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साहित्यकारों से आत्मीय संबंध (पत्रावली / संस्मरणिका) भाग - 6 // डॉ. महेन्द्र भटनागर

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. साहित्यकारों से आत्मीय संबंध (पत्रावली/संस्मरणिका) डॉ. महेंद्र भटनागर द्वि-भाषिक कवि / हिन्दी और अंग्रेज़ी        (परिचय के लिए भाग 1 में य...

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साहित्यकारों से आत्मीय संबंध

(पत्रावली/संस्मरणिका)

डॉ. महेंद्र भटनागर

द्वि-भाषिक कवि / हिन्दी और अंग्रेज़ी

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       (परिचय के लिए भाग 1 में यहाँ देखें)

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भाग 1 || भाग 2 || भाग 3 || भाग 4 || भाग 5 ||


भाग 6


मेरे अग्रज कवि केदारनाथ अग्रवाल

का व्यक्तित्व पत्रों के आईने में

. 13-1-1958

महेंद्र के नाम केदार की पाती

(संदर्भ : ‘प्रतिकल्पा’ में प्रकाशनार्थ प्रेषित आलेख की प्रथम क़िस्त।)

बाँदा के पत्र लिखा कविवर केदार ने,

आपको सलाम नया भेजते हैं दूर से!

प्रथमांश छपते ही नया लेख भेजूंगा,

भूल हो तो मेरे हाथ काटियेगा!!

शेष कुशल-मंगल है,

आपका स्नेही

मैं केदार हूँ

. बांदा

24-7-60

प्रिय बंधु,

बहुत दिनों से समाचार नहीं मिले। वैसे आपकी कविताएँ तो पढ़ने को मिल ही जाती हैं। आशा है कि आप रुष्ट नहीं हैं और शरीर से स्वस्थ हैं। हम ठीक हैं।

मेरी बेटी का पुनर्विवाह दि. 8-8-60 को किसी समय दोपहर के पूर्व यहीं बाँदा में स्पेशल मेरिज एक्ट के अन्तर्गत हो रहा है। आपकी उपस्थिति अनिवार्य और वांछनीय है। आशा है कि आप निराश नहीं करेंगे।

आपका,

केदारनाथ अग्रवाल

प्रिय भाई,

पोस्टकार्ड मिला। मैं तो समझा कि आप नाराज़ हो गये हैं तभी आप ने एक पत्र भी नहीं डाला है। अब विश्वास हुआ कि ऐसी कुछ भी बात नहीं है। पत्र के लिए धन्यवाद।

चेकोस्लवाकिया वाले प्रोफ़ेसर स्मेकल आये थे, पर मेरे यहाँ न आये। पत्र तो आया था कि वे यहाँ आयेंगे। न मिल सका। इसका खेद है। उन्हें पत्र लिखना तो मेरी ओर से दुःख प्रकट कर देना। वह भी मुझे भूल गये, भारत आकर भी। भाई, उसी को सब अपनाते हैं जिसका प्रभुत्व छाया रहता है। हम हैं तो टुटपुंजिये वि। हमें सब भूले रहेंगे। बहुत दुःख रहा, उनसे भेंट न हो पाई इसलिए।

किरन बेटी गौहाटी पहुँच गयी। अच्छी तरह से हैं। अमृत प्रयाग में है। अपना प्रकाशन कर रहे हैं। ख़ूब चैन से हैं। हम उनसे कुछ दूर पड़ गये हैं। उनका नहीं मेरा दोष है। मन ही तो है। रामविलास वैसे ही हैं; 12 अशोक नगर, आगरा में हैं। पुस्तक (भाषाविज्ञान) पर जुटे होंगे। इधर मौन हैं। ब्याह में नहीं आये। बेटे का विवाह कर चुके हैं। नागार्जुन पटना में हैं - उपन्यास लिख चुके हैं। परेशान हैं। मुरली (मुरलीमनोहर प्रसाद सिंह) का पता नहीं, क्यों मौन है। प्रकाशचंद्र गुप्त प्रयाग में हैं। स्वास्थ्य से कुछ चिन्तित हैं। वही रक्तचाप का रोग। पर, काम करते ही रहते हैं। हम ‘कृति’-‘ज्ञानोदय’ इत्यादि में कभी-कभी छप जाते हैं।

सस्नेह,

केदार

. दि. 25-1-62

शाम 6:15 बजे

प्रिय भाई,

पत्र क्या मिला - ऐसा लगा कि हम खो गये थे और फिर मिले। पत्र के लिए और पुनः पा लेने के लिए हृदय से धन्यवाद और बधाई।

मौसम बेहद ख़राब है। बाहर पानी बरस रहा है। आज दिन भर बरसा है। रात एक बजे से लगातार यही क्रम चल रहा है। महोवा से तीन दिन पर बाँदा लौटा हूँ। बारह बजे रात घर आया हूँ कि वर्षा शरू हो गयी है। शायद यही हाल ग्वालियर में भी होगा।

‘जिजीविषा’ के मिलने पर अवश्य ही अपनी रिव्यू लिखूंगा और या तो ‘हिन्दी टाइम्स’ में या ‘स्वाधीनता’ में दूंगा। विश्वास रखो।

