। इस बहाने, वे कई बार ग्वालियर आये और उनसे प्रत्यक्ष मिलने तथा अपने निवास पर उनका आदर-सत्कार करने का सुअवसर मुझे मिला। उनके सौम्य-सरल व्यक्तित्व में अद्भुत आकर्षण था। दो-वर्ष, ‘जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर’ में ‘हिन्दी शोध उपाधि समिति’ में रह कर उन्होंने हिन्दी के शोध-स्तर को ऊँचा उठाने के भरसक प्रयत्न किये। औदार्य की उनमें कमी न थी; किन्तु अपने कार्य व दायित्व के प्रति उन्हें मैंने सदैव ईमानदार पाया। भले ही, मेरे निर्देशन में किसी शोधार्थी ने आवेदन किया हो; किन्तु शोधार्थी का साक्षात्कार लेते समय शीर्षक अथवा रूपरेखा में यथोचित परिवर्तन के सुझाव उन्होंने निःसंकोच दिये। अन्यों के साथ भी ऐसा हुआ। इससे कुछ घटिया व अयोग्य शोध-निर्देशकों की नाराज़गी, उनके प्रति तो नहीं, मेरे प्रति रही। क्योंकि मैं ‘हिन्दी-अध्ययन’ का अध्यक्ष होने के कारण ‘हिन्दी शोध उपाधि समिति’ का एक पदेन सदस्य था। मैं अपने साथ डा. गिरिराजशरण अग्रवाल-द्वारा सम्पादित ‘शोध-सदर्भ’ की प्रति ले जाता था और शोध-विषय की पुनरावृत्ति यथासम्भव नहीं होने देता था। यद्यपि अंतिम निर्णय तो विशेषज्ञ-सदस्य पर ही निर्भर करता था; किन्तु नाराज़ शोध-निर्देशकों ने किसी ग़लतफ़हमी के कारण मुझे ‘समिति’ पर सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण समझ लिया। इन शोध-निर्देशकों की ग़लतफ़हमी व नाराज़गी आज भी ढो रहा हूँ; झेल रहा हूँ!

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वासुदेव बाबू ने ‘मगध विश्वविद्यालय,गया’ से समय-समय पर मुझे अनेक शोध-प्रबन्ध परीक्षण-हेतु भिजवाए। अनेक बार स्नातकोत्तर परीक्षार्थियों का मुझे प्राश्निक-परीक्षक बनाया। लम्बी यात्राएँ मुझे कष्टप्रद प्रतीत होती हैं। कारण - भौतिक इतना नहीं; जितना मनोवैज्ञानिक है। अतः शोधार्थियों की मौखिक परीक्षा लेने मैं बहुत कम, लम्बी यात्राओं पर जाता हूँ - वायुयान-यात्रा स्वीकृति के बावज़ूद। एक बार मेरे पास परीक्षण-हेतु जो शोध-प्रबन्ध आया उसके शोध-निर्देशक स्वयं डा. वासुदेवनन्दन प्रसाद जी थे। दूसरे परीक्षक चूँकि पैरों से विकलांग थे; अतः मौखिकी मुझे ही लेनी थी। किन्तु आदत से लाचार मैं गया नहीं गया। बाद में, ‘मगध विश्वविद्यालय’ के कुलपति की अनुमति से शोध-छात्रा, उसके आई.ए.एस. पति और वासुदेव बाबू स्वयं ग्वालियर आये और मेरे निवास पर मौखिकी सम्पन्न हुई। मैंने वासुदेव बाबू को यात्रा-कष्ट दिया; इसका दुःख तब भी हुआ; आज भी है।


सेवानिवृत्ति-बाद, सन् 1985 में मेरे ज्येष्ठ पुत्र का विवाह, मुंगेर की कन्या से सम्पन्न हुआ था; जो सफल नहीं रहा। पाँच-छह माह बाद ही, विच्छेद की नौबत आ गयी और एक वर्ष बाद पारस्परिक सहमति से मुंगेर- कोर्ट से विधिवत् विच्छेद-आदेश हो गये - एकपक्षीय; क्योंकि हम मुंगेर-कोर्ट में एक बार भी उपस्थित नहीं हुए। तदुपरान्त, कन्या-पक्ष वालों ने, हमें कष्ट पहुँचाने की नीयत से, मुंगेर-कोर्ट में ही, मेरे बेटे पर तीन और मुझ पर दो मुक़दमे थोप दिये। मजबूरन, ज़मानत करवाने और आवश्यकतानुसार समय-समय पर कोर्ट में उपस्थित होने हमें कई बार मुंगेर जाना पड़ा। संकट के इस काल में, मुझे वासुदेव बाबू की पूरी मदद मिली। उन्होंने पटना-स्थित अपने निकट के रिश्तेदार से हमें मिलवाया। जिनके कारण हमारी दिक़्क़तें कम हुईं। उनका आग्रह रहा कि मैं गया होता हुआ उनके साथ मुंगेर जाऊँ। आपाधापी और स्वार्थ-लिप्त वर्तमान युग में इतनी सहृदयता और आत्मीयता दुलर्भ है। अपने दि. 21-3-91 के पत्र में उन्होंने लिखा :

