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कहानी “ऊंची सोसाइटी की पहली सीढ़ी” राक़िम दिनेश चन्द्र पुरोहित

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कई दफ़े उन लोगों की काठ की हंडिया आग पर चढ़ जाती है, और पका देती है खिचड़ी ! और, उनका कोई बाल बांका नहीं होता ? आज़कल ऐसे शातिर लोगों का ही ज़मा...

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कई दफ़े उन लोगों की काठ की हंडिया आग पर चढ़ जाती है, और पका देती है खिचड़ी ! और, उनका कोई बाल बांका नहीं होता ? आज़कल ऐसे शातिर लोगों का ही ज़माना है, जो अपनी हथेली पर उगा देते हैं सरसों ! ऐसे वक़्त, ख़ुदा भी अपनी आँखें मूंद लेता है ! अब बात ही कुछ ऐसी है, दाऊद मियां को आज़कल ऐसे शातिरों की बिछाई कालीन की बख़िया उधेड़ना अच्छा लगने लगा है !

आज़कल दाऊद मियां सरकारी सेकेंडरी स्कूल में, कार्यालय सहायक यानी एलकारे आज़म के ओहदे पर काम करते हैं ! जनाब ठहरे क़िस्मत वाले, एल.डी.सी. के ओहदे से तरक्की पाते-पाते इस एजुकेशन महकमें में एलकारे आज़म बन गए ! जनाब को दफ़्तरे निग़ार के काम का तुजुर्बा भले न रहा हो, मगर जनाब को चाणक्य की तरह स्कूल में दबिस्तान-ए-सियासत चलाने का अच्छा-ख़ासा तुजुर्बा रहा है ! इस ‘दबिस्तान-ए-सियासत’ के शतरंज के सियासती खेल में इनके प्यादे भी, कई बार सामने वाले रागिब के बादशाह को मात दे दिया करते ! इस दबिस्तान-ए-सियासत को चलाते-चलाते इनको एक सीख मिल गयी, “यह ख़िलक़त जैसा चलता है, उसे वैसे ही चलने दो ! अगर देण की तो, तक़लीफ़ पाओगे ! यानी देण नहीं करनी, यह ख़िलक़त तो ऐसे ही चलता रहेगा ! यह सब, परवरदिगार के इशारों से चलता है ! इनका मानना है कि,सरकारी महकमों में गेले-घूंगे बनकर ही रहना अच्छा है ! जो अमन और आराम से, रहने की पहली सीख है ! कोई आपको काम करने का कहे तो आप मीठे अलफ़ाज़ में यही कहिये कि, ‘हुज़ूर, मुझे आता नहीं यह काम करना !’ बस सामने वाले अफ़सर को, आप यही जतलाएंगे कि, ‘अगर आप से काम करवाया जायेग़ा, तो सौंपे गए काम का बिगड़ना सौ फीसदी सही है !’ क्योंकि आप तो ठहरे, सरकारी दामाद ! सरकारी नौकरी तो जाने से रही, रिटायर होने तक आपको बेदख़ल नहीं किया जा सकता ! काम चाहे कुछ मत करो, मगर महीने की एक तारीख़ को तनख़्वाह गिनकर लेने में ही होश्यारी है ! आज़कल इन सरकारी महकमों में, गुज़रे वक़्त के दानिशमंद मलूक दासजी के उसूलों पर चलना ही आपकी समझदारी है ! उनका कहना था कि, ‘अज़गर करे न चाकरी, पंछी करे न काम ! दास मलूका कह गए, सबके दाता राम !’

यह अक्सर देखा गया है, सरकारी महकमों में काम करने वालों का काम बढ़ा दिया जाता है ! और काम नहीं करने वालों को, कुछ भी नहीं कहा जाता ! अगर ऐसे अकर्मण्य कार्मिकों की तनख़्वाह रोक दी जाय, तो ये लोग सीधे ज़िला कलेक्टर के सामने हाज़िर हो जायेंगे ! फिर तनख़्वाह रोकने वाले की शिकायत करके, वे उस अफ़सर के खिलाफ़ ज़िला कलेक्टर का नोटिस भिजवाकर ही दम लेंगे ! अगर मियां आपको वसूक न हो तो आप किसी भी मुसाहिब से बात करके देख लीजिएगा, वह भी ऐसे कार्मिक का पक्ष लेते हुए यही कहेगा कि, “कार्मिक के बीबी-बच्चे भूखे न मर जाय, इसलिए उसे तनख़्वाह वक़्त पर दिलवाना सरकार का फ़र्ज़ है !” यही मानस बना रहता है, इन सियासत चलाने वालों का !

इस मौहाल में कई सरकारी अफ़सरों व नेताओं के रिश्तेदार, इन सरकारी महकमों में सवाब [पुण्य] की खाते हैं ! जिनमें कई तो अपने महकमें पर इतने मेहरबान हैं, जो कभी-कभी दफ़्तर में तशरीफ़ रखने का अहसान करते हैं ! उस वक़्त वे हाज़री रजिस्टर में पूरे हफ़्ता या पूरे महीने के दस्तख़त, एक साथ करके वापस चले जाते हैं ! कई तो ऐसे भी ख़ुशनसीब है, जिनके घर हाज़री रजिस्टर भेजकर उनके दस्तख़त ले लिए जाते हैं ! ऐसे इंसान ही, असल में सरकारी दामाद कहलाने की क़ाबिलियत रखते हैं ! अब बात करें, दाऊद मियां के स्कूल की ! इस स्कूल में मृत राज्य कर्मचारी के कोटे में आये जनाब जमाल मियां भी, दाऊद मियां की नज़रों में सरकारी दामाद कहलाने के क़ाबिल है !

