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साहित्यकारों से आत्मीय संबंध (पत्रावली / संस्मरणिका) भाग - 7 // डॉ. महेन्द्र भटनागर

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साहित्यकारों से आत्मीय संबंध

(पत्रावली/संस्मरणिका)

डॉ. महेंद्र भटनागर

द्वि-भाषिक कवि / हिन्दी और अंग्रेज़ी

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       (परिचय के लिए भाग 1 में यहाँ देखें)

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भाग 1 || भाग 2 || भाग 3 || भाग 4 || भाग 5 || भाग 6 ||


भाग 7


आचार्य नंददुलारे वाजपेयी

. सागर विश्वविद्यालय

दि. 10 दिसम्बर 1959

प्रिय महेन्द्र भटनागर जी,

आपका पत्र मिला।

आपका ख़्याल ग़लत है कि मैंने कभी आपकी उपेक्षा या बेक़द्री की है। जब कभी उज्जैन गया हूँ; सबसे पहले आपकी खोज की है। एक बार तो आपके यहाँ रह भी आया हूँ। कभी भी यह विचार मन में न लाइएगा के मेरे मन में आपके प्रति व्यमनस्कता है। आपकी पुस्तक की भूमिका मैं नहीं लिख सका; उन दिनों बहुत व्यस्त था। भविष्य में जब कभी अवसर आएगा; आप मुझसे प्रत्येक प्रकार का सहयोग पा सकेंगे।

आपने अपनी पुस्तकों के रिव्यू के संबंध में लिखा है; परन्तु ‘आलोचना’ इधर कई महीनों से निकली नहीं। यह भी निश्चय नहीं कि वह कब तक निकलेगी। इसलिए इस संबंध में वादा करना सम्भव नहीं है।

शेष सब प्रसन्नता है। आशा है, आप सपरिवार सानंद हैं।

आपका,

नंददुलारे वाजपेयी

.

नरोत्तम

. सम्पादक : ‘नया साहित्य’

प्रगतिशील लेखक संघ का मुखपत्र

कमच्छा, बनारस

दि. 28 अप्रैल 1948

प्रिय भाई,

पत्र मिला। ‘नया साहित्य’ पर विस्तार से अपनी और दूसरे साथियों की सम्मति भेजो। खुल कर राय दो; साथियों को अपनी राय देने के लिए provocate करो। ‘सुमन’ ने कविता भेजना तो दर किनार; ‘नया साहित्य’ की प्राप्ति-सूचना भी नहीं दी। आख़िर बात क्या है? मिलें तो कहना, अपनी राय खुल कर मुझे लिखें। ‘सुमन’ की चुप्पी बेहद अखरती है।

‘सन्ध्या’ के बंद होने की सूचना पढ़ कर दुःख हुआ। ले-दे कर ‘नया साहित्य’ और ‘हंस’ रह गए हैं। इन्हें ज़िन्दा रखने की पूरी कोशिश करनी होगी।

‘न. सा.’ के ग्राहक बनाओ। उसे popularise करने के लिए discusion करो।

रामविलास के लेख को मेरे पास भेज दो।

नरोत्तम


.

नलिन विलोचन शर्मा (‘नकेन’ वाद के प्रवर्तक)

. बिहार-हिन्दी-साहित्य-सम्मेलन

सम्मेलन-भवन, पटना - 3

फरवरी 1963

प्रिय महेन्द्र भटनागर जी,

आपके कृपा-पत्र मिले थे।

मैं उत्तर तभी देना चाहता था जब आपकी पुस्तक की आलोचना ‘साहित्य’ में हो जाती।

अब आलोचना प्रकाशित हो गई है। अंक भिजवा रहा हूँ।

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पुस्तक की आलोचना ‘सेवक’ जी ने लिखी है। वे तरुण कवि और विचारक हैं।

मुझे आपकी कविताओं की ओजस्विता पसंद आती है।

समुज्ज्वल भविष्य के लिए कामना करता हुआ-

भवदीय,

नलिनविलोचन शर्मा


.