प्रसन्न हूँ। परिवार के अन्य लोग इलाहाबाद हैं। आजकल अकेला हूँ।

श्री मुरलीमनोहर प्रसाद सिंह पटना में हैं। उनका पता है : हरकारााशन, . बांदा

दि. 28-4-68

प्रिय भाई,

पत्र मिला। लेकिन एक युग बाद। प्रसन्नता हुई। मैं ठीक हूँ। कुछ कमज़ोर हो चला हूँ। उम्र धंस रही है न। वैसे कोई बात विशेष नहीं। कचहरी में सरकारी मुकदमें करना ही पड़ता है।

मैं लेख दूंगा। परन्तु अभी नहीं। समय मिलते ही लिखूंगा। वह कविता के नये प्रयोगों से संबंधित होगा।

लेखों का संग्रह तो निकला नहीं। न निकलेगा। ज़माना कुछ और की तलाश में है। ख़ैर।

आशा है कि अब आप स्वस्थ रहते हैं। आप तो कर्मठ लेखक हैं। आपसे क्या कहूँ।

कविता का रंग-रूप और भीतरी अस्तित्व सभी बदला है और बदलना चाहिए। परन्तु फ़ैशन की तरह नहीं। ठोस और ठिकाने की रचनाएँ होनी चाहिए। बड़ा विघटन है। कविता कथन मात्र रह गयी है। लेकिन सब ठीक होगा - कविता कविता होगी और फिर उसका रंग होगा। अभी आदमी टूट रहा है और टूटे आदमी की रचना भी टूटी होगी।

सस्नेह

आपका केदार

. बांदा

दि. 3-1-70

प्रिय भाई,

बहुत दिन पर पत्र मिला। तबियत कैसी है, यह आपने नहीं लिखा। पहले तो आप बहुत बीमार रहे थे। आशा है कि आप पूर्ण स्वास्थ्य लाभ कर चुके हैं।

बी.ए. के तीसरे वर्ष के पाठ्यक्रम में मुझे पढ़ाया जायगा। यह भी अच्छा हुआ। कृपा के लिए हिन्दी कविता और मैं आभारी हूँ। कहीं तो किसी ने ध्यान रखा।

मैं इधर लेख नहीं लिख पा रहा; क्योंकि सरकारी मुकदमों में उलझा रहता हूँ। जुलाई 70 के प्रथम सप्ताह में यह कर्तव्य ख़तम हो जायेगा। तब-तक अन्य काम नहीं कर सकता। फिर लेखनी चलाऊंगा। आपकी पुस्तकें हैं। मैं आपकी कविताओं का ध्यान रखूंगा।

और सब ठीक है। अब उम्र 59/60 की हो रही है। घाट किनारे लगने वाले


हैं।

वैसे जीने की ज़बरदस्त आस्था है।

मित्रों को तथा आपको नया वर्ष हर्षमय हो।

सस्नेह आपका

केदार

. बांदा

दि. 31-12-91

प्रिय भाई,

बरसों बाद अपने याद किया, पत्र लिखा। पुराने दिन याद आये। बड़ी प्रसन्नता हुई कि आप स्वस्थ और कुशल-क्षेम से हैं। अवकाश-प्राप्त के बाद तो समय-ही-समय रहता होगा। साहित्यिक रुचियों को जीवित करते रहें, लिखें-पढ़ें। यही चाहिए। मैं भी घर में अकेला पड़ा रहता हूँ - कुछ-न-कुछ सोचता रहता हूँ - कभी-कभी छोटी-छोटी कविताएँ लिख लेता हूँ। बेटा मद्रास में है। वहाँ जाऊंगा भविष्य में। कुछ महीने रहूंगा।

‘परिमल प्रकाशन’ के श्री शिव कुमार सहाय को पत्र लिख कर बात करें। मैं तो शिथिल हूँ कि कुछ कर सकूँ। अपनी लिखी पुस्तक के बारे में उन्हें लिखें। वह अवश्य उत्तर देंगे। आपको वह जानते होंगे ही।

सस्नेह आपका,

केदारनाथ अग्रवाल

. बांदा

दि. 13-1-92

बंधुवर महेंद्र भटनागर जी,

शिथिल हूँ। आँखें भी कम काम करती हैं। घर पर अकेला पड़ा रहता हूँ।

13/2 को, समारोह में शामिल होने, पुरस्कार लेने, कुछ सहृदय व्यक्तियों के साथ, भोपाल पहुँच रहा हूँ। कष्ट तो होगा - पर उठाना पड़ेगा।

आशा है, आप सपरिवार सानंद हैं। यथायोग्य के साथ।

आपका स्नेहपात्र

केदारनाथ अग्रवाल

इसके बाद फिर पत्र-व्यवहार सम्भ्वतः नहीं हुआ। भाई केदार काँपते हाथों से पत्र लिख रहे थे इधर; अतः उन्हें बार-बार कष्ट देना उचित नहीं समझा।