आख़िर ये जमाल मियां है, कौन ? ये जनाब, मास्टर निहाल अली के नेक दख़्तर ठहरे ! इंशाअल्लाह, जब मास्टरजी का इन्तिकाल हुआ, तब इनके भाग्य का छींका टूटा और ये पाली की सरकारी बांगड़ सीनियर हायर सेकेंडरी स्कूल में पा गए एल.डी.सी. यानी छोटे दफ़्तरेनिग़ार की नौकरी ! फिर तबादला होकर आ गए मिल क्षेत्र की लड़कियों की सेकेंडरी स्कूल में, जहां दाऊद मियां पहले से काम करते हैं ! यह एल.डी.सी. का ओहदा, जनाब को क़ाबिलियत के तौर पर तो मिलने से रहा ! इन्होने, दसवी पास क्या की ? यह कहिये कि, कोपी जांचने वाले ने इन पर मेहरबानी कर दी कि “बेचारा हर साल देता है इम्तिहान, और हो जाता है फ़ैल..फिर भी इम्तिहान देते थकता नहीं ! बेचारे को पास कर दें, तो अल्लाह मियां शायद हमें जन्नत में आला मुक़ाम नसीब कर दे..?” सभी जानते हैं कि, मियां के लिखे हर्फ़ तो “लिखे मूसा, पढ़े ख़ुदा” के माफ़िक ठहरे ! मगर जब अल्लाह मेहरबान, तो फिर गधा भी पहलवान ! बस, फिर क्या ? ख़ुशक़िस्मत थे जमाल मियां, तभी तो दसवी पास करते ही इनके अब्बू हो गए अल्लाह के प्यारे ! फिर क्या ? अल्लाह के फ़ज़लो करम से जनाब मृत राज्य कर्मचारी के कोटे से पा गए नौकरी, और उनके पड़ोसी पा गए निज़ात इनकी शैतानी हरक़तों से ! कोई मुसाहिब जनाब से पहली बार मिलता, तब जनाब उससे ऐसी लच्छेदार बातें करके उसको अपना मुरीद बना दिया करते कि, बस उस वक़्त उसके दिमाग़ में यही ख़्याल रहता ‘इस ख़िलक़त में जमाल मियां के सिवाय, कोई गफ़्फ़ार इंसान नहीं हो सकता ! मगर मियां से ताल्लुक़ात बढ़ते ही, जमाल मियां की असलियत सामने आ जाया करती ! फिर ख़ुदा जाने, बेचारे मुअज़्जम के साथ वे ऐसी हरक़तें कर बैठते ‘जिसे देखकर ख़ुद शैतान, अपने मुंह में अचरच से अंगुली डाल बैठे..?’ बस यही हाल रहा, दाऊद मियां का ! उन्होंने पहली मुलाक़ात में समझ लिया इनको, अल्लाह मियां की गाय ! मगर ये तो निकले, बोतल से निकले शैतान ख़बीस ! जिनको काबू में रखना, दाऊद मियां के हाथ में कहाँ ? फिर क्या ? आदतों से मज़बूर जमाल मियां ने, गफ़्फ़ार सरीखे दाऊद मियां की शांत ज़िंदगी में मचा दी उथल-पुथल !

जनाब की शैतानी हरक़तों पर, रोशनी डालना बेहतर होगा ! नौकरी पाकर जमाल मियां हो गए, बहुत ख़ुश ! सोचने लगे, “चलो अच्छा हुआ, अब तो पढ़ाई से पिंड छूटा ! अब तो हम करेंगे, ऐश” यह सोचकर, जनाब इठलाने लगे ! गली मोहल्ले वालों ने सोचा, कि ‘चलो अच्छा हुआ, अब तो इसकी शैतानी हरक़तों से पा जायेंगे निज़ात ! कम से कम यह शैतान सुधर गया तो हम, अमन और चैन से तो रह पायेंगे !’ मगर जमाल मियां तो इन पड़ोसियों के लिए इतने बड़े शैतान निकले, जिनकी एक-एक हरक़त उनके दिल में अब भी शूल की तरह चुभा करती है ! कभी-कभी ये जनाब पड़ोसियों के बिजली के मीटर और मेनस्वीच में कारीगरी करके आ जाया करते, और फिर इन बेचारों को बिजली की सुविधा से मरहूम कर देते ! शिकायत होने पर लाइन मेन आता, तब वह यही कहता कि, ‘लाईट खम्बे से नहीं गयी, घर के कनेक्शन से गई है !’ फिर क्या ? बेचारे पड़ोसियों को रुपये जुटाकर, लाइनमेन को मेहनताना चुकाना पड़ता है ! तब कहीं जाकर, उनके घरों में बिजली आती थी ! फिर, जमाल मियां पड़ोसियों उतारे चहरों को देखकर वे ख़िलखिलाकर हंस पड़ते ! इसके बाद वे गली के बाहर जाकर, उस लाइन मेन से अपना कमीशन हासिल कर लेते !

एक दिन ऐसा हुआ, उनके पड़ोसी नूर मियां अपने घर की मुंडेर पर बैठे-बैठे सर और रीश के सफ़ेद बालों को रंगने के लिए हीना तैयार कर रहे थे ! कहते हैं, “दीनदार मोमिनों को शरियत के तहत, इन बालों को हीना से ही रंगा जाना चाहिए !” यही कारण है बेचारे नूर मियां जुक़ाम इतने से परेशान होने के बाद भी, हीना की जगह डाई न लगायी ! दूसरा यह भी कारण है, सफ़ेद बालों को देखकर उनकी बेग़म कई दफ़े उन्हें उलाहना दे चुकी है कि, “हाय अल्लाह ! किस बूढ़े के साथ मेरा निकाह हो गया...? बीस बार कहा, मियां खिजाब लगा लो इन चांदी जैसे बालों पर..तब कहीं जाकर इनको अक्ल आयी, ख़िज़ाब लगाने की ! मगर, मियां तो ठहरे बेउसूल, यहीं बैठ गए हीना का मसाला लिए इस दालान में..! हाय अल्लाह, मेरी तो कोई इज़्ज़त ही नहीं इस घर में ? अभी कोई बाहर से मेहमान आ गए तो, ये जनाब.....?” बस इसी मुसीबत से छुटकारा पाने की नीयत से मियां, छत्त पर बैठे हीना तैयार कर रहे थे ! मगर, यहाँ तो जुकाम के मारे मियां की नाक ने हीना की गंध को पहचानना बंद कर दिया ! तभी एक क्रिकेट की बॉल तेज़ी से आकर इनके सर पर चांदमारी कर बैठी ! अब बेचारे नूर मियां, दर्द से कराह उठे ! और चीखकर, कहने लगे “कौन है रे, नामाकूल ?”

“चच्चाजान, मैं हूं जमाल ! निहाल अली साहब का, नेक दख़्तर ! क्रिकेट की बॉल, ज़रा हाथ से फिसल गयी चच्चा !” इतना कहकर, जमाल मियां अपनी छत्त से कूदकर आ गए नूर साहब की छत्त पर..अपनी बॉल उठाने !

“साहबज़ादे, फिसल गयी या कद्दू समझकर फेंक दी इधर ? अरे मियां ज़रा ख़्याल रखो...” चाय की पत्ती का उबला पानी अब ठंडा हो चुका था, उसमें हीना में मिलाते हुए नूर मियां ने आगे कहा !

उधर जमाल मियां की अम्मीजान तो, जमाल मियां से एक क़दम आगे रही..? वह मोहतरमा क्यों देखेगी आगे, या पीछे..? छत्त पर खड़ी उस मोहतरमा ने तो झट, उंडेल दिया ख़ाकदान ! इधर हवा का तेज़ झोंका आया, और कचरा उड़कर आ गया इधर...जहां नूर मियां बैठे-बैठे, खिजाब तैयार कर रहे थे ! ख़ुदा की पनाह, यह क्या हो गया ? हाय ख़ुदा इस बेरहम कचरे की खंक ने तो, नूर मियां की बंद नाक को खोल डाला ! फिर क्या ? वे बेचारे छींकते-छींकते हो गए, परेशान ! किसी तरह इन छींकों पर काबू पाकर, उनको नाक पर रुमाल रखते हुए कहना पड़ा कि, “अरी मोहतरमा मैं तो पहले से जुकाम से बेहाल हूं, अब तू यह कचरा डालकर मेरी जान निकालना चाहती है ? या ख़ुदा ! जैसा यह लौंडा है नालायक, वैसी ही है इसकी अम्मीजान !”