मेरे आत्मीय बाबा नागार्जुन

बाबा नागार्जुन (मैथिली भाषा के कवि-यात्री। घर का नाम वैद्यनाथ मिश्र) का जन्म सन् 1911 ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा (जून) के दिन बताया जाता है।

वे मुझसे लगभग पन्द्रह वर्ष बड़े थे (मेरी जन्म-तिथि 26 जून, 1926) है।

प्रगतिशील हिंदी कविता से जुड़ने के साथ नागार्जुन जी से भी जुड़ गया।        उनकी दिलचस्पी भी मेरी काव्य-सृष्टि के प्रति रही।

उन दिनों फ़ोन-सम्पर्क इतना सुगम न था; पत्राचार शुरू हुआ। नागार्जुन जी के कुछ ही पत्र मेरे पास सुरक्षित हैं।

सन् 1948-49 में मैंने उज्जैन से ‘सन्ध्या’ नामक मासिक साहित्यिक पत्रिका का सम्पादन प्रारम्भ किया। मुझे अपने समय के अधिकांश रचनाकारों का सहयोग मिला। नागार्जुन जी को भी ‘सन्ध्या’ के अंक भेजे। तीसरे अंक के लिए उन्होंने अपनी एक कविता ‘भुस का पुतला’ (रचना-वर्ष 1948) प्रकाशनार्थ भेजी। ‘सन्ध्या’ के प्रकाशक एक साहित्य-प्रेमी होमियोपैथी डॉक्टर थे। लाभ के अभाव में उन्होंने ‘सन्ध्या’ का तीसरा अंक मुद्रित नहीं करवाया। निदान - प्राप्त रचनाएँ मुझे संबंधित रचनाकारों को लौटानी पड़ीं। आगे चलकर नागार्जुन जी की यह कविता (‘भुस का पुतला’) ‘हंस’ के मुख-पृष्ठ पर छपी।

फिर सन् 1958 में उज्जैन से ही मेरे सम्पादन में त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका ‘प्रतिकल्पा’ (उज्जैन का एक प्राचीन नाम) का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। इस पत्रिका के मात्र तीन अंक निकले। तीसरा अंक कवितांक निकला; जिसमें काव्यालोचन आलेखों के साथ इकतालीस लब्ध-प्रतिष्ठ चर्चित कवियों की कविताएँ छपीं। इनमें नागार्जुन जी की कविता ‘केदार के प्रति’ शामिल है।

कहने का आशय है कि नागार्जुन जी ने मेरी प्रकाशन-योजनाओं में पूर्ण रुचि ली और तत्परतापूर्वक सहयोग किया। सौजन्य और औदार्य के वे प्रतिमूर्ति थे।

सन् 1948 में ही नागार्जुन जी ने पटना से ‘उदयन’ मासिक पत्र का प्रकाशन स्वयं किया। अंक मुझे भेजा। मैंने अपनी एक कविता ‘ज़िन्दगी की शाम’ प्रकाशनार्थ प्रेषित की। उनका तुरन्त उत्तर आया :

. उदयन, बाँकीपुर, पटना

दि. 4 सितम्बर 1948

प्रिय बंधु,

तुम्हारी रचना मिली-‘ज़िन्दगी की शाम’ और अच्छी लगी। इसका इस्तेमाल अब ‘उदयन’ के तीसरे अंक में होगा; दूसरे का मैटर प्रेस में जा चुका है।

और, सब ठीक है। हमारे पास कुछ नहीं है-अकिंचनों का मासिक है ‘उदयन’। भीख माँग कर इसे आगे बढ़ा रहा हूँ। कवि नागार्जुन को फिर भिक्षु नागार्जुन हो जाना पड़ा है। तुम्हें फिर भी दस रुपये भेजूंगा।

नागार्जुन

ज़िन्दगी की शाम

यह उदासी से भरी

मजबूर, बोझिल

ज़िन्दगी की शाम!

अपमानित

दुखी, बेचैन युग-उर की

तड़पती ज़िन्दगी की शाम!

मटमैले, तिमिर-आच्छन्न, धूमिल

नीलवर्णी क्षितिज पर

आहत, करुण, घायल, शिथिल

टूटे हुए कुछ पक्षियों के पंख

प्रतिपल फड़फड़ाते!

