रु. 25,000+ के  नाका लघुकथा पुरस्कार हेतु रचनाएँ आमंत्रित.

अधिक जानकारी के लिए यहाँ http://www.rachanakar.org/2018/10/2019.html देखें.

नीचे टैक्स्ट बॉक्स से रचनाएँ अथवा रचनाकार खोजें -
 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें.

नींव की ईंट व अन्य कविताएँ // चंदन कुमार

साझा करें:

आज की संतान आज की संतान हैं हम। माँ-बाप की प्रतिष्ठा की श्मशान हैं हम। आज की ……..हैं हम।          जितने भी बहायें, हमारी खुशी खातिर लहू।-2  ...

आज की संतान


आज की संतान हैं हम।

माँ-बाप की प्रतिष्ठा की श्मशान हैं हम।

आज की ……..हैं हम।

         जितने भी बहायें, हमारी खुशी खातिर लहू।-2

         उनके अरमानों की शाम हैं हम

         आज की ……..हैं हम।

कर्ज तले अहसानों उनके, इस कदर दबे हैं हम।-2

उबरने का इस कर्ज से, रखते नहीं दम।

आज की ……..हैं हम।

          आज जिनके सहारे, उठ खड़े हुए।-2

          देने से सहारा उन्हें ही, कतराते हैं हम।

          आज की ……..हैं हम।

जो बिछाते थे फूल, हमारे कदमों तले।-2.