प्रिय बंधुवर,

आपका 4/3 का पत्र 7/3 को मिला था। अस्वस्थ रहने के कारण आपको समय पर उत्तर नहीं दे सका। वृद्धावस्था में रोगों का हमला होता ही रहता है; यह अत्यन्त स्वाभाविक है। फिर इस तनावपूर्ण जीवन में ऐसा होना भी स्वाभाविक है। गांधी की अहिंसा, नेहरू की नैतिकता, सुभाष का त्याग और जयप्रकाश की निश्छलता अब कहीं देखने को नहीं मिलती। सभी पार्टियों में स्वार्थ का बोलबाला है। सभी अवसरवादिता से ग्रस्त हैं। 42-43 वर्षों की आज़ादी में हमारी यही उपलब्धि है। इन दिनों रात बीत जाती है तो हम समझते हैं कि सबेरा हो गया - सर्वत्र अशान्ति, त्रास और आशंका। साहित्य में आज उसी की छाया दीखती है।

आप मेरे लिए चिन्ता न करें। पद और पैसा मेरे लिए कोई महत्त्व नहीं रखते। आये तो स्वागत है; न आये तो कोई अवसाद नहीं। मैं आपकी व्यक्तिगत परेशानी के सारे विवरणों से अवगत नहीं। आरम्भ और अंत की कथा से परिचित नहीं। अगली बार बिहार की यात्रा पर आप जब निकलें तो यहाँ आने का कष्ट ज़रूर करें। आपकी कष्ट-कथा सुन कर उसका हल ढूँढ़ने का प्रयास कर सकूँ तो मुझे प्रसन्नता होगी। आप जैसे सरल व्यक्ति से किसी का कुछ अहित हो सकता है; समझ नहीं पाता।

आपका :

वासुदेवनन्दन प्रसाद

और फिर, दिनांक 13-7-91 के पत्र में पूछा :


प्रिय भाई,

बहुत दिनों से आपका कुशल समाचार नहीं मिला। आशा है, आप सपरिवार स्वस्थ और प्रसन्न हैं। मैं आपके लंबित मामले के सुखद अंत की सूचना पाने के लिए चिन्तित और उत्सुक हूँ। ईश्वर करे, आपकी उलझन और परेशानी शीघ्रातिशीघ्र दूर हो। सेवानिवृत्ति के बाद शांति और निश्चिन्तता बहुत ज़रूरी है। लेकिन ऐसा लगता है कि निष्छल और सज्जन व्यक्तियों को आज निरन्तर संघर्ष से जूझना पड़ता है। फिर, चिन्ता करने से क्या होता है। पत्रोत्तर की प्रतीक्षा है। आपसे मिलने की बड़ी इच्छा है। देखें, यह संयोग कब होता है।

आपका :

वासुदेवनन्दन प्रसाद

इतना अपनापन सहोदर भाइयों तक से नहीं मिल पाता। वासुदेव बाबू की याद आते ही आँखें नम हो उठती हैं। वे सही अर्थों में सज्जन व्यक्ति थे। अपने से बड़ों की ही नहीं; किसी की भी उन्होंने कभी निन्दा नहीं की। उन-समान सहृदय-सुहृत का प्रेम और सद्भाव पाकर अपने को गौरवान्वित अनुभव करता हूँ।

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विजयदेव नारायण साही

. इलाहाबाद

दि. 11-12-64

प्रियवर,

आपके द्वारा प्रेषित ‘संतरण’ कविता-संग्रह और बाद में आपका पत्र दोनों ही प्राप्त हुए।

आप जैसे सिद्धहस्त और पुराने कवि को सम्मति मैं क्या लिखूँ? आपने कृपापूर्वक संग्रह भेजा; इसके लिए आभार प्रदर्शित करना अपना कर्तव्य अवश्य समझता हूँ।

