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अनुपमा रवींद्र सिंह ठाकुर की कविताएँ

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1 एविडेंस

इस साल हमारी पाठशाला का मूलमंत्र था ’गो ग्रीन’,
बड़ी गंभीरता से हम सब कर रहे थे इसका पालन हर दिन,
प्रिन्टर बेचारा पड़ा-पड़ा सुस्ता रहा था,
दिन में एकाध प्रिन्ट आउट ही तो निकाल रहा था।

फिर अचानक सीबीएसई ने जारी किया फरमान,
क्या पढाते हैं आप, उसके दो सारे प्रमाण,
अब गो ग्रीन की धज्जियाँ उड़ती नज़र आईं,
क्योंकि हर तरफ कागज़ ही कागज़ दे रहे थे दिखाई।
 

हर तरफ थी केवल कागज़ों की भरमार,
लग रहा था हर पेड़ काटा जाएगा इस बार,
देखकर सोशल साईंस का गठ्ठा,
लगा अरे! यह पेड़ तो था बहुत ही हट्टा- कट्टा।
 

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जब हिन्दी की बारी आई,
तो लग रहा था जैसे किसी कोमल पौधे की जान गई,
अब बात मेरी समझ में आई,
क्यों भ्रष्ट आचरण हर तरफ देता दिखाई।
 

यहाँ कक्षा में क्या पढ़ाया
नहीं है उसका कोई मोल,
जो कागज़ पर लिखी,
वहीं बात है केवल अनमोल।
 

दूर बैठे-बैठे किसी के आचरण के संबंध में अंदाजा लगाना
हमारी सरकार की रीति है,
कई कागज़ों को बरबाद कर
बच्चों को फिर से पढ़ना "पेड़ बचाओ"
यही हमारी राष्ट्रीय शिक्षा नीति है।



2 वर्कशॉप

करने हमारी समस्याओं का तारन,
बँगलूर से सी.सी.ई समझाने आए मिस्टर साजन।
 

सभी के गले में पहचान पत्र लटक रहे थे,
सभी प्रफुल्लित मन से सोच रहे थे,
आज होगा सभी रहस्यों से पर्दाफाश,
आज मिस्टर साजन बताएँगे क्या है सी.सी.ई में ऐसा खास।
 

पर सभी का सर चकराया,
कुछ भी समझ में न आया,
जब उन्होंने हमसे पेपर का पहचान पत्र बनवाया।
 

सभी एक दूसरे को ताकने लगे,
सौ-सौ प्रश्न एक साथ हृदय में झाँकने लगे,
परंतु प्रश्नों के उठते तूफान को हमने वहीं दबा दिया,
एक आज्ञाकारी बालक की तरह निर्देश का पालन किया,
कागज का पहचान पत्र बनाकर गले में लटका दिया।
 

उनके दूसरे निर्देश पर हुई हमें और भी हैरानी,
लिखकर अपनी परेशानी,
दीवार पर थी चिपकानी,
अंतिम बार हमने करुणापूर्ण नज़रों से
साफ-सुथरी दीवार को निहारा,
फिर मन में यह विचारा,
रोकी जा सकती थी कई कागज़ों की बरबादी,
अगर मिस्टर साजन हमें देते थोड़ी सी बोलने की आज़ादी।
 

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कुछ शिक्षक दिख रहे थे बहुत ही उत्साहित,
क्योंकि वर्कशॉप पर थे वे अनुपस्थित,
अगले दिन आते ही उन्होंने प्रश्न का चैका मारा,
कैसा था वर्कशॉप यह प्रश्न विचारा।
हमने अपनी सारी पीड़ा को मन में छिपाया,
चेहरे पर हँसी का मुखौटा चढ़ाया,
और कहा, अद्भुत, अद्वितीय, अति उत्तम,
वे भी मुस्कुराए और कहा तो बताओ सीसीई क्या है?
 

हमने कहा सीसीई और कुछ नहीं,
मिस्टर साजन की बहन जो पहले आस्ट्रेलिया में रहती थी
आजकल न्यूज़ीलैंड में जापानी पढ़ाती है,
उनकी पत्नी जो एक पढ़ी-लिखी महिला है,
फिर भी बेटे के पीछे पढ़ाई के लिए पड़ती है,
मिस्टर साजन जो कम्प्यूटर के बहुत अच्छे ज्ञाता हैं,
उन्हें केक बनाना भी बहुत अच्छा से आता है।
 

सीसीई कुछ और नहीं
विदेशी शिक्षा की एक नकल है,
हमारे शिक्षा मंत्रियों के दिमाग का खोखलापन है,
किसी रिसोर्स पर्सन की रोज़ी-रोटी है,
तो हम जैसे शिक्षकों के लिए माथाफोड़ी है।