आज उन्हें ही काँटों का चादर ओढ़ाते हैं हम।

आज की ……..हैं हम।

         विश्वविख्यात पवित्र भारतीय संस्कृति पढ़े हैं,

         किताबों में हम।-2 करते हुए अपवित्र इसे, आती

         नहीं शर्म। कलियुग की वरदान हैं हम।

         आज की संतान हैं हम।

0000000000000


नींव की ईंट


होती टिकी बुनियाद जिसपे, वो नींव की ईंट है।

दबे को दबाना तो दुनिया की रीत है।

होती टिकी बुनियाद …...., वो नींव की ईंट है।

              न लेता साँस, खुली हवा में। होते दफन,

              जिसकी खुशियों के गीत है। होती टिकी

              बुनियाद ………..., वो नींव की ईंट है।

छूती इमारत ऊँचाइयाँ, जितनी भी। बुलंदियाँ

आधारित  किसपे, सर्वविदित है। होती टिकी

बुनियाद …………….., वो नींव की ईंट है।

              है अविचलित, कर्तव्य पथ से। आखिर

              जो, कर्तव्यनिष्ट है। होती टिकी बुनियाद

              ……………., वो नींव की ईंट है।

हो जाए क्षीण गर ये, हाले बयाँ परिलक्षित है।

इसकी हिफाजत से ही, ढांचा सुरक्षित है।

होती टिकी बुनियाद …...., वो नींव की ईंट है।

000000000000000000

जिंदगी


जंग है ये जिंदगी, तंग है ये जिंदगी।

बिना प्रेम के गुलशन के, बेरंग है वे जिंदगी।

      है भरा तनाव से, जीना इसे है दाव से।

      धोखे, जाल-फरेब से, प्रचंड है ये जिंदगी।

      जंग है ये जिंदगी, तंग है ये जिंदगी।

है तबाह इंसानियत, हैवानियत के संग है एक कारवां।

झुक रहा पलड़ा यहां सच्चाई का, देख हालत इस जहाँ

का दंग है ये जिंदगी। जंग है ये जिंदगी, तंग है ये जिंदगी।

       है बोलबाला पाप का, पुण्य का है मिट रहा नमो-निशां।

       है दिख रहा अपराध, चरम छूता हुआ। अति का अंत 

       का  होगा, इसी उम्मीद में  प्रसन्न है ये जिंदगी। जंग है

       ये जिंदगी, तंग है ये जिंदगी।

आएंगे मसीहा, करने तांडव यहाँ। करेंगे अंत पापियों का,

खिलेंगे फूल चमन में प्यार का। ये मत भूलो! परमात्मा का अंग

है ये जिंदगी। जंग है ये जिंदगी, तंग है ये जिंदगी।

0000000000000000


मिलते ऐसे भी लोग


जीवन के सफर में, मिलते ऐसे भी लोग। आत्म दाह

कर जाते हैं, सदन गैर जलाने को। हैं अनभिज्ञ इस

राज से, खिलते कमल को मिल जाता; कीचड़ का 

सहयोग।  जीवन के सफर में, मिलते ऐसे भी लोग।

         अपने मुँह मियाँ मिट्ठू , रखते बनने का शौक।

         कर्म-नीरसता है प्रिय जिन्हें, कर्मठ पर ढाते रोष।

         कर्तव्य-पथ पर अग्रसर हैं, जिनका करते विरोध।

         जीवन के सफर में, मिलते ऐसे भी लोग। 

हमदर्दी का ढोंग रचाते, रखते दिल में छल।

कपटी मित्रता निभाने का, करते कोशिश पुरजोर।

पलक झपकते कर देते, संगमीत का लुटिया गोल।

जीवन के सफर में, मिलते ऐसे भी लोग।

          निज दोष विलोपन  करते, पर छवि  बदनाम।

          मिथ्यावादिता से अलंकृत हो, बन जाते आप महान।

          ज्वलनशीलता का इनको, लग जाता है रोग। जीवन

          के  सफर में, मिलते ऐसे भी लोग।

हैं पराये कंधे पर, बन्दूक चलाने में माहिर।

पर सच्चाई ये कि, हैं अव्वल दर्जे के काहिल।

स्वार्थ हित में अपनों का भी, गाला दबाते लोग।

जीवन के सफर में, मिलते ऐसे भी लोग।

           इनकी सारी करतूतें, हो जाते हैं नाकाम।

           कर्मवीर को हीं मिलता है, कर्मठता का प्रमाण।

           होगी बुराई की चित, चाहे जितनी डाले रोक।

           जीवन के सफर में, मिलते ऐसे भी लोग।

प्रेम सुधा जब बरसेगी, नफरत होगी खाक।

सच्चाई के आगे, नतमस्तक होंगे आप।

कुंठित ही रह जायेगी, चापलूसी की नोक।

जीवन के सफर में, मिलते ऐसे भी लोग।

                  000000000000


राजनीतिक काँटे


सिंक गई रोटी, राजनीति के काँटे की।

छिड़वा दी जंग, एक खेत के दो मूली में।

बस कहा, तू इस पांते की-तू उस पांते की।

सिंक गई रोटी, राजनीति के काँटे की।

         हैं एक मृदा में, पनपे हम। 

         विद्वेष रसायन, किसने घोली।

         भाईचारे के बीच में, क्या जरूरत है नफरत की?

         सिंक गई रोटी, राजनीति के काँटे की।

है राजनीति बिन कंधे की।

वजह यही, लेता सहारा दंगे की

है जरूरतमंद! कभी इस कंधे की, कभी उस कंधे की।

सिंक गई रोटी, राजनीति के काँटे की।

         है दक्षता, खड्डा खोदने की।

         बखूबी आती कला इन्हें, समाज बांटने की।

         फिर देते क्यूँ मिथ्या-दिलासा,स्वनिर्मित-खाई पाटने की।

         सिंक गई रोटी, राजनीति के काँटे की।

न रहे वो लाल जिन्होंने, मिट्टी पे कुर्बानी दी।

नवचेतना लाने में, ताउम्र न्योछावर  तन-मन की।

अब ठहरे वतन-घात, धोखाधड़ी व घोटालेबाज़।

ये पुजारी हैं! समाजवाद की आड़ में,अलगाववाद की नीति की।

सिंक गई रोटी, राजनीति के काँटे की।

   0000000000000000                 

पिता


यारों मैं भी आज बाप बन गया।

अपने पिता के त्याग का एहसास हो गया।

यारों मैं भी………बाप बन गया।

हम थे कितने मूढ़ जो जिद अपनी

        उनसे मनवाते रहे। गर लगी डाँट

        तो मूँह रंग-बिरंगे बनाते रहे।

हमें अपनी गलती का आभास हो गया।

        यारों मैं भी………बाप बन गया।

न पड़ती मार डंडे की, रह जाते उदंड यूँही।

लड़खड़ाते पैर को संभालना सिखा दिया।

यारों मैं भी………बाप बन गया।

देखा था फटेहाल कपड़ों में उन्हें।

        हमें तो खूबसूरत पोशाकों का बादशाह

        बना दिया। यारों मैं भी……….बाप बन  

        गया।

छोड़ी नहीं कसर कोई भी, हमें जमीं से आसमाँ

तक लाने में। अपने अरमानों का गला दबा दिया।

यारों मैं भी………बाप बन गया।

थी बस! हमारी ही फिक्र उन्हें। हमारी

         खुशियों पर सर्वस्व वार दिया।

        यारों मैं भी………बाप बन गया।

है वक्त अब उनके ख्याल रखने का।

अपना ठीक वही सिला होगा क्योंकि हमारा भी

नकलची संतान हो गया।यारों मैं भी आज बाप बन गया”।

00000000000

         “ हिंदी अब पुरानी हो गई है ।”


