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वार्तालाप जिज्ञासुओं से - डॉ. महेन्द्र भटनागर की डा. शैलेन्द्र कुमार त्रिपाठी से बातचीत

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वार्तालाप जिज्ञासुओं से डा . महेंद्रभटनागर से कुछ प्रश्न - डा. शैलेन्द्र कुमार त्रिपाठी कवि महेंद्रभटनागर को अपने अतिरिक्त किस कवि की रचना प...

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वार्तालाप जिज्ञासुओं से

डा. महेंद्रभटनागर से कुछ प्रश्न

- डा. शैलेन्द्र कुमार त्रिपाठी

कवि महेंद्रभटनागर को अपने अतिरिक्त किस कवि की रचना प्रभावित करती है?

वर्तमान अनेक कवियों की अनेक कविताओं ने प्रभावित किया है / करती हैं। इनमें प्रतिष्ठित और नये कवि दोनों हैं। वस्तुतः प्रभावित विशिष्ट कविताएँ करती हैं; न कि यह या वह कोई कवि। वैसे विद्यमान कुछ परिचित कवियों के काव्य-कर्तृत्व के संबंध में, अन्यों की तरह, मेरी भी अपनी कुछ धारणाएँ हैं; मेरे भी अपने कुछ विचार हैं। उनकी कविताएँ जब और जहाँ प्रकाशित देखने को मिलती हैं-पत्र-पत्रिकाओं में या पुस्तकाकार-तो बड़ी अपेक्षाओं के साथ इन्हें पढ़ने को उद्यत होता हूँ/बड़े चाव से पढ़ता हूँ। कोई आवश्यक नहीं; अधिक बार निराश होता होऊँ। अनेक ऐसे कवियों की भी कविताएँ प्रभावित कर जाती हैं; जिनके नाम व रचना-कर्म से पूर्व-परिचित नहीं होता या जिनसे अल्प-परिचय रहता है। स्पष्ट है, प्रभावित रचनाएँ करती हैं; पूर्व-परिचित या नये रचनाकार नहीं। यह भी सही है; हर काव्य-सर्जक योजनाबद्ध ढंग से समसामयिक काव्य-सृजन का अध्ययन नहीं करता; अध्ययन करने की ज़रूरत भी महसूस नहीं करता। साहित्य-रचना के प्रति जो दृष्टि आलोचक की होती है; वह सृजनशील कवि की नहीं। कवि दूसरे कवियों की रचनाएँ पूर्ण या आंशिक पढ़ते हैं; प्रभावित या अप्रभावित होते हैं। बस। जो रुचिकर लगा या लगता है उसे याद रखना सम्भव नहीं हो पाता (एकदम असाधारण विशिष्ट कविताओं की बात भिन्न है।) कि आपके प्रश्न करने पर उत्तर में उन्हें उद्धृत कर सकूँ। मैं दिवंगत उन कवियों की बात नहीं कर रहा; जिनकी कृतियों को पढ़ता रहा हूँ; जिनकी कृतियाँ मुझे सहज उपलब्ध रही हैं। चाहे वे कवि प्राचीन हों या आधुनिक, हिन्दी के हों चाहे अन्य भाषाओं के।