नापते सीमा गगन की दूर,

जिनका हो गया तन चूर!

धुँधला चाँद

शोभाहीन

कुछ सकुचा हुआ-सा झाँकता है,

हो गया मुखड़ा

धरा को देखकर फीका,

सफ़ेदी से गया बीता,

कि हो आलोक से रीता!

गया रुक एक क्षण को

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राह में सिर धुन पवन

सम्मुख धरा पर देख

जर्जर फूस की कुटियाँ

पड़ीं जो तोड़ती-सी दम,

घिरा जिनमें युगों का सघन-तम!

और जिनमें हाँफ़ती-सी, टूटती-सी

साँस का साथी पड़ा है

हड्डियों को ढेर-सा मानव,

बना शव!

मौनता जिसकी अखंडित,

धड़कता दुर्बल हृदय

अन्याय-अत्याचार के

अगणित प्रहारों से दमित!

अभिशाप-ज्वाला का जला,

निर्मम व्यथा से जो दला

जिसको सदा मृत-नाश का

परिचय मिला!

जो दुर्दशा का पात्र,

भागी, कटु हलाहल घूँट जीवन का

मरण-अभिसार का

निर्जन भयानक पंथ का राही

थका, प्यासा, बुभुक्षित!

कह रहा है सृष्टि का कण-कण-

‘मनुजता का पतन’!

असहाय हो निरुपाय मानवता गिरी,

अवसाद के काले घने

अवसान को देते निमंत्रण

बादलों में मनु-मनुजता आ घिरी!

उद्यत हुआ मानव

बिना संकोच, जोकों-सा बना,

मानव रुधिर का पान करने!

क्रूरतम तसवीर है,


है क्रूरतम जिसकी हँसी

विष की बुझी!

पर, दब सकी क्या मुक्त मानवता?

सजग जीवन सबल?

यह दानवी-पंजा

अभी पल में झुकेगा,

और मुड़ कर टूट जाएगा!

मनुजता क्रुद्ध हो

जब उठ खड़ी होगी

दबा देगी गला

चाहे बना हो तेज़ छुरियों से!

सबल हुंकार से उसकी

सजग हो डोल जाएगी धरा,

जिस पर बना है भव्य, वैभव-पूर्ण

इकतरफ़ा महल

(पर, क्षीण, जर्जर और मरणोन्मुख!)

अभी लुंठित दिखेगा,

और हर पत्थर चटख कर

ध्वंस, बर्बरता, विषमता की

कथा युग को सुनाएगा!

जलियानवाला-बाग़-सम

मृत-आत्माओं की

धरा पर लोटती है आबरू फिर;

क्योंकि गोली से भयंकर

फाड़ डाले हैं चरण

दृढ़ स्वाभिमानी शीश

उन्नत माथ!

जिन पर छा गयी

सर्वस्व के उत्सर्ग की

अद्भुत शहीदी आग,

उसमें भस्म होगा

ध्वस्त होगा राज तेरा


ज़ुल्म का, अन्याय का पर्याय!

पर, यह ज़िन्दगी की शाम-

अगणित अश्रु-मुक्ताओं भरी,

मानों कि जग-मुख पर

गये छा ओस के कण!

चाहिए दिनकर

कि जो आकर सुखा दे

पोंछ ले सारे अवनि के

प्यार से आँसू सजल।

जिससे खिले भू त्रस्त

जीवन की चमक लेकर,

चमक ऐसी कि जिससे

प्रज्वलित हों सब दिशाएँ,

जागरण हो,

जन-समुन्दर हर्ष-लहरों से

सिहर कर गा उठे

अभिनव प्रभाती गान,

वेदों की ऋचाओं के सदृश!

बज उठे युग-मन मधुर वीणा

जिसे सुन जग उठें

सोयी हुईं जन-आत्माएँ!

और कवि का गीत

जीवन-कर्म की दृढ़ प्रेरणा दे,

प्राण को नव-शक्ति

नूतन चेतना दे!