हिंदुस्तान के कोने-कोने की जुबानी हो गई है।

अब तो परदेश भी इसकी दीवानी हो गई है।

जी हाँ! हिंदी अब पुरानी हो गई है।

     यथा समुद्र में तरिणी प्रवाहित होती है,

     विश्वस्तरीय भाषाखण्ड इसमे समाहित हो गई है।

     जी हाँ! हिंदी अब पुरानी हो गई है।

शब्दों  के आभूषण से भारी हो गई है।

तलवार की धार से भी तीक्ष्ण, इसकी व्यंग्य-वाणी हो गई है।

जी हाँ! हिंदी अब पुरानी हो गई है।

       जटिलता है मगर बहु रोचक व प्यारी हो गयी है।

       इसकी उपन्यासें तो बंगाल की खाड़ी हो गयी है।

       जी हाँ! हिंदी अब पुरानी हो गई है।

इसकी  कविताएं व गीत, मन मोह लेती है।

कहानियाँ व चुटकुले तो, गमगीन होंठों पर भी हँसी के स्रोत

बन गयी है। जी हाँ! हिंदी अब पुरानी हो गई है।

         हिंदी हिन्दोस्ताँ की शान हो गयी है।

         क्योंकि पूरी दुनिया में इसकी पहचान हो गई है।

         हमें भी सम्मान  की लाज रखनी है।

         सरकारी दफ्तरों में भी हिंदी की कार्य-नवाजी है।

         जी हाँ! हिंदी अब पुरानी हो गई है।

हमारी राष्ट्रभाषा अब अजय हो गई है।

क्यूँकि आज का नारा जय हिंद! जय हिंदी हो गई है।

जी हाँ! हिंदी अब पुरानी हो गई है।

00000000000                  

प्रलय


जगह-जगह प्रलय का हाहाकार है।

ओ ऊपर वाले! तरस खा।

तूने ही रचा ये संसार है।

जगह-जगह ……….हाहाकार है।

       कहीं बाढ़, भूकंप, तो कहीं ज्वालामुखी खूंखार है।

       इसके आगोश में हर इंसा बना बेबस-लाचार है।

       जगह-जगह ……….हाहाकार है।

न जाने मांग कितनी उजर रही, है कितनी गोद सूनी हो रही।

बचा तबाही के मंजर से, बस तेरे रहम की दरकार है।

जगह-जगह ……….हाहाकार है।

        जाती-धर्म के चक्रव्यूह में, उलझ चुका संसार है।

        कूटनीति के दलदल में फँसा पड़ा जगसार है।

        जगह-जगह ……….हाहाकार है।

ईर्ष्या-द्वेष और पाप जहाँ में, धर रहा रूप विकराल है।

देख तेरी दुनिया में, न एकता है न प्यार है।

जगह-जगह ……….हाहाकार है।

       ऊपर वाले कुछ ऐसा कर! बरपा सिर्फ पापियों पर    

       प्रलय कहर। तेरा विचित्र संसार है।

       जगह-जगह ……….हाहाकार है।

0000000000000

ओ अमन हत्यारे शर्म करो!


जातिवाद या धर्म विवाद की, यातना आखिर कब तक दोगे?

सत्तासीनता के लोलुप, क्या राष्ट्र विखण्डित कर दोगे?

ओ अमन हत्यारे शर्म करो! बर्बाद चमन को कर दोगे!        

          चिंगारी फैलाते हो, क्या राख वतन को कर दोगे?

          हर तरफ कोहराम मचा है, परस्पर संग्राम मुखर

          दोगे? ओ अमन हत्यारे शर्म करो! बर्बाद चमन को

          कर दोगे!       

आपस में उलझाकर, क्या शांति भंग कर दोगे?

क्या स्वार्थ में अंधे होकर, पीड़ा से दामन भर दोगे?

ओ अमन हत्यारे शर्म करो! बर्बाद चमन को कर दोगे!       

          घोटालों से जेब भरोगे, राष्ट्र सेवा का ढोंग रचोगे?

          ओ अस्तित्वहीन दगेबाजों! दाग तिरंगा कर दोगे ! ओ

          अमन हत्यारे शर्म करो! बर्बाद चमन को कर दोगे!    

बंद करो ये धंधेबाजी! जनता को कब तक लूटोगे?

सरहद के रखवाले को,सम्मान भला तुम क्या दोगे?

अमन हत्यारे शर्म करो! बर्बाद चमन को कर दोगे! 

                   000000000000000

नव पीढ़ी के नवयुवक


पेट्रोल छिड़कते अपने जब, गैरों से बगावत क्या करना।

बस एक चिंगारी बाकी है, जब राख वतन को है करना।

नव पीढ़ी के नवयुवक, संग्राम जहाँ से क्या करना।

रंग बदलते गिरगिटी, खद्दरदारी का क्या कहना।

है छल से स्वदेश जला, परदेश जलाकर क्या करना।

नव पीढ़ी के नवयुवक, संग्राम जहाँ से क्या करना।

सीमा विवाद मे क्या पड़ना ।सीमा विवाद मे क्या पड़ना।

सहोदर से जब खतरा है, इल्जाम पराये क्या मढ़ना।

नव पीढ़ी के नवयुवक, संग्राम जहाँ से क्या करना।

जब पिता पुत्र पर साधे स्वार्थ, ऐसे रिश्ते का क्या करना।

क्रांति कुनबे से है करना, वैमनस्य की शंका क्या रखना।

नव पीढ़ी के नवयुवक, संग्राम जहाँ से क्या करना।

गृह युद्ध की बारी है फिर सरहद पार से क्या लड़ना।

है राष्ट्र लुटेरे अपने ही तो व्यर्थ शहादत क्या करना।

नव पीढ़ी के नवयुवक, संग्राम जहाँ से क्या करना।

000000000000

           वृक्ष का संदेश


दिन रात तेरी बलायें लिया करती हूँ।

पग-पग तुम्हें छाया दिया करती हूँ।

युग-युग जियो मेरे लाल! ये दुआ करती हूँ।

        तेरी खुशी वास्ते हर दर्द सहती हूँ।

        दुश्मनों को तेरे, आत्मसात करती हूँ।

        युग-युग जियो मेरे लाल! ये दुआ करती हूँ।

तेरे साँसों की डोर मुझसे बंधी है।

तुम्हें प्राणदायिनी हवा जो देती हूँ।

युग-युग जियो मेरे लाल! ये दुआ करती हूँ।

        पैरो तले जमीन न खिसके, मिट्टी जकड़ कर रखती हूँ।

        भूस्खलन की मार न पड़े, इसलिए ऐसा करती हूँ।       

        युग-युग जियो मेरे लाल! ये दुआ करती हूँ।

झूम-झूम कर बदल राजा को, खुश किया करती हूँ।

इस तरह बारिश का आह्वान किया करती हूँ।

युग-युग जियो मेरे लाल! ये दुआ करती हूँ।

         अपनी दुनिया तेरी खुशियों पर न्योछावर करती हूँ।

         तेरे स्वास्थ्य का भरपूर ख्याल रखती हूँ।

         युग-युग जियो मेरे लाल! ये दुआ करती हूँ।

आज तूने ये क्या किया? मेरी दुनिया उजाड़कर हरी-भरी धरा

को बंजर बना दिया! जिससे तेरे दुनिया थी उसे स्वयं मिटा दिया! मानो अपनी खुशियों का गला दबा दिया!

          मेरा संदेश सुनो मेरे लाल! धारा पुनः करो हरियाल!

