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वार्तालाप जिज्ञासुओं से - डॉ. महेन्द्र भटनागर की - डॉ. कविता शर्मा से बातचीत

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वार्तालाप जिज्ञासुओं से

कवि महेंद्रभटनागर से एक भेंट-वार्ता

- डॉ. कविता शर्मा

आपके समकालीन कवि कौन-कौन से हैं?

मेरा जन्म 26 जून 1926 को हुआ और काव्य-रचना का प्रारम्भ 1941 से। लगभग 66 वर्षों के साहित्यिक परिदृश्य का साक्षी हूँ मैं। इस अवधि के कवियों की लम्बी सूची है; जो सर्वविदित है। अनेक मेरे अग्रज हैं; अनेक समवयस्क हैं; अनेक अनुज हैं। मेरे व्यक्तिगत संबंध बहुत कम कवियों से रहे/हैं। यात्राएँ मैं करता नहीं; कवि-सम्मेलनों में भाग लेता नहीं। कार्य-क्षेत्र मेरा चम्बल-ग्वालियर-क्षेत्र, बुदेलखंड और मालवा रहा। बहुत कम कवियों से मिलना हुआ; अधिकांश से पत्राचार द्वारा ही सम्पर्क रहे/हैं। व्यक्तिगत संबंध जगन्नाथप्रसाद मिलिन्द, शिवमंगल सिंह ‘सुमन’, प्रभाकर माचवे आदि कवियों से रहे; जो अब दिवंगत हैं। समवयस्कों में राजेन्द्रप्रसाद सिंह (बिहार), राजीव सक्सेना (दिल्ली), ललित शुक्ल (दिल्ली) वीरेंद्र मिश्र (ग्वालियर) आदि अनेक से निकटता रही। अनुज पीढ़ी के अनेक ख्यात कवि शिष्य रहे। यथा -मुकुटबिहारी ‘सरोज’, ओम प्रभाकर, चंद्रकांत देवताले, सरोजकुमार जैन, जगदीश चतुर्वेदी ‘शलभ’, आदि अनेक।

आप अपने समकालीन कवियों से किस प्रकार भिन्न हैं?

समकालीन कवियों से अपनी भिन्नता मैं स्वयं कैसे रेखांकित कर सकता हूँ! यह तो सुधी आलोचक, शोधार्थी, अध्येता, साहित्येतिहास-लेखक, पाठक और कविता-कर्म से जुड़े रचनाकर ही बता सकते हैं।

आपकी रचनाधर्मिता का मूलमंत्र क्या है?

रचनाधर्मिता के तथाकथित मूलमंत्र पर रचनाकार कब ध्यान देता है! मात्र काव्य-सृष्टि ही उसका उद्देश्य/लक्ष्य रहता है। यह बात अलग है, कभी वह इस विषय पर चिन्तन करे, आत्मालोचन करे। वस्तुतः काव्य-रचना व्यक्तिगत अनुभूतियों से सम्बद्ध है। स्व-अनुभव को जब कवि यथावत् अभिव्यक्त करता है; तभी वह अपने प्रति ईमानदार रहता है। आलोचक भले ही कुछ भी कहें; उसके सृजन में विरोधाभास देखें। कविता किसी मतवाद या विचारधारा की अनुगामिनी/दासी नहीं। कवि के लिए स्वतंत्र चिन्तन महत्वपूर्ण है। सबसे घटिया व गंदी भूमिका राजनीति की रहती है। धर्म का आतंक भी कवि की चेतना को प्रतिकूल प्रभावित करता है। जड़-दकियानूस धार्मिक समुदाय तो उसका जीना दूभर कर देता है। जो रचनाकार जितनी निर्भीकता से अपनी बात कहेगा वह उतना ही वरेण्य होगा। अनेक अप्रासंगिक तत्वों के विरुद्ध तो रचनाकार अपनी आवाज़ बुलन्द करेगा ही। मनुष्य को - समाज को आगे बढ़ना है। नैतिक मूल्यों में बदलाव आता है, माना कुछ मानवीय मूल्य शाश्वत होते हैं। वैज्ञानिक दृष्टि ही हमारी मार्ग-दर्शिका होनी चाहिए।

कविता लिखने की प्रेरणा आपको किससे मिली? क्या किसी कवि-विशेष ने आपको प्रभावित किया अथवा जीवन की परिस्थितियों ने?