मैंने कविताएँ उलट-पुलट कर देखीं। वे अवश्य ही आपकी मूल्यवान मनःस्थितियों का प्रतिनिधित्व करती हैं। कविताओं का गहरा रसास्वादन करने के लिए जो कालान्तर अपेक्षित है वह मिलने पर मैं अवश्य ही आपकी मनःस्थितियों से तादात्म्य स्थापित कर सकूंगा; ऐसा मुझे विश्वास है -

विशेषतः इसलिए भी कि आपकी अनुभूतियों का फैलाव हताशा से उत्साह तक और एशिया से कोठरी के अँधेरे तक है, जो आपके अनुभवी हृदय का परिचायक है।

एक बार फिर स्मरण की कृपा के लए मेरा आभार स्वीकार करें।

विनीत,

विजयदेव नारायण साही

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मेरे आत्मीय डा. विद्यानिवास मिश्र

स्मरण नहीं, डा. विद्यानिवास मिश्र जी से कब और किस संदर्भ में परिचय हुआ। उनकी विद्वत्ता और रचनात्मक प्रतिभा से प्रारम्भ से ही प्रभावित रहा। हिन्दी ‘ललित निबन्ध’ के विकास और समृद्धि में उनका योगदान विशिष्ट है; आचार्य हज़ारीप्रसाद द्विवेदी जी की तरह। उनका व्यक्तित्व और वाक्-कौशल भी सबको आकर्षित करता है।

उनका जो प्रथम पत्र मेरे पास सुरक्षित है, गोरखपुर से लिखा 24 नवम्बर 1964 का है। इन दिनों, मैं ‘शासकीय महाविद्यालय,महू (इंदौर)’ में हिन्दी-विभागाध्यक्ष था। मेरा दसवाँ कविता-संग्रह ‘संतरण’ सन् 1963 में प्रकाशित हुआ। यह काव्य-कृति मैंने डा. विद्यानिवास मिश्र जी को भी भेजी। विशुद्ध प्रेम-गीतों का एक संग्रह ‘मधुरिमा’ सन् 1959 में प्रकाशित हो चुका था; यद्यपि 80 रचनाओं की कृति ‘संतरण’ में भी 32 गेय गीत संगृहीत हैं। डा. विद्यानिवास मिश्र मेरी गीति-सृष्टि से सम्भवतः तब परिचित थे। उनके प्रायः सभी पत्र संक्षिप्त हैं। ‘संतरण’ के संदर्भ में लिखा उनका प्रस्तुत संक्षिप्त पत्र कोई कम प्रेरक नहीं :

. गोरखपुर / दि. 24-11-64

प्रियवर,

आभारी हूँ कि आपने इतने सम्मान के साथ अपनी नयी पुस्तक ‘संतरण’ भेजते समय मुझे स्मरण किया। समीक्षक तो क्या पाठक हूँ। वह भी सामान्य। गीतों से इस ओर मुड़ कर आपकी प्रतिभा और प्रस्फुटित हुई है। आपकी कविता में लयबद्धता प्रशंसनीय है।

अच्छी तरह पढ़ कर कभी फिर लिखूंगा।

सस्नेह, विद्यानिवास

यह एक आकस्मिक संयोग था कि धार में मेरा परिचय श्री अमीर मोहम्मद खाँ साहब से हुआ। ‘आनन्द महाविद्यालय, धार’ में हिन्दी-विभागाध्यक्ष 29 जुलाई 1950 से 27 सितम्बर 1955 तक रहा। श्री अमीर मोहम्मद खाँ, सम्भवतः 1953-54 में


इसी महाविद्यालय में ग्रंथपाल-पद पर नियुक्त हुए। यहाँ आने के पूर्व, वे बम्बई में, किसी अंग्रेज़ी-पत्र के कॉलम-राइटर थे। धार छोटी जगह थी। बड़ी सुगमता से वे मुझसे और मेरे कर्तृत्व से परिचित हो गये। मेरी काव्य-रचना से वे बड़े प्रभावित हुए और उन्होंने ही, सर्वप्रथम, मेरी तमाम कविताओं के अंग्रेज़ी में अनुवाद किये। उन्हीं दिनों, ‘नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी’ से ‘हिन्दी रिव्यू’ का प्रकाशन शुरू हुआ। सम्पादक डा. राम अवध द्विवेदी थे। डा. द्विवेदी जी ने मेरी अनेक कविताओं के अंग्रेज़ी-अनुवाद ‘हिन्दी रिव्यू’ में क्रमशः प्रकाशित किये। देश के अंग्रेज़ी-साहित्यालोक से ‘हिन्दी रिव्यू’ के माध्यम से परिचित हो गया और देश में प्रकाशित होनेवाली अन्य अंग्रेज़ी-पत्रिकाओं में भी मेरी कविताओं के अंग्रेज़ी-अनुवाद प्रकाशित होने लगे। यथा The Literary Half-Yearly’ (Mysore), ‘Macron’ (Hubly), ‘The Contemporary Indian Literature’ (New Delhi), ‘dhara’ (New Delhi) आदि।