          गर रहना है स्वस्थ्य-खुशहाल, तो मैं ये सलाह देती हूँ।

          युग-युग जियो मेरे लाल! ये दुआ करती हूँ।

000000000000

एक लड़का मनचला मिला


किसी गुमनाम सड़क पर एक लड़का मनचला मिला।

दूर से किसी हंसी लड़की का पीछा करता मिला।

किसी गुमनाम सड़क पर एक लड़का मनचला मिला।

      उसकी आँखों में मुहब्बत का चेहरा मिला।

      उसकी होंठों पर हँसी का फव्वारा मिला।

      किसी गुमनाम सड़क पर एक लड़का मनचला मिला।

लड़की का भी मुड़-मुड़ देखता मुखड़ा मिला।

कमबख्त दोनों में प्यार का क्या गुल खिला।

किसी गुमनाम सड़क पर एक लड़का मनचला मिला।

       कहीं दूर तक यही सिलसिला मिला।

       अजीबोगरीब इश्क का पचड़ा मिला

       किसी गुमनाम सड़क पर एक लड़का मनचला मिला।

लड़की सड़क पार करती मिली।

देखते-देखते गाड़ियों का एक कारवाँ मिला व लड़का

किनारे पर रुक कुछ क्षण निहारता मिला।

किसी गुमनाम सड़क पर एक लड़का मनचला मिला।

       अब गुजरा हुआ गाड़ियों का कारवाँ मिला।

       दृश्य स्पष्ट हुआ, सड़क के बीचोबीच एक बड़ा जमावड़ा

       मिला। पास जाके देखा तो उसी लड़की का शव कुचला

       मिला। लड़का भी दौर उसकी लाश पर सर पटक रोता

       मिला। किसी गुमनाम सड़क पर एक लड़का मनचला   

       मिला

बड़ा दुखद ऐसा हादसा मिला।

सड़क व सावधानी का रिश्ता गहरा मिला।

किसी गुमनाम सड़क पर एक लड़का मनचला मिला।

                          000000000000000


दुश्मन ऐसा नहीं देखा


चिल्मन देखा, चिल्मन में छुपा चेहरा नहीं देखा।

दोस्ती की आड़ में, दुश्मनी का पहाड़ नहीं देखा।

यारों दुश्मन! ऐसा नहीं देखा।

लोग यूँही मुस्कुरा देते हैं गम छुपाने को।

पर कभी उबलता हुआ, चेहरा नहीं देखा।

यारों दुश्मन! ऐसा नहीं देखा।

दोस्तों बड़ा ही मजेदार खेल है आँख-मिचौली का।

अपने पीठ पीछे छुपा, चेहरा नहीं देखा।

यारों दुश्मन! ऐसा नहीं देखा।

लोग चाँद का बखूबी तारीफ किया करते हैं।

पर उसमें लगा दाग, गहरा नहीं देखा।

यारों दुश्मन! ऐसा नहीं देखा।

गुलाब देखा, उसकी टहनी का काँटा नहीं देखा।

वफा देखी, बेवफाई का सन्नाटा नहीं देखा।

यारों दुश्मन! ऐसा नहीं देखा।

जहर कड़वा होता है, ऐसा मीठा नहीं देखा।

समझौते की आड़ में दुश्मनी का बीजारोपण नहीं देखा।

यारों दुश्मन! ऐसा नहीं देखा।

     000000000000000                       

पत्थर दिल


न जाने कितनी चोटें खायी, बेरहम जमाने में।

हैं रौंदे जाते, घर गैरों के बसाने में

न जाने कितनी चोटें खायी, बेरहम जमाने में।

लग जाते हैं चार चाँद, लोगों के आशियाने में।

कमबख्त जकड़े जाते हैं, यूँही हम दीवारों में।

न जाने कितनी चोटें खायी, बेरहम जमाने में।

थी खूब मुहब्बत, शाहजहाँ को भी अपनी बेगम से।

आखिर कर दिए ना जिस्म के टुकड़े मेरे, अविस्मरणीय

प्रेम निभाने में। न जाने कितनी चोटें खायी, बेरहम जमाने में।

नहीं छोड़ा हमें शेरशाह शूरी ने भी, जी0 टी0 सड़क बनाने में।

न जाने कितनी चोटें खायी, बेरहम जमाने में।

हम रहकर मूक सहते गए, जुर्म सभी जमाने के।

शर्म न आयी इंसां तुझको, बेरहम हमें बताने में।

हर निर्मम को पत्थर दिल कह, हम पर दाग लगाने में।

न जाने कितनी चोटें खायी, बेरहम जमाने मे।

000000000000

शहीदों का संदेश


हम शहीदों की टोली में आँसू न बहाना।

हमारी शहादत पर दीवाली मनाना।

शेरों की आँखों मे आँसू शोभा नहीं देते।

खून की होली तो हमारी फितरत है।

हमारी वीरगति पर मशाल जलाना।

हमारी शहादत पर दीवाली मनाना।

हो जायेंगे फौलाद भी चूर-चूर।

लाएगी रंग  हौसलों की उड़ान भरना।

हमारे नक्शे कदम आगे बढ़ाना।

हमारी शहादत पर दीवाली मनाना।

बह जाने दो लहू जंग में।

है कुर्बानियाँ विरासत का गहना।

है हमे वतन का मान बढ़ाना।

हमारी शहादत पर दीवाली मनाना।

बिन पानी फसल पैदा नहीं होते।

सींचने दो धरा हम वीरों के रक्त से,

वीर-भूमि कभी बंजर नहीं करना।

रचना विजयगान का ताना-बाना।

हमारी शहादत पर दीवाली मनाना।

कर दो जारी फरमान कायरों को,

कभी आंखों में आंखें डाल देखे।

पीठ पीछे वार कोई वीरता नहीं होती।

हमारी शूरत्व पर ताली बजाना।

हमारी शहादत पर दीवाली मनाना।

हैं बेखौफ मौत से,अपनी शहादत का जश्न जो मानते हैं।

भारत माँ के लाल हम, कर्तव्य सरहद रखवाली करना।

जब बाँधा कफन सर पे तो फिर, मौत से है क्या डरना।

गर है स्नेह अमर वीरों से, सतत मुस्कान भेंट चढ़ाना।

हमारी शहादत पर दीवाली मनाना

000000000000

दो बलिदान

(काव्य छंद हाइकु के रूप में)


