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रोचक आलेख // ठलुआ-पंथी // डा. सुरेन्द्र वर्मा

पथ अनेक हैं और हर पथ आपको कहीं न कहीं ले ही जाता है। लेकिन एक ऐसा भी पथ है ठलुओं का जो उन्हें कहीं नहीं ले जाता। वे कहीं जाना भी नहीं चाहते। ठलुए हैं; पड़े रहेंगे, क्यों कहीं जाएं ? और इस ठलुए ठिकाने पर भी वे कोई जानबूझकर, प्रयत्न पूर्वक नहीं आए हैं। किसी कवि ने क्या खूब कहा है, “मैं नहीं आया तुम्हारे द्वार, पथ ही मुड़ गया था !”

ठलुओं के कई प्रकार होते हैं। कुछ ठलुए जन्म -जात होते हैं। इनके लिए ठीक ही कहा गया है, ‘बड़े बाप के बेटे हैं / जब से जनम लिया लेटे हैं।’ कुछ ठलुए ‘बाई च्याइस’ होते हैं। वे ठलुआगीरी के सिवा कुछ करना ही नहीं चाहते। कुछ भी क्यों न करें, ‘करने’ में कुछ बन कुछ ‘करना’ पडेगा। ठलुआगीरी में तो कुछ करना ही नहीं है। ठलुआगीरी प्यार की तरह है जो किया नहीं जाता, हो जाता है। ठलुआ आदमी अपने को ठलुआ ‘करता’ नहीं, बस, ठलुआ ‘हो’ जाता है। ठलुआगीरी का एक तीसरा प्रकार उन ठलुओं का है जिनपर, आप समझ ही गए होंगे, ठलुआगीरी ‘थोप’ दी जाती है। काम करना चाहते हैं लेकिन मिलता ही नहीं। हमारे देश में ऐसे ठलुए बहुतायत से पाए जाते हैं।

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मैं सोच रहा था, कल मैंने दिन भर क्या किया ? बस, ठलुआ पडा रहा। यह सोचने भर की देर थी कि सोचा, क्यों न ठलुआ-पंथी पर ही कुछ लिख मारा जाए ! ठलुआ-पंथी की बस यही बुराई है। ठलुए हुए नहीं कि बैठे-ठाले कुछ न कुछ ऐसा विचार आ जाता है जो आपको ज़बरदस्ती ठलुआगीरी से अलग कर देता है। आर्केमिडीज़ ठलुए दिमाग से कपडे उतार कर अच्छे-खासे नहा रहे थे कि घेर लिया उन्हें अपने ही नाम के एक सिद्धांत ने। फँस गए बेचारे ! गुसलखाने से बाहर आ गए। खुशी में मिल गया, मिल गया कहते रहे और कपडे पहनना तक भूल गए।

एक कहावत है, “ठलुआ दिमाग शैतान का घर”। ज़रूर किसी शरारती दिमाग ने ही इसे आविष्कृत किया होगा। सच्ची बात तो यह है कि सकारात्मक सोच के लिए ठलुआ दिमाग बहुत ज़रूरी होता है। अगर आपका दिमाग बेमतलब की बातों से भरा रहेगा तो आपको सकारात्मक कोई सोच आएगा ही कैसे ? शांत और ठलुआ दिमाग ही इत्मीनान से सोच पाता है। ऐसा दिमाग जो सारे विचारों से रहित हो सके बड़े बड़े ऋषि-मुनि इसके लिए तपस्या करते है और नहीं पा पाते। ठलुआ गीरी कोई आसानी से प्राप्त होने वाली चीज थोड़ई है।

किस किस को याद कीजिए किस किस को रोइए / आराम बड़ी चीज़ है मुंह ढँक के सोइए। बुजुर्गों के तजुर्बे का यह सार है। ज़ाहिर है, इस कहावत में ठलुआगीरी का ही गुणगान किया गया है।

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कुछ लोग कबीर-पंथी होते हैं, कुछ नानक-पंथी। इसी तरह कुछ अन्य, अन्यान्य पथों को अपनाने की कोशिश करते हैं। लेकिन ठलुआ पंथी किसी ऐसे पथ को नहीं अपनाता जिसे वह प्राप्त ही न कर सके। गांधी मार्ग अपनाने वाले कभी गांधी न बन सके, न कबीर पंथी कबीर तक पहुँच सके न नानक के अनुयायी नानक हो सके। ये सब आदर्शवादी हैं। एक ऐसी दुनिया में रहते हैं जो यथार्थ से कोसों दूर है। ठलुआ-पंथी किसी आदर्श को जिसे हम प्राप्त ही नहीं कर सकते, पाने का प्रयास नहीं है। बेशक, ठलुआ होना एक आदर्श स्थिति है, किन्तु इसे ठलुआ रहकर ही बिना किसी प्रयत्न के हासिल किया जा सकता है।

ठलुओं को आप कभी सुस्त न समझें। जब आदमी ठलुआ होता है उसका दिमाग बड़ी तेज़ी से काम करता है। ठलुआ स्थिति में विचारों का तांता लग जाता है। तब कोई न कोई विचार ऐसा आ ही जाता है जो खुद ठलुआपन्थी के लिए घातक हो जाता है। कोई चिर-ठलुआ नहीं रह सकता। अत: ठलुआ गीरी से डरें नहीं। ठलुआ होने का लुत्फ़ उठाएं। मस्त रहें। ठलुआ होने की मस्ती कभी कभी ही मिल पाती है। लोग ठलुओं से ईर्ष्या करने लगते हैं, जलते हैं। मौक़ा ढूँढ़ते रहते हैं कि की कब उनकी मस्ती छीनी जा सके। ऐसे लोगों से होशियार रहिए। सतर्कता ज़रूरी है।

--डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०/१, सर्कुलर रोड, प्रयागराज-२२१००१

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