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आलेख // शुक्ल जी की आलोचना- भाषा से गुजरना हिंदी गद्य की शक्ति-सामर्थ्य से परिचित होना है // डॉ. वीरेंद्र कुमार भारद्वाज

डॉ. वीरेंद्र कुमार भारद्वाज

आचार्य रामचंद्र शुक्ल एक ऐसे साहित्यजीवक हैं, जिनका साहित्यिक व्यक्तित्व विविध पक्षों से आप्लावित है। उनके साहित्यिक जीवन के तीन आप्यायित, अमर और अतुलनीय स्तंभ हैं- गौरवपूर्ण इतिहास- लेखन, गंभीर निबंधकारिता और अप्रतिम समीक्षा-लेखन। आलोचक रामविलास शर्मा ने शुक्ल जी का महत्त्व बताते हुए लिखा है, “ हिंदी-साहित्य में शुक्ल जी का वही महत्त्व है, जो उपन्यासकार प्रेमचंद या कवि निराला का। उन्होंने आलोचना के माध्यम से उसी सामंती संस्कृति का विरोध किया, जिसका उपन्यास और कविता के माध्यम से प्रेमचंद और निराला ने।” शुक्ल जी की आलोचना- भाषा से गुजरना हिंदी गद्य की शक्ति-सामर्थ्य से परिचित होना है। उनकी भाषा बोलती है, हृदय में गहरे उतरती है और मौका पाकर व्यंग्य के तीखे बाण भी चला देती है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल का जन्म 4 अक्टूबर, 1884 ई. को उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के अगोरा गाँव में हुआ था। अध्ययन के क्षेत्र में पिता ने इनपर उर्दू और अंग्रेजी पढ़ने के लिए जोर दिया तथा पिता की आँख बचाकर वे हिंदी भी पढ़ते रहे। 19o1 ई. में मिशन स्कूल से स्कूल फाइनल की परीक्षा उत्तीर्ण की तथा प्रयाग के कायस्थ पाठशाला इंटर कालेज से एफ.ए. पढ़ने के लिए आए। कमजोर गणित की वजह से ‘प्लीलीडरशिप’ की परीक्षा पास करनी चाही, पर उसमें भी असफलता पाई। बावजूद इसके इन सब के मध्य वे बराबर साहित्य, मनोविज्ञान, इतिहासादि के अध्ययनरत रहे। मिर्जापुर के पंडित केदारनाथ पाठक, बद्रीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ के संपर्क में आकर उनका अध्ययन- अध्यवसाय और बलवती हुआ। यहीं पर उन्होंने हिंदी, उर्दू संस्कृत एवं अंग्रेजी साहित्य का वह गहन अनुशीलन प्रारंभ कर दिया था, जिसका उपयोग वे आगे चलकर अपने लेखन में जमकर कर सके।

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शुक्ल जी ने अपने साहित्यिक जीवन के प्रारंभ में लेख लिखे हैं और फिर गंभीर निबंधों का प्रणयन किया है, जो ‘चिंतामणि’ (दो भाग) में संकलित हैं। उन्होंने ब्रजभाषा और खड़ी बोली में फुटकर कविताएँ लिखीं तथा एडविन आर्नल्ड के ‘लाइट ऑफ एशिया’ का ब्रजभाषा में ‘बुद्धचरित’ नाम से पद्यानुवाद किया। जोसेफ एडिसन के ‘प्लेजर्स ऑफ इमिजिनेशन’ की ‘कल्पना का आनंद’ से तथा राखाल दास वंधोपाध्याय के ‘शशांक’ उपन्यास का भी हिंदी में रोचक अनुवाद किया। अपने ‘हिंदी-साहित्य का इतिहास’ में काव्यप्रवृत्तियों एवं कवियों का परिचय सहित उनकी समीक्षा भी की है।

शुक्ल की हिंदी- आलोचना को पहली देन है-साहित्यिक अभिरुचि में परिवर्तन। स्मरणीय है कि रीतिकालीन साहित्य और रीतिवादी ग्रंथों को पीछे करते हुए भक्तिकालीन साहित्य को सामने लाए थे। तुलसी उनके प्रिय कवि हैं, क्योंकि उनमें लोकमंगल की भावना है। वे जायसी को प्रतिष्ठित करते हैं और ‘नागमति’ के विरह वर्णन को हिंदी की अद्वितीय वस्तु घोषित करते हैं। वे काव्य में कल्पना से अधिक महत्त्व अनुभूति को देते हैं। कविता में वे योग, ध्यान आदि का कोई स्थान नहीं स्वीकारते। इसी से वे कबीर के और छायावाद के रहस्य का विरोध करते हैं। प्रबंध काव्य इन्हें अधिक प्रिय हैं, क्योंकि प्रबंध में रचनाकार का मार्मिक स्थलों की रचना करने का और लोकमंगल की साधना करने का अवसर मिल पाता है। उन्होंने आलोचना के केंद्र में भक्ति कालीन कवियों को प्रतिस्थापित किया और इसी के साथ भारतीय रसवाद की भी पुनः प्रतिष्ठा की। वे आलोचना को सृजनात्मक साहित्य के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं।