3. सैनिक

त्यागकर अपना घर-परिवार और सुख चैन,
एक पल भी नहीं रिसते जिसके नैन,
कड़ी धूप, बारिश और कंपकंपाती सर्दी में,
सजग खड़ा है सैनिक देश की सुरक्षा में।

इसीलिये देश में मनती है होली, दिवाली और रमजान,
बेफिक्र खेलता बचपन और खुशियाँ मनाती जवानी है,
उपवन में मंडराते भँवरे और खेतों में खुशहाली है,
क्योंकि दुश्मन के इरादों को उसने नेस्तनाबूत कर रखा है।

जाओ चैन से सो जाओ यारों,
सरहद पर देश का जवान
सर पर कफन बाँधकर खड़ा है,
सर पर कफ़न बाँधकर खड़ा है।

 

4. कृष्ण कन्हैया

नटखट कृष्ण कन्हैया की
लीला है अपरंपार,
रास रचा कर जगदीश्वर ने
किया जगत का उद्धार,
माखन चुराकर,मटकी फोड़ कर,
मुरलीधर मोहन ने किया कंस का संहार।
 

ग्वाल बालों संग धेनु चराकर,
गोपियों संग रास रचा कर,
राधा के संग प्रीत लगाकर,
राधिकारमण ने किया प्रेम को साकार।
 

अर्जुन के सारथी बन,
दिखाया उसे कर्म का द्वार,
भगवद्गीता रचकर किया संसार का उद्धार,
नटखट कृष्ण कन्हैया की लीला है अपरंपार।


 

5. भारत की सड़कें


भारत की ये उबड़-खाबड़ सड़कें,
हर कोई चले इन पर डर -डर के,
कहीं गोबर पड़ा
तो कहीं कचरा सड़ा,
कहीं खड्डा पड़ा
तो कहीं रिक्शा खड़ा।
कहीं धूल उड़ी,
तो कहीं गाय खड़ी,
कौन कहाँ से निकले
यह समस्या है बड़ी।
इंसानों की भीड़ में,
भैंस, बकरियाँ भी हैं खड़ी।
भारत का लोकतंत्र सचमुच है विशाल,
यहाँ मानव और पशु की एकता है बेमिसाल,
यातायात के नियमों का नहीं किसी को डर,
बेफिक्र होकर चलते इन्सान हों या जानवर।

6. शब्द

शब्दों का खेल होता है बड़ा ही मजेदार,
बिना हथियार के किया जा सकता है किसी पर भी वार।
 

मृदु शब्द ही मिलवा देते हैं नया साथीदार,
कठोर शब्द से दूर हो जाते हैं अच्छे-अच्छे यार।
 

कभी-कभी एक ही शब्द का प्रयोग कर दो बार-बार,
तो झूठ में भी नज़र आने लगता है सच्चा प्यार।
 

शब्दों से ही तो होता है किसी का निरादर और अपमान,
शब्दों से ही होता है किसी का मान और सम्मान।
 

शब्द ही तो करवाते हैं बड़े-बड़े काम,
मीठे-मीठे शब्दों से हासिल हो सकता है ऊँचा मुकाम।
 

रसीले शब्दों के भी पिलाए जाते हैं जाम,
शब्दों की महफिल में लोग गुज़ारते हैं शाम।
 

शब्दों का भी कवि द्वारा किया जाता हैं श्रृंगार,
काव्य भाषा में वे कहलाते हैं अलंकार।
 

मत करो किसी पर भी शब्द रूपी प्रहार,
करो इनका प्रयोग करके सोच विचार।


7. मेरा मन

बैठे-बैठे क्यों भटक जाता है मेरा मन,
यहाँ-वहाँ कहाँ-कहाँ की सैर कर आता है मेरा मन।
 

पढ़ाई में लाख यत्न करने पर नहीं लगता है मेरा मन,
देास्तों के बीच हमेशा खुश रहता है मेरा मन।
 

किताबों को देख डर जाता है मेरा मन,
परीक्षा का नाम सुनते ही सहम जाता है मेरा मन।
 

अनुशासन में जीने से कतराता है मेरा मन,
जो जीवन में ज़रूरी है, उसी से दूर जाना चाहता है मेरा मन।
 

चाहे जैसे भी हो, इसे मुट्टी में बाँधना है,
यह कहता है मुझसे मेरा मन।
 

एक दिन यह भी संभव होगा,
यह कहता है मुझसे मेरा मन
यह कहता है मुझसे मेरा मन।


8. प्राणवायु हिंदी

मेरी भावनाओं की अभिव्यक्ति है हिंदी,
कोटि-कोटि भारतीयों के प्राण हैं हिंदी,
भारतेंदु हरिश्चंद्र जी की वाणी है हिंदी,
स्वतंत्रता की जलती मशाल है हिंदी।
 