उनकी आँखें।

कुछ कहने आई।।

तरस गई।।।

जुबां खामोश।

निःशब्द प्यार यूँ ही।।

छलक गई।।।

जैसे बादल।

मौसम के बिना ही।।

बरस गई।।।

कुछ भी नहीं।

ये माँ की ममता थी।।

पुत्र खातिर।।

ये क्या हुआ।

कोख सूनी हो गई।।

राष्ट्र रक्षा मे।।

दो बलिदान।

ममता व पुत्र की।।

नमन करूँ।।।

00000000000

देश न बाँटो


काले-गोरे का भेद रहा, अब जाती धर्म का दंगा है।

देश न बाँटो अमन लुटेरों क्या यही तुम्हारा धंधा है?

तुम ठहरे सफेद-पोश, इरादे तुम्हारे काले हैं।

मंदिर-मस्जिद फसाद क्या यही तुम्हारा मुद्दा है?

देश न बाँटो अमन लुटेरों क्या यही तुम्हारा धंधा है?

भूल गए आजादी हमने, जद्दोजहद से पाई है।

एक सूत्र में बंध, अंग्रेजी सत्ता हिलायी है।

क्या हमें विखंडित करके राष्ट्र खोखला करना है?

देश न बाँटो अमन लुटेरों क्या यही तुम्हारा धंधा है?

कहते आप राष्ट्रभक्त, फिर करते क्यूँ घोटाला हो?

हमें मूर्ख बनाने का क्या यही तुम्हारा जरिया है?

देश न बाँटो अमन लुटेरों क्या यही तुम्हारा धंधा है?

‘धर्मनिरपेक्षता’ अपने वतन की, अतुलनीय विशेषता है।

क्या इसे सुलगते देख, हुआ कलेजा ठंडा है?

देश न बाँटो अमन लुटेरों क्या यही तुम्हारा धंधा है?

0000000000

कलुषित लोकतंत्र


क्या सुलगता रहेगा देश राजनीति की आग मे?

और कब तक सिंकेगी रोटी स्वदेशी लुटेरे की?

जाने कब आएगी अक्ल, यूँ ही बह जाते हम कूटनीतिक

सैलाब में। शायद आदत है हमें, बार-बार मुँह की खाने की।

और कब तक सिंकेगी रोटी स्वदेशी लुटेरे की?

प्रजातंत्र का मतलब क्या है? दंगा-फसाद, अपहरण उद्योग

हत्या या घोटाला है? हैं मूकदर्शक हो रहे आत्म-अत्याचार

का, इसीलिए तो बोलबाला है राजनीतिक भ्रष्टाचार का।

आओ जगाएँ आत्मशक्ति, जलाएं मशाल पुनर्जागरण की।

और कब तक सिंकेगी रोटी स्वदेशी लुटेरे की?

अपराधी सीना तान खड़ा है, सिर उसके राजनीतिक हाथ

जो पड़ा है। रहे उड़ा क्या खूब, धज्जियाँ कानूनी हथकंडे की।

और कब तक सिंकेगी रोटी स्वदेशी लुटेरे की?

इन्हें स्वदेश से प्यार नहीं है, ये दुश्मन है सरकार नहीं है।

हमे ही देश बचाना होगा, हम जनता हैं लाचार नहीं हैं।

हैं कड़ी हम, लोकतांत्रिक गणराज्य की। और कब तक

सिंकेगी रोटी स्वदेशी लुटेरे की?

जाति-धर्म का भेद न कर, राष्ट्रोत्थान कर जाएँ।

मानवता का परचम लहराए, राष्ट्र का मान बढ़ाये।

न बचे जगह आपसी विद्वेष की। और कब तक

सिंकेगी रोटी स्वदेशी लुटेरे की?

आओ एकता सूत्र में, एक साथ बंध जाएं।

कलुषित हुए राजनीति से, लोकतंत्र बचाये।

हमारी अखंडता ही है, पहचान देश की।

और कब तक सिंकेगी रोटी स्वदेशी लुटेरे की?