शुक्ल जी की समीक्षा का मूल स्वर यद्यपि व्याख्यात्मक है, तथापि आवश्यकता पड़ने पर उन्होंने आकलन संबंधी निर्णय लेने में साहस की कमी नहीं दिखाई। नलिन विलोचन शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘साहित्य का इतिहास दर्शन’ में कहा है कि शुक्ल जी से बड़ा समीक्षक संभवतः उस युग में किसी भी भारतीय भाषा में नहीं था। विचारोपरान्त बात की सत्य प्रतीति होती है और ऐसा लगता है कि समीक्षक के रूप में शुक्ल जी अब भी अपराजेय हैं। उन्होंने अपनी पद्धति को युगानुरूप नवीन बनाया था। रस और अलंकारादि की अभिनव व्याख्या की है। एक ओर अपनी आलोचना का ढाँचा भारतीय रहने दिया है, वहीं पर उसका बाह्य रूप और रचना-विधान पश्चिम से लिया है। अपनी पद्धति का प्रयोग तुलसी, सूर, जायसी जैसे श्रेष्ठ कवियों की समीक्षाओं के साथ-साथ अपने इतिहास में छोटे कवियों पर भी उतनी ही सफलता से किया है। अपने ‘समीक्षादर्श’ में एक की अनुभूति को दूसरे तक पहुँचाना काव्य का लक्ष्य माना है।

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शुक्ल जी का साहित्यिक इतिहासलेखक के रूप में हिंदी में अत्यंत गौरव पूर्ण स्थान है। उन्होंने साहित्य को शिक्षित जनता के साथ संबद्ध किया और उनका इतिहास केवल कवि-जीवनी या ढीले सूत्र में गूँथी आलोचनाओं से आगे बढ़कर सामाजिक- राजनीतिक परिस्थितियों से संकलित हो उठा। उन्होंने सामान्य प्रवृत्तियों के आधार पर कालविभाजन और उन युगों का नामकरण किया। इस प्रवृत्ति-साम्य की ओर भी ध्यानाकर्षित किया।

शुक्ल जी एक गंभीर और पंडित निबंधकार हैं। उनके निबंध अत्यंत गहरे रूप में बौद्धिक एवं विषयनिष्ठ हैं। उनके निबंधों की तीन कोटियाँ द्रष्टव्य हैं- मनोविकार विषयक, साहित्य- सिद्धांत विषयक और साहित्यालोचन विषयक। इनमें साहित्य सिद्धांत और साहित्यालोचन विषयक निबंधों का संग्रह प्रत्यक्ष रूप से ‘आलोचना’ से है। मनोविकार संबंधी निबंधों में उनके विशद पांडित्य, प्रौढ़ चिंतन, सहृदयता, सूक्ष्म विश्लेषण आदि का संपुजन है। उन्होंने श्रद्धा, भक्ति, लज्जा, करुणा, लोभ, प्रीति आदि भावों पर निबंध लिखे। ये निबंध उनके साहित्य चिंतन की पुष्ट आधारभूमि हैं। इन निबंधों में मनोविज्ञान का गूढ़ विश्लेषण शास्त्रीय न होकर मार्मिक और तलस्पर्शी है। प्रांजल भाषा के साथ जीवनधर्मी तत्त्वों की बहुलता है। ललित निबंधों-सी आत्मीयता भी है।

मिर्जापुर में अध्यापकी, ‘हिंदी शब्द सागर’ की सम्पादकी, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी अध्यापकी करते हुए पुनः विश्वविद्यालय में हिंदी विभागाध्यक्ष नियुक्त हुए। इसी पद पर रहते हुए 2 फरवरी, 1941 ई. में उनकी श्वास के दौरे में हृदय गति बंद हो जाने से मृत्यु हो गई। ‘चिंतामणि’, ‘रस मीमांसा’, ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’, ‘गोस्वामी तुलसीदास’, ‘सूरदास’ आदि उनकी महत्त्वपूर्ण पुस्तकें हैं।

डॉ. वीरेंद्र कुमार भारद्वाज

शेखपुरा, खजूरी, नौबतपुर, पटना-801109

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