यह आकस्मिक था कि उस दिन मैं भी भोपाल में था; जिस दिन ‘भारत-भवन’ में श्री केदारनाथ अग्रवाल जी का काव्य-पाठ होने वाला था। सुनने पहुँच गया। पहले किसी मराठी-कवि ने काव्य-पाठ किया; फिर केदार बाबू ने। श्रोता बहुत ही कम थे। मैंने पहली बार केदार बाबू को देखा था व पहली बार उन्हें काव्य-पाठ करते सुना था। वे अपनी पुस्तकों में से काव्य-पाठ कर रहे थे। वृद्धावस्था का पूरा असर दृग्गोचर हो रहा था। उनकी अनेक कविताएँ मुझे कण्ठस्थ थीं। वे पढ़ भी न पाते थे कि मैं आगे की काव्य-पंक्तियाँ धीरे-से बोल देता था। आसपास बैठे अपरिचित श्रोताओं की नज़र मुझ पर बार-बार जाती थी। शायद मुझे कोई प्रोफ़ेसर या कवि समझते होंगे। अन्यथा केदारनाथ अग्रवाल की कविताएँ किसे कण्ठस्थ होतीं! केदार बाबू का काव्य-पाठ अति सामान्य ढंग का था - न उसमें भावावेश था न किसी प्रकार का अभिनय-चातुर्य। मात्र आठ-दस श्रोता जो मौज़़ूद थे, चुपचाप सुनते रहे। सराहना-प्रशंसा के कोई स्वर नहीं। लगभग एक घण्टा काव्य-पाठ होता रहा।

बाद में, स्वल्पाहार-पूर्व, मैं भाई केदार से मिला। बड़े प्रसन्न हुए वे। बोले, ‘परिमल प्रकशन’ के शिवकुमार सहाय आये हुए हैं, आप उनसे अवश्य मिल लें। अभी यहीं थे। फिर वे अपने धंधे से अन्यत्र न निकल जायँ। मैंने उन्हें देखा न था। इधर-उधर कई लोगों से पूछा। कोई न बता सका। पता नहीं वे कहाँ निकल गये।

केदार बाबू को भी फिर नहीं खोज पाया। उपस्थित जन-समुदाय में भी मेरा कोई परिचित नहीं था। अतः घर (अपने बेटे के निवास पर; नया सुभाषनगर, भोपाल) लौट आया।

केदार बाबू का कार्यक्रम अज्ञात था। इतमीनान से बैठ कर उनसे बात करने का सुअवसर न पा सका। इसका मलाल आज भी है!


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वे आँखें!

गजानन माधव मुक्तिबोध

मेरी तरह कवि श्री गजानन माधव मुक्तिबोध का भी उज्जयिनी से अटूट संबंध रहा।

मेरा अभी तक का उज्जयिनी-निवास तीन खण्डों में विभाजित है। प्रथम-जब मैं ‘माधव इंटरमीडिएट कॉलेज’ में पढ़ता था; इंटर के द्वितीय-वर्ष में (सत्र 1942-1943)। द्वितीय-जब मैं ‘विक्टोरिया कॉलेज, ग्वालियर’ से बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण करके, उज्जैन के ‘मॉडल हाई स्कूल’ (प्राइवेट संस्था) और ‘शासकीय महाराजवाड़ा हाई स्कूल’ में भूगोल-हिन्दी अध्यापक बना ( सन् 1945 से 1950)। तृतीय-जब उज्जैन के ‘शासकीय माधव स्नातकोत्तर महाविद्यालय’ में, ‘शासकीय आनन्द महाविद्यालय, धार’ से मेरा स्थानान्तरण हुआ (सन् 1955 से 1960)।

यह एक संयोग है कि मैंने सर्व-प्रथम उसी विद्यालय में अध्यापिकी की; जिसमें श्री. ग.मा.मुक्तिबोध कर चुके थे।

मैं जब ‘मॉडल हाई स्कूल’ पहुँचा तब वहाँ मुक्तिबोध जी के दो अनुज भी थे - अध्यापक ही। श्री. शरच्चंद्र मुक्तिबोध; जो मराठी के यशस्वी कवि हैं (अब स्वर्गीय) और श्री. वसंत मुक्तिबोध। श्री. शरच्चंद्र मुक्तिबोध फिर नागपुर चले गये। ‘मॉडल हाई स्कूल’ और उज्जैन में रह कर, बंधु शरद से मेरी मित्रता घनिष्ठ होती गयी। इस प्रकार, मैं मुक्तिबोध-परिवार के निकट आया।

विद्यालय में साथी अध्यापकों से श्री. ग.मा. मुक्तिबोध की प्रतिभा से सम्बद्ध अनेक बातें सुनने में आयीं। फलस्वरूप, मैं उनके कर्तृत्व के प्रति आकर्षित हुआ। उन दिनों, मुक्तिबोध जी ‘हंस’ के सम्पादकीय-विभाग में कार्य करते थे (वाराणसी)। ‘हंस’ में मैंने सन् 1947 से लिखना प्रारम्भ किया था। मेरा पत्र-व्यवहार, सम्पादक-द्वै श्री. अमृतराय जी अथवा श्री त्रिलोचन शास्त्री जी से होता था।

श्री. प्रभाकर माचवे जी, उज्जैन ‘शासकीय माधव महाविद्यालय’ में, तब तर्क-शास्त्र के प्राध्यापक थे। उनसे प्रायः प्रतिदिन मिलना होता था। उनसे ही ‘तार-सप्तक’ मुझे पढ़ने को मिला। जिसमें मुक्तिबोध जी की कविताएँ भी समाविष्ट हैं।