मगर जमाल मियां को क्या लेना-देना, नूर मियां की तबीयत से ? उन्होंने तो झट बॉल उठाया और अपनी छत्त पर उसे सहेजकर रख आये वापस, नूर मियां के पास ! फिर चहकते हुए कहने लेगे कि, “चच्चाजान ! जाइए सीढ़ियां उतरकर, डाकिया बुला रहा है..शायद शबनम के ससुराल से ख़त आया होगा ?”

“वज़ा फ़रमाया, साहबज़ादे ! शबनम का पाँव भारी था, हो सकता है ख़ानदान का चिराग़ रोशन हुआ हो ?” इतना कहकर नूर मियां तैयार हीना के प्याले को वहीँ छत्त पर छोड़ दिया, और ख़ुद चल दिए सीढ़ियां उतरने !

शबनम के ज़िक्र से, जमाल मियां की आँखों के सामने शबनम का भोला चेहरा छा गया ! शबनम ज़्यादा नहीं, बस दो साल जमाल मियां से बड़ी थी ! उस वक़्त जमाल मियां रहे होंगे, क़रीब सौलह या सत्रह साल के ! इनको शबनम के साथ घंटों बातें करना, उसके साथ कभी ताश खेलना तो कभी शतरंज खेलना...उनको बहुत अच्छा लगता था ! खेल-खेल में, वे शबनम की हथेली दबा दिया करते ! इससे, उनका पूरा शरीर रोमांचित हो जाता ! एक दिन तो मियां ने हद कर दी, उन्होंने कह दिया “ख़ुदा करे, तुम्हारी डोली उठकर सीधी हमारे घर आ जाए !” तब मज़हाक़-मज़हाक़ में शबनम ने कह दिया “फिर छोटे मियां आपकी शैतानियाँ ख़त्म हो जायेगी, फिर तो जनाब रोज़ खायेंगे हमारे बेलन की मार !” मगर मियां ने नहले पर दहला मार दिया, और कह बैठे “हसीन मोहतरमा के हाथ से बेलन क्या ? मोहब्बत के लिए खंज़र खाना पड़े, तो भी हमें मंज़ूर है !”

मगर, एक तरफ़ा मोहब्बत का ख़्वाब पूरा नहीं हुआ ! उनकी बढ़ती इश्क की हरक़तों पर, नूर मियां ने बराबर नज़र रखी ! एक दिन आगरे के नवाब ख़ानदान से रिश्ता आने पर, उन्होंने शबनम का रिश्ता तय कर दिया ! जमाल मियां की आँखों के सामने, शबनम की डोली उठ गयी ! रुख़्सत के वक़्त, जमाल मियां की आँखों से अश्क निकलकर रुख़सारों पर बहने लगे ! ज़ख्म खाए दिल को थामते हुए, वे शबनम को ससुराल जाते बेबसी में देखते रहे ! मगर, उनमें कर-गुज़रने की हिम्मत नहीं रही ! इस सूने-सूने हयात का दोष, उन्होंने नूर मियां पर मंड दिया ! हौंसला न था मियां में, सामने आकर कुछ कहने का ! बस, बेहयाई से बदहवासी में आकर, उनसे बदला लेने के हयासोज़ तरीक़ों पर अपना दिमाग़ ख़पाने लगे ! कैसे बदला लें, इस आदमी से ? जिसने बेरहमी से, उनके इश्क को ख़ारोख़स समझकर कुचल डाला ! अब तो वे हर पल, उनसे बदला लेने के लिए मौक़े की फ़िराक़ में रहने लगे ! क़िस्मत ने उनका साथ दिया, आज़ उनको बदला लेने का मौक़ा मिल गया ! नूर मियां को सीढ़ियां उतरते देख, वे झट जाकर हीना के प्याले को उठा लाये ! फिर उस हीना को नाली में उंडेलकर पड़ोस के तबेले में जाकर, वहां से भैंस का गोबर उस प्याले में भरकर ले आये ! फिर उस प्याले को उसी स्थान पर रख दिया, जहां पहले रखा था ! शैतानी हरक़त को अंजाम देकर, वे चुपचाप रुख़सत हो गए...अपने इस कारनामें का, अंजाम देखने के लिए !

कुछ देर बाद, नूर मियां दालान में चहलक़दमी कर रहे थे ! मेहमानों के आने की फ़िक्र में डूबे नूर मियां कभी तो जाते दरवाज़े के पास उन्हें देखने, तो कभी जाते आईने के पास...यह देखने कि, बालों पर मेहंदी अच्छी तरह से लगी या नहीं ? तभी उनकी छोटी बेटी हमीदा सूंघती-सूंघती उनके पास जा पहुँची, और कहने लगी नाक-भौं सिकोड़कर “बदबू आ रही है, अब्बा !” सुनकर, नूर मियां बोले तपाक से “बेटा, तेरा नाक ख़राब है ! यहाँ कोई बदबू नहीं है. यह तेरा वहम है !”

मगर हमीदा को, कहाँ भरोसा ? वह उनके और नज़दीक आ गयी, फिर नाक को पल्लू से ढाम्पते हुए उसने कहना चाहा..मगर नूर मियां ने, उसको एक शब्द बोलने नहीं दिया ! और चिल्ला-चिल्लाकर कह बैठे “क्या देख रही हो, हमीदा ? क्या तूने किसी शख़्स के बालों में, हीना लगी हुई देखी नहीं ? असली ख़ालिस हीना है, बेटी ! तेरे हाफ़िज़ चाचा ने, सोजत से लाकर दी है ! यह उम्दा क़िस्म की मेहंदी है, बेटा ! जब तेरा निकाह होगा, तब मैं ऐसी ही मेहंदी सोजत से मंगवाऊंग़ा !”

तभी बावर्ची ख़ाने से बेग़म की पुकार सुनायी दी, वह कह रही थी “हमीदा, देख बेटा ! घर में कोई जानवर टट्टी-पेशाब करके, चला गया क्या ?” इतना सुनते ही नूर मियां का गुस्सा फूट पड़ा, वे चिल्लाकर कहने लगे “इलाज़ करा लो मां-बेटी अपनी नाक का, किसी ख़ानदानी हक़ीम से ! कभी बेटी को आती है बदबू, तो कभी उसकी अम्मीजान को !“

शाहिदा बेग़म उनके नज़दीक आकर, कहने लगी “शब्बू के अब्बा ! सुबह से, यह क्या हुलिया लिए घूम रहे हो ? जिधर से गुज़रते हो, वहां बदबू आने लगती है ! ख़ुदा की पनाह, अब यह बदबू बर्दाश्त नहीं होती ! क्या कहूं, आपसे ? इस बदबू के कारण मेरा सर फटा जा रहा है ! पहले तो मियां सफ़ेद बाल लिए घूम रहे थे, ज़्यादा कहने पर लगा आये बदबूदार मेहंदी ? या ख़ुदा, तू मेरे शौहर को थोड़ी अक्ल देना..ताकि, वे गंध को पहचान सके !”