समसामयिक कवियों के सृजन से परिचित होते रहने में अनेक बाधाएँ भी हैं। हिन्दी की ही बात करें। हिन्दी में, संसार की अन्य विकसित भाषाओं की तरह विपुल काव्य-सृष्टि हो रही है। लेकिन, क्या हम वह सब देख पाते हैं; पढ़ना तो बहुत दूर की बात है। पत्र-पत्रिकाओं की उपलब्धि सीमित है। उनके प्रकाशित अंक सुगमता से देखने तक को नहीं मिल पाते। लोकप्रिय अथवा साहित्य की विशिष्ट पत्रिकाओं की बात भिन्न है। लेकिन, यहाँ भी उन्हें प्राप्त कर सकने में कठिनाई है। हर व्यक्ति की क्रय-शक्ति सीमित होती है। अपनी बात करूँ। मुझ जैसा पेंशन-भोगी व्यक्ति पत्र-पत्रिकाओं एवं नयी कृतियों को देखने-पढ़ने के लिए तरसता रहता है। न तो उसकी जेब उन्हें ख़रीदने की अनुमति देती है; न वे उसे अपने आवासीय नगर में कहीं उपलब्ध होती हैं। स्थानीय पत्र व पुस्तक-विक्रेताओं का यह हाल है कि वे वह साहित्य भी नहीं रखते जो संतोषप्रद बिक सकता है। वे क्रयादेश पहले चाहते हैं। क्रयादेश मिलते ही ‘माल’ दिल्ली से आ जाता है। पत्र-सम्पादकों या प्रकाशकों से अवलोकनार्थ भेजने के लिए अनुरोध करो तो अधिकांश या तो भेजते नहीं या ख़रीद कर पढ़ने की नसीहत देते हैं। ठीक भी है, मानद प्रतियाँ कोई कितनी भेजे! अतः अपने अतिरिक्त अन्य कवियों तक पहुँचना इतना आसान नहीं। अद्यतन लेखन की दृष्टि से स्थानीय पुस्तकालयों की हालत भी अच्छी नहीं। पुस्तकालयों तक जाना कठिन; वहाँ जाकर पुस्तकों के जंगल में से अपनी रुचि की कृति निकाल पाना और भी कठिन। अधिकांश पुस्तकालयों में घोर अव्यवस्था। वार्धक्य-बाधा की बात तो मैं कर ही नहीं रहा। दूरदर्शन पर साहित्यिक कार्यक्रम बहुत कम आते हैं। कब आते-निकल जाते हैं; पता नहीं चलता। उनके निर्धारित समय पर सदा फ़ुरसत में होना भी सम्भव नहीं हो पाता। निष्कर्षतः, प्रभावित तो अनेक कवियों की अनेक रचनाएँ करती हैं; बशर्ते वे नज़र से गुज़रें। स्वयं की कविताएँ प्रभावित तो कोई विशेष नहीं करतीं; और अच्छा लिखने के लिए प्रेरित अवश्य करती हैं। असंतोष सृष्टि-सहायक ही होता है।

कविता के अतिरिक्त दूसरी वह कौन-सी साहित्यिक विधा है जिसमें कुछ रचकर आपको संतुष्टि मिलती हो?