‘तार-सप्तक’ से हिन्दी-कविता में नया मोड़ आता है (सन् 1943)। श्री. मुक्तिबोध इस संकलन के सर्वाधिक चर्चित कवि थे। कवि मुक्तिबोध को हिन्दी-जगत ने ‘तार-सप्तक’ से ही जाना।

एक बार, श्री. मुक्तिबोध उज्जैन अपने घर आये और तभी श्रीशरच्चंद्र मुक्तिबोध के माध्यम से मुझे उनसे प्रथम साक्षात्कार करने का सुअवसर मिला। सन् व माह ठीक-ठीक याद नहीं - जून 1950 रहा होगा। उन दिनों वे नागपुर में थे और मेरे कविता-संग्रह ‘टूटती शृंखलाएँ’ (प्रकाशन सन् 1949) की समीक्षा आकाशवाणी-केन्द्र, नागपुर से प्रसारित कर चुके थे। मेरी उनसे पहली भेंट, माधवनगर-उज्जैन स्थित उनके घर पर ही हुई।

उनकी दो बड़ी-बड़ी चमकीली स्निग्ध आँखें, उनका स्मरण करते ही, साकार हो उठती हैं। आँखें - जिनमें स्नेह और करुणा का सागर लहराता था। जिनकी गहराई अथाह थी। चुम्बकीय! सम्मोहक! व्यक्ति मुक्तिबोध से मैं प्रभावित हुआ, अभिभूत हुआ! ज़रा-सी देर में वे घुल-मिल गये। उनकी जैसी आत्मीयता बहुत कम देखने में आयी।

‘टूटती शृंखलाएँ’ की समीक्षा के माध्यम से मैं उनकी तटस्थता व सहृदयता से परिचित हो चुका था। ‘टूटती शृंखलाएँ’ मेरा दूसरा प्रकाशित कविता-संग्रह है। श्री. गजानन माधव मुक्तिबोध-द्वारा लिखित समीक्षा से तब मुझे बड़ी प्रेरणा मिली। इस समीक्षा का प्रारूप इस प्रकार है :

‘‘पुस्तक के अभिधान से ही सूचित होता है कि कवि वर्तमान युग की विशेष जन-चेतना को लेकर साहित्य-क्षेत्र में उतरा है। वर्तमान युग, इन दो शब्दों में ही भारत के चार-पाँच वर्षों के विभ्राटों तथा घटनाओं की गूँज समा जाती है। प्रस्तुत काव्य-पुस्तक में उनकी भावच्छायाओं ने अपना मूर्त्तरूप ग्रहण किया है। इस पुस्तक की कुछ कविताएँ ऐसी हैं, जिन्हें कवि के सचेत कवि-जीवन का प्रारम्भिक रूप कहा जा सकता है। उनमें प्रारम्भिकता के सभी लक्षण हैं। छंद और भाषाधिकार की दृष्टि से वे निर्दोष होते हुए भी उनकी हुँकृति इतनी घोर है कि वे साहित्य-विकास की दृष्टि से बासी और पुराने टाइप की हो गई हैं। किन्तु शेष कविताएँ ज़िन्दगी की असलियत को छूने का प्रयास करती हैं, अतः वे अधिक भावपरक और काव्यमय हो गयी हैं।

तरुण कवि वर्तमान युग के कष्ट, अंधकार, बाधाएँ, संघर्ष, प्रेरणा और विश्वास लेकर जन्मा है। उसके अनुरूप उसकी काव्य-शैली भी आधुनिक है। इस तरह वह ‘तार-सप्तक’ के कवियों की परम्परा में आता है; जिन्होंने सर्वप्रथम हिन्दी-काव्य की छायावादी प्रणाली को त्याग कर नवीन भावधारा के साथ-साथ नवीन अभिव्यक्ति शैली को स्वीकृत किया है। इस शैली की यह विशेषता है कि नवीन विषयों को लेने के साथ-साथ नवीन उपकरणों को और नवीन उपमाओं को भी लिया जाता है


तथा काव्य को हमारे यथार्थ जीवन से संबंधित कर दिया जाता है। इसे हम वस्तुवादी मनोवैज्ञानिक काव्य कह सकते हैं -

दीख रही हैं भरी घृणा से

आज तुम्हारी आँखें!

- - -

बातों का आशय इतना संशयग्रस्त

कि बिल्कुल भी पता नहीं पड़ पाता

सत्य रहस्य तुम्हारा

मेरे प्रति इस निर्मम आकर्षण का!

जिससे मैं बेचैन तड़प उठता हूँ

मूक सिनेमा के चित्रों के पात्रों के समान

होंठ उठा कर रह जाता हूँ मौन!

अथवा -

ठंडी हो रही है रात!

धीमी

यंत्र की आवाज़

रह-रह गूँजती अज्ञात!

स्तब्धता को चीर देती है

कभी सीटी कहीं से दूर इंजन की,

कहीं मच्छर तड़प भन-भन

अनोखाशोर करते हैं,

कभी चूहे निकल कर

दौड़ने की होड़ करते हैं,

घड़ी घंटे बजाती है!

कि बाक़ी रुक गये सब काम!

अथवा -

बुझते दीप फिर से आज जलते हैं,

कि युग के स्नेह को पाकर

लहर कर मुक्त बलते हैं!