तभी किसी के क़दमों की आहट सुनायी दी, थोड़ी देर में ही दालान का दरवाज़ा खोलकर हाफ़िज़ मियां अन्दर तशरीफ़ लाये ! और अन्दर दाख़िल होते ही, उन्होंने शाहिदा बेग़म से चहकते हुए कहा “भाभी जान, क्यों ख़ुदा को याद कर रही हैं आप ? क्या हो गया है, हमारे भाईजान को ?” इतना कहकर, हाफ़िज़ मियां नूर मियां के क़रीब आ गए, फिर सूंघते हुए कहने लगे “अरे भाईजान, कहीं मैं भैंसों के तबेले में तो नहीं आ गया ? या ख़ुदा, आपने यह क्या लगा रखा है, अपनी रीश में ? बहुत बदबू आ रही है, भाईजान !

हाफ़िज़ मियां आगे कुछ कह ही रहे थे, उसी वक़्त गली में शोर मचा..! गली में हीज़ड़े दाख़िल हो गए, जमाल मियां उनको नूर मियां के घर का रास्ता दिखलाते हुए वहां दालान में ले आये ! हीज़ड़े देने लगे ताल, और नूर मियां को चारों ओर झूम-झूमकर नाचने लगे ! और साथ में कहते जा रहे थे “बख़्सीस, नवाब साहब ! नाती हुआ है ! ख़ानदान-ए-चिराग़ रोशन हुआ है, अन्नदाता !” तभी हीज़डों का मुखिया, आ पहुंचा नूर मियां के क़रीब ! और, उनके रुख़सारों पर हाथ फेरने लगा ! जैसे ही उसके हाथ उनकी रीश पर गए, और वह चीखने लगा “ दय्या री दय्या ! इस रीश पर गोबर क्यों लीप डाला, हुज़ूर ? खुशी का मौक़ा है ! गुलाल मलते, आप नाना बने हैं हुज़ूर !”

नूर मियां को था, जुकाम..उन्हें क्या मालुम ? वे बेचारे, गंध पहचान नहीं पा रहे थे ? उन्हें क्या मालुम कि, रुख़सारों पर जो रीश सफ़ेद थी, उसे उन्होंने मेहंदी की जगह गोबर से लीप डाला ? गोबर और हीना का रंग एक ही होता है, और बेचारे मियां को गंध का पत्ता नहीं..इस कारण हीना को जगह, गोबर बालों पर लगा आये..? अब इतने लोगों के कहने के बाद, उन्हें वसूक हो गया कि, “हीना की जगह, किसी शैतान ने भैंस का गोबर प्याले में डाल दिया ?” अब बेचारे मियां आब-आब हो गए, उनको इतनी शर्म आयी कि बेचारे झट बाथ-रूम की ओर क़दम बढ़ाने चाहे...ताकि, वे अपने सर और रीश के बालों को धोकर वापस आ सके ! मगर, कहाँ ऐसी क़िस्मत उनकी ? यहाँ तो मियां पूरी तरह से घिर गए थे, इन हीज़ड़ों से ! अब कैसे जाए मियां, बाथ-रूम में ? तब मियां ने आव देखा, न ताव..झट अपने सर और रीश के बाल पोंछ डाले, इन हीज़ड़ों के ओढ़नों से !

अब आप छोड़िये इस दास्तान को, यहाँ तो हमारे जमाल मियां का दूसरा शौक रहा..लोगों को आपस में लड़ाना ! कहते हैं, अवध के नवाब लड़ाते थे मुर्गे और शहीद हो जाते थे शतरंज के प्यादों को बचाने ! यहाँ तो जमाल मियां भी ठहरे नवाब ख़ानदान के, फिर वे कम क्यों इन अवधी नवाबों से ? ये तो इनसे चार क़दम आगे, यानी वे तो ठहरे इन नवाबों के उस्ताद ! जनाब तो मुर्गों की जगह नामाकूल इंसानों को, आपस में लड़ाकर अपना शौक पूरा कर लिया करते ! फिर मोहल्ले के चबूतरे पर बैठकर, मोहल्ले के शैतान बच्चों को इकठ्ठा करके उन्हें अपने कारनामों के किस्से सुनाया करते ! इस तरह वे अगली आने वाली पीढ़ी को तालीम देकर, शैतानों की फ़ेहरिस्त में उनका नाम जोड़ने का काम करके अपना फ़र्ज़ निभाया करते ! एक दिन हुज़ूर जा पहुंचे, हाफ़िज़ मियां के दीवानख़ाने ! हाफ़िज़ मियां ठहरे, अल्लाह मियां की गाय सरीखे ! अल्लाह की रहमत से उनके पास सोजत में कई बीघा मेहंदी के खेत की ज़मीन थी, जिस पर वे हर साल उम्दा मेहंदी की फ़सल लिया करते ! फ़सल उठने पर, वे मोहल्ले के हर घर में एक-एक किलो मेहंदी मुफ़्त में बांटा करते ! हर ग़रीब व महजून मोमीन की मदद के लिए, वे हर वक़्त तैयार रहते ! जिस वक़्त जमाल मियां उनके दीवानख़ाने पहुंचे, उस वक़्त हाफ़िज़ मियां अल्लाह रसूल के पाक कलाम की माला जप रहे थे ! जमाल मियां के आते ही तख़्त पर बैठे हाफ़िज़ मियां ने, माला एक तरफ़ रख दी ! फिर, जमाल मियां से कह बैठे “आओ साहबज़ादे ! आज़ कैसे याद आ गए, चचाजान ?”