कविता लिखने की प्रेरणा मुझे अपने परिवेश से मिली। आगे चलकर, जीवन की स्थितियों-परिस्थितियों ने प्रभावित किया; जैसा प्रत्येक रचनाकार के साथ होता है। परिवेश का संबंध घर, विद्यालय और समाज से है। बचपन में माँ को ‘श्रीरामचरितमानस’ का पाठ करते और पिता जी को प्रातः वैदिक ऋचाओं का उच्चार करते सुनता था। विशिष्ट पर्वों और अवसरों पर घर पर ढोलक-मजीरों पर गान होते थे। मुहल्ले की महिलाएँ एकत्र होकर समवेत गाती थीं। जन्म, वर्ष-ग्रंथि, विवाह आदि अवसरों पर भी घर में गाने-बजाने का माहौल रहता था। इस परिवेश ने मुझे कविता और संगीत के प्रति आकर्षित किया। तदुपरान्त जब विद्यालयीन शिक्षा ग्रहण की तो हिन्दी के अनेक कवियों से परिचय हुआ। उनकी कविताओं को पढ़ने-समझने में आनन्द अनुभव करता था। इच्छा होती थी; मैं भी ऐसा अपना-कुछ लिखूँ। तुकों से चमत्कृत होता था। इसी दौरान कवि-सम्मेलनों/मुशायरों को भी सुना। श्रोताओं द्वारा कवियो-शायरों की प्रशंसा से प्रभावित होकर मैं भी यशः कामना करने लगा! स्वतः कुछ तुकबंदी करने की‘शुरूआत की। बड़ी बहन को विशेष रूप से सुनाता। जो सुनकर ख़ूब हँसतीं! इन प्रारम्भिक तथाकथित कविताओं का अब कोई अस्तित्व नहीं है। ‘आत्म-परिचय’ में मैंने इस सबका उल्लेख किया है।

अपनी काव्य-रचना का वास्तविक प्रारम्भ आप कब से मानते हैं?

मैट्रिक परीक्षा (सन् 1941) उत्तीर्ण करने के पश्चात् उच्च-शिक्षा ग्रहण करने हेतु स्थानीय ‘विक्टोरिया कॉलेज, ग्वालियर’ में प्रवेश लिया। कॉलेज में हिन्दी-अंग्रेज़ी के अतिरिक्त भूगोल और अर्थशास्त्र का भी अध्ययन किया। कॉलेज के उच्च-स्तरीय बौद्धिक और सांस्कृतिक धरातल के संस्कार क्रमशः पड़ते गये। सहपाठी कवियों से संबंध बने। हिन्दी-प्राध्यपकों के भी भावक-भावुक स्वरूप का चुम्बकीय प्रभाव पड़ा। सुमित्रानंदन पंत का ‘गुंजन’ पाठ्य-क्रम में निर्धारित था; अनेक प्राचीन-अर्वाचीन कवियों के संकलनों के साथ। इस प्रकार हिन्दी-कविता के अध्ययन ने भी मुझे दिशा दी। हिन्दी कविता-लोक में मेरे प्रवेश की यही पृष्ठभूमि व भूमिका है।

पत्र-पत्रिकाओं में आपकी कविताओं का प्रकाशन कब से प्रारम्भ हुआ?

नवम्बर 1941 से 1942 के अंत तक की अवधि में रचित इक्कीस ‘तारों के गीत’ पुस्तकाकार प्रकाशित हैं (1949)। इन दिनों स्थानीय कवि-सम्मेलनों में भी भाग लिया; पुरस्कार प्राप्त किये। ‘अज्ञात’ के नाम से लिखता था; फिर ‘महेंद्र’ के नाम से लिखा। सन् इस समय याद नहीं आ रहा (1946-1947), ‘हंस’ में पहली बार, एक कविता (‘युग और कवि’ / ‘नयी चेतना’ में समाविष्ट) ‘महेंद्रभटनागर’ के नाम से छपी। फिर यही नाम चल पड़ा।