कविता-विधा के अतिरिक्त अन्य साहित्यिक विधाओं में भी लिखने की चेष्टा समय-समय पर की अवश्य; पर कुछ समय गुज़र जाने के बाद यह महसूस किया कि अन्य विधाओं में लिखना मेरे लिए कष्ट-साध्य है। अन्य विधाओं की रचनाएँ -कहानियाँ, लघु-कथाएँ, रिपोर्ताज़, एकांकी, रेडियो-रूपक, संगीत-रूपक आदि- ‘महेन्द्रभटनागर-समग्र’ खंड-6 में समाविष्ट हैं। यद्यपि आलोचना कोई रचनात्मक विधा नहीं है; तथापि वह कारयित्री और भावयित्री दोनों प्रकार की प्रतिभाओं की माँग करती है। जिन आलोचकों में इन दोनों प्रतिभाओं का सम्मिश्रण है; वे अपने प्रतिपाद्य रचनाकारों अथवा अपनी विवेच्य कृतियों के प्रति न्याय करने में अधिक क्षम होते हैं। रचनात्मक लेखन को किसी पूर्व-निर्धारित कसौटी पर कसना इसलिए अधिक सार्थक नहीं; क्योंकि ऐसे जड़-निकष साहित्य को आगे बढ़ाने में सहायक नहीं होते। रचनात्मक लेखन पहले लिखा जाता है; उसके सैद्धान्तिक विवेचन-विश्लेषण की प्रक्रिया बाद में प्रारम्भ होती है। अमुक रचना इतना अधिक क्यों प्रभावित करती है; इसका रहस्य उस रचना के गहन व सूक्ष्म अध्ययन से ही स्पष्ट होता है। कहने का आशय है, कविता के अतिरिक्त मेरा कुछ आलोचना-कर्म भी है; जो ‘महेंद्रभटनागर-समग्र’ खंड - 4, 5 और 7 में समाविष्ट है। उच्च-कक्षाओं में अध्यापन एवं शोध-निर्देशन के फलस्वरूप आलोचना के प्रति मेरा आकर्षित होना स्वाभाविक रहा। मेरे अधिकांश आलोचना-लेखन में मेरे अपने निजी विचार अभिव्यक्त हुए हैं; जो आलोच्य कृतियों के अध्ययन-मनन अथवा प्रतिपाद्य रचनाकारों के जीवन-सान्निध्य से उपजे हैं। कविता की तरह, आलोचना भी मेरा पेशा कभी नहीं रहा। साहित्यितिहास में आलोचक के रूप में प्रतिष्ठित होने की इच्छा भी मेरे मन में कभी उत्पन्न नहीं हुई। मैंने पत्र-पत्रिकाओं में नियमित आलोचना-लेखन भी नहीं किया। यहाँ तक कि योजनाबद्ध ढंग से शोध-कार्य भी सम्पन्न नहीं कर सका। ‘नागपुर विश्वविद्यालय’ में शोध-कार्य हेतु पंजीकृत हो जाने के बाद, जब निर्धारित समयावधि में शोध-प्रबन्ध पूर्ण न लिख सका; तब जितना लिखा मात्र उतना मूल्यांकन-हेतु प्रस्तुत कर दिया। (दृष्टव्य : ‘समस्यामूलक उपन्यासकार प्रेमचंद’/चतुर्थ संस्करण / प्रकाशक : ज्ञानभारती- नेशनल पब्लिशिंग हाउस, 2/35 अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली - 2)। परिणाम हुआ, डी. लिट. की उपाधि से वंचित रह गया। हाँ, पी-एच.डी. की उपाधि मुझे निर्भ्रान्त रूप से प्रदान कर दी गयी। जिन दिनों शोध-कार्य हेतु विश्वविद्यालय में मेरा पंजीयन हुआ था, उन दिनों यह प्रावधान था कि यदि परीक्षक शोध-प्रबन्ध को डी. लिट. की उपाधि के योग्य समझें, तो ऐसी अभिशंसा कर सकते हैं। वस्तुतः, तब मुझे यह नियम विदित न था। वह तो परीक्षकों के प्रतिवेदनों से मालूम पड़ा। सर्वविदित है, डी. लिट् के संदर्भ में यह प्रावधान अब हटा दिया गया है। डी. लिट्. की उपाधि प्राप्ति-हेतु अब पहले पी-एच.डी. की उपाधि-ग्रहण कर लेना अनिवार्य है। कहने का आशय है कि आलोचना-कर्म में मेरा मन उतना नहीं रमा; जितना कविता-कर्म में। कविता और काव्य-रचना मुझे प्रारम्भ से ही रुचिकर रही और आज भी बड़ी प्रबलता से आकर्षित करती है मुझे।

‘‘जब तक जीना चाहा; ख़ूब जिये/ ... नहीं किसी की रही कृपा, / जूझे- अपने बल पर विश्वास किये!’’-जैसी पंक्तियाँ लिखनेवाला कवि; यह ठीक है कि अपनी शर्तों पर जीता रहा; पर, हिन्दी-आलोचना ने उसकी सक्रियता की पहचान नहीं की; इसका अनुभव आप किस प्रकार करते हैं?