सलाम करने के बाद पास रखी चौकी पर बैठते हुए जमाल मियां कह बैठे कि, “चाचा, आपके बराबर इस मोहल्ले में कोई दीनदार मोमीन न होगा ! दस्तरख़्वान पर बैठते अब्बाजान हमेशा आपको याद किया करते थे ! वे कहा करते, अगर सालीखा सिखना है तो हाफ़िज़ मियां से सीखिए ! उनसे सीख लिया, तो सब-कुछ सीख लिया !” अपनी तारीफ़ सुनकर, हाफ़िज़ मियां ख़ुश हो गए...फिर मुस्कराते हुए, कहने लगे “अल्लाहताआला की रहमत है बेटा, मैं चाहता हूं क़ुरान शरीफ़ में दिखलाये गए क़ायदों को अमल करो..फिर, शैतान क्या ? शैतान की ख़ाला भी, आपका बाल बांका नहीं कर सकती ! बस बेटा, आप एक आदत डाल दीजिये..आप, रोज़ाना पांच वक़्त की नमाज़ पढ़ा करें !” हाफ़िज़ मियां को लगने लगा...आज़ अच्छा शागिर्द मिला, बस फिर क्या ? सारी रूहानी पोथियों का इल्म उन्डेलने को तैयार हो गए ! मगर, उनको क्या मालुम ? इस साहबज़ादे की आँखें, पड़ोस की मुंडेर पर खड़ी हसीन मोहतरमा रुख़साना का रुयत कर रही थी ! जनाब की इल्तज़ा थी कि, ‘वे आज़ तो इस हसीना से, आँखें लड़ाकर ही यहाँ से रुख़्सत होंगे !’ यह हसीना ठहरी, शबनम की सहेली ! जो इस वक़्त, अपने मकान की छत्त पर खड़ी अपने गीले बाल सूखा रही थी ! कुछ ही पलों बाद, उनकी आँखें हसीना की आँखों से जा मिली ! नज़र मिलते आते ही, उन्होंने दिखला दिया अपनी आँखों का कमाल ! फिर क्या ? रुख़साना के रुख़सार, शर्म के मारे लाल हो गए ! तब हुज़ूर ने अँगुलियों के इशारों से, मुलाक़ात का वक़्त और जगह बता दी ! बेचारे हाफ़िज़ मियां तो ठहरे, गफ़्फ़ूर ! उन्हें, क्या पत्ता ? उनका क़ाबिल शागिर्द, क्या गुल खिला रहा था ? वे तो बेचारे, इल्म का बखान करते जा रहे थे ! काम हो जाने केबाद, जमाल मियां उठे..और, रुख़्सत होने की इज़ाज़त चाही ! अब हाफ़िज़ मियां, कहने लगे “बेटा, अब क्या कहूं तुम्हें ? बिना किसी काम, तुम हमारे दीवान ख़ाने कभी आया नहीं करते..क्या, मेहंदी की पुड़िया लेने आये हो, साहबज़ादे ?” तब जमाल मियां मुस्कराकर, कह उठे “चच्चा रहने दीजिये, मैं कहाँ बूढ़ा हो गाया..जो मुझे, अपने बाल रंगने हैं ? आया ज़रूर था, काम से ! मगर, आपसे कहूं कैसे ? कहने में सकोंच आता है, मगर.. “

अब हाफ़िज़ मियां को पान खाने की तलब होती है, वे झट पास रखी पान की डब्बी से एक पान की गिलोरी उठाते हैं ! फिर, उसे अपने मुंह में ठूंसते हैं ! पान की गिलोरी को मुंह में ठूंसकर, हाफ़िज़ मियां ने आगे कहां “क्या कहते हो, बेटा ? ख़ुदा ने रहमत बख़्सी है, नेकी करने के लिए ! बोलो बेटा, तुम क्या चाहते हो ?” अब जमाल मियां शैतानी हरक़त को अंजाम देने के लिए, अपना दिमाद दौड़ाने लगे ! फिर, बरबस बोल उठे “आप ऐसा ही चाहते हैं तो सुन लीजिये, चच्चा ! मगर, यह काम आपसे होगा नहीं ! बात यह है कि, नीम की हवेली वालों के हालात आपसे छिपे नहीं है ! मरहूम नवाब सदाकत अली साहब की नेक बेवा रोशन आरा, आपसे मदद चाहती है ! इस पीरजाल मोहतरमा के बच्चों ने, कोठों पर जाकर सारे रुपये-पैसे तवायफ़ों पर उड़ा दिए ! यहाँ तक कि, उन्होंने अपनी ऐयाशी के लिए अपने ख़ानदान की हवेली को भी गिरवी रख डाला ! अब कल चाँद के रोज़, सदाकत साहब की बरसी है ! उनको यतीमों को खाना खिलाना है, हुज़ूर ! मगर इनके पास पैसे है, कहाँ ? वह चाहती है ‘अल्लाह के नेक बन्दों से कुछ रुपये-पैसों का इंतज़ाम हो जाता तो, हवेली के क़ायदे-क़ानून महफ़ूज़ रह जाते !’ बस मुझसे उनके ये हाल देखे न गए, ख़ुदा के रहमो-करम से आपका नाम बता आया ! गुस्ताख़ी के लिए माफ़ करना, हुज़ूर ! इतना कहकर जमाल मियां उनका चेहरा पढ़ने लगे, फिर आगे कहने लगे “बस आज़ सूरज ढलने के बाद वह पाक बेवा, स्कूल के पास खड़े मऊवे के पेड़ के तले आपका इन्तिज़ार करेगी, बस पांच हज़ार रुपयों की ज़रूरत है ! बंदोबस्त न हो तो चच्चा, रहने दीजिये ! मना कर आऊंगा, वह बेचारी पीरजाल समझ लेगी...अल्लाह मियां को यह मंज़ूर नहीं, बस यह बच्चा बेहूदी बकवास करने चला आया था !” जमाल मियां से सारी गाथा सुनकर, हाफ़िज़ मियां बोल पड़े “ख़ुदा ने ये दो हाथ दिए हैं, ज़रुरतमंदों की मदद के लिए ! ये मौक़े, ख़ुदा के फ़ज़लो करम से मिलते हैं..साहबज़ादे ! आप यह नेक काम कर दीजिये हमारा, अब आप उस मोहतरमा को इतला कर दीजिये कि ‘हाफ़िज़ मियां सही वक़्त और मुकर्रर जगह पर, पैसे दे जायेंगे !”

काम बन गया, और जमाल मियां हो गए ख़ुश ! अब उनका, यहाँ रुकने का क्या काम ? झट जमाल मियां ने सलाम किया, और कह दिया “आदाब चच्चा जान ! अब जाने की इज़ाज़त चाहता हूं !” फिर क्या ? मियां चल दिए, शैतानी हरक़त को अंजाम देने !

अँधेरा हो गया, वैसे भी हाफ़िज़ मियां को अँधेरे में कम नज़र आता है ! जैसे ही वे उस मऊवे के पेड़ के क़रीब गए, उसी वक़्त अनजान जनानी ख़ूबसूरत बला आकर उनसे लिपट पड़ी ! अचानक हुई इस टक्कर से हाफ़िज़ मियां अपने बदन को संभाल न सके, उस मोहतरमा को लिए वे धड़ाम से ज़मीन पर गिर पड़े ! फिर क्या ? हाथ में थामे नोटों के बण्डल, ज़मीन पर बिखर गए ! तभी टोर्च की रोशनी हुई...बेचारे हाफ़िज़ मियां, चारों ओर मोहल्ले के लोगों से घिर गए !