धार से, ‘शासकीय माधव महाविद्यालय, उज्जैन’ स्थानान्तरित होकर,

28 सितम्बर 1955 को आ गया। यहाँ 15 जुलाई 1960 तक रहा। ‘विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन’ में जब अंग्रेज़ी की अपनी अध्ययन-शाला खुली तब उसमें श्री लक्ष्मीशंकर शर्मा की प्राध्यापक-पद पर नियुक्ति हुई। हिन्दी की अपनी स्वतंत्र अध्ययन-शाला तब नहीं थी। हिन्दी से संबंधित समस्त कार्य मुझे ही देखने पड़ते थे; क्योंकि उन दिनों ‘शासकीय माधव महाविद्यालय’, सरकार ने, ‘विक्रम विश्वविद्यालय’ को सौंप दिया था। श्री लक्ष्मीशंकर शर्मा से परिचित हो जाने के बाद, यह असम्भव था, उन्हें मेरी कविताओं के अंग्रेज़ी-अनुवादों की जानकारी न हो पाती। चूँकि काफ़ी कविताओं के अंग्रेज़ी-अनुवाद पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके थे; अतः श्री लक्ष्मीशंकर शर्मा ने उन्हें पुस्तक का आकार देना चाहा। स्वयं भी कुछ कविताओं के अनुवाद किये। अंग्रेज़ी-पत्रिकाओं में मेरे काव्य-कर्तृत्व के संबंध में उनके लेख भी प्रकाशित हुए। इस प्रकार, श्री लक्ष्मीशंकर शर्मा के सम्पादन में Forty Poems of Mahendra Bhatnagar’ ने आकार लिया। उज्जैन से स्थानान्तरण हो जाने के बाद, दतिया-इंदौर- ग्वालियर के महाविद्यालयों में पदस्थ रहा। 24 जुलाई 1964 को ‘इंदौर विश्वविद्यालय’ से सम्बद्ध ‘शासकीय महाविद्यालय, महू’ में हिन्दी-विभागाध्यक्ष बना। महू रह कर Forty Poems’ के प्रकाशन-प्रयत्न किये। न जाने किस आन्तरिक प्रेरणावश, इच्छा हुई किथ्वतजल च्वमउ़े का आमुख डा. विद्यानिवास मिश्र जी से लिखवाया जाये। विद्यानिवास जी की स्वीकृति मिलते ही; पाण्डुलिपि उन्हें भेज दी। लगभग एक वर्ष तक पाण्डुलिपि उनके पास पड़ी रही। अंत में, 31 मई 1967 को डा. विद्यानिवास मिश्र जी ने आमुख लिख कर भेज दिया; पाण्डुलिपि लौटा दी। उनका 1 जून 1967 का पत्र, प्रथम पत्र के समान ही, उत्साह-वर्द्धक और प्रेरक है :

. सूरत सदन, अलहदादपुर

गोरखपुर

दि. 1-6-67

प्रियवर,

संकलन और भूमिका संलग्न है। मैं अंग्रेज़ी-अनुवाद अपने कवि-मित्र लिनार्ड नेथन को, जो इस समय भारतवर्ष में ही हैं, दिखलाना चाहता था। पर, पुनः सोचा, इस चक्कर में देर न हो जाय और मुझे जुलाई के अंत या अगस्त के प्रारम्भ में विदेश कुछ अरसे के लिए जाना है, इसलिए आपके पास भेज रहा हूँ।

अधिकारी तो नहीं हूँ, पर लगा कि अनुवाद में मूल का भाव तो सुरक्षित है, पर लय का निर्वाह नहीं हो पाया है।

आपके दोनों कविता-संग्रह भी मिले थे, पर मैं उन्हें पूरा पढ़ नहीं पाया। कविता एक साँस या एक बैठक में पढ़ने की चीज़ भी नहीं है। जितना पढ़ा, उतना भावग्राही लगा।