सघन जीवन-निशा विद्युत लिए

मानों अँधेरे में बटोही जा रहा हो टॉर्च ले।

ये पंक्तियाँ महेन्द्र भटनागर जी के काव्य की अथवा अत्याधुनिक शैली की सर्वोत्तम उदाहरण नहीं हैं; किन्तु इस नई धारा की कुछ विशेषताओं की ओर अवश्य ध्यान खींचती हैं।

इस अत्याधुनिक के समीप और उसका भाग बनकर रहते हुए भी कवि की अभिव्यक्ति शैली में दुरूहता नहीं आ पायी। भाषा में रवानी, मुक्त छंदों का गीतात्मक वेग और अभिव्यक्ति की सरलता, काव्य-शास्त्रीय शब्दावली में कहा जाय तो माधुर्य और प्रसाद गुण महेन्द्र भटनागर की उत्तरकालीन कविताओं की विशेषता है। किन्तु सबसे बड़ी बात यह है, जो उन्हें पिटे-पिटाये रोमाण्टिक काव्य-पथ से अलग करती है और ‘तार-सप्तक’ के कवियों से जा मिलाती है वह यह है कि अत्याधुनिक भावधारा के साथ टेकनीक और अभिव्यक्ति की दृष्टि से उनका उत्तरकालीन काव्य डवकमतदपेजपब या अत्याधुनिकतावादी हो जाता है। ‘स्नेह की वर्षा’, ‘मेरे हिन्द की संतान’, ‘ध्वंस और सृष्टि’ उनकी मार्मिक कविताएँ हैं, जो इसी श्रेणी में आती हैं। उनका प्रभाव हृदय पर स्थायी रूप से पड़ जाता है।

श्री महेन्द्र भटनागर वर्तमान युग-चेतना की उपज हैं। मैं उनका हृदय से स्वागत करता हूँ।’’

यह समीक्षा तब एकाधिक पत्रिकाओं में भी प्रकाशित हुई। मेरे प्रकाशित तीसरे कविता-संग्रह ‘बदलता युग’ (सन् 1953) के रेपर के पृष्ठ-भाग पर इसका कुछ अंश भी प्रकाशित हुआ।

अपने इसी उज्जैन-प्रवास में वे एक दिन मेरे घर भी आये। अपनी रचनाओं के प्रति मैंने उन्हें बड़ा निर्मोही पाया। अनेक प्रकाशित रचनाओं की प्रतिलिपियाँ तक उनके पास नहीं थीं। ‘हंस’ एवं अन्य पत्रों की मेरी फाइलों से उन्होंने अपनी कई रचनाएँ ब्लेड से काट-काट कर निकालीं और मुझसे अनुरोध किया कि मैं उनकी जो रचनाएँ जहाँ भी छपी देखूँ, उन्हें उनकी सूचना दूँ या उनकी कटिंग ही उन्हें भेज दूँ। यही कारण है कि उनका साहित्य पुस्तकाकार समय पर प्रकाशित नहीं हो सका।

धूम्रपान वे काफ़ी करते रहे होंगे। मेरे घर उन्होंने बीड़ी पी थी; जिसे देख कर मुझे बड़ा अटपटा लगा। वे सदा वैचारिक दुनिया में डूबे रहते थे। अन्तर्द्वन्द्व की स्थिति और मानसिक बेचैनी उनकी चेष्टाओं और क्रिया-कलापों से प्रकट होती थी।

कुछ वर्ष बाद, मुक्तिबोध जी से उज्जैन में ही पुनः भेंट हुई डा. शिवमंगलसिंह ‘सुमन’ जी के निवास पर। उन दिनों मैं धार में था (29-7-50 से 27-9-55) और कुछ दिनों के लिए उज्जैन आया हुआ था। तब नये कवियों पर एक समीक्षा-पुस्तक तैयार करने का विचार उन्होंने प्रकट किया था। एक कविता-संकलन के तैयार करने की बात भी उन्होंने मुझे लक्ष्य करते हुए कही-‘भारतेन्दु से भटनागर तक’।

खेद है, फिर उनसे न कोई मुलाक़ात हो सकी और न पत्र-व्यवहार ही। क्या पता था, वे इतनी जल्दी हमें छोड़कर चले जाएंगे! उनकी बीमारी से लेकर, मुत्यु तक


का काल , उनकी ख्याति का सर्वाधिक सक्रिय काल रहा। अनेक कवियों - समीक्षकों ने उन पर मर्मस्पर्शी लेख लिखे, प्रकाशकों ने उनकी पुस्तकें छापीं; पर वे यह सब नहीं देख सके! हम जीवित अवस्था में प्रतिभाओं की उपेक्षा करते हैं और उनके निधन के पश्चात् बड़ी-बड़ी बातें!