‘उदयन’ के तृतीय अंक में यह कविता प्रकाशित हुई। पत्र में नागार्जुन जी ने अपनी ओर से ही लिखा, ‘तुम्हें फिर भी दस रुपये भेजूंगा।’ उनसे पारिश्रमिक/ मानदेय की अपेक्षा मैंने कभी नहीं की। उनके इस 4 सितम्बर, 1948 के पत्र का उत्तर मैंने तत्काल दिया और पारिश्रमिक न भेजने का आग्रह किया। नागार्जुन जी ने मेरे इस पत्र का बड़ा मार्मिक उत्तर दिया :


. अखिल भारतीय ओरियंटल कान्फ्रेंस

(14हवाँ अधिवेशन) दरभंगा

दि. 19 अक्टूबर 1948

बंधु,

तुमने लिखा है-‘उदयन’ भविष्य में बेहद उन्नति करेगा’-सो, तुम्हारे मुँह में घी-शक्कर! पारिश्रमिक के संबंध में तुम्हारी इस थीसिस से मेरा उत्साह कई गुना बढ़ गया है। वास्तव में, ‘उदयन’ को मैं भीख माँग-माँग कर ही निकाले जा रहा हूँ। जनता ने मुझे अपने समर्थ कंधों पर उठा लिया है। परन्तु प्रसन्नता की पराकाष्ठा पर अपने राम उस रोज़ पहुँचेंगे, जिस दिन ‘उदयन’ का सारा व्यय उसकी अपनी बिक्री से आने लगेगा।

‘तुम’ पर जो आज उतर आया हूँ सो, भैया, स्नेहाधिक्य ने अपने को ऐसा करने को बाध्य कर दिया। रचनाएँ मिलीं, मगर अभी ‘टूर’ में पढ़ नहीं पाया हूँ।

नागार्जुन

नागार्जुन जी के इस पत्र को पढ़कर अपार हर्ष हुआ। उन दिनों प्रगतिशील हिंदी कविता में मैं अपना स्थान बना ही रहा था। मुझ जैसे नवोदित कवि को नागार्जुन जैसे यशस्वी साहित्य-सर्जक ने जिस आत्मीयता से लिया-अपनाया, पढ़कर आश्चर्यचकित और विमुग्ध रह गया! हौसला बढ़ा।

‘तुम पर जो आज उतर आया हूँ सो, भैया, स्नेहाधिक्य ने अपने को ऐसा करने को बाध्य कर दिया।’ नागार्जुन ने यह स्नेह-भाव अंत तक बनाये रखा। निस्संदेह, उनका हृदय बड़ा विशाल था। संबोधनों में उन्होंने मुझे कभी ‘प्रिय बंधु’ लिखा, कभी ‘बंधु’, कभी ‘प्रिय साथी’।

उनका एक और विशिष्ट पत्र मेरे पास सुरक्षित है। यह पत्र उन्होंने सन् 1951 में वर्धा से प्रेषित किया था :

. हिंदी नगर, वर्धा

दि. 26 मई 1951

प्रिय साथी,

मुद्दत के बाद तुम्हारे हस्ताक्षर देखने को मिले-कैसा संयोग था! सबसे बड़ी असुविधा, प्रकाशन के क्षेत्र में, आज कवियों के ही माथे पड़ रही है। इलाहाबाद रहते समय, पिछले साल नेमि, माचवे, शमशेर और केदार से मैंने यही बात चलाई थी जो तुमने लिखी है। पर, कुछ निश्चित नहीं हो पाया। प्रसार और प्रबन्ध का भार ‘आधुनिक पुस्तक भंडार’ (7, अलबर्ट रोड, इलाहाबाद) लेने को तैयार था। पच्चीस-पच्चीस


रुपये हम लगाने को तैयार थे । किन्तु चरम वामपंथिता के उन दिनों में एक प्रकार की संशयात्मकता भी तो हमारे पैरों को जकड़े हुए थी। ख़ैर।

तुम्हारे कै संकलन अब तक निकल गये हैं? चाहता हूँ कि सामग्री सुलभ होती तो कुछ तुम पर लिखता।