सस्नेह, विद्यानिवास

पत्र अपनी जगह है; ‘आमुख’ में डा. विद्यानिवास मिश्र जी ने मेरी काव्य-सृष्टि के संबंध में जो लिखा है, वह निःसंदेह साधारण नहीं है। उनके ‘आमुख’ का प्रारूप इस प्रकार है :

I have gone through this anthology of Dr. Mahendra Bhatnagar’s seleted forty poems. The thing which strikes foremost is the note of blazing optimism coming out of these poems, be they songs of love, songs of future of man or songs of the advent of a new era ushered in by the common man all over the world. Though unfortunately I cannot share this optimism, I am deeply moved by the vigour with which it has been projected by the poet. Mahendra Bhatnagar is Browning, Shelley and Maykovsky welded into one, he is a visionary, he is a comrade-in-arms and he is an architect. His ‘Man fired with faith divine moves on’ because he is firm in his conviction that ‘one day the heart-rose shall bloom in the midst of impediments galore.’ He seeks strength from ‘the firmament’ which ‘has changed its colour’ and from the wind’ which is always ‘humming a tune’, from the ‘gracious mother earth’ wich is blessing man with a life - ‘long and happy’.

He sings of youth in a new vein, youth for him is not a passing phase, it is something ‘which endures’. To him woman no more bears ‘frailty’ as her other name, she is no longer ‘a source of pleasure and pastime’. In this emancipated woman he has found a companion. He is


‘never alone’, ‘the resurgent age is with him’, the future is driving him on. These are a few pieces which reflect the inner struggle between this optimism and disillusionment, but they are subdued by the dominating voice of hope.Such a sincere optimism is a rare quality and deserves full applause; more so, when we have the perspective of a sad and sick man of today.

I have a feeling that the vigorous rhythm of the original has not been carried fully to the English translations,may be, the barriers of language do not permit its export. The poet has a very sensitive ear for cadences and knows how to use them. His diction is chaste though racy, transperant and yet colourful, his imgery drawn partly from common-place of life and partly from poetic conventions, is simple and effective, it is not pretentious, as the so called modern imagery is and is the most suited instrument for the content.

I envy the impetuosity of Mahendra Bhatnagar and at the same time I admire his patience(‘the wall won’t collapse’) and his courage. If at times he is carried away by his creed, it only shows his zeal and not his weakness. If at times, he looks utterly lost in 'the masses idea', it only shows his devotion to the cause and not his lack of personality. If at times he turns a romantic visionary, it is an indicator of his fiery youth and not of his blindness to reality.

I sincerely hope, these poems along with their English renderings will be received well.


‘Forty Poems’ का अति-भव्य प्रकाशन 1968 में ‘एस. चंद एण्ड कं.’ नई दिल्ली से हुआ। अनेक मित्रों ने कृति की सराहना की। यह कृति अ-हिन्दी प्रदेशों में ख़ूब लोकप्रिय हुई। परिणामस्वरूप तमिष़, कन्नड़, मलयालम, तेलुगु, मराठी, गुजराती, ओड़िया आदि भाषाओं में भी मेरी कविताओं के काव्यानुवाद प्रकाशित होने शुरू हो गये।

‘Forty Poems’ के सम्पादक श्री. लक्ष्मीशंकर शर्मा जी ने आमुख का पहला अनुच्छेद, शायद अनावश्यक समझ कर, प्रकाशनार्थ नहीं भेजा। यह अनुच्छेद इस प्रकार है :

I must confess my guilt I have been sitting over this collection of Forty Poems by Mahendra Bhatnagar for about a year, the task assigned to me was to write a foreword. These poems are English translations from the Hindi original, translators are identifiable only through their initials



A.M.K.(Amir Mohammad Khan) and L.S.S.(Lakshmi Shankar Sharma); obviously they are close friends of the poet and are in tune with his creative genius, his idiom and his imagery. I do not find myself competent to judge the quality of the translations, for the only experience which I have had in the field, is the experience of para phrasing Hindi and Sanskrit poetry for some American poets, who in turn recreated poems out of these para phrases. I on my part can not escape from the fact that I am an alien to the English language and can not vouch for command over it, particularly over the language of poetry. I shall therefore confine myself to the contents of these poems.