स्व. मुक्तिबोध हिन्दी-साहित्यकारों के सम्मुख एक प्रश्न-चिन्ह बन कर उपस्थित हैं। उनका साहित्यिक जीवन हिन्दी-साहित्यालोक की उदासीन स्थिति को निरावृत्त कर देता है; उसके तटस्थ स्वरूप को मुक्तिबोध जी के जीवन-क्रम में देखा जा सकता है।

‘इंदौर विश्वविद्यालय’ के ‘हिन्दी अध्ययन मंडल’ का सदस्य तीन वर्ष (सन् 1964-1969 के मध्य) रहा। तब बी.ए. हिन्दी-पाठ्यक्रम में, आधुनिक कविता-संग्रह के अन्तर्गत हमने उनकी कविताओं को स्थान दिया तथा उनके व्यक्तित्व और कर्तृत्व पर शोध-कार्य का भी मार्ग प्रशस्त किया। स्वयं मेरे निर्देशन में, एकशोधार्थी (श्रीशीतलाप्रसाद मिश्र) ने उनके कर्तृत्व पर, ‘विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन’ में शोध-प्रबन्ध प्रस्तुत कर, पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की ( सन् 1971/‘समसामयिक हिन्दी-साहित्य के परिप्रेक्ष्य में श्री. गजानन माधव मुक्तिबोध के साहित्य का अनुशीलन’।)


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गिरिजा कुमार माथुर

. बी-3/44 जनकपुरी

नई दिल्ली-110058

दि. 24-6-1983

प्रिय भाई,

मेरी बीमारी की सूचना पाकर मुझे तत्काल याद किया, पत्र लिखा - मन को बहुत अच्छा लगा। ‘कुछ बूँद उजेला’’ शीर्षक अपनी कविता में मैंने कभी लिखा था :

कितना सुखी है मन

सहसा यह जान कर

उन छोड़ी हुई जगहों में,

लोगों में,

कुछ अब भी हैं

जो तुझे याद करते हैं,

कुछ अब भी हैं,

जो स्मरण के योग्य हैं।

अब अचानक तुम्हारा पत्र पाकर मुझे ये पंक्तियाँ अधिक सार्थक लगीं। कितने ऐसे लोग हैं जो अकारथ किसी को याद करते हों। मेरा ऑपरेशन हो गया। होम्योपेथिक दवा आदि से कोई फ़ायदा नहीं हुआ था। घर आ गया हूँ। अभी एक महीना ठीक होने में तो लगेगा ही। आजकल क्या लिख रहे हो? नवीनतम प्रकाशन कौन- सा है? युद्ध और शांति की समस्या पर मेरा बहुत पहले का लिखा हुआ काव्य ‘कल्पान्तर’ अब ‘नेशनल पब्लिशिंग हाउस’, नई दिल्ली से शीघ्र आ रहा है।

पत्रोत्तर देना -

सस्नेह, गिरिजा कुमार माथुर


.

चिरंजीत

. D-2-E DDA Flats,

Munirka

New Delhi-67

dt. 20.5.83

प्रियवर डा. महेंद्रभटनागर,

नमस्कार। कल डा. योगेन्द्रनाथ शर्मा ‘अरुण’ के पत्र के साथ, आपका जब काव्य-परिचय1 मिला तो मैं अनायास आज से कोई 20-22 वर्ष पूर्व की सुखद स्मृतियों में खो गया; तब हम दोनों के बीच नियमित रूप से पत्र-व्यवहार होता था और हम हिन्दी-जगत में एक-दूसरे के आत्मीय के रूप में जाने-पहचाने जाते थे। बाद में, क्रूर काल ने आकाशवाणी के चीफ़-प्रोड्यूसर का पद दिला कर मुझे ऐसी संघर्षमयी व्यस्तता में डाल दिया और मेरे भीतर रेडियो-नाट्य-विधा के आचार्यत्व की ऐसी लगन उत्पन्न करदी कि मैं अपने मित्रों से कट गया।

डा. ‘अरुण’ के पत्र से ज्ञात हुआ है कि आप मुझे बिलकुल नहीं भूले। यह आपकी स्नेह़शीलता और मेरे सौभाग्य का प्रमाण है।

आकाशवाणी से दिसम्बर 1979 में मैं रिटायर हुआ था। अपने आपको व्यस्त रखने के लिए अपने पैसे से मैंने जून 1980 से मासिक ‘सर्वप्रिय’ का सम्पादन-प्रकाशन शुरू किया। जून से यह चौथे वर्ष में प्रवेश करेगा। ईश्वर की कृपा से हिन्दी-जगत में ‘सर्वप्रिय’ का एक नये किस्म के मासिक के रूप में स्वागत हुआ है। आपके अवलोकनार्थ मैं इसके कुछ पुराने अंक भिजवा रहा हूँ। अगले महीने से यह आपके पास नियमित रूप से पहुँचता रहेगा। आपका परिचय मैं जुलाई अंक में प्रकाशित करूंगा।1

आकाशवाणी-ग्वालियर के अधिकारी मुझे ग्वालियर-यात्रा के लिए कह चुके हैं, परन्तु मैं इस निमंत्रण का लाभ नहीं उठा सका। भगवान से प्रार्थना कीजिए कि कोई ऐसा संयोग बने कि हम फिर पहले की तरह मिल सकें, बतिया सकें, भूली-बिसरी यादों को ताज़ा कर सकें।

डा. ‘अरुण’ ने बताया है कि आपको ‘सर्वप्रिय’ के प्रकाशन का पता नहीं। हैरान हूँ, क्योंकि ‘सर्वप्रिय’ तीन-वर्ष से ग्वालियर के एक न्यूज़ एजेण्ट के यहाँ जा रहा है।

आशा है, आप सपरिवार सानंद होंगे।

सस्नेह, आपका

चिरंजीत


‘‘प्रगतिवादी काव्य-परम्परा के सशक्त हस्ताक्षर डा. महेन्द्र भटनागर की काव्य-साधना आज ‘इतिहास’ का अंग बन चुकी है।