हिन्दी-आलोचकों ने मेरे काव्य-कर्तृत्व पर वांछित ध्यान नहीं दिया; ऐसा लगता तो है। वाजिब हक मिला अथवा नहीं इसके निर्णायक भी वस्तुतः वे ही हैं। यहाँ यह तथ्य भी ग़ौर करने काबिल है कि मैंने आलोचना की तरह कविता को भी कभी व्यवसाय नहीं बनाया-प्रोफ़ेशनल कवियों की तरह। न कवि-सम्मेलनों में जाता हूँ; न व्यावसायिक मद्यपान-प्रेमी कवियों के दल में कभी अपनी उपस्थिति दर्ज़ की। यात्रा-भीरु होने के कारण भ्रमण किया नहीं। साहित्य के मठाधीशों से सदा दूर रहा। किसी साहित्यिक संस्था का सदस्य बना नहीं। किसी ‘वाद-विशेष’ से मेरा कभी नियमित संबंध रहा नहीं। राजनीति से कभी कोई वास्ता नहीं रखा; कुछ शासकीय सेवा में कार्यरत रहने के कारण भी। कार्य-क्षेत्र मात्र बुन्देलखंड, मालवा, चम्बल-अंचल रहा; जहाँ साहित्यिक सक्रियता अधिक नहीं रही। कलकत्ता, इलाहाबाद, वाराणसी, दिल्ली आदि की तरह। लिखा; पर लेखन के प्रचार-प्रसार के प्रति लापरवाह रहा। संचय कुछ किया नहीं। नामी-ग़रामी साहित्यकारों से न मिलना हुआ; न उनके साथ फोटो खिँचे। अति-सीमित दायरे में रहीं मेरी गतिविधियाँ। सामान्य और स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित अवश्य होती रहीं; किन्तु किसी पत्रिका से अभिन्न व विशिष्ट ढंग से कभी जुड़ नहीं सका। आज भी लगभग यही हाल है।

अपरिचित रह जाने का एक बड़ा कारण ओर भी है। यद्यपि अनेक काव्य-कृतियाँ प्रकाशित हुइंर्; किन्तु अधिकांश कम प्रभाव-क्षेत्र वाले स्थानीय प्रकाशकों ने प्रकाशित कीं। माना उन्होंने कृतियाँ ख़ूब बेचीं; थोक में भी। कुछ के दो-दो संस्करण बिके। पर, कृतियाँ सीमित क्षेत्र में ही खपीं। देश में दूर-दूर तक मेरी काव्य-कृतियाँ कभी उपलब्ध नहीं रहीं और न आज हैं। कोई ख़रीदना-पढ़ना चाहे तो वह भी प्राप्त नहीं कर पाता। हाँ, समर्थ प्रकाशकों ने जो प्रकाशित किया; वह अवश्य सर्वत्र पहुँचा। स्वयं मुझे आश्चर्य होता है जब मुझे पता चलता है कि अमुक शहर के अमुक संस्थान के ग्रंथालय में मेरी अमुक कृतियाँ विद्यमान हैं। वस्तुतः साहित्यिक संस्थानों के अधिकांश मुखिया स्वयं लेखक होते हैं और वे रचनाकार की कृतियाँ, सही अर्थों में, न ख़रीद कर; प्रकाशकों का ‘माल’ ख़रीदना बेहतर समझते हैं; उन्हें ‘कृतज्ञ’ करने के लिए। उनके अपने मित्रों और शीर्षस्थ रचनाकारों की बात भिन्न है। गरज़ यह कि सारा तंत्र इतना दूषित है कि मुझ जैसा रचनाकार कहीं प्रवेश पा ही नहीं सकता।