सर्वप्रथम एक कविता ‘सुख-दुख’ ‘विक्टोरिया कॉलेज-मैगज़ीन’ में ‘अज्ञात’ नाम से छपी; जो ‘विहान’ में समाविष्ट है। कॉलेज-पत्रिकाओं व जातीय पत्रिकाओं का साहित्यिक महत्त्व लगभग शून्य माना जाता है। अतः अपनी प्रथम प्रकाशित कविता ‘हुंकार’ मानता हूँ। (‘टूटती शृंखलाएँ’ में समाविष्ट); जिसे इस काल के श्रेष्ठतम मासिक पत्र ‘विशाल भारत’ (कलकत्ता) में उसके तत्कालीन यशस्वी सम्पादक श्री. मोहनसिंह सेंगर जी ने, मार्च 1944 के अंक में, ‘गीत’ शीर्षक से छापा (दृष्टव्य : ‘आत्म-परिचय’/‘महेंद्रभटनागर-समग्र’-खंड : 1)।

आपकी दृष्टि में कविता क्या है? आत्माभिव्यक्ति, सामाजिक स्थिति सुधारने का एक मूलभूत हथियार या कुछ और?

‘कविता क्या है’-इस विषय पर लगातार विमर्श जारी है; किन्तु किसी सर्वमान्य निर्णय पर नहीं पहुँचा जा सका है; न पहुँचा जा सकेगा। कविता को परिभाषित करने का मैं अपने को अधिकारी नहीं समझता। यों तो प्रत्येक, ‘कविता क्या है’ का उत्तर देने लगेगा! हमारा काम रचना करना है; जिसे काव्य-शास्त्र के विद्वान जो भी विधा-नाम दें। कविता के मर्म के संदर्भ में मैं महाकवि तुलसीदास जी की निम्नांकित काव्य-पंक्तियाँ प्रायः उद्धृत करता रहा हूँ :

हृदय सिंधु मति सीप समाना। स्वाती सारद कहहिं सुजाना।।

जे बरखै बर बारि बिचारू। होहिं कवित मुक्ता मनि चारू।।

निःसंदेह, कविता आत्माभिव्यक्ति का माध्यम/साधन प्रथम है। सामाजिक-राजनीतिक बदलाव की दिशा में भी उसकी महत्वपूर्ण भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। कविता कितनी भी व्यक्ति-केंद्रित क्यों न हो; उसका सीधा संबंध जन-समुदाय से है। समाज-सापेक्ष होने के कारण ही हम कविता के संबंध में प्रेषणीयता की बात करते हैं। आज कविता का किसी रहस्य-अनुभूति (रहस्यवाद) से कोई सरोकार नहीं है। वस्तुतः वैज्ञानिक युग में ‘रहस्य’ के लिए कोई स्थान नहीं।

आपने जब काव्य-रचना प्रारम्भ की तब हिन्दी काव्य-परिदृश्य का स्वरूप क्या था?

मेरा जन्म-दिनांक 26 जून 1926 है तथा कविता-रचना-काल नवम्बर 1941 से (‘तारों के गीत’) प्रारम्भ होता है। लगभग छह-वर्ष की काव्य-रचना का परिप्रेक्ष्य स्वतंत्रता-पूर्व भारत है;‘शेष का स्वातं=योत्तर।

स्पष्ट है, प्रगतिवादी युग की पृष्ठभूमि ने मेरी साहित्यिक चेतना को उद्बुद्ध किया। उत्तर-छायावादी गीति-रचना भी इस बीच समान्तर अस्तित्व में रही। इसका प्रभाव भी मेरी गीति-सृष्टि पर रहा।

स्वच्छंदतावाद-छायावाद यद्यपि बहुत पीछे छूट चुके थे; तथापि छायावादी कवियों (प्रसाद, पंत, निराला, महादेवी) का ही वर्चस्व इन दिनों साहित्य व शिक्षा जगत पर छाया हुआ था। पंत और निराला प्रगतिवादी काव्यधारा में भी प्रमुख स्थान बना चुके थे।

प्रगतिवादी कवियों में सर्वाधिक चर्चित नाम थे केदारनाथ अग्रवाल, शिवमंगलसिंह ‘सुमन’, नागार्जुन, त्रिलोचन, नरेंद्र शर्मा, ग.म. मुक्तिबोध, रांगेय राघव,‘शील, गिरिजाकुमार माथुर, रामविलास‘शर्मा आदि।