‘Forty Poems’ की समीक्षाएँ अंग्रेज़ी और हिन्दी की अनेक पत्र-पत्रिकाओं में छपीं। काफ़ी विलम्ब से विचार आया कि कृति इंग्लैण्ड के प्रकाशकों को और वहाँ की साहित्यिक पत्रिकाओं में समीक्षार्थ भी भेजी जाये। इस संदर्भ में, डा. विद्यानिवास मिश्र जी से पूछा भी। उनका 14 मार्च 1973 का पत्र :

. अध्यापक निवास

संस्कृत विश्वविद्यालय

वाराणसी

दि. 14-3-73

प्रियवर,

आपका 27/1 का पत्र मुझे काफ़ी विलम्ब से मिला। इंग्लैण्ड के अंग्रेज़ी प्रकाशकों से मेरा सम्पर्क नहीं है। श्थ्वतजल च्वमउेश् लिए पते मैं ढूँढ कर आपको लिखूंगा कि कहाँ भेजें, यद्यपि रिव्यू आदि के लिए विलम्ब बहुत हो गया है।

आप कविता के क्षेत्र में निरन्तर आगे बढ़ रहे हैं, मुझे बड़ी प्रसन्नता है।

सस्नेह, विद्यानिवास

परिचय और परिचित सूत्रों के अभाव में Forty Poems’(और बाद में; After The Forty Poems’) विदेशों में न भेज सका। डा. विद्यानिवास जी की व्यस्तता का अनुमान सदा रहा। इस कारण, यह सोच-समझ कर ही, उनसे और-और अनुरोध करना उपयुक्त न समझा। यात्रा-भीरु होने के कारण उनसे मिलने भी न जा सका। हाँ, पत्राचार बना रहा। कभी इस कारण से; कभी उस।

1 जुलाई 1978 से ‘कमलाराजा कन्या महाविद्यालय, ग्वालियर’ में हिन्दी स्नातकोत्तर अध्ययन एवं शोध-विभाग का अध्यक्ष रहा। ‘जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर’ में तीन-वर्ष ‘हिन्दी अध्ययन मंडल’ का चेयरमैन रहा। अनेक प्रकाशकों ने पाठ्य-पुस्तकों के सम्पादन-हेतु मुझसे सम्पर्क किया। निबन्ध-संकलन और छायावादोत्तर काव्य-संकलन के संदर्भ में डा. विद्यानिवास मिश्र जी से राय लेना और पत्राचार करना मेरे लिए आवश्यक था। विद्यानिवास जी ने मेरे इन पत्रों के सकारात्मक उत्तर तत्काल दिये। यथा-

. आगरा

दि. 6-10-79

प्रियवर,

मैं 8 अक्टूबर को झेलम एक्सप्रेस से ग्वालियर पहुँच रहा हूँ। आप पाठ्य क्रम के लिए नये निबन्धों में से कोई ले लें - चाहे ‘राधा माधव हो गयी’ चाहे ‘कौन तू फुलवा बीननि हारी’ चाहे ‘गंगा की बिन्दु-बिन्दु में गोविन्द’, पुराने निबन्धों में से लेना चाहे तो ‘मधुबन जाऊंगा’ या ‘तुम चन्दन हम पानी’ या ‘हल्दी.’ वाला ही।

ग्वालियर भेंट होने पर बात हो जायेगी।

सस्नेह, विद्यानिवास

. आगरा

दि. 5-2-81

प्रियवर,

24/1 का पत्र विलम्ब से मिला।

‘अभिरुचि’ इस महीने निकल जायेगी।

आपके संकलन की भूमिका तो लिख दूंगा, और कविताओं के बारे में सुझाव भी दे दूंगा, पर यही चाहूंगा आप सम्पादक रहें। मैं पाठ्य-पुस्तक का सम्पादक नहीं होना चाहता। आप आशा है इतने से संतुष्ट हो जाएंगे और मुझे पाठ्य-पुस्तक के आर्थिक लाभ से दूर रख कर अनुगृहीत करेंगे। आप कहें तो कविताओं के सुझाव भेज दूँ।

सस्नेह, विद्यानिवास

. आगरा

दि. 19-2-81

प्रियवर,

17/2 का पत्र मिला। आपका आग्रह स्वीकार करता हूँ, पर यह अत्यन्त स्पष्ट रहेगा कि मैं जितना लिखूंगा, उसी के अनुपात में रायल्टी लूंगा। वह चाहे सवा प्रतिशत हो या ढाई प्रतिशत हो, इससे अधिक नहीं, कवियों के मानदेय में कमी नहीं होनी चाहिए, उनका शोषण मेरे व्याज से न हो।