शहीदों की गौरव गाथा है हिंदी,
विदेशी शासन का संहार है हिन्दी,
सुभद्रा की शब्द रूपी तलवार है हिंदी,
महादेवी वर्मा जी का मर्म है हिंदी।
 

सूरदास का अनुपम वात्सल्य है हिंदी,
मीरा का घनश्याम प्रेम है हिंदी,
महावीर जी की काव्य मंजूषा है हिंदी,
प्रेमचंद जी की संवेदना है हिंदी।
 

हरिशंकर परसाई जी का व्यंग है हिंदी,
अशोक चक्रधर जी का हास्य है हिंदी,
साहित्यकारों की श्वास है हिंदी,
हम सबका विश्वास है हिंदी।
 

हिंदुस्तान का ताज है हिंदी,
माँ भारती का श्रृंगार है हिंदी,
भारतीयों की हृदय सम्राज्ञी है हिंदी,
विश्व मंच पर भारत का गौरव गान है हिंदी।



9. गर्मी की छुट्टियाँ

नहीं है पल भर भी आराम,
मम्मी उठकर धौंस जमाए,
स्कूल जाओ बस यही रट लगाए,
पपा बड़ी-बड़ी आँखें दिखलाएँ,
पढ़ाई करो, हर वक्त यही चिल्लाएँ।
टीचर कक्षा में हर वक्त यही सिखाए,
बस पढ़ाई-पढ़ाई की रट लगाए,
हम सब ईश्वर से बस यही गुहार लगाएँ,
गर्मी की छुट्टियाँ जल्दी लौटाएँ।
 

हर वक्त परीक्षा का भय सताए,
स्वादिष्ट पकवान भी मुझको न भाए,
आते-जाते सब यही चिल्लाएँ,
उठो, पढ़ो, क्यों समय व्यर्थ गँवाए,
हर कोई यही उपदेश सुनाए,
बिना पढ़ाई के जीवन में कुछ न पाए,
यह सुन-सुन हमारा दिमाग चकराए,
हम सब ईश्वर से बस यही गुहार लगाएँ,
गर्मी की छुट्टियाँ जल्दी लौटाएँ।


10. चापलूसी

चापलूसी एक कला है
जो ईमानदार, प्रतिभाशाली और
बुद्धिजीवियों के लिए बला है।
बॉस के पहले जो ऑफिस पहुँच जाएँ,
उनके कार के सामने हाथ जोड़ खड़े हो जाएँ,
मुस्कुराकर बस यही जता जाएँ
कि हम से अधिक ईमानदार आप कोई न पाएँ,
हर क्षण मुस्कुराकर बॉस के चरणों में जो झुक जाएँ,
बॉस के आस-पास गुड़ पर मक्खी की तरह मँडराएँ,
बिना कारण बॉस के ऑफिस के चक्कर लगाएँ,
सचमुच चापलूसी एक कला है
जो ईमानदार, प्रतिभाशाली और
बुद्धिजीवियों के लिए बला है।
 

इनका होता है केवल एक ही काम,
सुबह-शाम जी हुजूरी और यस मैम,
बॉस की प्रशंसा कर उसे लुभाना,
औरों के सामने एडे बनकर पेडे खाना।
इनका न होता कोई धर्म और ईमान,
चापलूसी का तो बस एक ही भगवान,
उच्चाधिकारियों की जय-जयकार और गुणगान,
ये तो होते हैं केवल कुर्सी के गुलाम,
जो बैठे हैं कुर्सी पर उसी को ठोकते हैं सलाम।
सचमुच चापलूसी एक कला है
जो ईमानदार, प्रतिभाशालीं और
बुद्धिजीवियोंके लिए बला है।
 

होती हैं इनकी आँखों में चालाकी
और होठों पर मंद-मंद मुस्कान,
दूसरों के मन की बात निकालने में
ये होते हैं विद्वान।
मीठी बोली और मन में कटुता
यही इनकी पहचान,
बॉस के पसंद नापसंद का
लगा लेते हैं ये झट से अनुमान।
चापलूसी के बल पर कब तक
टिकेगी इनकी ये झूठी शान ?
तलवे चाट कर कब तक बने रहेंगे ये महान ?
एक ना एक दिन तो होगी प्रतिभा की पहचान,
छोड़ो चाटुकारिता और चापलूसी की ये झूठी शान,
अब तो कर लो ऊपर वाले का ध्यान,
अब तो छोड़ो जी हुजूरी और बढ़ाओ अपना ज्ञान,
बनकर बुद्धिजीवी और प्रतिभाशाली पाओ जगत में मान और सम्मान।

अनुपमा रवींद्र सिंह ठाकुर 

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