यों मेरी एक चिर-पोषित लालसा है कि 1942 के गण-आन्दोलन से लेकर चीन में जनवादी सत्ता की प्रतिष्ठापना-तिथि तक-सात साल तक-की नई कविताओं का एक संकलन तैयार करूँ। एतदर्थ मसाला एकत्र कर रहा हूँ। नये कवियों पर, पृथक-पृथक भी लिखने का मन है।

अभी कई महीने यहाँ रहना है। पत्र अवश्य लिखना। ‘नया साहित्य’ के आकार की, 160 पृष्ठों की एक चयनिका अगर प्रकाशित करें तो सात-सौ रुपये बैठेंगे। यह रकम कहाँ से आवेगी? यहाँ तो रोज़ कुआँ खोदते हैं और तब जा कर कहीं पानी के दर्शन होते हैं! ग़रीबी के कारण ही बिहार में रहना मेरे लिए असम्भव हो जाता है, राजनीतिक तीव्रता ..... (अस्पष्ट).

नागार्जुन

इस पत्र में भी मेरे संदर्भ में उन्होंने विशेष बात लिखी, ‘तुम्हारे कै संकलन अब तक निकल गए हैं? चाहता हूँ कि सामग्री सुलभ होती तो कुछ तुम पर लिखता।’ जो काव्य-कृतियाँ उस समय उपलब्ध थीं; मैंने उन्हें भेजीं। नागार्जुन जी की घुमक्कड़ प्रवृत्ति से सब परिचित हैं। कृतियाँ साथ लेकर तो कोई घूम-फिर नहीं सकता। जब मन बना; तब लिखा न जा सका। स्वभाववश, मुझे भी उन्हें स्मरण कराने में संकोच हुआ। बाद में, क्रमशः मेरी अनेक काव्य-कृतियाँ प्रकाशित हुईं। नागार्जुन जी को भी भेजीं, जिनमें ‘जिजीविषा’ कविता-संग्रह विशिष्ट था; क्योंकि इसमें जनवादी चेतना सम्पन्न कविताएँ अधिक सम्मिलित हैं।

उज्जैन निवास के दौरान प्रगतिशील कविता का एक संकलन सम्पादित करने का विचार मन में आया। नागार्जुन जी ने अपनी कविताएँ समाविष्ट करने की अनुमति ही प्रदान नहीं की, कविताओं के चयन का दायित्व भी मुझे सौंप दिया। मेरी समझ पर जो भरोसा उन्होंने दर्शाया, उससे भी मैं कोई कम प्रभावित नहीं हुआ। प्रकाशकीय संकट के कारण यह संकलन फिर प्रकाशित नहीं हो सका।

. नई दिल्ली-3

दि. 14 मार्च 1957

प्रिय भाई,

आपका पत्र मिला। अभी इतना व्यस्त हूँ कि रचनाएँ कापी करने का अवकाश बिल्कुल नहीं है। संकलन में डालने के लिए तो इधर-उधर से भी 5-7 रचनाएँ बटोर ले सकते हैं। ‘नया पथ’ और ‘अवन्तिका’ की फाइलें तो होंगी आपके पास।

‘नई चेतना’ अवश्य देखूंगा, फिर सूचित करूंगा। कल इलाहाबाद जा रहा हूँ, लौटूंगा 15 रोज़ बाद। .आशा है, आप प्रसन्न हैं।

नागार्जुन आपका

नागार्जुन जी के पत्र और भी थे; किन्तु घर में दो बार दीमक लगने के कारण बहुत-सी संचित पत्रिकाएँ एवं चिट्ठियाँ नष्ट हो गईं।

सन् 1978 से 1984 तक ‘कमलाराजा कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, ग्वालियर में हिंदी-विभागाध्यक्ष रहा। सहयोगी श्री. सत्यव्रत अवस्थी के घर जाड़ों में एक दिन नागार्जुन जी आये। पीरियड अवकाश में उनसे मिलने गया। प्रथम बार हम दोनों ने एक-दूसरे को देखा। प्रसन्नता का ठिकाना नहीं रहा। नागार्जुन जी अस्वस्थ दशा में थे; उन्हें पुराना दमा था। मेरे कविता-संग्रह ‘जिजीविषा’ के बारे में उन्होंने बताया कि कृति का नाम (टाइटिल) उपयुक्त नहीं रखा गया है। अधिक बात करने का अवसर न था।

नागार्जुन जी की शक़्ल, किंचित बढ़ी हुई दाढ़ी, वेशभूषा, आँगन में धूप में उनके बैठने का ढंग, सब आज भी चलचित्र-समान आँखों में उतर आता है। नागार्जुन जी का न रहना बेचैन और उदास कर जाता है।


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नामवर सिंह

. का.वि.वि.