0000000000000


शुक्र है राष्ट्रीय आपदा मोचन बल का


चहुँ ओर जल का घेरा था, ना दूर-दूर कोई हमारा था।

उफनती नदियों ने भी घरों में डाला डेरा था।

शुक्र है राष्ट्रीय आपदा मोचन बल का,बेबस का बना सहारा था।

थे भूख के मारे तड़प रहे, ऐसा प्रकृति ने मारा थपेड़ा था।

बचा न कोई  बसेरा था, छाया आंखों तले अंधेरा था।

शुक्र है राष्ट्रीय आपदा मोचन बल का, बेबस का बना सहारा था।

था निगल रहा काल आपने आगोश में।

पड़ा मौत का पहरा था।

शुक्र है राष्ट्रीय आपदा मोचन बल का, बेबस का बना सहारा था।

जन-जीवन सामान्य हुआ जब, भीषण भूकंप पधारा था।

विध्वंशकारी प्रकोप था जिसका, मातम ने रोष जताया था।

शुक्र है राष्ट्रीय आपदा मोचन बल का, बेबस का बना सहारा था।

भूस्खलन ने भी कहाँ छोड़ा, चट्टानों ने दबाया था।

हृदय विदारक प्रलय से जब, जन मानस थर्राया था।

शुक्र है राष्ट्रीय आपदा मोचन बल का, बेबस का बना सहारा था।

सन चौरासी-गैस त्रासदी का दंश हमने झेला था।

न थी कोई तकनीक अरु ना कोई ऐसा  शेरा था।

२०११-जापान सुनामी व २०१५-नेपाल भूकंप भी भीषण कहर उकेड़ा था।

शुक्र है राष्ट्रीय आपदा मोचन बल का, बेबस का बना सहारा था।

जहाँ भी देखा एक हीं चेहरा, रक्षक बनकर उभरा था।

मौत से खेलकर मानवता का लाया नया सबेरा था।

शुक्र है राष्ट्रीय आपदा मोचन बल का, बेबस का बना सहारा था।

               0000000000000


मानसिक आपदा


ऐसी आपदा ।

दिल दिए दहला ।।

चित्र मार्मिक ।।।

एक इंसान ।

       पाया मेरे गली में ।।

       था विचलित ।।।

पड़ा बेसुध ।

न गम न खुशी में ।।

शून्य लक्षित ।।।

था भूखा-प्यासा ।

       बेखबर प्रतीत ।।

       दृश्य दैनिक।।।

नंग-धरंग ।

गुजारता वो रैन ।।

चौके पथिक ।।।

मिलते दान ।

        रहे भौंचक मूक ।।

        मन भ्रमित ।।।

गुजरे माह ।

राज्य न सुनी आह ।।

पड़ा वहीं कुंठित ।।।

हैं ऐसे  कई ।

       बिछड़े अपनों से ।।

       पथ-भ्रमित ।।।

दिमागी रोग ।

जीवन मृतप्राय ।।

प्राण जिल्लत।।।

आवारा कुत्ते ।

       हैं होते संरक्षित ।।

       प्रणाली नीक ।।।

ये तो इंसान ।

सूबे करे इलाज ।।

होवें रक्षित ।।।

ये भी आपदा ।

      हैं अपने ही लोग ।।

      न हों आहत ।।।

00000000000


अटैची में अटका प्राण


है उम्र संतावन की ।

हूँ सेवानिवृत्त फौजी जवान।

दारोगा जी एक रिपोर्ट लिख लो, अटैची में अटका प्राण।

मैदान में बहाये पसीने।

हुए युद्ध में लहू-लुहान।

दारोगा जी एक रिपोर्ट लिख लो, अटैची में अटका प्राण।

न सोने को गद्दे मिले।

न मिले कभी आराम।

दारोगा जी एक रिपोर्ट लिख लो, अटैची में अटका प्राण।

गिनी-गिनाई छुट्टियाँ मिली।

रहे सरहद पर सीना तान।

दारोगा जी एक रिपोर्ट लिख लो, अटैची में अटका प्राण।

कहीं जानी दुश्मन बने नक्सल।

उतनी ही आतंकवाद ।

दारोगा जी एक रिपोर्ट लिख लो, अटैची में अटका प्राण।

चंदन फौजी ने ग्रेनेड भी खाए।

फिर भी न निकली जान ।

दारोगा जी एक रिपोर्ट लिख लो, अटैची में अटका प्राण।

जान पे खेलकर पाएँ हमने, जीवन में सम्मान।

अनुशासन में ही गुजर गए सारी उम्र तमाम।

दारोगा जी एक रिपोर्ट लिख लो, अटैची में अटका प्राण।

बड़े जतन से जमा किये थे, पैसे दुई-एक लाख।

रेलगाड़ी से ही उड़ा गए, थे चोर बड़े महान।

दारोगा जी एक रिपोर्ट लिख लो, अटैची में अटका प्राण।

     0000000000


किसान


चीर कलेजा धरती का हम अन्न उगाने वाले हैं।

हमें धूप से वैर नहीं, मौसमी त्रासदायें संग खेले हैं।

हैं श्रमवीर उत्पादक, देते सबको निवाले हैं।

धरा स्वेद से करते सिंचित, पड़े सलिल के लाले हैं।

चीर कलेजा धरती का हम अन्न उगाने वाले हैं।

हो रहे शुष्क नलकूप हमारे, नहरें भी पड़ गई खाली है।

पेट्रोल-डीजल महँगे हो रहे अतिशय, शोणित जलाने वाले हैं।

चीर कलेजा धरती का हम अन्न उगाने वाले हैं।

बाजारों में आग लगी है, नौकरोशाहों की तनख्वाह बढ़ी है।

मंहगाई की प्रबल मार, हम नीरव झेलने वाले हैं।

चीर कलेजा धरती का हम अन्न उगाने वाले हैं।

आंखें खोल देखे! कितनी समस्याएँ पाले हैं।

इस धरती का उद्धार करे वो, जो सरकार चलाने वाले हैं।

चीर कलेजा धरती का हम अन्न उगाने वाले हैं।