शोषक के प्रति तीव्र आक्रोश, शोषित के प्रति निश्छल सहानुभूति और सामाजिक पुनर्निर्माण का अदम्य-अडिग संकल्प कवि महेन्द्र भटनागर की रचनाओं में विशेष रूप से मुखरित हुआ है।

सर्वाधिक उल्लेखनीय तथ्य यह है कि महाकवि ‘निराला’ की भाँति डा. महेन्द्र भटनागर की कविताओं में भी ‘राग एवं विराग’ का अनूठा संगम हुआ है।

गीतों के माध्यम से प्रकृति के रूप-सौन्दर्य को चित्रित करने वाले कवि श्री महेन्द्र भटनागर शृंगार की मादक अभिव्यक्ति में भी सफल रहे हैं।’’

-डा. योगेन्द्रनाथ शर्मा ‘अरुण’

(‘सर्वप्रिय’ में श्री चिरंजीत जी द्वारा विशेष रूप से प्रकाशित परिचय का अंश।)


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ए. चेलिशेव

. मास्को / दि. 17-2-57

प्रिय मित्र,

मुझे आपका पत्र मिला।

मुझे बहुत खुशी है कि आप हमको हमारे काम में मदद दे सकते हैं।

प्रोफ़ेसर महेन्द्र भटनागर हमारा बड़ा हार्दिक धन्यवाद लेना।

अभी हमारा पहला संग्रह निकला। इसमें आधुनिक हिन्दी तथा उर्दू कवियों की कविताएँ शामिल हैं। इस संग्रह की एक प्रति मैं आपकी सेवा में भेज रहा हूँ। सब कविताएँ रूसी भाषा में काव्यमय रूप में अनुवादित हैं। अच्छा हो , अगर आप हमको आधुनिक हिन्दी कवियों की सर्वश्रेष्ठ कविताएँ भेज सकें; क्योंकि उनको चुनना हमारे लिए बहुत मुश्किल बात है।

मैं आपके ‘युवक साहित्यकार संघ’ की सफलताओं की कामना करता हूँ।

आपका,

चेलिशेव

. मास्को / दि. 21-4-59

श्रीमन महेन्द्र भटनागर,

आपके नौजवान मित्रों से मुझे मालूम हो गया कि आपकी साहित्यिक संस्था बड़ा काम पूरा कर रही है। मुझे बड़ा अफ़सोस है कि भारत में रहते हुए मुझे आपसे तथा आपके मित्रों से मिलने का सुअवसर न मिला। आशा है, निकट भविष्य में मुझे भारत में फिर आने का मौक़ा मिलेगा तब हम ज़रूर आपके ‘युवक साहित्यकार संघ’ के सदस्यों से मिलना और परिचय कर सकेंगे। अभी हमारे देश की जनता में, भारतीय जनता की कला तथा साहित्य के प्रति बढ़ी हुई दिलचस्पी तथा अभिरुचि है और हम जो भारतीय भाषाओं तथा साहित्य का अध्ययन कर रहे हैं; इन दिलचस्पी की पूर्ति करने के लिए बहुत काम करते हैं।हम को बड़ी खुशी है कि आप भारतीय लेखक और साहित्यकार इस बड़े कार्य में हमको मदद दे रहे हैं। उपदेश तथा सलाह देते हैं।


पुस्तकें भेज रहे हैं आदि। इस सहायता के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद है।

अभी हमारे सोवियत संघ के प्राच्य विज्ञान के पारिषाद के सब विद्वान लोग हिन्दी, बंगला, उर्दू, तामील, तेलूगू, मलयालम,पांजाबी तथा संस्कृत भाषाओं तथा उनका साहित्य का अध्ययन तथा अनुवाद कर रहे हैं। मैं विशेषकर हिन्दी- कविता का अध्ययन कर रहा हूँ। अभी मैं आधुनिक हिन्दी कवियों की कविताओं का पूरा संग्रह तैयार कर रहा हूँ; जिसमें सबसे बड़े कवियों की चुनी हुई कविताएँ शामिल होंगी। अच्छी बात है कि आपकी कविताओं के कई संग्रह हम को मिले। धन्यवाद। हम इनका रूसी अनुवाद करके हमारे संग्रह में ज़रूर शामिल कर लेंगे। आशा है, हमारा काम जल्दी से समाप्त हो जायेगा।

ए. चेलिशेव

. मास्को / दि. 16-2-1960


प्रिय भाई महेन्द्र भटनागर जी,

आपका पत्र मिला है। इसके साथ दो पुस्तकें भी मिलीं। एक महीने हुए मैं भारत से वापस आया था; जहाँ अखिल भारतीय लेखकों के सम्मेलन में मैंने भाग लिया जो मदरास नगर में हो रहा था।

मेरा विचार है कि आपकी पुस्तकों से हम कई कविताएँ (ख़ास तौर पर बच्चों की) रूसी भाषा में अनुवाद करेंगे। ये बहुत ही अच्छी हैं।