दूसरे दिन घर-घर ख़बर फ़ैल गयी कि, ‘बुढ़ापे की बासी कढ़ी में, हाफ़िज़ मियां को जवानी का उबाल क्या आ गया ? उन्होंने मोहल्ले की एक जवान लौंडी को रुपयों के बण्डल थमाकर, उसके साथ रंगरेलियां मनानी की कोशिश कर डाली...और उसी वक़्त, मौजूदा लोगों ने उनको रंगे-हाथ पकड़ लिया !’ अब वह मुकर्रम दीनदार इंसान, मकरुर रज़ील व अय्यास माने जाने लगा ! कल तक जो मकबूले आम मफ़लक मोमिनों का मददगार समझा जाता था, आज वही इंसान...अय्यास व रज़ील काम में लिप्त इंसान का ख़िताब पा गया ! बेचारे हाफ़िज़ मियां ने कभी न सोचा था कि, भलाई करने का ऐसा भी अंजाम हो सकता है ? मुअज़्ज़म को माअयूब में बदलने की कारीगरी, शैतानी ख़्यालात रखने वाले जमाल मियां जैसे इंसान ही अपने मफ़ाद के लिए कर सकते हैं ! अब हाफ़िज़ मिया और उनके पड़ोसी रुख़साना के अब्बा के बीच, मनमुटाव बढ़ गया ! इस तरह हाफ़िज़ मियां को समझ में आ गया कि, ‘जमाल मियां ऐसे नवाब हैं, जो मुर्गों की जगह इंसानों को आपस में लड़ाकर, मनोरंजन का लुत्फ़ उठा लिया करते हैं !’ इस वाकये के बाद लोगों की कानाफूसी बढ़ती गयी, और हाफ़िज़ मियां ने दिल-ए-ज़ख़्म पाकर घर से बाहर निकलना बंद कर दिया ! यदा-कदा कभी वे बाहर निकलते, तब लोग उनको मुंह पर ही कहने लगे ‘देखो इस रंगे सियार को ! अब इस कम्बख़्त को मुग़ल्लज़ चमन कहें, या दोज़ख़ का कीड़ा ? मगर उसके दौलत-ए-मुफ़ाखिरत पर, कोई असर नहीं पड़ेगा !’ बेचारे मग़मूम हाफ़िज़ मियां के दिल की बात सुनने वाला, कोई मोमीन सामने नहीं आया !

बस इस तरह, जमाल मियां जैसा चाहते थे..वैसा ही हुआ ! आख़िर, उन्होंने मुर्गों की जगह इंसानों को लड़ाने की तरक़ीब काम कर गयी ! अब इस मामले में फ़तेह हासिल करके, वह शैतान का ख़ालू मुस्कराने लगा ! फिर क्या ? अपना अगला क़दम जमाल मियां ने बढ़ाया, झट ! फिर क्या ? अपने कपड़ों पर इरानी गुलाब का इतर छिड़ककर, चल दिए अपनी रूठी माशूका को मनाने ! बेचारी रुख़साना जिस तरह बेआबरू हुई, अब उसके दिल के घावों पर दवाई लगनी भी बहुत ज़रूरी थी !

वे इठलाते हुए नुक्कड़ तक ही पहुंचे थे, तभी किसी ने पीछे से उनके कंधे पर धोल जमा दिया ! उन्होंने पीछे मुड़कर देखा, तो सामने लाल-लाल आँखों से घूरती हुई रुख़साना नज़र आयी ! उसके बोलने के पहले ही,जमाल मियां कह उठे “देख रुख़साना, ग़लती तेरी थी..तू मऊवे के पेड़ के पास जाकर, क्यों खड़ी हुई ? तू जानती है तेरे इन्तिज़ार में तेरा यह महबूब, नीम के तले आधी रात तक नीम तले खड़ा रहा ? तूझे नीम के पेड़ के तले बुलाया था...फिर, तू गयी क्यों मऊवे के पेड़ के तले ?”

उनकी बात सुनकर, रुख़साना को लगने लगा ‘वह ग़लत थी, और उसने अपने महबूब के बारे में ग़लत सोच लिया !’ बरबस उसके मुंह से ये शब्द बाहर निकल पड़े “हाय अल्लाह ! यह तो मेरा सच्चा आशिक निकला ? मैं क्यों इससे ख़फ़ा हुई ?” फिर आगे, वह अचरच से जमाल मियां से कह बैठी “क्या तुम आधी रात-तक नीम-तले बैठे रहे, मेरी इन्तिज़ार में ? ख़ुदा रहम ! यह क्या-क्या सोच डाला, मैंने तुम्हारे लिए ? तुम तो मुझे दिल से चाहने वाले महबूब निकले, हाय अल्लाह , यह क्या हो गया ? यह ख़ता माफ़ करना, मेरे मोला !” इतना कहकर, रुख़साना जार-जार रोने लगी, कहती गयी “मुझे माफ़ कर दे, मेरे महबूब ! यह ख़ता, ख़ुदा भी माफ़ न करेगा...हाय, मेरे मोला..” इस तरह चंगुल से छूट रही महबूबा को वापस ज़ाल में फंसाकर, जमाल मियां ने अहसास दिला दिया कि, ‘वे रुख़साना से, तहेदिल से मोहब्बत करते हैं !’ रुख़साना के रुख़्सत होते ही, जमाल मियां उस हलवाई की दुकान पर चले गए..जहां कल हो रहे तमाशे के वक़्त, वे वहां खड़े-खड़े रबड़ी उड़ा रहे थे !

वक़्त बितता गया, जमाल मियां को मालुम ही न पड़ा कि, ‘कितना वक़्त, गुज़र चुका है ?’ शबनम का लाडला बेटा अब क़रीब चार साल का हो गया, इन दिनों शबनम अपने मायके आयी हुई थी ! अधिकतर छत्त पर उसका वक़्त गुज़र जाता था..कभी वह अपने लाडले को नहलाती हुई नज़र आती, और कभी सर के गीले बाल सुखाती हुई जमाल मियां को नज़र आ जाया करती ! इस तरह, उसके दीदार जमाल मियां को होते रहे ! बदक़िस्मती ठहरी जमाल मियां की, शबनम ने एक बार भी जमाल मियां की ओर देखा नहीं ! इससे मियां हो गए, ख़फ़ा ! फिर क्या ? अपनी छत्त पर शैतान दोस्तों का जमाव करके, शबनम पर छींटा कशी करने लगे ! अपने लाडले में खोयी शबनम को कहाँ फुर्सत, जो इन लोगों के ग़लीज़ जुमलों को सुनें ? वह तो अपने चाँद के टुकड़े पर, क़ायल थी ! उसे नहलाती, खिलाती तो कभी उसे पुचकारती ! बस, वह उस बच्चे की दुनिया में खो जाती !

ख़ैर एक दिन ऐसा भी आया, मियां के सितारे चमके और उनके पास ख़बर आयी रुख़सना से ! कि, शबनम मस्तान बाबा के उर्स में जा रही है ! उसके ससुराल वालों ने मन्नत रखी थी, अगर दुल्हन की गोद में चाँद सा बेटा खेलेगा तो मस्तान बाबा के मज़ार पर चादर चढ़ाएंगे और बच्चे को वहां लोटाकर यतीमों को ख़ैरात देंगे ! इस तरह मन्नत पूरी होने पर शबनम का उर्स में जाना तय, और मियां के चेहरे पर रौनक छा जाना तय ! ऐसा लग रहा था, मानों उनके लब कहना चाह रहे हों कि, ‘अब हमारी पुरानी इश्क की दुनिया में, खिलेंगे गुल !’