हिन्दी के जिन आलोचकों ने मेरे काव्य-कर्तृत्व पर ध्यान दिया और समय-समय पर लिखा; उनकी सूची यद्यपि लम्बी है; किन्तु फिर भी कुछ नाम : श्री. शिवनाथ (शांतिनिकेतन), श्री. विश्वम्भर ‘मानव’, डा. सियाराम तिवारी (पटना/शांतिनिकेतन), डा. शम्भूनाथ चतुर्वेदी (लखनऊ विश्वविद्यालय), डा. विनयमोहन शर्मा, डा. रामविलास शर्मा, श्री गजानन माधव मुक्तिबोध, प्रो. प्रकाशचंद्र गुप्त, डा. त्रिभुवन सिंह, डा. राधाकृष्ण सहाय, डा. श्रीनिवास शर्मा (कोलकाता), डा. शम्भुनाथ सिंह (वाराणसी), डा. किरण शंकर प्रसाद, डा. ऋषिकुमार चतुर्वेदी, डा. विश्म्भरनाथ उपाध्याय, डा. हरिश्चंद्र वर्मा, डा. आनन्दप्रकाश दीक्षित, डा. सुरेश गौतम, डा. वीरेंद्र सिंह (जयपुर/एक पूर्ण कृति ‘महेंद्रभटनागर की काव्य-संवेदना : अन्तः अनुशासनीय आकलन’), डा. विद्यानिवास मिश्र, डा. शिवकुमार मिश्र, डा. रवि रंजन, डा. हरदयाल, वंशीधर सिंह आदि। डा. वीरेंद्र सिंह जी (जयपुर) की तरह, डा. बैरागीचरण द्विवेदी (उड़ीसा) ने तो अंग्रेज़ी में एक पूर्ण पुस्तक ही लिखी है -‘ Living Through Challenges : A Study of Dr. Mahendra Bhatnagar's Poetry'. जो शोध-प्रबन्ध हैं; वे प्रामाणिक व स्तरीय हैं। पाँच सम्पादित मूल्यांकन कृतियाँ भी प्रकाशित हैं - एक अंग्रज़ी में-‘A Modern Indian Poet : Dr. Mahendra Bhatnagar. एक-सौ-आठ कविताओं के फ्रेंच-काव्यनुवाद श्रीमती पूर्णिमा राय (बर्दवान विश्वविद्यालय) ने किये हैं। अंग्रेज़ी-काव्यानुवाद की दस ज़िल्दें प्रकाशित हैं। एक और शीघ्र प्रकाश्य है। तमिष़, तेलुगु, कन्न्ड़, मलयालम, मराठी, गुजराती, ओड़िया, बाँग्ला, मणिपुरी आदि भारतीय भाषाओं में काव्यानुवादों की स्वतंत्र कृतियाँ छपी हैं / क्रमशः छप रही हैं। उपलब्धियाँ तो अनेक हैं; किन्तु हिन्दी के पर्याप्त आलोचक मुझसे अपरिचित ही रहे हैं। ‘दिग्गजों’ ने यदि कहीं-कभी नाम दर्ज़ कर दिया होता तो अधिकांश द्वितीय श्रेणी के आलोचक भी आज सहज उद्धृत कर रहे होते; और-और नामों की तरह! इस या उस कारण से मुख्य काव्यधारा में उद्धृत-चर्चित न हो सकने के परिणाम स्थायी नहीं होते; देर-सवेर अध्येताओं का ध्यान अवश्य आकर्षित होगा यदि लेखन में कुछ सार है तो।

हिन्दी के वे कौन-से आधुनिक कवि हैं जो आपको अपनी भावधारा के करीब लगते हैं; जिनके सम्पर्क में आप रहे हों-न भी रहे हों?

भावधारा के निकट कवियों में जगन्नाथप्रसाद मिलिन्द और शिवमंगलसिंह ‘सुमन’ के नाम तत्काल उभरते हैं। उनसे मेरे व्यक्तिगत सम्पर्क भी रहे। अन्यों में रामधारीसिंह ‘दिनकर’, केदारनाथ अग्रवाल, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, रामदेव आचार्य आदि।

आज जो कविता लिखी जा रही है; जो कवि सामने आ रहे हैं, उनमें अगर पाँच का नाम लेना हो (या नाम क्यों सीमित रहें, पाँच से अधिक भी हों सकते हैं) तो आप किन कवियों को चुनेंगे जो भविष्य के प्रति सजग दृष्टिबोध सम्पन्न हैं?

भविष्य के प्रति सजग-दृष्टि बोध-सम्पन्न वर्तमान कवियों में नीरज, देवेंद्र शर्मा ‘इंद्र’, कुमार विमल, यायावर, चंद्रभानु भारद्वाज, अश्वघोष, एकांत श्रीवास्तव, मनोज सोनकर, अरुण कमल, उद्भ्रांत, नचिकेता, यश मालवीय आदि की ओर ध्यान जाता है।

जीवन के सच और रचना के सच में कभी अन्तर होता है क्या? अगर होता है तो क्यों?