राष्ट्रीय काव्यधारा के कवि भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे। यथा- मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, सियारामशरण गुप्त, रामधारीसिंह ‘दिनकर’ आदि। ‘दिनकर’ का प्रभाव-फलक बहुत आगे तक रहा - ‘उर्वशी’ तक।

‘अज्ञेय’ ने ‘इत्यलम्’ छपवा कर अपने काव्य-लेखन का अंत नहीं किया; वरन् हिन्दी कविता को नयी दिशा दी; उसका सफल-सार्थक नेतृत्व भी किया। हिन्दी कविता-लोक में ‘अज्ञेय’ के पुनर्जन्म ने हिन्दी कविता को आधुनिकता-अत्याधुनिकता का एक नया क्षितिज प्रदान किया। ‘तार-सप्तक’ (1943) युगान्तरकारी संकलन प्रमाणित हुआ। ‘प्रतीक’ पत्रिका द्वारा प्रयोगवाद और नयी कविता के काव्यान्दोलन को जन्म दिया। फिर, नयी कविता की बागडोर जगदीश गुप्त ने सँभाली।

इसी काल में कुछ कवि काव्यन्दोलनों और वादों से मुक्त रहकर काव्य-रचना करते रहे। यथा-भवानीप्रसाद मिश्र, धर्मवीर भारती, महेंद्रभटनागर, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, राजेंद्रप्रसाद सिंह, ललित शुक्ल, रामदरश मिश्र आदि।

वस्तुतः हिन्दी कविता की प्रमुख विधा गीत रही; जो छायावादी एवं उत्तर-छायावादी युग में सर्वाधिक मुखर रही (द्रष्टव्य बच्चन, नेपाली, शंभुनाथसिंह, जानकीवल्लभ शास्त्री आदि की गीति-सृष्टि।)

बड़े विस्तृत फलक पर आधुनिक हिन्दी कविता ने अपने पंख पसारे। कवियों की कतार निरंतर बढ़ती गयी/बढ़ती जा रही है। एशिया ही नहीं; विश्व-कविता में हिन्दी कविता का महत्त्व आँका जाना अब ज़रूरी हो गया है।

आधुनिक कवियों की कविता में गद्यात्मकता पायी जाती है; इस संबंध में आपके क्या विचार हैं?

विश्व-भर की कविता किसी-न-किसी आकार में है। उसे पद्य कहें, छंद कहें। काव्य-सौन्दर्य के अपने मानदंड हैं; जो अभिव्यक्ति से सम्बद्ध हैं। आकर्षक व प्रभावी अभिव्यक्ति ही कविता को प्राणवान बनाती है।आजकल यह कला/शिल्प लय-तुक के बंधनों से मुक्त होकर गद्य में अपना चमत्कार दिखा रही है; यद्यपि ‘लय’ (शाब्दिक एवं अर्थ) को इतना नज़र-अन्दाज़ नहीं किया गया है। गद्य लिखना सहज-सरल है; किन्तु गद्यात्मक काव्य-रचना करना नहीं। गद्यात्मक काव्य-रचना छंद-बद्ध (मुक्त-छंद सहित) काव्य-रचना से अधिक कठिन है। छंद-तुक का सहारा लिए बिना कवि अपनी अनुभूतियों-कल्पनाओं-विचारों को काव्य-परिधान पहनाता है। यह कार्य सिद्धहस्त रचनाकार ही कर सकते हैं; अन्यथा उनकी कविता और गद्य में कोई अन्तर नहीं रह जाएगा। और, हो यही रहा है। लम्बी-लम्बी गद्यात्मक कविताएँ लिखी जा रही हैं-नीरस,ऊबाऊ, बाझिल। कुछ कवि लफ्प़$ाजी पर उतर आते हैं। अभिव्यक्ति की भंगिमा-विशेष गद्यात्मक कविताओं के लिए अनिवार्य है। धाराप्रवाह लिखी जाने वाली गद्यात्मक कविताएँ अपनी विशेष अभिव्यक्ति के कारण आकर्षक लगती हैं। इन अभिव्यक्ति भंगिमाओं का अनुवाद भी सहज-सम्भव होता है। भाषा बाधा नहीं बनती। शब्द-चमत्कार (भाषा-सौष्ठव) का अनुवाद नहीं हो सकता। प्रत्येक भाषा का अपना विशिष्ट सौन्दर्य उसी तक सीमित रहता है।

स्वच्छन्दतावाद और नवस्वच्छन्दतावाद में आप क्या मूलभूत अन्तर मानते हैं?