आख़िर, वह दिन आया ! हुस्न के दीदार की इल्तज़ा लिए, जनाब बाबा मस्तान के मज़ार से कुछ क़दम दूर पागल बाबा की छतरी के तले आकर बैठ गए ! दूर-दूर से बाबा से दुआएं माँगने हज़ारों जायरीन नंगे पाँव पैदल चलकर आ रहे थे, कोई कोई गुलाब के फूलों की चादर ला रहा था तो कोई चमेली-मोगरे के फूलों की धवल चादर ! अब तो आ गयी, खीर-बताशों की बहार ! हुज़ूर के दरबार में मत्था टेकते जायरीन, एक ही आवाज़ के साथ खड़े होकर दामन फैलाए दुआ मांग रहे थे ! मदरसे के दालान में जमी कव्वालों की टोली ने, कव्वाली “आये थे बाबा तेरे दरबार में झोली ख़ाली लेकर, जायेंगे अरमान से दुआ झोली भरकर !” साज़ के साथ शुरू कर दी ! उधर बुर्कानशीं मोहतरमाएं अपने चेहरे की जाली हटाती हुई, आसमान के बादलों से निकले चाँद की तरह अपने ख़ूबसूरत चेहरे के दीदार देने लगी...कहीं उनका महबूब, नज़र आ जाय..इन्तिज़ार करते ? इधर इन्तिज़ार करते-करते, मियां जमाल का हाल बेहाल था ! वे आती-जाती हर मोहतरमा को घूरते जा रहे थे, न मालुम कब बादलों की ओट से दीदार हो जाये उस हुस्न के चाँद का ? तभी फ़क़ीरों का झुण्ड, ख़ैरात पाने के मंसूबे से मुख्य सड़क पर आ गया ! उन्हें देख गली के कुत्ते भौंकते हुए, उनके पीछे लग गए ! ख़ौफ़-ओ-ख़तर पर इन भौंकते कुत्तों को पाकर, बेचारे फ़क़ीर अपनी जान बचाने इधर-उधर भगने लगे ! एक साथ इन फ़क़ीरों को अपनी ओर आते देखकर, बेचारी मोहतरमाएं घबरा गयी !

फिर क्या ? जहां मिला रास्ता, उधर बेहताशा भगने लगे..वे घबराये हुए फ़क़ीर ! इन हसीनाओं में एक ने धवल चांदनी सा बुर्का ओढ़ रखा था, वह बेचारी बूढ़े फ़क़ीर से टक्कर हाकर गिर पड़ी ! फिर अपने बदन को किसी तरह संभालकर, वह वापस खड़ी हुई ! मगर, यह क्या ? सामने गुलाब का फूल थामे, उसे जमाल मियां के दीदार हो गए ! बस उनको देखते ही, उसने समझ लिया कि ‘उसको नीचे गिराने वाला और कोई नहीं..यह शैतान ही इस जुर्म का जिम्मेदार है !’ फिर क्या ? उसने आव देखा न ताव, झट पांव की मख़मली जूती निकालकर चला दी मियां के सर पर ! और ज़ुबान से बदल गरज उठे “नासपीटे ! समझता क्या है, अपने आप को...फिल्म चौदवी के चाँद का मियां गुरुदत्त ? चार फ़िल्में क्या देख ली लंगूर, तूने..और चला इश्क फ़रमाने..? अब खा, मेरी जूती की शिरनी...खा खीर-बताशे !” और लगी, पीटने जूती से ! तभी उसका चाँद स मुखड़ा जाली हटने से, जमाल मियां को दिखाई दिया...इस मुखड़े को देखते ही, जमाल मियां के हाथ के तोते उड़ गए...? हाय अल्लाह ! यह शबनम न होकर, यह तो कोई बुढ़िया खुर्राट शैतान की ख़ाला नज़र आने लगी ! तभी नुक्कड़ पर खड़ी मोहतरमा ख़िलखिलाकर हंस पड़ी, और ठहाके लगाकर, वह उस बुढ़िया खूसट से कहने लगी “अरे, ओ ख़ालाजान ! बेचारे को माफ़ कर दो, ख़ता हो गयी है इस बेचारे से ! शायद, आपको पहचाना नहीं होगा..?” फिर बुर्के की जाली हटाकर, जमाल मियां से बोली “छोटे नवाब, हम तो इधर खड़े हैं ! ज़रा इधर आइये, और अपने इस भाणजे को संभालो...इसे उठाये-उठाये हमारे हाथों में दर्द हो रहा है, मियां ! जल्दी आओ, भय्या !”

नुक्कड़ पर खड़ी मोहतरमा, शबनम ही थी ! अपने लाडले को जमाल मियां की गोद में डालकर, वह बोली “जाओ बेटा, अपने प्यारे मामू के पास !” यह सुनकर जमाल मियां की क्या हालत हुई होगी ? यह तो, ख़ुदा ही जाने ! मुगलेआज़म की अनारकली का ख़्वाब, धरा रह गया...बेचारे मज़नू का ख़िताब पाते-पाते, मामूजान के ओहदे से नवाज़ लिए गए ! बड़े अरमानों से लाया गुलाब का फूल, लैला के रेशमी बालों की जगह अवाम के क़दमों से कुचला गया ! वक़्त की नज़ाकत को देखकर, उन्होंने बच्चे को खिलाना चालू कर दिया ! कभी वे उसे अपने हाथों से हवा में उछालते, फिर वापस हाथों में थाम लेते ! दिल की भड़ास को बाहर निकालते हुए, वे उससे कहने लगे “छोटे मियां, आप बिल्कुल नानाजान के नक्शेक़दम पर चल रहे हैं..आप !”

मज़ारे-शरीफ़ पर चादर चढ़ाकर शबनम ने अपनी मन्नत पूरी की, फिर यतीमों को ख़ैरात बांटकर घर की ओर क़दम बढ़ाने लगी ! रास्ते में जमाल मियां को समझाने लगी “देखो भय्या, हम बचपन के दोस्त ठहरे ! तुम जानते ही हो, मैं तुम्हारा बुरा नहीं चाहती ! मैं तुमसे उम्र में भी बड़ी हूं, इसलिए मुझे तुम्हें कुछ कहने का हक़ है ! मैं यह भी जानती हूं कि, तुम्हारा पढ़ाई में जी नहीं लगता..और न तुम्हारी उम्र पढ़ाई करने के लायक रही है ! अच्छा है, तुम अपने पांवों पर खड़े हो जाओ...और, अपनी हैसियत बनाओ ! आज़कल लड़कियां हैसियत देखती है, आप क्या हो ? रोज़ बदलने के लिए नयी पौशाकें हो, व सीट के नीचे बाइक..तो मियां, मुधुमक्खी के छत्ते की तरह झूम उठेगी ये लड़कियां तुम्हारे चारों ओर !”