जीवन के सच और रचना के सच में अन्तर होता ही है। रचना कोई प़$ोटाग्राप़$ी नहीं है। वहाँ चयन है। जीवन स्थूल, रहस्यपूर्ण, जटिल, विराट और घिनौना-क्षुद्र होता है। रचना सूक्ष्म, स्पष्ट-मुखर, प्रांजल, तलस्पर्शी, विशाल और सुन्दर होती है। रचना जीवन से कोई कम काम्य नहीं। वह मानव हृदय और मस्तिष्क की पहचान है। जीवन की सार्थकता उसमें निहित है। वस्तुतः वह सभ्यता-संस्कृति का दर्पण है।

भोग के क्षण रचना में अवतरित नहीं होते; वे कालान्तर में पुनआर्हूत होते हैं कल्पना और सम्भावना के सहारे। उनमें जीवन से अधिक संगति होती है। जीवन आकस्मिक और अदभुत-आश्चर्य का पुंज है। रचना सहज और विश्वसनीय कलात्मक कृति। अपनी विशृंखलता में भी सुगढ़-सुगठित। जड़-निस्पन्दता में भी जीवन्त।

कविता स्वान्तःसुखाय कितनी? कितनी समाज को ध्यान में रखकर लिखी जाती है?

स्वान्तःसुखाय कविता का संबंध भक्त-कवियों से रहा है; किन्तु घर-परिवार और समाज से विरक्त होते हुए भी भक्त-कवियों का अस्तित्व व्यक्ति या समाज-निरपेक्ष नहीं रहा। उनका गायन (लेखन) कोई अरण्य-गायन नहीं माना जा सकता। व्यक्ति को सदाचरण की ओर प्रेरित करने वाला भक्ति व नीतिपरक काव्य मात्र स्वान्तःसुखाय क्यों? आत्मा की शुद्धि और पारलौकिक जीवन से सम्बद्ध चिन्तन व्यक्ति और समाज के लिए अर्थ रखता है। ज़ाहिर है, कविता का संबंध समाज से अटूट रहा है; रहेगा। वस्तुतः, ‘स्वान्तःसुखाय’ एक दर्शन है; जो अन्ततः बहुजनहिताय का कारण बनता है। अपने शाब्दिक अर्थ में स्वान्तःसुखाय स्वार्थ का पर्याय है। मात्र ‘स्व’ के उत्थान एवं मोक्ष-कामना के लिए जीना।

आज जो राजनीतिक भावधारा बह रही है उससे आप कभी विचलित होते हैं?

भारत की वर्तमान दूषित राजनीति के कारण ही न तो देश वांछित प्रगति कर पा रहा है; न जन-साधारण अपने भविष्य के प्रति आश्वस्त हो पा रहा है। सर्वत्र अस्थिरता परिव्याप्त है। अति-साधारण बौद्धिक-स्तर के निकृष्ट लोगों के हाथों हमने देश की बागडार सौंप रखी है। ये लोग भ्रष्ट ही नहीं, अपराधी मनोवृति भी रखते हैं। राजनीति और सत्ता पर ये बड़ी मज़बूती से काबिज़ है। देश की दौलत का बन्दर-बँटवारा इनके द्वारा निरन्तर हो रहा है। यह वर्ग ही दिन-पर-दिन समृद्ध होता जा रहा है। इनके बँगले बन रहे हैं; इनके वाहन चल रहे हैं। अधिकांश ये लोग ही विदेशों में घूमने व ऐश करने जाते हैं। शासन-तंत्र को अपनी इच्छानुसार दिशा देने में ये समर्थ हैं। इनके सहयोग और समर्थन से आप बहुत-कुछ पा सकते हैं। मीडिया, पत्रकारिता, साहित्य, संस्कृति, शिक्षा आदि पर इनका ही वर्चस्व है। स्वतंत्र विचारधारा वाले स्वाभिमानी व्यक्ति क्षति उठा रहे हैं। न्याय की आशा करना सब्ज़बाग देखना है। बीमार पड़ने पर इनके उपचार की कोई व्यवस्था नहीं। देश के बड़े-बड़े अस्पतालों में इस वर्ग की अति दयनीय स्थिति ज़रूरत से ज़्यादा साफ है। धनाभाव है तो बड़े-बड़े अस्पतालों में ये सिर्फ मरने पहुँचते हैं। खुले आम इनकी हत्या देखी जा सकती है। राजनीतिज्ञों के उपचार में कोई कोताही नहीं बरती जाती। वे सीधे विदेशों में जाकर अपना उपचार करवाते हैं। निर्धन-वर्ग को बुरी तरह छला जा रहा है। कला, साहित्य, संस्कृति के पोषक-उन्नायक तभी-तक सुखी हैं; जब-तक उन्हें इन गंदे राजनीतिज्ञों की कृपा और इनका सहयोग प्राप्त है।