दि. 11 सितम्बर 1952

आदरणीय भाई,

आपकी कविता-पुस्तक मिली। आपने याद किया, कृतज्ञ हूँ।

फुटकल रचनाओं से पूर्व-परिचित था; परन्तु सामूहिक प्रभाव इस संग्रह से ही पड़ा। उत्साह और उद्बोधन का यह भवोच्छ्वसित वेग कुछ देर तक मन को बहाता रहता है। विश्वासों को बल मिलता है।  

इनके सिवा भी तो आपकी कविताएँ होंगी। क्या कोई संग्रह उनका भी सामने आ रहा है ?

आपकी शक्तिशाली लेखनी से जीवनानुभूतियों.के अन्य गहरे स्तरों तथा मर्म छबियों का अंकन देखना चाहता हूँ।  

जिस कवि में इतनी आग है उसमें पानी न जाने कितना होगा ! लोग उसे भी देखना चाहते हैं। तभी पता चलेगा कि कवि कितने पानी में है।

आशा है, पुस्तक के बावज़ूद भी  हम लोगों के संबंध बने रहेंगे। सधर्मा कहीं मिलते ही हैं!

आपका

नामवर

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डा. नित्यानंद तिवारी

. सी-1, न्यू मुल्तान नगर

नई दिल्ली - 110056

दि. 10 जनवरी 1985

आदरणीय महेन्द्र भटनागर जी,

प्रणाम। आपका पत्र मिला। खुशी हुई। विभाग में आपसे थोड़ी देर के लिए भेंट हुई थी; लेकिन उस मुलाक़ात का अर्थ था। अक़्सर ही लोग मौखिकी के लिए आते रहते हैं, भेंट होती है, लेकिन जब कोई रचनाकार आता है तो उससे भेंट का सुख ही अलग होता है। यह कभी-कभी होता है।

आपने मुझे स्मरण रखा, पत्र लिखा। मुझे आपने अपना स्नेह और आत्मीयता दी। मैं खुश हूँ। अर्से से आपकी रचनाओं से परिचित रहा हूँ। आपका अद्यतन कविता-संग्रह अभी नहीं पढ़ा है; लेकिन शीघ्र ही मँगा लूंगा। पढ़ूंगा।

नव वर्ष पर आप औैर आपके परिवार को मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ!

नित्यानंद तिवारी

स्नेहभाजनॆ


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प्रभाकर माचवे (प्रमा)

प्रमा अर्थात् प्रभाकर माचवे।

प्रमा अर्थात् चेतना - विशुद्ध ज्ञान।

निःसंदेह, ज्ञान की प्रत्यक्ष सजीव प्रतिमा हैं प्रभाकर माचवे। उनमें जो विशिष्ट व असाधारण है; वह है उनका बहुज्ञ व्यक्तित्व। अध्ययनशील अनेक होते हैं, अनेक होते हैं बहुश्रुत; लेकिन रत्नाकर जैसी व्यापक-गहन ज्ञान-राशि को अपने में समोये रखना प्रत्येक के वश की बात नहीं। पढ़ा- सुना - देखा- भोगा कितना अधिक है उनके पास! कितना याद है उन्हें! यह विशेषता एक विलक्षण प्रतिभा-सम्पन्न में ही देखी जा सकती है। सौभाग्य से, ऐसे सक्रिय मस्तिष्क को स्वस्थ तन मिला। शारीरिक क्षमता ने उनकी बौद्धिक चेतना के विकास में अकूत सहायता पहुँचायी। मैंने उन्हें सदैव एक ऋषि की तरह अध्ययन और लेखन के प्रति समर्पित देखा। लेखनी तो मात्र साधन है; निर्जीव है। प्रमुख है, उस लेखनी का सूत्रधार। उस सूत्रधार का हृदय और मस्तिष्क।