हवेली आ गयी, अब बच्चे को जमाल मियां की गोद से उठाकर शबनम बोली “देखो मियां, दिल छोटा न करो ! तुम्हे जिस चीज़ की ज़रूरत है, मुझसे मांग लेना..बस, मैं तुम्हारे अन्दर शरीफ़ नेक मोमीन को देखना चाहती हूं..मुझे निराश मत करना, भय्या !” फिर बेटे की पेशानी पर हाथ रखकर, वह बेटे से कहने लगी “चलो बेटे ! अपने मामूजान से ख़ुदा हाफ़िज़ कहो !” तुतलाती ज़बान से वह बच्चा बोल उठा “धुदा हाफिद” ! फिर क्या ? शबनम बच्चे को गोदी में उठाये, हवेली में चली गयी ! शबनम को जाते हुए जमाल मियां टक-टकी लगाए देखते रहे, काफ़ी देर तक शबनम की आवाज़ उनके कानों में गूंज़ती रही ! उसकी एक बात, उनके दिल को छू गयी ! सामने नुक्कड़ पर खड़ी रुख़सना उन्हें हसरत भरी निग़ाहों से देख रही थी, मगर इस वक़्त इनको उसका इस तरह देखना भी रास नहीं आया ! अब क्या करना...? इस उधेड़बुन में मियां, अपने ग़रीबख़ाने की की ओर क़दमबोसी कर बैठे !

शबनम का एक-एक लफ़्ज़, जमाल मियां के दिल में उतर गया...ज़िंदगी, ख़ाली उसूलों पर नहीं चलती ! दमख़म रखना पड़ता है, गुलशन लगाने हैं पैबन्द नहीं ! बदन पर बढ़िया पौशाकें और घूमने के लिए सवारी...ऊँची सोसाइटी की पहली सीढ़ी है, जिसे हासिल करने के लिए ज़रूरत रहती है शातिर दिमाग़ की ! जो मियां को, पहले से ही हासिल है !

शबनम को आये कई दिन हो गए, आख़िर ससुराल से बुलावे का ख़त आ गया ! अब शबनम जाने की तैयारी करने लगी, जाने से पहले वह जमाल मियां के हाथ में पांच हज़ार रुपये थमाकर बोली “दिल छोटा न करो, छोटे नवाब ! यह रक़म रख लो, काम आयेगी ! कुछ नयी पौशाकें बनवा लेना..मैं कहती हूं, तुन्हारे बदन पर फ़िरोज़ी सूट अफ़सरों के माफ़िक़ अच्छा जमेगा ! बस, तुम अपना हुलिया बदल डालो एक बार ! कमाने-धमाने का कोई ज़रिया ढूँढ़ लेना, अब आवारागर्दी छोड़कर शरीफ़ों की ज़िंदगी जीना !”

शबनम के रुख़सत होने के बाद मियां सोचने लगे...ये पांच हज़ार तो जल्द ख़त्म हो जायेंगे, फिर ऐसा क्यों न कर लिया जाय ‘हींग लगे न फिटकरी, फिर बी रंग आये चोखा’..बस, फिर क्या ? झट चले गए, रुख़साना के अब्बा हुज़ूर रफ़ीक़ साहब के पास ! ये जनाब लुधियाना से होज़री का माल लाकर, सेल लगाया करते ! जिससे उनकी अच्छी-ख़ासी कमी हो जाया करती ! जमाल मियां पहले से ही जानते थे कि, रुख़सना के अब्बा रफ़ीक़ साहब को बेहतरीन सिगरेटों का शौक ठहरा ! बस, फिर क्या ? मजीद चच्चा के दीवानख़ाने से विलायती सिगरेटों का पैकेट मार लाये, और रफ़ीक़ साहब को तौहफ़े में देकर बोले “चच्चा, आप यदि चाहें तो मैं आपकी मदद कर सकता हूं, मेरा बहुत लम्बा सर्कल है..कई दोस्त डॉक्टर है, तो कई इंजीनियर है और क्या चच्चा ? ए.डी.एम. जो भी है, मेरे साथ डिस्ट्रिक्ट क्लब में टेनिस खेलते हैं ! फिर क्या ? आपका माल मैं चुटकियों में बिकवा दूंगा, आप भी क्या मुझे याद रखेंगे ?” बेचारे रफ़ीक़ साहब, क्या जाने इनके सर्कल को ? इनके सर्कल में तो ख़ाली आते थे व्यापारी या सौदाग़र ! उनका अफ़सरों से, क्या लेना-देना ? बस, मियां की बात सुनकर अब व्यापारी बुद्धि से उनको तो मुनाफ़ा ही मुनाफ़ा चारों ओर से नज़र आने लगा, और जमाल मियां की बिछाई जाजम उन्हें मुनाफ़ा देने वाली लगने लगी ! फिर क्या ? भाव-ताव बताकर होज़री का काफ़ी माल जमाल मियां को थमा दिया, और तौहफ़े में कई बेहतरीन सूट के सेम्पल भी थमा दिए ! सेम्पल का माल मुफ़्त में पाकर, जमाल मियां की बांछे ख़िल गयी !

होज़री के माल पर, कहीं मियां ने ‘मेड इन यू.एस.ए.’ तो कहीं ‘मेड इन होंगकोंग’ के लेबल चिपका दिए ! लोगों को तो विलायती चीजों का शौक अक्सर रहता है, इसलिए मियां के कई रिश्तेदारों, मोहल्ले वालों व अब्बा हुज़ूर के स्टाफ़ वालों को विलायती माल कहकर उन्हें ऊँचे दामों में बेच दिया ! इधर तो मियां ने भारी मुनाफ़ा कमाया, और दूसरी तरफ़ रफ़ीक़ साहब पर भारी अहसान लाद दिया कि “उन्होंने घर बैठे उनके माल की बिक्री करवा दी !’ इस तरह, जमाल मियां ने ऊंची सोसाइटी की पहली सीढ़ी पर क़दम रख ही दिया !

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टिप्पणियाँ

ब्लॉगर: 1
  1. आपको यह कहानी कैसी लगी ? आप अपने विचार रचनाकार में ज़रूर भेजें । इस कहानी के बाद आप कहानी "बिल्ली के गले में घंटी" पढ़ेंगे । जो यूनिकोड फ़ॉन्ट्स में तैयार रही है । कृपया, आप प्रतीक्षा
    करें । - दिनेश चंद्र पुरोहित (राक़िम)

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नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3862,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,337,ईबुक,192,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,257,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,105,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2810,कहानी,2136,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा 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कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,238,लघुकथा,862,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,24,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,326,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,62,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1932,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,658,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,703,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,15,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,60,साहित्यम्,2,साहित्यिक गतिविधियाँ,185,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,58,हास्य-व्यंग्य,69,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: कहानी “ऊंची सोसाइटी की पहली सीढ़ी” राक़िम दिनेश चन्द्र पुरोहित
कहानी “ऊंची सोसाइटी की पहली सीढ़ी” राक़िम दिनेश चन्द्र पुरोहित
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रचनाकार
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