जहाँ तक राजनीतिक भावधारा की बात है; साम्यवादी विचार वाले दलों को छोड़कर कोई भावधारा दृष्टिगत नहीं होती। सर्वत्र अति निकृष्ट जातिवाद का बोलबाला है। वर्ण-व्यवस्था ने राजनीतिक भावधारा को घिनौने जातिवाद में जकड़ रखा है। प्रजातंत्र का मूलाधार निर्वाचन-मतदान जातिवादी भावना से प्रेरित व संचालित है। योग्यता और चरित्र का कोई मूल्य नहीं। ‘अंधा प्रजातंत्र’ हमारी नियति बन गया है। वंशवाद अलग फल-फूल रहा है। ऐसे माहौल में जो रचनाकार व्यवस्था के प्रति आक्रोश व्यक्त करते हैं वे वरेण्य हैं।

‘‘काव्य में अर्थ-ग्रहण मात्र से काम नहीं चलता, बिम्ब-ग्रहण अपेक्षित होता है’’ - आचार्य रामचंद्र शुक्ल की यह उक्ति अगर आज की कविता पर लागू की जाय तो कितना ठीक है?

अर्थ-ग्रहण और बिम्ब-ग्रहण दोनों का अपना महत्त्व है। अर्थ-ग्रहण एक सामान्य प्रक्रिया है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के कथन से यह तथ्य स्पष्ट है - ‘‘काव्य में अर्थ-ग्रहण मात्र से काम नहीं चलता’’-बिम्ब (इमेज) ज्ञानेन्द्रियों (दृष्टि, शब्द, गंध, रस, स्पर्श) द्वारा ग्रहण किये जाते हैं। मन पर मूर्त्त चित्रों का अंकन ही बिम्ब-विधान है। (मानस-प्रतिमा)। प्रश्न उठता है-बिम्ब-ग्रहण क्या सहज होता है अथवा सायास? कवि क्या बिम्बों की छटा दिखाने के लिए काव्य-रचना करता है? वस्तुतः बिम्ब-विधान के स्वरूप का संबंध कवि-व्यक्तित्व पर निर्भर करता है। कोई स्थिर-चित्र अंकित करता है तो कोई गतिमान। बिम्ब मूर्त और अमूर्त दोनों प्रकार के होते हैं। निःसंदेह काव्य को रोचक बनाने में बिम्ब-विधान का अपना महत्त्व है। बिम्ब काव्य को उच्च-स्तर प्रदान करते हैं। अनायास और विचारपूर्वक प्रयुक्त दोनों प्रकार के बिम्बों की उपस्थिति आज की हिन्दी-कविता में मिलती है।

शिक्षा और मनोरंजन के लिए ख्यात भारत का द्रश्य-माध्यम (टी.वी.) किस तरह की भूमिका निभा रहा है? एक शिक्षाविद् के रूप में आप क्या सोचते हैं?

भारत का दृश्य-माध्यम टी.वी. पर्याप्त लोकप्रिय है। शिक्षा और मनोरंजन - दोनों दृष्टियों से-इसकी भूमिका सराहनीय है। आवश्यकता है तो भाषा-परिष्कार की। भारतीय भाषाओं में जो कार्यक्रम प्रसारित हों, उनमें अंग्रेजी-शब्दों के अनावश्यक प्रयोग से बचना चाहिए। दूसरे, राष्ट्रीय-सांस्कृतिक एकता की दृष्टि से इन कार्यक्रमों में भारतीय भाषाओं के उन तमाम शब्दों का प्रयोग होना चाहिए; जो प्रचलित हो गये हैं। अर्थात् अंग्रेज़ी शब्द-कोश की तरह भारतीय भाषाओं के शब्द-कोशों में भी नये-नये शब्दों की वृद्धि क्रमशः दर्ज़ होती रहनी चाहिए। इससे भारतीय भाषाएँ समृद्ध होंगी। वे परस्पर निकट आएंगी। जहाँ-तक हिन्दी-कार्यक्रमों का संबंध है; अनेक अशुद्ध प्रयोग और उनके अशुद्ध उच्चारण प्रायः सुनने में आते हैं। लिखित पंक्तियों में वर्तनी की अशुद्धियाँ देखकर तो बहुत ही बुरा लगता है।

एक शिक्षक के रूप में महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों को आपने अपनी सेवा दी है। शिक्षकों और शिक्षा के स्तर ने कभी आपको चिन्तित किया है? कुछ किया भी आपने?

