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डॉ. आर. बी. भंडारकर की तीन लघुकथाएँ

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लघु कथा-

          (1) * संस्कार *

                  -डॉ आर बी भण्डारकर.

दूसरा काल खण्ड समाप्त हुआ;भूगोल के प्राध्यापक अपना अध्यापन समाप्त कर अपनी अगली कक्षा के लिए निकल गए। तीसरे काल खण्ड के लिए हिंदी के प्राध्यापक उपस्थित हुए।

हिंदी वाले प्राध्यापक अभी इस महाविद्यालय के लिए नवागत ही थे पर सभी  छात्रों को भलीभाँति मालूम हो गया था कि वे  प्रतिदिन उपस्थित होते हैं और समय पर उपस्थित होते हैं। यदि उन्हें कभी छुट्टी आदि पर जाना होता है तो वे कक्षा में पहले ही सूचित कर देते हैं।

आदत के अनुसार थोड़े ही अंतराल में छात्र भारी शोरगुल करने लगे थे। हिंदी वाले प्राध्यापक जी ने आते ही छात्रों को शांत कराया;पर एक छात्र शोर और शरारत करता ही रहा।

प्राध्यापक ने कहा थोड़ा खड़े हो जाइए श्रीमान। छात्र उद्दंडता पूर्वक खड़ा हो गया। वह सोचने लगा कि प्राध्यापक जी डांटेंगे या खड़े रहने की सजा देंगे या बाहर चले जाने के लिए कहेंगे पर उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया। कहा,देख लिया सबने इनको?

हाँ, अब आप बैठ जाइए; अच्छा हुआ कि आज आपने केवल अपने ही नहीं,अपनी सात पीढ़ियों के संस्कार प्रकट कर दिए हैं।

छात्र पानी-पानी; पूरी कक्षा स्तब्ध।

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लघुकथा-

             (2) * विघ्नसंतोषी *

               - डॉ आर बी भण्डारकर . 

उत्तर प्रदेश का एक अपेक्षाकृत छोटा कस्बा। कभी यह कस्वा पेशवाओं के अधीन था और राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र भी। उस समय यहाँ महाराष्ट्रियन परिवारों की खूब आबादी थी और उनकी राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति भी काफी मजबूत थी। उनमें से मुअज्जुज लोगों के मकान "हवेली" कहे जाते थे। स्वतंत्रता के पश्चात राजतंत्र की समाप्ति के साथ ही इनकी राजनीतिक ताकत कम हुई। सामाजिक और आर्थिक हैसियत कम तो नहीं हुई पर वे सामाजिक रूप से अपने को अलग-थलग अनुभव करने लगे। अस्तु अनेक परिवार पलायन कर इंदौर, देवास या अन्य बड़े  नगरों में बस गए।

इन्हीं परिवारों में से किसी एक की हवेली। फैलाव लगभग एक एकड़ में। एक तरफ बहुत मजबूत कच्चे कमरे, बरामदे बैठक आदि;चहुँ ओर कच्ची चहारदीवारी। बड़ा आँगन,आँगन में एक कमरा। लम्बे समय से उचित देखभाल न होने के कारण पूरी हवेली लगभग खण्डर में तब्दील हो चुकी थी। आँगन के बीच के कमरे में एक बुढ़िया रहती थी। कब से रह रही थी कोई नहीं जानता। आसपास के लोग कहते हैं कि इसके माता-पिता भी इसी हवेली में रहते थे। इसका विवाह भी इसी हवेली से हुआ था और बाल्यावस्था में ही वैधव्य का दाग लेकर पुनः आकर इसी हवेली में रहने लगी।

हवेली में एक कुँआ था,इसी के तनिक दूरी पर पीपल का एक बड़ा सा पेड़ था। लोक मान्यता थी कि इस पीपल के पेड़ पर भूत रहता है। अँधेरी रात में जब साँय साँय हवा चलती तब पीपल के पेड़ में एक अजीब सनसनाहट होती थी जो लोगों को डराने का काम करती थी। आसपास की निर्जनता डरावने पन में उद्दीपन का कार्य करती थी।

बुढ़िया का नाम गौरा। लम्बी,गोरी-चिट्टी;उम्र 60-65 वर्ष पर कद-काठी मजबूत। आँखों की रौशनी चुस्त-दुरुस्त पर सुनाई कम देता। उसे प्रकृति से दुखों के इतने थपेड़े पड़े कि वह भाव-शून्य सी हो गयी। उसके न माता पिता,न भाई बहिन,न पुत्र-कलत्र और न कोई निकट का अपना। सो हृदय ऐसा जड़ हुआ कि न कोई रंज न गम,न खुशी,न दुख ;न शोक,न भय। हाँ,क्रोध था जिसे परिस्थितियों ने किंचित धार दार भी बना दिया था। सुबह-शाम घरेलू कार्य,दिन भर बकरियाँ चराना,लकड़ियाँ बीनना। बकयापन का साधन। वह बकरियों से ही बातें करती,बकरियों को ही डाँटती पुचकारती।

