नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

लोककथा // 5 क्रिसमस का सन्तरा // नौर्स देशों की लोक कथाएँ–1 // सुषमा गुप्ता

image

5 क्रिसमस का सन्तरा[1]

यह लोक कथा नौर्स देशों के पाँचों देशों में से डेनमार्क देश में कही सुनी जाती है।

एक बार एक बहुत ही छोटी लड़की डेनमार्क के एक अनाथालय में रहने के लिये आयी।

जैसे जैसे क्रिसमस का समय पास आया तो दूसरे बच्चों ने उस लड़की से क्रिसमस के उस सुन्दर पेड़ के बारे में बात करनी शुरू की जो क्रिसमस की सुबह को नीचे बड़े कमरे में लगने वाला था।

अपने रोज के मामूली से नाश्ते के बाद हर बच्चे को उस दिन एक और केवल एक ही क्रिसमस भेंट मिलने वाली थी और वह था एक सन्तरा।

उस अनाथालय का हेडमास्टर बड़े जिद्दी किस्म का आदमी था और वह क्रिसमस को एक मुसीबत समझता था। वह क्रिसमस की सुबह तक किसी बच्चे को क्रिसमस का पेड़ देखने के लिये नीचे भी नहीं आने देता था।

[post_ads]

सो क्रिसमस के पहले दिन की शाम को जब उसने उस छोटी लड़की को क्रिसमस के पेड़ को देखने के लिये चोरी से सीढ़ियों से नीचे जाते देखा तो उसने यह घोषणा कर दी कि उसको उसकी क्रिसमस की भेंट का सन्तरा नहीं मिलेगा क्योंकि वह उस पेड़ को देखने के लिये इतनी उत्सुक थी कि उसने अनाथालय के नियमों को तोड़ा था।

वह छोटी लड़की बेचारी रोती हुई अपने कमरे में भाग गयी। उसका दिल टूट गया था और वह अपनी बदकिस्मती पर रो रही थी कि मैं नीचे उस पेड़ को देखने गयी ही क्यों।

अगली सुबह जब बड़े बच्चे नाश्ते के लिये नीचे जा रहे थे तो वह छोटी लड़की नीचे नाश्ते के लिये नहीं गयी और अपने बिस्तर में ही पड़ी रही। वह यह सहन नहीं कर सकती थी कि दूसरी लड़कियों को तो क्रिसमस की भेंट मिले और वह खड़ी उनका मुँह देखती रहे।

बाद में जब सब बच्चे अपना अपना नाश्ता करके ऊपर आये तो एक बच्चे ने उसको एक रूमाल दिया।

उस लड़की को वह रूमाल देख कर बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने सावधानी से उस रूमाल को खोला तो उसे विश्वास ही नहीं हुआ कि उसमें एक छिला हुआ और फाँकें किया गया सन्तरा रखा था।

उसने पूछा — “यह कैसे हुआ?”

बच्चे ने जवाब दिया — “यह ऐसे हुआ कि हर बच्चे ने अपने छिले हुए और फाँकें किये गये सन्तरे में से एक एक फाँक निकाल कर तुम्हारे लिये रख दी थी ताकि तुमको भी तुम्हारी क्रिसमस की भेंट का सन्तरा मिल सके। ”

यह देख कर उस लड़की की आँखों में आँसू आ गये।


[1] The Christmas Orange – a folktale from Denmark, Europe. Adapted from the Web Site :

http://www.motivateus.com/stories/c-orange.htm

---

सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं के संकलन में से सैकड़ोंलोककथाओं के पठन-पाठन का आनंद आप यहाँ रचनाकार के  लोककथा खंड में जाकर उठा सकते हैं.

0 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.