जन-संख्या वृद्धि के कारण शिक्षण-संस्थाएँ बेतहाशा बढ़ती जा रही हैं। फलस्वरूप शिक्षकों और शिक्षा का स्तर गिर रहा है। शिक्षण-संस्थाएँ ‘इल्म की दूकान’ में परिवर्तित हो गयी हैं। अल्प-वेतन पर अध्यापक सहज ही उपलब्ध हो रहे हैं। शिक्षा के मूल उद्देश्य से न अध्यापकों का; न छात्रों का कोई वास्ता रहा। किसी प्रकार उपाधि प्राप्त करना छात्रों का एकमात्र लक्ष्य रह गया है। परीक्षाओं में नव़$ल का प्रचलन बढ़ रहा है। अर्थाभाव के कारण, अध्यापक अध्यापन के अतिरिक्त और-और धंधे करने के लिए विवश हैं। ट्यूशन कमाई का एक विकल्प बन गया है।

जहाँ तक शोध का संबंध है; स्थिति कोई कम दूषित नहीं। अपरिपक्व शोध-निर्देशकों की भरमार है। शोध के स्तर को गिराने में राजनीतिज्ञों की दखलंदाज़ी भी ख़ूब है। व्यक्तिगत प्रभाव से शोध-विषय स्वीकृत करवा लिए जाते हैं। परीक्षक भी पहचान वाले नियुक्त हों; प्रायः ऐसी कुचेष्टा रहती है। शोध-निर्देशन के संदर्भ में कुछ कड़े नियम बनने चाहिए। ऐसे अनेक शोध-निर्देशक सक्रिय हैं; जो अध्यापक-पद छोड़ चुके हैं; किन्तु आज भी शोध-निर्देशक बने हुए हैं; क्योंकि उनके पास वांछित स्नातकोत्तर-कक्षाओं का अध्यापन-अनुभव है। शोध-प्रबन्ध लेखन के नाम पर नकल-लेखन ख़ूब हो रहा है। धनराशि लेकर पेशेवर (नितान्त आयोग्य) लोग धड़ल्ले से नकल-कुकर्म में जुटे हुए हैं। मैं स्वयं अनेक विश्वविद्यालयों की ‘शोध-उपाधि’ समितियों में विशेषज्ञ-सदस्य अथवा पदेन सदस्य रहा। इस संदर्भ में मेरे अनुभव बड़े कटु हैं। शोध-निर्देशकों और शोधार्थियों की क्रूर नाराज़गी झेलता रहा। पुलिस तक में शिकायतें दर्ज़ करनी पड़ीं। जिसकी नकल उजागर करो; वही तंग करने के लिए गुंडे लगाने को तत्पर।

माना, मौलिक शोध भी हुआ है; हो रहा है। निष्ठावान शोध-निर्देशकों की पहचान भी इतनी कठिन नहीं। तुलनात्मक शोध ने शोध को नयी दिशा प्रदान की है। उच्च-स्तरीय और साधारण कोटि के शोध-प्रबन्ध प्रकाशित भी हो रहे हैं। नकल से साधारण कोटि का शोध-प्रबन्ध बेहतर। उसमें मौलिकता कुछ पायी ही जाती है। प्रतिभा नहीं तो शोधार्थी का परिश्रम तो उसमें बोलता ही है। शोध-कर्म की वैज्ञानिक पद्धति भी लक्षित होती है।

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रचनाकार: वार्तालाप जिज्ञासुओं से - डॉ. महेन्द्र भटनागर की डा. शैलेन्द्र कुमार त्रिपाठी से बातचीत
वार्तालाप जिज्ञासुओं से - डॉ. महेन्द्र भटनागर की डा. शैलेन्द्र कुमार त्रिपाठी से बातचीत
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