स्वच्छन्दतावाद अंग्रेज़ी रोमांटिसिज़्म का प्रतिरूप माना जाता है। हिन्दी साहित्येतिहास में इसका संबंध पूर्व-छायावादी कविता से है। श्रीधर पाठक और मुकुटधर पाण्डेय इस ‘वाद’ के सर्वाधिक चर्चित कवि हैं। काव्यशास्त्रीय विवेचना के अनुसार स्वच्छन्दतावाद के मूल तत्त्व हैं : प्रकृति, वन-वैभव, एकांत प्रणय, वैयक्तिक स्तर पर विद्रोह भाव, देश-भक्ति। वस्तुतः स्वच्छन्दतावाद और छायावाद दोनों, कुछ तत्कालीन स्थानीय स्थितियों के कारण, अंग्रेज़ी रोमांटिसिज़्म से भिन्न माने जाते हैं। (द्रष्टव्य : डा. नगेन्द्र की स्थापना)

स्वच्छन्दतावाद-काल में भारत पराधीन था; जिसके फलस्वरूप ही भारतीय स्वच्छन्दतावाद और अंग्रेज़ी रोमांटिसिज़्म में मौलिक अन्तर आया। हिन्दी साहित्य में, स्वच्छन्दतावाद की तरह नवस्वच्छन्दतावाद चर्चित नहीं रहा। जिस प्रकार प्रगतिवाद के समान नवप्रगतिवाद चर्चा का विषय नहीं बना। पर, अस्तित्व दोनों का (नवस्वच्छन्दतावाद/नवप्रगतिवाद) है। शायद, भविष्य में कभी इनके (स्वच्छन्दतावाद-नवस्वच्छन्दतावाद/प्रगतिवाद-नवप्रगतिवाद) पार्थक्य पर विस्तृत विमर्श हो।

कुछ विद्वान शोधार्थियों ने नवस्वच्छन्दतावाद और नवस्वच्छन्दतावादी कविता को अपने शोध का विषय बनाया ज़रूर है। द्रष्टव्य : डा. अजबसिंह का प्रकाशित शोध-प्रबन्ध ‘नवस्वच्छंदतावाद’। काल में अन्तर आने के कारण-स्थितियों-परिस्थितियों में अन्तर आने के कारण-स्वच्छन्दतावाद और नवस्वच्छन्दतावाद में अन्तर आना स्वाभाविक है। यह विषय वस्तुतः काव्यशास्त्रीय सैद्धान्तिक विवेचना का विषय है। प्रामाणिक कवि किसी वाद-विशेष को लक्ष्य करके काव्य-रचना नहीं करते। आलोचकों-शोधार्थियों-साहित्येतिहासकारों की अपनी-अपनी दृष्टि है कि वे किस कवि को किस वाद के अन्तर्गत विवेच्य युक्तिसंगत मानते हैं।

आप प्रगतिवादी-जनवादी कवि के रूप में ख्यात हैं-नवस्वच्छंदतावादी कवि के रूप में, आपकी काव्य-सृष्टि का अध्ययन करना, आपकी दृष्टि में कहाँ तक युक्तिसंगत है?