‘अभिरुचि’ छपितप्राय है, छपने पर मिलेगी ही। आपकी आगरे में प्रतीक्षा रही।

सस्नेह, विद्यानिवास

. आगरा

दि. 12-3-81

प्रियवर,

7-3-81 का पत्र मिला। आपने जो नाम सुझाये हैं उनमें दो-एक और नाम जोड़ना चाहूंगा। शमशेर, लीलाधर जगूड़ी, कुँवर नारायण और केशरी कुमार। कवि और सम्पादक के बीच में बराबरी की बात ठीक है और यदि कवियों को मानदेय मात्र देना हो तो आपने जैसा प्रस्ताव किया वैसा ठीक है। आप आगरे आयेंगे तो विस्तार से बात हो जायेगी। संकलन का नाम सीधा-सादा रखें-‘अपने समय की कविता’।

सस्नेह, आपका : विद्यानिवास

. आगरा

दि. 12-11-82

प्रिय महेंद्र भटनागर जी,

आपका पत्र मिला। ‘़शोध उपाधि समिति’ की बैठक आप 30/11 को रख लें, अथवा फिर दिसम्बर के अंत में। ‘अपने समय की कविता’ का अनुबंध-पत्र हस्ताक्षर करके भेज दिया। नेशनल वालों ने उसके बाद कोई रुचि नहीं ली, मेरा स्वाभिमान यह कहता नहीं कि मैं बात करूँ।

उन्हें गरज़ हो तो बात करें। सो, उलझन मेरी ओर से कुछ नहीं है। उनकी रुचि नहीं है, बात समाप्त।

सस्नेह, विद्यानिवास

खेद है, ‘नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली’ वालों ने फिर, ‘संकलन’ में रुचि ली नहीं। उनका अपना एक अन्य छायावादोत्तर कविता-संकलन पहले से प्रकाशित था ज़रूर। डा. विद्यानिवास जी हमारे यहाँ ‘जीवाजी विश्वविद्यालय’ की ‘हिन्दीशोध उपाधि समिति’ के बाह्य विशेषज्ञ सदस्य थे, अतः उनका ग्वालियर आना होता रहता था।

‘मध्य-प्रदेश साहित्य परिषद्, भोपाल’ एवं ‘जीवाजी विश्वविद्यालय’ के संयुक्त तत्वावधान में, ग्वालियर में, मात्र जीवाजी विश्वविद्यालय-क्षेत्र में स्थित महाविद्यालयों के छात्र-रचनाकारों के लिए ‘युवा लेखक शिविर’ (दि. 16 और 17 मार्च 1980 को) आयोजित किया गया। इसका संयोजन-दायित्व मुझे सौंपा गया। इस ‘शिविर’ में भाग लेने और छात्र-रचनाकारों का मार्ग-दर्शन करने के लिए मैंने डा. विद्यानिवास मिश्र जी की उपस्थिति को महत्त्वपूर्ण समझा। उन्हें सादर आमंत्रित किया। डा. विद्यानिवास जी ने अपनी सहमति तत्काल दी :

. आगरा

दि. 7-2-80

प्रियवर,

पत्र मिला। एक दिन के लिए आपके ‘शिविर’ में ज़रूर आ जाऊंगा। मेरे बारे में चर्चायें उठती ही रहती हैं। 'After The Forty Poems' के बारे में कुछ फ़ुरसत से लिखूंगा, अभी तो बिलकुल डूबा हुआ हूँ।

सस्नेह, विद्यानिवास

. आगरा

दि. 19-2-80

प्रिय डा. महेंद्र भटनागर जी,

18/2 का पत्र मिला। मैं 16-3-80 को तो अवश्य रहूंगा, पर 17-3-80 को ऐसे समय से चलना चाहूंगा कि मैं डेढ़ बजे तक यहाँ पहुँच जाऊँ। उस दिन एक आवश्यक बैठक यहाँ लगी हुई है। अपना वक्तव्य मैं 16-3-80 को देना चाहूंगा, उसी के लिए आलेख 4-5 मार्च तक भेज दूंगा। मेरे आवास की व्यवस्था की चिन्ता आपको नहीं करनी होगी।

सस्नेह, विद्यानिवास

विद्यानिवास जी ने ‘शिविर’ में बड़े उत्साह से भाग लिया; यद्यपि वे मात्र प्रथम सत्र में ही उपस्थित रह सके। अपना आलेख पढ़ा; जिसका परिवर्द्धित प्रारूप ‘संवाद’ नामक स्मारिका-पुस्तिका में समाविष्ट है-‘आज और आज की कविता’।