धरती बंजर हो जायेगी, जल संचय की बारी है।

नहीं तो भूखे मरना होगा, कितने भी पैसे वाले हैं।

चीर कलेजा धरती का हम अन्न उगाने वाले हैं।

उन्नत्ति का द्वार बचा लो, जीवन का संहार बचा लो।

सुलझा लो किसानी समस्याएँ, मत भूलो हम भी सरकार

सरकार बनाने वाले हैं। चीर कलेजा धरती का हम अन्न उगाने वाले हैं।

000000000


भूकंप व राष्ट्रीय आपदा मोचन बल


जब-जब धरती होवे कंपित, मनुवास विस्थापित।

ध्वस्त ढांचा तले फांसे लोग, तो होवे कछु विखंडित।

भये प्राकृति निर्मोही, करे काल रूप जब धृत।

पड़े संकट में प्राण, लेवे आखिरी श्वास हृदय-स्पंदित।

तीतर-वितर पड़े धरातल, होत लहू विरंजित।

पल ऐसे दर्द-कराह से, धरती-अम्बर गुंजित।

सूनी गोद,सुनी माँग,कलाई सूनी; करे जलजला व्यथित।

निःसहाय, सहमे हुए, निराश आंखे आखिर जो आपदा पीड़ित।

घटना अवगत आपदा मोचक की प्रतिक्रिया बड़ी उचित।

राहत-बचाव कार्य का देते अंजाम त्वरित।

रखते पास बचाव उपकरण, है जो भी आधुनिक।

देते ढूंढ-ढूंढ कर राहत, करते खतरों से  विमोचित।

हैं प्राथमिक उपचार में भी दक्ष, अव्वल दर्जे प्रशिक्षित।

इनके अमूल्य योगदान प्रलय  में, बचाते अनेकों जीवित।

हैं राष्ट्रीय आपदा मोचन बल के रक्षक बड़े समर्पित।

प्राकृतिक चाहे मानव निर्मित हर विपदा से करे सुरक्षित।

0000000000000

आज की प्रशासन


आम जनता की क्या मजाल जो प्रशासन का मजाक उड़ाए।

आम जनता को एक रुपया के लिए तरसनी पड़ती है लेकिन

प्रशासन के आगे नोटों की ढेर लगी रहती है।

यूँ डंडे घुमाकर नोटों की बौछार कर देती हैं।

पैसे लेकर तो अपराधी को भी फरार कर देती है।

आम जनता की क्या मजाल जो प्रशासन का मजाक उड़ाए।

आज ईमानदार लोग कारागार मे चले जाते हैं। पैसे देकर तो

खूनी भी सुरक्षित कार मे चले जाते हैं।

आम जनता की क्या मजाल जो प्रशासन का मजाक उड़ाए।

कहा जाता है उनके ऊपर राजनीतिक दबाव है।

शायद यही तो भ्रष्टाचार का प्रभाव है।

आम जनता की क्या मजाल जो प्रशासन का मजाक उड़ाए।

आज उनके ऊपर घूसखोरी का बवाल है। पर ऐसी बात नहीं

है भाई, क्यूँकि वे तो अपराधियों के दलाल हैं।

आम जनता की क्या मजाल जो प्रशासन का मजाक उड़ाए।

000000000000000

लौटा दो हरिताभ


हमे कैद से रिहा करो ओ मनुपुत्र सरकार।

वीरान पड़ा है विपिन हमारा लौटा दो हरिताभ।

लगता तेरा चिड़ियाखाना जैसे कारागार।

हमे यहाँ से मुक्त करो करते यही गुहार।

वीरान पड़ा है विपिन हमारा लौटा दो हरिताभ।

चारदीवारी कैसा होता कोई पूछे मेरा हाल।

दिखते नहीं पहाड़-जंगल परिकल्पना का संसार।

वीरान पड़ा है विपिन हमारा लौटा दो हरिताभ।

होते निर्मित अट्टालिकाएँ, बिछे सड़कों के जाल।

हो रहे आशय हमारे जंगल-झाड़ उजाड़।

वीरान पड़ा है विपिन हमारा लौटा दो हरिताभ।

है घुटन-भरी अब जिंदगी, रहे नहीं खुशहाल।

हम चौपाया खुली हवा मे नहीं ले पा रहे साँस।

वीरान पड़ा है विपिन हमारा लौटा दो हरिताभ।

वैश्विक उष्णता आरण्य उगाने का करता आगाज।

वरना बढ़ता ताप धरा को कर देगा बेताब।

वीरान पड़ा है विपिन हमारा लौटा दो हरिताभ।

वृक्ष लगाओ पर्यावरण बचाओ, बने प्रदूषण मुक्त संसार।

झुलस रहे इस जीवन का कर डालो उद्धार

वीरान पड़ा है विपिन हमारा लौटा दो हरिताभ।

000000000


सरहद पर होली


सजनी तेरी खातिर लाया तीन रंग की चोली।

हँसते-हँसते खेले हमने रक्त वर्ण की होली।

जोगीरा सा रा रा रा रा, जोगीरा सा रा रा रा रा।

एक रंग को समझ ले है ये शूर साजन रंगोली।

गोली आगे सीना रख दुश्मन की बंद की बोली।

जोगीरा सा रा रा रा रा, जोगीरा सा रा रा रा रा।

दूजा सच्चा कर्तव्य हमारा, लगा दी जान की बोली।

चंदन आखिर बाज न आये, खेले गोली से धूरखेली।

जोगीरा सा रा रा रा रा, जोगीरा सा रा रा रा रा।

तीजा रंग से भारत माँ की आन पे दी कुर्बानी।

राष्ट्रध्वज का मान बढ़ाया, कर सरहद  रखवाली।

जोगीरा सा रा रा रा रा, जोगीरा सा रा रा रा रा।

सजनी तुम भी खूब मनाओ मजे मे जमकर होली।

चंदन सजन पर करो गर्व, टपके ना अश्रु थोड़ी।

जोगीरा सा रा रा रा रा, जोगीरा सा रा रा रा रा।

00000000000


नारी की पुकार


हो रही विकृत संस्कृति विकार मिटाने आओ आज!