मैंने कभी सोचा न था कि कभी कोई ऐसा प्रश्न मुझसे करेगा! हाँ, काव्य-रचना करते समय प्रगतिवादी-जनवादी चेतना तो बार-बार उभर कर सामने आती है; किन्तु ‘नवस्वच्छंदतावाद’ कभी जेहन में नहीं आया। सामान्य क्षणों में भी ‘नवस्वच्छंदतावाद’ पर कभी ध्यान नहीं दिया। वस्तुतः रचनाकार सैद्धान्तिक विचारणा-विवेचना से अधिक सरोकार नहीं रखता। यह तो आलोचना-कर्म है जो किसी रचनाकार को सीमाओं में बाँधने का प्रयत्न करता है। ‘नवस्वच्छंदतावादी’ कवि के रूप में मुझे और मेरे काव्य-कर्तृत्व को आपने रेखांकित किया है तो इस संदर्भ में मैं क्या कह सकता हूँ। मैं स्वयं को कोई ‘वादी’ भले ही न मानूँ; अधिकांश आलोचक मुझे प्रगतिवादी-जनवादी कवि ठहराते हैं। जबकि मैंने बहुत-कुछ अपनी आन्तरिक प्रेरणा से स्वतंत्रतापूर्वक भी लिखा है। जिस विचार और व्यवस्था को मैंने अपनी दृष्टि में ठीक समझा; उसका खुलकर समर्थन किया। आलोचकों की चिन्ता किये बिना। प्रत्येक स्थापना का कोई आधार होता है। प्रमाण-स्वरूप तदनुसार काव्य-उद्धरण भी दर्ज़ किये जाते हैं। विशुद्ध एकेडेमिक अध्ययन के महत्व को मैं अस्वीकार नहीं कर रहा। मतभेद और विवाद तो सदा बने रहेंगे। काव्यालोचक अपनी-अपनी दृष्टि से अपने प्रतिपाद्य कवि की काव्य-सृष्टि का विवेचन-विश्लेषण-आकलन करते रहेंगे ही।

आप चाहे कितना भी कहें कि आपने काव्यान्दोलनों और वादों से मुक्त रहकर काव्य-रचना की; किन्तु आलोचकों और साहित्येतिहासकारों ने आपको प्रगतिवादी / नवप्रगतिवादी कवि घोषित व स्थापित किया है। इस संदर्भ में आप क्या कहना चाहेंगे।

सन् 1946-47 में कभी व और आगे भी जब मेरी कविताएँ ‘हंस’ (अमृतराय, त्रिलोचन, मुक्तिबोध द्वारा सम्पादित), ‘जनवाणी’ (बैजनाथसिंह ‘विनोद’ द्वारा सम्पादित समाजवादी पत्रिका), ‘उदयन’ (नागार्जुन द्वारा सम्पादित), ‘नया पथ’, ‘जनयुग’ आदि प्रगतिवादी-जनवादी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगीं; तब प्रगतिवादी खेमे तथा अन्य आलोचकों का ध्यान मेरी सामाजिक यथार्थपरक रचानाओं की ओर जाना स्वाभाविक था। मेरी विचारधारा मार्क्स की विचारधारा से पर्याप्त साम्य रखती है (द्रष्टव्य : ‘अभियान’ काव्य-कृति का ‘आमुख’ एवं ‘महेंद्रभटनागर-समग्र’ भाग-1 में प्रकाशित आत्म-परिचय); किन्तु वहीं ठहर नहीं जाती। मैं गौतम बुद्ध की करुणा और गांधी जी की नैतिकता एवं व्यक्ति व समाज से सम्बद्ध उनके क्रांतिकारी चिन्तन व आचरण से भी प्रभावित रहा हूँ। इसे प्रगतिवादी आलोचकों ने पसंद नहीं किया। उन्हें इसमें विरोधाभास नज़र आया। ज़ाहिर है, उन्होंने मुझे हाई-लाइट नहीं किया। लेंकिन स्पष्ट विरोध भी नहीं किया; क्योंकि मैं वाम विचारधारा के प्रति निष्ठावान रहा। रचनाकार का दर्ज़ा राजनीतिज्ञों से ऊँचा होता है। उसके चिन्तन में स्वतंत्रता रहती है। वह किसी वाद-विशेष अथवा किसी राजनीतिक दृष्टिकोण का अंध-प्रचारक नहीं होता। पूर्वाग्रही आलोचक उसके लेखन में असंगति व विरोध भले ही देखें। रचनाकार को इस ओर ध्यान देना आवश्यक नहीं। यही तो होगा, उसके जीवन-काल में उसका लेखन अलक्षित-उपेक्षित-अचर्चित रह जाएगा। लेकिन रचना में यदि सार होगा तो वह जीवित रहेगी; प्रासंगिक रहेगी।

प्रत्येक रचनाकार अपने काव्य में मिथक का प्रयोग करता है, आपने भी प्रयोग किये हैं, आपके काव्य में प्रमुख मिथकों का क्या महत्व है?