माचवे जी सही अर्थों में क़लम के धनी हैं। वे जब लिखने बैठते हैं तब उनकी लेखनी की त्वरा देखने योग्य होती है। जलधारा का-सा सहज प्रवाह! कोई कृत्रिमता नहीं। कोई माथा-पच्ची नहीं। जैसे लेखनी में सब-कुछ भरा हुआ है और यह अद्भुत सर्जक-शिल्पी उसे कागज़ पर उतारता चला जा रहा है। कहने का आशय-प्रभाकर माचवे में जो लेखन-सामर्थ्य है; वह विरल है। यह गुण न अभ्यास से हासिल किया जा सकता है; न अनुकरण से। माचवे जी के व्यक्तित्व में यह घुला-मिला एक प्राकृतिक तत्त्व है। कोई व्यक्ति चलता-फिरता विश्वकोश बन सकता है-माचवे जी भी किसी विश्वकोश से कम नहीं; किन्तु उनके जैसी अनुभूति-क्षमता, जीवन-संघर्ष के दौरान भोगा यथार्थ, भ्रमण द्वारा देखी-जानी दुनिया इतनी बहुरंगी है कि उनका साहचर्य- सम्पर्क आकर्षक व रोचक बन जाता है। उनका अनुभव-जगत ‘आवारा’ का अनुभव-जगत नहीं है (इसे उनकी सीमा भी कह सकते हैं।) एक अत्यधिक उत्तरदायी कार्मिक और निर्व्यसनी सद्गृहस्थ का अनुभव-जगत है। वे तर्कशास्त्र-दर्शनशास्त्र-अंग्रेज़ी के प्रोफ़ेसर रहे, अनेक प्रशासनिक पदों पर रहकर अपनी सूझबूझ का परिचय दिया, अनेक भाषाओं में, अनेक विधाओं में ख़ूब लिखा, हिन्दी में जो लिखा उसे पढ़कर कोई कह नहीं सकता कि इस लेखक की मातृभाषा हिन्दी नहीं।


और, इसके साथ दूसरी विशेषता जो माचवे जी में सम्पृक्त है, वह उनके क़द को और भी ऊँचा बना देती है। (वैसे भी माचवे जी का क़द बड़ा है!) यह विशेषता है-उनकी सरलता-सहजता। ज्ञान की गठरी को पीठ पर लाद उन्होंने ढोया नहीं। मैंने उन्हें प्रायः प्रसन्न-प्रफुल्ल देखा। खुल कर हँसते। हास-व्यंग्य करते। संस्मरण सुनाते। रुचिपूर्वक खाते-पीते। ज़रूरतमंदों की सहायता करते। माचवे जी में दर्प और अभिमान का लेश भी नहीं। नये लेखकों-रचनाकारों के प्रति आत्मीय। संबंधों-रिश्तों को निभाने वाले। तनिक भी ईर्ष्यालु नहीं। अहम् में अकिंचनों की कभी उपेक्षा नहीं की। आज भी जो उनसे सम्पर्क करता है; निराश नहीं होता। औदार्य और सौजन्य की अशेष पूँजी उनके पास है। वे सच्चे अर्थों में पढ़े-लिखे इंसान हैं।

उन्मुक्त हृदय और उन्मुक्त मस्तिष्क के इंसान! विश्व-मानव!


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डा. प्रभाकर माचवे जी के पत्र का एक नमूना

. दि. 11 मार्च 1987

प्रिय महेंद्र,

बहुत वर्षों बाद मिला पत्र तुम्हारा।

आज ग्यारह तारीख है; होली है सोलह को!

कुछ तो समय देते, मित्र! रचना को भेजने; डाक के द्वारा।

होली का नाम लिया

इसलिए कुछ जिगर को थाम लिया!

सोचा फिर दुबारा।

भेज रहा एक व्यंग, पत्र संग

छापो तो छापो

वर्ना भूल जाओ सारा!

सप्रेम -

प्रभाकर माचवे

.

(क्रमशः अगले भाग में जारी...)

संस्मरण 5016253326503319347

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