हवेली के मालिक हवेली बेचना चाहते थे पर भूत के डर के मारे कोई खरीदार ही नहीं मिलता। लेकिन कुछ दिनों बाद एक सुलझे विचारों वाले,नेक इंसान जरूरत मन्द ने वह हवेली खरीद ही ली। उन्होंने सबसे पहले आँगन को साफ सुथरा कराया। बैठक,दालान, कमरों की मरम्मत करवाई और उसे रहने योग्य बना लिया। बुढ़िया का आवास मकान के विशाल आँगन के बीचोंबीच होने के कारण उन्हें असुविधाजनक लगा सो उन्होंने बुढ़िया से आग्रह किया कि वह उसी हवेली में उत्तर की तरफ के छोटे आँगन वाले एक कमरे में रहने लगे। पर बुढ़िया तैयार नहीं हुई,उसका कहना था कि यह कमरा मेरा है और मैं तो इसी में रहूँगी। उन्होंने अनुभव किया कि बुढ़िया का इस हवेली से तो भावात्मक लगाव हो सकता है पर कमरे से कोई भावात्मक लगाव नहीं है। एक दिन बुढ़िया बकरियाँ चराने गई तो उन्होंने हवेली के विक्रेता और एक दो और लोगों की उपस्थिति में वह कमरा तुड़वा दिया और बुढ़िया का सामान नए अपेक्षाकृत बड़े,साफ-सुथरे सुविधा सम्पन्न कमरे में रखवा दिया और उसी कमरे से जुड़े आँगन में बकरियाँ बाँधने की व्यवस्था कर दी। बुढ़िया के आते ही उन्होंने उसे समझा-बुझा कर नए कमरे में भेज दिया। बुढ़िया खुशी-खुशी रहने लगी।

यह कहना सही ही है कि संसार में बहुतेरे लोग अपने दुख से कम,दूसरों के सुख से अधिक दुखी हैं। यह यहाँ चरितार्थ हुआ। हवेली की अच्छी स्थिति,वाजिब विक्रय मूल्य के कारण जो लोग हवेली खरीदने के लिए लार तो टपकाते रहते थे पर भूत के भय के मारे वह हवेली नहीं खरीद पा रहे थे;अब दूसरे ने जब हवेली खरीद कर उसे रहने योग्य बना लिया तो ऐसे लोगों को ईर्ष्या का कीड़ा काटने लगा।

इसका भी पता तब चला जब एक दिन  स्थानीय परगनाधिकारी के निरीक्षण के समय उनके सामने वह बुढ़िया हाथ जोड़े खड़ी दिखाई  दी।

"क्या परेशानी है अम्मा?"

(अपनी भाषा में) "साब, फलाँ  साहब ने मेरा कमरा तोड़ दिया है और मुझे अपने इस दूसरे कमरे में भेज दिया है। "

"तो अम्मा,आपका यह कमरा, आँगन अच्छा,साफ-सुथरा है। इसमें आपको क्या परेशानी है?"

(अपनी भाषा में) "साब, और तौ सब ठीक है पर उस कमरे का दरवाजा नीचा था जबकि इसका ऊँचा है सो निकलते समय मेरे सिर में टकरा जाता है। "

(एक समवेत हँसी का स्वर)

"ठीक है; दरवाजा नीचा करवा देंगे,फिर आपके सिर में नहीं लगा करेगा। "

परगनाधिकारी भीड़ की तरफ मुखातिब होकर कहते हैं, वाह भाई वाह विघ्नसंतोषियों !कमाल यह कि ये बरगलाने वाले बेचारी को ठीक से पट्टी भी नहीं पढ़ा पाए।

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         (3)  * सुयश *

               - डॉ आर बी भण्डारकर.

बात उस समय की है जब आज की तरह व्हाट्सएप्प ग्रुप नहीं हुआ करते थे।

एक मित्र मंडली थी। उसमें खूब सारे भागीदार। खूब सारे ,तो तरह तरह के मिजाज के लोग। एक बात में सब एक जैसे।

सब एक जैसे ? भई ऐसी बात कौन सी है ?

परनिंदा।

एक बार चमत्कार हो गया। शाम को सब स्कूल के बाहर के चबूतरे पर बैठ कर गपशप कर रहे थे। गप्प यानी अंतहीन वार्ता;जिसका न ओर(आदि) होता है न छोर(अंत)। बात स्थानीय चर्चा से शुरू हुई। युवाओं की कमियाँ फिर आस-पास के कुछ पुरुषों, महिलाओं की बुराइयाँ फिर कर्मचारियों, अधिकारियों, मंत्रियों की कमियाँ ,फिर रूस, चीन, अमेरिका, इंग्लैंड और न जाने कौन कौन देश के रीति-रिवाजों, नीतियों, योजनाओं की खामियाँ।

सुयश का प्रवेश। आते ही-भाइयो ! हम दूसरों की कमियाँ, बुराइयाँ गिनाने में अपना वक्त जाया करने की बजाय यदि कुछ सार्थक, प्रेरक, लोकहित कारी चर्चा करें तो कैसा रहे?

सब सुयश का मुँह ताकने लगते हैं।

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