देवी-देवताओं से संबंधित कथाओं और परम्परा से प्रचलित पौराणिक दंत-कथाओं का सहारा दुनिया-भर के कवियों ने लिया है। मिथक आदिम विश्वास हैं-अवास्तविक, काल्पनिक, बनावटी, मन-गढ़ंत, संदेहास्पद सत्य, आध्यात्मिक। मिथक के मूल भाव व विचार को समसामयिक जीवन से सम्पृक्त करके मिथकविद् रचनाकार जब देखते हैं; तब वे मिथक अपनी अभिनव सार्थकता से दीप्त हो उठते हैं। प्रसंग-गर्भत्व के कारण मिथक-काव्य को विभिन्न संस्कृतियों के सामान्य-जन सुगमता से ग्रहण नहीं कर पाते। मैंने मिथक-प्रयोग नही ंके बराबर किये हैं। सर्वविदित कुछ मिथकीय नामों का प्रश्रय अवश्य लिया है। राम, सीता, रावण आदि का नाम लेते ही हमारे समक्ष उनके जीवन, सिद्धन्तों और मूल्यों का साक्षात्कार होने लगता है; क्योंकि हम इन मिथकों से पूर्व-परिचित होते हैं।

आप बियासी वर्ष की अवस्था में भी रचनारत हैं, इसका रहस्य क्या है?

काव्य-सृजन में मेरी रुचि है। कविता-रचना मुझे अपूर्व तोष प्रदान करती है। लेकिन काव्य-रचना को मैंने कभी व्यावसायिक दर्ज़ा नहीं दिया। कवि-सम्मेलनों में ही नहीं; विशिष्ट काव्य-पाठ में भी मैं भाग नहीं लेता। प्रारम्भ में अथवा जब-तब जो भाग लिया, वह सहज ही। वाहवाही पाने / लूटने के लिए कविताएँ सुनाना मुझे अच्छा नहीं लगता। जब भी ऐसा किया; कई दिनों तक ग्लानि बनी रही। काव्य-पाठ प्रस्तुतीकरण-कौशल में निरा अनाड़ी हूँ। श्रोताओं को मंत्र-मुग्ध करना नहीं जानता। ऐसे करतबों से तोबा करता रहा। या यों कहा जाए; मैंने काव्य-रचना को पेशा कभी नहीं बनाया। जब-जब आन्तरिक प्रेरणा ने झकझोरा और सुविधा मिली तब-तब काव्य-रचना में प्रवृत्त हुआ। यही कारण है, मेरी काव्य-सृष्टि मात्रा में अधिक नहीं। अभी-तक के जीवन-काल में लगभग एक-हज़ार कविताएँ लिखीं होंगी; जो बीस संकलनों में उपलब्ध हैं। ‘समग्र’ के खंडों में सत्रह कविता-संकलन समाविष्ट हैं। वस्तुतः, उम्र का रचना-कर्म से कोई वास्ता नहीं। बस, मानसिक दृष्टि से आप स्वस्थ रहें; रचना-क्षम रहें। भले ही, कागज़ पर कुछ उतारें अथवा नहीं!

नये रचनाकारों तथा अध्येताओं को आप क्या संदेश देना चाहते हैं?

नये रचनाकारों व अध्येताओं को संदेश देने का कोई अर्थ नहीं। नयी पीढ़ी स्वयं जागरूक है। युवा-लेखन विरोध और विद्रोह का दूसरा नाम है। अन्यथा भी, अग्रज पीढ़ी का अनुसरण, विकास को अवरुद्ध करता है। भविष्य में, बदलाव आना ही चाहिए। अग्रजों के लेखन का निष्पक्ष, तटस्थ, पूर्वाग्रह-रहित अध्ययन अवश्य अपनी उपादेयता रखता है। नयी पीढ़ी का यह कर्तव्य भी है, क्योंकि काल-प्रवाह में आज की ‘नयी पीढ़ी’ का भी नामकरण कल ‘पुरानी पीढ़ी’ होना तय है!

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