शायद, आपको मालूम है कि हमारे देश में भारतीय साहित्य का अध्ययन और अनुवाद बड़े पैमाने में हो रहा है। मैं हिन्दी कविता का अध्ययन और अनुवाद कर रहा हूँ। कई निबन्ध और लेख तथा पुस्तकें मैंने प्रकाशित कीं। मेरी ख़ास अभिरुचि और दिलचस्पी - निराला, पंत, प्रसाद, महादेवी वर्मा की कविता तथा कबीर, तुलसी और सूर की कविता।

अभी हम भिन्न-भिन्न भारतीय भाषाओं से कविताओं का अनुवाद कर रहे हैं और अगले साल में बड़ी एंथोलोजी को प्रकाशित करेंगे।

इसीलिए आपकी कविताओं का संग्रह हमारे लिए उपयोगी पुस्तक है।

आशा है कि आप अच्छा हैं।

शुभकामनाओं सहित,

आपका

चेलिशेव


. मास्को / दि. 6-5-1960


प्रिय भाई,

आपका पत्र देर से मिला। धन्यवाद।

आपके सुझाव जो आपने किया है, हमारे लिए लाभदायक है। हम उनके प्रयोग ज़रूर करेंगे।

पर, अफ़सोस है कि इतने बड़े पैमाने में हम भारतीय कविता का अनुवाद और ख़ास करके प्रकाशित नहीं कर सकते हैं। हमारे इनकम (अस्पष्ट) सीमित हैं।

आपका सुझाव हम तब प्रयोग करेंगे जब The Anthology o`f Indian Poetry को तैयार करेंगे। पर, आप तो समझते हैं कि यह कार्य बहुत मुश्किल है। और इसी प्रकार की पुस्तक तैयार करने के लिए कई वर्षों का समय लगेगा।

अभी हमारी सब ताक़तें रविन्द्रनाथ ठाकुर की चुनी हुई रचनाओं का 14 पुस्तकों के संग्रह की तैयारी में लगी हैं। यह बहुत से महत्त्वपूर्ण काम हैं जो 1969 तक समाप्त करना चाहिए।

आशा है कि आपसे जल्दी मिलेंगे।

शुभकामनाओं सहित,

आपका

चेलिशेव

. मास्को / दि. 28-3-62

प्रिय मित्र महेन्द्र भटनागर जी,

आपका पत्र मिला था। बहुत-बहुत धन्यवाद।

मैं आपको अक़्सर याद करता हूँ और आपकी पुस्तकों को पढ़ रहा हूँ। अभी मैं तीन विषयों और क्षेत्रों में अध्ययन कर रहा हूँ।

(1) ‘The Tradition And Inovation In Literature’ के विषय पर पुस्तक लिख रहा हूँ (भारतीय, अंग्रेज़ी तथा रूसी साहित्य के आधार पर)

(2) दिनकर जी की चुनी हुई कविताओं का संग्रह रूसी भाषा में तैयार कर रहा हूँ (अनुवाद, भूमिका आदि)। जैसे मैं निराला और पंत के संग्रह तैयार और प्रकाशित किया था। शायद ये पुस्तकें आपने देखी होंगी।

(3) हिन्दी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास लिख भी रहा हूँ जो बिलकुल नये ढंग का होगा (पिछले साल भारत में रहते हुए भारतीय विद्वानों से मिल कर कई समस्याओं का विचार कर रहा था इसी विषय पर)

आपसे प्रार्थना है, अगर कोई उपयोगी मटीरियल भेज सकते हैं तो कृपया भेज दीजिये :

(1)     The Development of Romanticism in Indian Literatures.

(2)     Romantic Tendencies in Chhayawadi Poetry.

(3)     The Influence of Tagore on Hindi Romantic Poetry.

मेरी पुस्तक के लिए यह मटीरियल (पुस्तक, निबन्ध, लेख) बहुत लाभदायक  होगा।

जिस काम के बारे में आप लिखते हैं यह काम मैं स्वयं नहीं पूरा कर सकता हूँ, क्योंकि बहुत ही व्यस्त हूँ। पर कई मेरे विद्यार्थियों को मैं ज़रूर यह काम पूरा करने के लिए दे दूंगा। यह काम जो आप पूरा करना चाहते हैं बहुत ही अच्छा है। कितनी कविताएँ आपको चाहिए यह लिखिये।

आपकी कविताओं का अनुवाद अभी तक नहीं हुआ, मैं जानता हूँ कि अगले दो सालों के लिए प्र.ग. के प्लेन में इक़बाल, ग़ालिब, दिनकर, पंत जी (का पुनः प्रकाशन), नज़रुल इसलाम, सु. भारती (तामील) और अवश्य टैगोर के अलग-अलग संग्रह छप जायेंगे।

शायद, बाद में हम हिन्दी कविता की एंथोलोजी तैयार कर सकेंगे, तो इस बड़े संग्रह में आपकी कविताएँ भी ज़रूर शामिल करेंगे जो हमको बहुत पसन्द आती हैं।

लिखिये अभी आप क्या लिखते हैं।

शुभकामनाओं सहित,

आपका

चेलिशेव


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(क्रमशः अगले भाग में जारी...)

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रचनाकार: साहित्यकारों से आत्मीय संबंध (पत्रावली / संस्मरणिका) भाग - 6 // डॉ. महेन्द्र भटनागर
साहित्यकारों से आत्मीय संबंध (पत्रावली / संस्मरणिका) भाग - 6 // डॉ. महेन्द्र भटनागर
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