ओ देव हमारे अवतृत होकर संस्कार बचाने आओ आज!

है घेर रही माया कलयुगी। जोगी बन रहा है भोगी।

हो रही विकृत संस्कृति विकार मिटाने आओ आज!

ओ देव हमारे अवतृत होकर संस्कार बचाने आओ आज!

द्वापर में था कंस राज, राज बचाने आगे थे। द्रौपदी के

चिर-हरण से लाज बचाने आये थे।

हो रही विकृत संस्कृति विकार मिटाने आओ आज!

ओ देव हमारे अवतृत होकर संस्कार बचाने आओ आज!

आज अपराध का हो रहा गुणगान। इज्जत लूटी जा रही

सरेआम।हो रही विकृत संस्कृति विकार मिटाने आओ आज!

ओ देव हमारे अवतृत होकर संस्कार बचाने आओ आज!

तड़प रही हूँ, चीख रही हूँ, लूटी जा रही हूँ खुलेआम।

ओ देव हमारे कहाँ छुपे हो, अबला की सुनले पुकार!

हो रही विकृत संस्कृति विकार मिटाने आओ आज!

ओ देव हमारे अवतृत होकर संस्कार बचाने आओ आज!

है अंधा कानून हमारा, इसे राह दिखा दे आज!

हो रही विकृत संस्कृति विकार मिटाने आओ आज!

ओ देव हमारे अवतृत होकर संस्कार बचाने आओ आज!

000000000000


तपो तुम ही


तपो तुम ही।

तुम्ही देश के लाल।

तुम्ही संभाल।

शत्रु निज भी।

देते दर्द पहाड़।

करे बेहाल।

हो राष्ट्र नाज।

तुम्हें दुआ अपार।

हिय विशाल ।

थको तुम ही।

न लो कभी विराम।

झुके न भाल।

हो गर्व तुम।

रखते शीश थाल।

है किसे ख्याल।

स्वार्थी जहान।

करे तू बलिदान।

पूछा न हाल।

तपो तुम ही।

तुम्ही देश के लाल।

तुम्ही संभाल।

---

कवि:- चंदन कुमार

         आत्मज वेद प्रकाश शर्मा, छोटी कोपा,

         नौबतपुर,पटना(बिहार) 801109

         दूरभाष-829450150

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर

-----****-----

-----****-----

|नई रचनाएँ_$type=list$au=0$label=1$count=5$page=1$com=0$va=0$rm=1

.... प्रायोजक ....

-----****-----

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

~ विधाएँ ~

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---


|आपके लिए कुछ चुनिंदा रचनाएँ_$type=blogging$count=8$src=random$page=1$va=0$au=0

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3841,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,336,ईबुक,192,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,257,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,105,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2785,कहानी,2116,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,486,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,130,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,90,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,22,पाठकीय,61,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,329,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,327,बाल कलम,23,बाल दिवस,3,बालकथा,50,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,9,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,17,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,238,लघुकथा,831,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,4,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,315,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,62,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1919,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,648,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,688,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,55,साहित्यिक गतिविधियाँ,184,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,58,हास्य-व्यंग्य,68,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: नींव की ईंट व अन्य कविताएँ // चंदन कुमार
नींव की ईंट व अन्य कविताएँ // चंदन कुमार
https://lh5.googleusercontent.com/bsbvqjdYQFF6EK5d2VVtCHeLgU7x7WF0dmhFDYDaRtPIpsF5AU825AWvflgWxA7xS0nDwqVEV0Lrc4P1-W7RnQk_Lprv6GI8H0Zl1cJ8oGQpip1HR86p9ky2Zmt6vDBo_nu60OLV
https://lh5.googleusercontent.com/bsbvqjdYQFF6EK5d2VVtCHeLgU7x7WF0dmhFDYDaRtPIpsF5AU825AWvflgWxA7xS0nDwqVEV0Lrc4P1-W7RnQk_Lprv6GI8H0Zl1cJ8oGQpip1HR86p9ky2Zmt6vDBo_nu60OLV=s72-c
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2018/10/blog-post_49.html
https://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/2018/10/blog-post_49.html
true
15182217
UTF-8
सभी पोस्ट लोड किया गया कोई पोस्ट नहीं मिला सभी देखें आगे पढ़ें जवाब दें जवाब रद्द करें मिटाएँ द्वारा मुखपृष्ठ पृष्ठ पोस्ट सभी देखें आपके लिए और रचनाएँ विषय ग्रंथालय खोजें सभी पोस्ट आपके निवेदन से संबंधित कोई पोस्ट नहीं मिला मुख पृष्ठ पर वापस रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरूवार शुक्रवार शनिवार रवि सो मं बु गु शु शनि जनवरी फरवरी मार्च अप्रैल मई जून जुलाई अगस्त सितंबर अक्तूबर नवंबर दिसंबर जन फर मार्च अप्रैल मई जून जुला अग सितं अक्तू नवं दिसं अभी अभी 1 मिनट पहले $$1$$ minutes ago 1 घंटा पहले $$1$$ hours ago कल $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago 5 सप्ताह से भी पहले फॉलोअर फॉलो करें यह प्रीमियम सामग्री तालाबंद है चरण 1: साझा करें. चरण 2: ताला खोलने के लिए साझा किए लिंक पर क्लिक करें सभी कोड कॉपी करें सभी कोड चुनें सभी कोड आपके क्लिपबोर्ड में कॉपी हैं कोड / टैक्स्ट कॉपी नहीं किया जा सका. कॉपी करने के लिए [CTRL]+[C] (या Mac पर CMD+C ) कुंजियाँ दबाएँ