. आगरा

दि. 27-2-80

प्रिय महेंद्र जी,

कृपया मेरे लेख की एक प्रति शीघ्र भेज दें। मुझे उसको थोड़ा और बढ़ाना है। आशा है, आपका ‘शिविर’ बहुत सफल हुआ होगा। मुझे बहुत अफ़सोस है कि तरुण लेखकों के साथ व्यक्तिगत सम्पर्क नहीं हो सका।

सस्नेह, विद्यानिवास

सन् 1980 के बाद, फिर उनका सन् 1988 का एक पत्र सुरक्षित है। 30 जून 1984 को मैं मध्य-प्रदेश शैक्षिक सेवा से निवृत्त हुआ। तदुपरांत तीन-वर्ष विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, नई दिल्ली-द्वारा स्वीकृत एक शोध-परियोजना का अन्वेषक रहा। इस दौरान, अनेक पारिवारिक समस्याओं से भी जूझना पड़ा। मित्रों से मात्र अत्यावश्यक पत्र-सम्पर्क ही रहा

डा. विद्यानिवास मिश्र जी ‘काशी विद्यापीठ’ में जब कुलपति थे; पुनः पत्राचार हुआ। ‘जीने के लिए’ नामक कविता-संग्रह प्रकाशन के लिए तैयार था। डा. विद्यानिवास मिश्र जी से इसकी भूमिका लिखने के लिए अनुरोध किया। उन्हें मेरा यह अनुरोध भी स्वीकार्य था :

. वाराणसी

दि. 13-9-88

प्रिय महेंद्र भटनागर जी,

6/9 का पत्र मिला। इस समय इतनी तो फुर्सत नहीं है कि विस्तृत भूमिका लिख सकूँ पर संक्षिप्त भूमिका मैं ज़रूर लिख दूँगा। सस्नेह,

आपका, विद्यानिवास मिश्र

किन्तु प्रकाशक के अभाव में कृति का प्रकाशन टलता गया। फिर, सन् 1990 में जाकर, मजबूरी में, इस संग्रह का प्रकाशन मैंने स्वयं संक्षिप्त पत्र सुरक्षित हैं :

. वाराणसी

दि. 14-2-92

प्रिय महेंद्र भटनागर जी,

आपका पत्र मिला। ‘आज’ से मेरा कोई विशेष संबंध नहीं है और कोई आपके योग्य बात होगी तो मैं लिखूंगा।

सस्नेह, विद्याानिवास मिश्र

फ़रवरी 1992 में, पी-एच.डी. केशोधार्थी की मौखिकी लेने ‘दिल्ली विश्वविद्यालय’ गया। संयोगवश उसी रोज़ डा. विद्याानिवास मिश्र जी भी संस्कृत के किसी शोधार्थी की मौखिकी लेने ’दिल्ली विश्वविद्यालय’ आये। जब मैं अपने शोधार्थी की मौखिकी ले चुका तब डा. विद्यानिवास जी से मिलने उनके कक्ष की तरफ़ गया। लेकिन, उस समय वे मौखिकी ले रहे थे। अतः संकोचवश उनके कक्ष में प्रविष्ट नहीं हुआ। बाद में, उन्हें लिखा; उसी संदर्भ में उनका प्रस्तुत पत्र है :

. वाराणसी

दि. 9-3-92

प्रिय महेंद्र भटनागर जी,

आपका पत्र मिला। संस्कृत-विभाग में आये होते तो अच्छा लगता। ऐसी कोई औपचारिकता नहीं थी।

सस्नेह,

विद्यानिवास मिश्र


इसके बाद, डा. विद्यानिवास मिश्र जी से पत्राचार का कोई प्रसंग नहीं आया। इस बीच, वे ‘नव भारत टाइम्स’ (नई दिल्ली) और साहित्यिक मासिक पत्र ‘साहित्य अमृत’ के सम्पादक रहे।

डा. विद्यानिवास मिश्र जी की सहृदयता-आत्मीयता, उनका प्रेमपूर्ण व्यवहार और उनकी सहयोग-तत्परता की ओर जब भी ध्यान जाता है; उनके प्रति आदर-भाव से भर जाता हूँ। काश, ऐसे व्यक्तित्व के और निकट आ पाता!

.

(क्रमशः अगले भाग में जारी...)

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पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,17,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु 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रचनाकार: साहित्यकारों से आत्मीय संबंध (पत्रावली / संस्मरणिका) भाग - 11 // डॉ. महेन्द्र भटनागर
साहित्यकारों से आत्मीय संबंध (पत्रावली / संस्मरणिका) भाग - 11 // डॉ. महेन्द्र भटनागर
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